Adhyaya 80
Bhishma ParvaAdhyaya 8077 Versesअत्यंत संकुल: पाण्डवों की ओर से भीम का दबाव, कौरवों की ओर से द्रोण का तीक्ष्ण प्रतिरोध—पलड़ा निर्णायक रूप से नहीं झुकता।

Adhyaya 80

अध्याय ८० — मध्यंदिन-रणवृत्तान्तः (Yudhiṣṭhira–Śrutāyu encounter; Cekitāna–Gautama clash; Abhimanyu pressure; Arjuna’s redeployment)

Upa-parva: Bhīṣma-parva — Kurukṣetra Saṃgrāma Vṛttānta (Midday engagements and command responses)

Saṃjaya reports that at midday Yudhiṣṭhira advances toward Śrutāyu, initiating a focused exchange of arrows. Śrutāyu counters effectively, but Yudhiṣṭhira’s strikes penetrate armor and culminate in a controlled escalation: he suppresses a surge of wrath, severs Śrutāyu’s bow, then disables him with a decisive shot, followed by the neutralization of his mobility and charioteer, forcing Śrutāyu’s withdrawal and causing a localized Kaurava recoil. In parallel, Cekitāna engages Gautama (identified with Kṛpa Śāradvata), exchanging missile volleys; both lose chariot support, shift to close-quarters sword combat, and collapse from exertion before being retrieved by allies (Karakarṣa for Cekitāna; Śakuni for Gautama). Additional engagements include Dhṛṣṭaketu’s assault on Saumadatti and Bhūriśravas’ counter, while Abhimanyu faces a coordinated rush by multiple Kaurava rathins yet refrains from lethal completion after disarming them, recalling Bhīma’s prior counsel. Seeing Bhīṣma heavily covered by many kings and Abhimanyu endangered, Arjuna instructs Kṛṣṇa to drive swiftly toward the dense ratha concentration to prevent further losses; the chapter closes with Suśarmā and allied kings surrounding Arjuna, intensifying the broader melee.

Chapter Arc: संजय धृतराष्ट्र के सामने कठोर सत्य रखता है—यह संकट किसी और का नहीं, स्वयं राजा के ‘आत्मदोष’ और धर्म-संकर को जन्म देने वाले पुराने कर्मों (विशेषतः द्यूत) का फल है। → उसी नैतिक कटाक्ष की पृष्ठभूमि में रणभूमि पर भीमसेन का उग्र पराक्रम भड़क उठता है; धृष्टद्युम्न दूर से उसे शत्रुसेना को ‘दग्ध’ करते देखता है और कौरव-सेना में हाहाकार फैलता है। → द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न, सामने खड़े कौरव वीरों और धृतराष्ट्र-पुत्रों की घेराबंदी सुन-देख कर, ‘प्रमोहनास्त्र’ का प्रयोग करता है—क्षण भर के लिए युद्ध-यंत्रणा पर मोह का आवरण पड़ता है; साथ ही द्रोण के तीक्ष्ण बाणों से पीड़ित सेना विक्षुब्ध महासागर-सी चक्कर काटती है। → अध्याय का अंत ‘संकुलयुद्ध’ और ‘द्रोणपराक्रम’ की छाप के साथ होता है—पाण्डवों की ओर से भीम का संहारक वेग, और कौरवों की ओर से द्रोण की प्रत्युत्तर-धार, दोनों मिलकर युद्ध को और अधिक उलझा देते हैं। → मोहास्त्र से क्षणिक ठहराव के बाद अगला प्रश्न खुला रह जाता है—क्या द्रोण की प्रचण्ड बाण-वृष्टि पाण्डव-आक्रमण को रोक पाएगी, या भीम-धृष्टद्युम्न का वेग कौरव-व्यूह को तोड़ देगा?

Shlokas

Verse 1

ऑपनआ क्र बछ। अर: सप्तसप्ततितमो<्ध्याय: भीमसेन, धृष्टद्युम्न तथा द्रोणाचार्यका पराक्रम संजय उवाच आत्मदोषात्‌ त्वया राजन प्राप्त व्यसनमीदृशम्‌ । न हि दुर्योधनस्तानि पश्यते भरतर्षभ

قال سنجيا: «أيها الملك، بعيبك أنتَ جلبتَ على نفسك مثل هذه النازلة. يا ثورَ آلِ بهاراتا، إن دريودhana لا يُبصر حقًّا تلك العواقب.»

Verse 2

यानि त्वं दृष्टवान्‌ राजन्‌ धर्मसंकरकारिते । तव दोषात्‌ पुरा वृत्तं द्यूतमेव विशाम्पते

قال سنجيا: «أيها الملك، إن ما رأيتَه من قبل—تلك الأفعال التي أوقعت اختلاط الدارما وفسادها—قد وقع قديمًا بخطئك أنت: إنها مباراة القمار تلك، يا سيّد الناس.»

Verse 3

संजय कहते हैं--राजन! आपने अपने ही दोषसे यह संकट प्राप्त किया है। भरतश्रेष्ठ) जिन धर्म और अधर्मके सम्मिश्रणसे उत्पन्न दोषोंको आप देखते थे, उन्हें दुर्योधन नहीं देख सका था। प्रजानाथ! आपके अपराधसे ही पहले द्यूतक्रीड़ाकी घटना घटी थी ।। तव दोषेण युद्ध च प्रवृत्तं सह पाण्डवै: । त्वमेवाद्य फलं भुड्क्षे कृत्वा किल्बिषमात्मना,तथा आपके ही दोषसे आज पाण्डवोंके साथ युद्ध आरम्भ हुआ। आपने स्वयं ही जो पाप किया है, उसका फल आज आप ही भोग रहे हैं

قال سنجيا: «أيها الملك، إنما وقعتَ في هذه النازلة بخطئك أنت. يا خيرَ آلِ بهاراتا، إن العيوب التي وُلدت من امتزاج الدارما بالأدارما—وهي التي تُبصرها الآن—لم يُبصرها دريودhana. يا سيّدَ الناس، وبجريرتك وقع من قبل حادثُ القمار. وبجريرتك أيضًا اندلعت اليوم الحرب مع أبناء باندو. إذ اقترفتَ الإثم بفعلك أنت، فأنت اليوم تذوق ثمرته.»

Verse 4

आत्मनैव कृतं कर्म आत्मनैवोपभुज्यते । इह च प्रेत्य वा राजंस्त्वया प्राप्त यथातथम्‌,राजन्‌! इहलोक अथवा परलोकमें अपने किये हुए कर्मका फल अपने-आपको ही भोगना पड़ता है; अत: आपको जैसेका तैसा प्राप्त हुआ है

قال سانجيا: «إنَّ العملَ الذي يصنعه المرءُ بنفسه إنما يذوقُ ثمرته بنفسه وحده. سواءٌ في هذا العالم أو بعد الموت، أيها الملك، فما نزل بك إنما جاء مطابقًا تمامًا لما صنعتَ.»

Verse 5

तस्माद्‌ राजन्‌ स्थिरो भूत्वा प्राप्येदं व्यसनं महत्‌ | शृणु युद्ध यथावृत्तं शंसतो मे नराधिप

فلذلك، أيها الملك، اثبتْ واشتدَّ عزمُك—وإن كنت قد لقيتَ هذه النازلة العظمى—واسمعْ، يا سيّدَ الرجال، وأنا أقصُّ عليك كيف جرت المعركة على حقيقتها.

Verse 6

राजन! नरेश्वर! इस महान्‌ संकटको पाकर भी स्थिरता-पूर्वक युद्धका यथावत्‌ वृतान्त जैसा मैं बता रहा हूँ सुनिये ।। भीमसेन: सुनिशितैर्बाणर्भित््वा महाचमूम्‌ । आससाद ततो वीर: सर्वान्‌ दुर्योधनानुजान्‌,वीर भीमसेनने तीखे बाणोंसे आपकी विशाल सेनाको विदीर्ण करके दुर्योधनके सभी भाइयोंपर आक्रमण किया

قال سانجيا: أيها الملك، يا سيّدَ الرجال—وإن قامت هذه الشدّة العظمى—فاسمعْ مني، بثباتٍ ووضوح، حقيقةَ مجرى القتال. ثم إنّ البطلَ بهيماسينا، وقد شقَّ جيشك العظيم بسهامٍ حادّة كالموسى، اندفعَ إلى الأمام وهاجمَ جميعَ إخوةِ دوريودhana الأصغر سنًّا.

