Mahabharata Adhyaya 103
Drona ParvaAdhyaya 10344 Versesपाण्डव पक्ष के लिए क्षणिक उभार—कृष्ण-अर्जुन व्यूह भेदकर आगे; कौरव पक्ष में घबराहट, फिर दुर्योधन के आगमन से प्रतिरोध का पुनर्गठन।

Adhyaya 103

भीमसेन-द्रोण-संग्रामः (Bhīmasena and Droṇa: Containment, Advance, and Recognition)

Upa-parva: Droṇa Parva (War-Day Episode: Bhīmasena–Droṇa Encounter amid the Jayadratha-vadha campaign)

Saṃjaya reports Bhīmasena emerging from dense chariot ranks “like the sun from darkness,” prompting Droṇa to attempt restraint through intense arrow-showers. Bhīma, described as difficult to approach in battle, disperses surrounding fighters and hurls a formidable gadā whose impact terrifies and scatters units. Droṇa advances to meet him, checks him with waves of arrows, and the duel is characterized as vast and severe, comparable to divine–asuric conflict. Under heavy missile pressure, Bhīma dismounts and closes on foot, seemingly absorbing the arrow-rain; he seizes and throws Droṇa’s chariot, forcing Droṇa to remount another chariot and move toward the formation’s gate, aided by swift driving. Bhīma returns to his own chariot and continues breaking through multiple contingents (including Bhoja and Kāmboja forces), seeking Arjuna, who is engaged with the Jayadratha objective. Bhīma’s roar is heard by Arjuna and Vāsudeva, who respond with their own calls and move to see him. Hearing these sounds, Yudhiṣṭhira’s anxiety eases; he internally reflects on Arjuna’s survival and capacity, enumerating prior feats as grounds for confidence, while the broader battle remains intense.

Chapter Arc: श्रीकृष्ण सारथि और धनुर्धर अर्जुन द्रोणाचार्य की समुद्र-सी सेना को चीरते हुए आगे बढ़ते हैं; यह दृश्य देखकर कौरव-सैनिकों के हृदय में निराशा और लज्जा एक साथ उठती है। → कौरवों के महात्मा योद्धा साहस बटोरकर धनंजय की ओर लौटते हैं, पर जो-जो क्रोध और अमर्ष से अर्जुन के सामने गया, वह समुद्र-धारा की तरह फिर-फिर उसी ओर खिंचता चला आता है; उधर कृष्ण-अर्जुन द्रोणानीक को पार कर ऐसे दिखते हैं मानो हिंस्र पशुओं से भरे पर्वत लाँघकर दो व्यापारी निकल आए हों। → जब दोनों तेजस्वी वीर द्रोणसेना को लाँघ जाते हैं, तब कौरव पक्ष जयद्रथ के जीवन के लिए अनिष्ट शंका करता है; उसी क्षण दुर्योधन अपने अनुचरों सहित सामने आकर मार्ग रोकता है और कृष्ण अर्जुन से ‘प्राप्तकाल’ वचन कहने को उद्यत होते हैं। → अध्याय का निष्कर्ष इस बोध में ठहरता है कि द्रोणानीक से ‘मुक्त’ होकर कृष्ण-अर्जुन का तेज सूर्य और अग्नि के समान दहक रहा है—वे मानो मगर के मुख से छूटकर पार उतर आए हों; कौरवों की आशा अब दुर्योधन के प्रतिरोध पर टिक जाती है। → दुर्योधन के सामने आने पर कृष्ण अर्जुन को जो निर्णायक ‘प्राप्तकाल’ उपदेश/आदेश देने वाले हैं, वही अगले प्रसंग का द्वार बनता है।

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ३८ श्लोक हैं) हि ही बक। हि मा एकाधिकशततमो< ध्याय: श्रीकृष्ण और अर्जुनको आगे बढ़ा देख कौरव-सैनिकोंकी निराशा तथा दुर्योधनका युद्धके लिये आना संजय उवाच स्रंसन्‍त इव मज्जानस्तावकानां भयान्नूप । तौ दृष्टवा समतिक्रान्तो वासुदेवधनंजयौ

