Mahabharata Adhyaya 11
Drona ParvaAdhyaya 1159 Versesरण-समाचार की पृष्ठभूमि में मनोवैज्ञानिक युद्ध: धृतराष्ट्र के भीतर कौरव-पक्ष की विजय-आशा टूटती और पाण्डव-पक्ष की अनिवार्य बढ़त स्वीकार होती है।

Adhyaya 11

Droṇa’s Conditional Boon: The Plan to Capture Yudhiṣṭhira (द्रोणेन युधिष्ठिरग्रहणोपायः)

Upa-parva: Droṇābhiṣeka (Droṇa’s appointment as commander) — strategic objective of capturing Yudhiṣṭhira

Sañjaya reports to Dhṛtarāṣṭra the circumstances surrounding Droṇa’s rise to commander and the strategic deliberation that follows. Droṇa, honored with senāpati authority, offers Duryodhana a boon commensurate with the honor received. Duryodhana, consulting with allies, requests that Yudhiṣṭhira be brought alive. Droṇa interrogates the rationale—why capture rather than kill—implicitly acknowledging Yudhiṣṭhira’s reputation for non-hostility (ajātaśatru) and the political value of preserving a rival for negotiation or control. Duryodhana reveals a pragmatic calculus: killing Yudhiṣṭhira would provoke Arjuna into decisive retaliation, whereas capturing him could force a settlement or renewed exile through oath-bound mechanisms. Droṇa, recognizing the strategic intent, grants a conditional promise: Yudhiṣṭhira can be seized only if Arjuna is diverted from the field or separated from protective proximity. The chapter ends with Sañjaya noting that Duryodhana publicizes this objective across the army positions to reinforce resolve, despite the condition that makes the plan operationally complex.

Chapter Arc: धृतराष्ट्र, युद्ध-समाचार सुनते-सुनते, संजय से कहते हैं—अब मुझे बताओ: वह कौन-सा बल है जिसके सहारे पाण्डवों की आशा बढ़ती जाती है? और क्यों कौरवों की विजय किसी उपाय से दिखाई नहीं देती? → संजय धृतराष्ट्र के भय और जिज्ञासा को शांत करने के लिए श्रीकृष्ण की संक्षिप्त लीलाओं का स्मरण कराते हैं—गोपकुल में बाल्यकाल से ही उनकी अद्भुत शक्ति, यमुना-वन में अश्वराज का वध, और दूर-दूर के प्रदेशों (अवन्ती, दाक्षिणात्य, पर्वतीय, दशेरक, काश्मीरक, पिशाच, समुद्गल आदि) पर उनके प्रभाव/विजय का वर्णन। साथ ही अर्जुन की अपराजेयता और केशव के अमेय गुणों का प्रतिपादन होता है। → धृतराष्ट्र का निष्कर्ष कठोर होकर फूट पड़ता है—“किसी भी उपाय से कुरुओं की जय नहीं दिखती; हृषीकेश के कर्मों का अंत बुद्धि-पराक्रम से भी नहीं जाना जा सकता।” इसी बोध के साथ पराजय का छाया-निर्णय अध्याय का शिखर बनता है। → वृत्तांत युद्ध-रणनीति से अधिक ‘कारण’ पर टिकता है: कृष्ण-अर्जुन की महिमा के सामने कौरव-पक्ष की आशा क्षीण पड़ती है। धृतराष्ट्र के भीतर आत्मस्वीकृति उभरती है कि विनाश का बीज उनके ही पक्ष के अहं/द्वेष में था, और जो काल से परिपक्व है उसका वध तिनके से भी हो जाता है। → धृतराष्ट्र संजय से आग्रह करते हैं कि अब युद्ध का यथार्थ क्रम बताओ—आगे रणभूमि में क्या घटा, किस प्रकार घटनाएँ दैवयोग से ‘अन्यथा’ हो रही हैं?

Shlokas

Verse 1

भीकम (2 अमान एकादशोब< ध्याय: धृतराष्ट्रका भगवान्‌ श्रीकृष्णकी संक्षिप्त लीलाओंका वर्णन करते हुए श्रीकृष्ण और अर्जुनकी महिमा बताना धृतराष्ट्र रवाच शृणु दिव्यानि कर्माणि वासुदेवस्य संजय । कृतवान्‌ यानि गोविन्दो यथा नान्य: पुमान्‌ क्वचित्‌

قال دْهريتاراشترا: «يا سنجيا، قصَّ عليَّ الأعمال الإلهية لفاسوديفا. إن ما أنجزه غوڤيندا أعمالٌ لا يقدر أن يأتي بمثلها رجلٌ آخر في أي مكان.»

Verse 2

संवर्धता गोपकुले बालेनैव महात्मना । विख्यापितं बल बाद्दोस्त्रिषु लोकेषु संजय

قال فايشَمبايانا: بينما كان ذلك العظيم الروح ينشأ بين جماعة رعاة البقر، فقد جعل—وهو بعدُ في طفولته—قوة ذراعيه وبأسه البطولي مشتهرَين في العوالم الثلاثة، يا سنجيا.

