अनादिनिधनो ह्य् आत्मा तं बुद्ध्वा विहरेन् नरः अक्रुध्यन्न् अप्रहृष्यंश् च नित्यं विगतमत्सरः //
पञ्चम श्लोक—शांति और कल्याण के हेतु इस पुराण का नित्य सेवन करना चाहिए।