Adhyaya 13
Sabha ParvaAdhyaya 1356 Verses

Adhyaya 13

Jarāsandha as Obstacle to the Rājasūya — Kṛṣṇa’s Strategic Genealogical Brief (Sabhā Parva, Adhyāya 13)

Upa-parva: Rājasūyārambha Parva (Counsel on the Rājasūya and the Jarāsandha Problem)

Kṛṣṇa addresses Yudhiṣṭhira, affirming his qualifications for the rājasūya while introducing a decisive constraint: Jarāsandha’s continued dominance makes the rite unattainable. To justify this assessment, Kṛṣṇa outlines a structured survey of kṣatriya origins and political formations, then enumerates key rulers and factions aligned with, subordinated to, or intimidated by Jarāsandha. He describes Jarāsandha’s accumulation of power, the presence of notable supporters and martial associates, and the broader climate of fear that has displaced or constrained multiple polities. The discourse includes an account of the Yādavas’ earlier strategic relocation from Mathurā to Dvārakā under Magadhan pressure, emphasizing defensive statecraft and fortification. Kṛṣṇa then states the operational conclusion: if Yudhiṣṭhira seeks the rājasūya in full legitimacy, he must undertake efforts aimed at the release of captive kings and the removal of Jarāsandha’s coercive control. The chapter ends as Kṛṣṇa invites Yudhiṣṭhira’s reasoned decision on this counsel.

Chapter Arc: राजसूय करनेवाले प्राचीन राजर्षियों की महिमा और पुण्यलोक-प्राप्ति का श्रवण—युधिष्ठिर के भीतर एक महान संकल्प का अंकुर फूटता है। → सभा में युधिष्ठिर बार-बार विचार करते हैं: क्या वे कुरुश्रेष्ठ होकर भी इस महायज्ञ के योग्य हैं, और क्या यह यज्ञ धर्म की वृद्धि करेगा या अहंकार/राजनीतिक वैर को जगाएगा? वे सभासदों का सत्कार कर समर्थन का वातावरण बनाते हैं, पर निर्णायक मार्गदर्शन के लिए कृष्ण को ही उपाय मानते हैं। → मंत्रियों, भ्राताओं, ऋत्विजों और महर्षियों का एकस्वर अनुमोदन—“धर्मज्ञ! आप राजसूय के सर्वथा योग्य हैं”—और युधिष्ठिर का कृष्ण (जनार्दन) को निश्चयार्थ बुलाने का दृढ़ निर्णय। → द्वारका में कृष्ण तक संदेश पहुँचता है; सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ माने गए कृष्ण युधिष्ठिर के दर्शनाभिलाषी होकर इन्द्रसेन सहित इन्द्रप्रस्थ के लिए प्रस्थान करते हैं। → कृष्ण का आगमन निकट है—अब राजसूय की वास्तविक तैयारी, दिग्विजय/राजनीतिक समर्पण और संभावित विरोध (विशेषतः शिशुपाल आदि) की छाया आगे मंडराती है।

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ ३ “लोक मिलाकर कुल ३७३ श्लोक हैं) भस्न्यैमा+ज (2) अिमन- (राजसूयारम्भपर्व) त्रयोदशो 5 ध्याय: युधिष्ठिरका राजसूयविषयक संकल्प और उसके विषयमें भाइयों, मन्त्रियो, मुनियों तथा श्रीकृष्णसे सलाह लेना वैशम्पायन उवाच ऋषेस्तद्‌ वचन श्रुत्वा निशश्वास युधिष्ठिर: । चिन्तयन्‌ राजसूयेष्टिं न लेभे शर्म भारत,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! देवर्षि नारदका वह वचन सुनकर युधिष्िरने लंबी साँस खींची। राजसूययज्ञके सम्बन्धमें चिन्तन करते हुए उन्हें शान्ति नहीं मिली

বৈশম্পায়ন বললেন—হে ভারত (জনমেজয়)! সেই ঋষির বাক্য শুনে যুধিষ্ঠির দীর্ঘশ্বাস ফেললেন। রাজসূয় ইষ্টি সম্বন্ধে চিন্তা করতে করতে তাঁর মনে শান্তি রইল না।

Verse 2

राजर्षीणां च त॑ श्रुत्वा महिमानं महात्मनाम्‌ | यज्वनां कर्मभि: पुण्यैलोकप्राप्तिं समीक्ष्य च,राजसूययज्ञ करनेवाले महात्मा राजर्षियोंकी वैसी महिमा सुनकर तथा पुण्यकर्मोंद्वारा उत्तम लोकोंकी प्राप्ति होती देखकर एवं यज्ञ करनेवाले राजर्षि हरिश्वन्द्रका महान्‌ तेज (तथा विशेष वैभव एवं आदर-सत्कार) सुनकर उनके मनमें राजसूययज्ञ करनेकी इच्छा हुई

বৈশম্পায়ন বললেন—মহাত্মা রাজর্ষিদের মহিমা শুনে, যজ্ঞকারীদের পুণ্যকর্মে উৎকৃষ্ট লোকপ্রাপ্তি হয় তা দেখে, এবং রাজসূয় সম্পাদনকারী রাজর্ষি হরিশ্চন্দ্রের অতিবিশিষ্ট তেজ, ঐশ্বর্য ও সম্মান-সত্কারের কথা শুনে, তাঁর মনে রাজসূয় যজ্ঞ করার ইচ্ছা জাগল।

Verse 3

हरिश्नन्द्रे च राजर्षि रोचमानं विशेषत: । यज्वानं यज्ञमाहर्तु राजसूयमियेष स:,राजसूययज्ञ करनेवाले महात्मा राजर्षियोंकी वैसी महिमा सुनकर तथा पुण्यकर्मोंद्वारा उत्तम लोकोंकी प्राप्ति होती देखकर एवं यज्ञ करनेवाले राजर्षि हरिश्वन्द्रका महान्‌ तेज (तथा विशेष वैभव एवं आदर-सत्कार) सुनकर उनके मनमें राजसूययज्ञ करनेकी इच्छा हुई

বৈশম্পায়ন বললেন—বিশেষত রাজর্ষি হরিশ্চন্দ্রের দীপ্তিমান গৌরবের কথা শুনে, তিনি যজমান হয়ে রাজসূয় যজ্ঞ সম্পাদন করতে ইচ্ছা করলেন।

Verse 4

युधिष्ठटिरस्तत: सर्वानर्चयित्वा सभासद: । प्रत्यर्चितश्न तै: सर्वेर्यज्ञायैव मनो दधे,तदनन्तर युधिष्ठिरने अपने समस्त सभासदोंका सत्कार किया और उन सब सदस्योंने भी उनका बड़ा सम्मान किया। अन्तमें (सबकी सम्मतिसे) उनका मन यज्ञ करनेके ही संकल्पपर दृढ़ हो गया

তারপর যুধিষ্ঠির সভাসদ সকলকে যথোচিত সম্মান করলেন; আর সকলেই তাঁকে প্রতিসম্মানে ভূষিত করল। অতঃপর (সবার সম্মতিতে) তাঁর মন যজ্ঞানুষ্ঠানেই দৃঢ় হল।

Verse 5

स राजसूयं राजेन्द्र कुरूणामृषभस्तदा । आहर्तु प्रवर्ण चक्रे मन: संचिन्त्य चासकृत्‌,राजेन्द्र! कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिने उस समय बार-बार विचार करके राजसूययज्ञके अनुष्ठानमें ही मन लगाया

বৈশম্পায়ন বললেন—হে রাজেন্দ্র! সেই সময় কুরুদের শ্রেষ্ঠ যুধিষ্ঠির বারবার চিন্তা করে রাজসূয় যজ্ঞ সম্পাদনে মনকে প্রবৃত্ত করলেন।

Verse 6

भूयश्वाद्भुतवीर्यौजा धर्ममेवानुचिन्तयन्‌ | कि हित॑ सर्वलोकानां भवेदिति मनो दधे,हम और पराक्रमवाले धर्मराजने पुनः अपने धर्मका ही चिन्तन किया और सम्पूर्ण लोकोंका हित कैसे हो, इसी ओर वे ध्यान देने लगे

পুনরায়, আশ্চর্য বীর্য ও তেজে সমৃদ্ধ ধর্মরাজ কেবল ধর্মই চিন্তা করে মনে স্থির করলেন—“সকল লোকের মঙ্গল কীসে হবে?”