Verse 3

उच्चै:श्रवस्तुल्यबलं वायुवेगसमं जवे । जघान हयराजं तं यमुनावनवासिनम्‌,यमुनाके तटवर्ती वनमें उच्चै:श्रवाकें समान बलशाली और वायुके समान वेगवान्‌ अश्वराज केशी रहता था। उसे श्रीकृष्णने मार डाला

قال فايشَمبايانا: في الغابة على ضفاف اليَمُنا كان يقيم ملك الخيل كِشي—قوياً كأوتشايهشرَفَس، سريعاً كالرّيح. فضربه شري كريشنا وأسقط ذلك المخلوق المهيب.

Verse 4

दानवं घोरकर्माणं गवां मृत्युमिवोत्थितम्‌ । वृषरूपधरं बाल्ये भुजाभ्यां निजघान ह

وكذلك كان هناك دَانَفٌ شديدُ الفعل، قد اتخذ هيئةَ ثورٍ، فكان كالموت قائمًا على الأبقار. فقتله شري كريشنا في صباه بيديه هو.

Verse 5

प्रलम्बं नरकं जम्भं पीठं चापि महासुरम्‌ | मुरं चान्तकसंकाशमवधीत्‌ पुष्करेक्षण:,तत्पश्चात्‌ कमलनयन श्रीकृष्णने प्रलम्ब, नरकासुर, जम्भासुर, पीठ नामक महान्‌ असुर और यमराजसदृश मुरका भी संहार किया

ثم إن بوشكارِكْشَنَة—شري كريشنا ذو العينين كاللوتس—قتل برالَمبا، ونارَكا، وجَمبها، والعفريت العظيم المسمّى بيṭها، وكذلك مُورا الذي كان مروّعًا كأنتَكا (الموت).

Verse 6

तथा कंसो महातेजा जरासंधेन पालित: । विक्रमेणैव कृष्णेन सगण: पातितो रणे,इसी प्रकार श्रीकृष्णने पराक्रम करके ही जरासंधके द्वारा सुरक्षित महातेजस्वी कंसको उसके गणोंसहित रणभूमिमें मार गिराया

قال فايشَمبايانا: وكذلك كَمسا ذو البأس والضياء—وإن كان في حماية جاراسَنْدها—فقد أسقطه كريشنا في ساحة القتال بجرأته وحدها، هو ومن معه من أتباعه.

Verse 7

सुनामा रणविक्रान्त: समग्राक्षीहिणीपति: । भोजराजस्य मध्यस्थो भ्राता कंसस्य वीर्यवान्‌

قال فايشَمبايانا: «كان هناك سوناما—جسورًا في ساحة القتال، قائدًا لفرقةٍ كاملة من جيشٍ عظيم، ووسيطًا موثوقًا لدى ملك البوجا، وأخًا قويّ البأس لكَمسا».

Verse 8

बलदेवद्वितीयेन कृष्णेनामित्रघातिना । तरस्वी समरे दग्ध: ससैन्य: शूरसेनराट्‌

قال فايشَمبايانا: «ومع بالاديفا، اندفع كريشنا—قاتل الأعداء—في المعركة بقوةٍ لا تُقاوَم كأنها لهبٌ مستعر؛ فاحترق ملك الشوراسينا مع جيشه واندثر.»

Verse 9

शत्रुहन्ता श्रीकृष्णने बलरामजीके साथ जाकर युद्धमें पराक्रम दिखानेवाले, बलवान, वेगवान्‌, सम्पूर्ण अक्षौहिणी सेनाओंके अधिपति, भोजराज कंसके मझले भाई शूरसेन देशके राजा सुनामाको समरमें सेनासहित दग्ध कर डाला ।।

قال فايشَمبايانا: «إن كريشنا، قاتل الأعداء، مضى مع بالاراما وأظهر بأسه في ساحة الوغى. وفي القتال أحرق سوناما مع جنده إحراقًا—ذلك الملك القوي السريع، سيد جيوش الأَكْشَوْهِني، حاكم بلاد الشوراسينا، وهو الأخ الأوسط لكَمسا ملك البوجا. وكذلك فإن البراهمارِشي دُورفاسا، الكاهنَ الناسك شديد الغضب، قد خدمه كريشنا مع زوجته خدمةَ تعظيمٍ وعبادة؛ فلما رضي عنه منحه بركاتٍ كثيرة.»

Verse 10

तथा गान्धारराजस्य सुतां वीर: स्वयंवरे । निर्जित्य पृथिवीपालानावहत्‌ पुष्करेक्षण:

قال فايشَمبايانا: «وفي سْوَيَمْفَرَةِ ملك غاندھارا، ظفر البطل بوشكارِكشَنا بابنة الملك؛ وبعد أن غلب الملوك المجتمعين، حملها معه زوجةً.»

Verse 11

अमृष्यमाणा राजानो यस्य जात्या हया इव | रथे वैवाहिके युक्ता: प्रतोदेन कृतव्रणा:

قال فايشَمبايانا: «إن الملوك، وقد عجزوا عن احتمال المهانة، كانوا كجيادٍ أصيلةٍ بطبعها: قُيِّدوا إلى عربة زفافه، وتركهم سوطُ المِهْمَازِ جرحى.»

Verse 12

जरासंध॑ महाबाहुमुपायेन जनार्दन: । परेण घातयामास समग्राक्षीहिणीपतिम्‌,जनार्दन श्रीकृष्णने समस्त अक्षौहिणी सेनाओंके अधिपति महाबाहु जरासंधको उपायपूर्वक दूसरे योद्धा (भीमसेन)-के द्वारा मरवा दिया

قال فايشَمبايانا: إنَّ جاناردانا (كريشنا)، لا بالقوة المباشرة بل بحيلةٍ محكمة، جعل جَرَاسَنْدَهَ عظيمَ الساعد—سيدَ أكشوهِني كاملة—يُقتَل على يدِ محاربٍ آخر (بهيمسينا).