قال سنجيا: أيها الملك، لما رأى محاربوك فاسوديفا (كṛṣṇa) ودهانَنْجَيا (أرجونا) يندفعان إلى الأمام وقد تجاوزا الجميع، جعل الخوفُ نخاعَهم كأنه ينزلق—كأن القوة والعزم ينسحبان من داخلهم. إن المشهد علامةُ منعطفٍ نفسيٍّ وأخلاقيّ: فزخم كṛṣṇa وأرجونا في جانب الحق يزلزل جيش الكورو، ويكشف كيف تنهار الثقة الباطنة حين يواجه المرء غايةً وبأسًا أسمى في الحرب.

Verse 2

सर्वे तु प्रतिसंरब्धा हीमन्त: सत्त्वचोदिता: । स्थिरीभूता महात्मान: प्रत्यगच्छन्‌ धनंजयम्‌

قال سانجيا: حينئذٍ نهض أولئك المحاربون العظام النفوس جميعًا، وقد استُثيروا وتصلّبوا للقتال، مدفوعين بالشجاعة وثبات العزم في الباطن؛ فشدّوا أذهانهم وتقدّموا بسخطٍ نحو دهننجايا (أرجونا).

Verse 3

ये गता: पाण्डवं युद्धे रोषामर्षसमन्विता: । तेडद्यापि न निवर्तन्ते सिन्धव: सागरादिव,जो लोग युद्धमें रोष और अमर्षसे भरकर पाण्डुनन्दन अर्जुनके सामने गये, वे समुद्रतक गयी हुई नदियोंके समान आजतक नहीं लौटे

قال سانجيا: إن الذين خرجوا إلى القتال ضد أرجونا ابن باندو، ممتلئين غضبًا وكبرياءً مجروحًا، لم يعودوا إلى اليوم—كالأنهار إذا بلغت المحيط لا ترجع أدراجها.

Verse 4

असन्तस्तु न्यवर्तन्त वेदेभ्य इव नास्तिका: । नरकं भजमानास्ते प्रत्यपद्यन्त किल्बिषम्‌

قال سانجيا: أمّا الأدنياء فقد ارتدّوا على أعقابهم، كما يبتعد الملاحدة عن الفيدا. إذ اختاروا طريقًا يفضي إلى الجحيم، لم يحصدوا إلا الإثم وعادوا بالخزي.

Verse 5

तावतीत्य रथानीकं विमुक्तौ पुरुषर्षभौ । ददृशाते यथा राहोरास्यान्मुक्तौ प्रभाकरी

قال سانجيا: وبعد أن اجتازا كتلة صفوف العربات الحربية وتحرّرا من الطوق، بدا أفضل الرجلين—كريشنا وأرجونا—كالشمس والقمر وقد أُطلقا من فم راهو.

Verse 6

मत्स्याविव महाजालं विदार्य विगतक्लमौ । तथा कृष्णावदृश्येतां सेनाजालं विदार्य तत्‌

قال سانجيا: وكما أن سمكتين تمزّقان شبكة عظيمة فتخرجان بلا إعياء، كذلك شوهد كريشنا وأرجونا—بعد أن شقّا ذلك الحشد من الجيش كأنه شبكة—يبدوان غير متعبين.

Verse 7

विमुक्तौ शस्त्रसम्बाधाद्‌ द्रोणानीकात्‌ सुदुर्भिदात्‌ | अदृश्येतां महात्मानौ कालसूर्याविवोदितौ

قال سانجيا: بعدما تحرّرا من زحام السلاح وضغطه، ونجَوَا من تشكيل جيش درونا—وهو تشكيل عسير الكسر حقًّا—بان العظيما الروح، كريشنا وأرجونا، للعيان كالشمس إذا طلعت في زمن الفناء الكوني. وتُبرز هذه الصورة إشعاعهما القتالي المهيب، القريب من رهبة نهاية العالم، كما تُعلن انعطافًا حاسمًا في زخم المعركة أخلاقيًّا واستراتيجيًّا.

