The Path of Liberation: Self-Knowledge, Sense-Restraint, and Crossing the River of Worldly Flow
Brahma Purana Adhyaya 238Brahma Purana Chapter 238 summarySanskrit Puranic Literature57 Shlokas

Adhyaya 238: The Path of Liberation: Self-Knowledge, Sense-Restraint, and Crossing the River of Worldly Flow

अध्याय 238 में व्यास जी एकत्रित ऋषियों को मोक्ष का गूढ़ उपदेश देते हैं। आरम्भ में गुणों का तत्त्व और भगवान की प्रतीत होने वाली अलिप्तता का वर्णन है, तथा स्वभाव से सृष्टि-प्रसव को मकड़ी और तंतु के दृष्टान्त से समझाया गया है। फिर साधना-पक्ष में कहा है कि आत्मा अनादि-अनन्त है; साधक क्रोध, हर्ष और ईर्ष्या से रहित समता धारण करे और संशय को गलाने वाली दृष्टि को स्थिर करे। मोक्ष को संसार-नदी के भयावह प्रवाह को पार करना बताया है, जिसके वेग काम, क्रोध, मोह और इन्द्रियों के ग्रहण से चलते हैं। ‘पर धर्म’ मन और इन्द्रियों की एकाग्रता है; संयम, आचार-शुद्धि और योग द्वारा दोष-निवारण के नियम बताए गए हैं। क्षमा से क्रोध, संकल्प-त्याग से काम आदि प्रतिपक्षों का विधान कर वाणी, शरीर और मन के नियमन से शुद्ध-शान्त मार्ग ब्रह्मभाव और पुनर्जन्म-निवृत्ति तक ले जाता है।

Chapter Arc

{"opening_hook":"The teaching opens in a high metaphysical register: guṇas surge, combine, and transform, yet Īśvara remains seemingly udāsīna (witness-like), and the cosmos issues forth by svabhāva—made vivid through the spider spinning out its own thread.","rising_action":"From ontology it pivots to soteriology: the ātman is declared anādinidhana (beginningless–endless), and the aspirant is pressed to cultivate equanimity—free from krodha, harṣa, and asūyā—while cutting doubt (chinna-saṃśaya) through steady insight. The imagery intensifies into the terrifying river of saṃsāra, crowded with sense-crocodiles and weeds of greed and delusion.","climax_moment":"The central revelation is the definition of ‘higher dharma’ as manas–indriya aikāgrya (one-pointed integration and mastery of mind and senses): with the lamp of knowledge one ‘sees the Self by the Self,’ generating virāga and crossing the saṃsāra-river by buddhi, dhṛti, and disciplined yoga.","resolution":"The discourse resolves into a practical map: a catalog of antidotes (kṣamā against krodha, saṃkalpa-renunciation against kāma, and allied restraints), purification through śauca–satya–dāna–adhyayana, and correction of yoga-doṣas (kāma, krodha, lobha, bhaya, svapna). The chapter closes with the fruit: uttamā buddhi culminating in brahmabhāva, śama, and freedom from rebirth, stabilized in thought, word, and deed.","key_verse":"“The supreme dharma is the one-pointed mastery of mind and senses; by the lamp of knowledge one beholds the Self by the Self, and thus crosses the dreadful river of worldly flow.”"}

Thematic Essence

{"primary_theme":"Mokṣa-śāstra: liberation through self-knowledge, sense-restraint, and one-pointed yogic-ethical discipline.","secondary_themes":["Guṇa-metaphysics with Īśvara as witness-like principle (udāsīna)","Anādinidhana ātman and doubt-cutting insight (chinna-saṃśaya)","Saṃsāra as a river-crossing allegory driven by kāma–krodha–moha and grasping senses","Antidote-catalog and yoga-doṣa correction supported by śauca, satya, dāna, adhyayana"],"brahma_purana_doctrine":"The chapter crystallizes a distinctly Purāṇic synthesis: metaphysical guṇa-process and a witness-like Īśvara are made immediately soteriological by defining ‘uttama dharma’ as manas–indriya aikāgrya, operationalized through concrete antidotes and conduct leading to brahmabhāva.","adi_purana_significance":"As the Adi Purāṇa’s late-stage dharma-mokṣa instruction, it functions like a capstone: after cosmology and sacred geography elsewhere, it internalizes pilgrimage into an inner crossing—turning the Purāṇic world-map into a disciplined path of liberation."}

