Adhyaya 29
Bhishma ParvaAdhyaya 2929 Verses

Adhyaya 29

अक्षरब्रह्मयोग (Akṣara-Brahma-Yoga) — Knowledge of the Imperishable, Prakṛti, and Devotion

Upa-parva: Bhagavad Gītā Parva (within Bhīṣma Parva)

This chapter advances Kṛṣṇa’s instruction by (1) defining the epistemic aim: knowing Kṛṣṇa “in fullness” through yoga grounded in refuge (mayy-āsakta-manāḥ… mad-āśrayaḥ); (2) distinguishing knowledge with realization (jñāna-sahita-vijñāna) and the rarity of true comprehension; (3) presenting an ontology of prakṛti: the eightfold divided nature (earth, water, fire, air, space, mind, intellect, ego) and the higher nature as jīva that sustains the world; (4) asserting Kṛṣṇa as the origin and dissolution of the cosmos and the pervasive substrate (beads-on-a-string metaphor); (5) offering a catalog of immanence statements (vibhūti-like identifications) to train contemplative recognition of the divine in ordinary phenomena; (6) analyzing the guṇas and māyā as a binding, difficult-to-cross power, traversable through exclusive refuge; (7) classifying worshippers into four types (distressed, inquisitive, seeker of ends, knower) and privileging the steadfast knower; (8) describing misrecognition of the unmanifest, the concealment by yogamāyā, and the role of desire-aversion dualities in delusion; and (9) concluding with a soteriological frame: those striving for release from aging and death, taking refuge in Kṛṣṇa, come to know brahman, adhyātman, karma, and the integrated fields of adhibhūta, adhidaiva, and adhiyajña—even at the time of death—when their minds are disciplined.

Chapter Arc: Kurukshetra’s thunder pauses inwardly as Krishna turns Arjuna from the fever of choice to the science of liberation: two roads are named—renunciation and disciplined action—both promising the highest good. → Arjuna’s mind, still seeking a simpler escape from consequence, is met with Krishna’s firm ordering of paths: true renunciation is not mere withdrawal, and the yogin must learn to live amid duties without being seized by them; the chapter presses the listener to abandon the comfort of extremes. → Krishna’s decisive verdict lands: though both lead to the supreme, karma-yoga is superior as a practicable means; the mark of wisdom is equal vision—seeing the same Self in the learned and humble brahmin, the cow, the elephant, the dog, and the outcaste—while the inwardly detached seeker finds imperishable joy in the Self, not in fleeting contacts. → The teaching settles into a portrait of the liberated-in-life: senses, mind, and intellect mastered; desire, fear, and anger fallen away; the seeker, unhooked from external pleasures, abides in brahma-yoga and tastes undiminishing peace. → How can one who feels unfit for such mastery—unable to sustain karma-yoga, sankhya, or meditation—still be carried toward the Supreme?