Verse 13

चेदिराजं च विक्रान्तं राजसेनापतिं बली । अर्घ्ये विवदमानं च जघान पशुवत्‌ तदा,बलवान्‌ श्रीकृष्णने राजाओंकी सेनाके अधिपति पराक्रमी चेदिराज शिशुपालको अग्रपूजनके समय विवाद करनेके कारण पशुकी भाँति मार डाला

قال فايشَمبايانا: عندئذٍ ضرب شري كريشنا القوي ملكَ تشيدي الشجاع—شيشوبالا، قائدَ جموع الملوك—لأنه أثار الخصام أثناء طقس تقديم الأَرغْيَا (شرف العبادة الأولى)، فقتله كما يُقتل الوحش.

Verse 14

सौभ दैत्यपुरं खस्थं शाल्वगुप्तं दुरासदम्‌ । समुद्रकुक्षौ विक्रम्य पातयामास माधव:

قال فايشَمبايانا: إنَّ ماذافا (كريشنا)، بعد أن اقتحم بقوته جوفَ البحر، أسقط سَوْبها—الحصنَ الجويَّ للداناڤا—وكان شالڤا يحرسه حراسةً شديدة وهو بالغُ العُسر في اقتحامه.

Verse 15

तत्पश्चात्‌ माधवने आकाशमें स्थित रहनेवाले सौभ नामक दुर्धर्ष दैत्य-नगरको, जो राजा शाल्दद्वारा सुरक्षित था, समुद्रके बीच पराक्रम करके मार गिराया ।।

ثم بعد ذلك أسقط ماذافا (كريشنا) ببأسه، في وسط البحر، المدينةَ الشيطانيةَ المهيبة المسماة سَوْبها، وكانت قائمةً في السماء ويحميها الملك شالڤا. وفي ساحة القتال غلب أيضًا شعوب أنغا وڤانغا وكالينغا وماغدها وكاشي وكوسالا، وكذلك الڤاتسا والگارگيا والكاروشا والپاونڈرا.

Verse 16

आन्न्त्यान्‌ दाक्षिणात्यांश्न॒ पर्वतीयान्‌ दशेरकान्‌ । काश्मीरकानौरसिकान्‌ पिशाचांश्व समुद्गलान्‌

قال فايشَمبايانا: «يا سَنجايا، إنَّه (شري كريشنا)، ذو العينين كزهرة اللوتس، قد أخضع شعوبًا كثيرة من الثغور والأقاليم: أهل آنَنْتْيَا، وبلاد الجنوب، وديار الجبال، والدَشِيرَكَة، والكاشمير، والأوراسيكَة، والبيشاشا، والمودگالا».

Verse 17

काम्बोजान्‌ वाटधानांश्व चोलान्‌ पाण्ड्यांश्व॒ संजय । त्रिगर्तान्‌ मालवांश्वैव दरदांश्व॒ सुदुर्जयान्‌

قال فايشَمبايانا: «يا سَنْجَيا، لقد أخضعَ الكامبوجا والڤاطَدهانا، والچولا والپانديا؛ وكذلك التريگارتا والمالَڤا، والدَرَدا—وهم أقوامٌ بالغو العُسر في القهر». وتتابع هذه الأبيات سرد انتصارات كريشنا الواسعة، مُصوِّرةً توطيد السلطان في أقاليم شتّى تمهيدًا للصراعات الأخلاقية والسياسية الكبرى في الملحمة.

Verse 18

नानादिग्भ्यश्न सम्प्राप्तान्‌ खशांश्चैव शकांस्तथा । जितवान्‌ पुण्डरीकाक्षो यवनं च सहानुगम्‌

قال فايشَمبايانا: «يا سَنْجَيا، إن شري كريشنا ذا العينين كاللوتس قد قهر محاربين وفدوا من جهات شتّى—ومنهم الخَشَة والشَّكَة—كما أخضع اليَڤَنة مع أتباعهم.» ويُبرز هذا البيت دور كريشنا حاميًا وموحِّدًا؛ فغلباته لا تُعرض كفتحٍ مجرد، بل كإقامةٍ للنظام بقهر قوى الاضطراب وجمع الشعوب المتباينة تحت سلطانٍ واحدٍ مُثبِّت.

Verse 19

प्रविश्य मकरावासं यादोगणनिषेवितम्‌ । जिगाय वरुणं संख्ये सलिलान्तर्गतं पुरा,पूर्वकालमें श्रीकृष्णने जल-जन्तुओंसे भरे हुए समुद्रमें प्रवेश करके जलके भीतर निवास करनेवाले वरुण देवताको युद्धमें परास्त किया

قال فايشَمبايانا: «في سالف الزمان دخل شري كريشنا المحيط—موطن المَكَرات ومجتمع جموع الكائنات المائية—وهناك، في أعماق الماء، غلب ڤارونا في القتال.» ويؤكد السرد بأس كريشنا الذي لا يُجارى حتى في الميادين التي تحكمها آلهة أخرى، عارضًا نصره بوصفه برهانَ سلطانٍ إلهي لا مجرد عدوان.