Verse 7

दुःशासन दुर्विषहं दुःसहं दुर्मद जयम्‌ । जयत्सेनं विकर्ण च चित्रसेनं सुदर्शनम्‌,दुःशासन, दुर्विषह, दुःसह, दुर्मद, जय, जयत्सेन, विकर्ण, चित्रसेन, सुदर्शन, चारुचित्र, सुवर्मा, दुष्कर्ण तथा कर्ण--ये तथा और भी बहुत-से आपके जो महारथी पुत्र समीप खड़े थे, उन्हें कुपित देखकर महारथी भीमसेनने समरभूमिमें भीष्मके द्वारा सुरक्षित विशाल कौरवसेनामें प्रवेश किया

قال سانجيا: لما رأى أبناءك—دُهشاسانا، دُرفيشها، دُهسها، دُرمدا، جايا، جاياتسينا، فيكارنا، تشيتراسينا، سودرشانا، تشاروتشيترا، سوفارما، دُشكارنا، وكَرْنا—ومعهم كثير من عظماء فرسان المركبات قائمين قريبًا وقد اشتعلوا غضبًا، اندفع بهيماسينا الجبار إلى قلب الحشد الكاورافي في ساحة القتال، مع أنه كان محروسًا ببهشما.

Verse 8

चारुचित्रं सुवर्माणं दुष्कर्ण कर्णमेव च । एतांश्षान्यांश्व सुबहूनू समीपस्थान्‌ महारथान्‌,दुःशासन, दुर्विषह, दुःसह, दुर्मद, जय, जयत्सेन, विकर्ण, चित्रसेन, सुदर्शन, चारुचित्र, सुवर्मा, दुष्कर्ण तथा कर्ण--ये तथा और भी बहुत-से आपके जो महारथी पुत्र समीप खड़े थे, उन्हें कुपित देखकर महारथी भीमसेनने समरभूमिमें भीष्मके द्वारा सुरक्षित विशाल कौरवसेनामें प्रवेश किया

قال سانجيا: «(لقد رأيتُ) تشاروتشيترا، وسوفارما، ودُشكارنا، وكَرْنا؛ ورأيتُ كثيرًا من عظماء فرسان المركبات قائمين قريبًا—دُهشاسانا، دُرفيشها، دُهسها، دُرمدا، جايا، جاياتسينا، فيكارنا، تشيتراسينا، وسودرشانا. فلما رأى بهيماسينا هؤلاء الأشدّاء—وهم أبناؤك—مصطفّين قريبًا وقد استعر غضبهم، شقَّ طريقه قسرًا إلى داخل الحشد الكاورافي العظيم الذي يحرسه بهشما، ودخل ساحة القتال بعزمٍ ضارٍ.»

Verse 9

धार्रराष्ट्रान सुसंक्रुद्धान्‌ दृष्टया भीमो महारथ: । भीष्मेण समरे गुप्तां प्रविवेश महाचमूम्‌,दुःशासन, दुर्विषह, दुःसह, दुर्मद, जय, जयत्सेन, विकर्ण, चित्रसेन, सुदर्शन, चारुचित्र, सुवर्मा, दुष्कर्ण तथा कर्ण--ये तथा और भी बहुत-से आपके जो महारथी पुत्र समीप खड़े थे, उन्हें कुपित देखकर महारथी भीमसेनने समरभूमिमें भीष्मके द्वारा सुरक्षित विशाल कौरवसेनामें प्रवेश किया

قال سنجيا: لما رأى أبناء دِهْرِتَراشْتْرَةَ مستعرين غضبًا، اندفع المحارب العظيم على العربة، بهيما، إلى قلب الحشد الكورافي الواسع في ساحة القتال—جيشٌ كان بهيشما يحرسه ويظلّله. وكان قريبًا كثيرٌ من أبنائك الأشدّاء وأبطالُك: دُحشاسَنَة، دُرفيشَهَة، دُحسَهَة، دُرمَدَة، جَيَة، جَيَتسِينَه، فِكَرْنَة، تِشِترَسِينَه، سُدَرْشَنَة، تشارُتِشِترَة، سُفَرْمَا، دُشْكَرْنَة، وكَرْنَة؛ وقد اشتعلت حميّتهم حين رأوا بهيما يقتحم الصفوف.

Verse 10

अथालोब्य प्रविष्ट॑ तमूचुस्ते सर्व एव तु । जीवग्राहं निगृह्लीमो वयमेनं नराधिपा:,भीमसेनको सेनाके भीतर प्रविष्ट हुआ देख उन सब नरेशोंने आपसमें कहा कि हमलोग इन्हें जीवित ही पकड़ कर बंदी बना लें

قال سنجيا: لما رأوه يدخل صفوفهم بلا تردّد، قال أولئك الملوك جميعًا فيما بينهم: «لنقبضنّ عليه حيًّا ونأخذه أسيرًا».

Verse 11

स तै: परिवृतः पार्थो भ्रातृभि: कृतनिश्चयैः । प्रजासंहरणे सूर्य: क्रूरैरिव महाग्रहै:,ऐसा निश्चय करके उन सब भाइयोंने कुन्ती-कुमार भीमसेनको घेर लिया, मानो प्रजाके संहारकालमें सूर्यदेवको बड़े-बड़े क्रूर ग्रहोंने घेर रखा हो

قال سنجيا: وهكذا أُحيط ابنُ پْرِثا بإخوته وقد عقدوا العزم عقدًا محكمًا—كالشمس في زمن فناء العالم، حين تطوّقها كواكب عظيمة قاسية.

Verse 12

सम्प्राप्य मध्यं सैन्यस्थ न भी: पाण्डवमाविशत्‌ । यथा देवासूुरे युद्धे महेन्द्रं प्राप्प दानवान्‌,कौरवसेनाके भीतर पहुँच जानेपर भी पाण्डुनन्दन भीमसेनको तनिक भी भय नहीं हुआ, जैसे देवासुर-संग्राममें दानवोंकी सेनामें घुसनेपर देवराज इन्द्रको भयका स्पर्श नहीं होता है

قال سنجيا: ولما بلغ قلب الجيش، لم يدخل الخوف إلى ابن پاندو (بهيمسينا) قط. كما أنه في حرب الآلهة مع الأسورا، حين يندفع الدانافا إلى قتال مَهِندرا (إندرا)، لا يمسّ الرعبُ سيّدَ الآلهة.

Verse 13

तत:ः शतसहस्राणि रथिनां सर्वश: प्रभो | उद्यतानि शरैस्तीव्रैस्तमेक॑ परिवव्रिरे,प्रभो! तदनन्तर एकमात्र भीमसेनको उनपर तीव्र बाणोंकी वर्षा करते हुए सैकड़ों- हजारों रथियोंने युद्धके लिये उद्यत होकर सब ओरसे घेर लिया

قال سنجيا: ثم، يا مولاي، أحاط مئاتٌ وآلافٌ من فرسان العربات—وقد نهضوا جميعًا للحرب—ببهيمسينا الوحيد من كل جانب، وهو يصبّ عليهم وابلًا شديدًا من السهام.

Verse 14

स तेषां प्रवरान्‌ योधान्‌ हस्त्यश्वरथसादिन: । जघान समरे शूरो धार्तराष्ट्रानाचेन्तयन्‌,शूरवीर भीमसेन आपके पुत्रोंकी तनिक भी परवा न करते हुए हाथी, घोड़े एवं रथपर बैठकर युद्ध करनेवाले कौरवोंके मुख्य-मुख्य योद्धाओंको समर-भूमिमें मारने लगे

قال سنجيا: إنَّ بهيماسينا البطل، غيرَ مُبالٍ بأبناء دريتاراشترا، شرع في ساحة القتال يصرع أبرَزَ محاربيهم—أولئك الذين يقاتلون على ظهور الفيلة والخيول وعلى العربات الحربية.

Verse 15

तेषां व्यवसितं ज्ञात्वा भीमसेनो जिघृक्षताम्‌ । समस्तानां वधे राजन्‌ मतिं चक्रे महामना:,राजन! उन्हें कैद करनेकी इच्छावाले क्षत्रियोंके उस निश्चयको जानकर महामना भीमसेनने उन सबके वधका विचार कर लिया

قال سنجيا: أيها الملك، لما علم بهيماسينا عزمَ أولئك المحاربين الراسخ على أسرهم وأخذهم سبياً، عقد ذو النفس العظيمة نيّتَه على قتلهم جميعاً.

Verse 16

ततो रथं समुत्सृज्य गदामादाय पाण्डव: । जघान धार्तराष्ट्राणां तं बलौघं महार्णवम्‌,तदनन्तर पाण्डुनन्दन भीमसेन हाथमें गदा ले रथको त्यागकर उस विशाल सेनामें घुसकर उस महासागरतुल्य सैन्यसमुदायका विनाश करने लगे

قال سنجيا: ثم إنَّ الباندڤي (بهيماسينا) ترك عربته وأخذ صولجانه، فاندفع يضرب في ذلك الحشد من جيش الدهارتاراشترا—جيشٍ كالمحيط العظيم—وبدأ يحطّم ويُفني ذلك البحر من الجند بقوة لا تُقاوَم.

