Adhyaya 115
Anushasana ParvaAdhyaya 115144 Verses

Adhyaya 115

Ahiṃsā as Threefold Restraint (Mind–Speech–Action) and the Ethics of Consumption

Upa-parva: Āhiṃsā-anuśāsana (Instruction on Non-injury) — Bhīṣma’s discourse to Yudhiṣṭhira

Vaiśaṃpāyana reports that Yudhiṣṭhira again questions Bhīṣma, asking why ahiṃsā is praised as dharma and how one escapes suffering when harm is committed by action, speech, or mind. Bhīṣma replies that ahiṃsā is articulated by brahmavādins as a structured discipline: it is not stable if any constituent is compromised, likened to an animal unable to stand on only three legs. He elevates ahiṃsā as preeminent among dharmas, using the elephant’s footprint metaphor to indicate that other ethical ‘tracks’ are encompassed by it. He then specifies the tri-kāraṇa (three causal channels) of moral implication—mind first, then speech, then bodily action—stressing that relinquishment must begin internally. The discourse turns to dietary restraint: faults reside in mind, speech, and taste, and ascetics avoid meat because craving and attachment arise from tasting. Bhīṣma outlines moral objections to meat-eating through affective analogy (treating it as akin to consuming one’s own child) and through a psychology of desire (rāga arising from repeated savoring), concluding by reaffirming ahiṃsā as a comprehensive dharmic synthesis.

Chapter Arc: युधिष्ठिर बृहस्पति से पूछते हैं—मनुष्य किस आचरण से उत्तम स्वर्ग पाते हैं और किन कर्मों से नरक तथा तिर्यग्योनियों में गिरते हैं; मृत्यु के बाद देह को काष्ठ-लोष्टवत् छोड़कर जीव किस पथ से जाता है? → बृहस्पति कर्म-फल की कठोर गणना खोलते हैं—परस्त्रीगमन, स्त्रीहत्या, भोजन-चोरी, वस्त्र-चोरी आदि पापों के अनुसार जीव क्रमशः भेड़िया, कुत्ता, सियार, गीध, व्याल, बक, मक्खी, मयूर आदि योनियों में जन्म लेता है; कुछ योनियों में अल्पकाल में ही हिंसा/बंधन से मृत्यु का चक्र चलता रहता है। → पाप-विशेष के लिए तिर्यग्योनियों की श्रृंखला और यम-विषय (नरक-भोग) का वर्णन चरम पर पहुँचता है—विशेषतः स्त्रीहत्या जैसे महापाप के लिए दीर्घ क्लेश और अनेक ‘संसार’ (बार-बार जन्म) भोगने की घोषणा, तथा मृग-मत्स्य जैसे जन्मों में शीघ्र वध/जाल-बंधन का भयावह चक्र। → बृहस्पति यह भी बताते हैं कि भोगे हुए पाप-फल के क्षय के बाद जीव पुनः मानुषत्व प्राप्त कर सकता है; इस प्रकार कर्म-न्याय का विधान—दण्ड, शोधन, और पुनरावर्तन—स्पष्ट होता है। → युधिष्ठिर का जिज्ञासा-क्षेत्र आगे बढ़ता है—अब वे ‘शरीर-निचय’ (देह की स्थिति/संरचना और उसके रहस्य) जानने की ओर प्रश्न उठाते हैं।

Shlokas

Verse 1

ऑपन-माज बक। अर एकादशाधिकशततमोड< ध्याय: बृहस्पतिका युधिष्ठिरसे प्राणियोंके जन्मके प्रकारका और नानाविध पापोंके फलस्वरूप नरकादिकी प्राप्ति एवं तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेनेका वर्णन युधिछिर उवाच पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद । श्रोतुमिच्छामि मर्त्यानां संसारविधिमुत्तमम्‌

由提施提罗说道:“祖父啊,您大智深远,通达一切论典(śāstra);我愿聆听人类应以何等至高而善妙之法,来行持其在轮回(saṃsāra)中的旅程。”

Verse 2

केन वृत्तेन राजेन्द्र वर्तमाना नरा भुवि | प्राप्तुवन्त्युत्तमं स्वर्ग कथं च नरक॑ नूप

尤提希提罗说道:“噢,诸王之最!世间之人以何种行持,方能得至至高天界?又噢,统御者!以何种行持,竟会堕入地狱?”