Verse 20

युधि पञ्चजन हत्वा दैत्यं पातालवासिनम्‌ | पाज्चजन्यं हृषीकेशो दिव्यं शड्खमवाप्तवान्‌

قال فايشَمبايانا: «في ساحة القتال، بعدما قتل هريشيكيشا (كريشنا) الشيطانَ پَنجَجَنا الساكنَ في پاتالا، نال الصدفةَ الإلهية المسماة پَانْچَجَنْيَة.» وتُبيّن الحادثة أن الشارات الإلهية ليست زينةً فحسب؛ بل تُكتسب بقهر قوى الهلاك، ثم تغدو أدواتٍ تُلهِم أهل الحق وتجمعهم في الحرب.

Verse 21

इसी प्रकार हृषीकेशने पाताल-निवासी पंचजन नामक दैत्यको युद्धमें मारकर दिव्य पाज्चजन्य शंख प्राप्त किया ।।

قال فايشَمبايانا: «في غابة خاندَڤا، إن هريشيكيشا (كريشنا) الجبار، مع پارثا (أرجونا)، أرضى إله النار. فلما أتمّ رضى أَغني نال السلاح الأَغنييَّ المهيب في صورة القرص. وعلى النحو نفسه كان قد قتل من قبلُ في القتال شيطانَ پَنجَجَنا الساكنَ في پاتالا، فحاز بذلك الصدفةَ الإلهية المسماة پَانْچَجَنْيَة.» ويؤكد المقطع أن الأسلحة والرموز الإلهية ليست زينةَ حرب، بل تُنال بأفعالٍ حاسمةٍ منسجمةٍ مع نظام الكون—لحماية العالم وإسناد حلفاء الحق.

Verse 22

वैनतेयं समारुह्य त्रासयित्वामरावतीम्‌ | महेन्द्रभवनाद्‌ वीर: पारिजातमुपानयत्‌,वीर श्रीकृष्ण गरुड़पर आरूढ़ हो अमरावती पुरीमें जाकर वहाँके निवासियोंको भयभीत करके महेन्द्रभवनसे पारिजात वृक्ष उठा ले आये

قال فايشامبايانا: امتطى البطلُ فايناتِيا (غارودا) ومضى إلى أمارافَتي فألقى الرعب في قلوب سكانها؛ ثم حمل من قصر ماهِندرا (إندرا) شجرةَ الباريجاتا وعاد بها.

Verse 23

तच्च मर्षितवान्‌ शक्रो जानंस्तस्य पराक्रमम्‌ | राज्ञां चाप्यजितं कज्चित्‌ कृष्णेनेह न शुश्रुम

وقد احتمل شَكْرَةُ (إندرا) ذلك، إذ كان يعلم بأسه حقّ العلم؛ ومن بين الملوك لم أسمع قطّ بمن لم يغلبه كريشنا في هذا العالم.

Verse 24

यच्च तन्महदाक्षर्य सभायां मम संजय । कृतवान्‌ पुण्डरीकाक्ष: कस्तदन्य इहाहति,संजय! उस दिन मेरी सभामें कमलनयन श्रीकृष्णने जो महान्‌ आश्चर्य प्रकट किया था, उसे इस संसारमें उनके सिवा दूसरा कौन कर सकता है?

يا سنجيا! تلك الأعجوبة العظمى التي أظهرها كريشنا ذو العينين كاللوتس في مجلسي يومئذ—من ذا في هذا العالم، سواه، يقدر على مثلها؟

Verse 25

यच्च भकक्‍त्या प्रसन्नो5हमद्राक्ष॑ कृष्णमी श्वरम्‌ । तन्मे सुविदितं सर्व प्रत्यक्षमिव चागमम्‌

لقد أبصرتُ، وأنا مفعم بالرضا والعبادة، كريشنا الإلهَ في هيئته الربّانية؛ وذلك كلّه معلومٌ لديّ تمام العلم، كأنه رأيُ عين، وقد عرفته معرفةَ المشاهدة المباشرة.

Verse 26

नान्तो विक्रमयुक्तस्य बुद्धया युक्तस्य वा पुनः । कर्मणां शक्‍्यते गन्तुं हृषीकेशस्थ संजय,संजय! बुद्धि और पराक्रमसे युक्त भगवान्‌ हृषीकेशके कर्मोका अन्त नहीं जाना जा सकता

يا سنجيا! لا يُستطاع بلوغُ نهاية أعمال هريشيكيشا، المقرونِ بالحكمة والبأس.

Verse 27

तथा गदश्न साम्बश्न प्रद्युम्नोडथ विदूरथ: । अगावहोडनिरुद्धश्ष चारुदेष्ण: ससारण:

قال فايشَمبايانا: وكذلك كان غَدَةُ وسامْبَةُ، ثم برَدْيومْنَةُ وفيدورَثَةُ؛ وأغافاهَةُ وأنيرودْهَةُ وتشاروديشْنَةُ مع سارَنَةَ—فهؤلاء المحاربون أيضًا كانوا حاضرين مصطفّين في تلك الحرب.