Verse 17

(गदया भीमसेनेन ताडिता वारणोत्तमा: । भिन्नकुम्भा महाकाया भिन्नपृष्ठास्तथैव च ।। भिन्नगात्रा: सहारोहा: शेरते पर्वता इव । भीमसेनकी गदाके आघातसे बड़े-बड़े विशालकाय गजराजोंके कुम्भस्थल फट गये, पृष्ठभाग विदीर्ण हो गये तथा उनका एक-एक अंग छिन्न-भिन्न हो गया और उसी अवस्थामें वे सवारोंसहित धराशायी हो गये, मानो पर्वत ढह गये हों। रथाश्ष भग्नास्तिलश: सयोधा: शतशो रणे ।। अश्राक्ष सादिनश्वैव पदातै: सह भारत । भारत! उन्होंने उस रणक्षेत्रमें सैकड़ों रथोंको उनके सवारोंसहित तिल-तिल करके तोड़ डाला। घोड़ों, घुड़सवारों तथा पैदलोंकी भी धज्जियाँ उड़ा दीं। तत्राद्भुतमपश्याम भीमसेनस्य विक्रमम्‌ ।। यदेक: समरे राजन्‌ बहुभि: समयोधयत््‌ । अन्तकाले प्रजा: सर्वा दण्डपाणिरिवान्तक: ।।) राजन्‌! उस युद्धमें हमलोगोंने भीमसेनका अद्भुत पराक्रम देखा, जैसे प्रलयकालमें यमराज हाथमें दण्ड लिये समस्त प्रजाका संहार करते हैं, उसी प्रकार वे अकेले आपके बहुसंख्यक योद्धाओंके साथ युद्ध कर रहे थे। भीमसेने प्रविष्टे तु धृष्टद्युम्नोडपि पार्षत: । द्रोणमुत्सूज्य तरसा प्रययौ यत्र सौबल:,भीमसेनके कौरवसेनामें प्रवेश करनेपर ट्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न भी द्रोणाचार्यको छोड़कर बड़े वेगसे उस स्थानपर गये, जहाँ शकुनि युद्ध कर रहा था

قال سنجيا: لما هوت صولجانُ بهيماسينا، انفلقت صدورُ الفيلة المختارة—عظيمة الأجساد—وتشققت صدغُها وتمزقت ظهورُها. تكسّرت أعضاؤها، فخرّت في ساحة القتال مع ركّابها كأنها جبالٌ انهارت. وهناك أيضاً حطّم مئات العربات الحربية بمن عليها حتى صارت فتاتاً، ومزّق كذلك الخيلَ وفرسانَها والمشاة. أيها الملك، لقد رأينا بأسَ بهيماسينا العجيب: كان وحده يقاتل كثرةً من محاربيك، كأنما يَمَا، قابضاً عصاه، يُفني الخلائق عند زمن الفناء. ولما اقتحم بهيماسينا صفوفَ جيش الكورافا، ترك دِهريشتاديومنا ابنُ دروبادا دْرونا، وانطلق مسرعاً إلى الموضع الذي كان فيه ساوبالا (شكوني) يقاتل.

Verse 18

निवार्य महतीं सेनां तावकानां नरर्षभ: । आससाद रथं शून्यं भीमसेनस्य संयुगे,वहाँ आपकी विशाल सेनाको आगे बढ़नेसे रोककर नरश्रेष्ठ धृष्टद्युम्न युद्धस्थलमें भीमसेनके सूने रथके पास जा पहुँचे

قال سنجيا: بعدما كبح تقدّم جيشك العظيم، أقبل دِهريشتاديومنا—فحلُ الرجال—في ساحة القتال حتى بلغ عربةَ بهيماسينا القائمةَ خالية.

Verse 19

दृष्टवा विशोक॑ समरे भीमसेनस्य सारथिम्‌ । धृष्टद्युम्नो महाराज दुर्मना गतचेतन:,महाराज! भीमसेनके सारथि विशोकको समर-भूमिमें अकेला खड़ा देख धृष्टद्युम्न मन- ही-मन बहुत दुःखी और अचेत हो गये

قال سنجيا: أيها الملك، لما رأى فيشوكا—سائق عربة بهيماسينا—واقفًا وحده في ساحة القتال، اضطرب دِهريشتاديومنا في باطنه، وغلبه الحزن حتى فقد رباطة جأشه.

Verse 20

अपृच्छद्‌ वाष्पसंरुद्धों नि:श्वसन्‌ वाचमीरयन्‌ । मम प्राणै: प्रियतम: क्व भीम इति दु:खित:,वे लंबी साँस खींचते और आँसू बहाते हुए गद्गदकण्ठसे पूछने लगे--“विशोक! मेरे प्राणोंसे भी अधिक प्यारे भीमसेन कहाँ हैं? इतना कहते-कहते वे बहुत दुःखी हो गये

قال سنجيا: وقد اختنق بالدموع، يلهث ويجاهد ليُخرج الكلام، سأل بألم: «أين بهيما، الأعزّ عليّ من حياتي؟» وما إن قال ذلك حتى غمره الحزن.

Verse 21

विशोकस्तमुवाचेदं धृष्टद्युम्नं कृताउ्जलि: । संस्थाप्य मामिह बली पाण्डवेय: पराक्रमी

قال سنجيا: فخاطب فيشوكا دِهريشتاديومنا وقد ضمّ كفّيه إجلالًا: «إن ابن باندو، القويّ الشجاع، بعدما ثبّتني هنا بإحكام…»

Verse 22

प्रविष्टो धार्तराष्ट्राणामेतद्‌ बलमहार्णवम्‌ | तब विशोकने हाथ जोड़कर धूृष्टद्युम्नसे कहा--'प्रभो! पराक्रमी और बलवान्‌ पाण्डुनन्दन मुझे यहीं खड़ा करके कौरवोंके इस सैन्यसागरमें घुस गये हैं ।। मामुक्‍्त्वा पुरुषव्याप्र: प्रीतियुक्तमिदं वच:,“जाते समय पुरुषसिंह भीमसेनने मुझसे प्रेमपूर्वक यह बात कही कि सूत! तुम दो घड़ीतक इन घोड़ोंको रोककर यहीं मेरी प्रतीक्षा करो। जबतक कि ये जो लोग मेरा वध करनेके लिये उद्यत हैं, इन्हें अभी मार न डालूँ

قال سنجيا: «لما اقتحم بهيما—نمر الرجال—ذلك الجيش الهائل لآل دهرتاراشترا (الكورافا) كأنه بحرٌ من الجنود، تركني وراءه وخاطبني بمودة: “أيها السائق، أمسك هذه الخيل هنا وانتظرني مُهورتين، حتى أصرع أولئك الذين يتلهفون الآن لقتلي.”»

Verse 23

प्रतिपालय मां सूत नियम्याश्वान्‌ मुहूर्तकम्‌ । यावदेतान्‌ निहन्म्यद्य य इमे मद्वधोद्यता:,“जाते समय पुरुषसिंह भीमसेनने मुझसे प्रेमपूर्वक यह बात कही कि सूत! तुम दो घड़ीतक इन घोड़ोंको रोककर यहीं मेरी प्रतीक्षा करो। जबतक कि ये जो लोग मेरा वध करनेके लिये उद्यत हैं, इन्हें अभी मार न डालूँ

قال سنجيا: «أيها السائق، اكبح الخيل وانتظرني قليلًا، حتى أصرع اليوم هؤلاء الذين عزموا على قتلي.»

Verse 24

ततो दृष्टवा प्रधावन्तं गदाहस्तं महाबलम्‌ । सर्वेषामेव सैन्यानां संहर्ष: समजायत

قال سنجيا: ثمّ لما رأوا ذلك المحارب الجبّار—عظيم القوّة—يندفع إلى الأمام وهو قابض على الهراوة، دبّت في جميع الجيوش نشوةٌ وحماسةٌ قتاليةٌ عارمة.

Verse 25

“तदनन्तर गदा हाथमें लिये महाबली भीमसेनको धावा करते देख समस्त सैनिकोंके रोंगटे खड़े हो गये ।। तस्मिन्‌ सुतुमुले युद्धे वर्तमाने भयानके । भित्त्वा राजन्‌ महाव्यूहं प्रविवेश वृकोदर:

قال سنجيا: وبعد ذلك، لما رأى الجنود بهيماسينا الجبّار يندفع للهجوم والهراوة في يده، اقشعرت أبدانهم. وفي تلك المعركة الرهيبة الصاخبة، أيها الملك، شقّ فِركودارا صفَّ «المها-فيوها» العظيم واقتحم إلى داخله اقتحامًا.

