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Sukta 8.7
Kaṇva lineage (Mandala 8 context; exact rishi not specified here)
Maruts
Tr̥ṣṭubh (explicitly referenced; verse likely in Tr̥ṣṭubh)
This hymn chiefly invokes the Maruts as a mighty, mountain-ranging host who are awakened and strengthened by the poet’s Triṣṭubh praise, bringing vigor, protection, and victorious momentum. The Kaṇva-inspired formulations are presented as nourishing “streams” (iṣaḥ) like ghee, meant to swell the Maruts’ power and, through them, the sacrificer’s prosperity. The closing movement turns toward Agni as the ancient, radiant knower whose flame-sun sets the powers in their stations, sealing the rite with luminous order.
Mantra 1
प्र यद्वस्त्रिष्टुभमिषं मरुतो विप्रो अक्षरत् । वि पर्वतेषु राजथ ॥
जब कोई रिशि मरुत देवताओं के लिए बोलता है, वो उन्हे ताकत देता है। तब मरुत पहाड़ियों में चमकने लगते हैं। वहाँ उनका राज चलता है। यह दिखा रहा है कि भगवान की ताकत सब जगह काम करती है।
Mantra 2
यदङ्ग तविषीयवो यामं शुभ्रा अचिध्वम् । नि पर्वता अहासत ॥
जब मरुत अपनी ताकत से आगे बढ़ते हैं, पहाड़ियाँ झुक जाती हैं। वो इतने तेज हैं कि उनके आगे बड़ी-बड़ी चीज़ें भी हिल जाती हैं। यह बताता है कि सच्ची ताकत सब कुछ अपनी तरफ कर लेती है।
Mantra 3
उदीरयन्त वायुभिर्वाश्रासः पृश्निमातरः । धुक्षन्त पिप्युषीमिषम् ॥
मरुत हवा के साथ आवाज़ उठाते हैं। वो पृश्नि माता के बेटे हैं। वो ऐसे दूध निकालते हैं जैसे गाय देती है, बस यह ताकत का दूध है। यह ताकत लोगों को आगे बढ़ाती है।
Mantra 4
वपन्ति मरुतो मिहं प्र वेपयन्ति पर्वतान् । यद्यामं यान्ति वायुभिः ॥
मरुत बादल और धुंध फैलाते हैं। जब वो हवा के साथ चलते हैं, पहाड़ियाँ काँपने लगती हैं। उनकी ताकत इतनी बड़ी है कि सब कुछ हिल जाता है। यह बताता है कि भगवान की ताकत अंधेरा भी दूर कर सकती है।
Mantra 5
नि यद्यामाय वो गिरिर्नि सिन्धवो विधर्मणे । महे शुष्माय येमिरे ॥
जब पहाड़ और नदियाँ अपनी जगह पर सेट हो जाते हैं, वो एक बड़े नियम के हिसाब से अपनी रास्ता बना लेते हैं। तब वो तुम्हारी ताकत के सामने झुक जाते हैं। यह सब एक ऑर्डर में होता है, जैसे कोई बड़ा काम सिलसिलेवार चल रहा हो।
Mantra 6
युष्माँ उ नक्तमूतये युष्मान्दिवा हवामहे । युष्मान्प्रयत्यध्वरे ॥
हम तुम्हे रात को बुलाते हैं, हम तुम्हे दिन में बुलाते हैं। यज्ञ के काम में जब आगे बढ़ना होता है, तब भी तुम्हारा नाम लेते हैं। हर वक्त तुम्हारी ज़रूरत होती है।
Mantra 7
उदु त्ये अरुणप्सवश्चित्रा यामेभिरीरते । वाश्रा अधि ष्णुना दिवः ॥
