
Chapter Arc: द्रौपदी और कुन्ती विदा लेने को उठती हैं ही कि पाण्डवों के अन्तःपुर में एकाएक महान् निनाद उठता है—वन-प्रस्थान का क्षण घर-घर में शोक की लहर बनकर टूट पड़ता है। → कुन्ती अपने भाग्य-दोष को कारण मानकर आत्मग्लानि में डूबती है—‘उत्तम गुणों से युक्त पुत्रों को मैंने दुःख के लिए ही जन्म दिया।’ नगर की स्त्रियाँ कुरुओं को धिक्कारती हुई रोती हैं; धर्म, यश, वीर्य से सम्पन्न पुत्रों पर ‘दया करो’ की पुकार उठती है। → कुन्ती का विलाप चरम पर पहुँचता है—जीवन-धारण का धर्म अनित्य है, फिर भी विधाता ने मेरे जीवन का शीघ्र अन्त क्यों नहीं किया?—यह प्रश्न करुणा को तीव्रतम बना देता है और समूचे नगर का शोक एक स्वर हो जाता है। → विलाप और धिक्कार के बीच विदाई का अनिवार्य कर्म सम्पन्न होता है; पाण्डव-गृहस्थी का सुख-आश्रय टूटकर वन-मार्ग की कठोरता में बदलने लगता है। → इसी शोक-छाया में विदुर धृतराष्ट्र के महल पहुँचते हैं; उद्विग्न धृतराष्ट्र उनसे प्रश्न करते हैं—आगे राजसभा में क्या निर्णय/प्रतिक्रिया होगी, यह अगले प्रसंग पर टिका रह जाता है।
Verse 1
ऑपन--माज बछ। जि एकोनाशीतितमो< ध्याय: द्रौोपदीका कुन्तीसे विदा लेना तथा कुन्तीका विलाप एवं नगरके नर-नारियोंका शोकातुर होना वैशमग्पायन उवाच तस्मिन् सम्प्रस्थिते कृष्णा पृथां प्राप्प यशस्विनीम् । अपृच्छद् भृशदु:खार्ता याश्षान्यास्तत्र योषित:
Vaiśaṃpāyana said: When he had departed, Kṛṣṇā (Draupadī), overwhelmed by intense sorrow, approached the illustrious Pṛthā (Kuntī). She questioned her, and so too did the other women present there—grief-stricken—seeking words and meaning amid the calamity.
Verse 2
यथाहं वन्दनाश्लेषान् कृत्वा गन्तुमियेष सा । ततो निनाद: सुमहान् पाण्डवान्तःपुरेडभवत्
Vaiśaṃpāyana said: “Just as I had finished offering salutations and embraces and she was about to depart, a very great uproar arose within the Pāṇḍavas’ inner apartments.”
Verse 3
वैशम्पायनजी कहते हैं--युधिष्ठिरके प्रस्थान करनेपर कृष्णाने यशस्विनी कुन्तीके पास जाकर अत्यन्त दुःखसे आतुर हो वनमें जानेकी आज्ञा माँगी। वहाँ जो दूसरी स्त्रियाँ बैठी थीं, उन सबकी यथायोग्य वन्दना करके सबसे गले मिलकर उसने वनमें जानेकी इच्छा प्रकट की। फिर तो पाण्डवोंके अन्तःपुरमें महान् आर्तनाद होने लगा ।। कुन्ती च भृशसंतप्ता द्रौपदी प्रेक्ष्य गच्छतीम् । शोकविद्दलया वाचा कृच्छाद् वचनमत्रवीत्,द्रौपदीको जाती देख कुन्ती अत्यन्त संतप्त हो उठीं और शोकाकुल वाणीद्वारा बड़ी कठिनाईसे इस प्रकार बोलीं--
Vaiśampāyana said: When Yudhiṣṭhira set out, Kṛṣṇā (Draupadī), famed and noble, approached Kuntī in deep distress and begged permission to depart for the forest. In the women’s quarters, she duly saluted the other ladies seated there, embraced them all, and declared her resolve to go to the woods. Then a great wail of lamentation arose throughout the Pāṇḍavas’ inner apartments. And Kuntī, grievously afflicted, seeing Draupadī leaving, spoke with a voice broken by sorrow, forcing out her words with difficulty.
Verse 4
वत्से शोको न ते कार्य: प्राप्येदं व्यसनं महत् । स्त्रीधर्माणामभिज्ञासि शीलाचारवती तथा,“बेटी! इस महान् संकटको पाकर तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये। तुम स्त्रीके धर्मोंको जानती हो, शील और सदाचारका पालन करनेवाली हो
“Daughter, you should not give way to grief, even after meeting with this great calamity. You understand the duties proper to women, and you are one who upholds good character and right conduct as well.”
Verse 5
नत्वां संदेष्टमहामि है [ प्रति शुचिस्मिते । साध्वीगुणसमापतन्ना भूषितं ते कुलद्धयम्,“पवित्र मुसकानवाली बहू! इसीलिये पतियोंके प्रति तुम्हारा कया कर्तव्य है, यह तुम्हें बतानेकी आवश्यकता मैं नहीं समझती। तुम सती स्त्रियोंके सदगुणोंसे सम्पन्न हो; तुमने पति और पिता--दोनोंके कुलोंकी शोभा बढ़ायी है
Vaiśaṃpāyana said: “O woman of pure, gentle smile, I do not think it necessary here to instruct you about what your duty is toward your husbands. You are endowed with the virtues of chaste and noble women; you have brought honor and adornment to both lineages—your father’s family and your husband’s.”