Verse 26

“राजन्‌! उस भयंकर एवं तुमुल युद्धमें भीमसेनने इस महाव्यूहका भेदन करके इसके भीतर प्रवेश किया था” ।। विशोकस्य वच: श्रुत्वा धृष्टद्युम्नो5थ पार्षत: । प्रत्युवाच तत: सूतं रणमध्ये महाबल:,विशोककी यह बात सुनकर महाबली ट्रुपदकुमार धृष्टद्युम्नने उस समरांगणमें उनके सारथिसे इस प्रकार कहा--

قال سنجيا: «أيها الملك! في تلك المعركة الرهيبة الصاخبة، شقّ بهيماسينا هذا التشكيل العظيم ودخل إلى داخله.» فلما سمع دِهريشتاديومنا القوي—ابن پريشاتا (دروپادا)—كلام فيشوكا، أجاب السائق هناك في قلب ساحة القتال على هذا النحو.

Verse 27

न हि मे जीवितेनापि विद्यतेडद्य प्रयोजनम्‌ । भीमसेन रणे हित्वा स्नेहमुत्सूज्य पाण्डवैः,'सारथे! युद्धस्थलमें भीमसेनको छोड़कर और पाण्डवोंसे स्नेह तोड़कर अब मेरे जीवनसे कोई प्रयोजन नहीं है

قال سنجيا: «يا سائق المركبة! إن حياتي نفسها لا غاية لها عندي اليوم، إن كنتُ في ساحة القتال سأترك بهيماسينا وأطرح جانبًا مودّتي ورابطتي مع أبناء پاندو.»

Verse 28

यदि यामि विना भीम किं मां क्षत्र॑ वदिष्यति । एकायनगते भीमे मयि चावस्थिते युधि,“भीम एकमात्र युद्धके पथपर गये हैं और मैं भी युद्धस्थलमें उपस्थित हूँ। ऐसी दशामें यदि भीमसेनके बिना ही लौट जाऊँ तो क्षत्रियसमाज मुझे क्या कहेगा?

قال سنجيا: «إن عدتُ من دون بهيما، فماذا سيقول عني مجتمع المحاربين من الكشاتريا؟ وقد مضى بهيما وحده في طريق القتال، وأنا أيضًا قائم في ساحة الحرب—فكيف أرجع من غيره؟»

Verse 29

अस्वस्ति तस्य कुर्वन्ति देवा: शक्रपुरोगमा: । यः सहायान्‌ परित्यज्य स्वस्तिमानाव्रजेद्‌ गृहम्‌,“जो अपने सहायकोंको छोड़कर स्वयं कुशल-पूर्वक घरको लौट आता है, उसका इन्द्र आदि देवता अनिष्ट करते हैं

قال سنجيا: إن الآلهة، يتقدّمهم إندرا، تُنزل الشؤم على ذلك الرجل الذي يهجر رفاقه ولا يبتغي إلا سلامته، فيرجع إلى بيته سالمًا غير مجروح.

Verse 30

मम भीम: सखा चैव सम्बन्धी च महाबल: । भक्तोअस्मान्‌ भक्तिमांश्वाहं तमप्यरिनिषूदनम्‌

قال سنجيا: «بهيمَ لي—صديقٌ وقريبٌ ذو بأسٍ عظيم. هو مُخلصٌ لنا، وأنا كذلك مُخلصٌ له—بهيمَ، قاهرُ الأعداء.»

Verse 31

“महाबली भीम मेरे सखा और सम्बन्धी हैं। वे हम लोगोंके भक्त हैं और मैं भी उन शत्रुसूदन भीमका भक्त हूँ ।। सो<हं तत्र गमिष्यामि यत्र यातो वृकोदर: । निष्नन्तं मां रिपून्‌ पश्य दानवानिव वासवम्‌,“अतः मैं भी वहीं जाऊँगा जहाँ भीमसेन गये हैं। देखो जैसे इन्द्र दानवोंका संहार करते हैं, उसी प्रकार मैं भी शत्रुसेनाका विनाश कर रहा हूँ”

قال سنجيا: «بهيمَ الجبّار صديقي وقريبي. هو مُخلصٌ لنا، وأنا كذلك مُخلصٌ لبهيمَ ذلك الساحق للأعداء. لذلك سأمضي إلى حيث مضى فْرِكودَرا. انظروني وأنا أقطع صفوف الخصوم، كما قتل فاسافا (إندرا) الدانافا من قبل.»

Verse 32

एवमुक्त्वा ततो वीरो ययौ मध्येन भारत । भीमसेनस्यथ मार्गेषु गदाप्रमथितैर्गजै:,भारत! ऐसा कहकर वीरवर धृष्टद्युम्न भीमसेनके बनाये हुए मार्गोंसे कौरव-सेनाके भीतर गये। उन मार्गोंपर गदाके मारे हुए हाथी पड़े थे

قال سنجيا: فلما قال ذلك، اندفع البطل دْهْرِشْتَديومنَةُ في صميم جيش الكورافا، يا بهاراتا، عبر المسالك التي شقّها بهيمَسينا—وقد تناثرت عليها الفيلة التي سحقتها هراوته.

Verse 33

स ददर्श तदा भीम दहन्तं रिपुवाहिनीम्‌ । वातो वृक्षानिव बलात्‌ प्रभञ्जन्तं रणे रिपून्‌

قال سنجيا: عندئذٍ رآه بهيمَ يشتعل اندفاعًا في صفوف جيش العدو، يحطّم الخصوم في المعركة بقوةٍ محضة—كريحٍ عاتيةٍ تقتلع الأشجار من جذورها.

Verse 34

उस समय कुछ दूर जाकर धृष्टद्युम्नने शत्रुसेनाको दग्ध करते हुए भीमसेनको देखा। जैसे आँधी वृक्षोंको बलपूर्वक तोड़ देती या उखाड़ डालती है, उसी प्रकार भीमसेन भी रणभूमिमें शत्रुओंका संहार कर रहे थे ।। ते वध्यमाना: समरे रथिन: सादिनस्तथा । पादाता दन्तिनश्लैव चक्कुरार्तस्वरं महत्‌,समरांगणमें भीमसेनके मारे हुए रथी, घुड़सवार, पैदल और सवारोंसहित हाथी बड़े जोरसे आर्तनाद कर रहे थे

قال سنجيا: ثمّ بعد أن مضى قليلًا، رأى دْهْرِشْتَدْيُومْنَةُ بهيماسينا وهو يُحرق جموع العدو. وكما تعصف العاصفة العاتية فتُكسِّر الأشجار قسرًا أو تقتلعها من جذورها، كذلك كان بهيما يُفني الأعداء في ساحة القتال. وإذ كانوا يُقتلون في المعركة—فرسان العربات، والفرسان على الخيل، والمشاة، وحتى الفيلة مع راكبيها—أطلقوا صرخةً عظيمةً موجعةً ملؤها الفزع.

Verse 35

हाहाकारकश्न संजज्ञे तव सैन्यस्य मारिष । वध्यतो भीमसेनेन कृतिना चित्रयोधिना,आर्य! विचित्र रीतिसे युद्ध करनेवाले विद्वान्‌ भीमसेनके द्वारा मारी जाती हुई आपकी सेनामें हाहाकार मच गया

قال سنجيا: «يا أيها الجليل، لقد ارتفع في جيشك صراخٌ عظيمٌ من الكرب، إذ كان بهيماسينا—الماهر المهيب، يقاتل بحيلٍ لافتةٍ شتّى—يقطعهم قطعًا.»

Verse 36

ततः कृतास्त्रास्ते सर्वे परिवार्य वृकोदरम्‌ | अभीता: समवर्तन्त शस्त्रवृष्ट्या परंतप,शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! तदनन्तर अस्त्रोंके ज्ञाता समस्त कौरव-सैनिक भीमसेनको सब ओरसे घेरकर अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करते हुए बिना किसी भयके उनपर चढ़ आये

قال سنجيا: ثم إنّ أولئك المحاربين جميعًا، الماهرين في استعمال السلاح، أحاطوا بفِرْكودَرا (بهيمـا) من كل جانب. وبلا خوف اندفعوا نحوه، يمطرونه بوابلٍ من السهام والأسلحة.

Verse 37

अभिवद्रुतं शस्त्रभृतां वरिष्ठ समनन्‍्ततः: पाण्डवं लोकवीर: । सैन्येन घोरेण सुसंहितेन दृष्टवा बली पार्षतो भीमसेनम्‌

قال سنجيا: ولمّا رأى بهيماسينا—الباندفيَّ الجبّار—واقفًا في المقدّمة بين حملة السلاح، اندفع نحوه من كل جانب ابنُ بارْصَتَا (دْهْرِشْتَدْيُومْنَة)، الشجاع المشهور كبطلٍ بين الناس، ومعه قوّةٌ مهيبةٌ مصطفّةٌ بإحكام.

Verse 38

अथोपगच्छच्छरविक्षताड़ूं पदातिनं क्रोधविषं वमन्तम्‌ । आश्चवासयन्‌ पार्षतो भीमसेनं गदाहस्तं कालमिवान्तकाले

قال سنجيا: ثم تقدّم بارْصَتَا (دْهْرِشْتَدْيُومْنَة) إلى بهيماسينا—المشّاةَ بين الأبطال—وقد غطّت جسده جراحُ السهام، وكأنه ينفث سمَّ الغضب. فأراد أن يثبّت عزيمته ويشدّ أزره، إذ كان بهيما قائمًا والهراوة بيده، كأنه «الزمن» نفسه عند ساعة الفناء.

