
चित्रसेन-समागमः / The Engagement with Citrasena and the Gandharvas
Upa-parva: Gandharva-Yuddha (Encounter with the Gandharvas; Citrasena episode)
Vaiśaṃpāyana describes a large Gandharva contingent encircling the Pāṇḍavas with flaming arrows. Despite being outnumbered, the four Pāṇḍava warriors respond with sustained missile counterfire: Bhīma and the twin sons of Mādrī strike down opponents in large numbers while Arjuna initiates higher-grade divine weaponry. The Gandharvas attempt aerial withdrawal while carrying away Dhṛtarāṣṭra’s sons; Arjuna blocks their ascent with a dense net of arrows, likened to birds trapped in a cage. The Gandharvas retaliate with mace-, spear-, and sword-showers; Arjuna neutralizes these and intensifies pressure, producing a scene compared to a rain of stones and severed limbs, generating fear among adversaries. Arjuna cycles multiple astras (including Āgneya and Saura) to constrain movement and compel collapse of resistance. Gandharva-king Citrasena charges with an iron mace; Arjuna severs it into seven parts with arrows. Citrasena employs concealment through māyā; Arjuna counters with sound-targeting and anti-concealment measures. When Citrasena reveals himself as a dear associate, Arjuna withdraws the deployed weapon. The Pāṇḍavas collect their equipment and exchange formal inquiries, remaining stationed on their chariots, signaling controlled termination of conflict.
Chapter Arc: जनमेजय के समक्ष वैशम्पायन उस अंतरंग प्रसंग को उठाते हैं जहाँ द्रौपदी और कृष्ण-पत्नी सत्यभामा हँसते-हँसते, स्नेहपूर्वक साथ बैठती हैं और स्त्री-धर्म तथा गृह-धर्म की सूक्ष्म बातें छिड़ जाती हैं। → कुरु और यादव कुलों की विचित्र कथाएँ चलते-चलते सत्यभामा द्रौपदी से पूछती है कि वह कैसे अपने पतियों के प्रिय-हित में निरन्तर रत रहती है—और द्रौपदी परोक्ष रूप से यह दिखाती है कि प्रेम केवल भाव नहीं, सतत अनुशासन और प्रबन्ध भी है। → द्रौपदी अपने ‘नित्यकालमतन्द्रिता’ गृह-धर्म का कठोर, व्यावहारिक रूप खोलती है—सास-ससुर, कुटुम्ब-धर्म, सेवा-शुचिता, तथा घर-राज्य के आय-व्यय, भोग-वस्त्र, सेवक-सेविकाओं और व्यवस्था तक का सूक्ष्म ज्ञान; और यह भी कि पति जिन वस्तुओं का त्याग करते हैं, वह भी वही त्याग देती है। → संवाद का निष्कर्ष यह बनता है कि ‘सती स्त्री’ का कर्तव्य केवल व्रत-उपवास नहीं, बल्कि परिवार-राज्य की मर्यादा, संयम, परिश्रम, और पति-हित में बुद्धिमत्ता से चलाया गया जीवन है—जिससे गृहस्थाश्रम की कीर्ति और स्थिरता टिकती है। → सत्यभामा के मन में द्रौपदी के इस आदर्श-व्यवहार को अपनाने की जिज्ञासा और भी तीव्र होती है—आगे वह इस शिक्षा को अपने जीवन में कैसे उतारेगी, यह संकेत रूप में छोड़ दिया जाता है।
Verse 1
अऑरड..2 #23. () हि २ (ट्रोपदीसत्यभामासंवादपर्व) त्रयस्त्रिंशयदधिकद्धिशततमो ध्याय: द्रौपदीका सत्यभामाको सती स्त्रीके कर्तव्यकी शिक्षा देना वैशम्पायन उवाच उपासीनेषु विप्रेषु पाण्डवेषु महात्मसु । द्रौपदी सत्यभामा च विविशाते तदा समम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! जब महात्मा पाण्डव तथा ब्राह्मगणलोग आस- पास बैठकर धर्मचर्चा कर रहे थे, उसी समय द्रौपदी और सत्यभामा भी एक ओर जाकर एक ही साथ सुखपूर्वक बैठीं और अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक परस्पर हास्य-विनोद करने लगीं। राजेन्द्र! दोनोंने एक-दूसरीको बहुत दिनों बाद देखा था, इसलिये परस्पर प्रिय लगनेवाली बातें करती हुई वहाँ सुखपूर्वक बैठी रहीं
Vaiśampāyana berkata: Ketika para brāhmaṇa dan para Pāṇḍava yang berhati luhur duduk berdekatan, membicarakan dharma, Draupadī dan Satyabhāmā menyingkir ke satu sisi lalu duduk bersama. Gembira karena lama tak berjumpa, mereka saling bertukar kata-kata penuh kasih dan ringan—menjadi pembuka bagi nasihat tentang kewajiban seorang istri yang berbudi.
Verse 2
जाहस्यमाने सुप्रीते सुखं तत्र निषीदतु: । चिरस्य दृष्ट्वा राजेन्द्र तेडन्योन्यस्य प्रियंवदे,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! जब महात्मा पाण्डव तथा ब्राह्मगणलोग आस- पास बैठकर धर्मचर्चा कर रहे थे, उसी समय द्रौपदी और सत्यभामा भी एक ओर जाकर एक ही साथ सुखपूर्वक बैठीं और अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक परस्पर हास्य-विनोद करने लगीं। राजेन्द्र! दोनोंने एक-दूसरीको बहुत दिनों बाद देखा था, इसलिये परस्पर प्रिय लगनेवाली बातें करती हुई वहाँ सुखपूर्वक बैठी रहीं
Waiśampāyana berkata: “Wahai raja, kedua wanita itu, gembira dan berseri, duduk di sana dengan tenteram sambil saling bertukar tawa dan senda. Setelah lama berpisah dan kini berjumpa kembali, mereka berbicara satu sama lain dengan kata-kata yang penuh kasih dan menyenangkan.”
Verse 3
कथयामासत्ुतश्रित्रा: कथा: कुरुयदूत्थिता: । अथाब्रवीत् सत्यभामा कृष्णस्य महिषी प्रिया,कुरुकुल और यदुकुलसे सम्बन्ध रखनेवाली अनेक विचित्र बातें उनकी चर्चाकी विषय थीं। भगवान् श्रीकृष्णकी प्यारी पटरानी सत्राजितकुमारी सुन्दरी सत्यभामाने एकान्तमें द्रौपदीसे इस प्रकार पूछा--'शुभे! ट्रुपदकुमारि! किस बर्तावसे तुम हृष्ट-पुष्ट अंगोंवाले तथा लोकपालोंके समान वीर पाण्डवोंके हृदयपर अधिकार रखती हो? किस प्रकार तुम्हारे वशमें रहते हुए वे कभी तुमपर कुपित नहीं होते?
