
Vidura’s Message to Dhṛtarāṣṭra: Authorization for Dāna and Public Welfare (विदुरवाक्यम्—दानानुज्ञा)
Upa-parva: Dāna–Anujñā (Permissions for Charity and Redistribution)
Vaiśaṃpāyana reports that Vidura, approached by the king, delivers a consequential message to Dhṛtarāṣṭra. Vidura states that Yudhiṣṭhira has accepted Dhṛtarāṣṭra’s words and praises them; Arjuna likewise conveys that Dhṛtarāṣṭra may regard the households and resources as at his disposal. The discourse emphasizes that the Pāṇḍavas grant permission regarding the kingdom, wealth, and even life-protection—framing authority as ethically delegated rather than contested. Bhīma, recalling accumulated sorrows and past hostility, consents with visible strain, but is steadied by Yudhiṣṭhira and Arjuna, who urge the suspension of anger and contextualize Bhīma’s warrior disposition as kṣatriya-dharma. Vidura further specifies actionable charity: endowments and grants (brahmadeya/agrahāra), funerary and ancestral rites for sons (ūrdhvadehika), and the distribution of jewels, cattle, servants, and small livestock. The plan extends to public good—food and drink halls, cattle-watering facilities, and diverse meritorious works—implemented by royal instruction. Dhṛtarāṣṭra approves Vidura’s counsel and resolves to perform a great donation, timed to Kārttikī, indicating a calendrically anchored, socially visible act of dharmic repair.
Chapter Arc: वन-आश्रम की शान्ति में एक दिव्य हलचल उठती है—नारद, पर्वत, देवल, शिष्यों सहित व्यास और अन्य सिद्ध-मुनि धृतराष्ट्र से मिलने आ पहुँचते हैं। → कुन्ती विधिपूर्वक अतिथियों की पूजा करती है; महर्षि धर्म्य कथाओं से धृतराष्ट्र को रमाते हैं, पर धृतराष्ट्र के मन में भविष्य-गति और अपने अंत की जिज्ञासा गहरी होती जाती है—देवर्षि से वह ‘कहने/पूछने’ की अनुमति माँगता है। → धृतराष्ट्र नारद से निवेदन करता है कि दिव्यदृष्टि-सम्पन्न, सर्ववृत्तान्त-तत्त्वज्ञ ऋषि उसके (और साथियों के) परलोक-गमन का सत्य बतायें; उत्तर में देवर्षि उसके आगामी लोक-गमन का स्पष्ट विधान सुनाते हैं—धृतराष्ट्र गान्धारी सहित कुबेर-भवन/कुबेर-लोक