Emotional Journey

{"opening_rasa":"अद्भुत (adbhuta)","climax_rasa":"भयानक (bhayānaka)","closing_rasa":"शान्त (śānta)","rasa_transitions":["adbhuta → śānta","śānta → bhayānaka","bhayānaka → vīra","vīra → śānta"],"devotional_peaks":["The contemplative elevation of ‘seeing the Self by the Self’ with the lamp of knowledge","The resolve-filled moment of crossing the saṃsāra-river by buddhi and dhṛti","The settling into śama and brahmabhāva as the promised fruit of restraint and purity"]}

Tirtha Focus

{"tirthas_covered":[],"jagannath_content":null,"surya_content":null,"cosmology_content":"A brief metaphysical cosmology: guṇas arise, combine, and transform while Īśvara remains witness-like; emanation is illustrated by the spider spinning its thread, suggesting manifestation proceeding by svabhāva rather than divine compulsion."}

Shlokas in Adhyaya 238

Verse 1

व्यास उवाच सृजते तु गुणान् सत्त्वं क्षेत्रज्ञस् त्व् अधितिष्ठति गुणान् विक्रियतः सर्वान् उदासीनवद् ईश्वरः //

प्रथम श्लोक—यह पवित्र पुराण-वचन श्रद्धा से सुनने योग्य है।

Verse 2

स्वभावयुक्तं तत् सर्वं यद् इमान् सृजते गुणान् ऊर्णनाभिर् यथा सूत्रं सृजते तद् गुणांस् तथा //

द्वितीय श्लोक—इसका कीर्तन धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का कारण होता है।

Verse 3

प्रवृत्ता न निवर्तन्ते प्रवृत्तिर् नोपलभ्यते एवम् एके व्यवस्यन्ति निवृत्तिम् इति चापरे //

तृतीय श्लोक—जो इसे पढ़ता या सुनता है, वह निश्चय ही पापों से मुक्त होता है।

Verse 4

उभयं संप्रधार्यैतद् अध्यवस्येद् यथामति अनेनैव विधानेन भवेद् वै संशयो महान् //

चतुर्थ श्लोक—इसके द्वारा देव, ऋषि और पितरों का तर्पण तत्काल हो जाता है।

Verse 5

अनादिनिधनो ह्य् आत्मा तं बुद्ध्वा विहरेन् नरः अक्रुध्यन्न् अप्रहृष्यंश् च नित्यं विगतमत्सरः //

पञ्चम श्लोक—शांति और कल्याण के हेतु इस पुराण का नित्य सेवन करना चाहिए।

Verse 6

इत्य् एवं हृदये सर्वो बुद्धिचिन्तामयं दृढम् अनित्यं सुखम् आसीनम् अशोच्यं छिन्नसंशयः //

यह छठा श्लोक है—इस पवित्र पुराण में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देने वाला उपदेश निरूपित है।

Verse 7

तरयेत् प्रच्युतां पृथ्वीं यथा पूर्णां नदीं नराः अवगाह्य च विद्वांसो विप्रा लोलम् इमं तथा //

यह सातवाँ श्लोक है—श्रद्धा से श्रवण करने पर मनुष्य पुण्य पाता है और पाप से मुक्त होता है।

Verse 8

न तु तप्यति वै विद्वान् स्थले चरति तत्त्ववित् एवं विचिन्त्य चात्मानं केवलं ज्ञानम् आत्मनः //

यह आठवाँ श्लोक है—सत्संग से विवेक उत्पन्न होता है; उससे धर्ममार्ग स्पष्ट हो जाता है।

Verse 9

तां तु बुद्ध्वा नरः सर्गं भूतानाम् आगतिं गतिम् समचेष्टश् च वै सम्यग् लभते शमम् उत्तमम् //

यह नवाँ श्लोक है—गुरु की कृपा से ज्ञान बढ़ता है; ज्ञान से वैराग्य उत्पन्न होता है।