Verse 3

मृतं शरीरमुत्सज्य काष्ठलोष्टसमं जना: । प्रयान्त्यमुं लोकमित: को वै ताननुगच्छति,लोग अपने मृत शरीरको काठ और मिट्टीके ढेलेके समान छोड़कर जब यहाँसे परलोककी राह लेते हैं, उस समय उनके पीछे कौन जाता है?

尤提希提罗说道:“当人们弃下死去的躯体,视之如一段枯木或一块土坷垃,离此世而趋彼世之时,究竟是谁随他们而去?”

Verse 4

भीष्म उवाच अयमायाति भगवान्‌ बृहस्पतिरुदारधी: । पृच्छैनं सुमहाभागमेतद्‌ गुह्मूं सनातनम्‌

毗湿摩说道:“看哪,尊贵的布里哈斯帕提(Bṛhaspati),胸怀弘智,正向此处而来。你当向这位大福德者请问此一古老而幽深的秘义。”

Verse 5

नैतदन्येन शक्‍्यं हि वक्तुं केनचिदद्य वै । वक्ता बृहस्पतिसमो न हान्यो विद्यते क्वचित्‌,आज दूसरा कोई इस विषयका प्रतिपादन नहीं कर सकता। बृहस्पतिजीके समान वक्ता दूसरा कोई कहीं भी नहीं है

毗湿摩说道:“今日此事,确无他人能如实阐明。放眼诸处,再无与布里哈斯帕提(Bṛhaspati)比肩的说法者。”

Verse 6

वैशम्पायन उवाच तयो: संवदतोरेवं पार्थगांगेययोस्तदा । आजगाम विशुद्धात्मा नाकपृष्ठाद्‌ बृहस्पति:

毗湿摩波耶那说道:“当时,帕尔塔(尤提希提罗)与恒河之子毗湿摩正如此交谈之际,心灵澄净的布里哈斯帕提(Bṛhaspati)自天界高处降临其地。”

Verse 7

ततो राजा समुत्थाय धृतराष्ट्रपुरोगम: । पूजामनुपमां चक्रे सर्वे ते च सभासद:,उन्हें देखते ही राजा युधिष्छिर धृतराष्ट्रको आगे करके खड़े हो गये। फिर उन्होंने तथा उन सभी सभासदोंने बृहस्पतिजीकी अनुपम पूजा की

于是国王起身而立,将持国王置于前列。随即他行无比殊胜的恭敬供养,诸会众亦皆同作——以合乎正法之礼,尊奉可敬的布里哈斯帕提,敬重其灵性权威。

Verse 8

ततो धर्मसुतो राजा भगवन्तं बृहस्पतिम्‌ । उपगम्य यथान्यायं प्रश्न॑ पप्रच्छ तत्त्वतः,तदनन्तर धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरने भगवान्‌ बृहस्पतिजीके समीप जाकर यथोचित रीतिसे यह तात्विक प्रश्न उपस्थित किया

随后,法之子尤提希提罗王依礼趋近可敬的布里哈斯帕提,怀着求真之心,诚恳地提出了自己的疑问。

Verse 9

युधिछिर उवाच भगवन्‌ सर्वधर्मज्ञ सर्वशास्त्रविशारद | मर्त्यस्य क: सहायो वै पिता माता सुतो गुरु:

尤提希提罗说道:“尊者啊,通晓一切法(dharma),精研诸论典(śāstra)——凡人真正的助伴是谁?是父亲、母亲、儿子,还是师长?”

