
Sukta 1.124
Kutsa Āṅgirasa (traditional attribution for RV 1.124, subject to śākhā recensional listings)
Triṣṭubh (11-syllable lines; standard for many Uṣas hymns)
This Uṣas-hymn celebrates Dawn as the power that kindles Agni, spreads the Sun’s wide light, and sets all beings—two-footed and four-footed—into right movement and purpose. Through vivid feminine imagery, the poet praises Uṣas as a beneficent awakener who clears the life-waters, brings wealth and auspiciousness, and renews the world’s order each day. The hymn closes as a formal request for her protective help and for abundant vigor and prosperity.
Mantra 1
उषा उच्छन्ती समिधाने अग्ना उद्यन्त्सूर्य उर्विया ज्योतिरश्रेत् । देवो नो अत्र सविता न्वर्थं प्रासावीद्द्विपत्प्र चतुष्पदित्यै ॥
उषा, सुबह की रोशनी, उठती है और अंदर अग्नि जगा देती है। सूरज भी उठता है और चारों तरफ रोशनी फैला देता है। सविता देवता हमारे काम को सही दिशा देता है। इससे इंसान और जानवर दोनों आगे बढ़ते हैं।
Mantra 2
अमिनती दैव्यानि व्रतानि प्रमिनती मनुष्या युगानि । ईयुषीणामुपमा शश्वतीनामायतीनां प्रथमोषा व्यद्यौत् ॥
उषा देवियों के नियम नहीं तोड़ती। लेकिन पुराने जमाने को तोड़कर नया लाती है। वो पहले आने वालों की मिसाल है। फिर से आने वालों की भी। वो पहली रोशनी है जो फिर से चमक उठती है।
Mantra 3
एषा दिवो दुहिता प्रत्यदर्शि ज्योतिर्वसाना समना पुरस्तात् । ऋतस्य पन्थामन्वेति साधु प्रजानतीव न दिशो मिनाति ॥
यह आसमान की बेटी हमारे सामने आ गई है। रोशनी पहनी है, शुरू से वैसी ही है। वो सच के रास्ते पर चलती है। जैसे कोई जानता हो, किसी दिशा को गलत नहीं करती।
Mantra 4
उपो अदर्शि शुन्ध्युवो न वक्षो नोधा इवाविरकृत प्रियाणि । अद्मसन्न ससतो बोधयन्ती शश्वत्तमागात्पुनरेयुषीणाम् ॥
उषा साफ चमक कर सामने आ गई है। जैसे कोई अच्छी चीज़ दिख जाए। सोने वालों को जगा रही है, जैसे घर से बाहर निकलना हो। वो पुरानी रोशनी फिर से आई है जो वापस आने वालों के पास आती है।
Mantra 5
पूर्वे अर्धे रजसो अप्त्यस्य गवां जनित्र्यकृत प्र केतुम् । व्यु प्रथते वितरं वरीय ओभा पृणन्ती पित्रोरुपस्था ॥
उषा, सुभ की रोशनी की माँ, आधी रात के बाद अपना काम शुरू करती है। वो अंधेरे में एक निशानी रख देती है जो बताती है कि दिन आ रहा है। फिर वो आगे बढ़ के और भी फैल जाती है। वो दोनों तरफ फैल जाती है, दुनिया और आसमान, दोनों के बीच में रहती है।
Mantra 6
एवेदेषा पुरुतमा दृशे कं नाजामिं न परि वृणक्ति जामिम् । अरेपसा तन्वा शाशदाना नार्भादीषते न महो विभाती ॥
उषा सबसे ज़्यादा दिखाई देती है, सबको साफ नज़र आती है। वो किसी एक को पसंद नहीं करती और दूसरे को छोड़ देती है, सबके लिए बराबर है। उसका शरीर बिल्कुल साफ है, कोई दाग नहीं। वो छोटे से भी नहीं घबराती और बड़े से भी छोटी नहीं होती, हर जगह चमकती है।
Mantra 7
अभ्रातेव पुंस एति प्रतीची गर्तारुगिव सनये धनानाम् । जायेव पत्य उशती सुवासा उषा हस्रेव नि रिणीते अप्सः ॥
उषा ऐसे आती है जैसे कोई लड़की जिसका कोई भाई नहीं हो, अकेली, किसी इंसान के पास। वो ऐसे ही निकलती है जैसे कोई गड्ढे से बाहर आता है और उसके साथ धन लाता है। वो ऐसे आती है जैसे पत्नी अपने पति के पास आती है, अच्छे कपड़े पहन के। उषा मुस्कुराती है और पानी को साफ करती है, ज़िन्दगी के रास्ते के लिए।
Mantra 8
स्वसा स्वस्रे ज्यायस्यै योनिमारैगपैत्यस्याः प्रतिचक्ष्येव । व्युच्छन्ती रश्मिभिः सूर्यस्याञ्ज्यङ्क्ते समनगा इव व्राः ॥