Verse 6
सभाग्या: कुरवश्चेमे ये न दग्धास्त्वयानघे । अरिएं व्रज पन्थानं मदनुध्यानबृंहिता,“निष्पाप द्रौपदी! ये कौरव बड़े भाग्यशाली हैं, जिन्हें तुमने अपनी क्रोधाग्निसे जलाकर भस्म नहीं कर दिया। जाओ, तुम्हारा मार्ग विध्न-बाधाओंसे रहित हो; मेरे किये हुए शुभ चिन्तनसे तुम्हारा अभ्युदय हो
Vaiśaṃpāyana said: “O blameless Draupadī, these Kurus are indeed fortunate—those whom you have not burned to ashes with the fire of your wrath. Go on your way; may your path be free from obstacles, and may your welfare be strengthened by my auspicious contemplation and blessing.”
Verse 7
भाविन्यर्थ हि सत्स्त्रीणां वैकृतं नोपजायते । गुरुधर्माभिगुप्ता च श्रेय: क्षिप्रमवाप्स्यसि,“जो बात अवश्य होनेवाली है उसके होनेपर साध्वी स्त्रियोंके मनमें व्याकुलता नहीं होती। तुम अपने श्रेष्ठ धर्मसे सुरक्षित रहकर शीघ्र ही कल्याण प्राप्त करोगी
“When what must inevitably come to pass does come to pass, no agitation arises in the hearts of virtuous women. Guarded by your higher dharma, you will swiftly attain well-being.”
Verse 8
सहदेवद्न मे पुत्र: सदावेक्ष्यो वने वसन् । यथेदं व्यसन प्राप्प नायं सीदेन्महामति:,“बेटी! वनमें रहते हुए मेरे पुत्र सहदेवकी तुम सदा देखभाल रखना, जिससे यह परम बुद्धिमान सहदेव इस भारी संकटमें पड़कर दुःखी न होने पावे”
“My son Sahadeva, living in the forest, must be looked after by you at all times, so that, having fallen into this calamity, that great-minded one may not sink into grief.”
Verse 9
तथेत्युक्त्वा तु सा देवी ख्रवन्नेत्रजलाविला । शोणिताक्तैकवसना मुक्तकेशी विनिर्ययौ,कुन्तीके ऐसा कहनेपर नेत्रोंसे आँसू बहाती हुई द्रौपदीने “तथास्तुट कहकर उनकी आज्ञा शिरोधार्य की। उस समय उसके शरीरपर एक ही वस्त्र था, उसका भी कुछ भाग रजसे सना हुआ था और उसके सिरके बाल बिखरे हुए थे। उसी दशामें वह अन्तःपुरसे बाहर निकली
“So be it,” said the noble lady. With tears streaming from her eyes, she went out—wearing only a single garment, stained with blood, and with her hair loosened and dishevelled—emerging from the inner apartments in that very condition.
Verse 10
तां क्रोशन्ती पृथा दुःखादनुवब्राज गच्छतीम् । अथापश्यत् सुतान् सर्वान् हृताभरणवासस:,रोती-बिलखती, वनको जाती हुई द्रौपदीके पीछे-पीछे कुन्ती भी दुःखसे व्याकुल हो कुछ दूरतक गयीं, इतनेहीमें उन्होंने अपने सभी पुत्रोंको देखा, जिनके वस्त्र और आभूषण उतार लिये गये थे
As Draupadī went on, crying out in anguish, Pṛthā (Kuntī), overwhelmed by grief, followed after her for some distance. Then she saw all her sons—stripped of their garments and ornaments—an image of humiliation that signals the collapse of royal dignity and the moral disorder unleashed in the assembly.
Verse 11
रुरुचर्मावृततनून् हिया किंचिदवाड्मुखान् । परै: परीतान् संहृष्टे: सुहृद्धिश्चानुशोचितान्,उनके सभी अंग मृगचर्मसे ढँके हुए थे और वे लज्जावश नीचे मुख किये चले जा रहे थे। हर्षमें भरे हुए शत्रुओंने उन्हें सब ओरसे घेर रखा था और हितैषी सुहृद् उनके लिये शोक कर रहे थे
Vaiśaṃpāyana said: Covered in deerskins, their bodies wrapped over, they moved along with faces lowered in shame. Exultant enemies hemmed them in on every side, while their well-wishing friends looked on with grief. The scene lays bare the moral wound of humiliation—how triumph without restraint becomes cruelty, and how the dishonoured are made to bear a public spectacle.
Verse 12
तदवस्थान् सुतान् सर्वानिपसृत्यातिवत्सला । स्वजमानावदच्छोकातू् तत्तद् विलपती बहु,उस अवस्थामें उन सभी पुत्रोंके निकट पहुँचकर कुन्तीके हृदयमें अत्यन्त वात्सल्य उमड़ आया। वे उन्हें हृदयसे लगाकर शोकवश बहुत विलाप करती हुई बोलीं
Seeing her sons in that condition, Kuntī—overwhelmed by intense motherly affection—went close to them. Embracing them to her heart, she spoke through grief, lamenting again and again. The passage foregrounds the ethical tension between royal duty and the irrepressible compassion of a mother confronted with her children’s suffering.
