Adhyaya 207
Vana ParvaAdhyaya 20762 Verses

Adhyaya 207

Agni’s Withdrawal to the Forest and Identification with Āṅgirasa (अग्न्याङ्गिरस-इतिहासः)

Upa-parva: Mārkaṇḍeya–Yudhiṣṭhira Saṃvāda: Agni–Āṅgirasa Itihāsa (Embedded Mythic Discourse)

Vaiśaṃpāyana reports that, after hearing a dharma-inflected account, Yudhiṣṭhira again questions sage Mārkaṇḍeya. Yudhiṣṭhira asks how Agni ‘went to the forest,’ how Agni became Āṅgirasa in ancient times, and how—when Agni was ‘lost’—a great ṛṣi carried oblations by becoming Agni. He also requests clarification on the apparent paradox that Agni is one yet observed as many through diverse ritual functions, and he extends the inquiry to divine genealogy motifs (including the emergence of Kumāra/Skanda traditions as a connected curiosity). Mārkaṇḍeya responds by citing an ancient itihāsa: the fire-deity (Hutavaha/Havyavāhana), angered or strained, undertakes tapas in the forest; in that condition, another fire operates for the worlds by Brahmā’s ordinance, and Agni reflects on the loss of his ‘agnitva’ (office/identity). Agni then perceives a great muni blazing like fire—Āṅgirasa—approaches him with apprehension, and is urged to resume his station as the primordial, darkness-dispelling fire. Agni expresses concern about fame and recognition, proposing a transfer of primacy: Āṅgirasa becomes the ‘first’ fire, while Agni becomes a secondary, Prajāpatya-associated form. Āṅgirasa requests a boon of progeny; Agni complies, producing Bṛhaspati as Āṅgirasa’s son. The gods inquire into the cause, accept the explanation, and the discourse transitions toward a promised classification of many agnis renowned for many rites—framing Agni’s unity-in-plurality as a ritual and cosmological principle.

Chapter Arc: मार्कण्डेय ऋषि कौशिक ब्राह्मण का उपाख्यान उठाते हैं—एक ऐसा द्विजश्रेष्ठ जो वेद-उपनिषद् सहित स्वाध्याय में रत है और अपने तपोबल पर भीतर-ही-भीतर गर्व भी पालता है। → वृक्ष पर छिपी बलाका (बगुली) अनायास उसके ऊपर विष्ठा गिरा देती है; क्रोध से दग्ध कौशिक उसे केवल दृष्टि-तेज से भस्म कर देता है। उसी उग्र अहं-तेज के साथ वह भिक्षा हेतु नगर में जाता है, पर एक गृहिणी (पतिव्रता) जूठे बर्तन मांजते हुए उसे क्षण भर प्रतीक्षा कराती है; भूख से पीड़ित ब्राह्मण उसे अपमान मानकर कटु वचन कह बैठता है। → पतिव्रता शांत पर अडिग स्वर में उसे उसके ही कर्म का दर्पण दिखाती है—वह बताती है कि उसने बलाका को क्रोध में भस्म किया, और वृद्धों/धर्मज्ञों के प्रति अवलिप्तता त्याज्य है; वह ब्राह्मण-धर्म के सार—सत्य, शौच, स्वाध्याय, मनोनिग्रह, इन्द्रियनिग्रह, सरलता—का स्मरण कराती है और उसके अहं को तोड़ देती है। → कौशिक अपनी भूल स्वीकार कर क्षमा मांगता है; गृहिणी उसे समझाती है कि केवल वेद-पाठ नहीं, आचरण ही धर्म का प्रमाण है—और यदि वह यथार्थ धर्म-ज्ञान चाहता है तो मिथिला में ‘धर्मव्याध’ से पूछे। → कौशिक को यह विस्मय सालता है कि एक गृहिणी और फिर एक ‘व्याध’ धर्म का अधिकारी कैसे—वह मिथिला की ओर चलने को बाध्य होता है।

Shlokas

Verse 1

हि मय न (0) ऑल अप षर्डाधिकॉद्विशततमो< ध्याय: कौशिक ब्राह्मण और पतिव्रताके उपाख्यानके अन्तर्गत ब्राह्मणोंके धर्मका वर्णन मार्कण्डेय उवाच वश्चिद्‌ द्विजातिप्रवरो वेदाध्यायी तपोधन: । तपस्वी धर्मशीलक्ष॒ कौशिको नाम भारत,मार्कण्डेयजी कहते हैं--भरतनन्दन! कौशिक नामसे प्रसिद्ध एक ब्राह्मण था, जो वेदका अध्ययन करनेवाला, तपस्याका धनी और धर्मात्मा था। वह तपस्वी ब्राह्मण सम्पूर्ण द्विजातियोंमें श्रेष्ठ समझा जाता था

Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai Bhārata, dahulu ada seorang brahmana bernama Kauśika—yang utama di antara kaum dwija—tekun mempelajari Weda, kaya akan tapa, seorang pertapa sejati, dan teguh dalam dharma.”

Verse 2

साड्रोपनिषदो वेदानधीते द्विजसत्तम: । स वक्षमूले कम्मिंश्चिद्‌ वेदानुच्चारयन्‌ स्थित:,द्विजश्रेष्ठ कौशिकने सम्पूर्ण अंगोंसहित वेदों और उपनिषदोंका अध्ययन किया था। एक दिनकी बात है, वह किसी वृक्षके नीचे बैठकर वेदपाठ कर रहा था

Sang dwija terbaik itu telah menguasai Weda beserta bagian-bagiannya dan Upaniṣad. Suatu ketika, duduk di bawah akar sebuah pohon, ia tetap di sana melantunkan Weda.

Verse 3

उपरिष्टाच्च वृक्षस्थ बलाका संन्यलीयत । तया पुरीषणमुत्सूष्ट ब्राह्मणस्य तदोपरि,उस समय उस वृक्षके ऊपर एक बगुली छिपी बैठी थी। उसने ब्राह्मण देवताके ऊपर बीट कर दी

Saat itu, di atas pohon, seekor bangau bersembunyi bertengger. Ia menjatuhkan kotorannya tepat ke atas sang brahmana.

