
Sukta 1.123
This hymn celebrates Uṣas (Dawn) as the power that rises from darkness, reveals the world, and sets human life back into motion under Ṛta (cosmic order). It contrasts Night and Dawn as alternating forces, and prays that Dawn’s coming may establish in the worshipper an auspicious, right-directed will (kratu) along with abundance and generosity.
Mantra 1
पृथू रथो दक्षिणाया अयोज्यैनं देवासो अमृतासो अस्थुः । कृष्णादुदस्थादर्या विहायाश्चिकित्सन्ती मानुषाय क्षयाय ॥
दक्षिणा की रथ बहुत बड़ी है। देवता इसमें बैठे हैं जो अमर हैं। अंधेरे से वो ऊपर उठी है। वो आसमान में रहती है और लोगों के घर के लिए सोचती है।
Mantra 2
पूर्वा विश्वस्माद्भुवनादबोधि जयन्ती वाजं बृहती सनुत्री । उच्चा व्यख्यद्युवतिः पुनर्भूरोषा अगन्प्रथमा पूर्वहूतौ ॥
वो सबसे पहले जगी है। बड़ी ताकत पायी है और आगे बढ़ रही है। वो ऊपर दिखायी दी, नए रूप में। उषा आयी है, सबसे पहले, जब लोगों ने पुकारा था।
Mantra 3
यदद्य भागं विभजासि नृभ्य उषो देवि मर्त्यत्रा सुजाते । देवो नो अत्र सविता दमूना अनागसो वोचति सूर्याय ॥
जब उषा सुबह आती है और लोगों को उनका हिस्सा बाँटती है, वो एक अच्छी बेटी जैसी है। यह दुनिया में होता है जहाँ हम मरने वाले रहते हैं। तब सविता देवता हमें साफ बोलता है। वो कहता है हम कोई पाप नहीं किए। अब हम सूर्य की रोशनी लेने के लिए रेडी हैं।
Mantra 4
गृहंगृहमहना यात्यच्छा दिवेदिवे अधि नामा दधाना । सिषासन्ती द्योतना शश्वदागादग्रमग्रमिद्भजते वसूनाम् ॥
उषा सुबह एक घर से दूसरे घर जाती है। रोज आती है सीधा हमारे पास। अपना नाम लेकर आती है। वो सबको जगाती है और रोशनी देती है। बार-बार आती है। थोड़ा-थोड़ा करके खज़ाना बाँटती है। हर स्टेप पर नया खज़ाना मिलता है।
Mantra 5
भगस्य स्वसा वरुणस्य जामिरुषः सूनृते प्रथमा जरस्व । पश्चा स दघ्या यो अघस्य धाता जयेम तं दक्षिणया रथेन ॥
उषा, तुम सच बोलती हो। तुम भग की बहन हो और वरुण के रिश्तेदार हो। सबसे पहले चमक के दिखना। एक ताकत है जो हमें बुराई से बचाती है। वो ताकत हमें मिलनी चाहिए। उसे हम अपनी सही पूजा से पा लें।
Mantra 6
उदीरतां सूनृता उत्पुरंधीरुदग्नयः शुशुचानासो अस्थुः । स्पार्हा वसूनि तमसापगूळ्हाविष्कृण्वन्त्युषसो विभातीः ॥
सच्चे खयाल उठ के आएं। समझ बढ़ के आए। अग्नि की आग चमक के खड़ी हो। अंधेरे में छुपा हुआ खज़ाना था। उषा की रोशनी उसे साफ दिखा देती है। वो खज़ाना अच्छा है जो हमें मिलता है।
Mantra 7
अपान्यदेत्यभ्यन्यदेति विषुरूपे अहनी सं चरेते । परिक्षितोस्तमो अन्या गुहाकरद्यौदुषाः शोशुचता रथेन ॥
एक सुबह जाती है, दूसरी आती है। दोनों अलग-अलग दिखती हैं, साथ में चलती हैं। एक अंधेरे को गुफा बना देती है। उषा अपनी चमकती रथ से आती है। छुपी हुई चीज़ें साफ दिखती हैं।
Mantra 8
सदृशीरद्य सदृशीरिदु श्वो दीर्घं सचन्ते वरुणस्य धाम । अनवद्यास्त्रिंशतं योजनान्येकैका क्रतुं परि यन्ति सद्यः ॥
यह दिन आज भी वैसा है, कल भी वैसा होगा। यह वरुण के राज के पास जाते हैं जो बहुत दूर है। कोई गलती नहीं, हर दिन अकेले चलता है। तीस कदम एक साथ चल लेता है। जैसे किसी का इरादा पूरा हो रहा हो, वैसे यह दिन अपना काम करते हैं।
Mantra 9
जानत्यह्नः प्रथमस्य नाम शुक्रा कृष्णादजनिष्ट श्वितीची । ऋतस्य योषा न मिनाति धामाहरहर्निष्कृतमाचरन्ती ॥