Verse 8

अस्त्रसम्बाधनिर्मुक्तौ विमुक्तौ शस्त्रसंकटात्‌ | अदृश्येतां महात्मानौ शत्रुसम्बाधकारिणौ

قال سانجيا: بعدما تحرّرا من ازدحام المقذوفات وتخلّصا من خطر السلاح المتلاصق في القتال القريب، غاب العظيما الروح عن الأنظار—وهما اللذان كانا سببًا في ذلك الضغط الساحق على أعدائهما. ويُبرز البيت كيف يستطيع المقاتلون الاستثنائيون، وسط الفوضى الأخلاقية للحرب، أن يتجاوزوا لحظةً ساحة القتال المرئية، فيردّوا آلية العنف ذاتها على من يشهرها.

Verse 9

अक्षोभयेतां सेनां तौ समुद्र मकराविव

قال سانجيا: إنهما—كوحشين من وحوش البحر يهيّجان المحيط—ألقيا الجيش كلَّه في اضطراب. وفي تلك اللحظة، رأى جنودك وأبناؤك شري كريشنا وأرجونا وقد دخلا في صفّ دروناآچاريا، فحكموا قائلين: «لن يقدرا هذان على تجاوز درونا (واختراقه)».

Verse 10

तावकास्तव पुत्रा श्च द्रोणानीकस्थयोस्तयो: । नैतौ तरिष्यतो द्रोणमिति चक़ुस्तदा मतिम्‌

قال سانجيا: إن محاربيك وأبناءك، لما رأوا هذين—كريشنا وأرجونا—وقد دخلا في صفّ درونا، كوّنوا عندئذٍ هذا الرأي: «لن يستطيع هذان أن يعبرَا درونا ويتجاوزاه». ويُبرز البيت توتر الحرب الأخلاقي: ثقةٌ متجذّرة في الاتكال على قائد واحد جبار، واستخفافٌ بعزم الخصم ومهارته المسدَّدة بهداية إلهية.

Verse 11

तौतु दृष्टवा व्यतिक्रान्तौ द्रोणानीकं महाद्युती । नाशशंसुर्महाराज सिन्धुराजस्य जीवितम्‌

قال سانجيا: ولكن لما رأوا هذين البطلين ذوي البهاء العظيم وقد اخترقا صفّ درونا، أيها الملك، لم يبقَ لأبنائك رجاءٌ في بقاء ملك السِّندهو حيًّا.

Verse 12

आशा बलवती राजन्‌ सिन्धुराजस्य जीविते । द्रोणहार्दिक्ययो: कृष्णौ न मोक्ष्येते इति प्रभो

قال سانجيا: «أيها الملك، اشتدّ الرجاء في نجاة ملك السِّندهو، لأن الناس كانوا يعتقدون: “إن كريشنا وأرجونا لن يفلتَا من درونا وهارديكيا (كريتافارمان)، يا مولاي.”»

Verse 13

तामाशां विफलीकृत्य संतीर्णो तौ परंतपौ । द्रोणानीक॑ महाराज भोजानीकं च दुस्तरम्‌

قال سانجيا: «أيها الملك، إن ذينك المُحرقَين للأعداء—كريشنا وأرجونا—بعد أن أبطلا رجاء الخصم، شقّا طريقهما قسرًا، فعَبَرا وتجاوزا صفَّ درونا المهيب، وكذلك الكتيبة البهوجية العسيرة الاجتياز.»

Verse 14

अथ दृष्टवा व्यतिक्रान्ती ज्वलिताविव पावकौ । निराशा: सिन्धुराजस्य जीवितं न शशंसिरे

قال سانجيا: «ثم لما رأى جنودك ذينك البطلين وقد تجاوزا الجيش كله، متأجّجين كأنهما نارَان، دبّ اليأس فيهم ولم يعودوا يرجون بقاء ملك السِّندهو حيًّا.»

