Adhyaya 30
Vana ParvaAdhyaya 3044 Verses

Adhyaya 30

अध्याय ३० — क्रोधदोषाः क्षमाप्रशंसा च (Defects of Anger and the Praise of Forbearance)

Upa-parva: Kṣamā–Krodha Saṃvāda (Dialogue on Forbearance and Anger)

Chapter 30 presents Yudhiṣṭhira’s extended discourse to Draupadī analyzing krodha/manyu as a destructive force that obscures discernment, dissolves moral boundaries in speech and action, and generates reciprocal violence across social relations (including within families). He argues that anger is the root of societal ruin (prajā-vināśa) and that non-retaliation toward the angry functions as a ‘cikitsā’ (therapeutic remedy) protecting both self and other. The chapter differentiates true tejas (radiance/strength) from rage: genuine prowess is said to be guided by prajñā and free from inner anger, whereas anger is portrayed as rajas-driven and socially corrosive. A didactic exemplum is introduced via Kāśyapa’s gāthās praising kṣamā as dharma, yajña, Veda, truth, purity, and the sustaining principle of the world—granting honor here and auspicious destiny beyond. The closing lines present kṣamā and anṛśaṃsya (non-cruelty) as the enduring conduct of the self-possessed, while acknowledging the political context and the need for calibrated future action.

Chapter Arc: वनवास के अँधेरे में द्रौपदी का अंतःकरण फट पड़ता है—वह विधाता-ईश्वर को नमस्कार करते हुए भी युधिष्ठिर की ‘धर्म-बुद्धि’ पर प्रश्नचिह्न रख देती है: क्या न्याय सचमुच जगत में चलता है, या केवल दुर्बलों को समझाने का नाम है? → द्रौपदी (और प्रसंगतः भीम) युधिष्ठिर से पूछते हैं कि इतने महाबली भाई होते हुए भी यह असह्य व्यसन क्यों आया; फिर बहस कर्म-फल, पुरुषार्थ, क्षमा, सरलता, और ‘धर्म से ही श्री मिलती है’—इन दावों की परीक्षा बन जाती है। → विवाद का शिखर ‘ईश्वर-नियति बनाम कर्म-कर्तृत्व’ पर आता है: एक ओर कहा जाता है कि जीव डोर में बँधे पक्षी-सा नियत है और लोक ईश्वर के वश में हैं; दूसरी ओर कर्म का नियम सामने रखा जाता है—किया हुआ कर्म कर्ता का ही पीछा करता है, ईश्वर पाप से लिप्त नहीं होता। → युधिष्ठिर का उत्तर बहस को एक दिशा देता है: कर्म की अनिवार्यता, लोभ-त्याग, और मोक्षाभिमुख जीवन का संकेत; साथ ही यह स्वीकार कि तत्त्वदर्शी मुनियों ने जगत को अनेक प्रकार से देखा है—अर्थात एक ही प्रश्न के कई दृष्टिकोण हैं। → युधिष्ठिर ‘पुरातन इतिहास’ का उदाहरण उठाते हैं—ईश्वराधीनता और आत्म-अस्वातंत्र्य का दृष्टांत आगे विस्तार माँगता है।

Shlokas

Verse 1

#:73:.8 #::3...7 (0) हि २ 7 त्रिशो&्थ्याय: दुःखसे मोहित द्रौपदीका युधिष्िरकी बुद्धि, धर्म एवं ईश्वरके न्यायपर आशक्षेप द्रौपहुवाच नमो थात्रे विधात्रे च यौ मोहं चक्रतुस्तव । पितृपैतामहे वृत्ते वोढव्ये तेडन्यथा मतिः:,द्रौपदीने कहा--राजन! उस धाता (ईश्वर) और विधाता ([प्रारब्ध)-को नमस्कार हैं, जिन्होंने आपकी बुद्धिमें मोह उत्पन्न कर दिया। पिता-पितामहोंके आचारका भार वहन करनेमें भी आपका विचार दिखायी देता है इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि द्रौपदीवाक्ये त्रिंशो5ध्याय: ।॥ ३० || इस प्रकार श्रीमह्याभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाथिगमनपर्वमें द्रौपदीवाक्यविषयक तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ३० ॥। >> () है >> एकत्रिशो< ध्याय: युधिष्ठिरद्वारा द्रौपदीके आक्षेपका समाधान तथा ईश्वर, धर्म और महापुरुषोंके आदरसे लाभ और अनादरसे हानि युधिछिर उवाच वल्गु चित्रपदं श्लक्ष्णं याज्ञसेनि त्वया वच: । उक्त तच्छुतमस्माभिरन्नास्तिक्यं तु प्रभाषसे

Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai Yājñasenī, kata-katamu menawan—penuh ungkapan bergambar, tersusun rapi, dan halus. Kami telah mendengarnya; namun dengan berkata demikian, engkau seakan menyuarakan nada ketidakpercayaan, seolah menolak tatanan dharma yang menopang dunia.”