Shlokas

Verse 1

भी्न्मार (2) अमन ३. गीताके दूसरे अध्यायके उनचालीसवें श्लोकमें कर्मयोगका वर्णन आरम्भ करनेकी प्रतिज्ञा करके भगवानने उस अध्यायके अन्ततक कर्मयोगका ही भलीभाँति प्रतिपादन किया। उसके बाद भी तीसरे अध्यायके अन्ततक प्राय: कर्मयोगका ही अंग-प्रत्यंगोंसहित प्रतिपादन किया गया। इसके सिवा इस योगकी परम्परा बतलाते हुए भगवानने यहाँ जिन “सूर्य” और “मनु” आदिके नाम गिनाये हैं, वे सभी गृहस्थ और कर्मयोगी ही हैं। इससे भी यहाँ 'योगम्‌” पदको कर्मयोगका ही वाचक मानना उपयुक्त मालूम होता है। $. परमात्माकी प्राप्तिके साधनरूप कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग आदि जितने भी साधन हैं--सभी नित्य हैं; इनका कभी अभाव नहीं होता। जब परमेश्वर नित्य हैं, तब उनकी प्राप्तिके लिये उन्हींके द्वारा निश्चित किये हुए अनादि नियम अनित्य नहीं हो सकते। जब-जब जगतका प्रादुर्भाव होता है, तब-तब भगवानके समस्त नियम भी साथ-ही-साथ प्रकट हो जाते हैं और जब जगत्‌का प्रलय होता है, उस समय नियमोंका भी तिरोभाव हो जाता है; परंतु उनका अभाव कभी नहीं होता। इस प्रकार इस कर्मयोगकी अनादिता सिद्ध करनेके लिये पूर्वश्लोकमें उसे अविनाशी कहा गया है। अतएव इस श्लोकमें जो यह बात कही गयी कि वह योग बहुत कालसे नष्ट हो गया है--इसका यही अभिप्राय समझना चाहिये कि बहुत समयसे इस पृथ्वीलोकमें उसका तत्त्व समझनेवाले श्रेष्ठ पुरुषोंका अभाव-सा हो गया है, इस कारण वह अप्रकाशित हो गया है, उसका इस लोकमें तिरोभाव हो गया है; यह नहीं कि उसका अभाव हो गया है। २. इस कथनसे भगवानने यह भाव दिखलाया है कि यह योग सब प्रकारके दुःखोंसे और बन्धनोंसे छुड़ाकर परमानन्दस्वरूप मुझ परमेश्वरको सुगमतापूर्वक प्राप्त करा देनेवाला है, इसलिये अत्यन्त ही उतम और बहुत ही गोपनीय है; इसके सिवा इसका यह भाव भी है कि अपनेको सूर्यादिके प्रति इस योगका उपदेश करनेवाला बतलाकर और वही योग मैंने तुझसे कहा है, तू मेरा भक्त है--यह कहकर मैंने जो अपना ईश्वरभाव प्रकट किया है, यह बड़े रहस्यकी बात है। 3. यहाँ भगवानने यह भाव दिखलाया है कि मैं और तुम अभी हुए हैं, पहले नहीं थे--ऐसी बात नहीं है। हमलोग अनादि और नित्य हैं। मेरा नित्य स्वरूप तो है ही; इसके अतिरिक्त मैं अनेक रूपोंमें पहले प्रकट हो चुका हूँ। इसलिये मैंने जो यह बात कही है कि यह योग पहले सूर्यसे मैंने ही कहा था, इसका यही अभिप्राय समझना चाहिये कि कल्पके आदियमें मैंने नारायणरूपसे सूर्यको यह योग कहा था। ४. भगवान्‌की शक्तिरूपा जो मूलप्रकृति है, जिसका वर्णन गीताके नवम अध्यायके सातवें और आठवें श्लोकोंमें किया गया है और जिसे चौदहवें अध्यायमें “महद्रह्म” कहा गया है, उसी “मूलप्रकृति' का वाचक यहाँ 'स्वाम' विशेषणके सहित “प्रकृतिम' पद है, तथा भगवान्‌ अपनी जिस योगशक्तिसे समस्त जगत्‌को धारण किये हुए हैं, जिस असाधारण शक्तिसे वे नाना प्रकारके रूप धारण करके लोगोंके सम्मुख प्रकट होते हैं और जिसमें छिपे रहनेके कारण लोग उनको पहचान नहीं सकते--उसका वाचक यहाँ “आत्ममायया' पद है। ५. इससे भगवानने यह दिखलाया है कि यद्यपि मैं अजन्मा और अविनाशी हूँ--वास्तवमें मेरा जन्म और विनाश कभी नहीं होता, तो भी मैं साधारण व्यक्तिकी भाँति जन्मता और विनष्ट होता-सा प्रतीत होता हूँ; इसी तरह समस्त प्राणियोंका ईश्वर होते हुए भी एक साधारण व्यक्ति-सा ही प्रतीत होता हूँ। अभिप्राय यह है कि मेरे अवतारतत्त्वको न समझनेवाले लोग जब मैं मत्स्य, कच्छप, वराह और मनुष्यादि रूपमें प्रकट होता हूँ, तब मेरा जन्म हुआ मानते हैं और जब मैं अन्तर्धान हो जाता हूँ, उस समय मेरा विनाश समझ लेते हैं तथा जब मैं उस रूपमें दिव्य लीला करता हूँ, तब मुझे अपने-जैसा ही साधारण व्यक्ति समझकर मेरा तिरस्कार करते हैं (गीता ९।११)। वे बेचारे इस बातको नहीं समझ पाते कि ये सर्वशक्तिमान्‌ सर्वेश्वर, नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्त-स्वभाव साक्षात्‌ पूर्णब्रह्म परमात्मा ही जगत्‌का कल्याण करनेके लिये इस रूपमें प्रकट होकर दिव्य लीला कर रहे हैं; क्योंकि मैं उस समय अपनी योगमायाके परदेमें छिपा रहता हूँ (गीता ७।२५)। ३. ऋषिकल्प, धार्मिक, ईश्वरप्रेमी, सदाचारी पुरुषों तथा निरपराधी, निर्बल प्राणियोंपर बलवान्‌ और दुराचारी मनुष्योंका अत्याचार बढ़ जाना तथा उसके कारण लोगोंमें सदगुण और सदाचारका अत्यन्त हास होकर दुर्गुण और दुराचारका अधिक फैल जाना ही धर्मकी हानि और अधर्मकी वृद्धिका स्वरूप है। २. जो पुरुष अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य आदि समस्त सामान्य धर्मांका तथा यज्ञ, दान, तप एवं अध्यापन, प्रजापालन आदि अपने-अपने वर्णाश्रम-धर्मोंका भलीभाँति पालन करते हैं; दूसरोंका हित करना ही जिनका स्वभाव है; जो सदगुणोंके भण्डार और सदाचारी हैं तथा श्रद्धा और प्रेमपूर्वक भगवान्‌के नाम, रूप, गुण, प्रभाव, लीलादिके श्रवण, कीर्तन, स्मरण आदि करनेवाले भक्त हैं--उनका वाचक यहाँ 'साधु' शब्द है। 3. जो मनुष्य निरपराध, सदाचारी और भगवान्‌के भक्तोंपर अत्याचार करनेवाले हैं, जो झूठ, कपट, चोरी, व्यभिचार आदि दुर्गुण और दुराचारोंके भण्डार हैं, जो नाना प्रकारसे अन्याय करके धनका संग्रह करनेवाले तथा नास्तिक हैं; भगवान्‌ और वेद-शास्त्रोंका विरोध करना ही जिनका स्वभाव हो गया है--ऐसे आसुर स्वभाववाले दुष्ट पुरुषोंका वाचक यहाँ *दुष्कृताम” पद है। ४. स्वयं शास्त्रानुकूल आचरण कर, विभिन्न प्रकारसे धर्मका महत्त्व दिखलाकर और लोगोंके हृदयोंमें प्रवेश करनेवाली अप्रतिम प्रभावशालिनी वाणीके द्वारा उपदेश-आदेश देकर सबके अन्तःकरणमें वेद, शास्त्र, परलोक, महापुरुष और भगवानूपर श्रद्धा उत्पन्न कर देना तथा सदगुणोंमें और सदाचारोंमें विश्वास तथा प्रेम उत्पन्न करवाकर लोगोंमें इन सबको दृढ़तापूर्वक भलीभाँति धारण करा देना आदि सभी बातें धर्मकी स्थापनाके अन्तर्गत हैं। ५. यद्यपि भगवान्‌ बिना ही अवतार लिये अनायास ही सब कुछ कर सकते हैं और करते भी हैं ही; किंतु लोगोंपर विशेष दया करके अपने दर्शन, स्पर्श और भाषणादिके द्वारा सुगमतासे लोगोंको उद्धारका सुअवसर देनेके लिये एवं अपने प्रेमी भक्तोंका अपनी दिव्य लीलादिका आस्वादन करानेके लिये भगवान्‌ साकाररूपसे प्रकट होते हैं। उन अवतारोंमें धारण किये हुए रूपका तथा उनके गुण, प्रभाव, नाम, माहात्म्य और दिव्य कर्मोंका श्रवण, कीर्तन और स्मरण करके लोग सहज ही संसार-समुद्रसे पार हो सकते हैं। यह काम बिना अवतारके नहीं हो सकता। <. सर्वशक्तिमान्‌ पूर्णब्रह्म परमेश्वर वास्तवमें जन्म और मृत्युसे सर्वथा अतीत हैं। उनका जन्म जीवोंकी भाँति नहीं है। वे अपने भक्तोंपर अनुग्रह करके अपनी दिव्य लीलाओंके द्वारा उनके मनको अपनी ओर आकर्षित करनेके लिये, दर्शन, स्पर्श और भाषणादिके द्वारा उनको सुख पहुँचानेके लिये, संसारमें अपनी दिव्य कीर्ति फैलाकर उसके श्रवण, कीर्तन और स्मरणद्धारा लोगोंके पापोंका नाश करनेके लिये तथा जगतमें पापाचारियोंका विनाश करके धर्मकी स्थापना करनेके लिये जन्म-धारणकी केवल लीलामात्र करते हैं। उनका वह जन्म निर्दोष और अलौकिक है। जगत्‌का कल्याण करनेके लिये ही भगवान्‌ इस प्रकार मनुष्यादिके रूपमें लोगोंके सामने प्रकट होते हैं; उनका वह विग्रह प्राकृत उपादानोंसे बना हुआ नहीं होता--वह दिव्य, चिन्मय, प्रकाशमान, शुद्ध और अलौकिक होता है; उनके जन्ममें गुण और कर्म-संस्कार हेतु नहीं होते; वे मायाके वशमें होकर जन्म धारण नहीं करते, किंतु अपनी प्रकृतिके अधिष्ठाता होकर योगशक्तिसे मनुष्यादिके रूपमें केवल लोगोंपर दया करके ही प्रकट होते हैं--इस बातको भलीभाँति समझ लेना ही भगवान्‌के जन्मको तत्त्वसे दिव्य समझना है। भगवान्‌ सृष्टि-रचना और अवतार-लीलादि जितने भी कर्म करते हैं, उनमें उनका किंचिन्मात्र भी स्वार्थका सम्बन्ध नहीं है; केवल लोगोंपर अनुग्रह करनेके लिये ही वे मनुष्यादि अवतारोंमें नाना प्रकारके कर्म करते हैं (गीता ३।२२-२३)। भगवान्‌ अपनी प्रकृतिद्वारा समस्त कर्म करते हुए भी उन कर्मोंके प्रति कर्तृत्वभाव न रहनेके कारण वास्तवमें न तो कुछ भी करते हैं और न उनके बन्धनमें पड़ते हैं; भगवान्‌की उन कर्मोंके फलमें किंचिन्मात्र भी स्पृहा नहीं होती (गीता ४।१३-१४)। भगवानके द्वारा जो कुछ भी चेष्टा होती है, लोकहितार्थ ही होती है (गीता ४।८); उनके प्रत्येक कर्ममें लोगोंका हित भरा रहता है। वे अनन्त कोटि ब्रह्माण्डोंके स्वामी होते हुए भी सर्वसाधारणके साथ अभिमानरहित दया और प्रेमपूर्ण समताका व्यवहार करते हैं (गीता ९॥२९); जो कोई मनुष्य जिस प्रकार उनको भजता है, वे स्वयं उसे उसी प्रकार भजते हैं (गीता ४॥११); अपने अनन्यभक्तोंका योगक्षेम भगवान्‌ स्वयं चलाते हैं (गीता ९।२२), उनको दिव्य ज्ञान प्रदान करते हैं (गीता १०।१०-११) और भक्तिरूपी नौकापर बैठे हुए भक्तोंका संसारसमुद्रसे शीघ्र ही उद्धार करनेके लिये स्वयं उनके कर्णधार बन जाते हैं (गीता १२।