यह दिन के पहले नाम को जानता है। अंधेरे से निकाल के रोशनी पैदा होती है। जैसे रात काला है, उस्से सफेद चमक निकलती है। यह रिता की लड़की है, अपना काम कम नहीं करती। हर दिन वही काम करती है, वही तरीके से। सत्य में निकलना, यही उसका काम है।
Mantra 10
कन्येव तन्वा शाशदानाँ एषि देवि देवमियक्षमाणम् । संस्मयमाना युवतिः पुरस्तादाविर्वक्षांसि कृणुषे विभाती ॥
जैसे कोई नयी दुल्हन अपना रूप दिखाती है, वैसे यह देवी भी दिखने आती है। वो भगवान के पास जाती है जो उसे देखना चाहता है। मुस्कुराती हुई, जवान, आगे चलती है। अपना दिल साफ दिखाती है, चमकती हुई आती है। जो छुपा है उसे सामने लाती है।
Mantra 11
सुसंकाशा मातृमृष्टेव योषाविस्तन्वं कृणुषे दृशे कम् । भद्रा त्वमुषो वितरं व्युच्छ न तत्ते अन्या उषसो नशन्त ॥
चमक में सुंदर, जैसे माँ ने अपनी बेटी को सजाया हो। अपना रूप दिखाने के लिए आती है। उषा, तू बड़ी अच्छी है, और चमक के दिख। तेरा जो है वो तेरा ही रहेगा, कोई और उस्से चीन नहीं सकता। तेरा अपना एक स्पेशल तोहफा है।
Mantra 12
अश्वावतीर्गोमतीर्विश्ववारा यतमाना रश्मिभिः सूर्यस्य । परा च यन्ति पुनरा च यन्ति भद्रा नाम वहमाना उषासः ॥
घोड़ो से भरी, गायो से भरी, सब अच्छी चीज़ें लाती है। सूर्य की किरण के साथ मेहनत करती है। आगे जाती है, फिर वापस आती है। भला नाम लेकर आती है, यह सुबह के दिन हैं। तेज ताकत और ग्यान लाती है हमारे पास।
Mantra 13
ऋतस्य रश्मिमनुयच्छमाना भद्रम्भद्रं क्रतुमस्मासु धेहि । उषो नो अद्य सुहवा व्युच्छास्मासु रायो मघवत्सु च स्युः ॥
उषा, सुबह की रोशनी, सच के रास्ते पर चलती है। वो हमारे अंदर अच्छा इरादा डाल दे। आज हमारे लिए चमक, जिसे बुलाना आसान हो। हमारे अंदर और देने की ताकत में खूब दौलत आए।
A grand image of emergence: the wide chariot (linked with Dakṣiṇā’s auspiciousness) and the gods mounting it as the noble Dawn rises from darkness for human dwelling.
Dawn is praised as the revealer who sets life in motion; the hymn reflects on the lawful alternation of Night and Dawn and the movement from concealment to manifestation.
The sharp contrast of the two ‘unlike in form’ days—Night making darkness a hidden cave while Dawn blazes forth on her chariot—crystallizes the hymn’s central vision of revelation.
A direct prayer: following Ṛta’s ray, may Dawn place in us an ever more auspicious kratu and establish plenitude and the power to give.
पृथू रथो दक्षिणाया अयोज्यैनं देवासो अमृतासो अस्थुः । कृष्णादुदस्थादर्या विहायाश्चिकित्सन्ती मानुषाय क्षयाय ॥अपान्यदेत्यभ्यन्यदेति विषुरूपे अहनी सं चरेते । परिक्षितोस्तमो अन्या गुहाकरद्यौदुषाः शोशुचता रथेन ॥bhadram-bhadraṃ kratum
The hymn primarily praises Uṣas (Dawn). The first verse also brings in Dakṣiṇā as an auspicious opening image connected with the right, favorable movement of the rite.
Dawn is the daily power that drives away darkness, reveals the world, and restores order. The hymn asks that this same ‘dawning’ establish right intention (kratu) and prosperity in the worshipper.
It highlights their lawful alternation: one departs as the other arrives. This contrast teaches that darkness can be a covering, while dawn is the revealing force that brings clarity, activity, and direction.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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