Verse 10

ज्ञातिसम्बन्धिवर्गक्ष मित्रवर्गस्तथैव च । मृतं शरीरमुत्सज्य काष्ठलोष्टसमं जना:

尤提希提罗说道:“噢,护佑亲族与眷属之群、亦护佑友朋之众者:当身体死去,人们便弃之不顾,只把它看作一段木头或一块土坷垃。”

Verse 11

गच्छन्त्यमुत्र लोक॑ वै क एनमनुगच्छति । युधिष्ठिरने पूछा--भगवन्‌! आप सम्पूर्ण धर्मोके ज्ञाता और सब शास्त्रोंके विद्वान हैं; अतः बताइये

尤提希提罗问道:“当人前往彼世时,究竟是谁随他而去?在父亲、母亲、儿子、师长、同族亲眷与朋友之中,谁才是人的真实助伴?因为众人都将死去的身体弃如木段土块而离去,那么这生灵去往来世时,谁与之同行?”布里哈斯帕提答道:“大王啊,人独自出生,也独自走向终末。”

Verse 12

असहाय: पिता माता तथा भ्राता सुतो गुरु:

尤狄希提罗说道:“父亲、母亲,同样还有兄弟、儿子与师长——一旦失去依靠——便会变得依赖他人,且易受伤害。”

Verse 13

ज्ञातिसम्बन्धिवर्गक्ष मित्रवर्गस्तथैव च । पिता, माता, भाई, पुत्र, गुरु, जाति, सम्बन्धी तथा मित्रवर्ग--ये कोई भी उसके सहायक नहीं होते ।। मृतं शरीरमुत्सज्य काष्ठलोष्टसमं जना:

尤狄希提罗说道:“无论亲族与姻亲之群,还是朋友之群,都不能真正成为依靠。父亲、母亲、兄弟、儿子、师长、宗族、亲戚与朋友——在那决定性的时刻,无一能相随或救援。生命既逝,人们便弃置其身,如同一段木头或一块土坷垃。”

Verse 14

मुहूर्तमिव रोदित्वा ततो यान्ति पराड्मुखा: । लोग उसके मरे हुए शरीरको काठ और मिट्टीके ढेलेकी तरह फेंककर दो घड़ी रोते हैं और फिर उसकी ओरसे मुँह फेरकर चल देते हैं |। १३ $ ।।

尤狄希提罗说道:“人们仿佛只哭泣片刻,随后便转面离去。弃置那具身体之后,唯有达摩随人而行。”

Verse 15

तस्माद्‌ धर्म: सहायश्न सेवितव्य: सदा नृभि: । वे कुटुम्बीजन तो उसके शरीरका परित्याग करके चले जाते हैं, किंतु एकमात्र धर्म ही उस जीवात्माका अनुसरण करता है; इसलिये धर्म ही सच्चा सहायक है। अतः मनुष्योंको सदा धर्मका ही सेवन करना चाहिये ।।

因此,人应当恒常修习达摩,因为达摩才是真正的同伴与助力。亲族与家人弃身而去,唯有达摩随逐个体之我;故当不断行持达摩。众生与达摩相应,便得至上之天界大道。

Verse 16

तस्मान्न्यायागतैरर्थर्धर्म सेवेत पण्डित:

因此,智者应以正当合法所得之财来奉行并护持达摩。

Verse 17

लोभान्मोहादनुक्रोशाद्‌ भयाद्‌ वाप्यबहुश्रुतः:

尤提士提罗说:“因贪欲,因迷妄,因不当的怜悯,甚至因恐惧——不曾受良好教诲(于诸论典 śāstra)之人,便会行差踏错。”

Verse 18

धर्मश्चार्थश्॒ कामश्च त्रितयं जीविते फलम्‌

尤提士提罗说:“达摩(dharma)、阿尔塔(artha)与迦摩(kāma)——此三者,乃人生之果。”

Verse 19

युधिछिर उवाच श्रुतं भगवतो वाक्यं धर्मयुक्ते परं हितम्‌

尤提士提罗说:“我已聆听世尊之言——根植于达摩,且利益至上。”

Verse 20

मृतं शरीरं हि नृणां सूक्ष्ममव्यक्ततां गतम्‌

当人死去之时,其身确实归于微细、不可觉知、未显之境——不复为寻常目力所见,亦非寻常所能执取。

Verse 21

अचक्षुविंषयं प्राप्तं कं धर्मोडनुगच्छति । मनुष्यका स्थूल शरीर तो मरकर यहीं पड़ा रह जाता है और उसका सूक्ष्म शरीर अव्यक्तभावको प्राप्त हो जाता है--नेत्रोंकी पहुँचसे परे है। ऐसी दशामें धर्म किस प्रकार उसका अनुसरण करता है? ।।