Verse 15

मिथश्ल समभाषेतामभीतौ भयवर्धनौ । जयद्रथवधे वाचस्तास्ता: कृष्णधनंजयौ,दूसरोंका भय बढ़ाने और स्वयं निर्भय रहनेवाले श्रीकृष्ण और अर्जुन आपसमें जयद्रथवधके विषयमें इस प्रकार बातें करने लगे--

قال سانجيا: «وكان كريشنا وأرجونا، لا خوف في قلبيهما ويزيدان الرعب في قلوب الأعداء، يتحدثان معًا، يتبادلان شتى الكلمات بشأن قتل جايا دراثا.»

Verse 16

असौ मध्ये कृत: षड्भिर्धार्तराष्ट्र॑महारथै: । चक्षुविषयसम्प्राप्तो न मे मोक्ष्यति सैन्धव:

قال سانجيا: «وإن كان السَّيندهافا قد وُضع في قلب ستةٍ من عظماء فرسان المركبات من سلالة دِهرتراشترا، فإذا وقع في مدى بصري فلن يفلت حيًّا من يدي.»

Verse 17

यद्यस्य समरे गोप्ता शक्रो देवगणै: सह । तथाप्येनं निहंस्थाव इति कृष्णावभाषताम्‌

قال سانجيا: «ولو أن شَكْرَةَ (إندرا) مع جموع الآلهة حماه في ساحة القتال، فإننا نحن الاثنين سنضربه صريعًا لا محالة». هكذا كان الكريشنان يتخاطبان، مُعلنين عزمًا لا يتزعزع تحت وطأة الضغط الأخلاقي للحرب.

Verse 18

इति कृष्णा महाबाहू मिथो5कथयतां तदा | सिन्धुराजमवेक्षन्तौ त्वत्पुत्रा बहु चुक्रुशु:

قال سانجيا: وبينما كان كṛṣṇa وأرجونا ذو الساعدين الجبارين يتحدثان هكذا، وأبصارهما معلّقة بملك السِّندهو (جَيدَرَثا)، أطلق أبناؤك صخبًا عظيمًا.

Verse 19

अतीत्य मरुधन्वानं प्रयान्तौ तृषितो गजौ । पीत्वा वारि समाश्र्‌स्तौ तथैवास्तामरिंदमौ

قال سانجيا: كما أن فيلين عطشين، بعد أن يجتازا أرضًا قاحلة كالصحراء، يشربان الماء فيسكنان ويطمئنان، كذلك كṛṣṇa وأرجونا—قاهرا الأعداء—لما شقّا صفوف جيش الخصم أحسّا باندفاع من الراحة وبِشاشة الثقة.

Verse 20

व्याप्रसिंहणजाकीर्णानतिक्रम्य च पर्वतान्‌ । वणिजाविव दृश्येतां हीनमृत्यू जरातिगौ

قال سانجيا: بعدما اجتاز كṛṣṇa وأرجونا تلك الصفوف الشبيهة بالجبال، المكتظة بالنمور والأسود والفيلة، بدَوَا كأنهما تاجران عبرا جبالًا خطرة تعجّ بالوحوش ثم ظهرا آمنين راضيين؛ وكذلك هذان اللذان لا تمسّهما الموت ولا الشيخوخة، بدَوَا مطمئنين بعد أن تخطّيا ذلك الجيش.

Verse 21

तथा हि मुखवर्णो5यमनयोरिति मेनिरे । तावका वीक्ष्य मुक्त तौ विक्रोशन्ति सम सर्वश:

قال سانجيا: «حقًّا إن بهاء وجهيهما واحد»، هكذا قدّر المحاربون. ولما رأوا الاثنين قد انفلتَا، علا صخب جنودك من كل ناحية، إذ أبصروا كṛṣṇa وأرجونا يلمعان كشمسين، كأنهما أُطلقا من قبضة دروṇa الرهيب وسائر الملوك—وهم مُفزعون كالأفعى السامة وكالنار المتأججة.