Verse 39

विश्वके विख्यात वीर बलवान ट्रुपदकुमार धृष्टद्युम्नने देखा--शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ पाण्डुनन्दन भीमसेनपर सब ओरसे धावा हो रहा है। अत्यन्त संगठित हुई भयंकर सेनाने उनपर आक्रमण किया है। यह देखकर धृष्टद्युम्न भीमसेनको आश्वासन देते हुए उनके पास गये। उनका प्रत्येक अंग बाणोंसे क्षत-विक्षत हो रहा था। वे पैदल ही क्रोधरूपी विष उगल रहे थे और गदा हाथमें लिये प्रलयकालके यमराजके समान जान पड़ते थे ।। विशल्यमेनं च चकार तूर्ण- मारोपयच्चात्मरथे महात्मा । भृशं परिष्वज्य च भीमसेन- माश्वासयामास स शत्रुमध्ये,महामना धृष्टद्युम्नने तुरंत ही उन्हें अपने रथपर बिठा लिया और उनके शरीरमें धँसे हुए बाणोंको निकाल दिया। शत्रुओंके बीचमें ही भीमसेनको हृदयसे लगाकर उन्हें पूर्णतः सान्त्वना दी

Sañjaya said: In the very midst of the enemy host, the high-souled Dhṛṣṭadyumna swiftly relieved Bhīmasena of the arrows embedded in his body, lifted him onto his own chariot, and—embracing him firmly—restored his courage. The scene underscores a warrior’s duty not only to strike the foe but also to protect and steady an ally when the battle’s pressure threatens to overwhelm him.

Verse 40

भ्रातृनथोपेत्य तवापि पुत्र- स्तस्मिन्‌ विमर्दे महति प्रवृत्ते । अयं दुरात्मा द्रुपदस्य पुत्र: समागतो भीमसेनेन सार्थम्‌

Sañjaya said: “And then, approaching your brothers, your son too entered that great melee as it broke out. At that moment, the wicked son of Drupada came there together with Bhīmasena.”

Verse 41

त॑ याम सर्वे महता बलेन मा वो रिपु: प्रार्थथतामनीकम्‌ । वह महान्‌ संघर्ष आरम्भ होनेपर आपका पुत्र दुर्योधन भाइयोंके पास आकर बोला --“यह दुरात्मा ट्रुपदपुत्र आकर भीमसेनसे मिल गया है। हम सब लोग बहुत बड़ी सेनाके साथ इसपर आक्रमण करें, जिससे हमारा और तुम्हारा यह शत्रु हमलोगोंकी इस सेनाको हानि पहुँचानेका विचार न कर सके' || ४० है || श्रुत्वा तु वाक्‍्यं तममृष्यमाणा ज्येष्ठाज्ञया नोदिता धार्तराष्ट्रा:,दुर्योधनका यह कथन सुनकर आपके सभी वीर पुत्र, जो धृष्टद्यम्मका आगमन नहीं सह सके थे, बड़े भाईकी आज्ञासे प्रेरित हो प्रलयकालके भयंकर केतुओंकी भाँति हाथमें आयुध लिये धृष्टद्युम्नके वधके लिये उनपर टूट पड़े। उन्होंने अपने हाथोंमें धनुष-बाण ले रखे थे और वे रथके पहियोंकी घरघराहटके साथ-साथ धनुषकी प्रत्यंचाको भी कँपाते हुए उसकी टंकार फैला रहे थे

Sañjaya said: “Let us all advance against him with great force; let not your enemy find an opening to strike at our battle-array. Hearing Duryodhana’s words and unable to endure the arrival of Dhṛṣṭadyumna, the sons of Dhṛtarāṣṭra—urged on by their eldest brother’s command—rushed forward with weapons in hand to slay him, like dreadful banners at the time of cosmic dissolution. With bows and arrows ready, they made the chariot-wheels thunder and set their bowstrings quivering, spreading the sharp twang of their weapons.”

Verse 42

वधाय निष्पेतुरुदायुधास्ते युगक्षये केतवो यद्वदुग्रा: । प्रगृह्य चास्त्राणि धनूंषि वीरा ज्यां नेमिघोषै: प्रविकम्पयन्त:,दुर्योधनका यह कथन सुनकर आपके सभी वीर पुत्र, जो धृष्टद्यम्मका आगमन नहीं सह सके थे, बड़े भाईकी आज्ञासे प्रेरित हो प्रलयकालके भयंकर केतुओंकी भाँति हाथमें आयुध लिये धृष्टद्युम्नके वधके लिये उनपर टूट पड़े। उन्होंने अपने हाथोंमें धनुष-बाण ले रखे थे और वे रथके पहियोंकी घरघराहटके साथ-साथ धनुषकी प्रत्यंचाको भी कँपाते हुए उसकी टंकार फैला रहे थे

Sañjaya said: Urged on to kill, those warriors—armed with uplifted weapons—leapt forward like fierce portents at the end of an age. Grasping their missiles and bows, they advanced, making the bowstrings quiver and filling the field with the combined roar of bow-twang and the rumble of chariot-wheels—an image of war’s collective frenzy, where resolve hardens into lethal intent.

Verse 43

शरैरवर्षन्‌ ट्रुपदस्य पुत्र यथाम्बुदा भूधरं वारिजालै: । निहत्य तांश्चापि शरै: सुतीक्षणै- न विव्यथे समरे चित्रयोधी,जैसे मेघ पर्वतपर जलकी बूँदें बरसाते हैं, उसी प्रकार वे द्रुपदपुत्रपर बाणोंकी वृष्टि करने लगे। परंतु विचित्र युद्ध करनेवाले धृष्टद्युम्न उस समरांगणमें अपने पैने बाणोंद्वारा उन सबको अत्यन्त घायल करके स्वयं तनिक भी व्यथित नहीं हुए

Sañjaya said: They showered Drupada’s son with arrows, as rain-clouds drench a mountain with torrents of water. Yet that master of varied combat, Dhr̥ṣṭadyumna, striking them in return with razor-sharp shafts and grievously wounding them, did not falter or feel distress in the battle—showing the hard, relentless poise demanded by the ethics of the warrior’s duty amid the violence of war.

Verse 44

समभ्युदीर्णाश्व॒ तवात्मजांस्तथा निशम्य वीरानभित: स्थितान्‌ रणे । जिघांसुरुग्रं द्रपदात्मजो युवा प्रमोहनास्त्रं युयुजे महारथ:,युद्धमें सामने खड़े हुए आपके वीर पुत्रोंकोी आगे बढ़ते और प्रचण्ड होते देख नवयुवक महारथी द्रुपदकुमारने उनके वधके लिये भयंकर प्रमोहनास्त्रका प्रयोग किया

قال سانجايا: أيها الملك، لما سمع أن أبناءك وقد أُهيجت خيولهم اندفعوا إلى الأمام، ورأى الأبطال مصطفّين من كل جانب في ساحة القتال، أطلق ابن دروبادا الفتى—وقد عزم على إفنائهم—السلاح الرهيب «براموهانا»، سلاح الإيهام الذي يطمس البصيرة ويوقع في الذهول.

Verse 45

क्रुद्धों भृशं तव पुत्रेषु राजन्‌ दैत्येषु यद्वत्‌ समरे महेन्द्र: । ततो व्यमुहा॒न्त रणे नृवीरा: प्रमोहनास्त्राहतबुद्धिसत्त्वा:

قال سانجايا: أيها الملك، لقد اشتد غضبه على أبنائك اشتدادَ غضب مهيندرا (إندرا) على الدايتيَة في ساحة القتال. ثم في ميدان الحرب اضطرب الأبطال، إذ ضُرب فهمهم وثباتهم بسلاح الإيهام فأصابهم الذهول.

Verse 46

राजन! जैसे युद्धमें देवराज इन्द्र दैत्योंपर कुपित होते हैं, उसी प्रकार आपके पुत्रोंपर धृष्टद्युम्नका क्रोध बहुत बढ़ा हुआ था। उसके मोहनास्त्रके प्रयोगसे अपनी चेतना और धैर्य खोकर आपके नरवीर पुत्र रणभूमिमें मोहित हो गये ।। प्रदुद्रुवु: कुरवश्वैव सर्वे सवाजिनागा: सरथा: समन्तात्‌ । परीतकालानिव नष्टसंज्ञान्‌ मोहोपेतांस्तव पुत्रान्‌ निशम्य,आपके पुत्रोंको मोहसे युक्त एवं मरे हुएके समान अचेत हुआ देख समस्त कौरव- सैनिक हाथी, घोड़े तथा रथसहित सब ओर भाग चले

قال سانجايا: أيها الملك، كما يغضب إندرا، سيد الآلهة، على الدايتيَة في ساحة الحرب، كذلك اشتعل غضب دريشتاديومنَة على أبنائك. وبإطلاقه سلاح الإيهام فقد أبناؤك الأبطال وعيهم وثباتهم، فاستولى عليهم الذهول في الميدان. ولما رأت جموع الكورو أبناءك وقد غمرهم الوهم—فاقدين للإحساس كأن الموت قد قبض عليهم—ولّت الجيوش، ومعها العربات والخيول والفيلة، هاربةً في كل اتجاه.

