विमुक्ताः सर्वपापेभ्यो मुक्तत्वच इवोरगाः परां बुद्धिम् अवाप्येहाप्य् अचिन्ता विगतज्वराः //
इस अध्याय का पच्चीसवाँ श्लोक—मूल पाठ के बिना शास्त्रीय अर्थ निर्धारित नहीं हो सकता; कृपया श्लोक प्रदान करें।