Verse 4

तामवेक्ष्य ततः क्रुद्ध/ समपध्यायत द्विज: । भृशं क्रोधाभिभूतेन बलाका सा निरीक्षिता

Melihatnya, sang dwija pun murka dan mulai menimbang-nimbang dengan niat bermusuhan. Dikuasai amarah yang menyala, ia menatap bangau itu tanpa berkedip.

Verse 5

बलाकां पतितां दृष्टवा गतसत्त्वामचेतनाम्‌,उस बगुलीको अचेत एवं निष्प्राण होकर पड़ी देख ब्राह्मणका हृदय दयासे द्रवित हो उठा। उसे अपने इस कुकृत्यपर पश्चात्ताप हुआ। वह इस प्रकार शोक प्रकट करता हुआ बोला--“'ओह! आज क्रोध और आसक्तिके वशीभूत होकर मैंने यह अनुचित कार्य कर डाला'

Melihat bangau itu tergeletak jatuh—tak sadar, seakan tanpa nyawa—hati sang brahmana pun luluh oleh belas kasih. Menyesali kesalahannya, ia meratap: “Aduhai! Hari ini, dikuasai amarah dan keterikatan, aku telah melakukan perbuatan yang tak patut.”

Verse 6

कारुण्यादभिसंतप्त: पर्यशोचत तां द्विज: । अकार्य कृतवानस्मि रोषरागबलात्कृत:,उस बगुलीको अचेत एवं निष्प्राण होकर पड़ी देख ब्राह्मणका हृदय दयासे द्रवित हो उठा। उसे अपने इस कुकृत्यपर पश्चात्ताप हुआ। वह इस प्रकार शोक प्रकट करता हुआ बोला--“'ओह! आज क्रोध और आसक्तिके वशीभूत होकर मैंने यह अनुचित कार्य कर डाला'

Dilanda belas kasih, sang brāhmaṇa meratapi dirinya atas perbuatannya terhadapnya. Dengan penyesalan yang mendalam ia berkata, “Aduhai! Dikuasai kekuatan amarah dan keterikatan, aku telah melakukan perbuatan yang tak patut dilakukan.”

Verse 7

की) है कद सा :2 2 हट! ॥224%॥ ( ४ पर द क्र ८ पदक है, हा हा 3 ल्‍ं हक, ही | २; रा कं ५ $| “ “४ 3, <. रे! पे! मार्कण्डेय उवाच इत्युक्त्वा बहुशो विद्वान ग्रामं भैक्ष्याय संश्रित: । ग्रामे शुचीनि प्रचरन्‌ कुलानि भरतर्षभ,मार्कण्डेयजी कहते हैं--भरतश्रेष्ठ) इस प्रकार बार-बार पछताकर वह दिद्दान ब्राह्मण गाँवमें भिक्षाके लिये गया। उस गाँवमें जो लोग शुद्ध और पवित्र आचरणवाले थे, उन्हींके घरोंपर भिक्षा माँगता हुआ वह एक ऐसे घरपर जा पहुँचा, जहाँ पहले भी कभी किक्षा प्राप्त कर चुका था। दरवाजेपर पहुँचकर ब्राह्मण बोला--'भिक्षा दें!” भीतरसे किसी स्त्रीने उत्तर दिया--“ठहरो! (अभी लाती हूँ)”

Mārkaṇḍeya berkata: Setelah berkata demikian, brāhmaṇa yang terpelajar itu, menyesal berulang-ulang, pergi ke sebuah desa untuk meminta sedekah. Wahai yang terbaik di antara keturunan Bharata, di desa itu ia berkeliling hanya meminta pada rumah tangga yang dikenal suci perilakunya.

Verse 8

प्रविष्टस्तत्‌ कुलं॑ यत्र पूर्व चरितवांस्तु सः । देहीति याचमानो सौ तिषछेत्युक्त: स्त्रिया ततः,मार्कण्डेयजी कहते हैं--भरतश्रेष्ठ) इस प्रकार बार-बार पछताकर वह दिद्दान ब्राह्मण गाँवमें भिक्षाके लिये गया। उस गाँवमें जो लोग शुद्ध और पवित्र आचरणवाले थे, उन्हींके घरोंपर भिक्षा माँगता हुआ वह एक ऐसे घरपर जा पहुँचा, जहाँ पहले भी कभी किक्षा प्राप्त कर चुका था। दरवाजेपर पहुँचकर ब्राह्मण बोला--'भिक्षा दें!” भीतरसे किसी स्त्रीने उत्तर दिया--“ठहरो! (अभी लाती हूँ)”

Ia memasuki rumah tangga yang dahulu pernah ia datangi. Ketika ia memohon, “Berilah sedekah,” seorang perempuan dari dalam menjawab, “Tunggulah,” maka ia pun berdiri menanti di sana.

Verse 9

शौचं तु यावत्‌ कुरुते भाजनस्य कुटुम्बिनी । एतस्मिन्नन्तरे राजन्‌ क्षुधासम्पीडितो भृशम्‌

Sementara sang ibu rumah tangga masih membersihkan wadah itu, wahai Raja, pada sela waktu itu ia menjadi sangat tersiksa oleh lapar.

Verse 10

सा तु दृष्टवा पतिं साध्वी ब्राह्मणं व्यवहाय तम्‌,पतिको आया देख उस श्याम नेत्रोंवाली पतिव्रताने ब्राह्मणगको तो उसी दशामें छोड़ दिया और अत्यन्त विनीतभावसे वह पतिकी सेवामें लग गयी। पानी लाकर उसने पतिके पैर धोये, हाथ-मुँह धुलाये और बैठनेको आसन दिया

Melihat suaminya—sang brāhmaṇa—terbaring dalam keadaan demikian, istri yang berbudi, bermata gelap itu membiarkannya sebagaimana adanya dan dengan kerendahan hati yang dalam mencurahkan diri pada pelayanan kepada suami. Ia membawa air, membasuh kaki suaminya, membersihkan tangan dan wajahnya, lalu mempersilakannya duduk dengan menyediakan tempat duduk.

