Rig Veda Sukta 7
Mandala 8Sukta 736 Mantras

Sukta 7

Sukta 8.7

Rishi

Kaṇva lineage (Mandala 8 context; exact rishi not specified here)

Devata

Maruts

Chandas

Tr̥ṣṭubh (explicitly referenced; verse likely in Tr̥ṣṭubh)

यह सूक्त मुख्यतः मरुतों का आह्वान करता है—एक महान, पर्वतों में विचरने वाला गण—जिन्हें कवि की त्रिष्टुभ-स्तुति जगाती और बल देती है, और जो तेज, रक्षा तथा विजयकारी वेग प्रदान करते हैं। कण्व-प्रेरित वचन-रचनाएँ घृत-सदृश पोषक “धाराएँ” (इषः) के रूप में प्रस्तुत हैं, जो मरुतों की शक्ति को बढ़ाने और उनके द्वारा यजमान की समृद्धि को पुष्ट करने हेतु हैं। अंत में भाव अग्नि की ओर मुड़ता है—प्राचीन, दीप्तिमान ज्ञाता—जिसकी ज्वाला-रवि शक्तियों को उनके-अपने स्थानों में स्थापित करता है और दीप्तिमय व्यवस्था के साथ यज्ञ को पूर्ण करता है।

Mantras

Mantra 1

प्र यद्वस्त्रिष्टुभमिषं मरुतो विप्रो अक्षरत् । वि पर्वतेषु राजथ ॥

जब विप्र, हे मरुतो, तुम्हारे लिए त्रिष्टुभ्-छन्द की इष (पोषक प्रेरणा) को उँडेलता/प्रवाहित करता है, तब तुम पर्वत-श्रेणियों में प्रकाशित होते हो और राज्य करते हो।

Mantra 2

यदङ्ग तविषीयवो यामं शुभ्रा अचिध्वम् । नि पर्वता अहासत ॥

जब, हे शुभ्र (दीप्तिमान) जनो, तविषीयवः—प्रेरक बल से प्रबल—तुम अपना याम (मार्ग/गति) स्थापित करते हो, तब पर्वत नीचे झुक जाते हैं।

Mantra 3

उदीरयन्त वायुभिर्वाश्रासः पृश्निमातरः । धुक्षन्त पिप्युषीमिषम् ॥

वे (मरुत्) वायुओं के साथ उसे ऊपर उठाते हैं—वे गर्जन करने वाले, पृश्नि-माता के पुत्र; वे प्रचुर पोषण-रस (पिप्युषी) को दुहते हैं, जीवन-प्राण (इषम्) को उँडेलते हैं।

Mantra 4

वपन्ति मरुतो मिहं प्र वेपयन्ति पर्वतान् । यद्यामं यान्ति वायुभिः ॥

मरुत् धुंध/कुहासा (मिहम्) बिखेरते हैं; वे पर्वतों को कंपित कर देते हैं—जब वे वायुओं (प्राण-वायुओं) के साथ अपने नियत याम (मार्ग/यात्रा) पर चलते हैं।

Mantra 5

नि यद्यामाय वो गिरिर्नि सिन्धवो विधर्मणे । महे शुष्माय येमिरे ॥

जब तुम्हारे याम (अग्रगमन) के लिए पर्वत और नदियाँ विधर्मणे—व्यवस्थित धारण/स्थापन के लिए—नीचे (अपने स्थान में) लग जाती हैं, महे—महान्—शुष्म (वेग-बल) के लिए वे स्वयं को समर्पित कर देती हैं।

Mantra 6

युष्माँ उ नक्तमूतये युष्मान्दिवा हवामहे । युष्मान्प्रयत्यध्वरे ॥

रक्षा के लिए हम रात्रि में भी तुम्हें ही पुकारते हैं; दिन में भी तुम्हें ही आह्वान करते हैं; और यज्ञ के अग्रसर होते अध्वर-मार्ग में भी तुम्हें ही बुलाते हैं।

Mantra 7

उदु त्ये अरुणप्सवश्चित्रा यामेभिरीरते । वाश्रा अधि ष्णुना दिवः ॥

वे अरुण-प्रभा से युक्त, विचित्र (बहुवर्ण) शक्तियाँ ऊपर उठती हैं, अपने नियत मार्गों से गतिमान होती हैं; गूँजती हुई वे द्युलोक की शृंग-रेखा पर अपना स्थान लेती हैं।