Verse 2

कर्मभिश्िन्तितो लोको गत्यां गत्यां पृथग्विध: । तस्मात्‌ कर्माणि नित्यानि लोभान्मोक्षं यियासति,कर्मोके अनुसार उत्तम, मध्यम, अधम योनिमें भिन्न-भिन्न लोकोंकी प्राप्ति बतलायी गयी है, अतः कर्म नित्य हैं (भोगे बिना उन कर्मोंका क्षय नहीं होता)। मूर्ख लोग लोभसे ही मोक्ष पानेकी इच्छा रखते हैं। इस जगत्‌में धर्म, कोमलता, क्षमा, विनय और दयासे कोई भी मनुष्य कभी धन और एऐश्वर्यकी प्राप्ति नहीं कर सकता

Yudhiṣṭhira berkata: “Dunia ini tersusun oleh perbuatan; dan menurut perbuatan, ia mencapai tujuan demi tujuan yang berbeda-beda. Karena itu, karma bersifat menetap dan mengikat—tanpa mengalami buahnya, ia tidak lenyap. Namun orang bodoh, digerakkan oleh loba, tetap ingin meraih mokṣa.”

Verse 3

नेह धर्मानृशंस्याभ्यां न क्षान्त्या नार्जवेन च । पुरुष: श्रियमाप्रोति न घृणित्वेन कहिचित्‌,कर्मोके अनुसार उत्तम, मध्यम, अधम योनिमें भिन्न-भिन्न लोकोंकी प्राप्ति बतलायी गयी है, अतः कर्म नित्य हैं (भोगे बिना उन कर्मोंका क्षय नहीं होता)। मूर्ख लोग लोभसे ही मोक्ष पानेकी इच्छा रखते हैं। इस जगत्‌में धर्म, कोमलता, क्षमा, विनय और दयासे कोई भी मनुष्य कभी धन और एऐश्वर्यकी प्राप्ति नहीं कर सकता

Yudhiṣṭhira berkata: “Di dunia ini, seseorang tidak meraih kemakmuran hanya dengan dharma dan welas asih, tidak pula hanya dengan kesabaran atau kelurusan; dan tak seorang pun pernah memperoleh kekayaan serta kemegahan kuasa semata-mata karena berhati lembut.”

Verse 4

द्रौपदी और भीमसेनका युधिष्ठिरसे संवाद त्वां च व्यसनमभ्यागादिदं भारत दुःसहम्‌ । यत्‌ त्वं नाहसि नापीमे भ्रातरस्ते महौजस:,भारत! इसी कारण तो आपपर भी यह दुःसह संकट आ गया, जिसके योग्य न तो आप हैं और न आपके महातेजस्वी ये भाई ही हैं

Wahai Bhārata, malapetaka yang tak tertanggungkan ini pun menimpa dirimu; padahal engkau tidak layak menerimanya, demikian pula saudara-saudaramu yang perkasa itu.

Verse 5

न हि तेडध्यगमज्जातु तदानीं नाद्य भारत | धर्मात्‌ प्रियतरं किंचिदपि चेज्जीवितादिह,भरतकुलतिलक! आपके भाइयोंने न तो पहले कभी और न आज ही धर्मसे अधिक प्रिय दूसरी किसी वस्तुको समझा है। अपितु धर्मको जीवनसे भी बढ़कर माना है

Wahai permata wangsa Bharata, saudara-saudaramu tidak pernah—baik dahulu maupun hari ini—menganggap sesuatu lebih mereka cintai daripada dharma; di dunia ini mereka menempatkan dharma bahkan lebih tinggi daripada hidup.

Verse 6

धर्मार्थमेव ते राज्यं धर्मार्थ जीवितं च ते । ब्राह्मणा गुरवश्वचैव जानन्त्यापि च देवता:,आपका राज्य धर्मके लिये ही है, आपका जीवन भी धर्मके लिये ही है। ब्राह्मण, गुरुजन और देवता सभी इस बातको जानते हैं

Kerajaanmu ada semata demi dharma, dan hidupmu pun demi dharma. Para brāhmaṇa, para guru yang mulia, bahkan para dewa pun mengetahui hal itu.

Verse 7

भीमसेनार्जुनौ चो भौ माद्रेयौ च मया सह । त्यजेस्त्वमिति मे बुद्धिर्न तु धर्म परित्यजे:,मुझे विश्वास है कि आप मेरेसहित भीमसेन, अर्जुन और नकुल-सहदेवको भी त्याग देंगे; किंतु धर्मका त्याग नहीं करेंगे

Aku yakin engkau sanggup meninggalkan Bhīmasena dan Arjuna, juga kedua putra Mādrī—bahkan aku bersama mereka; namun engkau takkan pernah meninggalkan dharma.