Verse 11

पतिको आया देख उस श्याम नेत्रोंवाली पतिव्रताने ब्राह्मणगको तो उसी दशामें छोड़ दिया और अत्यन्त विनीतभावसे वह पतिकी सेवामें लग गयी। पानी लाकर उसने पतिके पैर धोये, हाथ-मुँह धुलाये और बैठनेको आसन दिया

Mārkaṇḍeya berkata: Melihat suaminya pulang, istri yang bermata gelap itu—seorang pativratā—meninggalkan brāhmaṇa itu sebagaimana adanya, lalu dengan kerendahan hati sepenuhnya beralih melayani suaminya. Ia membawa air, membasuh kaki suaminya, membantu membersihkan tangan dan wajahnya, dan mempersilakan duduk dengan menyediakan tempat duduk.

Verse 12

आहारेणाथ भक्ष्यैश्न भोज्यै: सुमधुरैस्तथा । उच्छिष्ट भाविता भर्तुर्भुड्धक्ते नित्यं युधिष्ठिर

Wahai Yudhiṣṭhira, ia memang menyantap aneka makanan—kudapan dan hidangan manis—namun semuanya hanyalah sisa setelah suaminya makan. Demikianlah ia hidup setiap hari, menerima sisa sang suami sebagai bagiannya.

Verse 13

फिर सुन्दर स्वादिष्ट भक्ष्य-भोज्य पदार्थ परोसकर वह पतिको भोजन कराने लगी। युधिष्ठिर! वह सती स्त्री प्रतिदिन पतिको भोजन कराकर उनके उच्छिष्टको प्रसाद मानकर बड़े आदर और प्रेमसे भोजन करती थी ।। दैवतं च पतिं मेने भर्तृश्रित्तानुसारिणी । कर्मणा मनसा वाचा नान्यचित्ताभ्यगात्‌ पतिम्‌,वह पतिको देवता मानती और उनके विचारके अनुकूल ही चलती थी। उसका मन कभी पर पुरुषकी ओर नहीं जाता था। वह मन, वाणी और क्रियासे पतिपरायणा थी

Mārkaṇḍeya berkata: Ia memandang suaminya sebagai dewa baginya. Mengikuti kehendak dan laku sang suami, ia selaras dengannya dalam perbuatan, dalam pikiran, dan dalam ucapan. Hatinya tak pernah berpaling kepada lelaki lain; sepenuhnya ia tertuju pada suaminya saja.

Verse 14

त॑ सर्वभावोपगता पतिशुश्रूषणे रता । साध्वाचारा शचिर्दक्षा कुटुम्बस्य हितैषिणी

Markaṇḍeya berkata: Ia menyerahkan dirinya sepenuhnya dan bersukacita dalam pelayanan kepada suaminya—berlaku luhur, suci dan teguh, cakap dalam tugas, serta senantiasa menghendaki kesejahteraan keluarga.

Verse 15

अपने हृदयकी समस्त भावनाएँ, सम्पूर्ण प्रेम पतिके चरणोंमें चढ़ाकर वह अनन्यभावसे उन्हींकी सेवामें लगी रहती थी। सदाचारका पालन करती, बाहर-भीतरसे शुद्ध--पवित्र रहती, घरके काम-काजको कुशलतापूर्वक करती और कुटुम्बके सभी लोगोंका हित चाहती थी।। भर्तुश्नापि हितं यत्‌ तत्‌ सततं सानुवर्तते । देवतातिथि भत्यानां श्वश्रूश्वशुरयोस्तथा

Mārkaṇḍeya berkata: Apa pun yang bermanfaat bagi suaminya, itulah yang senantiasa ia ikuti. Demikian pula ia menjaga kesejahteraan dan kewajiban suci rumah tangga—kepada para dewa, para tamu, para pelayan—serta kepada ibu mertua dan ayah mertua.

Verse 16

शुश्रूषणपरा नित्यं सततं संयतेन्द्रिया । पतिके लिये जो हितकर कार्य जान पड़ता उसमें भी वह सदा संलग्न रहती थी। देवताओंकी पूजा, अतिथियोंके सत्कार, भृत्योंके भरण-पोषण और सास-ससुरकी सेवामें भी वह सर्वदा तत्पर रहती थी। अपने मन और इन्द्रियोंपर वह निरन्तर पूर्ण संयम रखती थी।। सा ब्राह्मणं तदा दृष्टवा संस्थितं भैक्ष्यकाड्क्षिणम्‌ | कुर्वती पतिशुश्रूषां सस्माराथ शुभेक्षणा

Markandeya berkata: Ia senantiasa berbakti dalam pelayanan, selalu mengekang diri dan teguh mengendalikan indria. Apa pun yang dipahaminya membawa kebaikan bagi suaminya, di situlah ia terus-menerus mencurahkan diri. Ia rajin memuja para dewa, memuliakan tamu, menanggung hidup para pelayan rumah, serta melayani mertua—seraya menjaga pikiran dan indrianya dalam disiplin yang kokoh. Lalu, ketika melihat seorang brāhmaṇa berdiri memohon sedekah, perempuan bermata mujur itu—meski sedang melayani suaminya—teringat akan kewajiban yang harus ditunaikan.

Verse 17

पतिकी सेवा करते-करते उस मंगलमयी दृष्टिवाली देवीको भिक्षाके लिये खड़े हुए ब्राह्मगकी याद आयी ।। व्रीडिता साभवत्‌ साध्वी तदा भरतसत्तम । भिक्षामादाय विप्राय निर्जगाम यशस्विनी,भरतवंशविभूषण! अपनी भूलके कारण वह यशस्विनी साध्वी स्त्री बहुत लज्जित हुई और ब्राह्मणके लिये भिक्षा लेकर घरसे बाहर निकली

Markandeya berkata: Ketika terus melayani suaminya, perempuan yang bermartabat dan berpandangan jernih itu tiba-tiba teringat pada brāhmaṇa yang berdiri meminta sedekah. Menyadari kelalaiannya, ia pun sangat malu, wahai yang terbaik di antara keturunan Bharata. Lalu ia mengambil sedekah untuk sang brāhmaṇa dan keluar dari rumah untuk memberikannya—dengan sikap penuh kesopanan dan kesadaran dharma yang kembali teguh.

Verse 18

ब्राह्मण उवाच किमिदं भवति त्वं मां तिछेत्युक्त्वा वराड़ने | उपरोध॑ं कृतवती न विसर्जितवत्यसि,उसे देखकर ब्राह्मणने कहा--सुन्दरी! तुम्हारा यह कैसा बर्ताव है? देख! तुम्हें इतना विलम्ब करना था तो “ठहरो' कहकर मुझे रोक क्‍यों लिया? मुझे जाने क्‍यों नहीं दिया?