Verse 47

एतस्मिन्नेव काले तु द्रोण: शस्त्रभृतां वर: । द्रुपदं त्रिभिरासाद्य शरैरविव्याध दारुणै:

قال سانجايا: وفي تلك اللحظة بعينها، تقدّم درونا—أفخر حملة السلاح—إلى دروبادا، وطعنه بثلاثة سهامٍ ضارية.

Verse 48

इसी समय दूसरी ओर शणस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्यने ट्रपदके पास जाकर उनको तीन भयंकर बाणोंद्वारा बींध डाला ।। सो5तिविद्धस्ततो राजन्‌ रणे द्रोणेन पार्थिव: । अपायाद्‌ ट्रुपदो राजन पूर्ववैरमनुस्मरन्‌,राजन्‌! तब रणभूमिमें द्रोणके द्वारा अत्यन्त घायल हो राजा द्रुपद पहलेके वैरका स्मरण करते हुए वहाँसे दूर हट गये

قال سانجايا: أيها الملك، حين أُثخن دروبادا، الملك، بجراحٍ شديدة بسِهام درونا في ساحة القتال، انحاز مبتعدًا عن الميدان وهو يستحضر العداوة القديمة بينهما.

Verse 49

जित्वा तु द्रुपदं द्रोण: शड्खं दध्मौ प्रतापवान्‌ । तस्य शड्खस्वनं श्रुत्वा वित्रेसु: सर्वमोमका:,द्रपदको जीतकर प्रतापी द्रोणाचार्यने अपना शंख बजाया। उस शंखनादको सुनकर समस्त सोमक क्षत्रिय अत्यन्त भयभीत हो गये

قال سنجيا: بعدما قهر دْرُوبَدَة، نفخ درونا الجبّار في صَدَفته. فلما سمع محاربو السومَكَة دويَّ تلك الصدفة استولى عليهم الفزع.

Verse 50

अथ शुश्राव तेजस्वी द्रोण: शस्त्रभृतां वर: । प्रमोहनास्त्रेण रणे मोहितानात्मजांस्तव,तदनन्तर शब्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ तेजस्वी द्रोणाचार्यने सुना कि आपके पुत्र रणभूमिमें प्रमोहनास्त्रसे मोहित होकर पड़े हैं

قال سنجيا: ثم إن درونا المتلألئ، سيد حملة السلاح، سمع أن أبناءك مطروحون في ساحة القتال، قد أذهلتهم أسترا «براموهانا» وجعلتهم عاجزين.

Verse 51

ततो द्रोणो महाराज त्वरितो5भ्याययौ रणात्‌ । तत्रापश्यन्महेष्वासो भारद्वाज: प्रतापवान्‌,महाराज! यह सुनते ही महाथनुर्थर प्रतापी भरद्वाजनन्दन द्रोणाचार्य तुरंत उस युद्धस्थलसे चलकर वहाँ आ पहुँचे। आकर उन महारथीने देखा कि धृष्टद्युम्म और भीमसेन उस महायुद्धमें विचर रहे हैं और आपके पुत्र मोहाविष्ट होकर पड़े हुए हैं

قال سنجيا: عندئذٍ، أيها الملك، أسرع درونا وتقدّم من ساحة القتال. وهناك رأى الرامي العظيم، ابن بهاردفاجا الشجاع، المشهد: دريشتاديومنا وبهيمسينا يجولان في ذلك القتال العظيم، بينما كان أبناؤك مطروحين، قد غلب عليهم الوهم والذهول.

Verse 52

धृष्टय्युम्नं च भीमं च विचरन्तौ महारणे । मोहाविष्टांंश्व ते पुत्रानपश्यत्‌ स महारथ:,महाराज! यह सुनते ही महाथनुर्थर प्रतापी भरद्वाजनन्दन द्रोणाचार्य तुरंत उस युद्धस्थलसे चलकर वहाँ आ पहुँचे। आकर उन महारथीने देखा कि धृष्टद्युम्म और भीमसेन उस महायुद्धमें विचर रहे हैं और आपके पुत्र मोहाविष्ट होकर पड़े हुए हैं

قال سنجيا: وفي ذلك القتال العظيم رأى دريشتاديومنا وبهيمَ يجولان في الميدان؛ ورأى أبناءك مطروحين هناك وقد غلب عليهم الوهم.

Verse 53

ततः प्रज्ञास्त्रमादाय मोहनास्त्रं व्यनाशयत्‌ | अथ प्रत्यागतप्राणास्तव पुत्रा महारथा:,तब उन्होंने प्रज्ञास्त्र लेकर उसके द्वारा मोहनास्त्रका नाश कर दिया। इससे आपके महारथी पुत्रोंमें पुन: चेतनाशक्ति लौट आयी

قال سنجيا: عندئذٍ تناول سلاح «برجنا» فمحا سلاح «موهانا» المُضلِّل. فاستعاد أبناؤك—أولئك المها-رثا، فرسان المركبات العظام—أنفاسهم ووعيهم.

Verse 54

पुनर्युद्धाय समरे प्रययुर्भीमपार्षतौ । ततो युधिष्ठटिर: प्राह समाहूय स्वसैनिकान्‌

قال سنجيا: إنّ بهيما وبارشَتا تقدّما من جديد إلى ساحة القتال، عازمَين على استئناف الحرب. ثم إنّ يودهيشتيرا، بعدما استدعى جنوده، خاطبهم—مُشيرًا إلى إعادة ترتيبٍ مقصودة تمليها الدارما والواجب، لا إلى اندفاعٍ أعمى أو غضبٍ طارئ.

Verse 55

गच्छन्तु पदवीं शक्‍्त्या भीमपार्षतयोर्युधि । सौभद्रप्रमुखा वीरा रथा द्वादश दंशिता:

قال سنجيا: «لْيَتقدّم اثنا عشرَ من الأبطال على العربات—يتقدّمهم ساوبهادرا (أبهيمانيو)—بكل ما لديهم من قوة، على الطريق في القتال الدائر بين بهيما وبارشَتا.»

Verse 56

प्रवृत्तिमधिगच्छन्तु न हि शुद्धयति मे मन: । वे समरभूमिमें पुनः युद्धके लिये भीमसेन और द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्नकी ओर चले। तब राजा युधिष्ठिरने अपने सैनिकोंको बुलाकर कहा--“तुमलोग पूरी शक्ति लगाकर युद्धस्थलमें भीमसेन और धृष्टद्युम्नके पथका अनुसरण करो। अभिमन्यु आदि बारह वीर महारथी कवच आदिसे सुसज्जित हो भीमसेन और धृष्टद्युम्नका समाचार प्राप्त करें। मेरा मन उनके विषयमें निश्चिन्त नहीं हो रहा है” || ५४-५५ है ।। त एवं समनुज्ञाता: शूरा विक्रान्तयोधिन:,युधिष्ठिरकी ऐसी आज्ञा पाकर पराक्रमपूर्वक युद्ध करनेवाले वे पुरुषमानी समस्त शूरवीर “बहुत अच्छा' कहकर दोपहर होते-होते वहाँसे चल दिये

قال سنجيا: «دَعوهم يمضون، فإنّ قلبي لا يهدأ.» ثم عادوا يجتازون ساحة القتال، متجهين نحو بهيماسينا ودهريشتاديومنَة ليلتحقوا بالمعركة. عندئذٍ استدعى الملك يودهيشتيرا جنوده وأمر: «ابذلوا كامل قوتكم واتبعوا في الميدان الطريق الذي سلكه بهيماسينا ودهريشتاديومنَة. ولينطلق اثنا عشر من عظماء فرسان العربات—أبهيمانيو ومن معه—مكتملين بالدروع والسلاح، ليأتوا بخبر بهيماسينا ودهريشتاديومنَة؛ فإني لست مطمئنًا عليهم.» فلما أُذن لهم بذلك، أجاب أولئك الأبطال المتعززون الشجعان: «ليكن كذلك»، وانطلقوا من هناك عند انتصاف النهار.