Verse 8

राजानं धर्मगोप्तारं धर्मो रक्षति रक्षित: । इति मे श्रुतमार्याणां त्वां तु मन्‍्ये न रक्षति,मैंने आर्योके मुँहसे सुना है कि यदि धर्मकी रक्षा की जाय तो वह धर्मरक्षक राजाकी स्वयं भी रक्षा करता है। किंतु मुझे मालूम होता है कि वह आपकी रक्षा नहीं कर रहा है

Aku telah mendengar dari para ārya: dharma yang dijaga akan menjaga raja, pelindung dharma itu. Namun dalam halmu, tampaknya dharma tidak melindungimu.

Verse 9

अनन्या हि नरव्याप्र नित्यदा धर्ममेव ते । बुद्धिः सततमन्वेति च्छायेव पुरुषं निजा,नरश्रेष्ठ) जैसे अपनी छाया सदा मनुष्यके पीछे चलती है, उसी प्रकार आपकी बुद्धि सदा अनन्यभावसे धर्मका ही अनुसरण करती है

Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai harimau di antara manusia, batinmu tak pernah terpecah; setiap saat ia hanya mengikuti dharma. Kebijaksanaanmu senantiasa menyertaimu—seperti bayangan diri yang tak pernah meninggalkan seseorang.”

Verse 10

नावमंस्था हि सदृशान्‌ नावराउ्छेयस: कुतः । अवाप्य पृथिवीं कृत्स्नां न ते शुज्धमवर्धत,आपने अपने समान और अपनेसे छोटोंका भी कभी अपमान नहीं किया। फिर अपनेसे बड़ोंका तो करते ही कैसे? सारी पृथ्वीका राज्य पाकर भी आपका प्रभुताविषयक अहंकार कभी नहीं बढ़ा

Yudhiṣṭhira berkata: “Engkau tak pernah merendahkan mereka yang setara denganmu, apalagi yang berada di bawahmu—bagaimana mungkin engkau menistakan para sesepuh? Bahkan setelah meraih kedaulatan atas seluruh bumi, kejernihan batin dan kerendahan hatimu tak berkurang; kesombongan karena kuasa tak pernah tumbuh dalam dirimu.”

Verse 11

स्वाहाकारै: स्वधाभिश्न पूजाभिरपि च द्विजान्‌ । दैवतानि पितृश्चैव सततं पार्थ सेवसे,कुन्तीनन्दन! आप स्वाहा, स्वथा और पूजाके द्वारा देवताओं, पितरों और ब्राह्मणोंकी सदा सेवा करते रहते हैं

Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai Pārtha, putra Kuntī, engkau senantiasa melayani para dewa dengan persembahan yang disertai mantra svāhā, para leluhur dengan persembahan svadhā, dan para brāhmaṇa dengan pemujaan yang penuh hormat.”

Verse 12

ब्राह्मणा: सर्वकामैस्ते सततं पार्थ तर्पिता: । यतयो मोक्षिणश्रैव गृहस्थाश्वैव भारत,पार्थ! आपने ब्राह्मणोंकी समस्त कामनाएँ पूरी करके सदा उन्हें तृप्त किया है। भारत! आपके यहाँ मोक्षाभिलाषी संन्यासी तथा गृहस्थ ब्राह्मण सोनेके पात्रोंमें भोजन करते थे। जहाँ स्वयं मैं अपने हाथों उनकी सेवा-टहल करती थी। वानप्रस्थोंको भी आप सोनेके पात्र दिया करते थे। आपके घरमें कोई ऐसी वस्तु नहीं थी, जो ब्राह्मणोंके लिये अदेय हो

Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai Pārtha, engkau senantiasa memuaskan para brāhmaṇa dengan memenuhi segala keinginan mereka yang patut. Wahai Bhārata, di rumahmu para pertapa pencari mokṣa dan para brāhmaṇa berumah tangga sama-sama dihormati dan ditopang sebagaimana mestinya.”

