Jarāsandha as Obstacle to the Rājasūya — Kṛṣṇa’s Strategic Genealogical Brief
Sabhā Parva, Adhyāya 13
सर्वेषां दीयतां देयं मुडचन् कोपमदावुभौ । साधु धर्मेति धर्मेति नान्यच्छूयेत भाषितम्,क्रोध और अभिमानसे रहित होकर राजा युधिष्ठिरने अपने सेवकोंसे कह दिया कि 'देनेयोग्य वस्तुएँ सबको दी जायँ अथवा सारी जनताका पावना (ऋण) चुका दिया जाय।' उनके राज्यमें “धर्मराज! आप धन्य हैं। धर्मस्वरूप युधिष्ठिर आपको साधुवाद!” इसके सिवा और कोई बात नहीं सुनी जाती थी
sarveṣāṁ dīyatāṁ deyaṁ muñcan kopamadāv ubhau | sādhu dharmeti dharmeti nānyac chūyeta bhāṣitam ||
ক্রোধ ও অহংকার ত্যাগ করে রাজা যুধিষ্ঠির আদেশ দিলেন—“যা দানযোগ্য, তা সকলকে দাও।” তাঁর রাজ্যে ‘সাধু! ধর্ম! ধর্ম!’—এই প্রশংসাবাক্য ছাড়া আর কিছুই শোনা যেত না।
वैशम्पायन उवाच