को प्राप्त होगा। → देवर्षि के मधुर वचनों से राजा और समस्त उपस्थितजन प्रसन्न होते हैं; मनीषी ऋषिगण धृतराष्ट्र को आश्वस्त कर सिद्ध-गति से यथाकाम प्रस्थान करते हैं। → कुन्ती के विषय में भी परलोक-गति का संकेत उभरता है—युधिष्ठिर-जननी, धृतराष्ट्र-गान्धारी की सेवा के पुण्य से ‘पति के लोक’ को प्राप्त होगी—यह भविष्यवाणी आगे के घटनाक्रम की छाया डालती है।
Verse 1
वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर वहाँ राजा धृतराष्ट्रसे मिलनेके लिये नारद, पर्वत, महातपस्वी देवल, शिष्योंसहित महर्षि व्यास तथा अन्यान्य सिद्धू, मनीषी, श्रेष्ठ मुनिगण आये। उनके साथ परम धर्मात्मा वृद्ध राजर्षि शतयूप भी पधारे थे
毗舍摩波耶那说道:“阇那美阇耶啊,其后,许多可敬之来宾为会见持国王而至——那罗陀(Nārada)、帕尔瓦塔(Parvata)、大苦行者提婆罗(Devala)、携弟子而来的圣仙毗耶娑(Vyāsa),以及其他成就的悉地者、睿智的先见与最上诸牟尼。与他们同来的,还有以至高正法著称的年迈王仙娑多优波(Śatayūpa)。”
Verse 2
द्वैपायन: सशिष्यश्नष सिद्धाक्षान्ये मनीषिण: । शतयूपश्न राजर्षिव॑द्ध: परमधार्मिक:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर वहाँ राजा धृतराष्ट्रसे मिलनेके लिये नारद, पर्वत, महातपस्वी देवल, शिष्योंसहित महर्षि व्यास तथा अन्यान्य सिद्धू, मनीषी, श्रेष्ठ मुनिगण आये। उनके साथ परम धर्मात्मा वृद्ध राजर्षि शतयूप भी पधारे थे
毗湿摩波耶那说道:随后,岛生(毗耶娑)携弟子而至,又有诸多成就者(悉地)与睿智仙圣同来。随行的还有年迈的王仙沙多优波——至为正法之人——他亦为觐见持国王(德里达罗湿多罗)而来。此景彰显持国王林居之生活所承载的道德重量:诸位灵修成就者的聚集并非为观奇取乐,而是为尊崇达摩,并在生命终章引导一位君王归于内心的端正。
Verse 3
तेषां कुन्ती महाराज पूजां चक्रे यथाविधि । ते चापि तुतुषुस्तस्यास्तापसा: परिचर्यया,महाराज! कुन्तीदेवीने उन सबकी यथायोग्य पूजा की। वे तपस्वी ऋषि भी कुन्तीकी सेवासे बहुत संतुष्ट हुए
毗湿摩波耶那说道:大王啊,昆蒂依礼如法地供养礼敬他们。那些苦行仙人也因她细致周到的侍奉而大为欢喜——这表明,对修行者以恭敬之心行待客之道、以谦卑之心尽照料之责,正是达摩在无声处的践行。
Verse 4
तत्र धर्म्या: कथास्तात चक्रुस्ते परमर्षय: । रमयन्तो महात्मानं धृतराष्ट्र जनाधिपम्
在那里,亲爱的啊,那些至上仙圣谈论正法之事,以合乎达摩的言谈抚慰并取悦高贵的持国王(德里达罗湿多罗),使其心得安宁。
Verse 5
तात! वहाँ उन महर्षियोंने महात्मा राजा धृतराष्ट्रका मन लगानेके लिये अनेक प्रकारकी धार्मिक कथाएँ कहीं ।। कथान्तरे तु कम्मिंश्चिद् देवर्षिनरिदस्तत: । कथामिमामकथयत् सर्वप्रत्यक्षदर्शिवान्,सब कुछ प्रत्यक्ष देखनेवाले देवर्षि नारदने किसी कथाके प्रसंगमें यह कथा कहनी आरम्भ की