Verse 13

भुज्जते रुक्मपात्रीभियरयत्राहं परिचारिका | आरण्यकेभ्यो लौहानि भाजनानि प्रयच्छसि । नादेयं ब्राह्मणेभ्यस्ते गृहे किंचन विद्यते,पार्थ! आपने ब्राह्मणोंकी समस्त कामनाएँ पूरी करके सदा उन्हें तृप्त किया है। भारत! आपके यहाँ मोक्षाभिलाषी संन्यासी तथा गृहस्थ ब्राह्मण सोनेके पात्रोंमें भोजन करते थे। जहाँ स्वयं मैं अपने हाथों उनकी सेवा-टहल करती थी। वानप्रस्थोंको भी आप सोनेके पात्र दिया करते थे। आपके घरमें कोई ऐसी वस्तु नहीं थी, जो ब्राह्मणोंके लिये अदेय हो

Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai Pārtha, di rumahmu para brāhmaṇa makan dari bejana emas, dan aku sendiri melayani mereka dengan tanganku. Kepada para pertapa penghuni rimba pun engkau memberikan bejana besi. Di rumahmu tak ada sesuatu pun yang boleh ditolak bagi para brāhmaṇa.”

Verse 14

यदिदं वैश्वदेवं ते शान्तये क्रियते गृहे । तद्‌ दत्त्वातिथिभूते भ्यो राजज्छिषप्टेन जीवसि,राजन! आपके द्वारा शान्तिके लिये जो घरमें यह वैश्वदेव कर्म किया जाता है, उसमें अतिथियों और प्राणियोंके लिये अन्न देकर आप अवशिष्ट अन्नके द्वारा जीवन-निर्वाह करते हैं

Wahai Raja! Dalam upacara Vaiśvadeva yang engkau lakukan di rumah demi ketenteraman, engkau terlebih dahulu memberi makanan kepada para tamu dan makhluk hidup; lalu engkau menafkahi hidupmu dengan sisa persembahan itu.

Verse 15

इष्टय: पशुबन्धाश्न काम्यनैमित्तिकाश्न ये । वर्तन्ते पाकयज्ञाश्ष यज्ञकर्म च नित्यदा,इष्टि (पूजा), पशुबन्ध (पशुओंको बाँधना), काम्य याग, नैमित्तिक याग, पाकयज्ञ तथा नित्ययज्ञ--ये सब भी आपके यहाँ बराबर चलते रहते हैं

Iṣṭi (persembahan), paśubandha (ritus pengikatan hewan kurban), yajña yang didorong hasrat (kāmya) dan yang dilakukan karena sebab tertentu (naimittika), pākayajña rumah tangga, serta kewajiban yajña harian—semuanya di kediamanmu berlangsung tanpa putus.

Verse 16

अस्मिन्नपि महारण्ये विजने दस्युसेविते । राष्ट्रादपेत्य वसतो धर्मस्ते नावसीदति,आप राज्यसे निकलकर लुटेरोंद्वारा सेवित इस निर्जन महावनमें निवास कर रहे हैं, तो भी आपका धर्मकार्य कभी शिथिल नहीं हुआ है

Sekalipun engkau hidup di rimba raya ini—sunyi dan didatangi para perampok—setelah terusir dari kerajaanmu, laku dharmamu tidak pernah mengendur.

Verse 17

अश्वमेधो राजसूय: पुण्डरीको5थ गोसव: । एतैरपि महायज्ैरिष्ट ते भूरिदक्षिणै:,अश्वमेध, राजसूय, पुण्डरीक तथा गोसव--इन सभी महायज्ञोंका आपने प्रचुर दक्षिणादानपूर्वक अनुष्ठान किया है

Engkau telah melaksanakan bahkan yajña agung ini—Aśvamedha, Rājasūya, Puṇḍarīka, dan Gosava—masing-masing disertai dāna-dakṣiṇā yang melimpah kepada para ṛtvij.

Verse 18

राजन्‌ परीतया बुद्धा विषमे5क्षपराजये । राज्यं वसून्यायुधानि भ्रातृन्‌ मां चासि निर्जित:,परंतु महाराज! उस कपट हद्यूतजनित पराजयके समय आपकी बुद्धि विपरीत हो गयी, जिसके कारण आप राज्य, धन, आयुध तथा भाइयोंको और मुझे भी दावँपर रखकर हार गये

Namun, wahai Raja! Pada kekalahan yang genting dalam permainan dadu yang penuh tipu daya itu, pertimbanganmu menjadi tersesat; maka engkau pun kalah—mempertaruhkan dan kehilangan kerajaan, harta, senjata, saudara-saudaramu, bahkan aku juga.

Verse 19

ऋजोर्मुदोर्वदान्यस्य ह्वीमत: सत्यवादिन: । कथमक्षव्यसनजा बुद्धिरापतिता तव,आप सरल, कोमल, उदार, लज्जाशील और सत्यवादी हैं। न जाने कैसे आपकी बुद्धिमें जूआ खेलनेका व्यसन आ गया

Yudhiṣṭhira berkata: “Engkau lurus hati, lembut, dermawan, tahu malu, dan penutur kebenaran. Bagaimana mungkin kebijaksanaan yang lahir dari cela permainan dadu dapat menguasaimu?”