Verse 28

उल्मुको निशठश्वैव झिल्ली बश्रुश्न वीर्यवान्‌ पृथुश्न विपृथुश्नमेव शमीको5थारिमेजय:

قال فايشَمبايانا: أُلمُكَةُ، ونِصَطْهَةُ، وكذلك جِهِلِّي؛ وباشْرُشْنَةُ ذو البأس؛ وبِرِثوشْنَةُ ووِبِرِثوشْنَةُ؛ ثم شَمِيكَةُ وأَرِيمِيجَيَةُ—وهكذا تُساق الأسماء متتابعةً في عدٍّ منتظم.

Verse 29

एते<न्ये बलवन्तश्न वृष्णिवीरा: प्रहारिण: । कथंचित्‌ पाण्डवानीकं श्रयेयु: समरे स्थिता:

قال فايشَمبايانا: «وهؤلاء الآخرون أيضًا—أبطالُ الفْرِشْنِي الأقوياء، المتمرّسون بالضرب—إذا ثبتوا في ساحة القتال، فربما استطاعوا على نحوٍ ما أن يجدوا ملجأً بالانضمام إلى جيش الباندافا».

Verse 30

आहूता वृष्णिवीरेण केशवेन महात्मना | ततः संशयितं सर्व भवेदिति मतिर्मम

قال فايشَمبايانا: «لمّا استدعاني كيشَفَةُ—ذلك البطلُ العظيمُ النفس من الفْرِشْنِي—خلصتُ في فكري إلى أنّ كلَّ ما يأتي بعد ذلك سيغدو مُلتبسًا، محفوفًا بالشك.»

Verse 31

वनमाला और हल धारण करनेवाले वीर बलराम कैलास-शिखरके समान गौरवर्ण हैं। उनमें दस हजार हाथियोंका बल है। वे भी उसी पक्षमें रहेंगे, जहाँ श्रीकृष्ण हैं

قال فايشَمبايانا: إنّ البطلَ بالاراما—المتزيّنَ بإكليلٍ من أزهار الغاب، الحاملَ للمحراث—يتلألأ ببياضٍ كقمة جبل كايلاسا. وفيه قوةُ عشرةِ آلافِ فيل، وهو أيضًا سيقف في الجانب نفسه الذي فيه شري كريشنا.

Verse 32

यमाहु: सर्वपितरं वासुदेव॑ द्विजातय: । अपि वा होष पाण्डूनां योत्स्यते<र्थाय संजय

قال فايشامبايانا: «إنّ ذوي الميلادين يعلنون فاسوديفا أبًا كونيًّا للجميع. وإلا، يا سَنْجَيا، فسيقاتل من أجل مصلحة الباندافا».

Verse 33

संजय! जिन भगवान्‌ वासुदेवको द्विजगण सबका पिता बताते हैं, क्या वे पाण्डवोंके लिये स्वयं युद्ध करेंगे? ।।

قال فايشامبايانا: «يا سَنْجَيا! إنّ حكماء البراهمة يعلنون فاسوديفا المبارك أبًا للجميع. فإن حمل السلاح من أجل الباندافا، أفَيُقاتِلُ بنفسه؟ لأنّه، يا سَنْجَيا العزيز، حين يتدرّع كريشنا ويتهيّأ للقتال نصرةً للباندافا، فلن يكون هناك محاربٌ يستطيع—ولا يجرؤ—أن يقف في وجهه.»

Verse 34

यदि सम कुरव: सर्वे जयेयुर्नाम पाण्डवान्‌ | वार्ष्णेयो<र्थाय तेषां वै गृह्नीयाच्छस्त्रमुत्तमम्‌

قال فايشامبايانا: «حتى لو غلب الكاورافا جميعًا الباندافا، فإنّ الفارشنِيَّا (كريشنا)، لخيرهم، سيأخذ يقينًا بأفضل سلاح.»

Verse 35

ततः सर्वान्‌ नरव्याप्रो हत्वा नरपतीन्‌ रणे | कौरवांश्व महाबाहु: कुन्त्यै दद्यात्‌ स मेदिनीम्‌,उस दशामें पुरुषसिंह महाबाहु श्रीकृष्ण सब राजाओं तथा कौरवोंको रणभूमिमें मारकर सारी पृथ्वी कुन्तीको दे देंगे

قال فايشامبايانا: «ثم إنّ ذلك الأسد بين الرجال، عظيم الساعد، بعد أن يقتل في المعركة جميع الملوك والكاورافا، سيهب هذه الأرض كلّها لكونتي.»

Verse 36

यस्य यन्ता हृषीकेशो योद्धा यस्य धनंजय: । रथस्य तस्य कः संख्ये प्रत्यनीको भवेद्‌ रथ:

قال فايشامبايانا: «لأيّ عربةٍ يكون سائقها هريشيكيشا (كريشنا)، سيّد الحواس، ومقاتلها دهننْجَيا (أرجونا)، فأيُّ عربةٍ أخرى في ساحة الوغى يمكن أن تقوم لها مقام الندّ والخصم؟»

Verse 37

न केनचिदुपायेन कुरूणां दृश्यते जय: । तस्मान्मे सर्वमाचक्ष्व यथा युद्धमवर्तत,किसी भी उपायसे कौरवोंकी जय होती नहीं दिखायी देती। इसलिये तुम मुझसे सब समाचार कहो। वह युद्ध किस प्रकार हुआ?