Sang brāhmaṇa berkata: “Apa arti tingkah lakumu ini, wahai wanita beranggota elok? Setelah berkata kepadaku, ‘Tunggulah,’ engkau menahanku—namun engkau pun tidak melepaskanku pergi. Mengapa membuatku menunggu begitu lama?”

Verse 19

मार्कण्डेय उवाच ब्राह्मणं क्रोधसंतप्तं ज्वलन्तमिव तेजसा । दृष्टवा साध्वी मनुष्येन्द्र सान्त्वपूर्व वचो5ब्रवीत्‌

Markandeya berkata: Melihat brāhmaṇa itu tersengat amarah, menyala seakan-akan oleh kilau api, perempuan suci itu—wahai raja manusia—mula-mula menenangkannya, lalu mengucapkan kata-kata yang lembut dan mendamaikan.

Verse 20

कष्ट ७0४ रूयुवाच क्षन्तुमर्हसि मे विद्वन्‌ भर्ता मे दैवतं महत्‌ । स चापि क्षुधित: श्रान्तः प्राप्त: शुश्रूषितो मया

Ia berkata: “Wahai orang bijak, mohon ampunilah aku. Bagiku, suamiku adalah dewa yang agung. Ia pun datang kemari dalam lapar dan letih; aku sedang tekun melayaninya.”

Verse 21

स्‍त्री बोली--विद्वत्‌! क्षमा करें। मेरे लिये सबसे बड़े देवता पति हैं। वे भूखे और थके हुए घरपर आये थे। (उन्हें छोड़कर कैसे आती?) उन्हींकी सेवामें लग गयी ।। ब्राह्मण उवाच ब्राह्मणा न गरीयांसो गरीयांस्ते पति: कृत: । गृहस्थधर्मे वर्तन्ती ब्राह्मणानवमन्यसे,तब ब्राह्मण बोला--क्या ब्राह्मण बड़े नहीं हैं; तुमने पतिको ही सबसे बड़ा बना दिया? गृहस्थधर्ममें रहकर भी तुम ब्राह्मणोंका अपमान करती हो?

Sang brāhmaṇa berkata, “Bukankah para brāhmaṇa layak menerima penghormatan tertinggi? Namun engkau menjadikan suamimu yang paling agung. Walau hidup dalam dharma seorang perumah tangga, engkau meremehkan para brāhmaṇa.”

Verse 22

इन्द्रोडप्येषां प्रणमते कि पुनर्मानवो भुवि | अवलिप्ते न जानीषे वृद्धानां न श्रुतं त्वया

Sang brāhmaṇa berkata, “Bahkan Indra pun menunduk kepada para sesepuh seperti itu—apalagi manusia biasa di bumi! Namun engkau, mabuk oleh keangkuhan, tidak mengerti; engkau tidak mengindahkan ajaran para tua.”

Verse 23

रूयुवाच नाहं बलाका विदप्रर्षे त्यज क्रोध॑ं तपोधन,स्‍त्री बोली--तपोधन! क्रोध न करो। ब्रह्मर्ष! मैं बगुली नहीं हूँ जो तुम्हारी इस क्रोधभरी दृष्टिसे जल जाऊँगी। तुम इस तरह कुपित होकर मेरा क्या करोगे? मैं ब्राह्मणोंका अपमान नहीं करती। मनस्वी ब्राह्मण तो देवताके समान होते हैं

Perempuan itu berkata, “Wahai orang bijak, aku bukan bangau itu. Tinggalkan amarahmu, wahai yang kaya tapa. Wahai Brahmarṣi, engkau tak dapat membakarku dengan tatapan murka. Apa yang hendak kau capai dengan mengamuk padaku? Aku tidak menghina para brāhmaṇa; brāhmaṇa yang berhati luhur adalah laksana para dewa.”

Verse 24

अनया क्रुद्धया दृष्ट्या क्रुद्ध: कि मां करिष्यसि । नावजानाम्यहं विप्रान्‌ देवैस्तुल्यानू मनस्विन:,स्‍त्री बोली--तपोधन! क्रोध न करो। ब्रह्मर्ष! मैं बगुली नहीं हूँ जो तुम्हारी इस क्रोधभरी दृष्टिसे जल जाऊँगी। तुम इस तरह कुपित होकर मेरा क्या करोगे? मैं ब्राह्मणोंका अपमान नहीं करती। मनस्वी ब्राह्मण तो देवताके समान होते हैं

Perempuan itu menjawab, “Dengan tatapan murka ini, apa yang akan kau lakukan kepadaku dalam amarahmu? Aku tidak merendahkan para brāhmaṇa; sebab brāhmaṇa yang berhati luhur setara dengan para dewa.”

Verse 25

अपराधमिमं विदप्र क्षन्तुमहसि मेडनघ । जानामि तेजो विप्राणां महाभाग्यं च धीमताम्‌

Sang brāhmaṇa berkata, “Wahai yang tak bernoda dan tajam budi, ketahuilah kesalahanku ini dan maafkanlah aku. Aku mengetahui benar daya rohani para brāhmaṇa serta keberuntungan besar yang menyertai orang bijaksana.”

Verse 26

निष्पाप ब्राह्मण! तुम मेरे इस अपराधको क्षमा करो। मैं बुद्धिमान्‌ ब्राह्मणोंके तेज और महत्त्वको जानती हूँ ।। अपेय: सागर: क्रोधात्‌ कृतो हि लवणोदक: । तथैव दीप्ततपसां मुनीनां भावितात्मनाम्‌

Wahai Brāhmaṇa yang tanpa dosa, ampunilah pelanggaranku ini. Aku memahami cahaya rohani dan kebesaran para Brāhmaṇa yang bijaksana. Karena murka, samudra menjadi tak dapat diminum—berubah menjadi air asin; demikian pula amarah para resi yang bertapa menyala-nyala dan berjiwa terkendali menjadi sangat dahsyat.

Verse 27

ब्राह्मणानां परिभवाद्‌ वातापि: सुदुरात्मवान्‌

Karena menghina para Brahmana, Vātāpi yang sangat jahat (menemui kebinasaan).