Waiśampāyana berkata: Di sana, banyak kisah menakjubkan yang berkaitan dengan kaum Kuru dan Yadu menjadi bahan percakapan. Lalu Satyabhāmā—permaisuri utama yang paling dikasihi Kṛṣṇa—secara pribadi mengajukan pertanyaan tajam kepada Draupadī tentang dharma seorang istri, pengendalian diri, dan seni menjaga kerukunan rumah tangga.
Verse 4
सात्राजिती याज्ञसेनीं रहसीदं सुमध्यमा । केन द्रौपदि वृत्तेन पाण्डवानधितिष्ठसि,कुरुकुल और यदुकुलसे सम्बन्ध रखनेवाली अनेक विचित्र बातें उनकी चर्चाकी विषय थीं। भगवान् श्रीकृष्णकी प्यारी पटरानी सत्राजितकुमारी सुन्दरी सत्यभामाने एकान्तमें द्रौपदीसे इस प्रकार पूछा--'शुभे! ट्रुपदकुमारि! किस बर्तावसे तुम हृष्ट-पुष्ट अंगोंवाले तथा लोकपालोंके समान वीर पाण्डवोंके हृदयपर अधिकार रखती हो? किस प्रकार तुम्हारे वशमें रहते हुए वे कभी तुमपर कुपित नहीं होते?
Waiśampāyana berkata: Satyabhāmā, putri Satrājit yang berpinggang ramping, berkata diam-diam kepada Yājñasenī (Draupadī), “Wahai Draupadī, dengan laku apakah engkau memegang kendali atas para Pāṇḍava?”
Verse 5
लोकपालोपमान् वीरान् पुन: परमसंहतान् । कथं च वशगास्तुभ्यं न कुप्यन्ति च ते शुभे,कुरुकुल और यदुकुलसे सम्बन्ध रखनेवाली अनेक विचित्र बातें उनकी चर्चाकी विषय थीं। भगवान् श्रीकृष्णकी प्यारी पटरानी सत्राजितकुमारी सुन्दरी सत्यभामाने एकान्तमें द्रौपदीसे इस प्रकार पूछा--'शुभे! ट्रुपदकुमारि! किस बर्तावसे तुम हृष्ट-पुष्ट अंगोंवाले तथा लोकपालोंके समान वीर पाण्डवोंके हृदयपर अधिकार रखती हो? किस प्रकार तुम्हारे वशमें रहते हुए वे कभी तुमपर कुपित नहीं होते?
“Wahai wanita yang mulia, bagaimana para pahlawan itu—laksana para penjaga dunia dan bertubuh sangat perkasa—tetap berada dalam pengaruhmu, namun tak pernah murka kepadamu?”
Verse 6
तव वश्या हि सततं पाण्डवा: प्रियदर्शने । मुखप्रेक्षाश्न ते सर्वे तत्त्वमेतद् ब्रवीहि मे,'प्रियदर्शने! क्या कारण है कि पाण्डव सदा तुम्हारे अधीन रहते हैं और सब-के-सब तुम्हारे मुंठकी ओर देखते रहते हैं? इसका यथार्थ रहस्य मुझे बताओ
“Wahai yang berwajah elok, para Pāṇḍava senantiasa berada dalam pengaruhmu; mereka semua memandang wajahmu seakan menanti sabdamu. Katakan kepadaku hakikat yang sebenarnya—apa rahasia di baliknya?”
Verse 7
व्रतचर्या तपो वापि स्नानमन्त्रौषधानि वा । विद्यावीर्य मूलवीर्य जपहोमागदास्तथा,“पाज्चालकुमारी कृष्णे! आज मुझे भी कोई ऐसा व्रत, तप, स्नान, मन्त्र, औषध, विद्या-शक्ति, मूल-शक्ति (जड़ी-बूटीका प्रभाव) जप, होम या दवा बताओ, जो यश और सौभाग्यकी वृद्धि करनेवाला हो तथा जिससे श्यामसुन्दर सदा मेरे अधीन रहें”
Waiśampāyana berkata: “Entah itu laku brata beserta tata-aturannya, tapa, mandi ritual, mantra, ramuan herbal, daya pengetahuan suci, kemanjuran akar-akaran, amalan japa dan homa, ataupun penawar—katakanlah kepadaku sesuatu di antaranya yang menambah kemasyhuran dan keberuntungan, dan yang membuat sang kekasih berkulit gelap itu senantiasa berada dalam pengaruhku.”
Verse 8
ममाद्याचक्ष्व पाज्चालि यशस्यं भगदैवतम् | येन कृष्णे भवेन्नित्यं मम कृष्णो वशानुग:,“पाज्चालकुमारी कृष्णे! आज मुझे भी कोई ऐसा व्रत, तप, स्नान, मन्त्र, औषध, विद्या-शक्ति, मूल-शक्ति (जड़ी-बूटीका प्रभाव) जप, होम या दवा बताओ, जो यश और सौभाग्यकी वृद्धि करनेवाला हो तथा जिससे श्यामसुन्दर सदा मेरे अधीन रहें”
Waiśampāyana berkata: “Wahai Pāñcālī, katakanlah kepadaku hari ini suatu brata yang termasyhur, berlandaskan daya ilahi—yang menambah kemasyhuran dan keberuntungan—dan yang membuat Kṛṣṇa-ku senantiasa patuh serta mengikuti kehendakku.”
Verse 9
एवमुक्क्त्वा सत्यभामा विरराम यशस्विनी । पतिव्रता महाभागा द्रौपदी प्रत्युवाच ताम्,ऐसा कहकर यशस्विनी सत्यभामा चुप हो गयी। तब पतिपरायणा महाभागा द्रौपदीने उसे इस प्रकार उत्तर दिया--
Setelah berkata demikian, Satyabhāmā yang termasyhur pun terdiam. Lalu Draupadī—mulia dan teguh dalam kesetiaan kepada suami—menjawabnya demikian.
Verse 10
असत्स्त्रीणां समाचारं सत्ये मामनुपृच्छसि । असदाचरिते मार्गे कथं स्थादनुकीर्तनम्,'सत्ये! तुम मुझसे जिसके विषयमें पूछ रही हो, वह साध्वी स्त्रियोंका नहीं, दुराचारिणी और कुलटा स्त्रियोंका आचरण है। जिस मार्मका दुराचारिणी स्त्रियोंने अवलम्बन किया है उसके विषयमें हमलोग कोई चर्चा कैसे कर सकती हैं?
Waiśampāyana berkata: “Wahai Satya, engkau menanyakan kepadaku perihal laku perempuan yang tak bermoral. Itu bukan jalan perempuan berbudi; itu cara kaum rusak dan tak setia. Bagaimana mungkin kita menguraikan jalan yang berdiri di atas perilaku yang salah?”
Verse 11
अनुप्रश्न: संशयो वा नैतत् त्वय्युपपद्यते | तथा हापेता बुद्धया त्वं कृष्णस्य महिषी प्रिया,“इस प्रकारका प्रश्न अथवा स्वामीके स्नेहमें संदेह करना तुम्हारे-जैसी साध्वी स्त्रीके लिये कदापि उचित नहीं है; चूँकि तुम बुद्धिमती होनेके साथ ही श्यामसुन्दरकी प्रियतमा पटरानी हो
Waiśampāyana berkata: “Pertanyaan semacam itu—atau keraguan terhadap kasih suami—tidaklah patut bagimu. Engkau bukan tanpa kebijaksanaan; engkau adalah permaisuri yang dikasihi Kṛṣṇa. Maka tak selayaknya engkau memelihara curiga demikian.”