قال فايشَمبايانا: «لا تبدو غلبةُ الكورو ممكنةً بأي حيلةٍ كانت. فحدِّثني بكل شيءٍ على التمام—كيف جرت تلك المعركة؟»

Verse 38

अर्जुन: केशवस्यात्मा कृष्णो5प्यात्मा किरीटिन: । अर्जुने विजयो नित्यं कृष्णे कीर्तिश्व शाश्वती

قال فايشَمبايانا: «إن أرجونا كأنه نفسُ كيشافا، وكريشنا كذلك كأنه نفسُ أرجونا ذي التاج. في أرجونا تقيم الغلبة على الدوام، وفي كريشنا تسكن الشهرةُ التي لا تبلى سكنًا أبديًّا.»

Verse 39

सर्वेष्वपि च लोकेषु बीभत्सुरपराजित: । प्राधान्येनेव भूयिष्ठममेया: केशवे गुणा:

قال فايشَمبايانا: «في جميع العوالم لم يُغلَب بيبهاتسو (أرجونا) قطّ في موضعٍ ما. وفي كيشافا (شري كريشنا) فضائلُ لا تُحصى ولا تُقاس؛ وهنا إنما تُذكر، كأنما، أسمى تلك الخصال وأعلاها.»

Verse 40

मोहाद्‌ दुर्योधन: कृष्णं यो न वेत्तीह केशवम्‌ | मोहितो दैवयोगेन मृत्युपाशपुरस्कृत:,दुर्योधन मोहवश सच्चिदानन्दस्वरूप भगवान्‌ केशवको नहीं जानता है, वह दैवयोगसे मोहित हो मौतके फंदेमें फँस गया

قال فايشَمبايانا: «من فرط الوهم لا يعرف دُريودَهَنا كريشنا هنا—كيشافا على حقيقته. وقد أضلّه تسييرُ القدر، فمضى قُدُمًا وحبلُ الموت منصوبٌ أمامه.»

Verse 41

न वेद कृष्णं दाशार्हमर्जुनं चैव पाण्डवम्‌ । पूर्वदेवी महात्मानौ नरनारायणावुभौ

قال فايشَمبايانا: «لم تعرف كريشنا من سلالة الداشاره، ولم تعرف أرجونا الباندَفي—هذين العظيمَي النفس اللذين كانا في الأزمنة السالفة الزوجَ الإلهي نارا ونارايانا.»

Verse 42

यह दशा्कुलभूषण श्रीकृष्ण और पाण्डुपुत्र अर्जुनको नहीं जानता है, वे दोनों पूर्वदेवता महात्मा नर और नारायण हैं ।। एकात्मानौ द्विधाभूतौ दृश्येते मानवैर्भुवि । मनसा5पि हि दुर्धर्षा सेनामेतां यशस्विनौ

قال فايشَمبايانا: من لم يعرف شري كريشنا—زينة سلالة اليادو—وأرجونا ابن باندو، فإنه لا يعرف حقيقتهما. فهذان هما الإلهان القديمان، العظيما الروح نارا ونارايانا. هما واحدان في الجوهر، غير أنهما يبدوان لعيون البشر على الأرض اثنين؛ وحتى بمحض الإرادة فهما لا يُقهران—هذان الجليلان—أمام هذا الجيش بأسره.

Verse 43

युगस्येव विपर्यासो लोकानामिव मोहनम्‌

قال فايشَمبايانا: «كان الأمر كأن نظام العصر نفسه قد انقلب—سحرٌ أوقع الناس في الحيرة. في تلك اللحظة غدا ما ينبغي أن يكون جليًّا ملتبسًا، وبدا العالم كأنه واقع في قبضة الوهم، كأن الدارما وحسنَ التمييز قد حُجبا باضطراب الحرب.»

Verse 44

न होव ब्रह्मचर्येण न वेदाध्यपयनेन च

قال فايشَمبايانا: «ليس بمراعاة البراهماتشاريا، ولا حتى بتعليم الفيدا…» (والقول متصل)، دالًّا على أن مجرد الزهد والانضباط أو سلطة العلم وحدها لا تكفي لنيل الغاية الأخلاقية أو الروحية المقصودة؛ فالسرد ينتقد الاتكال على الألقاب الدينية الظاهرة دون الصفات الباطنة والسلوك الذي تقتضيه الدارما.

Verse 45

लोकसम्भावितौ वीरीौ कृतास्त्रौ युद्धदुर्मदौ

قال فايشَمبايانا: كان البطلان، المشهوران الموقَّران في أعين الناس، قد أُحكما التدريب على فنون السلاح؛ ولما استبدّ بهما سُكرُ الكِبْر الذي تُنبتُه المعارك، غدوا أشدّاءَ عُسْرَ الكبح في الحرب.

Verse 46

यां तां श्रियमसूयाम: पुरा दृष्टवा युधिषछ्टिरे

قال فايشَمبايانا: «يا يودهيشثيرا، تلك النعمة وذلك البهاء بعينه، الذي رأيناه من قبل بل وحسدناه—»

Verse 47

मत्कृते चाप्यनुप्राप्त: कुरूणामेष संक्षय:

قال فايشَمبايانا: «وحتى من أجلي أنا أيضًا، قد وقع هذا الفناء على آل كورو».

Verse 48

अनन्तमिदमैश्वर्य लोके प्राप्तो युधिष्ठिर:

قال فايشَمبايانا: «لقد نال يودهيشثيرا في هذا العالم مُلكًا لا حدّ له وبهاءً عظيمًا».