Mantra 8

सृजन्ति रश्मिमोजसा पन्थां सूर्याय यातवे । ते भानुभिर्वि तस्थिरे ॥

वे अपने ओज से रश्मि को मुक्त करते हैं और सूर्य के गमन हेतु पथ बनाते हैं; अपने भानुओं से वे व्यापक रूप से फैलकर प्रकाशमय मार्ग को स्थिर करते हैं।

Mantra 9

इमां मे मरुतो गिरमिमं स्तोममृभुक्षणः । इमं मे वनता हवम् ॥

हे मरुतो, यह मेरी वाणी—यह मेरा स्तोत्र, हे ऋभुक्षणो (बलवान् शिल्पी), इसे स्वीकार करो; मेरे इस हव (आह्वान) को स्वीकार करो।

Mantra 10

त्रीणि सरांसि पृश्नयो दुदुह्रे वज्रिणे मधु । उत्सं कवन्धमुद्रिणम् ॥

पृश्नि (चितकबरे) जनों ने वज्रिण (वज्रधारी) के लिए मधु की तीन धाराएँ दुही हैं—एक उत्स (स्रोत), कवन्ध (आवृत/संवृत) और उद्रिण (ऊर्ध्वगामी), भीतर से अक्षय स्रोत।

Mantra 11

मरुतो यद्ध वो दिवः सुम्नायन्तो हवामहे । आ तू न उप गन्तन ॥

हे मरुतो, जब हम दिवः (स्वर्ग) से तुम्हें, तुम्हारे सुम्न (अनुग्रह) की कामना करते हुए, पुकारते हैं—तब तुम हमारे पास आओ; हमारे निकट आ गमन करो।

Mantra 12

यूयं हि ष्ठा सुदानवो रुद्रा ऋभुक्षणो दमे । उत प्रचेतसो मदे ॥

क्योंकि तुम ही वास्तव में सुदानव—उदार दाता—रुद्रगण, ऋभु-स्वरूप बलवान् शिल्पी, गृह (दमे) में स्थित हो; और मद—प्रेरित आनन्द—में तुम प्रचेतस्, सर्वथा जागरूक शक्तियाँ हो।

Mantra 13

आ नो रयिं मदच्युतं पुरुक्षुं विश्वधायसम् । इयर्ता मरुतो दिवः ॥

हे दिव्य मरुतो, हमारे पास वह रयि—समृद्धि—लाओ जो मद से छलकती है, बहु-वृद्धि वाली, सर्वथा धारण-पोषण करने वाली; उसे हमारी ओर प्रवाहित करो।

Mantra 14

अधीव यद्गिरीणां यामं शुभ्रा अचिध्वम् । सुवानैर्मन्दध्व इन्दुभिः ॥

हे शुभ्र—दीप्तिमान—जनो, जब तुम मानो गिरियों—ऊँचाइयों—के याम—मार्ग और प्रवाह—को गति देते हो, तब सुवान—निचोड़े हुए—इन्दु—सोम-बिन्दुओं—से तुम हर्ष में प्रविष्ट होते हो और भीतर के आनन्द को तीव्र करते हो।

Mantra 15

एतावतश्चिदेषां सुम्नं भिक्षेत मर्त्यः । अदाभ्यस्य मन्मभिः ॥

इनकी कृपा का इतना ही अंश भी नश्वर मनुष्य याच सकता है—अदाभ्य (अजेय) के प्रेरित मनो-रूपों (मन्म) के द्वारा। क्योंकि सच्चा वरदान वही रक्षण और उन्नयन है जिसे कोई परास्त नहीं कर सकता।

Mantra 16

ये द्रप्सा इव रोदसी धमन्त्यनु वृष्टिभिः । उत्सं दुहन्तो अक्षितम् ॥

जो चमकती बूँदों के समान, अपनी वर्षाओं से दोनों लोकों (रोदसी) को श्वास देकर फैलाते हैं; जो अक्षय स्रोत को दुहते हैं—वे ही वे शक्तियाँ हैं जो आनंद और ज्ञान की धाराओं से सत्ता को उर्वर बनाती हैं।

Mantra 17

उदु स्वानेभिरीरत उद्रथैरुदु वायुभिः । उत्स्तोमैः पृश्निमातरः ॥

अपने गूँजते स्वनों से उठो; अपने रथों से उठो; अपने वायुओं से उठो; अपने स्तोत्रों से उठो—हे पृश्नि-माता के पुत्रो! गति और प्राण की अनेक शक्तियों से सत्ता को ऊपर उठाओ।