७)। इस प्रकार भगवान्‌के समस्त कर्म आसक्ति, अहंकार और कामनादि दोषोंसे सर्वथा रहित निर्मल और शुद्ध तथा केवल लोगोंका कल्याण करने एवं नीति, धर्म, शुद्ध प्रेम और भक्ति आदिका जगत्‌में प्रचार करनेके लिये ही होते हैं; इन सब कर्मोंको करते हुए भी भगवानका वास्तवमें उन कर्मोंसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं है, वे उनसे सर्वथा अतीत और अकर्ता हैं--इस बातको भलीभाँति समझ लेना, इसमें किंचिन्मात्र भी असम्भावना या विपरीत भावना न रहकर पूर्ण विश्वास हो जाना ही भगवान्‌के कर्मोंको तत्त्वसे दिव्य समझना है। ३. भगवानूमें अनन्य प्रेम हो जानेके कारण जिनको सर्वत्र एक भगवान्‌-ही-भगवान्‌ दीखने लग जाते हैं, उनका वाचक “मन्मया:' पद है। २. जो भगवान्‌की शरण ग्रहण कर लेते हैं, सर्वथा उनपर निर्भर हो जाते हैं, सदा उनमें ही संतुष्ट रहते हैं, जिनका अपने लिये कुछ भी कर्तव्य नहीं रहता और जो सब कुछ भगवान्‌का समझकर उनकी आज्ञाका पालन करनेके उद्देश्य्से उनकी सेवाके रूपमें ही समस्त कर्म करते हैं--ऐसे पुरुषोंका वाचक 'मामुपाश्रिता:” पद है। 3. यहाँ सांख्ययोगका प्रसंग नहीं है, भक्तिका प्रकरण है तथा पूर्वश्लोकमें भगवान्‌के जन्म-कर्मोंको दिव्य समझनेका फल भगवान्‌की प्राप्ति बतलाया गया है; उसीके प्रमाणमें यह श्लोक है। इस कारण यहाँ 'ज्ञानतपसा'” पदमें ज्ञानका अर्थ आत्मज्ञान न मानकर भगवानके जन्म-कर्मोंको दिव्य समझ लेना ज्ञानरूप ही माना गया है। इस ज्ञानरूप तपके प्रभावसे मनुष्यका भगवान्‌में अनन्य- प्रेम हो जाता है, उसके समस्त पाप-ताप नष्ट हो जाते हैं, अन्तःकरणमें सब प्रकारके दुर्गुणोंका सर्वधा अभाव हो जाता है और समस्त कर्म भगवानके कर्मोंकी भाँति दिव्य हो जाते हैं तथा वह कभी भगवान्से अलग नहीं होता, उसको भगवान्‌ सदा ही प्रत्यक्ष रहते हैं--यही उन भक्तोंका ज्ञानरूप तपसे पवित्र होकर भगवानके स्वरूपको प्राप्त हो जाना है। ४. इससे भगवानने यह भाव दिखलाया है कि मेरे भक्तोंके भजनके प्रकार भिन्न-भिन्न होते हैं। अपनी- अपनी भावनाके अनुसार भक्त मेरे पृथक्‌ू-पृथक्‌ रूप मानते हैं और अपनी-अपनी मान्यताके अनुसार मेरा भजन-स्मरण करते हैं, अतएव मैं भी उनको उनकी भावनाके अनुसार उन-उन रूपोंमें ही दर्शन देता हूँ तथा वे जिस प्रकार जिस-जिस भावसे मेरी उपासना करते हैं, मैं उनके उस-उस प्रकार और उस-उस भावका ही अनुसरण करता हूँ। जो मेरा चिन्तन करता है उसका मैं चिन्तन करता हूँ, जो मेरे लिये व्याकुल होता है उसके लिये मैं भी व्याकुल हो जाता हूँ, जो मेरा वियोग सहन नहीं कर सकता मैं भी उसका वियोग नहीं सहन कर सकता। जो मुझे अपना सर्वस्व अर्पण कर देता है मैं भी उसे अपना सर्वस्व अर्पण कर देता हूँ। जो ग्वाल-बालोंकी भाँति मुझे अपना सखा मानकर मेरा भजन करते हैं, उनके साथ मैं मित्रके-जैसा व्यवहार करता हूँ। जो नन्द-यशोदाकी भाँति पुत्र मानकर मेरा भजन करते हैं, उनके साथ पुत्रके-जैसा बर्ताव करके उनका कल्याण करता हूँ। इसी प्रकार रुक्मिणीकी तरह पति समझकर भजनेवालोंके साथ पति-जैसा, हनुमानकी भाँति स्वामी समझकर भजनेवालोंके साथ स्वामी-जैसा और गोपियोंकी भाँति माधुर्यभावसे भजनेवालोंके साथ प्रियतम-जैसा बर्ताव करके मैं उनका कल्याण करता हूँ और उनको दिव्य लीला-रसका अनुभव कराता हूँ। ३. इससे भगवानने यह दिखलाया है कि लोग मेरा अनुसरण करते हैं, इसलिये यदि मैं इस प्रकार प्रेम और सौहार्दका बर्ताव करूँगा तो दूसरे लोग भी मेरी देखा-देखी ऐसे ही निःस्वार्थभावसे एक-दूसरोंके साथ यथायोग्य प्रेम और सुहृदताका बर्ताव करेंगे। अतएव इस नीतिका जगतमें प्रचार करनेके लिये भी ऐसा करना मेरा कर्तव्य है। २. अनादिकालसे जीवोंके जो जन्म-जन्मान्तरोंमें किये हुए कर्म हैं, जिनका फलभोग नहीं हो गया है, उन्हींके अनुसार उनमें यथायोग्य सत्त्व, रज और तमोगुणकी न्यूनाधिकता होती है। भगवान्‌ जब सृष्टि- रचनाके समय मनुष्योंका निर्माण करते हैं, तब उन-उन गुण और कर्मोंके अनुसार उन्हें ब्राह्मणादि वर्णोमें उत्पन्न करते हैं। साथ ही यह भी समझ लेना चाहिये कि देव, पितर और तिर्यक्‌ आदि दूसरी-दूसरी योनियोंकी रचना भी भगवान्‌ जीवोंके गुण और कर्मोंके अनुसार ही करते हैं। इसलिये इन सृष्टि-रचनादि कर्मोंमें भगवान्‌की किंचिन्मात्र भी विषमता नहीं है, यही भाव दिखलानेके लिये यहाँ यह बात कही गयी है कि मेरे द्वारा चारों वर्णोकी रचना उनके गुण और कर्मोंके विभागपूर्वक की गयी है। आजकल लोग यह पूछा करते हैं कि ब्राह्मणादि वर्णोका विभाग जन्मसे मानना चाहिये या कर्मसे? तो उसका उत्तर यह हो सकता है कि यद्यपि जन्म और कर्म दोनों ही वर्णके अंग होनेके कारण वर्णकी पूर्णता तो दोनोंसे ही होती है परंतु इन दोनोंमें प्रधानता जन्मकी है, इसलिये जन्मसे ही ब्राह्मणादि वर्णोका विभाग मानना चाहिये; क्योंकि यदि माता-पिता एक वर्गके हों और किसी प्रकारसे भी जन्ममें संकरता न आवे तो सहज ही कर्ममें भी प्रायः संकरता नहीं आती; परंतु संगदोष, आहारदोष और दूषित शिक्षा-दीक्षादि कारणोंसे कर्ममें कहीं कुछ व्यतिक्रम भी हो जाय तो जन्मसे वर्ण माननेपर वर्णरक्षा हो सकती है, तथापि कर्मशुद्धिकी कम आवश्यकता नहीं है। कर्मके सर्वथा नष्ट हो जानेपर वर्णकी रक्षा बहुत ही कठिन हो जाती है। अत: जीविका और विवाहादि व्यवहारके लिये तो जन्मकी प्रधानता तथा कल्याणकी प्राप्तिमें कर्मकी प्रधानता माननी चाहिये; क्योंकि जातिसे ब्राह्मण होनेपर भी यदि उसके कर्म ब्राह्मणोचित नहीं हैं तो उसका कल्याण नहीं हो सकता तथा सामान्य धर्मके अनुसार शम-दमादिका पालन करनेवाला और अच्छे आचरणवाला शूद्र भी यदि ब्राह्मणोचित यज्ञादि कर्म करता है और उससे अपनी जीविका चलाता है तो पापका भागी होता है। 3. इससे भगवान्‌के कर्मोंकी दिव्यताका भाव प्रकट किया गया है। अभिप्राय यह है कि भगवान्‌का किसी भी कर्ममें राग-द्वेष या कर्तापन नहीं होता। वे सदा ही उन कर्मोसे सर्वथा अतीत हैं, उनके सकाशसे उनकी प्रकृति ही समस्त कर्म करती है। इस कारण लोकव्यवहारमें भगवान्‌ उन कर्मोंके कर्ता माने जाते हैं; वास्तवमें भगवान्‌ सर्वथा उदासीन हैं, कर्मोंस उनका कुछ भी सम्बन्ध नहीं है (गीता ९।९-१०)। ४. उपर्युक्त वर्णनके अनुसार जो यह समझ लेना है कि विश्व-रचनादि समस्त कर्म करते हुए भी भगवान्‌ वास्तवमें अकर्ता ही हैं--उन कर्मोंसे उनका कुछ भी सम्बन्ध नहीं है, उनके कर्मोंमें विषमता लेशमात्र भी नहीं है, कर्मफलमें उनकी किंचिन्मात्र भी आसक्ति, ममता या कामना नहीं है, अतएव उनको वे कर्म बन्धनमें नहीं डाल सकते--यही भगवान्‌को उपर्युक्त प्रकारसे तत्त्वतः जानना है और इस प्रकार भगवानके कर्मोंका रहस्य यथार्थरूपसे समझ लेनेवाले महात्माके कर्म भी भगवानकी ही भाँति ममता, आसक्ति, फलेच्छा और अहंकारके बिना केवल लोकसंग्रहके लिये ही होते हैं; इसीलिये वह भी कर्मोंसे नहीं बँधता। $. जो मनुष्य जन्म-मरणरूप संसारबन्धनसे मुक्त होकर परमानन्दस्वरूप परमात्माको प्राप्त करना चाहता है, जो सांसारिक भोगोंको दुःखमय और क्षणभंगुर समझकर उनसे विरक्त हो गया है और जिसे इस लोक या परलोकके भोगोंकी इच्छा नहीं है--उसे "मुमुक्षु' कहते हैं। अर्जुन भी मुमुक्षु थे, वे कर्मबन्धनके भयसे स्वधर्मरूप कर्तव्यकर्मका त्याग करना चाहते थे; अतएव भगवानने इस श्लोकमें पूर्वकालके मुमुक्षुओंका उदाहरण देकर यह बात समझायी है कि कमोंको छोड़ देनेमात्रसे मनुष्य उनके बन्धनसे मुक्त नहीं हो सकता, इसी कारण पूर्वकालके मुमुक्षुओंने भी मेरे कर्मोंकी दिव्यताका तत्त्व समझकर मेरी ही भाँति कर्मोंमें ममता, आसक्ति, फलेच्छा और अहंकारका त्याग करके निष्कामभावसे अपने-अपने वर्णाश्रमके अनुसार उनका आचरण ही किया है। २. साधारणतः मनुष्य यही जानते हैं कि शास्त्रविहित कर्तव्यकर्मोंका नाम कर्म है; किंतु इतना जान लेनेमात्रसे कर्मका स्वरूप नहीं जाना जा सकता, क्योंकि उसके आचरणमें भावका भेद होनेसे उसके स्वरूपमें भेद हो जाता है। अत: अपने अधिकारके अनुसार वर्णाश्रमोचित कर्तव्य-कर्मोंको आचरणमें लानेके लिये कर्मोंके तत्तको समझना चाहिये। 3. साधारणत: मनुष्य यही समझते हैं कि मन, वाणी और शरीरद्वारा की जानेवाली क्रियाओंका स्वरूपसे त्याग कर देना ही अकर्म यानी कर्मोंसे रहित होना है; किंतु इतना समझ लेनेमात्रसे अकर्मका वास्तविक स्वरूप नहीं जाना जा सकता; क्योंकि भावके भेदसे इस प्रकारका अकर्म भी कर्म या विकर्मके रूपमें बदल जाता है। अत: किस भावसे किस प्रकार की हुई कौन-सी क्रिया या उसके त्यागका नाम अकर्म है एवं किस स्थितिमें किस मनुष्यको किस प्रकार उसका आचरण करना चाहिये, इस बातको भलीभाँति समझकर साधन करना चाहिये। ४. साधारणत: झूठ, कपट, चोरी, व्यभिचार, हिंसा आदि पापकर्मोंका नाम ही विकर्म है--यह प्रसिद्ध है; पर इतना जान लेनेमात्रसे विकर्मका स्वरूप यथार्थ नहीं जाना जा सकता, क्योंकि शास्त्रके तत्त्वको न जाननेवाले अज्ञानी पुण्यको भी पाप मान लेते हैं और पापको भी पुण्य मान लेते हैं। वर्ण, आश्रम और अधिकारके भेदसे जो कर्म एकके लिये विहित होनेसे कर्तव्य (कर्म) है, वही दूसरेके लिये निषिद्ध होनेसे पाप (विकर्म) हो जाता है--जैसे सब वर्णोॉंकी सेवा करके जीविका चलाना शूद्रके लिये विहित कर्म है, किंतु वही ब्राह्मणके लिये निषिद्ध कर्म है; जैसे दान लेकर, वेद पढ़ाकर और यज्ञ कराकर जीविका चलाना ब्राह्मणके लिये कर्तव्य-कर्म है, किंतु दूसरे वर्णोंके लिये पाप है; जैसे गृहस्थके लिये न्यायोपार्जित द्रव्यसंग्रह करना और ऋतुकालमें स्वपत्नीगमन करना धर्म है, किंतु संन्यासीके लिये कांचन और कामिनीका दर्शन- स्पर्श करना भी पाप है। अत: झूठ, कपट, चोरी, व्यभिचार, हिंसा आदि जो सर्वसाधारणके लिये निषिद्ध हैं तथा अधिकारभेदसे जो भिन्न-भिन्न व्यक्तियोंके लिये निषिद्ध हैं--उन सबका त्याग करनेके लिये विकर्मके स्वरूपको भलीभाँति समझना चाहिये। $. यज्ञ, दान, तप तथा वर्णाश्रमके अनुसार जीविका और शरीर-निर्वाहसम्बन्धी जितने भी शास्त्रविहित कर्म हैं--उन