Verse 20

अतीव मोहमायाति मनश्नव परिभूयते । निशाम्य ते दुःखमिदमिमां चापदमीदृशीम्‌,आपके इस दुःख और भयंकर विपत्तिको विचारकर मुझे अत्यन्त मोह प्राप्त हो रहा है और मेरा मन दुःखसे पीड़ित हो रहा है

Yudhiṣṭhira berkata: “Kebingungan yang amat dalam menimpaku, dan batinku pun terhimpit. Melihat penderitaanmu dan malapetaka mengerikan yang menimpamu, aku dilanda duka.”

Verse 21

इस विषयमें लोग इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण देते हैं, जिसमें यह कहा गया है कि सब लोग ईश्वरके वशमें हैं, कोई भी स्वाधीन नहीं है

Yudhiṣṭhira berkata: “Dalam perkara ini, orang-orang mengutip sebuah kisah purba sebagai teladan. Di sana dinyatakan bahwa semua makhluk bergerak di bawah kuasa Tuhan; tiada seorang pun sungguh merdeka.”

Verse 22

धातैव खलु भूतानां सुखदु:खे प्रियाप्रिये । दधाति सर्वमीशान: पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरन्‌,विधाता ईश्वर ही सबके पूर्वकर्मोके अनुसार प्राणियोंके लिये सुख-दुःख, प्रिय- अप्रियकी व्यवस्था करते हैं

Yudhiṣṭhira berkata: “Sesungguhnya Sang Penetap, Tuhan, menetapkan bagi makhluk hidup suka dan duka, yang dicinta dan yang dibenci—semuanya—menurut karma yang telah digerakkan sebelumnya.”

Verse 23

यथा दारुमयी योषा नरवीर समाहिता । ईरयत्यड्रमजड्भानि तथा राजन्नरिमा: प्रजा:,नरवीर नरेश! जैसे कठपुतली सूत्रधारसे प्रेरित हो अपने अंगोंका संचालन करती है, उसी प्रकार यह सारी प्रजा ईश्वरकी प्रेरणासे अपने हस्त-पाद आदि अंगोंद्वारा विविध चेष्टाएँ करती हैं

Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai raja, pahlawan di antara manusia! Seperti boneka kayu yang digerakkan oleh dalang lalu menggerakkan anggota-anggotanya yang tak berakal, demikian pula rakyat ini bertindak melalui tangan, kaki, dan anggota lainnya hanya karena dorongan Tuhan.”

Verse 24

आकाश इव भूतानि व्याप्य सर्वाणि भारत । ईश्वरो विदधातीह कल्याणं यच्च पापकम्‌,भारत! ईश्वर आकाशके समान सम्पूर्ण प्राणियोंमें व्याप्त होकर उनके कर्मानुसार सुख- दुःखका विधान करते हैं

Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai Bhārata, sebagaimana angkasa meresapi semua makhluk, demikian pula Sang Īśvara meresapi setiap insan di sini dan, menurut karmanya, menetapkan kebaikan serta akibat pedih dari dosa—kebahagiaan dan penderitaan.”

Verse 25

शकुनिस्तन्तुबद्धो वा नियतो5यमनीश्वर: । ईश्वरस्य वशे तिषछेन्नान्येषां नात्मन: प्रभु:,जीव स्वतन्त्र नहीं है, वह डोरेमें बँधे हुए पक्षीकी भाँति कर्मके बन्धनमें बँधा होनेसे परतन्त्र है। वह ईश्वरके ही वशमें होता है। उसका न दूसरोंपर वश चलता है, न अपने ऊपर

Yudhiṣṭhira berkata: “Seperti burung yang terikat tali, makhluk ini terbelenggu oleh ikatan karma—terkendali dan tanpa kuasa merdeka. Ia berdiri hanya di bawah kehendak Īśvara; ia tak berkuasa atas orang lain, bahkan atas dirinya sendiri.”

Verse 26

मणि: सूत्र इव प्रोतो नस्योत इव गोवृष: । स्रोतसो मध्यमापन्न: कूलाद्‌ वृक्ष इव च्युत:

Yudhiṣṭhira berkata: “Aku bagaikan permata yang teruntai pada seutas benang; bagaikan banteng perkasa yang hidungnya terikat tali; bagaikan insan yang terseret ke tengah arus; bagaikan pohon yang tercabut dari tepi sungai dan dihanyutkan.”

Verse 27

धातुरादेशमन्वेति तन्मयो हि तदर्पण: । नात्माधीनो मनुष्यो5यं कालं भजति कंचन

Yudhiṣṭhira berkata: “Manusia mengikuti titah Sang Pencipta (Dhātā); sebab ia dibentuk oleh ketetapan itu sendiri dan seakan dipersembahkan ke dalamnya. Manusia ini bukan tuan atas dirinya; ia harus tunduk kepada Kāla (Waktu), apa pun yang dibawanya.”