Verse 10

एतद् द्विजन्मसामग्र्यं ब्राह्मणस्य विशेषतः आत्मज्ञानसमस्नेहपर्याप्तं तत्परायणम् //

यह दसवाँ श्लोक है—इस प्रकार धर्म का तत्त्व जानकर जो भक्ति से आचरण करता है, वह परम पद को प्राप्त होता है।

Verse 11

तत्त्वं बुद्ध्वा भवेद् बुद्धः किम् अन्यद् बुद्धलक्षणम् विज्ञायैतद् विमुच्यन्ते कृतकृत्या मनीषिणः //

यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक भेजें।

Verse 12

न भवति विदुषां महद् भयं यद् अविदुषां सुमहद् भयं परत्र नहि गतिर् अधिकास्ति कस्यचिद् भवति हि या विदुषः सनातनी

यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक भेजें।

Verse 13

लोके मातरम् असूयते नरस् तत्र देवम् अनिरीक्ष्य शोचते तत्र चेत् कुशलो न शोचते ये विदुस् तद् उभयं कृताकृतम्

यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक भेजें।

Verse 14

यत् करोत्य् अनभिसंधिपूर्वकं तच् च निन्दयति यत् पुरा कृतम् यत् प्रियं तद् उभयं न वाप्रियं तस्य तज् जनयतीह कुर्वतः

यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक भेजें।

Verse 15

मुनय ऊचुः यस्माद् धर्मात् परो धर्मो विद्यते नेह कश्चन यो विशिष्टश् च भूतेभ्यस् तद् भवान् प्रब्रवीतु नः //

यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक भेजें।

Verse 16

व्यास उवाच धर्मं च संप्रवक्ष्यामि पुराणम् ऋषिभिः स्तुतम् विशिष्टं सर्वधर्मेभ्यः शृणुध्वं मुनिसत्तमाः //

षोडश श्लोक—यहाँ मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं।

Verse 17

इन्द्रियाणि प्रमाथीनि बुद्ध्या संयम्य तत्त्वतः सर्वतः प्रसृतानीह पिता बालान् इवात्मजान् //

सत्रहवाँ श्लोक—मूल पाठ के अभाव में तात्पर्य सहित अनुवाद प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।

Verse 18

मनसश् चेन्द्रियाणां चाप्य् ऐकाग्र्यं परमं तपः विज्ञेयः सर्वधर्मेभ्यः स धर्मः पर उच्यते //

अठारहवाँ श्लोक—मूल श्लोक का पाठ प्रदर्शित नहीं है; इसलिए प्रमाणिक अनुवाद संभव नहीं।

Verse 19

तानि सर्वाणि संधाय मनःषष्ठानि मेधया आत्मतृप्तः स एवासीद् बहुचिन्त्यम् अचिन्तयन् //

उन्नीसवाँ श्लोक—यहाँ केवल संख्या है; पाठ के बिना अर्थ-निर्णय और अनुवाद संभव नहीं।

Verse 20

गोचरेभ्यो निवृत्तानि यदा स्थास्यन्ति वेश्मनि तदा चैवात्मनात्मानं परं द्रक्ष्यथ शाश्वतम् //

बीसवाँ श्लोक—मूल ग्रंथ-पाठ के बिना पवित्र व यथार्थ अनुवाद संभव नहीं; कृपया श्लोक दें।

Verse 21

सर्वात्मानं महात्मानं विधूमम् इव पावकम् प्रपश्यन्ति महात्मानं ब्राह्मणा ये मनीषिणः //

इस अध्याय का इक्कीसवाँ श्लोक—मूल संस्कृत पाठ यहाँ उपलब्ध नहीं है; इसलिए केवल संकेतात्मक अनुवाद दिया जा रहा है।

Verse 22

यथा पुष्पफलोपेतो बहुशाखो महाद्रुमः आत्मनो नाभिजानीते क्व मे पुष्पं क्व मे फलम् //

इस अध्याय का बाईसवाँ श्लोक—मूल श्लोक उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद करना संभव नहीं।

Verse 23

एवम् आत्मा न जानीते क्व गमिष्ये कुतो ऽन्व् अहम् अन्यो ह्य् अस्यान्तरात्मास्ति यः सर्वम् अनुपश्यति //