“亲爱的啊!在那里,诸大圣者为使高贵的持国王(德里达罗湿多罗)心神安定、得以慰藉,讲述了种种正法而振奋的故事。其后,在另一段故事的转折处,天仙那罗陀——据说能亲见万事万物者——开始讲述这一则传说。”
Verse 6
नारद उवाच केकयाधिपति: श्रीमान् राजा55सीदकुतो भय: । सहस्नचित्य इत्युक्त: शतयूपपितामह:,नारदजी बोले--राजन्! पूर्वकालमें सहस्नचित्य नामसे प्रसिद्ध एक तेजस्वी राजा थे, जो केकयदेशकी प्रजाका पालन करते थे। उन्हें कभी किसीसे भय नहीं होता था। यहाँ जो ये राजर्षि शतयूप विराज रहे हैं, इनके वे पितामह थे
那罗陀说道:“大王啊!往昔有一位光辉的君主,迦迦耶之主,名闻为‘萨哈斯拉奇提耶’——无所畏惧,毫无可惧之由。此处端坐的王仙沙多优波——萨哈斯拉奇提耶正是他的祖父。”
Verse 7
स पुत्रे राज्यमासज्य ज्येछे परमधार्मिके । सहस्रचित्यो धर्मात्मा प्रविवेश वनं नृप:,धर्मात्मा राजा सहस्रचित्य अपने परम धर्मात्मा ज्येष्ठ पुत्रको राज्यका भार सौंपकर तपस्याके लिये इसी वनमें प्रविष्ट हुए
那罗陀说道:这位正法之王萨哈斯拉奇提耶,将国政托付给最年长的王子——一位至诚奉持达摩者——随后入于林野,修行苦行之道;他在尽责安顿王权传续、确保公正治理不断绝之后,方才选择出离与舍弃。
Verse 8
स गत्वा तपस: पारं दीप्तस्य वसुधाधिप: । पुरंदरस्य संस्थान प्रतिपेदे महाद्युति:,ये महातेजस्वी भूपाल अपनी उद्दीप्त तपस्या पूरी करके इन्द्रलोकको प्राप्त हुए
那罗陀说道:当这位大放光辉的大地之主,将炽烈的苦行修至极致之境时,便得至普兰达罗(因陀罗)之居处。此处强调一层伦理旨趣:严谨的自制与持久的苦修(tapas),能使君王超越世间王权,趋向天界之域。
Verse 9
दृष्टपूर्व: स बहुशो राजन् सम्पतता मया । महेन्द्रसदने राजा तपसा दग्धकिल्बिष:,तपस्यासे उनके सारे पाप भस्म हो गये थे। राजन! इन्द्रलोकमें आते-जाते समय मैंने उन राजर्षिको अनेक बार देखा है
那罗陀说道:“大王啊,我往来行走之时,曾屡屡见到那位王仙,一次又一次。在大因陀罗的宫殿中,那位国王以苦行焚尽罪垢,仍安住于修行之中。”
Verse 10
तथा शैलालयो राजा भगदत्तपितामह: । तपोबलेनैव नृपो महेन्द्रसदनं गत:,इसी प्रकार भगदत्तके पिता महाराजा शैलालय भी तपस्याके बलसे ही इन्द्रलोकको गये हैं
那罗陀说道:“同样,婆伽达多之祖——舍伊拉拉耶王——亦唯凭苦行之力,得至摩诃因陀罗之宫(因陀罗天界)。”此言昭示:若以正道与纪律修持tapas,便被视为能使君王超越世俗名位,趋向更高的灵性归宿。
Verse 11
तथा पृषथ्रो राजा55सीद् राजन् वज्रधरोपम: । स चापि तपसा लेभे नाकपृष्ठमितो गत:,महाराज! राजा पृषध्र वज्रधारी इन्द्रके समान पराक्रमी थे। उन्होंने भी तपस्याके बलसे इस लोकसे जानेपर स्वर्गलोक प्राप्त किया था
那罗陀说道:“同样,大王啊,普利沙陀罗王勇猛如执金刚杵的因陀罗。他亦凭苦行之力,离此世后得至天界(那迦普利什塔,Nākapṛṣṭha)。”此颂彰显一项伦理理想:自制与有纪律的tapas能使人超越世俗地位;王权不仅对力量负责,更须对内在功德负责。
Verse 12
अस्मिन्नरण्ये नूपते मान्धातुरपि चात्मज: । पुरुकुत्सो नृपः सिद्धि महतीं समवाप्तवान्,नरेश्वर! मान्धाताके पुत्र पुरुकुत्सने भी, सरिताओंमें श्रेष्ठ नर्मदा जिनकी पत्नी हुई थी, इसी वनमें तपस्या करके बहुत बड़ी सिद्धि प्राप्त की थी। यहीं तपस्या करके वे नरेश स्वर्गलोकमें गये थे