Verse 22

द्रोणादाशीविषाकाराज्ज्वलितादिव पावकात्‌ । अन्येभ्य: पार्थिवेभ्यक्षु भास्वन्ताविव भास्करौ

قال سنجيا: «بدَوا كشمسين متألقتين، كأنهما أفلتتا من قبضة درونا—المهيب كالأفعى السامة—ومن نار الملوك الآخرين المتأججة. فلما رأى جنودك شري كريشنا وأرجونا هناك، يلمعان بتلك البهاء، ارتفع الصخب من كل ناحية».

Verse 23

विमुक्तौ सागरप्रख्याद्‌ द्रोणानीकादरिंदमौ । अदृश्येतां मुदा युक्तौ समुत्तीर्यार्णवं यथा

قال سنجيا: «وقد تحرّرا من جيش درونا، الواسع كالمحيط، بدا البطلان القاهران للأعداء—كريشنا وأرجونا—ممتلئين فرحًا، كأنهما عبرا بحرًا عظيمًا.»

Verse 24

अस्त्रौघान्महतो मुक्तौ द्रोणहार्दिक्यरक्षितात्‌ । रोचमानावदृश्येतामिन्द्राग्न्यो: सदृशौ रणे

قال سنجيا: «وقد أُطلِقا من ذلك الوابل العظيم من الأسلحة، وتحت حماية درونا وهارديكيا (كريتافارمان)، شوهد المحاربان في ساحة القتال متلألئين ببريق باهر—كإندرا وأغني نفسيهما.»

Verse 25

उद्धिन्नरुधिरी कृष्णौ भारद्वाजस्य सायकै: । शितैश्नितौ व्यरोचेतां कर्णिकारैरिवाचलौ

قال سنجيا: «كان كريشنا وأرجونا، وقد خُرِّقت أجسادهما بسهام ابن بهارادفاجا (درونا) الحادة، والدم يسيل منهما، يلمعان كجبلين اكتسيا بأزهار الكرنيكارا الحمراء.»

Verse 26

द्रोणग्राहह्नदान्मुक्ती शक्त्याशीविषसंकटात्‌ । अयःशरोग्रमकरात्‌ क्षत्रियप्रवराम्भस:

قال سنجيا: «وقد أُطلِقا من ذلك التشكيل القتالي الذي يشبه بحيرة درونا—تترصده أعداء كالتماسيح، وتختنق فيه الأفاعي السامة في صورة رماح قاتلة، وتجعله السهام الحديدية خطرًا كأنها أنياب مَكارا شرسة—عاد كريشنا وأرجونا يتلألآن، كما يتوهج الشمس والقمر حين يفلتان من قبضة راهو.»

Verse 27

ज्याघोषतलनिर्हादाद्‌ गदानिस्त्रिंशविद्युत: । द्रोणास्त्रमेघान्निर्मुक्तौ सूर्येन्दू तिमिरादिव

قال سنجيا: لما انفلت كريشنا وأرجونا من ذلك الضجيج الرعدي لأوتار الأقواس—حيث كانت الهراوات والسيوف تلمع كالبرق، وحيث كان سلاح درونا ينهال كالسحابة الممطرة—أشرقا كالشمس والقمر حين ينكشفان من الظلمة.

Verse 28

बाहुभ्यामिव संतीर्णो सिन्धुषष्ठा: समुद्रगा: । तपान्ते सरितः पूर्णा महाग्राहसमाकुला:

قال سنجيا: بدا كأنهما، بقوة ذراعيهما وحدها، قد سبحا عابرَين الأنهار المنصبة إلى البحر—خمسة أنهار ومعها السِّندهو سادسًا—أنهارًا متخمة بالمياه عند انقضاء القيظ، مكتظّة بتماسيح عظيمة.

Verse 29

इति कृष्णौ महेष्वासौ प्रशस्तौ लोकविश्रुतौ । सर्वभूतान्यमन्यन्त द्रोणास्त्रबलवारणात्‌

قال سنجيا: وهكذا عُدَّ «الكريشنان»—وهما راميان عظيمان، محمودان مشهوران في العالم—في نظر جميع الكائنات كأنهما قد كُفّا وحُبسا بقوة سلاح درونا الطاغية.