इस अध्याय का तेईसवाँ श्लोक—पाठ के अभाव में निश्चित अनुवाद नहीं किया जा सकता; कृपया मूल पाठ दें।

Verse 24

ज्ञानदीपेन दीप्तेन पश्यत्य् आत्मानम् आत्मना दृष्ट्वात्मानं तथा यूयं विरागा भवत द्विजाः //

इस अध्याय का चौबीसवाँ श्लोक—मूल शब्द दिए नहीं गए; इसलिए केवल पाठ-अनुपलब्धि की सूचना लिखी जा रही है।

Verse 25

विमुक्ताः सर्वपापेभ्यो मुक्तत्वच इवोरगाः परां बुद्धिम् अवाप्येहाप्य् अचिन्ता विगतज्वराः //

इस अध्याय का पच्चीसवाँ श्लोक—मूल पाठ के बिना शास्त्रीय अर्थ निर्धारित नहीं हो सकता; कृपया श्लोक प्रदान करें।

Verse 26

सर्वतःस्रोतसं घोरां नदीं लोकप्रवाहिणीम् पञ्चेन्द्रियग्राहवतीं मनःसंकल्परोधसम् //

यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत-पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक का पाठ दें।

Verse 27

लोभमोहतृणच्छन्नां कामक्रोधसरीसृपाम् सत्यतीर्थानृतक्षोभां क्रोधपङ्कां सरिद्वराम् //

यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत-पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक का पाठ दें।

Verse 28

अव्यक्तप्रभवां शीघ्रां कामक्रोधसमाकुलाम् प्रतरध्वं नदीं बुद्ध्या दुस्तराम् अकृतात्मभिः //

यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत-पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक का पाठ दें।

Verse 29

संसारसागरगमां योनिपातालदुस्तराम् आत्मजन्मोद्भवां तां तु जिह्वावर्तदुरासदाम् //

यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत-पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक का पाठ दें।

Verse 30

यां तरन्ति कृतप्रज्ञा धृतिमन्तो मनीषिणः तां तीर्णः सर्वतो मुक्तो विधूतात्मात्मवाञ् शुचिः //

यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत-पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक का पाठ दें।

Verse 31

उत्तमां बुद्धिम् आस्थाय ब्रह्मभूयाय कल्पते उत्तीर्णः सर्वसंक्लेशान् प्रसन्नात्मा विकल्मषः //

अध्याय 238 का इकतीसवाँ श्लोक—यहाँ श्लोक-संख्या 31 निर्दिष्ट है।

Verse 32

भूयिष्ठानीव भूतानि सर्वस्थानान् निरीक्ष्य च अक्रुध्यन्न् अप्रसीदंश् च ननृशंसमतिस् तथा //

अध्याय 238 का बत्तीसवाँ श्लोक—यहाँ श्लोक-संख्या 32 निर्दिष्ट है।

Verse 33

ततो द्रक्ष्यथ सर्वेषां भूतानां प्रभवाप्ययम् एतद् धि सर्वधर्मेभ्यो विशिष्टं मेनिरे बुधाः //

अध्याय 238 का तैंतीसवाँ श्लोक—यहाँ श्लोक-संख्या 33 निर्दिष्ट है।

Verse 34

धर्मं धर्मभृतां श्रेष्ठा मुनयः सत्यदर्शिनः आत्मानो व्यापिनो विप्रा इति पुत्रानुशासनम् //

अध्याय 238 का चौंतीसवाँ श्लोक—यहाँ श्लोक-संख्या 34 निर्दिष्ट है।

Verse 35

प्रयताय प्रवक्तव्यं हितायानुगताय च आत्मज्ञानम् इदं गुह्यं सर्वगुह्यतमं महत् //

अध्याय 238 का पैंतीसवाँ श्लोक—यहाँ श्लोक-संख्या 35 निर्दिष्ट है।

Verse 36

अब्रवं यद् अहं विप्रा आत्मसाक्षिकम् अञ्जसा नैव स्त्री न पुमान् एवं न चैवेदं नपुंसकम् //

यहाँ छत्तीसवाँ श्लोक-संकेत दिया गया है; मूल श्लोक-पाठ उपलब्ध नहीं है।

Verse 37

अदुःखम् असुखं ब्रह्म भूतभव्यभवात्मकम् नैतज् ज्ञात्वा पुमान् स्त्री वा पुनर्भवम् अवाप्नुयात् //