那罗陀说道:“人中之主啊,就在这片森林里,连曼陀多罗王之子普鲁库察也曾修行苦行,获得了伟大的灵性成就。他在此行持苦修之后,那位国王便升往天界。”
Verse 13
भार्या समभवद् यस्य नर्मदा सरितां वरा | सो<स्मिन्नरण्ये नृपतिस्तपस्तप्त्वा दिवं गत:,नरेश्वर! मान्धाताके पुत्र पुरुकुत्सने भी, सरिताओंमें श्रेष्ठ नर्मदा जिनकी पत्नी हुई थी, इसी वनमें तपस्या करके बहुत बड़ी सिद्धि प्राप्त की थी। यहीं तपस्या करके वे नरेश स्वर्गलोकमें गये थे
那罗陀说道:“那位以那尔摩陀——诸河之最胜者——为妻的国王,就在这片森林中修行苦行,随后登升天界。人中之主啊,那便是曼陀多罗之子普鲁库察。正是在此,他行持苦修,得大成就,并由此而往天界。”
Verse 14
शशलोमा च राजा55सीदू राजन् परमधार्मिक: । सम्यगस्मिन् वने तप्त्वा ततो दिवमवाप्तवान्,राजन! परम धर्मात्मा राजा शशलोमाने भी इसी वनमें उत्तम तपस्या करके स्वर्ग प्राप्त किया था
那罗陀说道:“大王啊,往昔曾有一位至为正法的君主,名为舍沙罗摩。就在这片森林里,他如法修行苦行,随后便得至天界,大王啊。”
Verse 15
द्वैपायनप्रसादाच्च त्वमपीदं तपोवनम् । राजन्नवाप्य दुष्प्रापां गतिमग्र्यां गमिष्यसि,नरेश्वर! व्यासजीकी कृपासे तुम भी इसी तपोवनमें आ पहुँचे हो। अब यहाँ तपस्या करके दुर्लभ सिद्धिका आश्रय ले श्रेष्ठ गति प्राप्त कर लोगे
那罗陀说道:“凭借岛生仙人(毗耶娑)的恩德,你也已到达这片苦行之林,国王啊。既已至此,你将修行苦行,获得那稀有而难得的至上境界——崇高的归宿,人中之主啊。”
Verse 16
त्वं चापि राजशार्दूल तपसो*न््ते श्रिया वृतः । गान्धारीसहितो गन्ता गति तेषां महात्मनाम्,नृपश्रेष्ठ॒ तुम भी तपस्याके अन्तमें तेजसे सम्पन्न हो गान्धारीके साथ उन्हीं महात्माओंकी गति प्राप्त करोगे
那罗陀说道:“你亦如此,人王之虎啊;当你的苦行圆满之时,你将被神圣的光辉所环绕。与甘陀梨相伴,你将前往那些大魂者所抵达的同一归宿。”
Verse 17
पाण्डु: स्मरति ते नित्यं बलहन्तु: समीपग: । त्वां सदैव महाराज श्रेयसा स च योक्ष्यति,महाराज! तुम्हारे छोटे भाई पाण्डु इन्द्रके पास ही रहते हैं। वे सदा तुम्हें याद करते रहते हैं। निश्चय ही वे तुम्हें कल्याणके भागी बनायेंगे
那罗陀说道:“般度常住于诛灭婆罗者(因陀罗)之侧,恒常忆念于你。大王啊,他时时系念于你,必定使你与安泰福祉相连,得蒙吉祥。”
Verse 18
तव शुश्रूषया चैव गान्धार्याश्व यशस्विनी । भर्तु: सलोकतामेषा गमिष्यति वधूस्तव
那罗陀说道:“凭你恭敬奉侍之功,又凭她自身对甘陀利的忠诚侍奉,你那声名卓著的儿媳将得与其夫同往一界。以无私奉养长辈之德与坚贞不渝之心,她注定要共享其夫身后之境。”
Verse 19
वयमेतत् प्रपश्यामो नृपते दिव्यचक्षुषा,नरेश्वर! यह सब हम अपनी दिव्य दृष्टिसे देख रहे हैं। विदुर महात्मा युधिष्ठिरके शरीरमें प्रवेश करेंगे और संजय उन्हींका चिन्तन करनेके कारण यहाँसे सीधे स्वर्गको जायँगे