Verse 30

इस प्रकार द्रोणाचार्यके अस्त्र-बलका निवारण करनेके कारण समस्त प्राणी श्रीकृष्ण और अर्जुनको लोकविख्यात प्रशस्त गुणयुक्त महाधनुर्धर मानने लगे ।।

قال سنجيا: ولأنهما كفّا قوة سلاح درونا-آچاريا، أخذت الكائنات كلها تعدّ كريشنا وأرجونا رماةً عظامًا، ذوي خصال محمودة وذكرٍ ذائع في العالم. ثم، وبنية القتل، ثبّت البطلان نظرهما على جايدَرَثَة القريب—كَنَمِرَين يترصّدان عند مورد ماء، يتلهفان للوثوب على غزال رورو جاء ليشرب.

Verse 31

यथा हि मुखवर्णोडयमनयोरिति मेनिरे । तव योधा महाराज हतमेव जयद्रथम्‌,महाराज! उस समय उन दोनोंके मुखपर जैसी समुज्ज्वल कान्ति थी, उसके अनुसार आपके योद्धाओंने जयद्रथको मरा हुआ ही माना

قال سنجيا: «يا أيها الملك! ومن إشراق البهاء الذي ارتفع على وجهيهما، استنتج محاربوك أن جايدَرَثَة قد قُتل حقًّا.»

Verse 32

लोहिताक्षौ महाबाहू संयुक्तौ कृष्णपाण्डवौ | सिन्धुराजमभिप्रेक्ष्य हृष्टो व्यनदतां मुहुः

قال سانجيا: كان البطلان عظيمَا الساعدين، كريشنا وباندافا (أرجونا)، وقد احمرّت أعينهما بحرارة القتال، جالسين معًا. فلما أبصرا ملك السِّند (جايادراثا) أمامهما امتلآ ابتهاجًا، وأخذا يزأران مرارًا وتكرارًا—إشارةً إلى العزم وإلى إلحاح الواجب الحقّ في خضمّ الحرب.

Verse 33

शौरेरभीषुहस्तस्य पार्थस्य च धनुष्मत: । तयोरासीत्‌ प्रभा राजन्‌ सूर्यपावकयोरिव,राजन! हाथोंमें बागडोर लिये श्रीकृष्ण और धनुष धारण किये अर्जुन--इन दोनोंकी प्रभा सूर्य और अग्निके समान जान पड़ती थी

قال سانجيا: أيها الملك، إن بهاء شَوري (كريشنا) وهو قابضٌ على زمام العربة، وبهاء بارثا (أرجونا) وهو حاملٌ قوسه، قد لمعَا معًا كالشمس والنار. وفي قلب الحرب لا يدلّ ذلك اللمعان المزدوج على البأس وحده، بل على قوة الغاية العادلة، تهديها المشورة الواضحة ويثبتها الفعل المنضبط.

Verse 34

हर्ष एव तयोरासीद्‌ द्रोणानीकप्रमुक्तयो: । समीपे सैन्धवं दृष्टवा श्येनयोरामिषं यथा

قال سانجيا: إن هذين البطلين، بعدما انفلتَا من صفّ درونا القتالي، لم يجدا إلا الابتهاج حين رأيا جايادراثا قريبًا منهما—كصقرين يفرحان عند رؤية اللحم. وتُبرز الصورة كيف أن الهدف الذي طال طلبه في لهيب الحرب قد يوقِد عزيمةً ضارية تكاد تكون غريزية، فتشتدّ المعضلة الأخلاقية بين قصدٍ مُحقّ وحماسةٍ افتراسية.

Verse 35

तौ तु सैन्धवमालोक्य वर्तमानमिवान्तिके । सहसा पेततुः क्रुद्धौ क्षिप्रं श्येनाविवामिषम्‌

قال سانجيا: لما رأى البطلان جايادراثا، ملك السِّند، كأنه قائمٌ أمامهما على مقربة، اشتعلَا غضبًا بغتةً فانقضّا عليه سريعًا—كصقرين يهويان على اللحم. ويُبرز البيت كيف أن الغضب والاستعجال في القتال قد يدفعان إلى فعلٍ فوريٍّ افتراسي، حيث لا يُرى العدوّ إنسانًا بل هدفًا ينبغي انتزاعه.