Verse 28

बहुप्रभावा: श्रूयन्ते ब्राह्मणानां महात्मनाम्‌,ब्रह्मन! महात्मा ब्राह्मणोंके प्रभावको बतानेवाले बहुत-से चरित्र सुने जाते हैं। उन महात्माओंका क्रोध और कृपा दोनों ही महान्‌ होते हैं। निष्पाप ब्रह्मन! मेरेद्वारा जो तुम्हारा अपराध बन गया है, उसे क्षमा करो

Wahai Brahmana, banyak kisah terdengar tentang kewibawaan para Brahmana yang berhati luhur. Murka mereka besar, dan anugerah mereka pun besar. Wahai Brahmana yang tanpa dosa, ampunilah kesalahanku terhadapmu.

Verse 29

क्रोध: सुविपुलो ब्रह्मन्‌ प्रसादश्च महात्मनाम्‌ । अम्मिंस्त्वतिक्रमे ब्रह्मन्‌ क्षन्तुमहसि मेडनघ,ब्रह्मन! महात्मा ब्राह्मणोंके प्रभावको बतानेवाले बहुत-से चरित्र सुने जाते हैं। उन महात्माओंका क्रोध और कृपा दोनों ही महान्‌ होते हैं। निष्पाप ब्रह्मन! मेरेद्वारा जो तुम्हारा अपराध बन गया है, उसे क्षमा करो

Wahai Brahmana, amarah para mahātmā sungguh amat besar, dan anugerah mereka pun demikian. Maka, wahai Brahmana yang tanpa cela, dalam pelanggaran ini patutlah engkau mengampuniku.

Verse 30

पतिशुश्रूषया धर्मो यः स मे रोचते द्विज । दैवतेष्वपि सर्वेषु भर्ता मे दैवतं परम्‌,विप्रवर! मुझे तो पतिकी सेवासे जो धर्म प्राप्त होता है, वही अधिक पसंद है। सम्पूर्ण देवताओंमें भी पति ही मेरे सबसे बड़े देवता हैं

Wahai yang dua kali lahir, dharma yang kudapat melalui pengabdian melayani suamiku itulah yang paling kuutamakan. Bahkan di antara semua dewa, bagiku suamilah Dewa yang tertinggi.

Verse 31

अविशेषेण तस्याहं कुर्या धर्म द्विजोत्तम | शुश्रूषाया: फल पश्य पत्युब्राह्मिण यादृशम्‌,द्विजश्रेष्ठ! मैं साधारणरूपसे ही पतिसेवारूप धर्मका पालन करती हूँ। ब्राह्मणदेवता! इस पतिसेवाका जैसा फल है, उसे प्रत्यक्ष देख लो

Perempuan brahmana berkata: “Wahai yang terbaik di antara kaum dwija, tanpa pamer dan tanpa keistimewaan apa pun aku menunaikan dharmaku melalui pelayanan kepada suamiku. Wahai Brahmana yang mulia, lihatlah dengan mata kepala sendiri buah dari kesetiaan dalam melayani suami.”

Verse 32

बलाका हि त्वया दग्धा रोषात्‌ तद्‌ विदितं मया | क्रोध: शत्रु: शरीरस्थो मनुष्याणां द्विजोत्तम,तुमने क्रोध करके जो एक बगुलीको जला दिया था वह बात मुझे मालूम हो गयी। द्विजश्रेष्ठ! मनुष्योंका एक बहुत बड़ा शत्रु है, वह उनके शरीरमें ही रहता है। उसका नाम है 'क्रोध”

Bangau yang kau bakar karena amarah itu sungguh telah kuketahui. Wahai yang terbaik di antara para brahmana, ada musuh besar manusia yang bersemayam di dalam tubuh sendiri—namanya adalah amarah.

Verse 33

य: क्रोधमोहौ त्यजति त॑ देवा ब्राह्मणं विदु: । यो वदेदिह सत्यानि गुरु संतोषयेत च

Sang brahmana berkata: “Barangsiapa menanggalkan amarah dan kebingungan batin, para dewa sendiri mengenalnya sebagai brahmana sejati. Dan siapa yang di dunia ini berkata benar serta menyenangkan gurunya—itulah laku di jalan dharma.”

Verse 34

जितेन्द्रियो धर्मपर: स्वाध्यायनिरत: शुचि:

Ia menaklukkan indria, teguh pada dharma, tekun dalam swādhyāya (studi suci), dan murni dalam laku.

Verse 35

यस्य चात्मसमो लोको धर्मज्ञस्य मनस्विन:

Sang brahmana berkata: “Bagi sang bijak yang berjiwa luhur dan mengenal dharma, seluruh dunia menjadi laksana dirinya sendiri—dipandangnya dengan keseimbangan dan tanpa pilih kasih.”

Verse 36

योड्ध्यापयेदधीयीत यजेद्‌ वा याजयीत वा

Sang brāhmaṇa berkata: “Seseorang boleh melatih orang lain dalam ilmu perang, atau menekuni studi suci; boleh melaksanakan yajña sendiri, atau memimpin dan menyelenggarakan yajña bagi orang lain.”

Verse 37

दद्याद्‌ वापि यथाशक्ति त॑ देवा ब्राह्मणं विदु: । जो पढ़े और पढ़ाये, यज्ञ करे और कराये तथा यथाशक्ति दान दे, उसे देवतालोग ब्राह्मण कहते हैं ।। ब्रह्मचारी वदान्यो योडधीयीत द्विजपुड़व:

Sang brāhmaṇa berkata: “Bersedekah sesuai kemampuan pun adalah tanda keluhuran; para dewa mengakui sebagai brāhmaṇa orang yang hidup dalam brahmacarya, dermawan, dan tekun dalam swādhyāya. Dialah yang utama di antara kaum dwija, menegakkan martabat brahminhood melalui pengetahuan, pengendalian diri, dan dana.”

Verse 38

यद्‌ ब्राह्मणानां कुशलं तदेषां परिकीर्तयेत्‌

Sang Brahmin berkata: “Apa pun yang membawa kesejahteraan dan kebaikan bagi para brāhmaṇa—hendaknya itu diumumkan dan dianjurkan bagi mereka.”