Verse 13
कुन्त्युवाच कथं सद्धर्मचारित्रान् वृत्तस्थितिविभूषितान् | अक्षुद्रान् दृ्भक्तांश्व दैवतेज्यापरान् सदा,कुन्तीने कहा--पुत्रो! तुम उत्तम धर्मका पालन करनेवाले तथा सदाचारकी मर्यादासे विभूषित हो। तुममें क्षुद्रणाका अभाव है। तुम भगवानके सुदृढ़ भक्त और देवाराधनमें सदा तत्पर रहनेवाले हो, तो भी तुम्हारे ऊपर यह विपत्तिका पहाड़ टूट पड़ा है। विधाताका यह कैसा विपरीत विधान है। किसके अनिष्टचिन्तनसे तुम्हारे ऊपर यह महान् दुःख आया है, यह बुद्धिसे बार-बार विचार करनेपर भी मुझे कुछ सूझ नहीं पड़ता
Kuntī said: “How is it that you—who live by true dharma, adorned with the discipline and dignity of right conduct and steady character; who are free from pettiness; who are firm devotees of the Divine and ever intent on worship—have nevertheless been struck by this mountain of calamity? What kind of perverse ordinance of the Disposer is this? Even when I reflect again and again, I cannot discern whose ill-will could have brought upon you such great suffering.”
Verse 14
व्यसनं व: समभ्यागात् को<यं विधिविपर्यय: । कस्यापध्यानजं चेदं घिया पश्यामि नैव तत्,कुन्तीने कहा--पुत्रो! तुम उत्तम धर्मका पालन करनेवाले तथा सदाचारकी मर्यादासे विभूषित हो। तुममें क्षुद्रणाका अभाव है। तुम भगवानके सुदृढ़ भक्त और देवाराधनमें सदा तत्पर रहनेवाले हो, तो भी तुम्हारे ऊपर यह विपत्तिका पहाड़ टूट पड़ा है। विधाताका यह कैसा विपरीत विधान है। किसके अनिष्टचिन्तनसे तुम्हारे ऊपर यह महान् दुःख आया है, यह बुद्धिसे बार-बार विचार करनेपर भी मुझे कुछ सूझ नहीं पड़ता
Vaiśaṃpāyana said: “A calamity has befallen you. What is this reversal of fate? And if this suffering has arisen from someone’s hostile brooding or ill-will, I cannot discern whose it is—though I search for it with my understanding.”
Verse 15
स्यात् तु मद्धाग्यदोषो<5यं याहं युष्मानजीजनम् । दुःखायासभुजो व्यर्थ युक्तानप्युत्तमैर्गुणै:,यह मेरे ही भाग्यका दोष हो सकता है। तुम तो उत्तम गुणोंसे युक्त हो तो भी अत्यन्त दुःख और कष्ट भोगनेके लिये ही मैंने तुम्हें जन्म दिया है
This may indeed be a fault of my own destiny—that I gave birth to you. Though you are endowed with the highest virtues, it seems I have brought you forth only for the futile lot of enduring sorrow and hardship.
Verse 16
कथं वत्स्यथ दुर्गेषु वने ऋद्धिविनाकृता: । वीर्यसत्त्वबलोत्साहतेजोभिरकृशा: कृशा:,इस प्रकार सम्पत्तिसे वंचित होकर तुम वनके दुर्गम स्थानोंमें कैसे रह सकोगे? वीर्य, धैर्य, बल, उत्साह और तेजसे परिपुष्ट होते हुए भी तुम दुर्बल हो
Vaiśaṃpāyana said: “How will you live in the forest’s difficult, perilous tracts, stripped of prosperity? Though you are endowed with valor, steadfastness, strength, enthusiasm, and splendor, you will still be reduced to hardship and want.”
Verse 17
यद्येतदेवमज्ञास्यं वने वासो हि वो ध्रुवम् | शतशड्जान्मृते पाण्डौ नागमिष्यं गजाह्नयम्,यदि मैं यह जानती कि नगरमें आनेपर तुम्हें निश्चय ही वनवासका कष्ट भोगना पड़ेगा तो महाराज पाण्डुके परलोकवासी हो जानेपर शतशंगपुरसे हस्तिनापुर नहीं आती
Vaiśaṃpāyana said: “Had I known that things would turn out thus—that your coming to the city would surely end in exile to the forest—I would not have come to Gajāhvaya (Hastināpura) from Śataśṛṅga after King Pāṇḍu had died.”
Verse 18
धन्यं व: पितरं मन्ये तपोमेधान्वितं तथा । यः पुत्राधिमसम्प्राप्य स्वर्गेच्छामकरोत् प्रियाम्,मैं तो तुम्हारे तपस्वी एवं मेधावी पिताको ही धन्य मानती हूँ, जिन्होंने पुत्रोंके दुःखसे दुःखी होनेका अवसर न पाकर स्वर्गलोककी अभिलाषाको ही प्रिय समझा
Vaiśaṃpāyana said: “I deem your father truly blessed—endowed with austerity and keen intelligence—for, having attained the highest good through his sons, he did not fall into the sorrow that comes from being afflicted by his children’s suffering; instead, he held dear the aspiration for heaven.”