Verse 28

सूतमें पिरोयी हुई मणि, नाकमें नथे हुए बैल और किनारेसे टूटकर धाराके बीचमें गिरे हुए वृक्षकी भाँति यह जीव सदा ईश्वरके आदेशका ही अनुसरण करता है; क्योंकि वह उसीसे व्याप्त और उसीके अधीन है। यह मनुष्य स्वाधीन होकर समयको नहीं बिताता ।। अज्ञो जन्तुरनीशोडयमात्मन: सुखदुःखयो: । ईश्वरप्रेरितो गच्छेत्‌ स्वर्ग नरकमेव च,यह जीव अज्ञानी तथा अपने सुख-दुःखके विधानमें भी असमर्थ है। यह ईश्वरसे प्रेरित होकर ही स्वर्ग एवं नरकमें जाता है

Yudhiṣṭhira berkata: “Makhluk hidup ini bodoh dan tak berdaya bahkan atas penetapan suka dan dukanya sendiri. Didorong oleh kehendak Īśvara, ia pergi—sungguh—ke surga atau ke neraka.”

Verse 29

इस प्रकार श्रीमह्या भारत वनपर्वके अन्तर्गत अजुनाभिगमनपर्वमें द्रौपदी- युधिष्ठिरसंवादविषयक उनतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ,यथा वायोस्तृणाग्राणि वशं यान्ति बलीयस: । धातुरेवं वशं यान्ति सर्वभूतानि भारत भारत! जैसे क्षुद्र तिनके बलवान्‌ वायुके वशमें हो उड़ते-फिरते हैं, उसी प्रकार समस्त प्राणी ईश्वरके अधीन हो आवागमन करते हैं

Wahai Bhārata! Seperti ujung-ujung rumput yang kecil tak berdaya terbawa oleh angin yang perkasa, demikian pula semua makhluk bergerak dan kembali di bawah kuasa Tuhan Yang Mahatinggi. Menyadari hal ini, hendaknya manusia meredakan kesombongan dan kebiasaan menyalahkan, serta menumbuhkan keteguhan, kerendahan hati, dan kepercayaan pada dharma di tengah putaran nasib.

Verse 30

आर्ये कर्मणि युञ्जान: पापे वा पुनरीश्वरः । व्याप्य भूतानि चरते न चायमिति लक्ष्यते,कोई श्रेष्ठ कर्ममें लगा हुआ हो चाहे पापकर्ममें, ईश्वर सभी प्राणियोंमें व्याप्त होकर विचरते हैं; किंतु वे यही हैं इस प्रकार उनका लक्ष्य नहीं होता

Entah seseorang menekuni perbuatan mulia atau kembali terjerumus dalam perbuatan dosa, Tuhan meresapi semua makhluk dan bergerak di dalamnya; namun Ia tidak dikenali sebagai ‘inilah Dia’—Ia tetap tak tampak dan tak bertanda.

Verse 31

हेतुमात्रमिदं धातु: शरीर क्षेत्रसंज्ञितम्‌ | येन कारयते कर्म शुभाशुभफलं विभु:,यह क्षेत्रसंज्षक शरीर ईश्वरका साधनमात्र है, जिसके द्वारा वे सर्वव्यापी परमेश्वर प्राणियोंसे स्वेच्छा-प्रारब्धरूप शुभाशुभ फल भुगतानेवाले कर्मोंका अनुष्ठान करवाते हैं

Tubuh yang disebut ‘kṣetra’ ini hanyalah sarana bagi Sang Penguasa; melaluinya, Tuhan Yang Mahameliputi membuat makhluk menjalankan perbuatan yang berbuah baik maupun buruk untuk mereka alami.

Verse 32

पश्य मायाप्रभावो5यमी श्वरेण यथा कृत: । यो हन्ति भूतैर्भूतानि मोहयित्वा55त्ममायया,ईश्वरने जिस प्रकार इस मायाके प्रभावका विस्तार किया है, उसे देखिये। वे अपनी मायाद्वारा मोहित करके प्राणियोंसे ही प्राणियोंका वध करवाते हैं

Lihatlah bagaimana Tuhan membentangkan daya māyā ini. Dengan māyā-Nya sendiri Ia memperdaya makhluk, lalu membuat makhluk saling membinasakan—hidup menjadi alat bagi lenyapnya hidup.