Verse 12
यदैव भर्ता जानीयान्मन्त्रमूलपरां स्त्रियम् । उद्विजेत तदैवास्या: सर्पाद् वेश्मगतादिव,“जब पतिको यह मालूम हो जाय कि उसकी पत्नी उसे वशमें करनेके लिये किसी मन्त्र-तन्त्र अथवा जड़ी-बूटीका प्रयोग कर रही है तो वह उससे उसी प्रकार उद्विग्न हो उठता है जैसे अपने घरमें घुसे हुए सर्पसे लोग शंकित रहते हैं”
Begitu seorang suami mengetahui bahwa istrinya memakai mantra, ritual, atau jampi dari akar dan herba untuk menundukkannya, seketika itu juga ia menjadi gentar terhadapnya—seperti orang-orang ketakutan ketika seekor ular masuk ke dalam rumah.
Verse 13
उद्विग्नस्य कुत: शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् । न जातु वशगो भर्ता स्त्रिया: स्यान्मन्त्रकर्मणा,“उद्विग्नको शान्ति कैसी? और अशान्तको सुख कहाँ? अतः मन्त्र-तन्त्र करनेसे पति अपनी पत्नीके वशमें कदापि नहीं हो सकता
Bagaimana orang yang gelisah memperoleh damai, dan bagaimana yang tak damai memperoleh bahagia? Karena itu, dengan sihir dan rekayasa ritual, seorang suami takkan pernah sungguh-sungguh dapat ditundukkan di bawah kuasa istrinya.
Verse 14
अमित्रप्रहितांश्वापि गदान् परमदारुणान् | मूलप्रचारैहिं विषं प्रयच्छन्ति जिघांसव:,“इसके सिवा, ऐसे अवसरोंपर धोखेसे शत्रुओं-द्वारा भेजी हुई ओषधियोंको खिलाकर कितनी ही स्त्रियाँ अपने पतियोंको अत्यन्त भयंकर रोगोंका शिकार बना देती हैं। किसीको मारनेकी इच्छावाले मनुष्य उसकी स्त्रीके हाथमें यह प्रचार करते हुए विष दे देते हैं कि “यह पतिको वशमें करनेवाली जड़ी-बूटी है”
Selain itu, musuh pun mengirim penyakit yang amat mengerikan. Mereka yang berniat membunuh menyelipkan racun dengan dalih “akar dan herba”—menyebarkan kabar seolah itu obat, lalu menaruh racun itu ke tangan orang lain (sering melalui sang istri), hingga timbul celaka besar.
Verse 15
जिह्दया यानि पुरुषस्त्वचा वाप्युपसेवते । तत्र चूर्णानि दत्तानि हन्यु: क्षिप्रमसंशयम्,“उनके दिये हुए चूर्ण ऐसे होते हैं कि उन्हें पति यदि जिह्ला अथवा त्वचासे भी स्पर्श कर ले, तो वे नि:ःसंदेह उसी क्षण उसके प्राण ले लें
Serbuk-serbuk itu demikian mematikan: entah seorang lelaki menelannya lewat lidah atau sekadar tersentuh pada kulit—sekali diberikan, niscaya dengan cepat merenggut nyawanya.
Verse 16
जलोदरसमायुक्ता: श्वित्रिण: पलितास्तथा । अपुमांस: कृताः स्त्रीभिर्जडान्धबधिरास्तथा,“कितनी ही स्त्रियोंने अपने पतियोंको (वशमें करनेकी आशासे हानिकारक दवाएँ खिलाकर उन्हें) जलोदर और कोढ़का रोगी, असमयमें ही वृद्ध, नपुंसक, अंधा, गूँगा और बहरा बना दिया है
Banyak lelaki telah dibuat—oleh ulah perempuan (yang berharap dapat menundukkan suaminya dengan obat berbahaya)—menderita busung air, terkena leucoderma, beruban sebelum waktunya, bahkan menjadi impoten; juga dibuat tumpul budi, buta, dan tuli.
Verse 17
पापानुगास्तु पापास्ता: पतीनुपसृजन्त्युत । न जातु विप्रियं भर्तु: स्त्रिया कार्य कथंचन,“इस प्रकार पापियोंका अनुसरण करनेवाली वे पापिनी स्त्रियाँ अपने पतियोंको अनेक प्रकारकी विपत्तियोंमें डाल देती हैं। अतः साध्वी स्त्रीको चाहिये कि वह कभी किसी प्रकार भी पतिका अप्रिय न करे
Waiśampāyana berkata: “Perempuan-perempuan berdosa yang mengikuti dosa menjerumuskan suami mereka ke dalam berbagai malapetaka. Karena itu, seorang istri yang berbudi luhur janganlah sekali-kali, dengan cara apa pun, melakukan sesuatu yang tidak berkenan di hati suaminya.”
Verse 18
वर्ताम्यहं तु यां वृत्ति पाण्डवेषु महात्मसु । तां सर्वा शृणु मे सत्यां सत्यभामे यशस्विनि,“यशस्विनी सत्यभामे! मैं स्वयं महात्मा पाण्डवोंके साथ जैसा बर्ताव करती हूँ, वह सब सच-सच सुनाती हूँ; सुनो
Waiśampāyana berkata: “Wahai Satyabhāmā yang termasyhur, dengarkanlah seluruh kebenaran dariku: akan kukatakan dengan jujur bagaimana aku menjalani laku dan bersikap terhadap para Pāṇḍava yang berhati agung.”
Verse 19
अहंकार विहायाहं कामक्रोधौ च सर्वदा । सदारान् पाण्डवान् नित्यं प्रयतोपचराम्पहम्,“मैं अहंकार और काम-क्रोधको छोड़कर सदा पूरी सावधानीके साथ सब पाण्डवोंकी और उनकी अन्यान्य स्त्रियोंकी भी सेवा करती हूँ
Waiśampāyana berkata: “Dengan menanggalkan kesombongan serta senantiasa menjauhkan nafsu dan amarah, aku setiap hari dengan tekun melayani para Pāṇḍava beserta para istri mereka.”
Verse 20
प्रणयं प्रतिसंहृत्य निधायात्मानमात्मनि । शुश्रूषुर्निरहंमाना पतीनां चित्तरक्षिणी,अपनी इच्छाओंका दमन करके मनको अपने-आपमें ही समेटे हुए केवल सेवाकी इच्छासे ही अपने पतियोंका मन रखती हूँ। अहंकार और अभिमानको अपने पास नहीं फटकने देती
Waiśampāyana berkata: “Dengan mengekang keinginan diri dan menghimpun batin kembali ke dalam Sang Diri, aku hanya berhasrat untuk melayani—tanpa ego dan tanpa keangkuhan—seraya menjaga dan menenteramkan hati para suamiku.”