Verse 19
धन्यां चातीन्द्रियज्ञानामिमां प्राप्तां परां गतिम् । मन्ये तु माद्रीं धर्मज्ञां कल्याणीं सर्वथैव तु,इसी प्रकार अतीन्द्रिय ज्ञानसे सम्पन्न एवं परमगतिको प्राप्त हुई कल्याणमयी इस धर्मज्ञा माद्रीको भी सर्वथा धन्य मानती हूँ। जिसने अपने अनुराग, उत्तम बुद्धि और सदव्यवहारद्वारा मुझे भुलाकर जीवित रहनेके लिये विवश कर दिया। मुझको और जीवनके प्रति मेरी इस आसक्तिको धिक््कार है! जिसके कारण मुझे यह महान् क्लेश भोगना पड़ता है
Vaiśaṃpāyana said: “I deem her blessed—endowed with suprasensory insight and having attained the highest state. And in every way I also regard Mādrī, that auspicious knower of dharma, as truly blessed.”
Verse 20
रत्या मत्या च गत्या च ययाहमभिसन्धिता । जीवितप्रियतां महां धिड़मां संक्लेशभागिनीम्,इसी प्रकार अतीन्द्रिय ज्ञानसे सम्पन्न एवं परमगतिको प्राप्त हुई कल्याणमयी इस धर्मज्ञा माद्रीको भी सर्वथा धन्य मानती हूँ। जिसने अपने अनुराग, उत्तम बुद्धि और सदव्यवहारद्वारा मुझे भुलाकर जीवित रहनेके लिये विवश कर दिया। मुझको और जीवनके प्रति मेरी इस आसक्तिको धिक््कार है! जिसके कारण मुझे यह महान् क्लेश भोगना पड़ता है
Vaiśaṃpāyana said: “By her affection, her discernment, and her noble conduct, she so influenced me that I was constrained to go on living, forgetting my own resolve. Fie upon this great attachment to life in me—this share in suffering—because of which I must endure such heavy anguish.”
Verse 21
पुत्रका न विहास्ये व: कृच्छूलब्धान् प्रियान् सतः । साहं यास्यामि हि वनं हा कृष्णे किं जहासि माम्
“My children, I will not abandon you—my beloved ones, obtained only after hardship and long striving. I myself will indeed go to the forest. Alas, O Kṛṣṇā, why do you forsake me?”
Verse 22
पुत्रो! तुम सदाचारी और मेरे लिये प्राणोंसे भी अधिक प्यारे हो। मैंने बड़े कष्टसे तुम्हें पाया है; अतः तुम्हें छोड़कर अलग नहीं रहूँगी। मैं भी तुम्हारे साथ वनमें चलूँगी। हाय कृष्णे! तुम क्यों मुझे छोड़े जाती हो? ।। अन्तवत्यसुधर्मेडस्मिन् धात्रा कि नु प्रमादतः । ममान्तो नैव विहितस्तेनायुर्न जहाति माम्
“My son! You are virtuous and dearer to me than life itself. I obtained you only through great hardship; therefore I will not live apart from you. I too will go to the forest with you. Alas, O Kṛṣṇā, why do you leave me? In this perishable world, has the Creator, through some inadvertence, failed to appoint an end for me? For my death has not been ordained—therefore my life does not leave me.”
Verse 23
यह प्राणधारणरूपी धर्म अनित्य है, एक-न-एक दिन इसका अन्त होना निश्चित है, फिर भी विधाताने न जाने क्यों प्रमादवश मेरे जीवनका भी शीघ्र ही अन्त नहीं नियत कर दिया। तभी तो आयु मुझे छोड़ नहीं रही है ।। हा कृष्ण द्वारकावासिन् क्वासि संकर्षणानुज । कस्मान्न त्रायसे दुःखान्मां चेमांश्व॒ नरोत्तमान्,हा द्वारकावासी श्रीकृष्ण! तुम कहाँ हो! बलरामजीके छोटे भैया! मुझको तथा इन नरश्रेष्ठ पाण्डवोंको इस दुःखसे क्यों नहीं बचाते?
“This dharma of sustaining life is impermanent; one day it must surely end. Yet I know not why the Ordainer, through some negligence, did not appoint a swift end even for my life; therefore my span does not leave me. Alas, O Kṛṣṇa, dweller of Dvārakā—where are you? O younger brother of Saṅkarṣaṇa (Balarāma), why do you not rescue me, and these best of men, the Pāṇḍavas, from this sorrow?”
Verse 24
अनादिनिधन ये त्वामनुध्यायन्ति वै नरा: । तांस्त्वं पासीत्ययं वाद: स गतो व्यर्थतां कथम्,'प्रभो! तुम आदि-अन्तसे रहित हो, जो मनुष्य तुम्हारा निरन्तर स्मरण करते हैं, उन्हें तुम अवश्य संकटसे बचाते हो। तुम्हारी यह विरद व्यर्थ कैसे हो रही है?
Vaiśaṃpāyana said: “O Lord, you are without beginning or end. Those people who continually meditate upon you are surely protected by you in times of peril. How, then, can this proclaimed vow of yours have come to seem futile?”
