न तु तप्यति वै विद्वान् स्थले चरति तत्त्ववित् एवं विचिन्त्य चात्मानं केवलं ज्ञानम् आत्मनः //
यह आठवाँ श्लोक है—सत्संग से विवेक उत्पन्न होता है; उससे धर्ममार्ग स्पष्ट हो जाता है।