Verse 57

बाढमित्येवमुक्त्वा तु सर्वे पुरुषमानिन: । मध्यन्दिनगते सूर्ये प्रययु: सर्व एव हि,युधिष्ठिरकी ऐसी आज्ञा पाकर पराक्रमपूर्वक युद्ध करनेवाले वे पुरुषमानी समस्त शूरवीर “बहुत अच्छा' कहकर दोपहर होते-होते वहाँसे चल दिये

قال سنجيا: فلما قال ذلك، أجاب جميع أولئك المحاربين المعتزين بأنفسهم: «ليكن كذلك.» وحين بلغَت الشمس كبدَ السماء عند الظهيرة، انطلقوا جميعًا—قابلين أمر يودهيشتيرا، وماضين بعزمٍ على القتال ببسالة كما يقتضي واجب الحرب.

Verse 58

केकया द्रौपदेयाश्न धृष्टकेतुश्न वीर्यवान्‌ | अभिमन्युं पुरस्कृत्य महत्या सेनयावृता:,अभिमन्युको आगे करके विशाल सेनासे घिरे हुए पाँच केकयराजकुमार, द्रौपदीके पाँचों पुत्र और पराक्रमी धृष्टकेतु--ये शत्रुओंका दमन करनेवाले शूरवीर सूचीमुख नामक समरव्यूह बनाकर आपके पुत्रोंकी उस सेनाको रणक्षेत्रमें विदीर्ण करने लगे

قال سنجيا: إنّ أمراء كِكَيَة، وأبناء دروبدي الخمسة، ودهريشتاكيتو الجسور—وقد قدّموا أبهيمانيو في المقدّمة وأحاطت بهم جموعٌ عظيمة—اصطفّوا في تشكيلٍ حربي يُدعى سوتشيموخا («رأس الإبرة»)، وشرعوا يطعنون جيش أبنائك ويشقّونه في ساحة القتال.

Verse 59

ते कृत्वा समरव्यूहं सूचीमुखमरिंदमा: । बिभिदुर्धार्तराष्ट्राणां तद्‌ रथानीकमाहवे,अभिमन्युको आगे करके विशाल सेनासे घिरे हुए पाँच केकयराजकुमार, द्रौपदीके पाँचों पुत्र और पराक्रमी धृष्टकेतु--ये शत्रुओंका दमन करनेवाले शूरवीर सूचीमुख नामक समरव्यूह बनाकर आपके पुत्रोंकी उस सेनाको रणक्षेत्रमें विदीर्ण करने लगे

قال سَنْجَيا: لما اصطفّ أولئك الأبطالُ القامعون للأعداء في «تشكيل رأس الإبرة» (سُوتشِيمُخا)، أخذوا في قلب المعركة يطعنون ويشقّون كتيبةَ العربات الحربية التابعة للدھارتراشترَة. ويُبرز هذا المشهدُ كيف يقترن التدبيرُ المنضبطُ بالبأس: فبتشكيلٍ مُركَّزٍ تُكسَرُ قوةٌ أعظم، وتَنفُذُ العزيمةُ والنظامُ عبر أشدّ مقاومةٍ في الحرب.

Verse 60

तान्‌ प्रयातान्‌ महेष्वासानभिमन्युपुरोगमान्‌ | भीमसेन भयाविष्टा धृष्टद्युम्नविमोहिता,जनेश्वर! आपकी सेना भीमसेनके भयसे व्याकुल और धूृष्टद्युम्नके बाणोंसे मोहित हो रही थी। अतः आक्रमण करनेवाले अभिमन्यु आदि महाधनुर्धर वीरोंको वह रोकनेमें समर्थ न हो सकी। मद और मूच्छाके वशीभूत हुई मतवाली स्त्रीकी भाँति वह मार्गमें चुपचाप खड़ी रही

قال سَنْجَيا: لما تقدّم أولئك الرماة العظام وأبهيمنيو في مقدّمتهم، استولى على جيشك—يا سيّد الناس—الخوفُ من بهيماسينا، وأوقعته سهامُ دْهْرِشْتَديومنَة في الاضطراب. لذلك لم يقدر على صدّ الأبطال المندفعين بقيادة أبهيمنيو؛ بل وقف صامتًا في الطريق، كامرأةٍ سكرى غلبها الذهول، عاجزًا عن الفعل.

Verse 61

न संवारयितुं शक्ता तव सेना जनाधिप । मदमूर्च्छान्वितात्मा वै प्रमदेवाध्वनि स्थिता,जनेश्वर! आपकी सेना भीमसेनके भयसे व्याकुल और धूृष्टद्युम्नके बाणोंसे मोहित हो रही थी। अतः आक्रमण करनेवाले अभिमन्यु आदि महाधनुर्धर वीरोंको वह रोकनेमें समर्थ न हो सकी। मद और मूच्छाके वशीभूत हुई मतवाली स्त्रीकी भाँति वह मार्गमें चुपचाप खड़ी रही

قال سَنْجَيا: يا حاكمَ الناس، لم تستطع جيوشك أن تردّهم. إذ غلب عليها السُّكرُ والذهول، فوقفت في الطريق كامرأةٍ طائشة، عاجزةً عن كبح المحاربين المندفعين. ويؤكد هذا البيت أن فقدان الانضباط وصفاء البصيرة في الحرب يحوّل حتى الجيش العظيم إلى عائقٍ ساكن، لا إلى قوةٍ حامية.

Verse 62

तेडभिजाता महेष्वासा: सुवर्णविकृतध्वजा: । परीप्सन्तो5 भ्यधावन्त धृष्टद्युम्नवृकोदरौ,सुवर्णनिर्मित ध्वजाओंसे सुशोभित होनेवाले वे महाधनुर्धर कुलीन योद्धा धृष्टद्युम्मन और भीमसेनकी रक्षाके लिये बड़े वेगसे दौड़े

قال سَنْجَيا: إن أولئك الرماة العظام، من ذوي الحسب الرفيع، المزيّنين براياتٍ مصوغةٍ من ذهب، اندفعوا إلى الأمام بأقصى سرعة، قاصدين حماية دْهْرِشْتَديومنَة وفْرِكودَرَة (بهِيما). ويُبرز هذا البيت خُلُقَ ساحة القتال: فالنخبة من المحاربين تُقاس لا بالبأس وحده، بل باستعدادها لستر الرفاق وحمايتهم عند الشدّة.

Verse 63

तौ च दृष्टवा महेष्वासावभिमन्युपुरोगमान्‌ | बभूवतुर्मुदा युक्तौ निध्नन्तो तव वाहिनीम्‌,वे दोनों महाधनुर्धर धृष्टद्यम्म और भीमसेन भी अभिमन्यु आदि वीरोंको सहायताके लिये आते देख हर्ष और उत्साहमें भर गये और आपकी सेनाका विनाश करने लगे

قال سَنْجَيا: لما رأى كلاهما أولئك الرماة العظام—أبهيمنيو والأبطال السائرين تحت قيادته—امتلأ دْهْرِشْتَديومنَة وبهِيماسينا فرحًا وحماسةً متجددة، وشرعا يوقعان الهلاك في جيشك. وفي النسيج الأخلاقي للملحمة، يبيّن هذا المشهد كيف إن رؤية الرفاق على طريق الحقّ، ووصول النصرة في أوانها، تشعل الشجاعة فتجعل العزم فعلًا حاسمًا وسط فوضى الحرب.

Verse 64

(द्रोणमिष्वस्त्रकुशलं सर्वविद्यासु पारगम्‌ ।) दृष्टवा तु सहसा5<यान्तं पाञज्चाल्यो गुरुमात्मन: । नाशंसत वध वीर: पुत्राणां तव भारत,भारत! पांचालराजकुमार धूृष्टद्युम्नने धनुर्वेदमें कुशल और समस्त विद्याओंके पारंगत विद्वान्‌ अपने गुरु द्रोणाचार्यको सहसा वहाँ आये देख आपके पुत्रोंके वधकी इच्छा छोड़ दी

قال سانجيا: لما رأى درونا—المتبحّر في أسلحة المقذوفات والمكتمل في جميع فروع العلم—يصل إلى هناك فجأة، فإن أمير بانشالا (دريشتاديومنا)، إذ أبصر معلّمه نفسه، لم يُقِرّ قتل أبنائك، يا بهاراتا.

Verse 65

ततो रथं समारोप्य कैकेयस्य वृकोदरम्‌ । अभ्यधावत्‌ सुसंक्रुद्धो द्रोणमिष्वस्त्रपारगम्‌,फिर भीमसेनको केकयके रथपर बिठाकर क्रोधमें भरे हुए धृष्टद्युम्नने अस्त्रविद्याके पारगामी विद्वान द्रोणाचार्यपर धावा किया

قال سانجيا: ثم أركب بهيما—فريكودارا—على عربة أمير الكايكيا، فانقضّ دريشتاديومنا، وقد امتلأ غضبًا، على درونا، ذلك الذي بلغ الغاية في علم القوس والسلاح.