Verse 25
इमे सद्धर्ममाहात्म्ययशोवीर्यनिवर्तिन: । नाहन्ति व्यसन भोक्तुं नन्वेषां क्रियतां दया,ये मेरे पुत्र उत्तम धर्म, महात्मा पुरुषोंके शील-स्वभाव, यश और पराक्रमका अनुसरण करनेवाले हैं, अतः कष्ट भोगनेके योग्य नहीं हैं; भगवन्! इनपर तो दया करो
Vaiśaṃpāyana said: “These (my sons) are followers of the noble path—guided by the greatness of true dharma, and by the conduct, fame, and valor of high-souled men. They do not deserve to suffer calamity. Therefore, O revered one, show them compassion.”
Verse 26
सेयं नीत्यर्थविज्ञेषु भीष्मद्रोणकृपादिषु । स्थितेषु कुलनाथेषु कथमापदुपागता,नीतिके अर्थको जाननेवाले परम विद्वान् भीष्म, द्रोण और कृपाचार्य आदिके, जो इस कुलके रक्षक हैं, उनके रहते हुए यह विपत्ति हमपर क्यों आयी?
Vaiśaṃpāyana said: “How has this calamity come upon us, when Bhīṣma, Droṇa, Kṛpa and the others—men supremely learned in polity and in the aims of life—stand present as the guardians and lords of our lineage?”
Verse 27
हा पाण्डो हा महाराज क्वासि किं समुपेक्षसे । पुत्रान् विवास्यत: साधूनरिभिर्यूतनिर्जितान्,हा महाराज पाण्ड! कहाँ हो? आज तुम्हारे श्रेष्ठ पुत्रोंको शत्रुओंने जूएमें जीतकर वनवास दे दिया है, तुम क्यों इनकी दुरवस्थाकी उपेक्षा कर रहे हो?
‘Alas, Pāṇḍu! Alas, O great king—where are you? Why do you remain indifferent? Your noble sons have been defeated by enemies in the gambling match and are being driven into exile; why do you overlook their suffering?’
Verse 28
सहदेव निवर्तस्व ननु त्वमसि मे प्रिय: । शरीरादपि माद्रेय मा मा त्याक्षी: कुपुत्रवत्,माद्रीनन्दन सहदेव! तुम मुझे अपने शरीरसे भी अधिक प्रिय हो। बेटा! लौट आओ। कुपुत्रकी भाँति मेरा त्याग न करो
Vaiśaṃpāyana said: “Sahadeva, turn back. Surely you are dear to me—dearer even than my own body, O son of Mādrī. Do not abandon me like an unfilial son.”
Verse 29
व्रजन्तु भ्रातरस्तेडमी यदि सत्याभिसंधिन: । मत्परित्राणजं धर्ममिहैव त्वमवाप्नरुहि,तुम्हारे ये भाई यदि सत्यधर्मके पालनका आग्रह रखकर वनमें जा रहे हैं तो जाय; तुम यहीं रहकर मेरी रक्षाजनित धर्मका लाभ लो
Vaiśaṃpāyana said: “Let these brothers of yours depart, if they are truly resolved upon truth. But you—remain here and obtain, right here, the merit of dharma that arises from protecting me.”
Verse 30
वैशम्पायन उवाच एवं विलपतीं कुन्तीमभिवाद्य प्रणम्प च । पाण्डवा विगतानन्दा वनायैव प्रवव्रजु:,वैशम्पायनजी कहते हैं--इस प्रकार विलाप करती हुई माता कुन्तीको अभिवादन एवं प्रणाम करके पाण्डवलोग दुःखी हो वनको चले गये
Vaiśampāyana said: Having saluted and bowed to Kuntī as she lamented thus, the Pāṇḍavas—bereft of joy—set out alone for the forest.
Verse 31
विदुरश्चापि तामार्ता कुन्तीमाश्चास्य हेतुभि: । प्रावेशयद् गृहं क्षत्ता स्वयमार्ततर: शनै:,विदुरजी शोकाकुला कुन्तीको अनेक प्रकारकी युक्तियोंद्वारा धीरज बँँधाकर उन्हें धीरे- धीरे अपने घर ले गये। उस समय वे स्वयं भी बहुत दुःखी थे
Vaiśampāyana said: Vidura too, seeing Kuntī overwhelmed with grief, consoled her with many reasoned words and gently led her into his house. Yet he himself was even more distressed, moving slowly under the weight of sorrow.