Verse 7

अनुगृह्नन्‌ प्रजा: सर्वा: सर्वधर्मभृतां वर: । अविशेषेण सर्वेषां हितं चक्रे युधिष्ठिर:,युधिष्ठिर समस्त धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ थे। वे सारी प्रजापर अनुग्रह करके सबका समानरूपसे हितसाधन करने लगे

সর্বধর্মধারীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ যুধিষ্ঠির সকল প্রজার প্রতি অনুগ্রহ প্রদর্শন করলেন এবং কোনো ভেদ না করে সবারই কল্যাণসাধনে সমভাবে প্রবৃত্ত হলেন।

Verse 8

सर्वेषां दीयतां देयं मुडचन्‌ कोपमदावुभौ । साधु धर्मेति धर्मेति नान्यच्छूयेत भाषितम्‌,क्रोध और अभिमानसे रहित होकर राजा युधिष्ठिरने अपने सेवकोंसे कह दिया कि 'देनेयोग्य वस्तुएँ सबको दी जायँ अथवा सारी जनताका पावना (ऋण) चुका दिया जाय।' उनके राज्यमें “धर्मराज! आप धन्य हैं। धर्मस्वरूप युधिष्ठिर आपको साधुवाद!” इसके सिवा और कोई बात नहीं सुनी जाती थी

ক্রোধ ও অহংকার ত্যাগ করে রাজা যুধিষ্ঠির আদেশ দিলেন—“যা দানযোগ্য, তা সকলকে দাও।” তাঁর রাজ্যে ‘সাধু! ধর্ম! ধর্ম!’—এই প্রশংসাবাক্য ছাড়া আর কিছুই শোনা যেত না।

Verse 9

एवंगते ततस्तस्मिन्‌ पितरीवाश्वसञ्जना: । न तस्य विद्यते द्वेष्ठा ततो5स्याजातशत्रुता,उनका ऐसा व्यवहार देख सारी प्रजा उनके ऊपर पिताके समान भरोसा रखने लगी। उनके प्रति द्वेष रखनेवाला कोई नहीं रहा। इसीलिये वे “अजातशत्रु' नामसे प्रसिद्ध हुए

এভাবে সব কিছু স্থির হলে প্রজারা পিতার মতোই তাঁর ওপর আস্থা রাখল। তাঁর প্রতি বিদ্বেষ পোষণকারী কেউ রইল না; তাই তিনি ‘অজাতশত্রু’ নামে খ্যাত হলেন।

Verse 10

परिग्रहान्नरेन्द्रस्य भीमस्य परिपालनात्‌ । शत्रूणां क्षपणाच्चैव बीभत्सो: सव्यसाचिन:,निकामवर्षा: स्फीताश्न आसञ्जनपदास्तथा । महाराज युधिष्ठिर सबको आत्मीयजनोंकी भाँति अपनाते, भीमसेन सबकी रक्षा करते, सव्यसाची अर्जुन शत्रुओंके संहारमें लगे रहते, बुद्धिमान्‌ सहदेव सबको धर्मका उपदेश दिया करते और नकुल स्वभावसे ही सबके साथ विनयपूर्ण बर्ताव करते थे। इससे उनके राज्यके सभी जनपद कलहशून्य, निर्भय, स्वधर्मपरायण तथा उन्नतिशील थे। वहाँ उनकी इच्छाके अनुसार समयपर वर्षा होती थी

মহারাজ যুধিষ্ঠির সকলকে আপনজনের মতো গ্রহণ করতেন; ভীমসেন প্রজার রক্ষা করতেন; সব্যসাচী অর্জুন শত্রুনাশে সদা উদ্যত থাকতেন; প্রজ্ঞাবান সহদেব অবিরত ধর্মোপদেশ দিতেন; আর নকুল স্বভাবতই সকলের সঙ্গে বিনয়পূর্ণ আচরণ করতেন। তাই তাঁদের রাজ্যের জনপদ ছিল কলহশূন্য, নির্ভয়, স্বধর্মনিষ্ঠ ও উন্নতিশীল; এবং ইচ্ছামতো ঋতুকালে যথাসময়ে বৃষ্টি হতো।

Verse 12

इस प्रकार श्रीमह्याभारत सभापवके अन्तर्गत लोकपालसभाख्यानपर्वमें पाण्डु-संदेश- कथनविषयक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ,वार्धुषी यज्ञसत्त्वानि गोरक्ष॑ कर्षणं वणिक्‌

এইভাবে শ্রীমহাভারতের সভাপর্বের অন্তর্গত লোকপালসভা-আখ্যানের মধ্যে পাণ্ডুর বার্তা-বর্ণনাবিষয়ক দ্বাদশ অধ্যায় সমাপ্ত হল। সমাপনী বাক্যগুলি সমাজধারণের স্তম্ভসমূহ স্মরণ করায়—ধন-ঋণব্যবহার, যজ্ঞসামগ্রী, গোরক্ষা, কৃষিকর্ম ও বাণিজ্য।

Verse 13

धीमत: सहदेवस्य धर्माणामनुशासनात्‌ | वैनत्यात्‌ सर्वतश्चैव नकुलस्थ स्वभावत: । अविग्रहा वीतभया: स्वधर्मनिरता: सदा,विशेषात्‌ सर्वमेवैतत्‌ संजज्ञे राजकर्मणा । अनुकर्ष च निष्कर्ष व्याधिपावकमूर्च्छनम्‌ इति श्रीमहा भारते सभापर्वणि राजसूयारम्भपर्वणि वासुदेवागमने त्रयोदशो 5 ध्याय: इस प्रकार श्रीमह्याभारत सभापवकिे अन्तर्गत राजसूयारम्भपर्वमें वायुदेवागमनविषयक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ

বৈশম্পায়ন বললেন—ধর্মবিষয়ে প্রাজ্ঞ সহদেবের শাসন ও উপদেশে, আর নকুলের জন্মগত বিনয় ও সর্বদিকের সদ্ভাবের ফলে, তারা কলহমুক্ত, ভয়শূন্য এবং সর্বদা নিজ নিজ ধর্মে নিবিষ্ট রইল। বিশেষত রাজকার্যের শৃঙ্খলা ও রাজধর্মের সুপরিচালনাই এই সামঞ্জস্য ও স্থৈর্য সৃষ্টি করেছিল। (এভাবে সভাপর্বের রাজসূয়ারম্ভপর্বে বাসুদেবাগমন-বিষয়ক ত্রয়োদশ অধ্যায় সমাপ্ত।)

Verse 14

सर्वमेव न तत्रासीद्‌ धर्मनित्ये युधिष्ठिरे । उन दिनों राजाके सुप्रबन्धसे ब्याजकी आजीविका, यज्ञकी सामग्री, गोरक्षा, खेती और व्यापार--इन सबकी विशेष उन्नति होने लगी। निर्धन प्रजाजनोंसे पिछले वर्षका बाकी कर नहीं लिया जाता था तथा चालू वर्षका कर वसूल करनेके लिये किसीको पीड़ा नहीं दी जाती थी। सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाले युधिष्ठिरके शासनकालमें रोग तथा अग्निका प्रकोप आदि कोई भी उपद्रव नहीं था | १२-१३ ह ।। दस्युभ्यो वज्चकेभ्यश्व राज्ञ: प्रति परस्परम्‌