सबमें आसक्ति, फलेच्छा, ममता और अहंकारका त्याग कर देनेसे वे इस लोक या परलोकमें सुख-दुःखादि फल भुगतानेके और पुनर्जन्मके हेतु नहीं बनते, बल्कि मनुष्यके पूर्वकृत समस्त शुभाशुभ कर्मोंका नाश करके उसे संसार-बन्धनसे मुक्त करनेवाले होते हैं--इस रहस्यको समझ लेना ही कर्ममें अकर्म देखना है। इस प्रकार कर्ममें अकर्म देखनेवाला मनुष्य आसक्ति, फलेच्छा और ममताके त्यागपूर्वक ही विहित कर्मोंका यथायोग्य आचरण करता है। अतः वह कर्म करता हुआ भी उनसे लिप्त नहीं होता, इसलिये वह मनुष्योंमें बुद्धिमान्‌ है; वह परमात्माको प्राप्त है, इसलिये योगी है और उसे कोई भी कर्तव्य शेष नहीं रहता--वह कृतकृत्य हो गया है, इसलिये वह समस्त कर्मोंको करनेवाला है। लोकप्रसिद्धिमें मन, वाणी और शरीरके व्यापारको त्याग देनेका ही नाम अकर्म है; यह त्यागरूप अकर्म भी आसक्ति, फलेच्छा, ममता और अहंकारपूर्वक किया जानेपर पुनर्जन्मका हेतु बन जाता है; इतना ही नहीं, कर्तव्यकर्मोंकी अवहेलनासे या दम्भाचारके लिये किया जानेपर तो वह विकर्म (पाप)-के रूपमें बदल जाता है--इस रहस्यको समझ लेना ही अकर्ममें कर्म देखना है। २. स्त्री, पुत्र, धन, मकान, मान, बड़ाई, प्रतिष्ठा और स्वर्गसुख आदि इस लोक और परलोकके जितने भी विषय (पदार्थ) हैं, उनमेंसे किसीकी किंचिन्मात्र भी इच्छा करनेका नाम “कामना” है तथा किसी विषयको ममता, अहंकार, राग-द्वेष एवं रमणीय-बुद्धिसे स्मरण करनेका नाम “संकल्प” है। कामना संकल्पका कार्य है और संकल्प उसका कारण है। विषयोंका स्मरण करनेसे ही उनमें आसक्ति होकर कामनाकी उत्पत्ति होती है (गीता २।६२)। जिन कर्मोंमें किसी वस्तुके संयोग-वियोगकी किंचिन्मात्र भी कामना नहीं है; जिनमें ममता, अहंकार और आसक्तिका सर्वथा अभाव है और जो केवल लोकसंग्रहके लिये चेष्टामात्र किये जाते हैं--वे सब कर्म कामना और संकल्पसे रहित हैं। 3. जैसे अनिनिद्वारा भुने हुए बीज केवल नाममात्रके ही बीज रह जाते हैं, उनमें अंकुरित होनेकी शक्ति नहीं रहती, उसी प्रकार ज्ञानरूप अग्निके द्वारा जो समस्त कर्मोंमें फल उत्पन्न करनेकी शक्तिका सर्वथा नष्ट हो जाना है--यही उन कर्मोंका ज्ञानरूप अग्निसे भस्म हो जाना है। ४. 'अपि' अव्ययसे यह भाव दिखलाया गया है कि ममता, अहंकार और फलासस्तिसे युक्त मनुष्य तो कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करके भी कर्मबन्धनसे मुक्त नहीं हो सकता और यह नित्यतृप्त पुरुष समस्त कर्मोंको करता हुआ भी उनके बन्धनमें नहीं पड़ता। ५. आसक्तिका सर्वथा त्याग करके शरीरमें अहंकार और ममतासे सर्वथा रहित हो जाना और किसी भी सांसारिक वस्तुके या मनुष्यके आश्रित न होना अर्थात्‌ अमुक वस्तु या मनुष्यसे ही मेरा निर्वाह होता है, यही आधार है, इसके बिना काम ही नहीं चल सकता--इस प्रकारके भावोंका सर्वथा अभाव हो जाना ही “निराश्रय” हो जाना है। ऐसा हो जानेपर मनुष्यको किसी भी सांसारिक पदार्थकी किंचिन्मात्र भी आवश्यकता नहीं रहती, वह पूर्णकाम हो जाता है; उसे परमानन्दस्वरूप परमात्माकी प्राप्ति हो जानेके कारण वह निरन्तर आनन्दमें मग्न रहता है, उसकी स्थितिमें किसी भी घटनासे कभी जरा भी अन्तर नहीं पड़ता। यही उसका “नित्यतृप्त' हो जाना है। ६. जिस मनुष्यको किसी भी सांसारिक वस्तुकी कुछ भी आवश्यकता नहीं है; जो किसी भी कर्मसे या मनुष्यसे किसी प्रकारका भोग प्राप्त होनेकी किंचिन्मात्र भी आशा या इच्छा नहीं रखता; जिसने सब प्रकारकी इच्छा, कामना, वासना आदिका सर्वथा त्याग कर दिया है--उसे “निराशी:' कहते हैं; जिसका अन्तःकरण और समस्त इन्द्रियोंसहित शरीर वशमें है--अर्थात्‌ जिसके मन और इन्द्रिय राग-द्वेषसे रहित हो जानेके कारण उनपर शब्दादि विषयोंके संगका कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ सकता और जिसका शरीर भी जैसे वह उसे रखना चाहता है वैसे ही रहता है--वह चाहे गृहस्थ हो या संन्यासी “यतचित्तात्मा” है और जिसकी किसी भी वस्तुमें ममता नहीं है तथा जिसने समस्त भोग-सामग्रियोंके संग्रहका भलीभाँति त्याग कर दिया है, वह संन्यासी तो सर्वथा 'त्यक्तसर्वपरिग्रह:' है ही। इसके सिवा जो कोई दूसरे आश्रमवाला भी यदि उपर्युक्त प्रकारसे परिग्रहका त्याग कर देनेवाला है तो वह भी “त्यक्तसर्वपरिग्रह:” है। ३. उपर्युक्त पुरुषको न तो यज्ञादि कर्मोंका अनुष्ठान न करनेसे होनेवाला प्रत्यवायरूप पाप लगता है और न शरीरनिर्वाहके लिये की जानेवाली क्रियाओंमें होनेवाले पापोंसे ही उसका सम्बन्ध होता है; यही उसका 'पाप' को प्राप्त न होना है । २. अनिच्छासे या परेच्छासे प्रारब्धानुसार जो अनुकूल या प्रतिकूल पदार्थकी प्राप्ति होती है, वह “यदृच्छालाभ” है, इस यदृच्छालाभमें सदा ही आनन्द मानना, न किसी अनुकूल पदार्थकी प्राप्ति होनेपर उसमें राग करना, उसके बने रहने या बढ़नेकी इच्छा करना और न प्रतिकूलकी प्राप्तिमें द्वेष करना, उसके नष्ट हो जानेकी इच्छा करना--इस प्रकार दोनोंको ही प्रारब्ध या भगवानका विधान समझकर निरन्तर शान्त और प्रसन्नचित्त रहना--यही “यदृच्छालाभ' में सदा संतुष्ट रहना है। 3. यज्ञ, दान और तप आदि किसी भी कर्तव्यकर्मका निर्विध्नतासे पूर्ण हो जाना उसकी सिद्धि है और किसी प्रकार विघ्न-बाधाके कारण उसका पूर्ण न होना ही असिद्धि है। इसी प्रकार जिस उद्देश्यसे कर्म किया जाता है, उस उद्देश्यका पूर्ण हो जाना सिद्धि है और पूर्ण न होना ही असिद्धि है। इस प्रकारकी सिद्धि और असिद्धिमें भेदबुद्धिका न होना अर्थात्‌ सिद्धिमें हर्ष और आसक्ति आदि तथा असिद्धिमें द्वेष और शोक आदि विकारोंका न होना, दोनोंमें एक-सा भाव रहना ही सिद्धि और असिद्धिमें सम रहना है। ४. जिस प्रकार केवल शरीरसम्बन्धी कर्मोको करनेवाला परिग्रहरहित सांख्ययोगी अन्य कर्मोंका आचरण न करनेपर भी कर्म न करनेके पापसे लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार कर्मयोगी विहित कर्मोंका अनुष्ठान करके भी उनसे नहीं बँँधता। ५. अपने वर्ण, आश्रम और परिस्थितिके अनुसार जिस मनुष्यका जो शास्त्रदृष्टिसे विहित कर्तव्य है, वही उसके लिये यज्ञ है। उस शास्त्रविहित यज्ञका सम्पादन करनेके उद्देश्यसे ही जो कर्मोंका करना है-- अर्थात्‌ किसी प्रकारके स्वार्थका सम्बन्ध न रखकर केवल लोकसंग्रहरूप यज्ञकी परम्परा सुरक्षित रखनेके लिये ही जो कर्मोंका आचरण करना है, वही यज्ञके लिये कर्मोंका आचरण करना है। उपर्युक्त प्रकारसे कर्म करनेवाले पुरुषके कर्म उसको बाँधनेवाले नहीं होते, इतना ही नहीं; किंतु जैसे किसी घासकी ढेरीमें आगमें जलाकर गिराया हुआ घास स्वयं भी चलकर नष्ट हो जाता है और उस घासकी ढेरीको भी भस्म कर देता है--वैसे ही आसक्ति, फलेच्छा, ममता और अभिमानके त्यागरूप अग्निमें जलाकर किये हुए कर्म पूर्वसंचित समस्त कर्मोंके सहित विलीन हो जाते हैं, फिर उसके किसी भी कर्ममें किसी प्रकारका फल देनेकी शक्ति नहीं रहती। ३. इस यज्ञमें खुवा, हवि, हवन करनेवाला और हवनरूप क्रियाएँ आदि भिन्न-भिन्न वस्तुएँ नहीं होतीं; ऐसा यज्ञ करनेवाले योगीकी दृष्टिमें सब कुछ ब्रह्म ही होता है; क्योंकि वह जिस मन, बुद्धि आदिके द्वारा समस्त जगतको ब्रह्म समझनेका अभ्यास करता है, उनको, अपनेको, इस अभ्यासरूप क्रियाको या अन्य किसी भी वस्तुको ब्रह्मसे भिन्न नहीं समझता, सबको ब्रह्मरूप ही देखता है; इसलिये उसकी उनमें किसी प्रकारकी भी भेदबुद्धि नहीं रहती। २. ब्रह्मा, शिव, शक्ति, गणेश, सूर्य, चन्द्रमा, इन्द्र और वरुणादि जो शास्त्रसम्मत देव हैं--उनके लिये हवन करना, उनकी पूजा करना, उनके मन्त्रका जप करना, उनके निमित्त दान देना और ब्राह्मण-भोजन करवाना आदि समस्त कर्मोंका अपना कर्तव्य समझकर बिना ममता, आसक्ति और फलेच्छाके केवल परमात्माकी प्राप्तिके उद्देश्यसे श्रद्धा-भक्तिपूर्वक शास्त्रविधिके अनुसार पूर्णतया अनुष्ठान करना ही देवताओंके पूजनरूप यज्ञका भलीभाँति अनुष्ठान करना है। ३. अनादिसिद्ध अज्ञानके कारण शरीरकी उपाधिसे आत्मा और परमात्माका भेद अनादिकालसे प्रतीत हो रहा है; इस अज्ञानजनित भेद-प्रतीतिको ज्ञानके अभ्यारुद्वारा मिटा देना अर्थात्‌ शास्त्र और आचार्यके उपदेशसे सुने हुए तत्त्वज्ञानका निरन्तर मनन और निदिध्यासन करते-करते नित्य विज्ञानानन्द्धन गुणातीत परब्रह्म परमात्मामें अभेदभावसे आत्माको एक कर देना--विलीन कर देना ही ब्रह्मरूप अग्निमें यज्ञके द्वारा यज्ञको हवन करना है। ४. श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, जिह्ला और नासिकाको वशमें करके प्रत्याहार करना--शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध आदि बाहर-भीतरके विषयोंसे विवेकपूर्वक उन्हें हटाकर उपरत होना ही श्रोत्र आदि इन्द्रियोंका संयमरूप अग्नियोंमें हवन करना है। इसका सुस्पष्टभाव गीताके दूसरे अध्यायके अठावनवें श्लोकमें कछुएके दृष्टान्तसे बतलाया गया है। ५. कानोंके द्वारा निन्दा और स्तुतिको या अन्य किसी प्रकारके अनुकूल या प्रतिकूल शब्दोंको सुनते हुए, नेत्रोंके द्वारा अच्छे-बुरे दृश्योंको देखते हुए, जिह्नाके द्वारा अनुकूल और प्रतिकूल रसको ग्रहण करते हुए-- इसी प्रकार अन्य समस्त इन्द्रियोंद्वारा भी प्रारब्धके अनुसार योग्यतासे प्राप्त समस्त विषयोंका अनासक्तभावसे सेवन करते हुए अन्तःकरणमें समभाव रखना, भेदबुद्धिजनित राग-द्वेष और हर्ष-शोकादि विकारोंका न होने देना--अर्थात्‌ उन विषयोंमें जो मन और इन्द्रियोंको विक्षिप्त (विचलित) करनेकी शक्ति है, उसका नाश करके उनको इन्द्रियोंमें विलीन करते