Verse 32
४४ 3 »! है ७ /॥ ता | हा | का ॥ जनाः समस्तास्तं द्रष्टूं समारुरुहुरातुरा: ।। ततः प्रासादवर्याणि विमानशिखराणि च । गोपुराणि च सर्वाणि वृक्षानन्यांश्व॒ सर्वशः ।। अधिरुह्य जन: श्रीमानुदासीनो व्यलोकयत् । तदनन्तर धर्मराज युधिष्ठिर जब वनकी ओर प्रस्थित हुए, तब उस नगरके समस्त निवासी दुःखसे आतुर हो उन्हें देखनेके लिये महलों, मकानकी छतों, समस्त गोपुरों और वृक्षोंपर चढ़ गये। वहाँसे सब लोग उदास होकर उन्हें देखने लगे। न हि रथ्यास्ततः शक््या गन्तुं बहुजनाकुला: ।। आरह्दा ते सम तान्यत्र दीना: पश्यन्ति पाण्डवम् । उस समय सड़कें मनुष्योंकी भारी भीड़से इतनी भर गयी थीं कि उनपर चलना असम्भव हो गया था। इसीलिये लोग ऊँचे चढ़कर अत्यन्त दीनभावसे पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरको देख रहे थे ।। पदातिं वर्जितच्छत्र॑ं चेलभूषणवर्जितम् ।। वल्कलाजिनसंवीतं पार्थ दृष्टवा जनास्तदा । ऊचुर्बहुविधा वाचो भूशोपहतचेतस: ।। कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर छत्ररहित एवं पैदल ही चल रहे थे। उनके शरीरपर राजोचित वस्त्रों और आभूषणोंका भी अभाव था। वे वल्कल और मृगचर्म पहने हुए थे। उन्हें इस दशामें देखकर लोगोंके हृदयमें गहरी चोट पहुँची और वे सब लोग नाना प्रकारकी बातें करने लगे। जना ऊचु. यं यान्तमनुयाति सम चतुरजड्भगबलं महत् | तमेवं कृष्णया सार्धमनुयान्ति सम पाण्डवा: ।। चत्वारो भ्रातरश्नैव पुरोधाश्व विशाम्पतिम् । नगरनिवासी मनुष्य बोले--अहो! यात्रा करते समय जिनके पीछे विशाल चतुरंगिणी सेना चलती थी, आज वे ही राजा युधिष्ठिर इस प्रकार जा रहे हैं और उनके पीछे द्रौपदीके साथ केवल चार भाई पाण्डव तथा पुरोहित चल रहे हैं। या न शक््या पुरा द्रष्टं भूतेराकाशगैरपि ।। तामद्य कृष्णां पश्यन्ति राजमार्गगता जना: । जिसे आजसे पहले आकाशचारी प्राणीतक नहीं देख पाते थे, उसी द्रुपदकुमारी कृष्णाको अब सड़कपर चलनेवाले साधारण लोग भी देख रहे हैं। अड्डरागोचितां कृष्णां रक्तचन्दनसेविनीम् ।। वर्षमुष्णं च शीतं च नेष्यत्याशु विवर्णताम् | सुकुमारी द्रौपदीके अंगोंमें दिव्य अंगराग शोभा पाता था। वह लाल चन्दनका सेवन करती थी, परंतु अब वनमें सर्दी, गर्मी और वर्षा लगनेसे उसकी अंगकान्ति शीघ्र ही फीकी पड़ जायगी। अद्य नूनं पृथा देवी सत्त्वमाविश्य भाषते ।। पुत्रान् स्तुषां च देवी तु द्रष्टमद्याथ नाहति ।। निश्चय ही आज कुन्तीदेवी बड़े भारी धैर्यका आश्रय लेकर अपने पुत्रों और पुत्रवधूसे वार्तालाप करती हैं; अन्यथा इस दशामें वे इनकी ओर देख भी नहीं सकतीं। निर्गुणस्यापि पुत्रस्य कथं स्याद् दु:खदर्शनम् । किं पुनर्यस्थ लोको<यं जितो वृत्तेन केवलम् ।। गुणहीन पुत्रका भी दुःख मातासे कैसे देखा जायगा; फिर जिस पुत्रके सदाचारमात्रसे यह सारा संसार वशीभूत हो जाता है, उसपर कोई दुःख आये तो उसकी माता वह कैसे देख सकती है? आनुृशंस्यमनुक्रोशो धृति: शीलं दम: शम: । पाण्डवं शोभयन्त्येते षड् गुणा: पुरुषोत्तमम् ।। तस्मात् तस्योपघातेन प्रजा: परमपीडिता: । पुरुषरत्न पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरको कोमलता, दया, धैर्य, शील, इन्द्रियसंयम और मनोनिग्रह--ये छः सदगुण सुशोभित करते हैं। अतः उनकी हानिसे आज सारी प्रजाको बड़ी पीड़ा हो रही है। आऔदकानीव सन्त्वानि ग्रीष्मे सलिलसंक्षयात् ।। पीडया पीडितं सर्व जगत् तस्य जगत्पते: । मूलस्यैवोपघातेन वृक्ष: पुष्पफलोपग: ।। जैसे गर्मीमें जलाशयका पानी घट जानेसे जलचर जीव-जन्तु व्यथित हो उठते हैं एवं जड़ कट जानेसे फल और फूलोंसे युक्त वृक्ष सूखने लगता है, उसी प्रकार सम्पूर्ण जगत्के पालक महाराज युधिष्ठिरकी पीड़ासे सारा संसार पीड़ित हो गया है। मूलं होष मनुष्याणां धर्मराजो महाद्युति: । पुष्पं फलं च पत्रं च शाखास्तस्येतरे जना: ।। ते भ्रातर इव क्षिप्रं सपुत्रा: सहबान्धवा: । गच्छन्तमनुगच्छामो येन गच्छति पाण्डव: ।। महातेजस्वी धर्मराज युधिष्छिर मनुष्योंके मूल हैं। जगत्के दूसरे लोग उन्हींकी शाखा, पत्र, पुष्प और फल हैं। आज हम अपने पुत्रों और भाई-बन्धुओंको साथ लेकर चारों भाई पाण्डवोंकी भाँति शीघ्र उसी मार्गसे उनके पीछे-पीछे चलें, जिससे पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर जा रहे हैं। उद्यानानि परित्यज्य क्षेत्राणि च गृहाणि च । एकदु:खसुखा: पार्थमनुयाम सुधार्मिकम् ।। आज हम अपने