বৈশম্পায়ন বললেন—ধর্মনিষ্ঠ যুধিষ্ঠিরের রাজ্যে কোনো বিশৃঙ্খলা ছিল না। তাঁর সুসংগঠিত শাসনে ন্যায়সঙ্গত জীবিকা ও জনকল্যাণ বৃদ্ধি পেল; যজ্ঞের উপকরণ, গোরক্ষা, কৃষি ও বাণিজ্য—সবই বিশেষভাবে উন্নত হলো। দরিদ্র প্রজাদের কাছ থেকে গত বছরের বকেয়া কর নেওয়া হতো না, আর চলতি বছরের কর আদায়ের জন্য কাউকে কষ্ট দেওয়া হতো না। সেই ধর্মশাসিত রাজ্যে রোগব্যাধি বা অগ্নিদুর্যোগের মতো উপদ্রব ছিল না; দস্যু ও প্রতারকদের ভয়ও ছিল না।

Verse 15

प्रियं कर्तुमुपस्थातुं बलिकर्म स्वकर्मजम्‌,कामतो> प्युपयुञ्जानै राजसैलों भजैर्जनै: । दूसरे राजालोग विभिन्न देशके कुलीन वैश्योंके साथ धर्मराज युधिष्ठिरका प्रिय करने, उन्हें कर देने, अपने उपार्जित धन-रत्न आदिकी भेंट देने तथा संधि-विग्रहादि छः कार्योमें राजाको सहयोग देनेके लिये उनके पास आते थे। सदा धर्ममें ही लगे रहनेवाले राजा युधिष्ठिरके शासनकालमें राजस स्वभाववाले तथा लोभी मनुष्योंद्वारा इच्छानुसार धन आदिका उपभोग किये जानेपर भी उनका देश दिनोदिन उन्नति करने लगा

বৈশম্পায়ন বললেন—ধর্মরাজ যুধিষ্ঠিরকে সন্তুষ্ট করতে ও তাঁর কাছে উপস্থিত হতে লোকেরা নিজেদের কর্মজাত নিয়ত বলি-কর নিয়ে আসত। নানা দেশের রাজারা, কুলীন বৈশ্যদের সঙ্গে, সন্ধি-বিদ্বেষ প্রভৃতি রাজকার্যের ছয় উপায়ে সহায়তা করতে, কর অর্পণ করতে এবং নিজেদের অর্জিত ধন-রত্নাদি উপহার দিতে তাঁর কাছে আসত। যদিও রজোগুণী ও লোভী লোকেরা ইচ্ছামতো ধন-ভোগ উপভোগ করত, তবু ধর্মনিষ্ঠ যুধিষ্ঠিরের শাসনে রাজ্য দিন দিন উন্নতি লাভ করল।

Verse 16

अभिहर्तु नृपा: षट्सु पृथग्‌ जात्यैश्व नैगमै: । ववृधे विषयस्तत्र धर्मनित्ये युधिषछ्ठिरे

বৈশম্পায়ন বললেন—সেখানে পৃথক পৃথক জাতির ছয় শ্রেণি এবং নানা নৈগম (শ্রেণি/নগরসমাজ) সহ রাজারা কর ও সেবা অর্পণ করতে এগিয়ে আসত। এইভাবে ধর্মনিষ্ঠ যুধিষ্ঠিরের শাসনে সেই রাজ্যের সম্পদ ও অধিকার-পরিসর ক্রমে বৃদ্ধি পেল।

Verse 17

सर्वव्यापी सर्वगुणी सर्वसाह: स सर्वराट्‌,राजा युधिष्ठिरकी ख्याति सर्वत्र फैल रही थी। सभी सदगुण उनकी शोभा बढ़ा रहे थे। वे शीत एवं उष्ण आदि सभी द्वद्धोंको सहनेमें समर्थ तथा अपने राजोचित गुणोंसे सर्वत्र सुशोभित होते थे

বৈশম্পায়ন বললেন—রাজা যুধিষ্ঠিরের খ্যাতি সর্বত্র ছড়িয়ে পড়ছিল। সকল সদ্গুণই তাঁর শোভা বৃদ্ধি করত। শীত-উষ্ণ প্রভৃতি দ্বন্দ্ব সহ্য করতে তিনি সক্ষম ছিলেন; রাজোচিত গুণে ভূষিত হয়ে তিনি সর্বত্র এক সর্বভৌম সম্রাটের মতো দীপ্তিমান ছিলেন।

Verse 18

यस्मिन्नधिकृत: सम्राड्‌ भ्राजमानो महायशा: । यत्र राजन्‌ दश दिश: पितृतो मातृतस्तथा । अनुरक्ता: प्रजा आसन्नागोपाला द्विजातय:,राजन! दसों दिशाओंमें प्रकाशित होनेवाले वे महायशस्वी सम्राट्‌ जिस देशपर अधिकार जमाते, वहाँ ग्वालोंसे लेकर ब्राह्मणोंतक सारी प्रजा उनके प्रति पिता-माताके समान भाव रखकर प्रेम करने लगती थी

হে রাজন! যে যে দেশে দশ দিক জুড়ে দীপ্তিমান সেই মহাযশস্বী সম্রাট্ কর্তৃত্ব স্থাপন করতেন, সেখানে গোপাল থেকে দ্বিজ পর্যন্ত সকল প্রজা তাঁকে পিতা-মাতার ন্যায় জেনে স্নেহভরে অনুরক্ত হয়ে থাকত।

Verse 19

वैशम्पायन उवाच स मन्त्रिण: समानाय्य क्षातृश्व वदतां वर: | राजसूयं प्रति तदा पुन: पुनरपृच्छत,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! वक्ताओंमें श्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरे उस समय अपने मन्त्रियों और भाइयोंको बुलाकर उनसे बार-बार पूछा--'राजसूययज्ञके सम्बन्धमें आपलोगोंकी क्‍या सम्मति है?”

বৈশম্পায়ন বললেন—হে জনমেজয়! বক্তাদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ, ক্ষাত্রধর্মে প্রতিষ্ঠিত যুধিষ্ঠির তখন মন্ত্রীদের ও ভ্রাতৃগণকে আহ্বান করে রাজসূয় যজ্ঞ সম্বন্ধে বারংবার তাঁদের মতামত জিজ্ঞাসা করলেন—“আপনাদের কী অভিমত?”

Verse 20

ते पृच्छमाना: सहिता वचो3र्थ्य मन्त्रिणस्तदा | युधिष्ठिरं महाप्राज्ञ यियक्षुमिदमब्रुवन्‌,इस प्रकार पूछे जानेपर उन सब मन्त्रियोंने एक साथ यज्ञकी इच्छावाले परम बुद्धिमान्‌ युधिष्ठिस्से उस समय यह अर्थयुक्त बात कही--

এইভাবে জিজ্ঞাসিত হলে, সেই সকল মন্ত্রী একত্রিত হয়ে, যজ্ঞ করতে উদ্যত মহাপ্রাজ্ঞ যুধিষ্ঠিরকে তখন এই অর্থপূর্ণ বাক্য বললেন।

Verse 21

येनाभिषिक्तो नृपतिर्वारुणं गुणमृच्छति । तेन राजापि त॑ कृत्स्नं सम्राडुगुणमभीप्सति,“महाराज! राजसूययज्ञके द्वारा अभिषिक्त होनेपर राजा वरुणके गुणोंको प्राप्त कर लेता है; इसलिये प्रत्येक नरेश उस यज्ञके द्वारा सम्राट्के समस्त गुणोंको पानेकी अभिलाषा रखता है

মহারাজ! রাজসূয় যজ্ঞে অভিষিক্ত হলে নৃপতি বরুণের গুণ লাভ করেন; অতএব প্রত্যেক রাজাই সেই যজ্ঞের দ্বারা সম্রাটের সমগ্র গুণসম্ভার অর্জনের আকাঙ্ক্ষা করে।

Verse 22

तस्य सम्राड्गुणाहस्य भवत:ः कुरुनन्दन । राजसूयस्य समयं मन्यन्ते सुहृदस्तव,“कुरुनन्दन! आप तो सम्राटके गुणोंको पानेके सर्वथा योग्य हैं; अतः आपके हितैषी सुहृद्‌ आपके द्वारा राजसूययज्ञके अनुष्ठानका यह उचित अवसर प्राप्त हुआ मानते हैं