रहना--यही शब्दादि विषयोंका इन्द्रियरूप अग्नियोंमें हवन करना है। &. इस प्रकारके ध्यानयोगमें जो मनोनिग्रहपूर्वक इन्द्रियोंकी देखना, सुनना, सूँघना, स्पर्श करना, आस्वादन करना एवं ग्रहण करना, त्याग करना, बोलना और चलना-फिरना आदि तथा प्राणोंकी श्वास- प्रश्चास और हिलना-डुलना आदि समस्त क्रियाओंको विलीन करके समाधिस्थ हो जाना है--यही आत्मसंयमयोगरूप अमग्निमें इन्द्रियोंकी और प्राणोंकी समस्त क्रियाओंका हवन करना है। ३. अपने-अपने वर्णधर्मके अनुसार न्यायसे प्राप्त द्रव्यको ममता, आसक्ति और फलेच्छाका त्याग करके यथायोग्य लोकसेवामें लगाना अर्थात्‌ उपर्युक्त भावसे बावली, कुएँ, तालाब, मन्दिर, धर्मशाला आदि बनवाना; भूखे, अनाथ, रोगी, दु:खी, असमर्थ, भिक्षु आदि मनुष्योंकी यथावश्यक अन्न, वस्त्र, जल, औषध, पुस्तक आदि वस्तुओंद्वारा सेवा करना; विद्वान्‌ तपस्वी वेदपाठी सदाचारी ब्राह्मणोंको गौ, भूमि, वस्त्र, आभूषण आदि पदार्थोंका यथायोग्य अपनी शक्तिके अनुसार दान करना--इसी तरह अन्य सब प्राणियोंको सुख पहुँचानेके उद्देश्यसे यथाशक्ति द्रव्यका व्यय करना '“द्रव्ययज्ञ' है। २. परमात्माकी प्राप्तिके उद्देश्य्से अन्तःकरण और इन्द्रियोंको पवित्र करनेके लिये ममता, आसक्ति और फलेच्छाके त्यागपूर्वक व्रत-उपवासादि करना; धर्मपालनके लिये कष्ट सहन करना; मौन धारण करना; अग्नि और सूर्यके तेजको तथा वायुको सहन करना; एक वस्त्र या दो वस्त्रोंस अधिकका त्याग कर देना; अन्नका त्याग कर देना, केवल दूध या फल खाकर ही शरीरका निर्वाह करना; वनवास करना आदि जो शास्त्रविधिके अनुसार तितिक्षासम्बन्धी क्रियाएँ हैं--उन सबका वाचक यहाँ “तपोयज्ञ' है। 3. यहाँ योगरूप यज्ञसे यह भाव समझना चाहिये कि बहुत-से साधक परमात्माकी प्राप्तिके उद्देश्यसे आसक्ति, फलेच्छा और ममताका त्याग करके अष्टांगयोगरूप यज्ञका ही अनुष्ठान किया करते हैं। यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि--ये योगके आठ अंग हैं। किसी भी प्राणीको किसी प्रकार किंचिन्मात्र कभी कष्ट न देना (अहिंसा); हितकी भावनासे कपटरहित प्रिय शब्दोंमें यथार्थभाषण (सत्य); किसी प्रकारसे भी किसीके स्वत्व--हकको न चुराना और न छीनना (अस्तेय); मन, वाणी और शरीरसे सम्पूर्ण अवस्थाओंमें सदा-सर्वदा सब प्रकारके मैथुनोंका त्याग करना (तब्रह्मचर्य) और शरीरनिर्वाहके अतिरिक्त भोग्य-सामग्रीका कभी संग्रह न करना (अपरिग्रह)-- इन पाँचोंका नाम “यम' है। सब प्रकारसे बाहर और भीतरकी पवित्रता रखना (शौच); प्रिय-अप्रिय, सुख-दु:ःख आदिके प्राप्त होनेपर सदा-सर्वदा संतुष्ट रहना (संतोष)। एकादशी आदि व्रत-उपवास करना (तप); कल्याणप्रद शास्त्रोंका अध्ययन तथा ईश्वरके नाम और गुणोंका कीर्तन करना (स्वाध्याय); सर्वस्व ईश्वरके अर्पण करके उनकी आज्ञाका पालन करना (ईश्वरप्रणिधान)--इन पाँचोंका नाम “नियम' है। सुखपूर्वक स्थिरतासे बैठनेका नाम “आसन” है। आसन अनेकों प्रकारके हैं। उनमेंसे आत्मसंयम चाहनेवाले पुरुषके लिये सिद्धासन, पद्मासन और स्वस्तिकासन--ये तीन बहुत उपयोगी माने गये हैं। इनमेंसे कोई-सा भी आसन हो, परंतु मेरुदण्ड, मस्तक और ग्रीवाको सीधा अवश्य रखना चाहिये और दृष्टि नासिकाग्रपर अथवा भृकुटीके मध्यभागमें रखनी चाहिये। आलस्य न सतावे तो आँखें मूँदकर भी बैठ सकते हैं। जो पुरुष जिस आसनसे सुखपूर्वक दीर्घकालतक बैठ सके, उसके लिये वही आसन उत्तम है। बाहरी वायुका भीतर प्रवेश करना श्वास है और भीतरकी वायुका बाहर निकलना प्रश्चास है; इन दोनोंको रोकनेका नाम “प्राणायाम' है। देश, काल और संख्या (मात्रा)-के सम्बन्धसे बाह्य, आभ्यन्तर और स्तम्भवृत्तिवाले--ये तीनों प्राणायाम दीर्घ और सूक्ष्म होते हैं। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध जो इन्द्रियोंके बाहटी विषय हैं और संकल्प-विकल्पादि जो अन्तःकरणके विषय हैं, उनके त्यागसे--उनकी उपेक्षा करनेपर अर्थात्‌ विषयोंका चिन्तन न करनेपर प्राणोंकी गतिका जो स्वत: ही अवरोध होता है, उसका नाम चतुर्थ 'प्राणायाम' है। अपने-अपने विषयोंके संयोगसे रहित होनेपर इन्द्रियोंका चित्तके-से रूपमें अवस्थित हो जाना 'प्रत्याहार' है। स्थूल-सूक्ष्म या बाह्म-आभ्यन्तर--किसी एक ध्येय स्थानमें चित्तको बाँध देना, स्थिर कर देना या लगा देना “धारणा” कहलाता है। चित्तवृत्तिका गंगाके प्रवाहकी भाँति या तैलधारावत्‌ अविच्छिन्नरूपसे ध्येय वस्तुमें ही लगा रहना “ध्यान” कहलाता है। ध्यान करते-करते जब योगीका चित्त ध्येयाकारको प्राप्त हो जाता है और वह स्वयं भी ध्येयमें तन्‍्मय- सा बन जाता है, ध्येयसे भिन्न अपने-आपका भी ज्ञान उसे नहीं-सा रह जाता है, उस स्थितिका नाम “समाधि है। $. जिन शास्त्रोंमें भगवानके तत्त्वका, उनके गुण, प्रभाव और चरित्रोंका तथा उनके साकार-निराकार, सगुण-निर्गुण स्वरूपका वर्णन है--ऐसे शास्त्रोंका अध्ययन करना, भगवान्‌की स्तुतिका पाठ करना, उनके नाम और गुणोंका कीर्तन करना तथा वेद और वेदांगोंका अध्ययन करना 'स्वाध्याय' है। ऐसा स्वाध्याय अर्थज्ञानकेके सहित होनेसे तथा ममता, आसक्ति और फलेच्छाके अभावपूर्वक किये जानेसे 'स्वाध्यायज्ञानयज्ञ"” कहलाता है। इस पदमें स्वाध्यायके साथ "ज्ञान" शब्दका समास करके यह भाव दिखलाया है कि स्वाध्यायरूप कर्म भी ज्ञानयज्ञ ही है, इसलिये गीताके अध्ययनको भी भगवानने 'ज्ञानयज्ञ' नाम दिया है (गीता १८।७०)। २. उपर्युक्त प्राणायामरूप यज्ञमें अग्निस्थानीय अपानवायु है और हविःस्थानीय प्राणवायु है। अतएव यह समझना चाहिये कि जिसे पूरक प्राणायाम कहते हैं, वही यहाँ अपानवायुमें प्राणवायुका हवन करना है; क्योंकि जब साधक पूरक प्राणायाम करता है तो बाहरकी वायुको नासिकाद्वारा शरीरमें ले जाता है, तब वह बाहरकी वायु हृदयमें स्थित प्राणवायुकी साथ लेकर नाभिमेंसे होती हुई अपानमें विलीन हो जाती है। इस साधनमें बार-बार बाहरकी वायुको भीतर ले जाकर वहीं रोका जाता है, इसलिये इसे आभ्यन्तर कुम्भक भी कहते हैं। 3. इस दूसरे प्राणायामरूप यज्ञमें अग्निस्थानीय प्राणवायु है और हविःस्थानीय अपानवायु है। अतः समझना चाहिये कि जिसे रेचक प्राणायाम कहते हैं, वही यहाँपर प्राणवायुमें अपानवायुका हवन करना है; क्योंकि जब साधक रेचक प्राणायाम करता है तो वह भीतरकी वायुको नासिकाद्वारा शरीरसे बाहर निकालकर रोकता है; उस समय पहले हृदयमें स्थित प्राणवायु बाहर आकर स्थित हो जाती है, पीछेसे अपानवायु आकर उसमें विलीन होती है। इस साधनमें बार-बार भीतरकी वायुको बाहर निकालकर वहीं रोका जाता है, इस कारणसे इसे बाह्य कुम्भक भी कहते हैं। ४. जिस प्राणायाममें प्राण और अपान--इन दोनोंकी गति रोक दी जाती है अर्थात्‌ न तो पूरक प्राणायाम किया जाता है और न रेचक, किंतु श्वास और प्रश्चासको बंद करके प्राण-अपान आदि समस्त वायुभेदोंको अपने-अपने स्थानोंमें ही रोक दिया जाता है--वही यहाँ प्राण और अपानकी गतिको रोककर प्राणोंका प्राणोंमें हवन करना है। इस साधनमें न तो बाहरकी वायुको भीतर ले जाकर रोका जाता है और न भीतरकी वायुको बाहर लाकर; बल्कि अपने-अपने स्थानोंमें स्थित पंचवायु-भेदोंको वहीं रोक दिया जाता है। इसलिये इसे “केवल कुम्भक' कहते हैं। ५. इस अध्यायमें चौबीसवें श्लोकसे लेकर यहाँतक जिन यज्ञ करनेवाले साधक पुरुषोंका वर्णन हुआ है, वे सभी ममता, आसक्ति और फलेच्छासे रहित होकर उपर्युक्त यज्ञरूप साधनोंका अनुष्ठान करके उनके द्वारा पूर्वसंचित कर्मसंस्काररूप समस्त शुभाशुभ कर्मोंका नाश कर देनेवाले हैं; इसलिये वे यज्ञके तत्त्वको जाननेवाले हैं। &. यहाँ भगवानने उपर्युक्त यज्ञके रूपकमें परमात्माकी प्राप्तिके ज्ञान, संयम, तप, योग, स्वाध्याय, प्राणायाम आदि ऐसे साधनोंका भी वर्णन किया है, जिनमें अन्नका सम्बन्ध नहीं है। इसलिये यहाँ उपर्युक्त साधनोंका अनुष्ठान करनेसे साधकोंका अन्त:करण शुद्ध होकर उसमें जो प्रसादरूप प्रसन्नताकी उपलब्धि होती है (गीता २।६४-६५; १८।३६-३७), वही यज्ञसे बचा हुआ अमृत है; क्योंकि वह अमृतस्वरूप परमात्माकी प्राप्तिमें हेतु है तथा उस विशुद्धभावसे उत्पन्न सुखमें नित्यतृप्त रहना ही यहाँ उस अमृतका अनुभव करना है। $. जो मनुष्य उपर्युक्त यज्ञोंमेंसे या इनके सिवा जो और भी अनेक प्रकारके साधनरूप यज्ञ शास्त्रोंमें वर्णित हैं, उनमेंसे कोई-सा भी यज्ञ--किसी प्रकार भी नहीं करता, उसको यह लोक भी सुखदायक नहीं है, फिर परलोक तो कैसे सुखदायक हो सकता है--इस कथनसे यह भाव दिखलाया गया है कि उपर्युक्त साधनोंका अधिकार पाकर भी उनमें न लगनेके कारण उसको मुक्ति तो मिलती ही नहीं, स्वर्ग भी नहीं मिलता और मुक्तिके द्वाररूप इस मनुष्यशरीरमें भी कभी शान्ति नहीं मिलती। २. यहाँ जिन साधनरूप यज्ञोंका वर्णन किया गया है एवं इनके सिवा और भी जितने कर्तव्यकर्मरूप यज्ञ शास्त्रोंमें बतलाये गये हैं, वे सब मन, इन्द्रिय और शरीरकी क्रियाद्वारा ही होते हैं। उनमेंसे किसीका सम्बन्ध केवल मनसे है, किसीका मन और इन्द्रियोंसे एवं किसी-किसीका मन, इन्द्रिय और शरीर--इन सबसे है। ऐसा कोई भी यज्ञ नहीं है, जिसका इन तीनोंमेंसे किसीके साथ सम्बन्ध न हो। इसलिये साधकको चाहिये कि जिस साधनमें शरीर, इन्द्रिय और प्राणोंकी क्रियाका या संकल्प-विकल्प आदि मनकी क्रियाका त्याग किया जाता है, उस त्यागरूप साधनको भी कर्म ही समझे और उसे भी फल- कामना, आसक्ति तथा ममतासे रहित होकर ही करे; नहीं तो वह भी बन्धनका हेतु बन सकता है। 