खेत, बाग-बगीचे और घर-द्वार छोड़कर परम धर्मात्मा कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरके साथ चल दें और उन्हींके सुख-दुःखको अपना सुख-दुःख समझें। समुद्धृतनिधानानि परिध्वस्ताजिराणि च | उपात्तधनधान्यानि हृतसाराणि सर्वश: ।। रजसाप्यवकीर्णानि परित्यक्तानि दैवतै: । मूषकै: परिधावद्धिरुद्धिलैरावृतानि च ।। अपेतोदकधूमानि हीनसम्मार्जनानि च | प्रणष्टबलिकर्मेज्यामन्त्रहोमजपानि च ।। दुष्कालेनेव भग्नानि भिन्नभाजनवन्ति च । अस्मत्त्यक्तानि वेश्मानि सौबल: प्रतिपद्यताम् ।। हम अपने घरोंकी गड़ी हुई निधि निकाल लें। आँगनकी फर्श खोद डालें। सारा धन धान्य साथ ले लें। सारी आवश्यक वस्तुएँ हटा लें। इनमें चारों ओर धूल भर जाय। देवता इन घरोंको छोड़कर भाग जायाँ। चूहे बिलसे बाहर निकलकर इनमें चारों ओर दौड़ लगाने लगें। इनमें न कभी आग जले, न पानी रहे और न झाड़ू ही लगे। यहाँ बलिवैश्वदेव, यज्ञ, मन्त्रपाठ, होम और जप बंद हो जाय। मानो बड़ा भारी अकाल पड़ गया हो, इस प्रकार ये सारे घर ढह जायाँ। इनमें टूटे बर्तन बिखरे पड़े हों और हम सदाके लिये इन्हें छोड़ दें--ऐसी दशामें इन घरोंपर कपटी सुबलपुत्र शकुनि आकर अधिकार कर ले। वनं नगरमपद्यास्तु यत्र गच्छन्ति पाण्डवा: | अस्माभिश्न परित्यक्तं पुरं सम्पद्यतां वनम् ।। अब जहाँ पाण्डव जा रहे हैं, वह वन ही नगर हो जाय और हमारे छोड़ देनेपर यह नगर ही वनके रूपमें परिणत हो जाय। बिलानि दंष्टिण: सर्वे वनानि मृगपक्षिण: । त्यजन्त्वस्मद्धयाद् भीता गजा: सिंहा वनान्यपि ।। वनमें हमलोगोंके भयसे साँप अपने बिल छोड़कर भाग जाया, मृग और पक्षी जंगलोंको छोड़ दें तथा हाथी और सिंह भी वहाँसे दूर चले जायाँ। अनाक्रान्तं प्रपद्यन्तु सेव्यमानं त्यजन्तु च । तृणमाषफलादानां देशांस्त्यक्त्वा मृगद्धिजा: ।। वयं पार्थवने सम्यक् सह वत्स्याम निर्वृता: । हमलोग तृण (साग-पात), अन्न और फलका उपयोग करनेवाले हैं। जंगलके हिंसक पशु और पक्षी हमारे रहनेके स्थानोंको छोड़कर चले जायाँ। वे ऐसे स्थानका आश्रय लें, जहाँ हम न जायेँ और वे उन स्थानोंको छोड़ दें, जिनका हम सेवन करें। हमलोग वनमें कुन्तीपुत्रोंके साथ बड़े सुखसे रहेंगे। वैशम्पायन उवाच इत्येवं विविधा वाचो नानाजनसमीरिता: । शुश्राव पार्थ: श्रुत्वा च न विचक्रेड5स्य मानसम् ।। वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इस प्रकार भिन्न-भिन्न मनुष्योंकी कही हुई भाँति-भाँतिकी बातें युधिष्ठिरने सुनीं। सुनकर भी उनके मनमें कोई विकार नहीं आया। ततः प्रासादसंस्थास्तु समन्तादू वै गृहे गृहे । ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां चैव योषित: ।। ततः प्रासादजालानामुत्पाट्यावरणानि च । ददृशु: पाण्डवान् दीनान् रौरवाजिनवासस: ।। कृष्णां त्वदृष्टपूर्वा तां व्रजन्तीं पद्धिरेव च । एकवत्त्रां रुदन्तीं तां मुक्तकेशीं रजस्वलाम् ।। दृष्टवा तदा स्त्रिय: सर्वा विवर्णवदना भृशम् | विलप्य बहुधा मोहाद् दुःखशोकेन पीडिता: ।। हा हा धिग् धिग् धिगित्युक्त्वा नेत्रैरश्रूण्यवर्तयन् ।) तदनन्तर चारों ओर महलोंमें रहनेवाली ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शाूद्रोंकी स्त्रियाँ अपने-अपने भवनोंकी खिड़कियोंके पर्दे हटाकर दीन पाण्डवोंको देखने लगीं। सब पाण्डवोंने मृगचर्ममय वस्त्र धारण कर रखा था। उनके साथ द्रौपदी भी पैदल ही चली जा रही थी। उसे उन स्त्रियोंने पहले कभी नहीं देखा था। उसके शरीरपर एक ही वस्त्र था, केश खुले हुए थे, वह रजस्वला थी और रोती चली जा रही थी। उसे देखकर उस समय सब स्त्रियोंका मुख उदास हो गया। वे क्षोभ एवं मोहके कारण नाना प्रकारसे विलाप करती हुई दुःख-शोकसे पीड़ित हो गयीं और “हाय हाय! इन धुृतराष्ट्रपुत्रोंको बार-बार धिककार है, धिक््कार है” ऐसा कहकर नेत्रोंसे आँसू बहाने लगीं। धार्तराष्ट्रस्त्रियस्ता श्व निखिलेनोपलभ्य तत् । गमनं परिकर्ष च कृष्णाया द्यूतमण्डले
Vaiśampāyana said: When Dharmarāja Yudhiṣṭhira set out toward the forest, all the townspeople, distressed with grief, climbed up in haste just to see him—onto the finest palaces, the rooftops and lofty terraces, the city-gates and towers, and even the trees everywhere. From those heights the citizens, heavy with sorrow and inwardly detached in shock, looked on as the righteous king departed.