那罗陀说道:“大王啊,我们以天眼明见此事。大心的毗度罗将入于由提施提罗之身;而三阇耶因其心念全系于他,将从此处径直升天。”
Verse 20
प्रवेक्ष्यति महात्मानं विदुरश्न युधिष्ठिरम् । संजयस्तदनुध्यानादित: स्वर्गमवाप्स्यति,नरेश्वर! यह सब हम अपनी दिव्य दृष्टिसे देख रहे हैं। विदुर महात्मा युधिष्ठिरके शरीरमें प्रवेश करेंगे और संजय उन्हींका चिन्तन करनेके कारण यहाँसे सीधे स्वर्गको जायँगे इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि नारदवाक्ये विंशो5ध्याय:
那罗陀说道:“人中王啊,伟大的毗度罗将入于由提施提罗之身;三阇耶因恒常观念于他,将从此处离去而径得天界。此一切,我们皆以天眼所见。”
Verse 21
वैशम्पायन उवाच एतच्छुत्वा कौरवेन्द्रो महात्मा सार्थ पत्न्या प्रीतिमान् सम्बभूव । विद्वान वाक््यं नारदस्य प्रशस्य चक्रे पूजां चातुलां नारदाय,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! यह सुनकर महात्मा कौरवराज धृतराष्ट्र अपनी पत्नीके साथ बहुत प्रसन्न हुए। उन विद्वान् नरेशने नारदजीके वचनोंकी प्रशंसा करके उनकी अनुपम पूजा की
毗湿摩衍那说道:“阇那弥阇耶啊,闻此言后,俱卢之主、伟大的持国王与其王后同感欢悦。那位明智的君王称赞那罗陀之言,并以无与伦比的礼敬与供养奉献于他。”
Verse 22
ततः सर्वे नारदं विप्रसंघा: सम्पूजयामासुरतीव राजन् | राज्ञ: प्रीत्या धृतराष्ट्रस्य ते वै पुन: पुन: सम्प्रहशस्तदानीम्,राजन्! तदनन्तर समस्त ब्राह्मण-समुदायने नारदजीका विशेष पूजन किया। राजा धृतराष्ट्रकी प्रसन्नतासे उस समय उन सब लोगोंको बारंबार हर्ष हो रहा था
于是,聚集在场的一切婆罗门众都热切地礼敬供养那罗陀,王啊。见到俱卢王持国(Dhṛtarāṣṭra)心生欢悦,他们也在那时一再欢笑、满怀喜庆——王啊。
Verse 23
नारदस्य तु तद् वाक्यं शशंसुद्धिजसत्तमा: । शतसयूपस्तु राजर्षिनरिदं वाक्यमब्रवीत्,उन सभी श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने नारदजीके पूर्वाक्त वचनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। तत्पश्चात् राजर्षि शतयूपने नारदजीसे इस प्रकार कहा--
诸位最尊贵的两生者(婆罗门)一再称赞那罗陀的言辞。随后,王仙萨塔萨尤帕(Śatasayūpa)对那罗陀说道——
Verse 24
अहो भगवता श्रद्धा कुरुराजस्य वर्धिता । सर्वस्य च जनस्यास्य मम चैव महाद्युते,“महातेजस्वी देवर्षे! बड़े हर्षकी बात है कि आपने कुरुराज धृतराष्ट्रकी, यहाँ आये हुए सब लोगोंकी और मेरी भी तपस्याविषयक श्रद्धाको अधिक बढ़ा दिया है
毗舍摩耶那说道:“真是奇妙!因你吉祥的临在,俱卢王持国(Dhṛtarāṣṭra)的信心得以增长;在此聚集的众人之信心亦同样被坚固,连我也如此,噢,大放光明者。”
Verse 25
अस्ति काचिद् विवक्षा तु तां मे निगदत: शृणु । धृतराष्ट्र प्रति नृपं देवर्षे लोकपूजित,“लोकपुजित देवर्षे! राजा धृतराष्ट्रके विषयमें मुझे कुछ कहने या पूछनेकी इच्छा हो रही है। अपनी उस इच्छाको मैं बता रहा हूँ, सुनिये