Verse 49

यस्य कोपान्महात्मानौ भीष्मद्रोणौ निपातितौ । युधिष्ठिर इस संसारमें अनन्त ऐश्वर्यके भागी हुए हैं। जिनके कोपसे महात्मा भीष्म और द्रोण मार गिराये गये ।। प्राप्त: प्रकृतितो धर्मो न धर्मो मामकान्‌ प्रति

قال فايشَمبايانا: «بغضبِ مَن سقط العظيما النفس بهيشما ودرونا، فذلك يودهيشثيرا نفسه صار شريكًا في مُلكٍ لا ينفد في هذا العالم. غير أنّ الدارما التي تنشأ بطبيعتها وتُنال حقًّا لا تُرى حين يتعلّق الأمر بأهلي؛ ففي لهيب هذه الحرب لا تقف الاستقامة إلى جانب الهوى والتحزّب.»

Verse 50

क्रूर: सर्वविनाशाय कालो5सौ नातिवर्तते । युधिष्ठटिरको धर्मका स्वाभाविक फल प्राप्त हुआ है, किंतु मेरे पुत्रोंकी उसका फल नहीं मिल रहा है। सबका विनाश करनेके लिये प्राप्त हुआ यह क्रूर काल बीत नहीं रहा है ।।

قال فايشَمبايانا: «إنّ هذا الزمان القاسي، الذي جاء ليجلب الفناء للجميع، لا يمضي. لقد نال يودهيشثيرا—الثابت على الدارما—الثمرة الطبيعية للبرّ، غير أنّ أبنائي لا ينالون جزاءها. هذا الزمان الغاشم، القادم لإهلاك الكل، لا يبرح مكانه. ولولا ذلك، يا عزيز، لكانت العواقب التي تصوّرها ذوو الهمم السامية على غير ما صارت إليه.»

Verse 51

तस्मादपरिहार्ये<र्थे सम्प्राप्ते कृच्छू उत्तमे । अपारणीये दुश्निन्त्ये यथाभूत॑ प्रचक्ष्य मे,अतः इस अनिवार्य, अपार, दुश्निन्त्य एवं महान्‌ संकटके प्राप्त होनेपर जो घटना जिस प्रकार हुई हो, वह मुझे बताओ

فلذلك، إذ قد نزل أمرٌ لا مفرّ منه—محنةٌ قصوى لا تُقاس ولا يُستكنه غورها—فأخبرني على وجه الدقّة كيف جرت الوقائع، كما وقعت حقًّا.

Verse 331

यदि गद, साम्ब, प्रद्युम्न, विदूरथ, अगावह, अनिरुद्ध, चारुदेष्ण, सारण, उल्मुक, निशठ, झिल्ली, पराक्रमी बश्रु, पृथु, विपृथु, शमीक तथा अरिमेजय--ये तथा दूसरे भी बलवान एवं प्रहारकुशल वृष्णिवंशी योद्धा वृष्णिवंशके प्रमुख वीर महात्मा केशवके बुलानेपर पाण्डव-सेनामें आ जायेँ और समरभूमिमें खड़े हो जायेँ तो हमारा सारा उद्योग संशयमें पड़ जाय; ऐसा मेरा विश्वास है ।। नागायुतबलो वीर: कैलासशिखरोपम: । वनमाली हली रामस्तत्र यत्र जनार्दन:

قال فايشَمبايانا: «لو أن غَدَا، وسامبا، وبراديومنَ، وفيدورَثَ، وأغاوَهَ، وأنيرودها، وتشاروديشْنَ، وسارَنَ، وأولموكَ، ونيشَطَ، وجهيلِّي، وبَشْرُ الشجاع، وبِرِثو، وفيبِرِثو، وشاميكَ، وأريميجَيَ—ومعهم سائرُ المحاربين الأقوياء المهرة في الضرب من سلالة فْرِشْنِي—لبّوا نداء كيشَفَا عظيمِ النفس، فدخلوا جيشَ الباندَفَة ووقفوا في ساحة القتال، لوقع كلُّ مسعانا في مهبِّ الشك؛ ذلك يقيني. قويٌّ كقوة عشرة آلاف ناغا، بطلٌ كقمة كايلاسا—راما حاملُ المحراث، المتوَّجُ بإكليلِ زهورِ الغابة، يكون هناك حيثما كان جاناردانا».

Verse 423

नाशयेतामिहेच्छन्तौ मानुषत्वाच्च नेच्छत: । उनकी आत्मा तो एक है; परंतु इस भूतलके मनुष्योंको वे शरीरसे दो होकर दिखायी देते हैं। उन्हें मनसे भी पराजित नहीं किया जा सकता। वे यशस्वी श्रीकृष्ण और अर्जुन यदि इच्छा करें तो मेरी सेनाको तत्काल नष्ट कर सकते हैं; परंतु मानवभावका अनुसरण करनेके कारण ये वैसी इच्छा नहीं करते हैं

قال فايشَمبايانا: «لو شاءا لاستطاعا أن يدمّرا كلَّ ما هنا؛ غير أنهما، لالتزامهما حالَ البشر، لا يشاءان ذلك. في الحقيقة إن ذاتَهما واحدة، لكنهما على هذه الأرض يبدوان للناس جسدين اثنين. ولا يمكن قهرهما حتى في الخاطر. هذان المجيدان—شري كريشنا وأرجونا—لو اختارا لأفنيا جيشي في لحظة؛ لكنهما، اتباعًا لنهج السلوك الإنساني، لا يضمران مثل هذه المشيئة».