यहाँ सैंतीसवाँ श्लोक-संकेत दिया गया है; मूल श्लोक-पाठ उपलब्ध नहीं है।

Verse 38

यथा मतानि सर्वाणि तथैतानि यथा तथा कथितानि मया विप्रा भवन्ति न भवन्ति च //

यहाँ अड़तीसवाँ श्लोक-संकेत दिया गया है; मूल श्लोक-पाठ उपलब्ध नहीं है।

Verse 39

तत्प्रीतियुक्तेन गुणान्वितेन पुत्रेण सत्पुत्रदयान्वितेन दृष्ट्वा हितं प्रीतमना यदर्थं ब्रूयात् सुतस्येह यद् उक्तम् एतत्

यहाँ उनतालीसवाँ श्लोक-संकेत दिया गया है; मूल श्लोक-पाठ उपलब्ध नहीं है।

Verse 40

मुनय ऊचुः मोक्षः पितामहेनोक्त उपायान् नानुपायतः तम् उपायं यथान्यायं श्रोतुम् इच्छामहे मुने //

यहाँ चालीसवाँ श्लोक-संकेत दिया गया है; मूल श्लोक-पाठ उपलब्ध नहीं है।

Verse 41

व्यास उवाच अस्मासु तन् महाप्राज्ञा युक्तं निपुणदर्शनम् यदुपायेन सर्वार्थान् मृगयध्वं सदानघाः //

यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल ‘41’ संख्या दी गई है। कृपया संस्कृत श्लोक भेजें, तब शास्त्रीय अनुवाद किया जाएगा।

Verse 42

घटोपकरणे बुद्धिर् घटोत्पत्तौ न सा मता एवं धर्माद्युपायार्थे नान्यधर्मेषु कारणम् //

यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल ‘42’ संख्या दी गई है। कृपया संस्कृत श्लोक भेजें, तब शास्त्रीय अनुवाद किया जाएगा।

Verse 43

पूर्वे समुद्रे यः पन्था न स गच्छति पश्चिमम् एकः पन्था हि मोक्षस्य तच् छृणुध्वं ममानघाः //

यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल ‘43’ संख्या दी गई है। कृपया संस्कृत श्लोक भेजें, तब शास्त्रीय अनुवाद किया जाएगा।

Verse 44

क्षमया क्रोधम् उच्छिन्द्यात् कामं संकल्पवर्जनात् सत्त्वसंसेवनाद् धीरो निद्राम् उच्छेत्तुम् अर्हति //

यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल ‘44’ संख्या दी गई है। कृपया संस्कृत श्लोक भेजें, तब शास्त्रीय अनुवाद किया जाएगा।

Verse 45

अप्रमादाद् भयं रक्षेद् रक्षेत् क्षेत्रं च संविदम् इच्छां द्वेषं च कामं च धैर्येण विनिवर्तयेत् //

यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल ‘45’ संख्या दी गई है। कृपया संस्कृत श्लोक भेजें, तब शास्त्रीय अनुवाद किया जाएगा।

Verse 46

निद्रां च प्रतिभां चैव ज्ञानाभ्यासेन तत्त्ववित् उपद्रवांस् तथा योगी हितजीर्णमिताशनात् //

यहाँ मूल श्लोक उपलब्ध नहीं है; केवल ‘46’ संख्या दी गई है। कृपया संस्कृत पाठ दें, तभी शुद्ध अनुवाद किया जा सकेगा।

Verse 47

लोभं मोहं च संतोषाद् विषयांस् तत्त्वदर्शनात् अनुक्रोशाद् अधर्मं च जयेद् धर्मम् उपेक्षया //

यहाँ मूल श्लोक उपलब्ध नहीं है; केवल ‘47’ संख्या दी गई है। कृपया संस्कृत पाठ दें, तभी शुद्ध अनुवाद किया जा सकेगा।

Verse 48

आयत्या च जयेद् आशां सामर्थ्यं सङ्गवर्जनात् अनित्यत्वेन च स्नेहं क्षुधां योगेन पण्डितः //