毗舍摩耶那说道:“噢,为诸世界所敬奉的天仙圣者,我心中有一愿,欲就持国王(Dhṛtarāṣṭra)一事陈说。请听我道来。”
Verse 26
सर्ववृत्तान्ततत्त्वज्ञों भवान् दिव्येन चक्षुषा । युक्त: पश्यसि विप्रर्षे गतिर्या विविधा नृूणाम्,“ब्रह्मर्ष! आप सम्पूर्ण वृत्तान्तोंके तत्त्वज्ञ हैं। आप योगयुक्त होकर अपनी दिव्य दृष्टिसे मनुष्योंको जो नाना प्रकारकी गति प्राप्त होती है, उसे प्रत्यक्ष देखते हैं
毗舍摩耶那说道:“噢,婆罗门大圣(brahmarṣi),你洞悉一切事变背后的真实义理。凭借天眼并安住于瑜伽定境,你亲见世人所趋向的种种不同归宿。”
Verse 27
उक्तवान् नृपतीनां त्वं महेन्द्रस्य सलोकताम् | न त्वस्य नृपतेलोंका: कथितास्ते महामुने,“महामुने! आपने अनेक राजाओंकी इन्द्रलोक-प्राप्तिका वर्णन किया; किंतु यह नहीं बताया कि ये राजा धृतराष्ट्र किस लोकको जायाँगे
毗舍波耶那说道:“你已讲述许多国王得以往生至与摩诃因陀罗(因陀罗)同一世界。然而,噢,大圣者,你尚未告诉我们,这位国王持国(Dhṛtarāṣṭra)将前往何等世界。”
Verse 28
स्थानमप्यस्य नृपते: श्रोतुमिच्छाम्यहं विभो । त्वत्त: कीदूक् कदा चेति तन्ममाख्याहि तत्त्वतः,'प्रभो! इन नरेशको जो स्थान प्राप्त होनेवाला है, उसे भी मैं आपके मुखसे सुनना चाहता हूँ। वह स्थान कैसा होगा और कब प्राप्त होगा--यह मुझे ठीक-ठीक बताइये”
毗舍波耶那说道:“噢,威能者,我也愿听闻这位国王所将抵达的归宿。请你如实、详尽地告诉我:他将获得何等境界,又将在何时获得?”
Verse 29
इत्युक्तो नारदस्तेन वाक््यं सर्वमनो5नुगम् । व्याजहार सभामध्ये दिव्यदर्शी महातपा:,शतयूपके इस प्रकार प्रश्न करनेपर दिव्यदर्शी महातपस्वी देवर्षि नारदने उस सभामें सबके मनको प्रिय लगनेवाली यह बात कही
毗舍波耶那说道:他如此发问后,具天眼、苦行卓绝的圣仙那罗陀,在众会之中开口,所言契合众人心意,悦耳而得其时。
Verse 30
नारद उवाच यदृच्छया शक्रसदो गत्वा शक्रं शचीपतिम् । दृष्टवानस्मि राजर्षे तत्र पाण्डंं नराधिपम्,नारदजी बोले--राजर्षे! एक दिन मैं दैवेच्छासे घूमता-फिरता इन्द्रलोकमें चला गया और वहाँ जाकर शचीपति इन्द्रसे मिला। वहीं मैंने राजा पाण्डुको भी देखा था
那罗陀说道:“噢,王圣啊,有一次我因天意漫游,来到因陀罗的会堂,得见舍支之主因陀罗。在那里,我也见到了般度王(Pāṇḍu),人间诸王之雄。”
Verse 31
तत्रेयं धृतराष्ट्रस्य कथा समरभवन्नप । तपसो दुष्करस्यास्य यदयं तपते नृप:,नरेश्वर! वहाँ राजा धृतराष्ट्रकी ही बातचीत चल रही थी। वे जो तपस्या करते हैं, इनके इस दुष्कर तपकी ही चर्चा हो रही थी
“在那里,话题转到了持国(Dhṛtarāṣṭra)身上。众人谈论的是他严酷的苦行——那位国王如何正在修持艰难的苦行。”
Verse 32