वो चमकदार शक्तियाँ ऊपर उठती हैं, रंग-बिरंगी दिखती हैं। अपनी रास्तों पर चल के वो आसमान की ऊंचाई पर जाके खड़ी हो जाती हैं। उनका शोर गूंजता है, जैसे कोई ताकत दिख रही हो।
Mantra 8
सृजन्ति रश्मिमोजसा पन्थां सूर्याय यातवे । ते भानुभिर्वि तस्थिरे ॥
अपनी ताकत से वो एक किरण निकालते हैं, सूरज के लिए रास्ता बना देते हैं। अपनी रोशनी से वो फैल के खड़े हो जाते हैं, जैसे कोई चमकदार रास्ता बना रहे हो।
Mantra 9
इमां मे मरुतो गिरमिमं स्तोममृभुक्षणः । इमं मे वनता हवम् ॥
हे मरुत, मेरी बात सुनो, यह जो मैं गा रहा हूँ उसे अपना लो। तुम जो शक्ति वाले हो, मेरे इस बुलावे को कुबूल करो। मैं तुमसे यही कह रहा हूँ, सुनो और हाँ करो।
Mantra 10
त्रीणि सरांसि पृश्नयो दुदुह्रे वज्रिणे मधु । उत्सं कवन्धमुद्रिणम् ॥
चित्रों वाले देवताओं ने तीन नदियाँ निकाली हैं। यह मीठा पानी है जो इंद्र के लिए है। यह पानी ऊपर उठता है और कभी खत्म नहीं होता। यह अंदर से आता है और बहुत बड़ा सोर्स है।
Mantra 11
मरुतो यद्ध वो दिवः सुम्नायन्तो हवामहे । आ तू न उप गन्तन ॥
हे मरुत, जब हम तुम्हे आसमान से बुलाते हैं, तो हम तुम्हारी कृपा माँगते हैं। तब तुम हमारे पास आओ। हमें अपने पास बुला लो।
Mantra 12
यूयं हि ष्ठा सुदानवो रुद्रा ऋभुक्षणो दमे । उत प्रचेतसो मदे ॥
तुम लोग अच्छे देते हो। तुम रुद्र हो और घर में काम करते हो। तुम लोग बड़े बनाते हो। और जब खुशी आती है, तुम्हारा दिमाग बहुत चलता है।
Mantra 13
आ नो रयिं मदच्युतं पुरुक्षुं विश्वधायसम् । इयर्ता मरुतो दिवः ॥
हे मरुत, आसमान से हमे वो सब कुछ लाओ। जो खुशी से भरा हो, जो बढ़ता रहे, और जो सबको रखे। हमें यह सब दो।
Mantra 14
अधीव यद्गिरीणां यामं शुभ्रा अचिध्वम् । सुवानैर्मन्दध्व इन्दुभिः ॥
जब तुम चमकते हुए लोग पहाड़ों का रास्ता खोलते हो, तब सोम के पानी से खुशी आती है। यह पानी निचोड़ा गया है और तुम लोग बहुत खुश होते हो।
Mantra 15
एतावतश्चिदेषां सुम्नं भिक्षेत मर्त्यः । अदाभ्यस्य मन्मभिः ॥
इंसान इतना ही माँग सकता है इन से, वो भी सिर्फ उस शक्ति के थ्रू जो कभी हार नहीं मानता। जो शक्ति सबसे बड़ी है, उसके विचार से यह वरदान मिलता है। यह वरदान है कि वो तुम्हे बचाए और आगे ले जाए, कोई तुम्हे हिला नहीं सकता।
Mantra 16
ये द्रप्सा इव रोदसी धमन्त्यनु वृष्टिभिः । उत्सं दुहन्तो अक्षितम् ॥
वो बूँदें जैसे चमक रही हों, दोनों दुनिया को फैला देती हैं अपनी बारिश से। वो ऐसा चश्मा खोल देती हैं जो कभी खत्म नहीं होता। यह शक्तियाँ ज़िन्दगी को खुश कर देती हैं, ज्ञान और खुशी की धाराएँ लाती हैं।
Mantra 17
उदु स्वानेभिरीरत उद्रथैरुदु वायुभिः । उत्स्तोमैः पृश्निमातरः ॥
उठो अपनी आवाज़ के साथ, अपने रथ के साथ, अपनी हवा के साथ, अपने गानों के साथ। पृश्नि माता के बेटे, तुम सब ऊपर उठो। अपनी साँस और गति की शक्ति से सबको ऊँचा करो।
Mantra 18
येनाव तुर्वशं यदुं येन कण्वं धनस्पृतम् । राये सु तस्य धीमहि ॥
जिसने तुर्वश और यदु की मदद की, जिसने कण्व को धनवान बनाया, उस शक्ति को हम अपने दिल में बसाते हैं। हम उसकी तरफ सोच लगाते हैं ताकि ज़िन्दगी में पूरा मिल जाए।
Mantra 19
इमा उ वः सुदानवो घृतं न पिप्युषीरिषः । वर्धान्काण्वस्य मन्मभिः ॥
वो जो देने वाले हैं, उनकी यह धाराएँ घी की तरह मीठी हैं और भर गई हैं। कण्व के विचार से यह और बड़ी हो गई हैं। जो अंदर से समर्पित होता है, वो खुश और पूरा बन जाता है।
Mantra 20
क्व नूनं सुदानवो मदथा वृक्तबर्हिषः । ब्रह्मा को वः सपर्यति ॥
अब तुम लोग कहाँ खुश हो रहे हो, जो लोग भगवान के लिए आसन बिछाते हो। कौन है जो तुम्हारी पूजा कर रहा है, कौन है जो भगवान का काम समझता है।
Mantra 21
नहि ष्म यद्ध वः पुरा स्तोमेभिर्वृक्तबर्हिषः । शर्धाँ ऋतस्य जिन्वथ ॥
पहले भी ऐसा ही होता था, जब तुम लोग भगवान के लिए आसन बिछाते थे। अपने भजन से तुम सच्चाई की ताकत को जगाते हो, सब कुछ सही ढंग से चलता है।
Mantra 22
समु त्ये महतीरपः सं क्षोणी समु सूर्यम् । सं वज्रं पर्वशो दधुः ॥
सब मिलकर पानी को सही जगह पे लगाया, धरती को भी, सूरज को भी। सब मिलकर एक बड़ी ताकत बनाई, जैसे बिजली का चमकना सब जगह एक साथ होता है।
Mantra 23
वि वृत्रं पर्वशो ययुर्वि पर्वताँ अराजिनः । चक्राणा वृष्णि पौंस्यम् ॥
वो लोग वृत्र के पास गए, जो सब रोक के रखता था। पहाड़ जैसे बड़े पत्थर तोड़ दिए, ताकत दिखाते हुए। अब रास्ता साफ हो गया, रोशनी आ गई।
Mantra 24
अनु त्रितस्य युध्यतः शुष्ममावन्नुत क्रतुम् । अन्विन्द्रं वृत्रतूर्ये ॥
त्रित लड़ाई में लगा था, उसके पीछे पीछे ताकत आई। इंद्र के साथ सब मिलकर वृत्र को हराया, जो सब रोक रहा था।
Mantra 25
विद्युद्धस्ता अभिद्यवः शिप्राः शीर्षन्हिरण्ययीः । शुभ्रा व्यञ्जत श्रिये ॥
इनके हाथ में बिजली चमक रही है। वो ऊपर आसमान की तरफ जा रहे हैं। उनके चेहरे चमक रहे हैं, सिर पे सोने का गेहना है। यह सब अपने आप को चमका रहे हैं ताकि वो खूब चमकें।
Mantra 26
उशना यत्परावत उक्ष्णो रन्ध्रमयातन । द्यौर्न चक्रदद्भिया ॥
जब तुमने दूर से आके बैल के लिए रास्ता खोला, तो आसमान भी डर गया। तुमने चाहा और तुमने एक छेदा बनाया। आसमान काँप गया जैसे किसी चीज़ से डर गया हो।
Mantra 27
आ नो मखस्य दावनेऽश्वैर्हिरण्यपाणिभिः । देवास उप गन्तन ॥
हमें भी आओ, यह पूजा खुश करने के लिए। तुम्हारे पास घोड़े हैं और तुम्हारे हाथ सोने जैसे चमक रहे हैं। हे देवता, हमारे पास आओ और पास आओ।
Mantra 28
यदेषां पृषती रथे प्रष्टिर्वहति रोहितः । यान्ति शुभ्रा रिणन्नपः ॥