Verse 21
दुर्व्याह्वताच्छड्कमाना दुःस्थितादू दुरवेक्षितात् । दुरासिताद् दुर्वजितादिद्धिताध्यासितादपि,“कभी मेरे मुखसे कोई बुरी बात न निकल जाय, इसकी आशंकासे सदा सावधान रहती हूँ। असभ्यकी भाँति कहीं खड़ी नहीं होती। निर्लज्जकी तरह सब ओर दृष्टि नहीं डालती। बुरी जगहपर नहीं बैठती। दुराचारसे बचती तथा चलने-फिरनेमें भी असभ्यता न हो जाय, इसके लिये सतत सावधान रहती हूँ। पतियोंके अभिप्रायपूर्ण संकेतका सदैव अनुसरण करती हूँ
Waiśampāyana berkata: “Karena takut ada kata buruk terucap dari mulutku, aku senantiasa berjaga-jaga. Aku tidak berdiri dengan sikap kasar dan tak sopan; aku tidak menebar pandang dengan tanpa malu ke segala arah. Aku tidak duduk di tempat yang tidak patut; aku menjauhi kelakuan tercela; bahkan dalam berjalan dan bergerak pun aku waspada agar tidak melanggar tata susila. Aku selalu mengikuti isyarat dan maksud yang tersirat dari para suamiku.”
Verse 22
सूर्यवैश्वानरसमान् सोमकल्पान् महारथात् । सेवे चक्षुर्हण: पार्थननुग्रवीर्यप्रतापिन:,“कुन्तीदेवीके पाँचों पुत्र ही मेरे पति हैं। वे सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी, चन्द्रमाके समान आह्ाद प्रदान करनेवाले, महारथी, दृष्टिमात्रसे ही शत्रुओंको मारनेकी शक्ति रखनेवाले तथा भयंकर बल-पराक्रम एवं प्रतापसे युक्त हैं। मैं सदा उन्हींकी सेवामें लगी रहती हूँ
Waiśampāyana berkata: “Aku melayani para Pārtha, para mahārathi—bercahaya laksana Surya dan api suci Vaiśvānara, serta menyejukkan laksana Candra. Mereka sanggup meremukkan musuh hanya dengan pandangan; dianugerahi kekuatan dahsyat, keberanian, dan kemilau kejayaan. Senantiasa aku tekun dalam pelayanan kepada mereka.”
Verse 23
देवो मनुष्यो गन्धर्वो युवा चापि स्वलंकृतः । द्रव्यवानभिरूपो वा न मेडन्य: पुरुषो मत:,“देवता, मनुष्य, गन्धर्व, युवक, बड़ी सजधजवाला धनवान् अथवा परम सुन्दर कैसा ही पुरुष क्यों न हो, मेरा मन पाण्डवोंके सिवा और कहीं नहीं जाता
Waiśampāyana berkata: “Entah ia dewa, manusia, Gandharwa, pahlawan muda, atau pria yang berhias indah; entah kaya atau amat tampan—tiada lelaki lain yang berkenan di hatiku. Selain para Pāṇḍawa, hatiku tidak berpaling ke mana pun.”
Verse 24
नाभुक्तवति नास्नाते नासंविष्टे च भर्तरि । न संविशामि नाश्नामि सदा कर्मकरेष्वपि,“पतियों और उनके सेवकोंको भोजन कराये बिना मैं कभी भोजन नहीं करती, उन्हें नहलाये बिना कभी नहाती नहीं हूँ तथा पतिदेव जबतक शयन न करें, तबतक मैं सोती भी नहीं हूँ
Waiśampāyana berkata: “Selama suamiku belum makan, aku tidak makan; selama ia belum mandi, aku tidak mandi; dan selama ia belum berbaring untuk beristirahat, aku pun tidak berbaring. Inilah aturan tetapku—bahkan dalam hal para pelayan dan pekerja rumah tangga.”
Verse 25
क्षेत्राद् वनाद् वा ग्रामाद् वा भर्तारें गृहमागतम् | अभ्युत्थायाभिनन्दामि आसनेनोदकेन च,“खेतसे, वनसे अथवा गाँवसे जब कभी मेरे पति घर पधारते हैं, उस समय मैं खड़ी होकर उनका अभिनन्दन करती हूँ; तथा आसन और जल अर्पण करके उनके स्वागत- सत्कारमें लग जाती हूँ
Waiśampāyana berkata: “Entah ia pulang dari ladang, dari hutan, atau dari desa—ketika suamiku tiba di rumah, aku bangkit menyambutnya dengan hormat; lalu aku mengurus penyambutannya dengan mempersembahkan tempat duduk dan air.”
Verse 26
प्रमृष्टभाण्डा मृष्टान्ना काले भोजनदायिनी । संयता गुप्तधान्या च सुसम्मृष्टनिवेशना,“मैं घरके बर्तनोंको माँज-धोकर साफ रखती हूँ। शुद्ध एवं स्वादिष्ट रसोई तैयार करके सबको ठीक समयपर भोजन कराती हूँ। मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर घरमें गुप्तरूपसे अनाजका संचय रखती हूँ और घरको झाड़-बुहार, लीप-पोतकर सदा स्वच्छ एवं पवित्र बनाये रखती हूँ
Waiśampāyana berkata: “Aku menjaga bejana-bejana rumah tangga tetap tersapu dan bersih. Aku menyiapkan makanan yang suci dan matang sempurna, lalu menyajikannya kepada semua orang pada waktunya. Dengan pikiran dan indra terkendali, aku menyimpan persediaan gandum secara diam-diam di dalam rumah; dan aku menjaga kediaman tetap tersapu, diplester, dan terawat—senantiasa bersih serta tersucikan.”
Verse 27
अतिरस्कृतसम्भाषा दुःस्त्रियो नानुसेवती | अनुकूलवती नित्यं भवाम्यनलसा सदा,“मैं कोई ऐसी बात मुँहसे नहीं निकालती, जिससे किसीका तिरस्कार होता हो। दुष्ट स्त्रियोंके सम्पर्कसे सदा दूर रहती हूँ। आलस्यको कभी पास नहीं आने देती और सदा पतियोंके अनुकूल बर्ताव करती हूँ
Aku tidak mengucapkan kata-kata yang membuat orang lain terhina. Aku senantiasa menjauh dari pergaulan perempuan yang jahat. Aku tidak membiarkan kemalasan mendekat, dan selalu berperilaku selaras dengan kehendak para suamiku.
Verse 28
अनर्म चापि हसित द्वारि स्थानमभीक्ष्णश: । अवस्करे चिरस्थानं निष्कुटेषु च वर्जये,“पतिके किये हुए परिहासके सिवा अन्य समयमें मैं नहीं हँसा करती, दरवाजेपर बार- बार नहीं खड़ी होती, जहाँ कूड़े-करकट फेंके जाते हों, ऐसे गंदे स्थानोंमें देरतक नहीं ठहरती और बगीचोंमें भी बहुत देरतक अकेली नहीं घूमती हूँ
Selain senda-gurau dengan suamiku, aku tidak tertawa pada waktu lain. Aku tidak berulang kali berdiri di ambang pintu. Aku tidak berlama-lama di tempat kotor tempat sampah dibuang, dan aku pun menghindari berjalan sendirian terlalu lama di kebun-kebun yang sunyi.