কুরুনন্দন! আপনি সম্রাটের গুণসমূহ লাভের সর্বতোভাবে যোগ্য; অতএব আপনার হিতৈষী সুহৃদগণ মনে করেন—আপনার দ্বারা রাজসূয় যজ্ঞ সম্পাদনের এটাই যথোচিত সময়।

Verse 23

तस्य यज्ञस्थ समय: स्वाधीन: क्षत्रसम्पदा । साम्ना षडग्नयो यस्मिंश्षीयन्ते शंसितव्रतैः,“उस यज्ञका समय क्षत्रसम्पत्ति यानी सेना आदिके अधीन है। उसमें उत्तम व्रतका आचरण करनेवाले ब्राह्मण सामवेदके मन्त्रोंद्वार अग्निकी स्थापनाके लिये छः: अग्निवेदियोंका निर्माण करते हैं

বৈশম্পায়ন বললেন— সেই যজ্ঞের নির্ধারিত সময় ও সুষ্ঠু সম্পাদন ক্ষত্রসম্পদ, অর্থাৎ রাজবল ও সেনাসম্পদের অধীন। সেই ক্রিয়ায় প্রশংসিত ব্রতধারী ব্রাহ্মণেরা সামগানের দ্বারা ছয়টি অগ্নিবেদী নির্মাণ করে পবিত্র অগ্নিসমূহ প্রতিষ্ঠা করেন, যাতে বিধি ও শৃঙ্খলায় যজ্ঞ সম্পন্ন হয়।

Verse 24

दर्वीहोमानुपादाय सर्वान्‌ यः प्राप्तुते क्रतून्‌ | अभिषेकं च यस्यान्ते सर्वजित्‌ तेन चोच्यते,“जो उस यज्ञका अनुष्ठान करता है, वह “दर्वीहोम' (अग्निहोत्र आदि)-से लेकर समस्त यज्ञोंके फलको प्राप्त कर लेता है एवं यज्ञके अन्तमें जो अभिषेक होता है, उससे वह यज्ञकर्ता नरेश 'सर्वजित्‌ सम्राट' कहलाने लगता है

বৈশম্পায়ন বললেন— যে এই যজ্ঞ সম্পাদন করে, সে দর্বীহোম (অগ্নিহোত্র প্রভৃতি) থেকে আরম্ভ করে সকল যজ্ঞের ফল লাভ করে। আর শেষে যার অভিষেক সম্পন্ন হয়, সেই যজমান রাজা তখন ‘সর্বজিত্’—সর্ববিজয়ী সম্রাট—নামে অভিহিত হয়।

Verse 25

समर्थो5सि महाबाहो सर्वे ते वशगा वयम्‌ | अचिरात्‌ त्वं महाराज राजसूयमवाप्स्यसि,“महाबाहो! आप उस यज्ञके सम्पादनमें समर्थ हैं। हम सब लोग आपकी आज्ञाके अधीन हैं। महाराज! आप शीघ्र ही राजसूययज्ञ पूर्ण कर सकेंगे

বৈশম্পায়ন বললেন— হে মহাবাহু, তুমি এই যজ্ঞ সম্পাদনে সমর্থ; আমরা সকলেই তোমার আদেশাধীন। হে মহারাজ, অচিরেই তুমি রাজসূয় লাভ করে তা সম্পূর্ণ করবে।

Verse 26

अविचार्य महाराज राजसूये मन: कुरु । इत्येवं सुह्ृदः सर्वे पृथक्‌ च सह चाब्रुवन्‌,“अत: किसी प्रकारका सोच-विचार न करके आप राजसूयके अनुष्ठानमें मन लगाइये।” इस प्रकार उनके सभी सुहृदोंने अलग-अलग और सम्मिलित होकर अपनी यही सम्मति प्रकट की

বৈশম্পায়ন বললেন— হে মহারাজ, কোনো দ্বিধা-চিন্তা না করে রাজসূয়ে মন স্থির করো। এভাবে তাঁর সকল সুহৃদ—কেউ পৃথকভাবে, কেউ একত্রে—একই পরামর্শ উচ্চারণ করল।

Verse 27

स धर्म्य पाण्डवस्तेषां वच: श्रुत्वा विशाम्पते | धृष्टमिष्टं वरिष्ठ च जग्राह मनसारिहा,प्रजानाथ! शत्रुसूदन पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने उनका यह साहसपूर्ण, प्रिय एवं श्रेष्ठ वचन सुनकर उसे मन-ही-मन ग्रहण किया

বৈশম্পায়ন বললেন— হে প্রজাপতি, ধর্মপরায়ণ পাণ্ডব, শত্রুদমনকারী যুধিষ্ঠির তাদের সেই সাহসী, প্রিয় ও শ্রেষ্ঠ বাক্য শুনে অন্তরে তা গ্রহণ করলেন।

Verse 28

श्रुत्वा सुहृद्गचस्तच्च जानंश्वाप्पात्मन: क्षमम्‌ । पुनः पुनर्मनो दध्ने राजसूयाय भारत,भारत! उन्होंने सुहदोंका वह सम्मतिसूचक वचन सुनकर तथा यह भी जानते हुए कि राजसूययज्ञ अपने लिये साध्य है, उसके विषयमें बारम्बार मन-ही-मन विचार किया

সুহৃদদের সম্মতিসূচক সেই শুভ বাক্য শুনে এবং রাজসূয় যজ্ঞ যে নিজের সাধ্যসীমার মধ্যেই—এ কথা জেনে, হে ভারত! তিনি বারংবার সেই দিকেই মন স্থাপন করলেন; অন্তরে অন্তরে দৃঢ় সংকল্পে বিষয়টি পুনঃপুন চিন্তা করতে লাগলেন।

Verse 29

स भ्रातृभि: पुनर्थीमानृत्विग्भिश्व महात्मभि: | मन्त्रिभिश्वापि सहितो धर्मराजो युधिष्ठिर: । धौम्यद्वैपायनाद्यैश्व मन्त्रयामास मन्त्रवित्‌,फिर मन्त्रणाका महत्त्व जाननेवाले बुद्धिमान्‌ धर्मराज युधिष्ठिर अपने भाइयों, महात्मा ऋत्विजों, मन्त्रियों तथा धौम्य एवं व्यास आदि महर्षियोंके साथ इस विषयपर पुन: विचार करने लगे

তখন পরামর্শে পারদর্শী ধর্মরাজ যুধিষ্ঠির, ভ্রাতৃগণ, মহাত্মা ঋত্বিজ ও মন্ত্রীদের সঙ্গে নিয়ে, ধৌম্য, দ্বৈপায়ন (ব্যাস) প্রভৃতি মহর্ষিদের সহিত সেই বিষয়ে পুনরায় আলোচনা করলেন।

Verse 30

युधिछिर उवाच इयं या राजसूयस्य सम्रार्ड्हस्य सुक्रतो: । श्रद्धधानस्य वदत: स्पृहा मे सा कथं भवेत्‌,युधिष्ठिरने कहा--महात्माओ! राजसूय नामक उत्तम यज्ञ किसी सम्राटके ही योग्य है, तो भी मैं उसके प्रति श्रद्धा रखने लगा हूँ; अतः आपलोग बताइये, मेरे मनमें जो यह राजसूययज्ञ करनेकी अभिलाषा हुई है, कैसी है?

যুধিষ্ঠির বললেন—হে মহাত্মাগণ! রাজসূয় নামক এই সমৃদ্ধ ও উৎকৃষ্ট যজ্ঞ তো সম্রাটেরই যোগ্য; তবু আমার অন্তরে তার প্রতি শ্রদ্ধা জেগেছে। বলুন তো, রাজসূয় সম্পাদনের যে আকাঙ্ক্ষা আমার হৃদয়ে উদিত হয়েছে, তার প্রকৃতি কী রূপ?