Verse 36

तौ दृष्टवा तु व्यतिक्रान्ती हृषीकेशधनंजयौ । सिन्धुराजस्य रक्षार्थ पराक्रान्त: सुतस्तव

قال سانجيا: لما رأى كريشنا (هريشيكيشا) وأرجونا (دهانانجايا) يندفعان إلى الأمام وقد تجاوزا القوات التي تعترضهما، شرع ابنك دوريوذانا يُظهر بأسًا عظيمًا حمايةً لملك السِّند. ويُبرز المشهد كيف أن العزم الشخصي والوفاء للحلفاء يدفعان إلى فعلٍ حاسم وسط فوضى الحرب، وإن كان الصراع برمّته مثقلاً بالتباساتٍ أخلاقية.

Verse 37

द्रोणेनाबद्धकवचो राजा दुर्योधनस्तत: । ययावेकरथेनाजौ हयसंस्कारवित्‌ प्रभो

قال سانجيا: ثم إنّ الملك دوريوذانا، وقد لبس الدرع الذي شدّه عليه درونا، خرج إلى ساحة القتال بعربةٍ واحدة. وكان خبيرًا بترويض الخيل وتدبيرها، فتقدّم إلى الأمام—صورةً لعزمٍ ملكيّ تسنده الخبرة الحربية وسلطانُ أستاذه الحامي، وإن كان ثِقَلُ الحرب الأخلاقي يضغط على كل فعلٍ من هذا القبيل.

Verse 38

कृष्णपार्थो महेष्वासौ व्यतिक्रम्याथ ते सुत: । अग्रतः पुण्डरीकाक्षं प्रतीयाय नराधिप,नरेश्वर! महाधनुर्धर श्रीकृष्ण और अर्जुनको लाँधचकर आपका पुत्र कमलनयन श्रीकृष्णके सामने जा पहुँचा

قال سانجيا: أيها الملك، إن ابنك—بعد أن تجاوز الراميين العظيمين كريشنا وبارثا (أرجونا)—تقدّم إلى المقدّمة حتى بلغ أمام كريشنا ذي العينين كزهرة اللوتس ووقف قبالته. إن هذا المشهد يبرز جرأة المحارب في ساحة الوغى، لكنه يلمّح أيضًا إلى توترٍ أخلاقي حين يواجه السائق-المرشد الذي يجسّد ضبطَ الخطة ومشورةَ الدارما وسط العنف.

Verse 39

ततः सर्वेषु सैन्येषु वादित्राणि प्रहृष्टवत्‌ । प्रावाद्यन्त व्यतिक्रान्ते तव पुत्रे धनंजयम्‌,तदनन्तर आपका पुत्र दुर्योधन जब अर्जुनको भी लाँधकर आगे बढ़ गया, तब सारी सेनाओंमें हर्षपूर्ण बाजे बजने लगे

قال سانجيا: عندئذٍ دوّت الآلات في جميع الجيوش بأصواتٍ متهلّلة. فقد اندفع ابنك إلى الأمام متجاوزًا حتى دهننجايا (أرجونا). وكان ذلك علامة ابتهاج جيش الكورو بتقدّم دوريوذانا الجريء، كاشفًا كيف يحوّل صخب الحرب حركةً تكتيكية إلى نصرٍ نفسيّ—بل وإلى ظفرٍ يُرى كأنه أخلاقي—في أعين الجنود.

Verse 40

सिंहनादरवाश्वासन्‌ शड्खशब्दविमिश्रिता: । दृष्टवा दुर्योधन तत्र कृष्णयो: प्रमुखे स्थितम्‌,दुर्योधनको वहाँ श्रीकृष्ण और अर्जुनके सामने खड़ा देख शंखोंकी ध्वनिसे मिले हुए सिंहनादके शब्द सब ओर गूँजने लगे

قال سانجيا: فلما رأوه دوريوذانا قائمًا هناك في المقدّمة، مواجهًا كريشنا وأرجونا، دوّى الميدان من كل جانب بزئيرٍ كزئير الأسد ممزوجٍ بنفخ الصدَف. كان ذلك اندفاعًا ظاهرًا للثقة القتالية والتحدّي، إذ اشتدّ التلاقي حول القادة.