Verse 29
(अन्त्यालापमसंतोषं परव्यापारसंकथाम् | अतिहासातिरोषौ च क्रोधस्थानं च वर्जये । निरताहं सदा सत्ये भर्तृणामुपसेवने,“नीच पुरुषोंसे बात नहीं करती, मनमें असंतोषको स्थान नहीं देती और परायी चर्चासे दूर रहती हूँ। न अधिक हँसती हूँ और न अधिक क्रोध करती हूँ। क्रोधका अवसर ही नहीं आने देती। सदा सत्य बोलती और पतियोंकी सेवामें लगी रहती हूँ
Aku menghindari percakapan yang rendah dan tak patut, tidak memberi tempat bagi ketidakpuasan di dalam hati, dan menjauh dari gunjingan tentang urusan orang lain. Aku tidak tertawa berlebihan dan tidak pula larut dalam amarah; bahkan kesempatan yang dapat menjadi singgasana murka pun kuhindari. Aku senantiasa teguh pada kebenaran dan tetap tekun melayani para suamiku.
Verse 30
सर्वथा भर्तरहितं न ममेष्टं कथंचन । यदा प्रवसते भर्ता कुट॒म्बार्थेन केनचित्
Dalam keadaan apa pun, hidup tanpa suami tidak pernah menyenangkan bagiku. Bila suamiku harus pergi merantau demi suatu urusan rumah tangga, keadaan berpisah darinya bukanlah sesuatu yang dapat kuterima.
Verse 31
सुमनोवर्णकापेता भवामि व्रतचारिणी । “पतिदेवके बिना किसी भी स्थानमें अकेली रहना मुझे बिलकुल पसंद नहीं है। मेरे स्वामी जब कभी कुटुम्बके कार्यसे कभी परदेश चले जाते हैं, उन दिनों मैं फ़ूलोंका शृंगार नहीं धारण करती, अंगराग नहीं लगाती और निरन्तर ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करती हूँ || ३० न्् यच्च भर्ता न पिबति यच्च भर्ता न सेवते
Ketika suamiku pergi, aku menanggalkan hiasan bunga dan lulur wewangian, lalu menjalani laku tapa sebagai pemegang ikrar. Apa pun yang tidak diminum suamiku dan apa pun yang tidak ia santap, aku pun menahan diri darinya.
Verse 32
यथोपदेशं नियता वर्तमाना वराड़ने,(अनुतिष्ठामि तत् सर्व नित्यकालमतन्द्रिता ।।) 'सुन्दरी! शास्त्रोंमें स्त्रियोंके लिये जिन कर्तव्योंका उपदेश किया गया है, उन सबका मैं नियमपूर्वक पालन करती हूँ। अपने अंगोंको वस्त्राभूषणोंसे विभूषित रखकर पूरी सावधानीके साथ मैं पतिके प्रिय एवं हित-साधनमें संलग्न रहती हूँ। मेरी सासने अपने परिवारके लोगोंके साथ बर्तावमें लानेयोग्य जो धर्म पहले मुझे बताये थे, उन सबका मैं निरन्तर आलस्यरहित होकर पालन करती हूँ
Waiśampāyana berkata: “Wahai wanita beranggota elok, aku hidup dengan disiplin menurut ajaran śāstra. Segala kewajiban yang ditetapkan bagi perempuan kutunaikan setiap waktu tanpa lalai—dengan tubuh berhias kain dan perhiasan, aku senantiasa waspada menekuni apa yang menyenangkan dan membawa kebaikan bagi suamiku. Dan segala tata laku yang dahulu diajarkan mertuaku untuk bergaul patut dengan para anggota rumah tangga, semuanya kujalankan terus-menerus, tanpa kemalasan.”
Verse 33
स्वलंकृता सुप्रयता भर्तुः प्रियहिते रता । ये च धर्मा: कुट॒म्बेषु श्वश्वा मे कथिता: पुरा,(अनुतिष्ठामि तत् सर्व नित्यकालमतन्द्रिता ।।) 'सुन्दरी! शास्त्रोंमें स्त्रियोंके लिये जिन कर्तव्योंका उपदेश किया गया है, उन सबका मैं नियमपूर्वक पालन करती हूँ। अपने अंगोंको वस्त्राभूषणोंसे विभूषित रखकर पूरी सावधानीके साथ मैं पतिके प्रिय एवं हित-साधनमें संलग्न रहती हूँ। मेरी सासने अपने परिवारके लोगोंके साथ बर्तावमें लानेयोग्य जो धर्म पहले मुझे बताये थे, उन सबका मैं निरन्तर आलस्यरहित होकर पालन करती हूँ
Waiśampāyana berkata: “Dengan berhias dan selalu siap, aku tekun pada apa yang menyenangkan dan bermanfaat bagi suamiku. Dan segala kewajiban rumah tangga yang dahulu diajarkan mertuaku untuk tata laku dalam keluarga, semuanya kupraktikkan setiap waktu tanpa letih.”
Verse 34
भिक्षाबलिश्राद्धमिति स्थालीपाकाश्न पर्वसु | मान्यानां मानसत्कारा ये चान्ये विदिता मम,“मैं दिन-रात आलस्य त्यागकर भिक्षा-दान, बलिवैश्वदेव, श्राद्ध, पर्वकालोचित स्थालीपाकयज्ञ, मान्य पुरुषोंका आदर-सत्कार, विनय, नियम तथा अन्य जो-जो धर्म मुझे ज्ञात हैं, उन सबका सब प्रकारसे उद्यत होकर पालन करती हूँ
Waiśampāyana berkata: “Aku menanggalkan kemalasan siang dan malam, lalu menunaikan kewajiban yang kuketahui: bila perlu memberi sedekah dari hasil meminta, mempersembahkan bali (vaiśvadeva), melaksanakan upacara śrāddha, dan pada hari-hari perayaan mempersembahkan yajña sthālīpāka menurut tata cara. Kepada mereka yang patut dihormati, kuberikan penghormatan dan jamuan dari hati; juga kerendahan hati, disiplin, serta dharma lain yang kukenal—semuanya kulakukan dengan kesiapsiagaan yang tak putus.”
Verse 35
तान् सर्वाननुवर्ते5हं दिवारात्रमतन्द्रिता । विनयान् नियमांश्वैव सदा सर्वात्मना श्रिता,“मैं दिन-रात आलस्य त्यागकर भिक्षा-दान, बलिवैश्वदेव, श्राद्ध, पर्वकालोचित स्थालीपाकयज्ञ, मान्य पुरुषोंका आदर-सत्कार, विनय, नियम तथा अन्य जो-जो धर्म मुझे ज्ञात हैं, उन सबका सब प्रकारसे उद्यत होकर पालन करती हूँ
Waiśampāyana berkata: “Semua kewajiban itu kuikuti siang dan malam tanpa letih. Kerendahan hati dan pengendalian diri senantiasa kujadikan sandaran dengan segenap jiwa.”