उषा अपनी बड़ी बहन के पास जाती है, जैसे दो बहन एक दूसरे को सही में देख रही हों। वो फैलती है और सूरज की किरणों से खुद को सजाती है। वो ऐसे लगती है जैसे कोई नचने वाली है, अच्छे से सज के, रोशनी के रूप में।
Mantra 9
आसां पूर्वासामहसु स्वसॄणामपरा पूर्वामभ्येति पश्चात् । ताः प्रत्नवन्नव्यसीर्नूनमस्मे रेवदुच्छन्तु सुदिना उषासः ॥
यह सुभ की रोशनी वाली बहनें हैं। एक के बाद दूसरी आती है, पहले वाली जाती है, नयी आती है। यह सुभ पुरानी है, फिर भी हर दिन नयी लगती है। इन सुभों की यही दुआ है कि वो हमारे लिए अच्छा दिन लाएँ, खुशहाली और अच्छे दिन के साथ।
Mantra 10
प्र बोधयोषः पृणतो मघोन्यबुध्यमानाः पणयः ससन्तु । रेवदुच्छ मघवद्भ्यो मघोनि रेवत्स्तोत्रे सूनृते जारयन्ती ॥
हे उषा, जल्दी उठ और वोह लोग जगा दे जो देते हैं और खुश कर देते हैं। जो लोग नहीं देते, वोह सोये रहें, उनका काम चलता रहे। तू अमीर लोगों के लिए अमीर हो के आ। हमारी पूजा के लिए भी अमीर हो। जो हम बोलते हैं उसे ज़िन्दा कर दे।
Mantra 11
अवेयमश्वैद्युवतिः पुरस्ताद्युङ्क्ते गवामरुणानामनीकम् । वि नूनमुच्छादसति प्र केतुर्गृहंगृहमुप तिष्ठाते अग्निः ॥
देख, यह उषा आगे से आती है। वोह अपने चमकते घोड़ों को जोड़ी में जोड़ती है। अब वोह फैल के आ गयी है। एक नज़र आ रहा है कि सब जगह अग्नि उठ रहा है। हर घर में अग्नि खड़ा हो रहा है।
Mantra 12
उत्ते वयश्चिद्वसतेरपप्तन्नरश्च ये पितुभाजो व्युष्टौ । अमा सते वहसि भूरि वाममुषो देवि दाशुषे मर्त्याय ॥
जब तू उठ ती है, पक्षी भी अपने घरों से उड़ते हैं। जो लोग अपने बाप का हिस्सा लेते हैं, वोह भी उठते हैं। तू उनके साथ बहुत खुशी लेकर आती है। हे देवी उषा, जो इंसान भगवान को समर्पित करता है, उसके लिए यह तू लाती है।
Mantra 13
अस्तोढ्वं स्तोम्या ब्रह्मणा मेऽवीवृधध्वमुशतीरुषासः । युष्माकं देवीरवसा सनेम सहस्रिणं च शतिनं च वाजम् ॥
मैं तुम्हारी पूजा करता हूँ अपने शब्दों से। हे उषा, इस्से तुम भी बड़ी हो। तुम्हारी मदद से हम भी बड़े हो जायें। हमें हज़ारों और सौओं की तरक्की मिले।
Dawn’s arising is immediately linked with the ignition of Agni and the Sun’s outpouring of vast light, while Savitṛ impels beings toward their true purpose.
Uṣas is elaborated through dynamic images: she awakens, adorns, advances, and bestows—clearing the life-waters and enabling gain, movement, and auspicious activity in the world.
The hymn’s vision peaks in the sense of universal propulsion: the dawn-process aligns inner fire, solar revelation, and Savitṛ’s impulsion so that all life moves forward into right fulfillment.
The poet seals the praise with a direct request for the Dawns’ gracious help and for abundant, many-counted strength and prosperity.
urviyā jyotir aśret
uṣā hasreva
sahasriṇaṃ ca śatinaṃ ca vājam
Uṣas is Dawn, praised as a divine power who brings light, awakens beings to action, and renews the world’s order each morning.
They function as allied powers in the dawn-process: Dawn awakens the inner and outer fire (Agni), the Sun (Sūrya) rises with wide light, and Savitṛ ‘impels’ beings toward right activity and purpose.
The hymn asks for Uṣas’ protective help (avas) and for abundant vāja—strength, vitality, and prosperity—often expressed as wealth “in thousands and in hundreds.”
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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