तत्राहमिदमश्रौषं शक्रस्य वदत: स्वयम् | वर्षाणि त्रीणि शिष्टानि राज्ञोडस्य परमायुष:,उस सभामें साक्षात् इन्द्रके मुखसे मैंने सुना था कि इन राजा धुृतराष्ट्रकी आयुकी जो अन्तिम सीमा है, उसके पूर्ण होनेमें अब केवल तीन वर्ष ही शेष रह गये हैं
就在那时,我亲自从释迦罗(帝释天)口中听他宣告:“此王寿命之极限,如今只余三年。”此言昭示死期迫近,催人不容迟延地完成本分,并速行内在的净化。
Verse 33
ततः कुबेरभवनं गान्धारीसहितो नृपः । प्रयाता धृतराष्ट्रोड्यं राजराजाभिसत्कृत:,उसके समाप्त होनेपर ये राजा धृतराष्ट्र गान्धारीके साथ कुबेरके लोकमें जायँगे और वहाँ राजाधिराज कुबेरसे सम्मानित हो इच्छानुसार चलनेवाले विमानपर बैठकर दिव्य वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो देव, गन्धर्व तथा राक्षसोंके लोकोंमें स्वेच्छानुसार विचरते रहेंगे। ऋष्िपुत्र महाभाग धर्मात्मा धृतराष्ट्रके सारे पाप इनकी तपस्याके प्रभावसे भस्म हो जायाँगे। राजन! तुम मुझसे जो बात पूछ रहे थे, उसका उत्तर यही है
那罗陀说道:“其后,持国王(Dhṛtarāṣṭra)将与甘陀丽同往俱毗罗(Kubera)之天宫。于彼处,受财宝天王俱毗罗——诸王之王——礼敬,他将登上随心而行的天车;身披天衣、佩戴神饰,任意游历于诸天、乾闼婆与罗刹诸界。凭其苦行(tapas)之力,持国王这位守法之人一切罪垢皆将焚尽。大王啊,这正是你所问之事的答复。”
Verse 34
कामगेन विमानेन दिव्याभरण भूषित: । ऋषिपुत्रो महाभागस्तपसा दग्धकिल्बिष:,उसके समाप्त होनेपर ये राजा धृतराष्ट्र गान्धारीके साथ कुबेरके लोकमें जायँगे और वहाँ राजाधिराज कुबेरसे सम्मानित हो इच्छानुसार चलनेवाले विमानपर बैठकर दिव्य वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो देव, गन्धर्व तथा राक्षसोंके लोकोंमें स्वेच्छानुसार विचरते रहेंगे। ऋष्िपुत्र महाभाग धर्मात्मा धृतराष्ट्रके सारे पाप इनकी तपस्याके प्रभावसे भस्म हो जायाँगे। राजन! तुम मुझसे जो बात पूछ रहे थे, उसका उत्तर यही है
他将佩戴天界宝饰,乘坐随心而行的天车。那位福德深厚的仙人之子,以苦行(tapas)焚尽罪垢,必将证得崇高境界。
Verse 35
संचरिष्यति लोकांश्व देवगन्धर्वरक्षसाम् । स्वच्छन्देनेति धर्मात्मा यन्मां त्वमनुपृच्छसि,उसके समाप्त होनेपर ये राजा धृतराष्ट्र गान्धारीके साथ कुबेरके लोकमें जायँगे और वहाँ राजाधिराज कुबेरसे सम्मानित हो इच्छानुसार चलनेवाले विमानपर बैठकर दिव्य वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो देव, गन्धर्व तथा राक्षसोंके लोकोंमें स्वेच्छानुसार विचरते रहेंगे। ऋष्िपुत्र महाभाग धर्मात्मा धृतराष्ट्रके सारे पाप इनकी तपस्याके प्रभावसे भस्म हो जायाँगे। राजन! तुम मुझसे जो बात पूछ रहे थे, उसका उत्तर यही है
那位守法之人将随心所欲,游行于诸天、乾闼婆与罗刹之界——这正是你向我追问之事。