Verse 36
मृदून् सतः सत्यशीलान् सत्यधर्मानुपालिन: । आशीविषानिव क्रुद्धान् पतीन् परिचराम्यहम्,“मेरे पति बड़े ही सज्जन और मृदुल स्वभावके हैं। सत्यवादी तथा सत्यधर्मका निरन्तर पालन करनेवाले हैं; तथापि क्रोधमें भरे हुए विषैले सर्पोंसे जिस प्रकार लोग डरते हैं, उसी प्रकार मैं अपने पतियोंसे डरती हुई उनकी सेवा करती हूँ
Waiśampāyana berkata: “Suami-suami kami sungguh lembut dan berbudi—teguh dalam berkata benar serta setia memelihara dharma kebenaran. Namun ketika amarah menyala, mereka menjadi laksana ular berbisa; maka, sebagaimana orang gentar kepada ular yang sedang murka, demikian pula aku, dalam rasa takut, tetap melayani dan merawat suami-suamiku.”
Verse 37
पत्याश्रयो हि मे धर्मो मतः स्त्रीणां सनातन: । स देव: सा गतिर्नान्या तस्य का विप्रियं चरेत्,“मैं यह मानती हूँ कि पतिके आश्रयमें रहना ही स्त्रियोंका सनातन धर्म है। पति ही उनका देवता है और पति ही उनकी गति है। पतिके सिवा नारीका दूसरा कोई सहारा नहीं है, ऐसे पतिदेवताका भला कौन स्त्री अप्रिय करेगी?
Aku berpegang bahwa dharma abadi seorang perempuan ialah hidup dalam lindungan dan tuntunan suaminya. Dialah dewanya; dialah perlindungan tertinggi—tiada yang lain. Jika demikian adanya, perempuan mana yang akan bertindak hingga membuatnya berduka?
Verse 38
अहं पतीन् नातिशये नात्यश्रे नातिभूषये | नापि श्रश्रृं परिवदे सर्वदा परियन्त्रिता,“पतियोंके शयन करनेसे पहले मैं कभी शयन नहीं करती, उनसे पहले भोजन नहीं करती, उनकी इच्छाके विरुद्ध कोई आभूषण नहीं पहनती, अपनी सासकी कभी निन्दा नहीं करती और अपने-आपको सदा नियमन्त्रणमें रखती हूँ
Aku tak pernah melampaui para suamiku, dan tak pula bertindak congkak. Aku tidak berhias bertentangan dengan kehendak mereka. Aku tak pernah mencela ibu mertua, dan senantiasa menjaga diri dalam tata-aturan serta pengendalian.
Verse 39
अवधानेन सुभगे नित्योत्थिततयैव च । भर्तारो वशगा महां गुरुशुश्रूषयैव च,'सौभाग्यशालिनी सत्यभामे! मैं सावधानीसे सर्वदा सबेरे उठकर समुचित सेवाके लिये सन्नद्ध रहती हूँ। गुरुजनोंकी सेवा-शुश्रूषासे ही मेरे पति मेरे अनुकूल रहते हैं
Wahai yang beruntung, dengan kewaspadaan dan dengan bangun pagi setiap hari, aku senantiasa siap untuk melayani. Terutama melalui bakti dan pelayanan kepada para sesepuh dan guru, para suami menjadi berkenan dan bersikap lunak kepadaku.
Verse 40
नित्यमार्यामहं कुन्तीं वीरसूं सत्यवादिनीम् । स्वयं परिचराम्येतां पानाच्छादनभोजनै:,“मैं वीरजननी सत्यवादिनी आर्या कुन्तीदेवीकी भोजन, वस्त्र और जल आदिसे सदा स्वयं सेवा करती रहती हूँ
Aku senantiasa melayani Kuntī yang mulia—ibu para pahlawan dan penutur kebenaran—dengan tanganku sendiri, menyediakan air, pakaian, dan santapan.
Verse 41
नैतामतिशये जातु वस्त्र भूषणभोजनै: । नापि परिवदे चाहं तां पृथां पृथिवीसमाम्,“वस्त्र, आभूषण और भोजन आदिमें मैं कभी सासकी अपेक्षा अपने लिये कोई विशेषता नहीं रखती। मेरी सास कुन्तीदेवी पृथ्वीके समान क्षमाशील हैं। मैं कभी उनकी निन््दा नहीं करती
Dalam hal pakaian, perhiasan, dan santapan, tak pernah sekalipun aku menuntut keistimewaan bagi diriku melebihi ibu mertuaku. Dan aku tak pernah mencela Pṛthā (Kuntī), yang kesabarannya laksana bumi.
Verse 42
अष्टागग्रे ब्राह्मणानां सहस््राणि सम नित्यदा । भुज्जते रुक्मपात्रीषु युधिष्ठिरनिवेशने,“पहले महाराज युधिष्ठिरके महलमें प्रतिदिन आठ हजार ब्राह्मण सोनेकी थालियोंमें भोजन किया करते थे
Waiśampāyana berkata: Dahulu kala, di kediaman Raja Yudhiṣṭhira, tepat delapan ribu brāhmaṇa makan setiap hari, disajikan dalam bejana-bejana emas.
Verse 43
अष्टाशीतिसहस्राणि स्नातका गृहमेधिन: । त्रिंशद्दासीक एकैको यान् बिभर्ति युधिष्ठिर:,“महाराज युधिष्ठिरके यहाँ अद्बासी हजार ऐसे स्नातक गृहस्थ थे, जिनका वे भरण- पोषण करते थे। उनमेंसे प्रत्येककी सेवामें तीस-तीस दासियाँ रहती थीं
Waiśampāyana berkata: Di lingkungan rumah tangga Raja Yudhiṣṭhira ada delapan puluh delapan ribu kepala keluarga terpelajar—lulusan studi suci—yang dipeliharanya; dan bagi masing-masing, tiga puluh dayang ditetapkan untuk melayani.
Verse 44
दशान्यानि सहस्राणि येषामन्न॑ सुसंस्कृतम् हियते रुक्मपात्रीभिययतीनामूर्ध्वरेतसाम्,“इनके सिवा दूसरे दस हजार और ऊर्ध्वरेता यति उनके यहाँ रहते थे, जिनके लिये सुन्दर ढंगसे तैयार किया हुआ अन्न सोनेकी थालियोंमें परोसकर पहुँचाया जाता था
Waiśampāyana berkata: Selain mereka, ada lagi sepuluh ribu pertapa pengembara—para yati yang menahan diri—yang tinggal di sana; bagi mereka, makanan yang disiapkan dengan saksama diantarkan dan dipersembahkan dalam piring-piring emas.