Verse 31

वैशम्पायन उवाच एवमुक्तास्तु ते तेन राज्ञा राजीवलोचन । इदमूचुर्वच: काले धर्मराजं॑ युधिष्ठिरम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--कमलनयन जनमेजय! राजाके इस प्रकार पूछनेपर वे सब लोग उस समय धर्मराज युधिष्ठिरसे यों बोले--

বৈশম্পায়ন বললেন—হে কমলনয়ন রাজা! সেই নৃপতি এভাবে জিজ্ঞাসা করলে, তখনই তারা সকলেই ধর্মরাজ যুধিষ্ঠিরকে এইরূপ বাক্য বলল।

Verse 32

अहतस्त्वमसि धर्मज्ञ राजसूयं महाक्रतुम्‌ अथैवमुक्ते नृपतावृत्विग्भिऋ्रषिभिस्तथा

তারা বলল—হে ধর্মজ্ঞ! তুমি অক্ষত ও অপরাজিত; অতএব সেই মহাক্রতু রাজসূয় যজ্ঞ সম্পাদন কর। রাজাকে এ কথা বলা হলে ঋত্বিজ ও ঋষিরাও তদ্রূপ সমর্থন জানাল।

Verse 33

स तु राजा महाप्राज्ञ: पुनरेवात्मना55त्मवान्‌,तदनन्तर मनको वशमें रखनेवाले महाबुद्धिमान्‌ राजा युधिष्लिरने सम्पूर्ण लोकोंके हितकी इच्छासे पुनः: इस विषयपर मन-ही-मन विचार किया--'जो बुद्धिमान्‌ अपनी शक्ति और साधनोंको देखकर तथा देश, काल, आय और व्ययको बुद्धिके द्वारा भलीभाँति समझ करके कार्य आरम्भ करता है, वह कष्टमें नहीं पड़ता। केवल अपने ही निश्चयसे यज्ञका आरम्भ नहीं किया जाता।” ऐसा समझकर यत्नपूर्वक कार्यभार वहन करनेवाले युधिष्छिरने उस कार्यके विषयमें पूर्ण निश्चय करनेके लिये जनार्दन भगवान्‌ श्रीकृष्णको ही सब लोगोंसे उत्तम माना और वे मन-ही-मन उन अप्रमेय महाबाहु श्रीहरिकी शरणमें गये, जो अजन्मा होते हुए भी धर्म एवं साधु पुरुषोंकी रक्षा आदिकी इच्छासे मनुष्यलोकमें अवतीर्ण हुए थे

Vaiśampāyana said: The supremely intelligent king, Yudhiṣṭhira—self-controlled and reflective—again pondered inwardly, wishing for the welfare of all worlds. He reasoned that a wise person, after assessing his own strength and resources and carefully weighing place, time, income, and expenditure, begins an undertaking without falling into distress; and that a sacrifice should not be commenced merely on the basis of one’s private resolve. Having understood this, Yudhiṣṭhira, who bore the burden of responsibility with deliberate effort, judged Janārdana, Lord Śrī Kṛṣṇa, to be the best among all for arriving at a final decision in that matter. In his heart he sought refuge in that immeasurable, mighty-armed Śrī Hari—unborn, yet descended into the human world out of the will to protect dharma and safeguard the righteous.

Verse 34

भूयो विममृशे पार्थों लोकानां हितकाम्यया । सामर्थ्ययोगं सम्प्रेक्ष्य देशकालौ व्ययागमौ,तदनन्तर मनको वशमें रखनेवाले महाबुद्धिमान्‌ राजा युधिष्लिरने सम्पूर्ण लोकोंके हितकी इच्छासे पुनः: इस विषयपर मन-ही-मन विचार किया--'जो बुद्धिमान्‌ अपनी शक्ति और साधनोंको देखकर तथा देश, काल, आय और व्ययको बुद्धिके द्वारा भलीभाँति समझ करके कार्य आरम्भ करता है, वह कष्टमें नहीं पड़ता। केवल अपने ही निश्चयसे यज्ञका आरम्भ नहीं किया जाता।” ऐसा समझकर यत्नपूर्वक कार्यभार वहन करनेवाले युधिष्छिरने उस कार्यके विषयमें पूर्ण निश्चय करनेके लिये जनार्दन भगवान्‌ श्रीकृष्णको ही सब लोगोंसे उत्तम माना और वे मन-ही-मन उन अप्रमेय महाबाहु श्रीहरिकी शरणमें गये, जो अजन्मा होते हुए भी धर्म एवं साधु पुरुषोंकी रक्षा आदिकी इच्छासे मनुष्यलोकमें अवतीर्ण हुए थे

Vaiśampāyana said: Again the son of Pṛthā reflected, desiring the welfare of all people. Considering the proper alignment of resources and capability, and carefully weighing place and time, income and expenditure, the wise king Yudhiṣṭhira thought within himself: “One who is prudent—after assessing his strength and means, and after rightly understanding by reason the factors of place, time, revenue, and cost—does not fall into distress. A sacrifice should not be begun merely on the basis of one’s private resolve.” Having thus understood, Yudhiṣṭhira, who bore the burden of duty with deliberate effort, regarded Janārdana, Lord Śrī Kṛṣṇa, as the best of all for arriving at a firm decision in that undertaking; and in his heart he sought refuge in that immeasurable, mighty-armed Śrī Hari, who, though unborn, had descended into the human world out of the will to protect dharma and the righteous.

Verse 35

विमृश्य सम्यक्‌ च धिया कुर्वन्‌ प्राज्ञो न सीदति । न हि यज्ञसमारम्भ: केवलात्मविनिश्चयात्‌,तदनन्तर मनको वशमें रखनेवाले महाबुद्धिमान्‌ राजा युधिष्लिरने सम्पूर्ण लोकोंके हितकी इच्छासे पुनः: इस विषयपर मन-ही-मन विचार किया--'जो बुद्धिमान्‌ अपनी शक्ति और साधनोंको देखकर तथा देश, काल, आय और व्ययको बुद्धिके द्वारा भलीभाँति समझ करके कार्य आरम्भ करता है, वह कष्टमें नहीं पड़ता। केवल अपने ही निश्चयसे यज्ञका आरम्भ नहीं किया जाता।” ऐसा समझकर यत्नपूर्वक कार्यभार वहन करनेवाले युधिष्छिरने उस कार्यके विषयमें पूर्ण निश्चय करनेके लिये जनार्दन भगवान्‌ श्रीकृष्णको ही सब लोगोंसे उत्तम माना और वे मन-ही-मन उन अप्रमेय महाबाहु श्रीहरिकी शरणमें गये, जो अजन्मा होते हुए भी धर्म एवं साधु पुरुषोंकी रक्षा आदिकी इच्छासे मनुष्यलोकमें अवतीर्ण हुए थे

Vaiśampāyana said: “One who reflects well and acts with clear intelligence does not fall into distress. For the undertaking of a sacrifice is not begun merely on the strength of one’s private resolve.” Having thus weighed the matter for the welfare of all, King Yudhiṣṭhira—great in understanding and intent on bearing the burden carefully—sought firm certainty about the enterprise. He regarded Janārdana, Bhagavān Śrī Kṛṣṇa, as the best guide among all, and inwardly took refuge in that immeasurable, mighty-armed Śrī Hari, who, though unborn, descends into the human world to uphold dharma and protect the righteous.

