Jarāsandha as Obstacle to the Rājasūya — Kṛṣṇa’s Strategic Genealogical Brief
Sabhā Parva, Adhyāya 13
नस किंचिन्न विषहेदिति कृष्णममन्यत । सतुतां नैछिकीं बुद्धि कृत्वा पार्थो युधिष्ठिर:,द्वारकावासिन कृष्णं द्वारवत्यां समासदत् । उनके लिये कुछ भी असहा नहीं है। इस तरह उन्होंने उन्हें सर्वशक्तिमान् एवं सर्वज्ञ माना। ऐसी निश्चयात्मक बुद्धि करके कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने गुरुजनोंके प्रति निवेदन करनेकी भाँति समस्त प्राणियोंके गुरु श्रीकृष्णके पास शीघ्र ही एक दूत भेजा। वह दूत शीघ्रगामी रथके द्वारा तुरंत यादवोंके यहाँ पहुँचकर द्वारकावासी श्रीकृष्णसे द्वारकामें ही मिला
na sa kiñcin na viṣahed iti kṛṣṇam amanyata | sā tu tāṃ naiśikīṃ buddhiṃ kṛtvā pārtho yudhiṣṭhiraḥ | dvārakāvāsinaṃ kṛṣṇaṃ dvāravatyāṃ samāsadat |
তিনি শ্রীকৃষ্ণকে এমনই মনে করলেন—যাঁর পক্ষে কিছুই অসহ্য নয়। এই দৃঢ় সিদ্ধান্তে তাঁকে সর্বশক্তিমান ও সর্বজ্ঞ জেনে, পার্থ যুধিষ্ঠির দ্বারকাবাসী কৃষ্ণের কাছে দ্বারবতীতে গিয়ে সাক্ষাৎ করলেন।
वैशम्पायन उवाच