3. जिस यज्ञमें द्रव्यकी अर्थात्‌ सांसारिक वस्तुकी प्रधानता हो, उसे द्रव्यमय यज्ञ कहते हैं। अत: अग्निमें घृत, चीनी, दही, दूध, तिल, जौ, चावल, मेवा, चन्दन, कपूर, धूप और सुगन्धयुक्त ओषधियाँ आदि हविका विधिपूर्वक हवन करना; दान देना; परोपकारके लिये कुँआ, बावली, तालाब, धर्मशाला आदि बनवाना; बलिवैश्वदेव करना आदि जितने सांसारिक पदार्थोंसे सम्बन्ध रखनेवाले शास्त्रविहित शुभकर्म हैं--वे सब द्रव्यमय यज्ञके अन्तर्गत हैं तथा जो विवेक, विचार और आध्यात्मिक ज्ञानसे सम्बन्ध रखनेवाले साधन हैं, वे सब ज्ञानयज्ञके अन्तर्गत हैं। ४. उपर्युक्त प्रकरणमें जितने प्रकारके साधनरूप कर्म बतलाये गये हैं तथा इनके सिवा और भी जितने शुभकर्मरूप यज्ञ वेद-शास्त्रोंमें वर्णित हैं (गीता ४।३२), वे सब कर्म ज्ञानमें समाप्त हो जाते हैं, इस कथनसे भगवानने यह भाव दिखलाया है कि समस्त साधनोंका बड़े-से-बड़ा फल परमात्माका यथार्थ ज्ञान प्राप्त करा देना है। ५. परमात्माके तत्त्वको जाननेकी इच्छासे श्रद्धा और भक्तिभावपूर्वक किसी बातको पूछना “परिप्रश्न' है। <. श्रद्धा-भक्तिपूर्वक महापुरुषोंके पास निवास करना, उनकी आज्ञाका पालन करना, उनके मानसिक भावोंको समझकर हरेक प्रकारसे उनको सुख पहुँचानेकी चेष्टा करना--ये सभी सेवाके अन्तर्गत हैं। ७. महापुरुषोंसे परमात्माके तत्त्वज्ञानका उपदेश पाकर आत्माको सर्वव्यापी, अनन्तस्वरूप समझना तथा समस्त प्राणियोंमें भेदबुद्धिका अभाव होकर सर्वत्र आत्मभाव हो जाना--अर्थात्‌ जैसे स्वप्नसे जागा हुआ मनुष्य स्वप्नके जगत्‌को अपने अन्तर्गत स्मृतिमात्र देखता है, वास्तवमें अपनेसे भिन्न अन्य किसीकी सत्ता नहीं देखता, उसी प्रकार समस्त जगत्‌को अपनेसे अभिन्न और अपने अन्तर्गत समझना सम्पूर्ण भूतोंको निःशेषतासे आत्माके अन्तर्गत देखना है (गीता ६।२९)। ३. सम्पूर्ण भूतोंको सच्चिदानन्दघन परमात्मामें देखना पूर्वोक्त आत्मदर्शनरूप स्थितिका फल है; इसीको परमपदकी प्राप्ति, निर्वाण-ब्रह्मकी प्राप्ति और परमात्मामें प्रविष्ट हो जाना भी कहते हैं। २. यहाँ भगवानने अर्जुनको यह बतलाया है कि तुम वास्तवमें पापी नहीं हो, तुम तो दैवी-सम्पदाके लक्षणोंसे युक्त (गीता १६।५) तथा मेरे प्रिय भक्त और सखा हो (गीता ४।३); तुम्हारे अंदर पाप कैसे रह सकते हैं। परंतु इस ज्ञानका इतना प्रभाव और माहात्म्य है कि यदि तुम अधिक-से-अधिक पापकर्मी होओ तो भी तुम इस ज्ञानरूप नौकाके द्वारा उन समुद्रके समान अथाह पापोंसे भी अनायास तर सकते हो। बड़े- से-बड़े पाप भी तुम्हें अटका नहीं सकते। 3. इस जन्म और जन्मान्तरमें किये हुए समस्त कर्म संस्काररूपसे मनुष्यके अन्त:करणमें एकत्रित रहते हैं, उनका नाम 'संचित'” कर्म है। उनमेंसे जो वर्तमान जन्ममें फल देनेके लिये प्रस्तुत हो जाते हैं, उनका नाम “प्रारब्ध/ कर्म है और वर्तमान समयमें किये जानेवाले कर्मोंको 'क्रियमाण” कहते हैं। उपर्युक्त तत्त्वज्ञानरूप अग्निके प्रकट होते ही समस्त पूर्वसंचित संस्कारोंका अभाव हो जाता है। मन, बुद्धि और शरीरसे आत्माको असंग समझ लेनेके कारण उन मन, इन्द्रिय और शरीरादिके साथ प्रारब्ध भोगोंका सम्बन्ध होते हुए भी उन भोगोंके कारण उसके अन्तःकरणमें हर्ष-शोक आदि विकार नहीं हो सकते। इस कारण वे भी उसके लिये नष्ट हो जाते हैं और क्रियमाण कर्मोंमें उसका कर्तृत्वाभिमान तथा ममता, आसक्ति और वासना न रहनेके कारण उनके संस्कार नहीं बनते; इसलिये वे कर्म वास्तवमें कर्म ही नहीं हैं। इस प्रकार उसके समस्त कर्मोंका नाश हो जाता है। ४. कितने ही कालतक कर्मयोगका आचरण करते-करते राग-द्वेषके नष्ट हो जानेसे जिसका अन्त:करण स्वच्छ हो गया है, जो कर्मयोगमें भलीभाँति सिद्ध हो गया है; जिसके समस्त कर्म ममता, आसक्ति और फलेच्छाके बिना भगवान्‌की आज्ञाके अनुसार भगवान्‌के ही लिये होते हैं--उस योग-संसिद्ध पुरुषके अन्तःकरणमें परमेश्वरके अनुग्रहसे अपने-आप उस ज्ञानका प्रकाश हो जाता है। ५. वेद, शास्त्र, ईश्वर और महापुरुषोंके वचनोंमें तथा परलोकमें जो प्रत्यक्षकी भाँति विश्वास है एवं उन सबमें परम पूज्यता और उत्तमताकी भावना है--उसका नाम श्रद्धा है और ऐसी श्रद्धा जिसमें हो, उसको *श्रद्धावान” कहते हैं। जबतक इन्द्रिय और मन अपने काबूमें न आ जाये, तबतक श्रद्धापूर्वक कटिबद्ध होकर उत्तरोत्तर तीव्र अभ्यास करते रहना चाहिये; क्योंकि श्रद्धापूर्वक तीव्र अभ्यासकी कसौटी इन्द्रियसंयम ही है, जितना ही श्रद्धापूर्ण तीव्र अभ्यास किया जाता है, उत्तरोत्तर उतना ही इन्द्रियोंका संयम होता जाता है। अतएव इन्द्रिय-संयमकी जितनी कमी है, उतनी ही साधनमें कमी समझनी चाहिये और साधनमें जितनी कमी है, उतनी ही श्रद्धामें त्रुटि समझनी चाहिये। $. वेद-शास्त्र और महापुरुषोंके वचनोंको तथा उनके बतलाये हुए साधनोंको ठीक-ठीक न समझ सकनेके कारण तथा जो कुछ समझमें आवे उसपर भी विश्वास न होनेके कारण जिसको हरेक विषयमें संशय होता रहता है, जो किसी प्रकार भी अपने कर्तव्यका निश्चय नहीं कर पाता, हर हालतमें संशययुक्त रहता है, वह मनुष्य अपने मनुष्य-जीवनको व्यर्थ ही खो बैठता है। जिसमें स्वयं विवेचन करनेकी शक्ति नहीं है, ऐसा अज्ञ मनुष्य भी यदि श्रद्धालु हो तो श्रद्धाके कारण महापुरुषोंके कथनानुसार संशयरहित होकर साधनपरायण हो सकता है और उनकी कृपासे उसका भी कल्याण हो सकता है (गीता १३।२५); परंतु जिस संशययुक्त पुरुषमें न विवेकशक्ति है और न श्रद्धा ही है, उसके संशयके नाशका कोई उपाय नहीं रह जाता; इसलिये जबतक उसमें श्रद्धा या विवेक नहीं आ जाता, उसका अवश्य पतन हो जाता है। २. संशययुक्त मनुष्य केवल परमार्थसे भ्रष्ट हो जाता है इतनी ही बात नहीं है, जबतक मनुष्यमें संशय विद्यमान रहता है, वह उसका नाश नहीं कर लेता, तबतक वह न तो इस लोकमें यानी मनुष्यशरीरमें रहते हुए धन, ऐश्वर्य या यशकी प्राप्ति कर सकता है, न परलोकमें यानी मरनेके बाद स्वर्गादिकी प्राप्ति कर सकता है और न किसी प्रकारके सांसारिक सुखोंको ही भोग सकता है। 3. यहाँ “योगसंन्यस्तकर्माणम्‌” का अर्थ स्वरूपसे कर्मोंका त्याग कर देनेवाला न मानकर कर्मयोगके द्वारा समस्त कर्मोमें और उनके फलमें ममता, आसक्ति और कामनाका सर्वथा त्याग करके उन सबको परमात्मामें अर्पण कर देनेवाला त्यागी (गीता ३।३०; ५।१०) मानना ही उचित है। ४. ईश्वर है या नहीं, है तो कैसा है, परलोक है या नहीं, यदि है तो कैसे है और कहाँ है, शरीर, इन्द्रिय, मन और बुद्धि--ये सब आत्मा हैं या आत्मासे भिन्न हैं, जड़ हैं या चेतन, व्यापक हैं या एकदेशीय, कर्ता- भोक्ता जीवात्मा है या प्रकृति, आत्मा एक है या अनेक, यदि वह एक है तो कैसे है और अनेक है तो कैसे, जीव स्वतन्त्र है या परतन्त्र, यदि परतन्त्र है तो कैसे है और किसके परतन्त्र है, कर्म-बन्धनसे छूटनेके लिये कर्मोंको स्वरूपसे छोड़ देना ठीक है या कर्मयोगके अनुसार उनका करना ठीक है, अथवा सांख्ययोगके अनुसार साधन करना ठीक है--इत्यादि जो अनेक प्रकारकी शंकाएँ तर्कशील मनुष्योंके अन्तःकरणमें उठा करती हैं, इन समस्त शंकाओंका विवेकज्ञानके द्वारा विवेचन करके एक निश्चय कर लेना अर्थात्‌ किसी भी विषयमें संशययुक्त न रहना और अपने कर्तव्यको निर्धारित कर लेना, यही विवेकज्ञानद्वारा समस्त संशयोंका नाश कर देना है। ५. जिसके मन और इन्द्रिय वशमें किये हुए हैं--अपने काबूमें हैं, उस पुरुषके शास्त्रविहित कर्म ममता, आसक्ति और कामनासे सर्वथा रहित होते हैं; इस कारण उन कर्मोंमें बन्धन करनेकी शक्ति नहीं रहती। ६. संशयका कारण अविवेक है। अत: विवेकद्वारा अविवेकका नाश होते ही उसके साथ-साथ संशयका भी नाश हो जाता है। इसका स्थान हृदय यानी अन्तःकरण है; अत: जिसका अन्तःकरण अपने वशमें है, उसके लिये इसका नाश करना सहज है। अर्जुनके अन्तःकरणमें संशय विद्यमान था, उनकी विवेकशक्ति मोहके कारण कुछ दबी हुई थी; इसीसे वे अपने कर्तव्यका निश्चय नहीं कर सकते थे और स्वधर्मरूप युद्धका त्याग करनेके लिये तैयार हो गये थे। इसलिये भगवान्‌ यहाँ उन्हें उनके हृदयमें स्थित संशयका विवेकद्वारा छेदन करनेके लिये कहते हैं। एकोनत्रिशो< ध्याय: (श्रीमद्भगवद्गीतायां पज्चमो< ध्याय:) सांख्ययोग, निष्काम कर्मयोग, ज्ञानयोग एवं भक्तिसहित ध्यानयोगका वर्णन सम्बन्ध--गीताके तीसरे और चौथे अध्यायमें अर्जुनने भगवान्‌के श्रीमुखसें अनेकों प्रकारसे कर्मयोगकी प्रशंसा युनी और उसके सम्पादनकी प्रेरणा तथा आज्ञा प्राप्त की। साथ ही यह भी युना कि 'कर्मयोगके द्वारा भगवत्स्वरूपका तत्त्वज्ञान अपने-आप ही हो जाता है! (गीता ४/३८)/ गीताके चौथे अध्यायके अन्तमें भी उन्हें भगवान्‌के द्वाय कर्मयोगके सम्पादनकी ही आज्ञा मिली। परंतु बीच-बीचमें उन्होंने भगवान्‌के श्रीमुखसे ही ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविः (गीता ४।/२४/* ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुद्धति (गीता ४/२५/ (द्‌ विद्धि प्रणिपातेन (गीता ४/३४)// आदि वचनोंद्वारा ज्ञानयोग अथाति कर्मसंन्यायकी भी प्रशंसा युनी। इससे अर्जुन यह निर्णय नहीं कर सके कि इन दोनोंगेंसे मेरे लिये कौन-सा साधन श्रेष्ठ है। अतएव अब भगवान्‌के श्रीमुखसे ही उसका निर्णय करानेके उद्देश्यसे अर्जुन उनसे प्रश्न करते हैं-- अर्जुन उवाच संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि । यच्छेय एतयोरेकं तनमे ब्रूहि सुनिश्चितम्‌,अर्जुन बोले--हे कृष्ण! आप करमोके संन्यासकी और फिर कर्मयोगकी प्रशंसा करते हैं। इसलिये इन दोनोंमेंसे जो एक मेरे लिये भलीभाँति निश्चित कल्याणकारक साधन हो, उसको कहियेः

