
Sukta 8.8
Kaṇva lineage (probable; hymn explicitly references Kaṇva in nearby verses)
Aśvins
This hymn is an urgent dawn-invocation to the Aśvins, calling them to arrive swiftly in their sun-clad chariot and to bestow complete boons—health, protection, and successful rite. It praises them as deep-seeing twins who move by the paths of ṛta (cosmic order), near to living beings, and asks that the worshippers not be left to reproach or failure in the seasonal, properly ordered work.
Mantra 2
आ नूनं यातमश्विना रथेन सूर्यत्वचा । भुजी हिरण्यपेशसा कवी गम्भीरचेतसा ॥
हे अश्विन भाई, अभी आओ अपनी रथ में। वो रथ सूरज की रोशनी से चमक रहा है। तुम दोनों बड़े बलवान हो, सोना जैसा रूप है तुम्हारा। तुम अंदर की बात समझते हो, बहुत गहरी समझ है। हमें आके रास्ते की तेज़ रफ़्तार दो।
Mantra 3
आ यातं नहुषस्पर्यान्तरिक्षात्सुवृक्तिभिः । पिबाथो अश्विना मधु कण्वानां सवने सुतम् ॥
अश्विन भाई, आसमान से आओ, इंसान की पहुँच से बाहर से। अच्छे शब्दों से बुलाया है तुम्हे। कण्व ऋषि के यहाँ मधु निकाला है, तुम उसको पियो। यह मीठा रस अंदर की रोशनी बढ़ाता है।
Mantra 4
आ नो यातं दिवस्पर्यान्तरिक्षादधप्रिया । पुत्रः कण्वस्य वामिह सुषाव सोम्यं मधु ॥
हमें भी आओ, आसमान से और बीच की दुनिया से। तुम लोग भेंट पसंद करते हो। कण्व ऋषि का बेटा यहाँ बैठ के तुम्हारे लिए सोम रस का मधु निकाल रहा है। यह मीठा रस अंदर आके सब ठीक कर दे।
Mantra 5
आ नो यातमुपश्रुत्यश्विना सोमपीतये । स्वाहा स्तोमस्य वर्धना प्र कवी धीतिभिर्नरा ॥
अश्विन भाई, हमारी सुन के यहाँ आ जाओ। सोम पीने का टाइम हो गया है। हमारी स्तुति बढ़ाओ, आगे बढ़ो। तुम दोनों रिशि हो, तुम्हारे विचार बहुत तेज़ हैं, तुम वीर हो।
Mantra 6
यच्चिद्धि वां पुर ऋषयो जुहूरेऽवसे नरा । आ यातमश्विना गतमुपेमां सुष्टुतिं मम ॥
पुराने रिशि भी तुम्हे बुलाते थे मदद के लिए। अश्विन, तुम उनकी सुन के आए थे। अब मेरी भी सुनो, मेरी स्तुति पसंद आई तो यहाँ आ जाओ। मैं तुम्हे सही तरीके से बुला रहा हूँ।
Mantra 7
दिवश्चिद्रोचनादध्या नो गन्तं स्वर्विदा । धीभिर्वत्सप्रचेतसा स्तोमेभिर्हवनश्रुता ॥
आसमान से भी आओ, जहाँ रोशनी है वहाँ से। तुम सूरज की दुनिया जानते हो, तुम्हे पता है रोशनी कहाँ है। अपने विचार से आओ, तुम्हारा दिमाग साफ है जैसे कोई अपना बच्चा हो। हमारी स्तुति सुन के आओ, हमारी आवाज़ सुनो।
Mantra 8
किमन्ये पर्यासतेऽस्मत्स्तोमेभिरश्विना । पुत्रः कण्वस्य वामृषिर्गीर्भिर्वत्सो अवीवृधत् ॥
दूसरे लोग क्यों हमारी स्तुति से आगे निकलना चाहते हैं? अश्विन, वत्स रिशि ने तुम्हे अपनी बातों से बढ़ा दिया है। वो कण्व रिशि का बेटा है, उसने तुम्हारे लिए गीत बनाए हैं। इससे तुम्हारी शक्ति बढ़ गई है।
Mantra 9
आ वां विप्र इहावसेऽह्वत्स्तोमेभिरश्विना । अरिप्रा वृत्रहन्तमा ता नो भूतं मयोभुवा ॥