Verse 36

भवतीति समाज्ञाय यत्नतः कार्यमुद्रहन्‌ । स निश्चयार्थ कार्यस्य कृष्णमेव जनार्दनम्‌,तदनन्तर मनको वशमें रखनेवाले महाबुद्धिमान्‌ राजा युधिष्लिरने सम्पूर्ण लोकोंके हितकी इच्छासे पुनः: इस विषयपर मन-ही-मन विचार किया--'जो बुद्धिमान्‌ अपनी शक्ति और साधनोंको देखकर तथा देश, काल, आय और व्ययको बुद्धिके द्वारा भलीभाँति समझ करके कार्य आरम्भ करता है, वह कष्टमें नहीं पड़ता। केवल अपने ही निश्चयसे यज्ञका आरम्भ नहीं किया जाता।” ऐसा समझकर यत्नपूर्वक कार्यभार वहन करनेवाले युधिष्छिरने उस कार्यके विषयमें पूर्ण निश्चय करनेके लिये जनार्दन भगवान्‌ श्रीकृष्णको ही सब लोगोंसे उत्तम माना और वे मन-ही-मन उन अप्रमेय महाबाहु श्रीहरिकी शरणमें गये, जो अजन्मा होते हुए भी धर्म एवं साधु पुरुषोंकी रक्षा आदिकी इच्छासे मनुष्यलोकमें अवतीर्ण हुए थे

Vaiśampāyana said: Having understood the matter and taking up the burden of action with care, Yudhiṣṭhira sought firm certainty about what should be done and regarded Janārdana—Kṛṣṇa alone—as the best guide. Then the great-minded king, intent on the welfare of all worlds and restraining his own mind, reflected inwardly: “A wise man, after assessing his strength and resources and clearly grasping by reason the factors of place, time, income, and expenditure, begins an undertaking; such a man does not fall into distress. A sacrifice should not be commenced merely on the basis of one’s private resolve.” Thinking thus, and bearing the responsibility with diligence, Yudhiṣṭhira took refuge in the immeasurable, mighty-armed Śrī Hari—though unborn, he descends into the human world for the protection of dharma and the good.

Verse 37

सर्वलोकात्‌ परं मत्वा जगाम मनसा हरिम्‌ । अप्रमेयं महाबाहुं कामाज्जातमजं नृषु,तदनन्तर मनको वशमें रखनेवाले महाबुद्धिमान्‌ राजा युधिष्लिरने सम्पूर्ण लोकोंके हितकी इच्छासे पुनः: इस विषयपर मन-ही-मन विचार किया--'जो बुद्धिमान्‌ अपनी शक्ति और साधनोंको देखकर तथा देश, काल, आय और व्ययको बुद्धिके द्वारा भलीभाँति समझ करके कार्य आरम्भ करता है, वह कष्टमें नहीं पड़ता। केवल अपने ही निश्चयसे यज्ञका आरम्भ नहीं किया जाता।” ऐसा समझकर यत्नपूर्वक कार्यभार वहन करनेवाले युधिष्छिरने उस कार्यके विषयमें पूर्ण निश्चय करनेके लिये जनार्दन भगवान्‌ श्रीकृष्णको ही सब लोगोंसे उत्तम माना और वे मन-ही-मन उन अप्रमेय महाबाहु श्रीहरिकी शरणमें गये, जो अजन्मा होते हुए भी धर्म एवं साधु पुरुषोंकी रक्षा आदिकी इच्छासे मनुष्यलोकमें अवतीर्ण हुए थे

Considering Hari to be higher than all the worlds, he turned to Him in his mind. He sought refuge in that immeasurable, mighty-armed Lord—unborn, yet appearing among men by His own will—thereby placing the coming decision under divine guidance rather than mere personal resolve.

Verse 38

पाण्डवस्तर्कयामास कर्मभिदरदेवसम्मतै: । नास्य किंचिदविज्ञातं नास्य किंचिदकर्मजम्‌,पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने श्रीकृष्णके देवपृूजित अलौकिक कर्मोंद्वारा यह अनुमान किया कि श्रीकृष्णके लिये कुछ भी अज्ञात नहीं है तथा कोई भी ऐसा कार्य नहीं है, जिसे वे कर न सकें

পাণ্ডুনন্দন যুধিষ্ঠির দেবপূজিত শ্রীকৃষ্ণের অলৌকিক কর্মসমূহ বিচার করে অনুমান করলেন—তাঁর কাছে কিছুই অজ্ঞাত নয়, এবং এমন কোনো কাজ নেই যা তিনি করতে অক্ষম।

Verse 39

नस किंचिन्न विषहेदिति कृष्णममन्यत । सतुतां नैछिकीं बुद्धि कृत्वा पार्थो युधिष्ठिर:,द्वारकावासिन कृष्णं द्वारवत्यां समासदत्‌ । उनके लिये कुछ भी असहा नहीं है। इस तरह उन्होंने उन्हें सर्वशक्तिमान्‌ एवं सर्वज्ञ माना। ऐसी निश्चयात्मक बुद्धि करके कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने गुरुजनोंके प्रति निवेदन करनेकी भाँति समस्त प्राणियोंके गुरु श्रीकृष्णके पास शीघ्र ही एक दूत भेजा। वह दूत शीघ्रगामी रथके द्वारा तुरंत यादवोंके यहाँ पहुँचकर द्वारकावासी श्रीकृष्णसे द्वारकामें ही मिला

তিনি শ্রীকৃষ্ণকে এমনই মনে করলেন—যাঁর পক্ষে কিছুই অসহ্য নয়। এই দৃঢ় সিদ্ধান্তে তাঁকে সর্বশক্তিমান ও সর্বজ্ঞ জেনে, পার্থ যুধিষ্ঠির দ্বারকাবাসী কৃষ্ণের কাছে দ্বারবতীতে গিয়ে সাক্ষাৎ করলেন।

Verse 40

गुरुवद्‌ भूतगुरवे प्राहिणोद्‌ दूतमज्जसा । शीघ्रगेन रथेनाशु स दूत: प्राप्प पयादवान्‌

গুরুর ন্যায় সর্বভূতগুরুর কাছে তিনি তৎক্ষণাৎ দূত পাঠালেন। দ্রুতগামী রথে চড়ে সেই দূত অচিরেই যাদবদের নিকট পৌঁছাল।

Verse 41

(स प्रह्दः प्राउ्जलि भूूत्वा व्यज्ञापपत माधवम्‌ ।। उसने विनयपूर्वक हाथ जोड़ भगवान्‌ श्रीकृष्णसे इस प्रकार निवेदन किया। दूत उवाच धर्मराजो हृषीकेश धौम्यव्यासादिभि: सह । पाज्चालमात्स्यसहितै भ्रतिभिश्चैव सर्वश: ।। त्वद्दर्शने महाबाहो काड्क्षते स युधिष्ठिर: । दूतने कहा--महाबाहु हृषीकेश! धर्मराज युधिष्छिर धौम्य एवं व्यास आदि महर्षियों, द्रपद और विराट आदि नरेशों तथा अपने समस्त भाइयोंके साथ आपका दर्शन करना चाहते हैं। वैशम्पायन उवाच इन्द्रसेनवच: श्रुत्वा यादवप्रवरो बली ।) दर्शनाकड्क्षिणं पार्थ दर्शनाकाड्क्षयाच्युत:

দূতটি বিনীতভাবে নত হয়ে করজোড়ে মাধবকে নিবেদন করল। দূত বলল—“হে হৃষীকেশ! ধর্মরাজ যুধিষ্ঠির ধৌম্য, ব্যাস প্রভৃতি মহর্ষিদের সঙ্গে, পাঞ্চাল ও মৎস্যদের সহিত, এবং তাঁর সকল ভ্রাতার সঙ্গে, হে মহাবাহো, আপনার দর্শন কামনা করেন।” বৈশম্পায়ন বললেন—ইন্দ্রসেনের বাক্য শুনে বলবান যাদবশ্রেষ্ঠ অচ্যুতও দর্শনাকাঙ্ক্ষী পার্থের প্রতি মনোনিবেশ করলেন, কারণ তিনিও সেই সাক্ষাৎ কামনা করছিলেন।

Verse 42

व्यतीत्य विविधान्‌ देशांस्त्वरावान्‌ क्षिप्रवाहन:,मार्गमें अनेक देशोंको लाँघते हुए वे बड़ी उतावलीके साथ आगे बढ़ रहे थे। उनके रथके घोड़े बहुत तेज चलनेवाले थे

পথে নানা দেশ অতিক্রম করে সে অত্যন্ত তাড়াহুড়োয় এগিয়ে চলল; তার রথের অশ্বগুলি ছিল অতিশয় দ্রুতগামী।