Verse 45
तान् सर्वानग्रहारेण ब्राह्मणान् वेदवादिन: । यथा पूजयामि सम पानाच्छादनभोजनै:,“मैं उन सब वेदवादी ब्राह्मणोंको अग्रहार (बलिवैश्वदेवके अन्तमें अतिथिको दिये जानेवाले प्रथम अन्न)-का अर्पण करके भोजन, वस्त्र और जलके द्वारा उनकी यथायोग्य पूजा करती थी
Aku menghormati semua brāhmaṇa pengucap Weda itu dengan mempersembahkan agrahāra terlebih dahulu, lalu memuja mereka sebagaimana patut dengan air minum, pakaian, dan hidangan.
Verse 46
शतं दासीसहस््राणि कौन्तेयस्य महात्मन: । कम्बुकेयूरधारिण्यो निष्ककण्ठ्यः: स्वलड्कृता:,“कुन्तीनन्दन महात्मा युधिष्ठिरके एक लाख दासियाँ थीं, जो हाथोंमें शंखकी चूड़ियाँ, भुजाओंमें बाजूबंद और कण्ठमें सुवर्णके हार पहनकर बड़ी सजधजके साथ रहती थीं
Waiśampāyana berkata: Putra Kuntī yang berhati luhur itu memiliki seratus ribu dayang—bergelang kerang, berkelat lengan, dan berkalung emas—berbusana indah serta berhias gemerlap.
Verse 47
महार्हमाल्याभरणा: सुवर्णश्रिन्दनो क्षिता: । मणीन् हेम च बिश्रत्यो नृत्यगीतविशारदा:,“उनकी मालाएँ तथा आभूषण बहुमूल्य थे, अंगकान्ति बड़ी सुन्दर थी। वे चन्दनमिश्रित जलसे स्नान करती और चन्दनका ही अंगराग लगाती थीं, मणि तथा सुवर्णके गहने पहना करती थीं। नृत्य और गीतकी कलामें उनका कौशल देखने ही योग्य था
Waiśampāyana berkata: Mereka mengenakan rangkaian bunga dan perhiasan yang amat berharga; tubuh mereka diolesi cendana dan dihiasi kilau emas. Dengan permata dan emas sebagai perhiasan, mereka terampil—bahkan mahir—dalam tari dan nyanyian.
Verse 48
तासां नाम च रूपं च भोजनाच्छादनानि च । सर्वासामेव वेदाहं कर्म चैव कृताकृतम्,“उन सबके नाम, रूप तथा भोजन-आच्छादन आदि सभी बातोंकी मुझे जानकारी रहती थी। किसने क्या काम किया और क्या नहीं किया? यह बात भी मुझसे छिपी नहीं रहती थी”
Waiśampāyana berkata: Aku mengetahui nama dan rupa mereka semua, juga makanan, pakaian, dan segala rinciannya. Tidak tersembunyi bagiku apa yang telah dilakukan masing-masing dan apa yang ditinggalkannya.
Verse 49
शतं दासीसहस्राणि कुन्तीपुत्रस्य धीमत: । पात्रीहस्ता दिवारात्रमतिथीन् भोजयन्त्युत,“बुद्धिमान् कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरकी पूर्वोक्त एक लाख दासियाँ हाथोंमें (भोजनसे भरी हुई) थाली लिये दिन-रात अतिथियोंको भोजन कराती थीं
Waiśampāyana berkata: Seratus ribu pelayan perempuan milik putra Kuntī yang bijaksana berdiri dengan piring hidangan di tangan, menjamu para tamu siang dan malam.
Verse 50
शतमश्वसहस्राणि दशनागायुतानि च । युधिष्ठिरस्यानुयात्रमिन्द्रप्रस्थनिवासिन:,“जिन दिनों महाराज युधिष्छिर इन्द्रप्रस्थमें रहकर इस पृथ्वीका पालन करते थे, उस समय प्रत्येक यात्रामें उनके साथ एक लाख घोड़े और एक लाख हाथी चलते थे। मैं ही उनकी गणना करती, आवश्यक वस्तुएँ देती और उनकी आवश्यकताएँ सुनती थी
Waiśampāyana berkata: Seratus ribu kuda dan sepuluh ribu gajah pula menyertai iring-iringan Yudhiṣṭhira; para penghuni Indraprastha mengikuti perjalanan beliau.
Verse 51
एतदासीत् तदा राज्ञो यन्महीं पर्यपालयत् । येषां संख्याविधिं चैव प्रदिशामि शूणोमि च,“जिन दिनों महाराज युधिष्छिर इन्द्रप्रस्थमें रहकर इस पृथ्वीका पालन करते थे, उस समय प्रत्येक यात्रामें उनके साथ एक लाख घोड़े और एक लाख हाथी चलते थे। मैं ही उनकी गणना करती, आवश्यक वस्तुएँ देती और उनकी आवश्यकताएँ सुनती थी
Waiśampāyana berkata: Demikianlah keadaan ketika sang raja memerintah dan melindungi bumi. Untuk rombongan itu, akulah yang menetapkan perhitungan jumlah mereka dengan tepat, menyediakan keperluan, dan mendengarkan kebutuhan mereka.
Verse 52
अन्त:पुराणां सर्वेषां भृत्यानां चैव सर्वश: । आगोपालाविपालेभ्य: सर्व वेद कृताकृतम्,“अन्तः:पुरके, नौकरोंके तथा ग्वालों और गड़रियोंसे लेकर समस्त सेवकोंके सभी कार्योकी देखभाल मैं ही करती थी और किसने कया काम किया अथवा कौन काम अधूरा रह गया--इन सब बातोंकी जानकारी भी रखती थी
Aku sendiri mengawasi seluruh pekerjaan di bagian dalam istana dan setiap pelayan tanpa kecuali. Dari para penggembala sapi dan domba hingga semuanya, aku mencatat dengan lengkap apa yang telah dikerjakan dan apa yang masih tersisa.
Verse 53
सर्व राज्ञ: समुदयमायं च व्ययमेव च । एकाहं वेझि कल्याणि पाण्डवानां यशस्विनि,“कल्याणी एवं यशस्विनी सत्यभामे! महाराज तथा अन्य पाण्डवोंको जो कुछ आय, व्यय और बचत होती थी, उस सबका हिसाब मैं अकेली ही रखती और जानती थी
Wahai wanita yang membawa berkah, wahai yang termasyhur! Aku seorang diri mengetahui sepenuhnya keadaan keuangan para Pāṇḍava: seluruh pemasukan dan pendapatan mereka, demikian pula seluruh pengeluaran mereka.
Verse 54
मयि सर्व समासज्य कुटुम्बं भरतर्षभा: । उपासनरता: सर्वे घटयन्ति वरानने,“वरानने! भरतश्रेष्ठ पाण्डव कुटुम्बका सारा भार मुझपर ही रखकर उपासनामें लगे रहते और तदनुरूप चेष्टा करते थे
Wahai wanita berwajah elok! Para Pāṇḍava, yang terbaik di antara keturunan Bharata, menyerahkan seluruh beban rumah tangga kepadaku; sedangkan mereka semua, tekun dalam upāsanā dan pelayanan bakti, berusaha sesuai dharma mereka.