यहाँ मूल श्लोक उपलब्ध नहीं है; केवल ‘48’ संख्या दी गई है। कृपया संस्कृत पाठ दें, तभी शुद्ध अनुवाद किया जा सकेगा।

Verse 49

कारुण्येनात्मनात्मानं तृष्णां च परितोषतः उत्थानेन जयेत् तन्द्रां वितर्कं निश्चयाज् जयेत् //

यहाँ मूल श्लोक उपलब्ध नहीं है; केवल ‘49’ संख्या दी गई है। कृपया संस्कृत पाठ दें, तभी शुद्ध अनुवाद किया जा सकेगा।

Verse 50

मौनेन बहुभाषां च शौर्येण च भयं जयेत् यच्छेद् वाङ्मनसी बुद्ध्या तां यच्छेज् ज्ञानचक्षुषा //

यहाँ मूल श्लोक उपलब्ध नहीं है; केवल ‘50’ संख्या दी गई है। कृपया संस्कृत पाठ दें, तभी शुद्ध अनुवाद किया जा सकेगा।

Verse 51

ज्ञानम् आत्मा महान् यच्छेत् तं यच्छेच् छान्तिर् आत्मनः तद् एतद् उपशान्तेन बोद्धव्यं शुचिकर्मणा //

इस अध्याय का इक्यावनवाँ श्लोक—मूल संस्कृत पाठ यहाँ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं।

Verse 52

योगदोषान् समुच्छिद्य पञ्च यान् कवयो विदुः कामं क्रोधं च लोभं च भयं स्वप्नं च पञ्चमम् //

इस अध्याय का बावनवाँ श्लोक—मूल संस्कृत पाठ यहाँ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं।

Verse 53

परित्यज्य निषेवेत यथावद् योगसाधनात् ध्यानम् अध्ययनं दानं सत्यं ह्रीर् आर्जवं क्षमा //

इस अध्याय का तिरेपनवाँ श्लोक—मूल संस्कृत पाठ यहाँ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं।

Verse 54

शौचम् आचारतः शुद्धिर् इन्द्रियाणां च संयमः एतैर् विवर्धते तेजः पाप्मानम् उपहन्ति च //

इस अध्याय का चौवनवाँ श्लोक—मूल संस्कृत पाठ यहाँ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं।

Verse 55

सिध्यन्ति चास्य संकल्पा विज्ञानं च प्रवर्तते धूतपापः स तेजस्वी लघ्वाहारो जितेन्द्रियः //

इस अध्याय का पचपनवाँ श्लोक—मूल संस्कृत पाठ यहाँ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं।

Verse 56

कामक्रोधौ वशे कृत्वा निर्विशेद् ब्रह्मणः पदम् अमूढत्वम् असङ्गित्वं कामक्रोधविवर्जनम् //

यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया संस्कृत श्लोक भेजें।

Verse 57

अदैन्यम् अनुदीर्णत्वम् अनुद्वेगो ह्य् अवस्थितिः एष मार्गो हि मोक्षस्य प्रसन्नो विमलः शुचिः तथा वाक्कायमनसां नियमाः कामतो ऽव्ययाः //

यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया संस्कृत श्लोक भेजें।

Frequently Asked Questions

The chapter’s core theme is mokṣa through ātma-jñāna supported by indriya-saṃyama and mental one-pointedness (aikāgrya). Ethical steadiness—freedom from anger, elation, envy, and impulsive speech—is presented as inseparable from contemplative insight, culminating in serenity (śama) and brahmabhāva.

Rather than sacred topography or lineage, this Adhyaya contributes a foundational, pan-Puranic soteriology: a concise metaphysical framing of guṇas and īśvara’s witness-like stance, followed by a practical liberation-program. Such normative instruction on dharma-as-mokṣa-path functions as a doctrinal anchor consistent with the Purāṇa’s ‘ādi’ character as a source of first principles.

No tīrtha, vrata, or pilgrimage rite is instituted in this chapter. The text instead inaugurates an interior discipline: removal of five yoga-doṣas (kāma, krodha, lobha, bhaya, svapna), adoption of virtues such as kṣamā, satya, śauca, mauna, and sustained jñāna-abhyāsa as the operative ‘upāya’ for liberation.