Mantra 18

येनाव तुर्वशं यदुं येन कण्वं धनस्पृतम् । राये सु तस्य धीमहि ॥

जिसके द्वारा तुर्वश और यदु को सहारा मिला, जिसके द्वारा कण्व धन-विजयी (धनस्पृत) बने—उस शक्ति के लिए, रयि (समृद्धि) हेतु, हम अपना ध्येय-मन धारण करते हैं।

Mantra 19

इमा उ वः सुदानवो घृतं न पिप्युषीरिषः । वर्धान्काण्वस्य मन्मभिः ॥

हे सुदानवो, ये तुम्हारी पोषक धाराएँ घृत-सी मधुरता के समान परिपूर्ण हुई हैं; कण्व के मन्म (प्रेरित वचनों) से वे और भी बढ़ी हैं—अंतर्यज्ञ की आहुतियाँ समृद्ध पोषण में वृद्धि करें।

Mantra 20

क्व नूनं सुदानवो मदथा वृक्तबर्हिषः । ब्रह्मा को वः सपर्यति ॥

हे सुदानवो, अब तुम कहाँ आनंद लेते हो—हे वृक्तबर्हिषः, जिन्होंने पवित्र बर्हि (आसन) बिछाया है? कौन-सा ब्रह्मा, कौन-सा वाक्-वेत्ता, तुम्हारी यथाविधि उपासना करता है?

Mantra 21

नहि ष्म यद्ध वः पुरा स्तोमेभिर्वृक्तबर्हिषः । शर्धाँ ऋतस्य जिन्वथ ॥

निश्चय ही, हे पवित्र आसन के बिछानेवालो, पहले भी तुम्हारे लिए यह कभी अन्यथा नहीं हुआ। स्तोत्रों द्वारा तुम ऋत के शर्ध (समूह) को प्राणित करते हो; वाणी द्वारा तुम सुव्यवस्थित शक्तियों को कर्म में प्रवृत्त करते हो।

Mantra 22

समु त्ये महतीरपः सं क्षोणी समु सूर्यम् । सं वज्रं पर्वशो दधुः ॥

एक साथ उन्होंने महान आपः (जल-तत्त्व) को सम्यक् किया; एक साथ क्षोणी (पृथ्वी) को; एक साथ सूर्य को। एक साथ उन्होंने वज्र को पर्वशः—अंग-अंग जोड़कर—स्थापित किया।

Mantra 23

वि वृत्रं पर्वशो ययुर्वि पर्वताँ अराजिनः । चक्राणा वृष्णि पौंस्यम् ॥

वे पर्वशः—अंग-अंग करके—वृत्र के विरुद्ध चले; उन्होंने अराजिन (अडिग) पर्वतों को विदीर्ण कर दिया—हे वृष्णि (बलवान), पौंस्य (वीर-शक्ति) को रचते हुए।

Mantra 24

अनु त्रितस्य युध्यतः शुष्ममावन्नुत क्रतुम् । अन्विन्द्रं वृत्रतूर्ये ॥

त्रित के युद्धरत होने के पीछे-पीछे, उन्होंने शुष्म (वीर्य-बल) और क्रतु (प्रकाशमय संकल्प) को आगे बढ़ाया; वृत्र-तूर्य (वृत्र-विघ्न के अतिक्रमण) में वे इन्द्र के साथ चले।

Mantra 25

विद्युद्धस्ता अभिद्यवः शिप्राः शीर्षन्हिरण्ययीः । शुभ्रा व्यञ्जत श्रिये ॥

हाथों में विद्युत् लिए, स्वर्ग की ओर दीप्त, उज्ज्वल शिप्रा (गाल-रक्षक) और स्वर्णमय शिरोभूषणों सहित—वे शुभ्र जन अपनी श्रिये (शोभा) के लिए बाहर से दीप्तिमान हुए।

Mantra 26

उशना यत्परावत उक्ष्णो रन्ध्रमयातन । द्यौर्न चक्रदद्भिया ॥

जब, कामना से, परावत (दूरतम लोक) से तुमने वृषभ के लिए रन्ध्र (भेद/मार्ग) खोल दिया—तब द्यौः (स्वर्ग) भी मानो भय से काँप उठा।

Mantra 27

आ नो मखस्य दावनेऽश्वैर्हिरण्यपाणिभिः । देवास उप गन्तन ॥

हे देवो! यज्ञ-आनन्द के दान हेतु, अश्वों सहित, स्वर्ण-दीप्त हस्तों वाले होकर हमारे पास आओ; समीप आकर उपस्थित होओ।

