४४ 3 »! है ७ /॥ ता | हा | का ॥ जनाः समस्तास्तं द्रष्टूं समारुरुहुरातुरा: ।। ततः प्रासादवर्याणि विमानशिखराणि च । गोपुराणि च सर्वाणि वृक्षानन्यांश्व॒ सर्वशः ।। अधिरुह्य जन: श्रीमानुदासीनो व्यलोकयत् । तदनन्तर धर्मराज युधिष्ठिर जब वनकी ओर प्रस्थित हुए, तब उस नगरके समस्त निवासी दुःखसे आतुर हो उन्हें देखनेके लिये महलों, मकानकी छतों, समस्त गोपुरों और वृक्षोंपर चढ़ गये। वहाँसे सब लोग उदास होकर उन्हें देखने लगे। न हि रथ्यास्ततः शक््या गन्तुं बहुजनाकुला: ।। आरह्दा ते सम तान्यत्र दीना: पश्यन्ति पाण्डवम् । उस समय सड़कें मनुष्योंकी भारी भीड़से इतनी भर गयी थीं कि उनपर चलना असम्भव हो गया था। इसीलिये लोग ऊँचे चढ़कर अत्यन्त दीनभावसे पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरको देख रहे थे ।। पदातिं वर्जितच्छत्र॑ं चेलभूषणवर्जितम् ।। वल्कलाजिनसंवीतं पार्थ दृष्टवा जनास्तदा । ऊचुर्बहुविधा वाचो भूशोपहतचेतस: ।। कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर छत्ररहित एवं पैदल ही चल रहे थे। उनके शरीरपर राजोचित वस्त्रों और आभूषणोंका भी अभाव था। वे वल्कल और मृगचर्म पहने हुए थे। उन्हें इस दशामें देखकर लोगोंके हृदयमें गहरी चोट पहुँची और वे सब लोग नाना प्रकारकी बातें करने लगे। जना ऊचु. यं यान्तमनुयाति सम चतुरजड्भगबलं महत् | तमेवं कृष्णया सार्धमनुयान्ति सम पाण्डवा: ।। चत्वारो भ्रातरश्नैव पुरोधाश्व विशाम्पतिम् । नगरनिवासी मनुष्य बोले--अहो! यात्रा करते समय जिनके पीछे विशाल चतुरंगिणी सेना चलती थी, आज वे ही राजा युधिष्ठिर इस प्रकार जा रहे हैं और उनके पीछे द्रौपदीके साथ केवल चार भाई पाण्डव तथा पुरोहित चल रहे हैं। या न शक््या पुरा द्रष्टं भूतेराकाशगैरपि ।। तामद्य कृष्णां पश्यन्ति राजमार्गगता जना: । जिसे आजसे पहले आकाशचारी प्राणीतक नहीं देख पाते थे, उसी द्रुपदकुमारी कृष्णाको अब सड़कपर चलनेवाले साधारण लोग भी देख रहे हैं। अड्डरागोचितां कृष्णां रक्तचन्दनसेविनीम् ।। वर्षमुष्णं च शीतं च नेष्यत्याशु विवर्णताम् | सुकुमारी द्रौपदीके अंगोंमें दिव्य अंगराग शोभा पाता था। वह लाल चन्दनका सेवन करती थी, परंतु अब वनमें सर्दी, गर्मी और वर्षा लगनेसे उसकी अंगकान्ति शीघ्र ही फीकी पड़ जायगी। अद्य नूनं पृथा देवी सत्त्वमाविश्य भाषते ।। पुत्रान् स्तुषां च देवी तु द्रष्टमद्याथ नाहति ।। निश्चय ही आज कुन्तीदेवी बड़े भारी धैर्यका आश्रय लेकर अपने पुत्रों और पुत्रवधूसे वार्तालाप करती हैं; अन्यथा इस दशामें वे इनकी ओर देख भी नहीं सकतीं। निर्गुणस्यापि पुत्रस्य कथं स्याद् दु:खदर्शनम् । किं पुनर्यस्थ लोको<यं जितो वृत्तेन केवलम् ।। गुणहीन पुत्रका भी दुःख मातासे कैसे देखा जायगा; फिर जिस पुत्रके सदाचारमात्रसे यह सारा संसार वशीभूत हो जाता है, उसपर कोई दुःख आये तो उसकी माता वह कैसे देख सकती है? आनुृशंस्यमनुक्रोशो धृति: शीलं दम: शम: । पाण्डवं शोभयन्त्येते षड् गुणा: पुरुषोत्तमम् ।। तस्मात् तस्योपघातेन प्रजा: परमपीडिता: । पुरुषरत्न पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरको कोमलता, दया, धैर्य, शील, इन्द्रियसंयम और मनोनिग्रह--ये छः सदगुण सुशोभित करते