Verse 43

इन्द्रप्रस्थगतं पार्थमभ्यगच्छज्जनार्दन: । स गृहे पितृवद्‌ भ्रात्रा धर्मराजेन पूजित: । भीमेन च ततो<पश्यत्‌ स्वसारं प्रीतिमान्‌ पितु:,भगवान्‌ जनार्दन इन्द्रप्रस्थमें आकर राजा युधिष्ठिरसे मिले। फुफेरे भाई धर्मराज युधिष्ठिर तथा भीमसेनने अपने घरमें श्रीकृष्णका पिताकी भाँति पूजन किया। तत्पश्चात्‌ श्रीकृष्ण अपनी बुआ कुन्तीसे प्रसन्नतापूर्वक मिले

বৈশম্পায়ন বললেন—জনার্দন (শ্রীকৃষ্ণ) ইন্দ্রপ্রস্থে অবস্থানরত পার্থ (অর্জুন)-এর কাছে গেলেন। রাজগৃহে তাঁর ফুফাতো ভ্রাতা ধর্মরাজ যুধিষ্ঠির পিতার ন্যায় শ্রদ্ধায় তাঁকে পূজা করলেন; ভীমও তেমনি সম্মান জানালেন। তারপর ভগবান জনার্দন পিতৃভগিনী কুন্তীর সঙ্গে স্নেহভরে আনন্দিত হয়ে মিলিত হলেন।

Verse 44

प्रीत: प्रीतेन सुहदा रेमे स सहितस्तदा । अर्जुनेन यमाभ्यां च गुरुवत्‌ पर्युपासित:,तदनन्तर प्रेमी सुहृद्‌ अर्जुनसे मिलकर वे बहुत प्रसन्न हुए। फिर नकुल-सहदेवने गुरुकी भाँति उनकी सेवा-पूजा की

বৈশম্পায়ন বললেন—প্রিয় সুহৃদের স্নেহে তিনি পরিতুষ্ট হয়ে তাদের সঙ্গে আনন্দ করলেন। অর্জুন এবং যমজ নকুল-সহদেব গুরুর ন্যায় শ্রদ্ধা করে তাঁর সেবা-পরিচর্যা করল।

Verse 45

त॑ विश्रान्तं शुभे देशे क्षणिनं कल्पमच्युतम्‌ । धर्मराज: समागम्याज्ञापयत्‌ स्वप्रयोजनम्‌,इसके बाद उन्होंने एक उत्तम भवनमें विश्राम किया। थोड़ी देर बाद जब वे मिलनेके योग्य हुए और इसके लिये उन्होंने अवसर निकाल लिया, तब धर्मराज युधिष्ठिरे आकर उनसे अपना सारा प्रयोजन बतलाया

বৈশম্পায়ন বললেন—অচ্যুত শুভ স্থানে অল্পক্ষণ বিশ্রাম নিলেন। তারপর ধর্মরাজ যুধিষ্ঠির তাঁর কাছে এসে নিজের উদ্দেশ্য নিবেদন করলেন।

Verse 46

युधिछिर उवाच प्रार्थितो राजसूयो मे न चासौ केवलेप्सया । प्राप्पते येन तत्‌ ते हि विदितं कृष्ण सर्वश:,युधिष्ठटिर बोले--श्रीकृष्ण! मैं राजसूययज्ञ करना चाहता हूँ; परंतु वह केवल चाहनेभरसे ही पूरा नहीं हो सकता। जिस उपायसे उस यज्ञकी पूर्ति हो सकती है, वह सब आपको ही ज्ञात है

যুধিষ্ঠির বললেন—হে কৃষ্ণ! আমি রাজসূয় যজ্ঞ করতে ইচ্ছুক; কিন্তু তা কেবল আকাঙ্ক্ষায় সিদ্ধ হয় না। যে উপায়ে তা সম্পন্ন হতে পারে, সে সবই তোমার কাছে সম্পূর্ণরূপে বিদিত।

Verse 47

यस्मिन्‌ सर्व सम्भवति यश्न सर्वत्र पूज्यते । यश्न सर्वेश्वरो राजा राजसूयं स विन्दति,जिसमें सब कुछ सम्भव है अर्थात्‌ जो सब कुछ कर सकता है, जिसकी सर्वत्र पूजा होती है तथा जो सर्वेश्वर होता है, वही राजा राजसूययज्ञ सम्पन्न कर सकता है

যার মধ্যে সবই সম্ভব, যে সকল কার্য সম্পাদনে সক্ষম, যাকে সর্বত্র পূজা করা হয় এবং যে রাজাদের মধ্যে সর্বেশ্বর—সেই রাজাই রাজসূয় যজ্ঞ লাভ করে সম্পন্ন করতে পারে।

Verse 48

त॑ राजसूय॑ सुह्ृदः कार्यमाहु: समेत्य मे । तत्र मे निश्चिततमं तव कृष्ण गिरा भवेत्‌,मेरे सब सुहृद्‌ एकत्र होकर मुझसे वही राजसूययज्ञ करनेके लिये कहते हैं; परंतु इसके विषयमें अन्तिम निश्चय तो आपके कहनेसे ही होगा

যুধিষ্ঠির বললেন— আমার হিতৈষী সুহৃদগণ একত্র হয়ে আমাকে রাজসূয় যজ্ঞ করতে অনুরোধ করছেন; কিন্তু এ বিষয়ে আমার চূড়ান্ত ও দৃঢ় সিদ্ধান্ত, হে কৃষ্ণ, তোমার বাক্যেই নির্ভর করবে।

Verse 49

केचिद्धि सौहृदादेव न दोषं परिचक्षते । स्वार्थहेतोस्तथैवान्ये प्रियमेव वदन्त्युत,कुछ लोग प्रेम-सम्बन्धके नाते ही मेरे दोषों या त्रुटियोंको नहीं बताते हैं। दूसरे लोग स्वार्थवश वही बात कहते हैं, जो मुझे प्रिय लगे

যুধিষ্ঠির বললেন— কেউ কেউ কেবল স্নেহ-সৌহার্দ্যের কারণে আমার দোষত্রুটি একেবারেই দেখায় না; আবার কেউ স্বার্থের তাড়নায় আমার কাছে শুধু প্রিয় কথাই বলে।

Verse 50

प्रियमेव परीप्सन्ते केचिदात्मनि यद्धितम्‌ । एवम्प्रायाश्व दृश्यन्ते जनवादा: प्रयोजने,कुछ लोग जो अपने लिये हितकर है, उसीको मेरे लिये भी प्रिय एवं हितकर समझ बैठते हैं। इस प्रकार अपने-अपने प्रयोजनको लेकर प्राय: लोगोंकी भिन्न-भिन्न बातें देखी जाती हैं

কেউ কেউ নিজের যা মঙ্গলজনক, তাকেই আমার জন্যও প্রিয় ও কল্যাণকর বলে ধরে নেয়। এভাবেই নিজ নিজ উদ্দেশ্য অনুসারে লোকের নানা রকম কথা প্রায়ই দেখা যায়।

Verse 51

त्वं तु हेतूनतीत्यैतान्‌ कामक्रोधौ व्युदस्य च । परम॑ यत्‌ क्षमं लोके यथावद्‌ वक्तुमहसि,परंतु आप उपर्युक्त सभी हेतुओंसे एवं काम-क्रोधसे रहित होकर (अपने स्वरूपमें स्थित हैं। अतः) इस लोकमें मेरे लिये जो उत्तम एवं करनेयोग्य हो, उसको ठीक-ठीक बतानेकी कृपा करें

কিন্তু তুমি এসব কারণের ঊর্ধ্বে, আর কাম-ক্রোধ পরিত্যাগ করে স্থিত। অতএব এই জগতে আমার জন্য যা সর্বোত্তম ও করণীয়, তা যথাযথভাবে বলে দাও।

Verse 116

निकामवर्षा: स्फीताश्न आसञ्जनपदास्तथा । महाराज युधिष्ठिर सबको आत्मीयजनोंकी भाँति अपनाते, भीमसेन सबकी रक्षा करते, सव्यसाची अर्जुन शत्रुओंके संहारमें लगे रहते, बुद्धिमान्‌ सहदेव सबको धर्मका उपदेश दिया करते और नकुल स्वभावसे ही सबके साथ विनयपूर्ण बर्ताव करते थे। इससे उनके राज्यके सभी जनपद कलहशून्य, निर्भय, स्वधर्मपरायण तथा उन्नतिशील थे। वहाँ उनकी इच्छाके अनुसार समयपर वर्षा होती थी