Mantra 28

यदेषां पृषती रथे प्रष्टिर्वहति रोहितः । यान्ति शुभ्रा रिणन्नपः ॥

जब उनका चितकबरा (अश्व) रथ पर होता है और लाल (अश्व) धुरे/डंडे को खींचता है, तब उज्ज्वल शक्तियाँ चल पड़ती हैं, जलों को कम्पित कर गति में प्रवृत्त करती हुई।

Mantra 29

सुषोमे शर्यणावत्यार्जीके पस्त्यावति । ययुर्निचक्रया नरः ॥

सु-निचोड़े हुए सोम में, शर्यणावती में, और आवास-समृद्ध आर्जीक में, वे नर-वीर निचक्रया (स्थापित चक्र सहित) चले—अपने पथ में अडिग।

Mantra 30

कदा गच्छाथ मरुत इत्था विप्रं हवमानम् । मार्डीकेभिर्नाधमानम् ॥

हे मरुतो! इस प्रकार पुकारते हुए, संकटग्रस्त ऋषि के पास तुम कब आओगे—जो सहायता का अभिलाषी है—अपनी मार्डीक (कृपामय-चिकित्सक) शक्तियों से उसे संबल देते हुए?

Mantra 31

कद्ध नूनं कधप्रियो यदिन्द्रमजहातन । को वः सखित्व ओहते ॥

अब फिर, हे ‘कद्ध’ के प्रिय जनो, ऐसा क्या है कि तुमने इन्द्र को नहीं छोड़ा? तुममें से कौन सख्य-बंधन से पीछे हटता है?

Mantra 32

सहो षु णो वज्रहस्तैः कण्वासो अग्निं मरुद्भिः । स्तुषे हिरण्यवाशीभिः ॥

बलवानों के साथ, वज्र-हस्तों के साथ, हम कण्वजन मरुतों सहित अग्नि की स्तुति करते हैं—स्वर्ण-सी उज्ज्वल वाणियों से।

Mantra 33

ओ षु वृष्णः प्रयज्यूना नव्यसे सुविताय । ववृत्यां चित्रवाजान् ॥

हे वृष्णि (बलवान् देव)! यज्ञ में अग्रसर करने वाली शक्तियों को—नवीन उन्नति के लिए, सुगम कल्याण-गति के लिए—मैं यहाँ प्रवर्तित करूँ; वे चित्र-वीर्य, विविध तेजों से परिपूर्ण हों।

Mantra 34

गिरयश्चिन्नि जिहते पर्शानासो मन्यमानाः । पर्वताश्चिन्नि येमिरे ॥

अन्तःस्थ ‘गिरि’ भी झुककर नीचे धँस जाते हैं; प्रतिरोधी पिण्ड, अपने को अचल मानते हुए भी, ढीले पड़ते हैं। ‘पर्वत’ तक रोके और बाँधे जाते हैं—जब दैवी बल अवरोध पर दबाव डालता है।

Mantra 35

आक्ष्णयावानो वहन्त्यन्तरिक्षेण पततः । धातारः स्तुवते वयः ॥

वे हमें वहन करते हैं—दृष्टि में तीव्र—अन्तरिक्ष के पथ से उड़ते हुए; स्तुति करने वाले के लिए धातार (दैवी व्यवस्थापक) प्रगति के पंखयुक्त बलों को पहुँचाते हैं।

Mantra 36

अग्निर्हि जानि पूर्व्यश्छन्दो न सूरो अर्चिषा । ते भानुभिर्वि तस्थिरे ॥

अग्नि ही प्राचीन, जन्मजात ज्ञाता है—छन्द का सूर्य-सा, अपनी ज्वाला (अर्चिष्) के साथ। उसकी किरणों (भानु) से वे शक्तियाँ व्यापक होकर प्रकट होती हैं और अपने-अपने स्थानों में स्थिर हो जाती हैं।

Frequently Asked Questions

The Maruts are a host of storm and wind powers—radiant, swift, and loud—invoked to bring strength, protection, and forward-moving energy to the sacrificer.

Triṣṭubh is the hymn’s driving meter, and the poet treats the mantra itself as a real offering—an iṣ (nourishing force) that feeds and increases the Maruts’ power.

Agni is the ritual foundation: his flame is described as sunlike, and his radiance ‘sets’ the powers in their proper stations, concluding the invocation with stability and order.

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