हैं। अतः उनकी हानिसे आज सारी प्रजाको बड़ी पीड़ा हो रही है। आऔदकानीव सन्त्वानि ग्रीष्मे सलिलसंक्षयात् ।। पीडया पीडितं सर्व जगत् तस्य जगत्पते: । मूलस्यैवोपघातेन वृक्ष: पुष्पफलोपग: ।। जैसे गर्मीमें जलाशयका पानी घट जानेसे जलचर जीव-जन्तु व्यथित हो उठते हैं एवं जड़ कट जानेसे फल और फूलोंसे युक्त वृक्ष सूखने लगता है, उसी प्रकार सम्पूर्ण जगत्के पालक महाराज युधिष्ठिरकी पीड़ासे सारा संसार पीड़ित हो गया है। मूलं होष मनुष्याणां धर्मराजो महाद्युति: । पुष्पं फलं च पत्रं च शाखास्तस्येतरे जना: ।। ते भ्रातर इव क्षिप्रं सपुत्रा: सहबान्धवा: । गच्छन्तमनुगच्छामो येन गच्छति पाण्डव: ।। महातेजस्वी धर्मराज युधिष्छिर मनुष्योंके मूल हैं। जगत्के दूसरे लोग उन्हींकी शाखा, पत्र, पुष्प और फल हैं। आज हम अपने पुत्रों और भाई-बन्धुओंको साथ लेकर चारों भाई पाण्डवोंकी भाँति शीघ्र उसी मार्गसे उनके पीछे-पीछे चलें, जिससे पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर जा रहे हैं। उद्यानानि परित्यज्य क्षेत्राणि च गृहाणि च । एकदु:खसुखा: पार्थमनुयाम सुधार्मिकम् ।। आज हम अपने खेत, बाग-बगीचे और घर-द्वार छोड़कर परम धर्मात्मा कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरके साथ चल दें और उन्हींके सुख-दुःखको अपना सुख-दुःख समझें। समुद्धृतनिधानानि परिध्वस्ताजिराणि च | उपात्तधनधान्यानि हृतसाराणि सर्वश: ।। रजसाप्यवकीर्णानि परित्यक्तानि दैवतै: । मूषकै: परिधावद्धिरुद्धिलैरावृतानि च ।। अपेतोदकधूमानि हीनसम्मार्जनानि च | प्रणष्टबलिकर्मेज्यामन्त्रहोमजपानि च ।। दुष्कालेनेव भग्नानि भिन्नभाजनवन्ति च । अस्मत्त्यक्तानि वेश्मानि सौबल: प्रतिपद्यताम् ।। हम अपने घरोंकी गड़ी हुई निधि निकाल लें। आँगनकी फर्श खोद डालें। सारा धन धान्य साथ ले लें। सारी आवश्यक वस्तुएँ हटा लें। इनमें चारों ओर धूल भर जाय। देवता इन घरोंको छोड़कर भाग जायाँ। चूहे बिलसे बाहर निकलकर इनमें चारों ओर दौड़ लगाने लगें। इनमें न कभी आग जले, न पानी रहे और न झाड़ू ही लगे। यहाँ बलिवैश्वदेव, यज्ञ, मन्त्रपाठ, होम और जप बंद हो जाय। मानो बड़ा भारी अकाल पड़ गया हो, इस प्रकार ये सारे घर ढह जायाँ। इनमें टूटे बर्तन बिखरे पड़े हों और हम सदाके लिये इन्हें छोड़ दें--ऐसी दशामें इन घरोंपर कपटी सुबलपुत्र शकुनि आकर अधिकार कर ले। वनं नगरमपद्यास्तु यत्र गच्छन्ति पाण्डवा: | अस्माभिश्न परित्यक्तं पुरं सम्पद्यतां वनम् ।। अब जहाँ पाण्डव जा रहे हैं, वह वन ही नगर हो जाय और हमारे छोड़ देनेपर यह नगर ही वनके रूपमें परिणत हो जाय। बिलानि दंष्टिण: सर्वे वनानि मृगपक्षिण: । त्यजन्त्वस्मद्धयाद् भीता गजा: सिंहा वनान्यपि ।। वनमें हमलोगोंके भयसे साँप अपने बिल छोड़कर भाग जाया, मृग और पक्षी जंगलोंको छोड़ दें तथा हाथी और सिंह भी वहाँसे दूर चले जायाँ। अनाक्रान्तं प्रपद्यन्तु सेव्यमानं त्यजन्तु च । तृणमाषफलादानां देशांस्त्यक्त्वा मृगद्धिजा: ।। वयं पार्थवने सम्यक् सह वत्स्याम निर्वृता: । हमलोग तृण (साग-पात), अन्न और फलका उपयोग करनेवाले हैं। जंगलके हिंसक पशु और पक्षी हमारे रहनेके स्थानोंको छोड़कर चले जायाँ। वे ऐसे स्थानका आश्रय लें, जहाँ हम न जायेँ और वे उन स्थानोंको छोड़ दें, जिनका हम सेवन करें। हमलोग वनमें कुन्तीपुत्रोंके साथ बड़े सुखसे रहेंगे। वैशम्पायन उवाच इत्येवं विविधा वाचो नानाजनसमीरिता: । शुश्राव पार्थ: श्रुत्वा च न विचक्रेड5स्य मानसम् ।। वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इस प्रकार भिन्न-भिन्न मनुष्योंकी कही हुई भाँति-भाँतिकी बातें युधिष्ठिरने सुनीं। सुनकर भी उनके मनमें कोई विकार नहीं आया। ततः प्रासादसंस्थास्तु समन्तादू वै गृहे गृहे । ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां चैव योषित: ।। ततः प्रासादजालानामुत्पाट्यावरणानि च । ददृशु: पाण्डवान् दीनान् रौरवाजिनवासस: ।। कृष्णां त्वदृष्टपूर्वा तां व्रजन्तीं पद्धिरेव च । एकवत्त्रां रुदन्तीं तां मुक्तकेशीं रजस्वलाम् ।। दृष्टवा तदा स्त्रिय: सर्वा विवर्णवदना भृशम् | विलप्य बहुधा मोहाद् दुःखशोकेन पीडिता: ।। हा हा धिग् धिग् धिगित्युक्त्वा नेत्रैरश्रूण्यवर्तयन् ।) तदनन्तर चारों ओर महलोंमें रहनेवाली ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शाूद्रोंकी स्त्रियाँ अपने-अपने भवनोंकी खिड़कियोंके पर्दे हटाकर दीन पाण्डवोंको देखने लगीं। सब पाण्डवोंने मृगचर्ममय वस्त्र धारण कर रखा था। उनके साथ द्रौपदी भी पैदल ही चली जा रही थी। उसे उन स्त्रियोंने पहले कभी नहीं देखा था। उसके शरीरपर एक ही वस्त्र था, केश खुले हुए थे, वह रजस्वला थी और रोती चली जा रही थी। उसे देखकर उस समय सब स्त्रियोंका मुख उदास हो गया। वे क्षोभ एवं मोहके कारण नाना प्रकारसे विलाप करती हुई दुःख-शोकसे पीड़ित हो गयीं और “हाय हाय! इन धुृतराष्ट्रपुत्रोंको बार-बार धिककार है, धिक््कार है” ऐसा कहकर नेत्रोंसे आँसू बहाने लगीं। धार्तराष्ट्रस्त्रियस्ता श्व निखिलेनोपलभ्य तत् । गमनं परिकर्ष च कृष्णाया द्यूतमण्डले
vaiśampāyana uvāca |
janāḥ samastās taṁ draṣṭuṁ samāruruhur āturāḥ |
tataḥ prāsādavaryāṇi vimānaśikharāṇi ca |
gopurāṇi ca sarvāṇi vṛkṣān anyāṁś ca sarvaśaḥ |
adhiruhya janaḥ śrīmān udāsīno vyalokayat ||
Vaiśampāyana said: When Dharmarāja Yudhiṣṭhira set out toward the forest, all the townspeople, distressed with grief, climbed up in haste just to see him—onto the finest palaces, the rooftops and lofty terraces, the city-gates and towers, and even the trees everywhere. From those heights the citizens, heavy with sorrow and inwardly detached in shock, looked on as the righteous king departed.
वैशम्पायन उवाच
The verse highlights how a righteous king’s fall into hardship becomes a collective moral wound for society: dharma-based leadership binds ruler and subjects, so the king’s unjust suffering is felt as public grief. It also hints at udāsīnatā—an inward stillness that can arise amid overwhelming sorrow.
As Yudhiṣṭhira departs for the forest after the dice-game calamity, the entire city rushes to see him. Unable to approach closely, people climb palaces, towers, and trees and watch silently, stricken with distress.