Verse 33
रुरुदु: सुस्वनं सर्वा विनिन्दन्त्य: कुरून् भृशम् । दध्युश्व सुचिरं काल॑ करासक्तमुखाम्बुजा:
Vaiśampāyana said: All the women wept aloud, bitterly censuring the Kurus. For a long while they remained sunk in grief, their lotus-like faces resting upon their hands—overwhelmed by sorrow and helplessness.
Verse 34
धृतराष्ट्रपुत्रोंकी स्त्रियाँ ट्रौपदीके द्यूतसभामें जाने और उसके वस्त्र खींचे जाने (एवं वनमें जाने) आदिका सारा वृत्तान्त सुनकर कौरवोंकी अत्यन्त निन््दा करती हुई फूट-फ़ूटकर रोने लगीं और अपने मुखारविन्दको हथेलीपर रखकर बहुत देरतक गहरी चिन्तामें डूबी रहीं ।। राजा च धृतराष्ट्रस्तु पुत्राणामनयं तदा । ध्यायनुद्विग्नहददयो न शान्तिमधिजग्मिवान्,उस समय अपने पुत्रोंके अन्यायका चिन्तन करके राजा धृतराष्ट्रका भी हृदय उद्विग्न हो उठा। उन्हें तनिक भी शान्ति नहीं मिली
Vaiśampāyana said: When the women of Dhṛtarāṣṭra’s sons heard the full account—how Draupadī was made to enter the gambling hall, how her garment was dragged, and how she was sent away to the forest—they bitterly condemned the Kauravas. Breaking into sobs, they sat for a long time with their faces resting on their palms, sunk in heavy anxiety. And King Dhṛtarāṣṭra too, reflecting then on the injustice of his sons, became deeply agitated at heart and found no peace.
Verse 35
स चिन्तयन्ननेकाग्र: शोकव्याकुलचेतन: । क्षत्तु: सम्प्रेषयामास शीघ्रमागम्यतामिति,चिन्तामें पड़े-पड़े उनकी एकाग्रता नष्ट हो गयी। उनका चित्त शोकसे व्याकुल हो रहा था। उन्होंने विदुरके पास संदेश भेजा कि तुम शीघ्र मेरे पास चले आओ
Vaiśampāyana said: Lost in anxious reflection, his mind no longer steady and his consciousness shaken by grief, he sent word to Vidura, the chamberlain: “Come to me at once, without delay.”
Verse 36
ततो जगाम विदुरो धृतराष्ट्रनिवेशनम् । त॑ पर्यपृच्छत् संविग्नो धृतराष्ट्री जनाधिप:
Then Vidura went to Dhṛtarāṣṭra’s residence. There the king—Dhṛtarāṣṭra’s son—anxiously questioned him, disturbed in mind.
Verse 77
|। प् | द् (0॥॥ कि ५
The provided Sanskrit text for “Sabha Parva 79.77” is corrupted/garbled and does not preserve a recoverable verse reading. Without the correct Devanāgarī text or a verified reading, a faithful translation cannot be produced.
Verse 78
इस प्रकार श्रीमह्याभारत सभापव॑के अन्तर्गत अनुद्यूतपर्वमें युधिष्ठिरका वनको प्रस्थानविषयक अठठद्ठत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ
Thus ends the seventy-eighth chapter of the Anudyūta section within the Sabha Parva of the sacred Mahabharata, describing Yudhishthira’s departure for the forest.
Verse 79
तब विदुर राजा धृतराष्ट्रके महलमें गये। उस समय महाराज धुृतराष्ट्रने अत्यन्त उद्विग्न होकर उनसे पूछा ।। इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि अनुद्यूतपर्वणि द्रौपदीकुन्तीसंवादे एकोनाशीतितमो<ध्याय:
Then Vidura went to King Dhṛtarāṣṭra’s palace. At that time, King Dhṛtarāṣṭra—deeply agitated and anxious—questioned him. Thus ends the seventy-ninth chapter in the Anudyūta section of the Sabhā Parva, in the dialogue of Draupadī and Kuntī, of the Śrī Mahābhārata.