तानि सर्वाणि संधाय मनःषष्ठानि मेधया आत्मतृप्तः स एवासीद् बहुचिन्त्यम् अचिन्तयन् //
उन्नीसवाँ श्लोक—यहाँ केवल संख्या है; पाठ के बिना अर्थ-निर्णय और अनुवाद संभव नहीं।