अश्विन, रिशि ने तुम्हे यहाँ बुलाया है हमारे लिए मदद करने। हमारी स्तुति सुन के आओ। तुम बड़े वीर हो, दुश्मन तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता। तुम बड़े बलवान हो, रास्ते में जो रोकता है उसको तोड़ डालो। हमारे लिए ऐसे बनो जो खुशी दे।
Mantra 10
आ यद्वां योषणा रथमतिष्ठद्वाजिनीवसू । विश्वान्यश्विना युवं प्र धीतान्यगच्छतम् ॥
जब शक्ति ने तुम्हारी रथ को चला दिया, तो अश्विन भाई, तुम दोनों आगे बढ़ गए। तुम लोगों के दिल में जो सही बात थी, सबको पूरा करने चले गए।
Mantra 11
अतः सहस्रनिर्णिजा रथेना यातमश्विना । वत्सो वां मधुमद्वचोऽशंसीत्काव्यः कविः ॥
इसलिए अश्विन, तुम अपनी रथ लेकर आओ। वो रथ में हज़ारों चमक है। रिशि वत्स ने तुमसे जो बात कही है, वो बहुत मीठी है और सच है।
Mantra 12
पुरुमन्द्रा पुरूवसू मनोतरा रयीणाम् । स्तोमं मे अश्विनाविममभि वह्नी अनूषाताम् ॥
अश्विन, तुम लोगों को खुशी देते हो और बहुत कुछ देते हो। तुम दिल से भी क़रीब हो। मेरी यह स्तुति सुनके तुम्हारी रथ यहाँ आए। और इसे ऊपर ले जाओ।
Mantra 13
आ नो विश्वान्यश्विना धत्तं राधांस्यह्रया । कृतं न ऋत्वियावतो मा नो रीरधतं निदे ॥
अश्विन, हमें सारी चीज़ें बिना देर के दो। जो लोग सही वक़्त पर काम करते हैं, उनका काम सही बना दो। हमें किसी की बुराई में मत छोड़ो।
Mantra 14
यन्नासत्या परावति यद्वा स्थो अध्यम्बरे । अतः सहस्रनिर्णिजा रथेना यातमश्विना ॥
नासत्य, तुम कहीं भी क्यों न हो, दूर या आसमान में, यहाँ आओ। अपनी रथ लेकर आओ जिसमें हज़ारों चमक है। अश्विन, हमारे पास आओ।
Mantra 15
यो वां नासत्यावृषिर्गीर्भिर्वत्सो अवीवृधत् । तस्मै सहस्रनिर्णिजमिषं धत्तं घृतश्चुतम् ॥
रिशि वत्स ने गाके अश्विन ब्रदर्स की ताकत बढ़ा दी है। वो उनके लिए गाते रहे। अब आप दोनों उन्हे खाना दो। एक ऐसा खाना जो चमकता है, हज़ारों रोशनी वाला। जो घी जैसा मीठा और ताकतवर पानी छोड़ता है।
Mantra 16
प्रास्मा ऊर्जं घृतश्चुतमश्विना यच्छतं युवम् । यो वां सुम्नाय तुष्टवद्वसूयाद्दानुनस्पती ॥
अश्विन ब्रदर्स, उसको वो ताकत दो जो घी जैसी चमकती है और बहती रहती है। उसने तुम्हारी मेहरबानी के लिए तारीफ की है। वो अंदर की दौलत माँगता है। आप जो देते हैं, उसकी ताकत से वो जीता रहे।
Mantra 17
आ नो गन्तं रिशादसेमं स्तोमं पुरुभुजा । कृतं नः सुश्रियो नरेमा दातमभिष्टये ॥
हमें आओ, बुराई मारनेवाले। तुम बहुत खुश रहते हो। हमारी यह स्तुति स्वीकारो। तुम चमकनेवाले वीर हो। हमें वो चीज़ें दो जो हम जीत सकें, जो हमारे काम आएँ।
Mantra 18
आ वां विश्वाभिरूतिभिः प्रियमेधा अहूषत । राजन्तावध्वराणामश्विना यामहूतिषु ॥
प्रियमेध लोगों ने तुम्हे बुलाया है, अपनी सारी मदद के साथ। अश्विन ब्रदर्स, तुम यज्ञ के राजा हो। जब लोग बुलावाते हैं, तब आओ। और हमारे अंदर राज करो।
Mantra 19
आ नो गन्तं मयोभुवाश्विना शम्भुवा युवम् । यो वां विपन्यू धीतिभिर्गीर्भिर्वत्सो अवीवृधत् ॥
अश्विन ब्रदर्स, हमें आओ। तुम खुशी लाते हो और शांति लाते हो। रिशि वत्स ने तुम्हारी ताकत बढ़ा दी सोच के और बोल के। उसने तुम्हारे लिए गाके तुम्हारी तारीफ की।