Verse 436

भीष्मस्य च वधस्तात द्रोणस्य च महात्मन: । तात! भीष्म तथा महात्मा द्रोणका वध युगके उलट जानेकी-सी बात है। सम्पूर्ण लोकोंको यह घटना मानो मोहमें डालनेवाली है

قال فايشَمبايانا: «يا بُنيّ، إن قتلَ بهيشما وقتلَ درونا عظيمِ النفس كأنما هو انقلابُ العالم رأسًا على عقب. إن مثل هذا الحدث يوقع جميع الكائنات في ذهول، لأنه يقلب المألوف من التوقعات بشأن الدارما، وبشأن الحماية، وبشأن سقوط من كان يُظَنّ أنه لا يُقهَر».

Verse 443

न क्रियाभिरनन चास्त्रेण मृत्यो: कश्षिन्निवार्यते जान पड़ता है, कोई भी न तो ब्रह्मचर्यके पालनसे, न वेदोंके स्वाध्यायसे, न कर्मोके अनुष्ठानसे और न अस्त्रोंके प्रयोगसे ही अपनेको मृत्युसे बचा सकता है

قال فايشَمبايانا: «لا أحد يستطيع دفعَ الموت—لا بالأعمال الطقسية ولا باستعمال السلاح. تؤكد هذه الآية حتمية الفناء، حتى مع الانضباط والقوة القتالية، وتذكّر بأن سعي الإنسان محدود أمام ناموس الزمان».

Verse 453

भीष्मद्रोणौ हतौ श्रुत्वा कि नु जीवामि संजय । संजय! लोकसम्मानित, अस्त्रविद्याके ज्ञाता तथा युद्धदुर्मद वीरवर भीष्म और द्रोणाचार्यके मारे जानेका समाचार सुनकर मैं किसलिये जीवित रहूँ?

قال فايشَمبايانا: «يا سَنْجَيا، بعدما سمعتُ أن بهيشما ودرونا قد قُتلا، لِمَ أعيش بعدُ؟ يا سنجيا—هذان البطلان الأوّلان، المكرَّمان في العالم، العارفان بعلم الأسلحة، الشديدان في كبرياء القتال—حين أسمع خبرَ موتِ بهيشما ودروناآتشاريّا، لأيِّ سببٍ أبقى حيًّا؟»

Verse 463

अद्य तामनुजानीमो भीष्मद्रोणवधेन ह । पूर्वकालमें राजा युधिष्ठिरके पास जिस प्रसिद्ध राजलक्ष्मीको देखकर हमलोग उनसे डाह करने लगे थे, आज भीष्म और द्रोणाचार्यके वधसे हम उसके कटु फलका अनुभव कर रहे हैं

قال فايشَمبايانا: «اليوم لا بدّ لنا أن نقبل ذلك—حقًّا، بسبب مقتل بهيشما ودرونا. لقديمًا، حين رأينا حظَّ الملك يودهيشثيرا ومجده الملوكي المشهور، استبدّت بنا الغيرة؛ واليوم، بموت بهيشما والمعلّم دروناآچاريا، نتذوّق الثمرة المُرّة لتلك الغيرة.»

Verse 473

पक्‍वानां हि वधे सूत वज्ायन्ते तृणान्युत । सूत! मेरे ही कारण यह कौरवोंका विनाश प्राप्त हुआ है। जो कालसे परिपक्व हो गये हैं, उनके वधके लिये तिनके भी वज्रका काम करते हैं

قال فايشَمبايانا: «يا سوتا، إذا نضجت الكائنات للموت، صار حتى نصلُ العشب كالصاعقة لهلاكها. حقًّا، وبسببي حلّ خراب الكورافا. فمن أنضجهم الزمانُ (كالا) تمامًا، تصبح أهونُ عِلّةٍ أداةً لقَدَرٍ لا يُقاوَم.»

Verse 506

अन्यथैव प्रपद्यन्ते दैवादिति मतिर्मम । तात! मनस्वी पुरुषोंद्वारा अन्य प्रकारसे सोचे हुए कार्य भी दैवयोगसे कुछ और ही प्रकारके हो जाते हैं; ऐसा मेरा अनुभव है

قال فايشَمبايانا: «إن يقيني أن الأمور تؤول على غير ما يُراد، بقوة القدر. يا بُنيّ، حتى الأعمال التي يتدبّرها الرجل ذو العزم الشديد تدبيرًا محكمًا، كثيرًا ما تُثمر—باقتران المصير—على وجهٍ مغاير تمامًا؛ تلك خلاصة ما علّمتني التجربة.»

Frequently Asked Questions

The dilemma concerns legitimizing an objective framed as restraint (capture alive) while still instrumentalizing a righteous king for political control, raising the question of whether a less-lethal aim is ethically sound when pursued for coercive ends.

The passage teaches that power must acknowledge constraints: even the most celebrated warrior cannot guarantee outcomes against superior counter-force (Arjuna), and policy claims must be conditional on real capacities rather than on prestige or desire.

No explicit phalaśruti appears; the meta-commentary is structural—Sañjaya’s framing emphasizes how stated intentions, conditional promises, and public proclamations shape collective action and foreshadow later consequences.

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