Verse 41

ये च ते सिन्धुराजस्य गोप्तार: पावकोपमा: । ते प्राह्ष्पन्त समरे दृष्ट्‌वा पुत्र॑ं तव प्रभो

قال سانجيا: «وأما حُرّاسُ ملك السِّندهو—محاربون يتّقدون كالنار—فقد امتلأوا فرحًا في ساحة القتال حين رأوا ابنك ثابتًا لا يتزحزح. وكان سرورهم انعكاسًا لثقةٍ وولاءٍ تجددَا وسط الخطر، إذ يلتفّ الحماة حول قائدٍ راسخ في الحرب.»

Verse 42

दृष्टवा दुर्योधन कृष्णो व्यतिक्रान्तं सहानुगम्‌ । अब्रवीदर्जुनं राजन्‌ प्राप्तकालमिदं वच:,राजन! सेवकोंसहित दुर्योधन सबको लाँधचकर सामने आ गया--यह देखकर श्रीकृष्णने अर्जुनसे यह समयोचित बात कही

قال سنجيا: لما رأى كريشنا دُريودَهَنَ ومعه أتباعه قد تجاوزوا الصفوف وتقدّموا إلى الأمام، خاطب أرجونا، أيها الملك، بكلماتٍ موافقةٍ لوقتِها—كأنها تُعلن أن الموقف قد بلغ ساعة الحسم، وأن الواجب (الدهرما) يقتضي قرارًا قاطعًا تحت وطأة الحرب.

Verse 86

विमुक्तौ ज्वलनस्पर्शान्मकरास्याज्ञषाविव । शत्रुओंको संतप्त करनेवाले वे दोनों महात्मा श्रीकृष्ण और अर्जुन अग्निके समान दाहक स्पर्शवाले मगरके मुखसे छूटे हुए दो मत्स्योंके समान अस्त्र-शस्त्रोंकी बाधाओं तथा संकटोंसे मुक्त दिखायी दे रहे थे

قال سنجيا: إن البطلين العظيمي النفس—شري كريشنا وأرجونا—بدَوَا كأنهما قد تحرّرا من عوائق السلاح ومن المهالك، كسمكتين أُطلقتا من فكَّي المَكَرَا. كان مسّهما مُحرقًا كالنار، وكانا مُعذِّبَين لأعدائهما، يخرجان سالمَين من الأخطار التي أرادت أن تُقيِّدهما وتلتهمهما.

Verse 101

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि दुर्योधनागमे एकाधिकशततमो<ध्याय:

قال سنجيا: هكذا، في المهابهارتا الموقَّرة، ضمن «دْرونا پرفا»—وخاصةً في القسم المتعلّق بقتل جايدَرَثَ—يُختَتم الفصل الحادي بعد المئة، واصفًا قدوم دُريودَهَنَ. إن خاتمة الفصل تُشير إلى انتقالٍ في سرد الحرب، مُغلِقةً حلقةً تمحورت حول القصاص وثِقَل العهود وعواقبها الأخلاقية في ساحة القتال.

Frequently Asked Questions

The chapter frames a pressure point between obligation to the campaign’s strategic objective (supporting Arjuna’s vow-driven pursuit) and the immediate duty to protect allies against a teacher-commander’s containment tactics, requiring rapid choices under uncertainty.

Endurance and clarity of purpose operate alongside restraint: the text depicts how resolve (to reach and support Arjuna) must be paired with adaptive tactics (dismounting, re-mounting, re-routing through units) rather than fixation on a single mode of combat.

No explicit phalaśruti is stated here; the chapter’s meta-level function is narrative-structural, using sound recognition and Yudhiṣṭhira’s internal appraisal to orient the listener within the larger vow-and-countermeasure arc.

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