जब उनका चितका हुआ घोड़ा रथ में होता है और लाल घोड़ा आगे खींचता है, तब यह चमकने वाले शक्ति वाले जाते हैं। वो जाते हैं और पानी में हलचल मचा देते हैं।
Mantra 29
सुषोमे शर्यणावत्यार्जीके पस्त्यावति । ययुर्निचक्रया नरः ॥
सुषोमा नदी में, सर्यनावती में, अर्जिका में जहाँ लोग रहते हैं, वहाँ यह वीर गए। उनका चक्का जम गया, वो अपने रास्ते पर चले गए।
Mantra 30
कदा गच्छाथ मरुत इत्था विप्रं हवमानम् । मार्डीकेभिर्नाधमानम् ॥
मरुत, कब आओगे? रिशि तुम्हे बुला रहा है, उसकी मदद चाहिए। आप अपनी शक्ति लेकर आओ जो बीमारी ठीक करे और सब ठीक कर दे।
Mantra 31
कद्ध नूनं कधप्रियो यदिन्द्रमजहातन । को वः सखित्व ओहते ॥
अब यह बताओ, तुम लोग इंद्र को छोड़ के कहाँ जाओगे? तुम में से कौन अपने दोस्त को छोड़ेगा? कौन अपना रिश्ता तोड़ेगा?
Mantra 32
सहो षु णो वज्रहस्तैः कण्वासो अग्निं मरुद्भिः । स्तुषे हिरण्यवाशीभिः ॥
हम कण्व लोग अग्नि की स्तुति करते हैं, मरुत के साथ। यह लोग बहुत ताकतवर हैं, हाथ में वज्र लिए हैं। उनकी आवाज़ सोना जैसी चमकती है।
Mantra 33
ओ षु वृष्णः प्रयज्यूना नव्यसे सुविताय । ववृत्यां चित्रवाजान् ॥
मैं उन ताकतवर लोगों को बुला रहा हूँ जो यज्ञ करते हैं। वो नया बनने में मदद करें, हमें आगे बढ़ा दें। उनकी ताकत अलग-अलग रंग की है।
Mantra 34
गिरयश्चिन्नि जिहते पर्शानासो मन्यमानाः । पर्वताश्चिन्नि येमिरे ॥
जब भगवान की ताकत आती है, तो पहाड़ भी हिल जाते हैं। जो लोग समझते हैं कि हम नहीं हिलेंगे, वो भी दब के रह जाते हैं। पहाड़ भी रुक नहीं पाते।
Mantra 35
आक्ष्णयावानो वहन्त्यन्तरिक्षेण पततः । धातारः स्तुवते वयः ॥
ये शक्तियाँ हमे ले जाती हैं, आँखों से तेज़, आसमान में उड़ती हुई। जो लोग स्तुति करते हैं, उनको भगवान आगे बढ़ने की ताकत देता है। ये शक्तियाँ हवा में उड़ते हैं और हमे सही रास्ते पर ले जाते हैं।
Mantra 36
अग्निर्हि जानि पूर्व्यश्छन्दो न सूरो अर्चिषा । ते भानुभिर्वि तस्थिरे ॥
अग्नि पुराना ज्ञानी है, पैदा होते ही सब जानता है। वो सूरज की तरह चमकता है, मंत्र की शक्ति से। उसकी किरणों से ये शक्तियाँ चमक उठी हैं और अपनी जगह पर खड़ी हो गई हैं।
The Maruts are a host of storm and wind powers—radiant, swift, and loud—invoked to bring strength, protection, and forward-moving energy to the sacrificer.
Triṣṭubh is the hymn’s driving meter, and the poet treats the mantra itself as a real offering—an iṣ (nourishing force) that feeds and increases the Maruts’ power.
Agni is the ritual foundation: his flame is described as sunlike, and his radiance ‘sets’ the powers in their proper stations, concluding the invocation with stability and order.
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