Verse 33

अन्यथा परिदृष्टानि मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभि: । अन्यथा परिवर्तन्ते वेगा इव नभस्वत:,तत्त्वदर्शी मुनियोंने वस्तुओंके स्वरूप कुछ और प्रकारसे देखे हैं; किंतु अज्ञानियोंके सामने किसी और ही रूपमें भासित होते हैं। जैसे आकाशचारी सूर्यकी किरणें मरुभूमिमें पड़कर जलके रूपमें प्रतीत होने लगती हैं

Para resi yang melihat kebenaran memandang hakikat sebagaimana adanya; namun di hadapan orang yang dungu, ia tampak dalam rupa lain. Seperti sinar matahari yang melintas di angkasa, ketika jatuh di padang pasir, tampak seolah-olah menjadi air.

Verse 34

अन्यथैव हि मन्यन्ते पुरुषास्तानि तानि च । अन्यथैव प्रभुस्तानि करोति विकरोति च,लोग भिन्न-भिन्न वस्तुओंको भिन्न-भिन्न रूपोंमें मानते हैं; परंतु शक्तिशाली परमेश्वर उन्हें और ही रूपमें बनाते और बिगाड़ते हैं

Manusia menafsirkan hal-hal itu menurut cara masing-masing; namun Tuhan Yang Mahakuasa membentuknya dengan cara yang lain—dan dengan cara yang lain pula mengubah serta melenyapkannya.

Verse 35

यथा काष्ठेन वा काष्ठमश्मानं चाश्मना पुन: । अयसा चाप्ययश्शषिन्द्यान्निर्विचेष्टमचेतनम्‌,महाराज युधिष्ठिर! जैसे अचेतन एवं चेष्टारहित काठ, पत्थर और लोहेको मनुष्य काठ, पत्थर और लोहेसे ही काट देता है, उसी प्रकार सबके प्रपितामह स्वयम्भू भगवान्‌ श्रीहरि मायाकी आड़ लेकर प्राणियोंसे ही प्राणियोंका विनाश करते हैं

Wahai Maharaja Yudhiṣṭhira! Sebagaimana benda-benda tak bernyawa dan tak bergerak—kayu, batu, dan besi—dipotong atau dihancurkan hanya oleh kayu, batu, dan besi itu sendiri, demikian pula Bhagavān Hari, Sang Svayambhū, leluhur agung segala makhluk, bernaung di balik māyā dan mendatangkan kebinasaan makhluk melalui makhluk yang lain.

Verse 36

एवं स भगवान्‌ देव: स्वयम्भू: प्रपितामह: । हिनस्ति भूतैर्भूतानि च्छद्म कृत्वा युधिछ्ठिर,महाराज युधिष्ठिर! जैसे अचेतन एवं चेष्टारहित काठ, पत्थर और लोहेको मनुष्य काठ, पत्थर और लोहेसे ही काट देता है, उसी प्रकार सबके प्रपितामह स्वयम्भू भगवान्‌ श्रीहरि मायाकी आड़ लेकर प्राणियोंसे ही प्राणियोंका विनाश करते हैं

Wahai Yudhiṣṭhira! Demikianlah Sang Bhagavān, Dewa, Svayambhū, leluhur agung semua makhluk, dengan menyamar (bertabir), membinasakan makhluk melalui makhluk yang lain.

Verse 37

सम्प्रयोज्य वियोज्यायं कामकारकर: प्रभु: । क्रीडते भगवान्‌ भूतैर्बाल: क्रीडनकैरिव,जैसे बालक खिलौनोंसे खेलता है, उसी प्रकार स्वेच्छानुसार कर्म (भाँति-भाँतिकी लीलाएँ) करने-वाले शक्तिशाली भगवान्‌ सब प्राणियोंके साथ उनका परस्पर संयोग-वियोग कराते हुए लीला करते रहते हैं

Sang Penguasa ini bertindak semata menurut kehendak-Nya: Ia mempertemukan makhluk-makhluk lalu memisahkan mereka kembali. Seperti anak kecil bermain dengan mainan, demikianlah Bhagavān bersukalila dengan para makhluk.

Verse 38

न मातृपितृवद्‌ राजन्‌ धाता भूतेषु वर्तते । रोषादिव प्रवृत्तोडयं यथायमितरो जन:,राजन! मैं समझती हूँ, ईश्वर समस्त प्राणियोंके प्रति माता-पिताके समान दया एवं स्नेहयुक्त बर्ताव नहीं कर रहे हैं, वे तो दूसरे लोगोंकी भाँति मानो रोषसे ही व्यवहार कर रहे हैं

Wahai Raja! Dhātṛ (Sang Penentu) tampaknya tidak bertindak terhadap makhluk-makhluk dengan kasih sayang seperti ibu dan ayah; Ia seolah bergerak bertindak, sebagaimana orang biasa, seakan didorong oleh amarah.