Verse 66

तस्याभिपततस्तूर्ण भारद्वाज: प्रतापवान्‌ । क्रुद्धश्चिच्छेद बाणेन धनु: शत्रुनिबर्हण:,तब शत्रुओंका नाश करनेवाले प्रतापी द्रोणाचार्यने कुृपित होकर अपनी ओर आनेवाले धष्टद्युम्नके धनुषको एक बाणसे तुरंत काट दिया

قال سانجيا: وبينما كان يندفع مسرعًا، غضب بهارادفاجا الجبار (درونا)، فقطع قوس خصمه سريعًا بسهم واحد.

Verse 67

अन्यांश्व शतशो बाणान्‌ प्रेषयामास पार्षते । दुर्योधनहितार्थाय भर्तृपिण्डमनुस्मरन्‌,उसके बाद दुर्योधनके हितके लिये स्वामीके अन्नका विचार करते हुए धृष्टद्युम्नपर और भी सैकड़ों बाण चलाये

قال سانجيا: ثم، ابتغاء مصلحة دوريودانا، متذكّرًا الطعام الذي ناله من سيّده—وما يترتّب عليه من دينٍ ووفاء—أطلق مئات السهام الأخرى على دريشتاديومنا.

Verse 68

अथान्यद्‌ धनुरादाय पार्षतः परवीरहा । द्रोणं विव्याध विंशत्या रुक्मपुड्खै: शिलाशितै:,तत्पश्चात्‌ शत्रुवीरोंका हनन करनेवाले धृष्टद्युम्नने दूसरा धनुष लेकर पत्थरपर रगड़कर तेज किये हुए सोनेकी पाँखवाले बीस बाणोंसे द्रोणाचार्यको घायल कर दिया

قال سانجيا: عندئذٍ أخذ دريشتاديومنا، ابن بريشاتا وقاتل أبطال الأعداء، قوسًا آخر، فأصاب درونا بعشرين سهمًا—مريّشة بالذهب ومسنونة على الحجر.

Verse 69

तस्य द्रोण: पुनश्नापं चिच्छेदामित्रकर्शन: । हयांश्न चतुरस्तूर्ण चतुर्भि: सायकोत्तमै:,तब शत्रुसूदन द्रोणने पुनः धृष्टद्युम्मका धनुष काट दिया और चार उत्तम सायकोंद्वारा उनके चारों घोड़ोंको तुरंत ही भयानक यमलोकको भेज दिया। भारत! फिर एक भल्‍ल्लके द्वारा उनके सारथिको भी मृत्युके हवाले कर दिया

قال سنجيا: ثم إنّ درونا، قاهر الأعداء، قطع قوسه مرةً أخرى؛ وبأربع سهامٍ ممتازةٍ أصاب سريعًا خيوله الأربعة فأرداها، دافعًا بها إلى الموت. ثم بسهمٍ «بهلّا» حادٍّ أرسل السائق أيضًا إلى نهايته.

Verse 70

वैवस्वतक्षयं घोरं प्रेषयामास भारत । सारथिं चास्य भल्‍्लेन प्रेषयामास मृत्यवे,तब शत्रुसूदन द्रोणने पुनः धृष्टद्युम्मका धनुष काट दिया और चार उत्तम सायकोंद्वारा उनके चारों घोड़ोंको तुरंत ही भयानक यमलोकको भेज दिया। भारत! फिर एक भल्‍ल्लके द्वारा उनके सारथिको भी मृत्युके हवाले कर दिया

قال سنجيا: يا بهاراتا، لقد أرسل الخيول الأربعة إلى الديار الرهيبة ليَما؛ وبسهم «بهلّا» حادٍّ دفع السائق أيضًا إلى قبضة الموت.

Verse 71

हताश्चात्‌ स रथात्‌ तूर्णमवप्लुत्य महारथ: । आरुरोह महाबाहुरभिमन्योर्महारथम्‌,घोड़ों और सारथिके मारे जानेपर महारथी महाबाहु धृष्टद्युम्न तुरंत उस रथसे कूद पड़े और अभिमन्युके विशाल रथपर आरूढ़ हो गये

قال سنجيا: فلما قُتلت خيوله وسائقه، قفز المحارب العظيم على العربة، ذو الساعدين الجبارين دْهْرِشْتَدْيُومْنَ، سريعًا من عربته، واعتلى عربة أبهيمانيو الضخمة.

Verse 72

तत: सरथनागाश्वा समकम्पत वाहिनी । पश्यतो भीमसेनस्य पार्षतस्य च पश्यत:,तदनन्तर भीमसेन और धृष्टद्युम्नके देखते-देखते रथ, हाथी और घुड़सवारोंसहित सारी पाण्डव-सेना काँपने लगी

قال سنجيا: ثم، على مرأى من بهيماسينا ومن بارشاتا (دْهْرِشْتَدْيُومْنَ)، أخذ جيش الباندافا يرتجف—عرباتٌ وفيلةٌ وفرسانٌ اهتزّت جميعًا معًا.

Verse 73

तत्प्रभग्नं बल॑ दृष्टवा द्रोणेनामिततेजसा । नाशवनुवन्‌ वारयितुं समस्तास्ते महारथा:,अमिततेजस्वी आचार्य द्रोणके द्वारा अपनी सेनाका व्यूह भंग हुआ देख वे सम्पूर्ण महारथी प्रयत्न करनेपर भी उसे रोकनेमें सफल न हो सके

قال سنجيا: ولما رأوا صفوف جيشهم وقد حطّمها درونا ذو البهاء الذي لا يُقاس، لم يستطع أولئك المحاربون العظام على العربات—ولو اجتمعوا—أن يوقفوه.

Verse 74

वध्यमानं तु तत्‌ सैन्यं द्रोणेन निशितैः: शरै: । व्यभ्रमत्‌ तत्र तत्रैव क्षोभ्यमाण इवार्णव:

قال سَنْجَايَا: لما كانت تلك الجموع تُقْتَل وتُقَطَّع بسِهام دْرُونَا الحادّة، أخذت تترنّح وتتبدّد هنا وهناك—كالمحيط إذا خُضَّ واضطرب اضطرابًا عنيفًا فهاجت أمواجه.

Verse 75

द्रोणाचार्यके पैने बाणोंसे पीड़ित हुई वह सेना विक्षुब्ध महासागरके समान वहीं चक्कर काटने लगी ।। तथा दृष्टवा च तत्सैन्यं जहषे तावकं बलम्‌ । दृष्टवा5<चार्य सुसंक़रुद्धं पतन्तं रिपुवाहिनीम्‌ । चुक्रुशु: सर्वतो योधा: साधु साध्विति भारत,द्रोणाचार्यको अत्यन्त कुपित होकर शत्रुसेनापर टूटते और पाण्डव-सेनाको भागते देख आपके सैनिकोंको बड़ा हर्ष हुआ। भारत! आपके सभी योद्धा सब ओरसे द्रोणाचार्यको साधुवाद देने लगे

قال سَنْجَايَا: لما أُصيب ذلك الجيش بسِهام دْرُونَا الحادّة وعُذِّب بها، أخذ يدور في مكانه كبحرٍ عظيمٍ هائج. وإذ رأى جيشك ذلك ابتهج. وحين أبصروا المُعلِّم دْرُونَا وقد استبدّ به الغضب، يقتحم صفوف العدو اقتحامًا، بينما كانت جموع الباندڤا تتراجع، صاح محاربوك من كل ناحية: «أحسنت! أحسنت!»، يا بهاراتا.

Verse 76

इस प्रकार श्रीमह्याभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें धृतराष््रकी चिन्ताविषयक छिह्त्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ

وهكذا تنتهي الفصولة السادسة والسبعون من «بهِيشْمَ بَرْوَا» في «شري مهابهاراتا»، ضمن القسم المتعلّق بسقوط بهيشما، في شأن تأمّلات دْهْرِتَرَاشْتْرَا القلِقة.

Verse 77

इति श्रीमहा भारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि संकुलयुद्धे द्रोणपराक्रमे सप्तसप्ततितमो<ध्याय:

وهكذا، في «شري مهابهاراتا»، ضمن «بهِيشْمَ بَرْوَا»—وخاصة في القسم المتعلّق بسقوط بهيشما—وفي خضمّ القتال المتشابك المضطرب، تنتهي الفصولة السابعة والسبعون، في ذكر بأس دْرُونَا.

Frequently Asked Questions

The chapter dramatizes leadership under provocation: Yudhiṣṭhira’s anger is portrayed as potentially world-disturbing, yet he must convert that impulse into measured, rule-governed action rather than uncontrolled retaliation.

Effective dharma in crisis is shown as regulated agency: restraint (self-governance) enables decisive action that protects collective stability, while impulsive fury risks strategic and moral disintegration.

No explicit phalaśruti is stated; the meta-commentary is implicit in the cosmic reaction to Yudhiṣṭhira’s wrath and the repeated emphasis on public witness, marking the episode as an ethical exemplar within the war’s narrative ledger.