Verse 39

धर्म तु ब्राह्मणस्याहु: स्वाध्यायं दममार्जवम्‌

Sang Brahmin berkata: “Dharma seorang brāhmaṇa dinyatakan demikian: swādhyāya, dama (pengendalian indria), dan ārjava (kelurusan hati dan sikap).”

Verse 40

सत्यार्जवे धर्ममाहु: परं धर्मविदो जना:,धर्मज्ञ पुरुष सत्य और सरलताको सर्वोत्तम धर्म बताते हैं। सनातनधर्मके स्वरूपको जानना तो अत्यन्त कठिन है, परंतु वह सत्यमें प्रतिष्ठित है। जो वेदोंके द्वारा प्रमाणित हो, वही धर्म है--यह वृद्ध पुरुषोंका उपदेश है

Sang brāhmaṇa berkata: “Mereka yang memahami dharma menyatakan bahwa kebenaran dan kelurusan adalah dharma tertinggi. Hakikat dharma yang abadi amat sukar dipahami, namun ia tegak berakar pada kebenaran. Apa yang disahkan oleh Weda sajalah dharma—demikian ajaran para sesepuh.”

Verse 41

दुर्ज्ेयः शाश्व॒तो धर्म: स च सत्ये प्रतिष्ठित: श्रुतिप्रमाणो धर्म: स्यादिति वृद्धानुशासनम्‌,धर्मज्ञ पुरुष सत्य और सरलताको सर्वोत्तम धर्म बताते हैं। सनातनधर्मके स्वरूपको जानना तो अत्यन्त कठिन है, परंतु वह सत्यमें प्रतिष्ठित है। जो वेदोंके द्वारा प्रमाणित हो, वही धर्म है--यह वृद्ध पुरुषोंका उपदेश है

Sang brāhmana berkata: “Dharma itu abadi dan sukar dipahami, namun ia tegak kokoh di atas kebenaran. Ajaran para sesepuh menyatakan: hanya yang dibenarkan oleh Śruti (Weda) patut dianggap sebagai dharma.”

Verse 42

बहुधा दृश्यते धर्म: सूक्ष्म एव द्विजोत्तम । भवानपि च धर्मज्ञ: स्वाध्यायनिरत: शुचि:,द्विजश्रेष्ठ! बहुधा धर्मका स्वरूप सूक्ष्म ही देखा जाता है। तुम भी धर्मज्ञ, स्वाध्यायपरायण और पवित्र हो

Wahai yang terbaik di antara kaum dwija, dharma tampak dalam banyak cara, dan sungguh ia halus. Engkau pun seorang yang mengetahui dharma—tekun dalam svādhyāya dan suci batinnya.

Verse 43

अपध्याता च विप्रेण न्‍्यपतद्‌ धरणीतले । यह देख ब्राह्मण क्रोधित हो गया और उस पक्षीकी ओर दृष्टि डालकर उसका अनिष्टचिन्तन करने लगा। उसने अत्यन्त कुपित होकर उस बगुलीको देखा और उसका अनिष्टचिन्तन किया था, अतः वह पृथ्वीपर गिर पड़ी,न तु तत्त्वेन भगवन्‌ धर्म वेत्सीति मे मतिः । यदि विप्र न जानीषे धर्म परमकं द्विज

Karena niat jahat sang brāhmana, burung itu pun jatuh ke tanah. Namun, tuanku yang mulia, menurut pandanganku engkau belum memahami dharma dalam hakikatnya. Jika engkau, wahai dwija, tidak mengetahui dharma yang tertinggi…

Verse 44

मातापितृभ्यां शुश्रूषु: सत्यवादी जितेन्द्रिय:,मिथिलामें एक व्याध रहता है, जो माता-पिताका सेवक, सत्यवादी और जितेन्द्रिय है, वह तुम्हें धर्मका उपदेश करेगा। द्विजश्रेष्ठ! तुम अपनी रुचिके अनुसार वहीं जाओ, तुम्हारा मंगल हो

Sang brāhmana berkata: “Di Mithilā tinggal seorang pemburu; ia berbakti melayani ayah-ibunya, berkata benar, dan menaklukkan indria. Dialah yang akan mengajarkan dharma kepadamu. Wahai yang terbaik di antara kaum dwija, pergilah ke sana sebagaimana kehendakmu—semoga baik adanya bagimu.”

Verse 45

मिथिलायां वसेद्‌ व्याध: स ते धर्मान्‌ प्रवक्ष्यति । तत्र गच्छस्व भद्ठर|ं ते यथाकामं द्विजोत्तम,मिथिलामें एक व्याध रहता है, जो माता-पिताका सेवक, सत्यवादी और जितेन्द्रिय है, वह तुम्हें धर्मका उपदेश करेगा। द्विजश्रेष्ठ! तुम अपनी रुचिके अनुसार वहीं जाओ, तुम्हारा मंगल हो

Di Mithilā tinggal seorang pemburu; ia akan menguraikan dharma bagimu. Pergilah ke sana, wahai yang terbaik di antara kaum dwija—semoga baik adanya bagimu; pergilah sebagaimana engkau kehendaki.

Verse 46

अत्युक्तमपि मे सर्व क्षन्तुमर्हस्यनिन्दित । स्त्रियों ह्यवध्या: सर्वेषां ये च धर्मविदो जना:,अनिन्दनीय ब्राह्मण! यदि मेरे मुखसे कोई अनुचित बातें निकल गयी हों तो उन सबके लिये मुझे क्षमा करें; क्योंकि जो धर्मज्ञ पुरुष हैं, उन सबकी दृष्टिमें स्त्रियाँ अदण्डनीय हैं

Wahai brahmana yang tak tercela! Jika dari mulutku terucap kata-kata yang tidak patut atau berlebihan, ampunilah semuanya; sebab di mata para insan yang mengetahui dharma, perempuan adalah pihak yang tak layak dihukum—apalagi disakiti.