Verse 39

आयज्छीलववतो दृष्टवा ह्वीमतो वृत्तिकर्शितान्‌ | अनार्यान्‌ सुखिनश्चैव विद्धलामीव चिन्तया,क्योंकि जो लोग श्रेष्ठ, शीलवान्‌ और संकोची हैं, वे तो जीविकाके लिये कष्ट पा रहे हैं; किंतु जो अनार्य (दुष्ट) हैं, वे सुख भोगते हैं; यह सब देखकर मेरी उक्त धारणा पुष्ट होती है और मैं चिन्तासे विह्नल-सी हो रही हूँ

Ketika aku melihat orang-orang mulia—yang berperilaku baik dan bersahaja—terkikis oleh perjuangan mencari nafkah, sementara yang hina hidup dalam kenyamanan, keyakinanku yang dahulu kian menguat; dan aku pun seakan terbingung-bingung, diliputi kegelisahan dalam renungan.

Verse 40

तवेमामापदं दृष्टवा समृद्धिं च सुयोधने । धातारं गये पार्थ विषमं योडनुपश्यति,कुन्तीनन्दन! आपकी इस आप त्तिको तथा दुर्योधनकी समृद्धिको देखकर मैं उस विधाताकी निन्दा करती हूँ, जो विषम दृष्टिसे देख रहा है अर्थात्‌ सज्जनको दुःख और दुर्जजको सुख देकर उचित विचार नहीं कर रहा है

Wahai Pārtha, melihat engkau jatuh dalam malapetaka ini dan melihat Suyodhana berjaya, aku mencela Sang Penentu—seakan Ia memandang dengan keberpihakan; memberi derita kepada yang benar dan kesejahteraan kepada yang jahat, seolah tanpa pertimbangan yang adil.

Verse 41

आर्यशास्त्रातिगे क्रूरे लुब्धे धर्मापचायिनि । धार्तरष्टे श्रियं दत्ता धाता कि फलमश्लुते,जो आर्यशास्त्रोंकी आज्ञाका उल्लंघन करनेवाला, क्रूर, लोभी तथा धर्मकी हानि करनेवाला है, उस धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनको धन देकर विधाता क्या फल पाता है?

Bila Sang Pencipta menganugerahkan kemakmuran kepada putra Dhṛtarāṣṭra yang melampaui tata-aturan mulia, yang kejam, tamak, dan perusak dharma—buah apakah yang Ia peroleh dengan memberi keberuntungan demikian?

Verse 42

कर्म चेत्‌ कृतमन्वेति कर्तारें नान्यमृच्छति । कर्मणा तेन पापेन लिप्यते नूनमी श्वर:,यदि किया हुआ कर्म कर्ताका ही पीछा करता है, दूसरेके पास नहीं जाता, तब तो ईश्वर भी उस पापकर्मसे अवश्य लिप्त होंगे

Jika suatu perbuatan, setelah dilakukan, niscaya mengikuti hanya pelakunya dan tidak berpindah kepada siapa pun, maka sungguh Tuhan pun akan ternoda oleh perbuatan dosa itu—bila Dialah yang menetapkan atau menggerakkannya.

Verse 43

अथ कर्म कृतं पापं न चेत्‌ कर्तारमृच्छति । कारणं बलमेवेह जनाञ्छोचामि दुर्बलान्‌,इसके विपरीत, यदि किया हुआ पाप-कर्म कर्ताको नहीं प्राप्त होता तो इसका कारण यहाँ बल ही है (ईश्वर शक्तिशाली हैं, इसीलिये उन्हें पापकर्मका फल नहीं मिलता होगा)। उस दशामें मुझे दुर्बल मनुष्योंके लिये शोक हो रहा है

Namun jika sebaliknya, perbuatan dosa yang telah dilakukan tidak kembali kepada pelakunya, maka sebabnya di dunia ini hanyalah kekuasaan belaka. Dalam keadaan demikian aku berduka bagi yang lemah—sebab merekalah yang akan memikul akibat, sementara yang kuat akan lolos.

Verse 231

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्‌ । ईश्वरस्य वशे लोकास्तिष्ठन्ते नात्मनो यथा

Di sini pun mereka mengutip teladan kuno ini: makhluk-makhluk di dunia berdiri di bawah kuasa Tuhan, bukan menurut kehendak mereka sendiri yang merdeka.

Frequently Asked Questions

The dilemma is whether grievance and loss justify retaliatory anger; Yudhiṣṭhira argues that anger compromises judgment and dharma, and that restraint preserves both ethical integrity and long-term capacity for rightful action.

To regulate anger through wisdom and disciplined non-retaliation: anger is depicted as boundary-erasing and self-harming, while kṣamā is framed as the sustaining virtue that protects social order and personal excellence.

Yes. The gāthās attributed to Kāśyapa present kṣamā as yielding honor in this world and an auspicious post-mortem trajectory, implying that understanding and practicing forbearance has both social and transcendent benefit.