Verse 55
तमहं भारमासक्तमनाधृष्य॑ दुरात्मभि: । सुखं सर्व परित्यज्य रात्र्यहानि घटामि वै,“मुझपर जो भार रखा गया था, उसे दुष्ट स्वभावके स्त्री-पुरुष नहीं उठा सकते थे। परंतु मैं सब प्रकारका सुख-भोग छोड़कर रात-दिन उस दुर्वह भारको वहन करनेकी चेष्टा किया करती थी
Beban yang diletakkan di pundakku adalah beban yang takkan sanggup dipikul oleh lelaki maupun perempuan yang berhati bengkok. Namun aku, menanggalkan segala kenyamanan dan kenikmatan, berjuang siang dan malam untuk memanggul beban yang berat itu.
Verse 56
अधृष्यं वरुणस्येव निधिपूर्णमिवोदधिम् | एकाहं वेझि कोशं वै पतीनां धर्मचारिणाम्,“मेरे धर्मात्मा पतियोंका भरा-पूरा खजाना वरुणके भण्डार और परिपूर्ण महासागरके समान अक्षय एवं अगम्य था। केवल मैं ही उनके विषयकी ठीक जानकारी रखती थी
Perbendaharaan para suamiku yang menapaki dharma itu laksana gudang Varuṇa yang tak tersentuh; laksana samudra penuh harta yang tak pernah susut. Hanya aku seorang yang mengetahui ukuran sejatinya dan tempat tersimpannya.
Verse 57
अनिशायां निशायां च सहा या क्षुत्पिपासयो: । आराधयन्त्या: कौरव्यांस्तुल्या रात्रिरहश्न मे,'रात हो या दिन, मैं सदा भूख-प्यासके कष्ट सहन करके निरन्तर कुरुकुलरत्न पाण्डवोंकी आराधनामें लगी रहती थी। इससे मेरे लिये दिन और रात समान हो गये थे
Entah pada waktu yang tak semestinya atau di tengah malam, aku menahan lapar dan dahaga serta senantiasa tekun melayani para Pāṇḍava keturunan Kuru. Karena pengabdian yang tak goyah itu, siang dan malam menjadi sama bagiku.
Verse 58
प्रथमं प्रतिबुध्यामि चरमं संविशामि च । नित्यकालमहं सत्ये एतत् संवननं मम,'सत्ये! मैं प्रतेदिन सबसे पहले उठती और सबसे पीछे सोती थी। यह पतिभक्ति और सेवा ही मेरा वशीकरण मन्त्र है
Wahai Satya, setiap hari aku bangun paling awal dan berbaring paling akhir. Wahai Satya, inilah selalu sarana untuk memenangkan hati suami: keteguhan dharma kesetiaan istri yang terwujud dalam pelayanan.
Verse 59
एतज्जानाम्यहं कर्तु भर्त॒संवननं महत् | असत्स्त्रीणां समाचार नाहं कुर्या न कामये,“पतिको वशमें करनेका यही सबसे महत्त्वपूर्ण उपाय मैं जानती हूँ। दुराचारिणी स्त्रियाँ जिन उपायोंका अवलम्बन करती हैं, उन्हें न तो मैं करती हूँ और न चाहती ही हूँ”
Aku tahu inilah cara agung untuk memenangkan hati suami. Namun cara-cara yang ditempuh perempuan tak bermoral—aku tidak melakukannya dan tidak pula menginginkannya.
Verse 60
वैशम्पायन उवाच तच्छुत्वा धर्मसहितं व्याह्नतं कृष्णया तदा । उवाच सत्या सत्कृत्य पाज्चालीं धर्मचारिणीम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! द्रौपदीकी ये धर्मयुक्त बातें सुनकर सत्यभामाने उस धर्मपरायणा पाज्चालीका समादर करते हुए कहा--'पाञज्चालराजकुमारी! याज्ञसेनी! मैं तुम्हारी शरणमें आयी हूँ; (मैंने जो अनुचित प्रश्न किया है), उसके लिये मुझे क्षमा कर दो। सखियोंमें परस्पर स्वेच्छापूर्वक ऐसी हास-परिहासकी बातें हो जाया करती हैं!
Vaiśaṃpāyana berkata: Mendengar ucapan Kṛṣṇā (Draupadī) yang selaras dengan dharma, Satyā (Satyabhāmā) pun menghormati Pāñcālī yang berpegang pada dharma, lalu berkata dengan penuh takzim.
Verse 61
अभिपन्नास्मि पाञज्चालि याज्ञसेनि क्षमस्व मे । कामकार: सखीनां हि सोपहासं प्रभाषितम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! द्रौपदीकी ये धर्मयुक्त बातें सुनकर सत्यभामाने उस धर्मपरायणा पाज्चालीका समादर करते हुए कहा--'पाञज्चालराजकुमारी! याज्ञसेनी! मैं तुम्हारी शरणमें आयी हूँ; (मैंने जो अनुचित प्रश्न किया है), उसके लिये मुझे क्षमा कर दो। सखियोंमें परस्पर स्वेच्छापूर्वक ऐसी हास-परिहासकी बातें हो जाया करती हैं!
Wahai Pāñcālī, wahai Yājñasenī, aku datang memohon perlindunganmu—maafkan pertanyaanku yang tidak patut itu. Di antara sahabat perempuan, kata-kata senda-gurau sering terlontar dengan bebas disertai tawa.
Verse 232
इस प्रकार श्रीमह्याभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें आंगिरसोपाख्यानके प्रसंगर्में कार्तिकेयस्घुतिविषयक दो सौ बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
Demikianlah, dalam Śrī Mahābhārata bagian Vana Parva, pada Markandeya-Samāsya Parva, dalam konteks kisah Āṅgirasa, berakhirlah bab ke-232 yang membahas kidung pujian kepada Kārtikeya.
Verse 233
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि द्रौपदीसत्यभामासंवादपर्वणि त्रयस्त्रिंशयदधिकद्वधिशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत द्रौपदीसत्यभामा-संवादपर्वमें दो सौ तैतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
Demikian berakhir bab ke-233 dalam Vana Parva Śrī Mahābhārata, pada bagian yang dikenal sebagai Dialog Draupadī dan Satyabhāmā. Dengan rumusan penutup ini, selesailah bab tersebut.
Verse 316
यच्च नाक्षाति मे भर्ता सर्व तद् वर्जयाम्यहम् । “मेरे पतिदेव जिस चीजको नहीं खाते, नहीं पीते अथवा नहीं सेवन करते, वह सब मैं भी त्याग देती हूँ
Apa pun yang suamiku tidak makan, tidak minum, atau tidak nikmati—semuanya kutinggalkan sepenuhnya.
Whether to pursue maximal destruction against a retreating opponent versus applying measured force; the dilemma is resolved when recognition of Citrasena as a friendly associate triggers immediate weapon withdrawal and de-escalation.
Competence must be paired with control: mastery of astras is presented alongside the capacity to neutralize, retract, and stop violence when new information (identity, relationship, context) changes the ethical status of the engagement.
No explicit phalaśruti appears in the provided passage; the chapter’s meta-function is narrative-ethical—demonstrating astra-discipline and recognition-based restraint as integral to kṣatriya conduct.