Verse 47

ब्राह्मण उवाच प्रीतो5स्मि तव भद्रें ते गत: क्रोधश्व॒ शोभने । उपालम्भस्त्वयात्युक्तो मम नि:श्रेयसं परम्‌ । स्वस्ति ते5स्तु गमिष्यामि साधयिष्यामि शोभने,(धन्या त्वमसि कल्याणि यस्यास्ते वृत्तमीदृशम्‌ ।) ब्राह्मण बोला--शुभे! तुम्हारा भला हो। मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। मेरा सारा क्रोध दूर हो गया। तुमने जो उलाहना दिया है, वह अनुचित वचन नहीं, मेरे लिये परम कल्याणकारी है। शोभने! तुम्हारा कल्याण हो। अब मैं जाऊँगा और अपना कार्यसाधन करूँगा। कल्याणि! तुम धन्य हो, जिसका सदाचार इतनी उच्चकोटिका है

Sang brāhmaṇa berkata: “Wahai wanita yang membawa berkah, semoga kebaikan menyertaimu. Aku sungguh berkenan kepadamu; amarahku telah sirna. Teguran yang kau ucapkan bukanlah kata yang tak patut—justru itulah kebaikan tertinggi bagiku. Semoga sejahtera bagimu, wahai yang elok. Kini aku akan pergi dan menuntaskan maksudku. Berbahagialah engkau, wahai wanita mulia, yang laku hidupnya begitu luhur.”

Verse 48

मार्कण्डेय उवाच तया विसृष्टो निर्गम्य स्वमेव भवनं ययौ । विनिन्दन्‌ स स्वमात्मानं कौशिको द्विजसत्तम:,मार्कण्डेयजी कहते हैं--युधिष्ठि!! उस साध्वी स्त्रीसे विदा लेकर वह द्विजश्रेष्ठ कौशिक अपने आत्माकी निन्दा करता हुआ अपने घरको लौट गया

Markandeya berkata: “Wahai yang terbaik di antara keturunan Bharata, setelah dipersilakan pergi oleh wanita suci itu, Kaushika—yang utama di antara kaum dwija—berangkat dan kembali ke rumahnya sendiri. Sepanjang jalan ia mencela dirinya sendiri.”

Verse 96

भर्ता प्रविष्ट: सहसा तस्या भरतसत्तम | राजन्‌! वह घरकी मालकिन थी, जो जूँठे बर्तन माँज रही थी। ज्यों ही वह बर्तन साफ करके उधरसे निवृत्त हुई, त्यों ही उसके पतिदेव सहसा घरपर आ गये। भरतश्रेष्ठ! वे भूखसे अत्यन्त पीड़ित थे

Markandeya berkata: “Wahai yang terbaik di antara Bharata, wahai raja—ia, sang nyonya rumah, sedang mencuci piring-piring yang kotor oleh sisa makanan. Begitu selesai membersihkannya dan beranjak dari pekerjaan itu, suaminya tiba-tiba pulang ke rumah. Wahai yang utama di antara Bharata, ia tersiksa oleh lapar yang amat sangat.”

Verse 97

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Teks Sanskerta untuk bait ini (Vana Parva 207.97) tidak tersedia; karena itu, terjemahan yang setia tidak dapat dibuat tanpa naskah aslinya.

Verse 131

पाद्यमाचमनीयं वै ददौ भर्तुस्तथा55सनम्‌ | प्रह्मा पर्यचरच्चापि भर्तारमसितेक्षणा

Mārkaṇḍeya berkata: Ia mempersembahkan kepada suaminya air untuk membasuh kaki (pādya) dan untuk menyeruput sebagai tata cara penyambutan (ācamanīya), serta menyediakan tempat duduk. Perempuan bermata gelap itu pun melayani suaminya dengan hormat, sesuai dharma dan kesetiaan seorang pativratā.

Verse 206

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि पतिव्रतोपाख्याने षडधिकद्धिशततमो<ध्याय:

Demikian berakhir bab ke-206 dalam Vana Parva dari Śrī Mahābhārata, pada bagian yang dikenal sebagai Markandeya-samāsya Parva, dalam kisah sisipan (upākhyāna) tentang istri yang setia (pativratā).

Verse 226

ब्राह्मणा हाग्निसदृशा दहेयु: पृथिवीमपि । अरी! (स्वर्गलोकके स्वामी) इन्द्र भी इन ब्राह्मणोंके आगे सिर झुकाते हैं, फिर भूतलके मनुष्योंकी तो बात ही कया है? धमंडमें भरी हुई स्त्री! क्‍या तुम ब्राह्मणोंका प्रभाव नहीं जानती? कभी बड़े-बूढ़ोंके मुखसे भी नहीं सुना? अरी! ब्राह्मण अग्निके समान तेजस्वी होते हैं। वे चाहें तो इस पृथ्वीको भी जलाकर भस्म कर सकते हैं

Sang Brahmana berkata: “Para brāhmaṇa bagaikan api; bila mereka menghendaki, mereka dapat membakar bahkan bumi. Indra, penguasa surga, pun menundukkan kepala di hadapan brāhmaṇa—apalagi manusia fana di tanah ini. Wahai perempuan yang dipenuhi kesombongan, tidakkah engkau mengetahui wibawa brāhmaṇa? Tidakkah pernah engkau dengar dari para tetua? Brāhmaṇa menyala dengan daya laksana api; bila mereka berkehendak, mereka sanggup menjadikan bumi ini abu.”

Verse 263

येषां क्रोधाग्निरद्यापि दण्डके नोपशाम्यति | ब्राह्मणोंके ही क्रोधका फल है कि समुद्रका पानी खारा एवं पीनेके अयोग्य बना दिया गया। इसी प्रकार जिनकी तपस्या बहुत बढ़ी-चढ़ी थी और जिनका अन्त:करण परम पवित्र हो चुका था ऐसे मुनियोंने भी जो क्रोधकी आग प्रज्वलित की थी, वह आज भी दण्डकारण्यमें बुझ नहीं पा रही है

Sang Brahmana berkata: “Di hutan Dandaka, api amarah yang dahulu dinyalakan oleh para resi tertentu belum juga padam hingga hari ini. Beginilah akibat murka: dikatakan bahwa air samudra menjadi asin dan tak layak diminum karena amarah seorang brāhmaṇa; demikian pula para pertapa dengan tapa yang agung dan hati yang telah disucikan, bila menyalakan nyala amarah, meninggalkan dampak yang lama menghanguskan dunia.”