বৈশম্পায়ন বললেন— মহারাজ যুধিষ্ঠিরের রাজ্যে ইচ্ছানুসারে যথাসময়ে বৃষ্টি হতো; প্রজারা পর্যাপ্ত অন্নে পুষ্ট থাকত এবং দেশ-জনপদ সমৃদ্ধ ও সুস্থিত ছিল। যুধিষ্ঠির সকলকে আপনজনের মতো গ্রহণ করতেন; ভীমসেন সকলের রক্ষা করতেন; সব্যসাচী অর্জুন শত্রুনাশে সদা উদ্যত থাকতেন; বুদ্ধিমান সহদেব নিত্য প্রজাকে ধর্মোপদেশ দিতেন; আর নকুল স্বভাবতই সকলের সঙ্গে বিনয়পূর্ণ আচরণ করতেন। তাই তাঁদের রাজ্যের সব জনপদ কলহশূন্য, নির্ভয়, স্বধর্মনিষ্ঠ এবং ক্রমে ক্রমে উন্নতিশীল ছিল।

Verse 143

राजवल्लभतश्चैव नाश्रूयत मृषा कृतम्‌ लुटेरोंसे, ठगोंसे, राजासे तथा राजाके प्रिय व्यक्तियोंसे प्रजाके प्रति अत्याचार या मिथ्या व्यवहार कभी नहीं सुना जाता था और आपसमें भी सारी प्रजा एक-दूसरेसे मिथ्या व्यवहार नहीं करती थी

বৈশম্পায়ন বললেন—রাজার প্রিয়জনদের দিক থেকেও কখনও মিথ্যা আচরণের কথা শোনা যেত না। না লুটেরা, না প্রতারক, না রাজা, না রাজার স্নেহভাজন কেউ প্রজাকে পীড়ন করত বা ছলনা করত; আর প্রজারাও পরস্পরের সঙ্গে অসৎ বা মিথ্যা ব্যবহার করত না।

Verse 163

कामतो> प्युपयुञ्जानै राजसैलों भजैर्जनै: । दूसरे राजालोग विभिन्न देशके कुलीन वैश्योंके साथ धर्मराज युधिष्ठिरका प्रिय करने, उन्हें कर देने, अपने उपार्जित धन-रत्न आदिकी भेंट देने तथा संधि-विग्रहादि छः कार्योमें राजाको सहयोग देनेके लिये उनके पास आते थे। सदा धर्ममें ही लगे रहनेवाले राजा युधिष्ठिरके शासनकालमें राजस स्वभाववाले तथा लोभी मनुष्योंद्वारा इच्छानुसार धन आदिका उपभोग किये जानेपर भी उनका देश दिनोदिन उन्नति करने लगा

বৈশম্পায়ন বললেন—যদিও রাজস স্বভাবের ও লোভী লোকেরা ইচ্ছামতো ধন-ভোগে মত্ত থাকত, তবু ধর্মে সদা প্রতিষ্ঠিত রাজা যুধিষ্ঠিরের শাসনে রাজ্য দিন দিন সমৃদ্ধ হতে লাগল। নানা দেশ থেকে অন্য রাজারা এবং কুলীন বৈশ্যগণ ধর্মরাজকে তুষ্ট করতে, কর দিতে, নিজেদের অর্জিত ধন-রত্নাদি উপহার দিতে এবং সন্ধি-বিদ্রোহ প্রভৃতি রাষ্ট্রনীতির ছয় কর্মে রাজার সহায় হতে তাঁর কাছে আসত।

Verse 323

मन्त्रिणो भ्रातरश्चान्ये तद्बच: प्रत्यपूजयन्‌ । “धर्मज्ञ! आप राजसूय महायज्ञ करनेके सर्वथा योग्य हैं।' ऋत्विजों तथा महर्षियोंने जब राजा युधिष्ठिरसे इस प्रकार कहा, तब उनके मन्त्रियों और भाइयोंने उन महात्माओंके वचनका बड़ा आदर किया

বৈশম্পায়ন বললেন—মন্ত্রীগণ, ভ্রাতৃগণ এবং অন্যান্য অনুচররা সেই বাক্যকে সম্মান জানাল। “হে ধর্মজ্ঞ! আপনি সর্বতোভাবে রাজসূয় মহাযজ্ঞ সম্পাদনের যোগ্য।” ঋত্বিজ ও মহর্ষিরা যখন রাজা যুধিষ্ঠিরকে এভাবে বললেন, তখন তাঁর মন্ত্রী ও ভ্রাতারা সেই মহাত্মাদের বাণী গভীর শ্রদ্ধায় গ্রহণ করলেন।

Verse 403

द्वारकावासिन कृष्णं द्वारवत्यां समासदत्‌ । उनके लिये कुछ भी असहा नहीं है। इस तरह उन्होंने उन्हें सर्वशक्तिमान्‌ एवं सर्वज्ञ माना। ऐसी निश्चयात्मक बुद्धि करके कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने गुरुजनोंके प्रति निवेदन करनेकी भाँति समस्त प्राणियोंके गुरु श्रीकृष्णके पास शीघ्र ही एक दूत भेजा। वह दूत शीघ्रगामी रथके द्वारा तुरंत यादवोंके यहाँ पहुँचकर द्वारकावासी श्रीकृष्णसे द्वारकामें ही मिला

বৈশম্পায়ন বললেন—দূত দ্বারাবতীতেই দ্বারকাবাসী কৃষ্ণের সঙ্গে সাক্ষাৎ করল। “তাঁর কাছে অসহ্য বলে কিছু নেই; তিনি সর্বশক্তিমান ও সর্বজ্ঞ”—এই দৃঢ় সিদ্ধান্ত করে কুন্তীনন্দন যুধিষ্ঠির, যেমন গুরুজনদের কাছে নিবেদন করা হয়, তেমনি সকল প্রাণীর গুরু শ্রীকৃষ্ণের কাছে তৎক্ষণাৎ এক দূত পাঠালেন। দ্রুতগামী রথে সেই দূত যাদবদের নগরে পৌঁছে দ্বারকাতেই শ্রীকৃষ্ণের সঙ্গে মিলিত হল।

Verse 416

इन्द्रसेनेन सहित इन्द्रप्रस्थमगात्‌ तदा । वैशम्पायनजी कहते हैं--दूत इन्द्रसेनकी यह बात सुनकर यदुवंशशिरोमणि महाबली भगवान्‌ श्रीकृष्ण दर्शनाभिलाषी युधिष्ठिरके पास स्वयं भी उनके दर्शनकी अभिलाषासे दूत इन्द्रसेनके साथ इन्द्रप्रस्थ नगरमें आये

বৈশম্পায়ন বললেন—তখন তিনি ইন্দ্রসেনকে সঙ্গে নিয়ে ইন্দ্রপ্রস্থে গেলেন। দূত ইন্দ্রসেনের কথা শুনে যদুবংশশিরোমণি মহাবলী ভগবান শ্রীকৃষ্ণ, যুধিষ্ঠিরকে দর্শন করার আকাঙ্ক্ষায় নিজেও, ইন্দ্রসেন দূতের সঙ্গে ইন্দ্রপ্রস্থ নগরে উপস্থিত হলেন।

Frequently Asked Questions

The dilemma is how to pursue a universal-sovereignty rite without normalizing coercive domination: Kṛṣṇa frames the rājasūya as improper or infeasible while Jarāsandha’s imprisonment of other rulers persists, forcing a choice between ceremonial ambition and restoring political justice.

Legitimate authority is not merely personal virtue or ritual correctness; it depends on the ethical condition of the political order. Removing systemic coercion and enabling the freedom of other rulers is presented as integral to righteous sovereignty.

No explicit phalaśruti appears in this adhyāya; instead, the chapter functions as pragmatic meta-guidance—linking ritual success (rājasūya completion) to a prior corrective action (the liberation of captive kings and neutralization of Jarāsandha’s dominance).