Verse 2

श्रीभगवानुवाच संन्यास: कर्मयोगश्न नि:श्रेयसकरावुभौ । तयोस्तु कर्मसंन्यासात्‌ कर्मयोगो विशिष्यते

The Blessed Lord said: Both renunciation and the discipline of selfless action lead to the highest good. Yet, between the two, the path of action offered without attachment is superior to mere abandonment of works—because it guides one to freedom while still fulfilling one’s rightful duty.

Verse 3

श्रीभगवान्‌ बोले--कर्मसंन्यास और कर्मयोग--ये दोनों ही परम कल्याणके करनेवाले हैं, परंतु उन दोनोंमें भी कर्मसंन्याससे कर्मयोग साधनमें सुगम होनेसे श्रेष्ठ हैः ।। ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काडक्षति । निर्दन्दी हि महाबाहो सुखं बन्धात्‌ प्रमुच्यते,हे अर्जुन! जो पुरुष न किसीसे द्वेष करता है और न किसीकी आकांक्षा करता है, वह कर्मयोगी सदा संन्‍्यासी ही समझनेयोग्य है;* क्योंकि रागदद्वेषादि द्वन्दोंसे रहित पुरुष सुखपूर्वक संसारबन्धनसे मुक्त हो जाता है

Know that person to be a perpetual renunciant who neither hates nor craves. Free from the pairs of opposites, O mighty-armed one, he is released with ease from the bondage of worldly entanglement. The ethical point is that inner freedom—absence of aversion and grasping—constitutes true renunciation even while one remains engaged in action.

Verse 4

इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके श्रीमद्भगवद्‌गीतापवके अन्तर्गत ब्रह्मविद्या एवं योगशासत्ररूप श्रीमद्भगवद्‌गीतोपनिषद्‌, श्रीकृष्णारजुनसंवादमें ज्ञानकर्मसंन्यासयोग नामक चौथा अध्याय पूरा हुआ,सांख्ययोगौ पृथग्‌ बाला: प्रवदन्ति न पण्डिता: । एकमप्यास्थित: सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्‌ उपर्युक्त संन्यास और कर्मयोगको मूर्खलोग पृथक्‌-पृथक्‌ फल देनेवाले कहते हैं न कि पण्डितजन; क्‍योंकि दोनोंमेंसे एकमें भी सम्यक्‌ प्रकारसे स्थित पुरुष दोनोंके फलरूप परमात्माको प्राप्त होता हैः

The unwise speak of Sāṅkhya (renunciation through knowledge) and Yoga (disciplined action) as if they were different paths with different ends; the truly discerning do not. For one who is rightly established even in one of them, in the proper spirit, attains the fruit of both—realization of the Supreme. Ethically, the teaching dissolves the false conflict between inner renunciation and outward duty: right action, performed without possessiveness and with clarity of understanding, becomes a means to the same liberation that renunciation seeks.

Verse 5

यत्‌ सांख्यै: प्राप्पते स्थानं तद्‌ योगैरपि गम्यते । एक॑ सांख्यं च योगं च य: पश्यति स पश्यति,ज्ञानयोगियोंद्वारा जो परमधाम प्राप्त किया जाता है, कर्मयोगियोंद्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है।5 इसलिये जो पुरुष ज्ञानयोग और कर्मयोगको फलरूपमें एक देखता है, वही यथार्थ देखता है इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतापर्वणि श्रीमद्धभगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मसंन्यासयोगो नाम पठ्चमो<ध्याय:

Arjuna said: The supreme state that is attained by the followers of Sāṅkhya is also reached by the practitioners of Yoga. He alone truly sees who recognizes Sāṅkhya (the path of discerning knowledge) and Yoga (the path of disciplined action) as one in their essential result.

Verse 6

संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगत: । योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्दा नचिरेणाधिगच्छति,परंतु हे अर्जुन! कर्मयोगके बिना संन्यास अर्थात्‌ मन, इन्द्रिय और शरीरद्वारा होनेवाले सम्पूर्ण कर्मोमें कर्तापनका त्याग प्राप्त होना कठिन है और भगवत्स्वरूपको मनन करनेवाला कर्मयोगी परब्रह्म परमात्माको शीघ्र ही प्राप्त हो जाता है

Arjuna said: O mighty-armed one, renunciation is hard to attain without disciplined practice; but the sage who is integrated in yoga quickly reaches Brahman. Ethically, the verse stresses that inner freedom is not gained by merely abandoning action, but by cultivating steadiness and selfless discipline that purifies agency and leads to the highest reality.

Verse 7

योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रिय: । सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते,जिसका मन अपने वशमें है, जो जितेन्द्रिय एवं विशुद्ध अन्तःकरणवाला हैः और सम्पूर्ण प्राणियोंका आत्मरूप परमात्मा ही जिसका आत्मा है, ऐसा कर्मयोगी कर्म करता हुआ भी लिप्त नहीं होता

One who is disciplined in yoga—pure in inner being, self-mastered, and with senses conquered—whose very self has become one with the Self of all beings, remains unstained even while acting. The verse frames ethical action as possible without moral taint when deeds arise from inner purity, restraint, and a vision of the one Self present in all creatures.

Verse 8

नैव किंचित्‌ करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्‌ पश्यज्शृण्वन्‌ स्पृशज्जिप्रन्नश्नन्‌ गच्छन्‌ स्वपउश्ववसन्‌,तत्त्वको जाननेवाला सांख्ययोगी5ः तो देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूँघता हुआ, भोजन करता हुआ, गमन करता हुआ, सोता हुआ, श्वास लेता हुआ, बोलता हुआ, त्यागता हुआ, ग्रहण करता हुआ तथा आँखोंको खोलता और मूँदता हुआ भी, सब इन्द्रियाँ अपने-अपने अर्थोमें बरत रही हैं--इस प्रकार समझकर नि:संदेह ऐसा माने कि मैं कुछ भी नहीं करता हूँ:

The knower of truth, disciplined in yoga, should understand: “I do nothing at all.” Even while seeing, hearing, touching, smelling, eating, walking, sleeping, breathing; speaking, letting go, taking hold; and even opening and closing the eyes—he holds firmly that it is only the senses moving among their objects. Thus, without self-deception, he remains free from the claim of doership and the moral vanity that follows from it.

Verse 9

प्रलपन्‌ विसृजन गृह्नन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्‌,तत्त्वको जाननेवाला सांख्ययोगी5ः तो देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूँघता हुआ, भोजन करता हुआ, गमन करता हुआ, सोता हुआ, श्वास लेता हुआ, बोलता हुआ, त्यागता हुआ, ग्रहण करता हुआ तथा आँखोंको खोलता और मूँदता हुआ भी, सब इन्द्रियाँ अपने-अपने अर्थोमें बरत रही हैं--इस प्रकार समझकर नि:संदेह ऐसा माने कि मैं कुछ भी नहीं करता हूँ:

Holding firmly to the insight that it is only the senses moving among their respective objects, the knower of truth—steadfast in Sāṅkhya and Yoga—regards himself as not truly acting at all, even while speaking, letting go, taking hold, and even while opening and closing the eyes.

Verse 10

सम्बन्ध-- इस प्रकार सांख्ययोगीके साधनका स्वरूप बतलाकर अब दसवें और ग्यारहवें श्लोकोंगें कर्मयोगियोंके साधनका फलयहित स्वरूप बतलाते हैं-- ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सड़ूं त्यक्त्वा करोति यः । लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा,जो पुरुष सब कर्मोंको परमात्मामें अर्पण करके5 और आसक्तिको त्यागकर कर्म करता है, वह पुरुष जलसे कमलके पत्तेकी भाँति पापसे लिप्त नहीं होता

Arjuna said: Whoever dedicates all actions to Brahman (the Supreme), performing them after abandoning attachment, is not stained by sin—just as a lotus leaf remains untouched by water. In the ethical setting of the battlefield, the teaching reframes action: one should not flee duty out of fear of moral taint, but act with inner renunciation and God-centered offering, so that responsibility is fulfilled without selfish grasping.

Verse 11

कायेन मनसा बुद्धया केवलैरिन्द्रियैरपि । योगिन: कर्म कुर्वन्ति सड़ूं त्यक्त्वा55त्मशुद्धये,कर्मयोगी ममत्वबुद्धिरहित केवल इन्द्रिय, मन, बुद्धि और शरीरद्वारा भी आसक्तिको त्यागकर अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये कर्म करते हैं*

Arjuna said: “With the body, the mind, the intellect, and even with the senses alone, disciplined practitioners perform action—having abandoned attachment—so that the inner self may be purified.” In the ethical frame of the Gītā’s battlefield counsel, the verse presents work not as self-assertion or possession, but as a means of cleansing intention and reducing egoic clinging while still fulfilling one’s duty.

Verse 12

युक्त: कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्रोति नैषप्ठिकीम्‌ अयुक्त: कामकारेण फले सक्तो निबध्यते,कर्मयोगी कर्मोंके फलका त्याग करके भगवत्प्राप्तिरूप शान्तिको प्राप्त होता है और सकाम पुरुष कामनाकी प्रेरणासे फलमें आसक्त होकर बँधता है?

Arjuna said: “One who is disciplined—renouncing the fruits of action—attains steadfast peace, the settled tranquility born of spiritual commitment. But one who is undisciplined, driven by desire, clings to results and thus becomes bound.”

Verse 13

सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी । नदद्वारे पुरे देही नैव कुर्वनू न कारयन्‌,अन्त:ःकरण जिसके वशमें है, ऐसा सांख्ययोगका आचरण करनेवाला पुरुष न करता हुआ और न करवाता हुआ ही नदद्वारोंवाले शरीररूप घरमें सब कर्मोंको मनसे त्यागकर्रः आनन्दपूर्वक सच्चिदानन्दघन परमात्माके स्वरूपमें स्थित रहता है

Arjuna said: Having mentally renounced all actions, the self-controlled embodied being rests in ease within the ‘city of nine gates’ (the body), neither acting nor causing others to act. The ethical thrust is inner mastery: freedom from doership and coercion, while abiding in the Self beyond compulsive agency.

Verse 14

सम्बन्ध-- जबकि आत्मा वास्तवमें कर्म करनेवाला भी नहीं है और इनद्द्रियादिसे करवानेवाला भी नहीं है; तो फिर सब मनुष्य अपनेको कर्मोका कर्ता क्‍यों मानते हैं और वे कर्मफलके भागी क्‍यों होते हैं? इसपर कहते हैं-- न कर्त॒त्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभु: । न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते,परमेश्वर मनुष्योंके न तो कर्तापनकी, न कर्मोंकी और न कर्मफलके संयोगकी ही रचना करते हैं;* किंतु स्वभाव ही बर्त रहा है?

Arjuna said: The Lord does not create for people the sense of doership, nor the actions themselves, nor the linkage with the fruits of action. Rather, it is one’s own nature—habitual disposition shaped by the guṇas—that sets all this in motion. In the ethical setting of the Gītā’s battlefield teaching, Arjuna is pressing the question of moral responsibility: if the Self is not truly an agent, why do humans still experience themselves as accountable actors and inheritors of consequences?

Verse 15

सम्बन्ध-- जो साधक समस्त कर्मोकों और कर्मफलोंको भगवान्‌के अर्पण करके कर्मफलसे अपना सम्बन्ध-विच्छेद कर लेते हैं; उनके शुभाशुभ कमोंके फलके भागी क्या भगवान्‌ होते हैं? इस जिज्ञासापर कहते हैं-- नादत्ते कस्यचित्‌ पापं न चैव सुकृत॑ विभु: । अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुहान्ति जन्तव:,सर्वव्यापी परमेश्वर भी न किसीके पापकर्मको और न किसीके शुभकर्मको ही ग्रहण करता है; किंतु अज्ञानके द्वारा ज्ञान ढका हुआ है, उसीसे सब अज्ञानी मनुष्य मोहित हो रहे हैं:

The all-pervading Lord does not take upon Himself anyone’s sin, nor even anyone’s merit. Rather, knowledge in embodied beings is veiled by ignorance; and because of that covering, creatures become deluded—mistaking the self and its agency, and thereby binding themselves to the consequences of action.

Verse 16

ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मन: । तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्‌,परंतु जिनका वह अज्ञान परमात्माके तत्त्वज्ञानद्वारा नष्ट कर दिया गया है, उनका वह ज्ञान सूर्यके सदूश उस सच्चिदानन्दघन परमात्माको प्रकाशित कर देता है

But for those in whom that ignorance has been destroyed by true knowledge, their knowledge shines like the sun and reveals the Supreme Reality. Ethically, the verse frames liberation not as a change in the world outside, but as the removal of inner obscuration: when delusion is dispelled, discernment becomes luminous and one recognizes the highest good beyond confusion and self-centered impulse.