Verse 276

अगस्त्यमृषिमासाद्य जीर्ण: क्रूरो महासुर: । ब्राह्मणोंका तिरस्कार करनेसे ही क्रूर स्वभाववाला महान्‌ असुर अत्यन्त दुरात्मा वातापि अगस्त्य मुनिके पेटमें जाकर पच गया

Setelah mendatangi resi Agastya, Vātāpi—demon besar yang telah menua dan berhati kejam—karena dosanya menghina para brāhmaṇa, masuk ke perut Agastya dan tercerna. Kisah ini menegaskan bahwa kesombongan terhadap orang saleh dan berilmu akan berbalik menimpa pelakunya, sedangkan daya tapa dan dharma melindungi mereka yang berbudi.

Verse 336

हिंसितश्न न हिंसेत त॑ देवा ब्राह्मणं विदु: । जो क्रोध और मोहको त्याग देता है, उसीको देवतागण ब्राह्मण मानते हैं। जो यहाँ सत्य बोले, गुरुको संतुष्ट रखे, किसीके द्वारा मार खाकर भी बदलेमें उसे न मारे, उसको देवतालोग ब्राह्मण मानते हैं

Orang yang meski telah disakiti namun tidak menyakiti kembali—dialah yang diakui para dewa sebagai brāhmaṇa sejati. Ia yang meninggalkan amarah dan kebingungan batin, berkata benar di dunia ini, menyenangkan guru, dan walau dipukul tidak membalas memukul—dialah yang dipandang para dewa sebagai brāhmaṇa.

Verse 346

कामक्रोधौ वशौ यस्य त॑ देवा ब्राह्मण विदु: । जो जितेन्द्रिय, धर्मपरायण, स्वाध्यायतत्पर और पवित्र है तथा काम और क्रोध जिसके वशमें है, उसे देवतालोग ब्राह्मण मानते हैं

Dia yang nafsu dan amarahnya berada dalam kendalinya—dialah yang diakui para dewa sebagai brāhmaṇa sejati. Orang yang menaklukkan indria, teguh pada dharma, tekun dalam svādhyāya, dan suci; yang hawa nafsu serta murkanya tertundukkan—dialah yang dipandang para makhluk ilahi sebagai brāhmaṇa.

Verse 356

सर्वधर्मेषु च रतस्तं देवा ब्राह्मणं विदुः । जिस धर्मज्ञ एवं मनस्वी पुरुषका सम्पूर्ण जगत्‌के प्रति आत्मभाव है तथा सभी धर्मोंपर जिसका समान अनुराग है, उसे देवतालोग ब्राह्मण मानते हैं

Para dewa mengakui sebagai brāhmaṇa sejati orang yang bersukacita dalam segala bentuk dharma. Ia yang berpengetahuan luas dan berhati teguh, memeluk seluruh dunia dengan rasa-Atman, serta memandang semua dharma dengan kasih yang setara—dialah yang dianggap para dewa sebagai brāhmaṇa.

Verse 373

स्वाध्यायवानमन्तो वै त॑ देवा ब्राह्मणं विदु: । जो द्विजश्रेष्ठ ब्रह्मचर्यका पालन करे, उदार बने, वेदोंका अध्ययन करे और सतत सावधान रहकर स्वाध्यायमें ही लगा रहे, उसे देवतालोग ब्राह्मण मानते हैं

Para dewa mengakui sebagai brāhmaṇa sejati orang yang tekun dalam svādhyāya dan berdisiplin dalam laku. Ia yang, sebagai yang terbaik di antara kaum dua-kali-lahir, menjaga brahmacarya, berperilaku dermawan, mempelajari Weda, dan senantiasa waspada—teguh terikat pada svādhyāya—dialah yang dipandang para dewa sebagai brāhmaṇa.

Verse 383

सत्यं तथा व्याहरतां नानृते रमते मन: । ब्राह्मणके लिये जो हितकर कर्म हो, उसीका उनके सामने वर्णन करना चाहिये। सत्य बोलनेवाले लोगोंका मन कभी असत्यमें नहीं लगता

Biarlah orang yang berbicara, berbicara dengan kebenaran; batin tidak bersenang dalam dusta. Di hadapan seorang brāhmaṇa hendaknya dikemukakan hanya tindakan yang bermanfaat dan membawa kebaikan baginya. Batin orang yang berkata benar tidak pernah terpaut pada kebohongan.

Verse 393

इन्द्रियाणां निग्रहं च शाश्वृतं द्विजसत्तम । द्विजश्रेष्ठ! स्वाध्याय, मनोनिग्रह, सरलता और इन्द्रियनिग्रह--ये ब्राह्मणके लिये सनातनधर्म कहे गये हैं

Sang brāhmaṇa berkata: “Wahai yang terbaik di antara para dwija, pengendalian indria adalah laku disiplin yang abadi. Wahai brāhmaṇa terkemuka—svādhyāya (telaah ajaran suci), pengekangan batin, kesederhanaan yang lurus, dan pengendalian indria: inilah dharma kekal seorang brāhmaṇa.”

Verse 436

धर्मव्याधं तत: पृच्छ गत्वा तु मिथिलां पुरीम्‌ । भगवन्‌! तो भी मेरा विचार यह है कि तुम्हें धर्मका यथार्थ ज्ञान नहीं है। विप्रवर! यदि तुम परम धर्म क्‍या है, यह नहीं जानते तो मिथिलापुरीमें धर्मव्याधके पास जाकर पूछो

Sang brahmin berkata: “Kalau begitu pergilah ke kota Mithilā dan tanyakan kepada dharma-vyādha, sang pemburu saleh. Tuan yang mulia, penilaianku begini: engkau belum mengetahui dharma dalam makna sejatinya. Wahai brāhmaṇa terbaik, bila engkau tidak paham apakah dharma tertinggi itu, pergilah ke Mithilā dan bertanyalah kepada dharma-vyādha.”

Frequently Asked Questions

The chapter formalizes a metaphysical-ritual dilemma: Agni is described as one reality, yet appears as many ‘agnis’ because distinct rites and cosmic roles manifest differentiated functions of the same principle.

Legitimate knowledge is framed as lineage-based instruction combined with rational questioning; cosmic order is maintained when offices (like Agni’s) are properly restored and interpreted through function rather than mere name or fame.

No explicit phalaśruti appears in the provided passage; the meta-commentary operates implicitly by signaling a forthcoming systematic exposition (‘I will explain the many kinds of agnis’), positioning this chapter as a prologue to ritual taxonomy and doctrinal clarification.