Verse 36
देवगुह्ामिदं प्रीत्या मया व: कथितं महत् | भवन्तो हि श्रुतधनास्तपसा दग्धकिल्बिषा:,यह देवताओंका अन्यन्त गुप्त विचार है। परंतु आप लोगोंपर प्रेम होनेके कारण मैंने इसे आपके सामने प्रकट कर दिया है। आपलोग वेदके धनी हैं और तपस्यासे निष्पाप हो चुके हैं (अत: आपके सामने इस रहस्यको प्रकट करनेमें कोई हर्ज नहीं है)
那罗陀说道:“此一大事,乃诸天所秘而不宣者;我因爱重诸位,故为你们揭示。你们富于圣典之学,又以苦行(tapas)焚尽罪垢,因此将这隐秘的筹议告知你们,并无不当。”
Verse 37
वैशम्पायन उवाच इति ते तस्य तच्छुत्वा देवर्षेर्मधुरं वच: । सर्वे सुमनस: प्रीता बभूवु: स च पार्थिव:,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! देवर्षिके ये मधुर वचन सुनकर वे सब लोग बहुत प्रसन्न हुए और राजा धृतराष्ट्रको भी इससे बड़ा हर्ष हुआ
毗湿摩波耶那说道:“大王啊,众人如此听闻天仙圣者那甘美之言,皆心生欢喜;而国王持国(Dhṛtarāṣṭra)亦充满了极大的喜悦。”
Verse 38
एवं कथाभिरन्वास्य धृतराष्ट्रं मनीषिण: । विप्रजग्मुर्यथाकामं ते सिद्धगतिमास्थिता:,इस प्रकार वे मनीषी महर्षिगण अपनी कथाओंसे धृतराष्ट्रको संतुष्ट करके सिद्ध गतिका आश्रय ले इच्छानुसार विभिन्न स्थानोंको चले गये
毗湿摩波耶那说道:“就这样,诸位智者以教诲性的叙事安慰持国(Dhṛtarāṣṭra),那些圣贤——已安住于成就者(悉地者)的圆满行程——便随其所愿,前往各处而去。”
Verse 183
युधिष्ठिरस्थ जननी स हि धर्म: सनातन: । तुम्हारी और गान्धारीदेवीकी सेवा करनेसे यह तुम्हारी यशस्विनी बहू युधिष्ठिरजननी कुन्ती अपने पतिके लोकमें पहुँच जायगी। युधिष्ठिर साक्षात् सनातन धर्मस्वरूप हैं (अतः उनकी माता कुन्तीकी सदगतिमें कोई संदेह ही नहीं है)
那罗陀说道:“昆蒂,尤提士提罗之母,确已安住于永恒之法(常住之法)。凭你与王后甘陀利所尽的虔诚侍奉,你这位声名卓著的儿媳——生下尤提士提罗的昆蒂——必将抵达其夫之界。因为尤提士提罗正是亘古法的化身;故而对其母昆蒂的吉祥归宿,毫无疑虑。”
Whether post-conflict resentment—especially Bhīma’s remembered hostility—should govern conduct, or whether dharma requires restraint and cooperative restitution through authorized charity and public benefit.
Legitimate power is ethically exercised through consent, restraint, and service: anger is subordinated to social repair, and wealth is transformed into merit and stability through regulated dāna and welfare works.
No explicit phalaśruti is stated here; the meta-significance is structural—this chapter models dharmic closure through calendrically timed great charity (Kārttikī) and institutionally directed giving.