Verse 17

सम्बन्ध-- यथार्थ ज्ञानसे परमात्माकी प्राप्ति होती है, यह बात संक्षेपयें कहकर अब छब्बीसवें श्लोकतक ज्ञानयोगद्वारा परमात्माको प्राप्त होनेके याधन तथा परमात्माको प्राप्त सिद्ध पुरुषोंके लक्षण, आचरण, महत्त्व और स्थितिका वर्णन करनेके उद्देश्यसे पहले यहाँ ज्ञानयोगके एकान्त साधनद्वारा परमात्माकी प्राप्ति बतलाते हैं-- तदबुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणा: । गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषा:,जिनका मन तद्रूप हो रहा है, जिनकी बुद्धि तद्रप हो रही हैः और सच्चिदानन्दघन परमात्मामें ही जिनकी निरन्तर एकीभावसे स्थिति है,* ऐसे तत्परायण पुरुष ज्ञानके द्वारा पापरहित* होकर अपुनरावृत्तिको अर्थात्‌ परम गतिको प्राप्त होते हैं+

Verse 18

विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि । शुनि चैव श्वपाके च पण्डिता: समदर्शिन:,वे ज्ञानीजन विद्या और विनययुक्त ब्राह्मणमें तथा गौ, हाथी, कुत्ते और चाण्डालमें भी समदर्शी ही होते हैं?

The wise perceive with equal vision a Brahmin endowed with learning and humility, a cow, an elephant, a dog, and even one who eats dog’s flesh (an outcaste). In ethical terms, true knowledge expresses itself as impartial regard for the same indwelling Self in all beings, beyond social rank or species.

Verse 19

इहैव तैर्जित: सर्गो येषां साम्ये स्थितं मन: । निर्दोष हि सम॑ ब्रह्म तस्माद्‌ ब्रह्मणि ते स्थिता:

Even here, in this very life, those whose minds are established in equanimity have conquered the cycle of worldly becoming. For Brahman is flawless and impartial; therefore they abide in Brahman. In the midst of conflict and moral strain, the verse points to inner steadiness as the decisive victory—one that frees a person from being driven by partiality, agitation, or reactive judgment.

Verse 20

१९ ।। न प्रह्ृष्येत्‌ प्रियं प्राप्प नोद्धिजेत्‌ प्राप्प चाप्रियम्‌ । स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्म॒विद्‌ ब्रह्म॒णि स्थित:,जो पुरुष प्रियको प्राप्त होकर हर्षित नहीं हो और अप्रियको प्राप्त होकर उद्विग्न न हो, वह स्थिरबुद्धि संशयरहित ब्रह्मवेत्ता पुरुष सच्चिदानन्द्धन परब्रह्म परमात्मामें एकीभावसे नित्य स्थित है

One who does not exult on gaining what is pleasing, nor become agitated on encountering what is displeasing—who is steady in understanding and free from delusion—such a knower of Brahman remains firmly established in Brahman. In the ethical frame of the battlefield teaching, this describes inner poise that is not swayed by success or setback, praise or pain, and thus supports right action without attachment.

Verse 21

बाहास्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्‌ सुखम्‌ । स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्लुते,बाहरके विषयोंमें आसक्तिरहित अन्तःकरणवाला साधकः आत्मामें स्थित जो ध्यानजनित सात््विक आनन्द है, उसको प्राप्त होता है; तदनन्तर वह सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्माके ध्यानरूप योगमें अभिन्नभावसे स्थित” पुरुष अक्षय आनन्दका अनुभव करता हैः

Arjuna says: One whose mind is unattached to external contacts and sense-objects discovers within the Self the happiness that arises from inner steadiness. Established in the yoga of Brahman—absorbed in the Supreme—such a person partakes of imperishable bliss.

Verse 22

ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते । आटद्यन्तवन्त: कौन्तेय न तेषु रमते बुध:,जो ये इन्द्रिय तथा विषयोंके संयोगसे उत्पन्न होनेवाले सब भोग हैं, वे यद्यपि विषयी पुरुषोंको सुखरूप भासते हैं तो भी दुःखके ही हेतु हैं! और आदि-अन्तवाले अर्थात्‌ अनित्य हैं। इसलिये हे अर्जुन! बुद्धिमान्‌ विवेकी पुरुष उनमें नहीं रमता5

Arjuna says: The pleasures that arise from contact between the senses and their objects are, in truth, sources of suffering. They have a beginning and an end and are therefore impermanent. Knowing this, O son of Kuntī, the wise person does not delight in them—choosing steadiness and discernment over fleeting gratification amid the moral crisis of war.

Verse 23

शकक्‍्नोतीहैव य: सोढुं प्राक्‌ शरीरविमोक्षणात्‌ । कामक्रोधोद्धवं वेगं स युक्त: स सुखी नर:,जो साधक इस मनुष्यशरीरमें, शरीरका नाश होनेसे पहले-पहले हीः काम-क्रोधसे उत्पन्न होनेवाले वेगको सहन करनेमें समर्थ हो जाता है,* वही पुरुष योगी है और वही सुखी है

Arjuna said: The person who, while still living in this very body—before it is cast off—can endure the surging impulse born of desire and anger, that person is truly disciplined in yoga and is genuinely happy. The ethical point is self-mastery: inner victory over passion and wrath is presented as the mark of real spiritual steadiness, even amid the pressures of life and conflict.

Verse 24

सम्बन्ध-- उपर्युक्त प्रकारसे बाह्य विषयभोगोंकोी क्षणिक और दुःखोंका कारण समझकर तथा आसक्तिका त्याग करके जो काम-क्रोधपर विजय प्राप्त कर चुका है; अब ऐसे यांख्ययोगीकी अन्तिम स्थितिका फल-यहित वर्णन किया जाता है-- यो<न्त:सुखो<न्‍्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः । स योगी ब्रह्नानिर्वाणं ब्रह्म भूतो 5धिगच्छति,जो पुरुष अन्तरात्मामें ही सुखवाला है, आत्मामें ही रमण करनेवाला हैः तथा जो आत्मामें ही ज्ञानवाला है, वह सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्माके साथ एकीभावको प्राप्त सांख्ययोगीः शान्त ब्रह्मको प्राप्त होता है?

Arjuna said: The yogin whose happiness is inward, whose delight is within the Self, and whose light of knowledge shines from within—having become one with Brahman—attains the peace of Brahman, the state of liberation.

Verse 25

लभभनते ब्रह्मनिर्वाणमृषय: क्षीणकल्मषा: । छिन्नद्वैधा यतात्मान: सर्वभूतहिते रता:,जिनके सब पाप नष्ट हो गये हैं,/ जिनके सब संशय ज्ञानके द्वारा निवृत्त हो गये हैं, जो सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें रत हैं और जिनका जीता हुआ मन निश्चलभावसे परमात्मामें स्थित है, वे ब्रह्मवेत्ता पुरुष शान्त ब्रह्मको प्राप्त होते हैं

Sages whose impurities have been exhausted attain the peace of Brahman—those whose inner conflict has been cut away, who are self-disciplined, and who delight in the welfare of all beings. The verse frames liberation not as escape from the world, but as the ethical maturity of a purified mind devoted to universal good.

Verse 26

कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां* यतचेतसाम्‌ | अभितो ब्रह्निर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्‌

Arjuna said: For ascetics who have cast off desire and anger, whose minds are disciplined and restrained, the peace of Brahman—liberation—abides all around; it is ever-present for those who truly know the Self. Ethically, the verse points to inner conquest (over passion and wrath) as the ground of spiritual freedom, even amid the pressures of conflict.

Verse 27

सम्बन्ध-- कर्मगोग और सांख्ययोग--दोनों याधनों-्वारा परमात्माकी प्राप्ति और परमात्माको प्राप्त महापुरुषोंके लक्षण कहे गये। उक्त दोनों ही प्रकारके साधकोंके लिये वैराग्यपूर्वक मन-इन्द्रियोॉंकोी वशर्में करके ध्यानयोगका साधन करना उपयोगी है; अतः अब संक्षेपें फलसहित ध्यानयोगका वर्णन करते हैं-- स्पर्शान्‌ कृत्वा बहिर्बहिंभ्षक्षुश्वैवान्तरे भ्रुवो: । प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ,बाहरके विषयभोगोंको न चिन्तन करता हुआ बाहर ही निकालकर और नेत्रोंकी दृष्टिको भूकुटीके बीचमें स्थित करके* तथा नासिकामें विचरनेवाले प्राण और अपानवायुको सम करके,“ जिसकी इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि जीती हुई हैं---ऐसा जो मोक्षपरायण मुनि इच्छा, भय और क्रोधसे रहित हो गया है, वह सदा मुक्त ही हैः

Arjuna said: Having set aside external sense-contacts and turned the mind away from outward enjoyments, fixing the gaze steadily in the space between the eyebrows, and equalizing the inward-moving and outward-moving breaths as they pass within the nostrils—one disciplines the senses and mind for meditation. In the ethical setting of the battlefield discourse, this instruction presents inner mastery (restraint of attention and breath) as a practical means to steadiness and liberation, even amid the pressures of action and conflict.

Verse 28

भीष्मपर्वणि तु अष्टाविंशोड ध्याय:,भीष्मपर्वमें अद्वाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायण: । विगतेच्छाभयक्रोधो य: सदा मुक्त एव सः बाहरके विषयभोगोंको न चिन्तन करता हुआ बाहर ही निकालकर और नेत्रोंकी दृष्टिको भूकुटीके बीचमें स्थित करके* तथा नासिकामें विचरनेवाले प्राण और अपानवायुको सम करके,“ जिसकी इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि जीती हुई हैं---ऐसा जो मोक्षपरायण मुनि इच्छा, भय और क्रोधसे रहित हो गया है, वह सदा मुक्त ही हैः

The sage who has mastered his senses, mind, and intellect, and who is wholly devoted to liberation—free from desire, fear, and anger—is, in truth, ever liberated. The verse presents inner conquest as the ethical foundation of freedom: liberation is not merely a future attainment but a present state for one whose impulses no longer govern conduct.

Verse 29

सम्बन्ध-- जो मनुष्य इस प्रकार मन, इन्द्रियॉपर विजय प्राप्त करके कर्मयोग, सांख्ययोग या ध्यानयोगका याधन करनेगें अपनेको समर्थ नहीं यमझता हो, ऐसे साधकके लिये सुगमतासे परमपदकी प्राप्ति करानेवाले भ्क्तियोगका संक्षेप्ें वर्णन करते हैं-- भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्‌ । सुहृद सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति,मेरा भक्त मुझको सब यज्ञ और तपोंका भोगनेवाला,* सम्पूर्ण लोकोंके ईश्वरोंका भी ईश्वर" तथा सम्पूर्ण भूतप्राणियोंका सुहृद* अर्थात्‌ स्वार्थरहित दयालु और प्रेमी, ऐसा तत्त्वसे जानकर शान्तिको प्राप्त होता है?

Knowing Me in truth as the enjoyer and final recipient of all sacrifices and austerities, as the supreme Lord even over the rulers of all worlds, and as the selfless well-wisher of every living being, My devotee attains peace. In the midst of the war’s moral strain, the verse grounds inner calm not in withdrawal from duty, but in clear recognition of the divine as the ultimate end of disciplined action and the universal friend of all creatures.

Frequently Asked Questions

The problem is misrecognition caused by guṇa-driven delusion and desire–aversion dualities, which prevents beings from apprehending the imperishable ground; the remedy proposed is disciplined yoga and exclusive refuge that stabilizes understanding and conduct.

Prakṛti is articulated in a two-tier model: an eightfold “lower” configuration of material-psychological constituents and a “higher” principle as jīva that sustains the world; Kṛṣṇa is presented as the source, support, and end of the cosmos, enabling a unified metaphysical and devotional orientation.

Yes: the chapter states that those who strive for release from aging and death by taking refuge come to know brahman, adhyātman, and karma in an integrated way, and—if their minds are disciplined—retain this recognition even at the time of departure (prayāṇa-kāla).