Mantra 20
याभिः कण्वं मेधातिथिं याभिर्वशं दशव्रजम् । याभिर्गोशर्यमावतं ताभिर्नोऽवतं नरा ॥
जिस ताकत से तुमने कण्व और मेधातिथि की मदद की थी। जिस ताकत से तुमने वश की मदद की, जिसके पास दस बाड़े थे। जिस ताकत से तुमने गोशर्य की भी मदद की। वहीं ताकत से अब हमें भी बचाओ, हे ताकतवाले।
Mantra 21
याभिर्नरा त्रसदस्युमावतं कृत्व्ये धने । ताभिः ष्वस्माँ अश्विना प्रावतं वाजसातये ॥
जिस ताकत से तुमने त्रसदस्यु को बचाया था जब उसने धन जीता था। उसी ताकत से, हे अश्विन, हमें भी आगे बढ़ो और रक्षा करो। ताकि हम भी शक्ति और संपत्ति पा सकें।
Mantra 22
प्र वां स्तोमाः सुवृक्तयो गिरो वर्धन्त्वश्विना । पुरुत्रा वृत्रहन्तमा ता नो भूतं पुरुस्पृहा ॥
हे अश्विन, हमारे गाने और अच्छे शब्द तुम्हे बड़े बनाएं। तुम दुश्मनों को बहुत जगह हराते हो। हमारे लिए ऐसी शक्ति बनो जो हम बहुत चाहते हैं। जो हमारे पास रहे और काम करे।
Mantra 23
त्रीणि पदान्यश्विनोराविः सान्ति गुहा परः । कवी ऋतस्य पत्मभिरर्वाग्जीवेभ्यस्परि ॥
अश्विन के तीन कदम हैं। वो सामने दिखते हैं, पर गुप्त भी हैं। दोनों रिशि सच्चाई के रास्ते से जीवत लोगों के पास आते हैं। कोई रोकता नहीं, वो सबको घेर लेते हैं।
A direct, immediate summons: the Aśvins are asked to come ‘now’ in a sun-radiant chariot, portrayed as strong-armed, golden, deep-minded seers.
The hymn expands their identity as swift benefactors who draw near to living beings and who make the properly timed, properly ordered work (ṛtu/ṛta) fruitful.
The central plea for comprehensive, prompt boons—‘bring to us all gifts without delay’—and for protection from reproach and diminishment of the rite’s effectiveness.
A contemplative sealing image of their mysterious mode of approach—‘three steps’ both manifest and hidden—affirming that by ṛta’s paths they arrive near and encompass the living.
sūryatvacā (clad with the sun’s radiance)
ā no viśvāny aśvinā dhattaṃ rādhāṃsi (bring to us all boons)
trīṇi padāny aśvinor (three are the steps of the Aśvins)
They are the divine twin riders of the dawn—swift helpers and healers—invoked to arrive quickly, protect the worshippers, and bring complete blessings.
To come immediately in their radiant chariot, grant all boons without delay, make the properly timed ritual work effective, and keep the worshippers from blame or failure.
It suggests their mysterious mode of movement: their presence can be openly experienced yet also remains hidden beyond, as they approach beings along the paths of ṛta (cosmic order).
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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