尤提士提罗问道:“当人已超出目力所及之境,达摩将随谁而行?因为人的粗身既死,便横陈于此;而微细之身则入于未显之态,远离眼根所及。在此情形之下,达摩如何随伴于他?” 布里哈斯帕提答道,遂开示诸成分与诸力——地、风、空、水、光、意,以及终结之使者(死)——以阐明:纵使其人不可见,道德业报亦不致散失。

Verse 22

प्राणिनामिह सर्वेषां साक्षिभूता निशानिशम्‌

尤提希提罗说道:“在此世间,对一切有情众生,都有一物恒为见证——昼夜不息。”

Verse 23

त्वगस्थिमांसं शुक्रे च शोणितं च महामते

尤提希提罗说道:“噢,大心者,当观此身之皮、骨与肉,亦当观其精与血。”

Verse 24

ततो धर्मसमायुक्तः प्राप्तुते जीव एव हि

因此,唯有与达摩相应的生命之我,方能抵达至高归宿。其后,在他世受尽并耗尽业果之报,当众生再取新身之时,安住于此身五大之中的主宰诸天,便观照那灵我之善业与恶业。如今,你还想听什么?

Verse 25

ततो<स्य कर्म पश्यन्ति शुभं वा यदि वाशुभम्‌ | देवता: पञ्चभूतस्था: कि भूयः श्रोतुमिच्छसि

于是,安住于五大之中的主宰诸天便观其所作——或善或恶。你还想听什么?

Verse 26

ततो धर्मसमायुक्त: स जीव: सुखमेधते । इहलोके परे चैव कि भूय: कथयामि ते,तदनन्तर धर्मयुक्त वह जीव इहलोक और परलोकमें सुखका अनुभव करता है। अब तुम्हें और क्या बताऊँ?

因此,与达摩相应的众生,今世来世皆得安乐而兴盛。我还须对你说什么呢?

Verse 27

युधिछिर उवाच तद्‌ दर्शितं भगवता यथा धर्मोडनुगच्छति । एतत्‌ तु ज्ञातुमिच्छामि कथ्थ॑ रेत: प्रवर्तते

尤提希提罗说道:“世尊啊,您已开示了法如何随逐生命。如今我愿知:在此身中,生殖精华(retas,精液/生命之力)是如何生起并运转的?”

Verse 28

ब॒हस्पतिरुवाच अन्नमश्नन्ति यद्‌ देवा: शरीरस्था नरेश्वर । पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिर्मनस्तथा

布里哈斯帕提说道:“大王啊,身内主宰诸分的诸神,享用人所食之食——即与地、水、食、风、空、光,以及心相应者。由此食物使体内诸元素(并心为伴)皆得圆满满足之时,强盛的生殖精华(retas,精液/生命之力)便产生。”

Verse 29

ततस्तृप्तेषु राजेन्द्र तेषु भूतेषु पडचसु । मन:पषष्ठेषु शुद्धात्मन्‌ रेत: सम्पद्यते महत्‌

布里哈斯帕提说道:“罗阇因陀罗啊,当那五大在身中皆得满足——以心为第六——纯净之人啊,伟大的生殖精华(retas,精液/生命之力)便得成就。”

Verse 30

ततो गर्भ: सम्भवति श्लेषात्‌ स्त्रीपुंसयोर्नूप । एतत्‌ ते सर्वमाख्यातं भूय: कि श्रोतुमिच्छसि

“继而,大王啊,由女子与男子的结合,胚胎便得生成。我已尽为汝说;如今,统御之君啊,你还愿听什么?”

Verse 31

युधिषछ्िर उवाच आखायात॑ मे भगवता गर्भ: संजायते यथा । यथा जातस्तु पुरुष: प्रपद्यति तदुच्यताम्‌

尤提希提罗说道:“尊者啊,您已为我说明胚胎如何生成。如今请说:人既已出生,为何又如何再度堕入系缚,复被诸缘所缠所缚?”

Verse 32

ब॒हस्पतिर्वाच आसमज़मात्र: पुरुषस्तैर्भूतैरभि भूयते । विप्रयुक्तश्न तैर्भूते: पुनर्यात्यपरां गतिम्‌

布里哈斯帕提说道:一个人在判断上哪怕仅有些微失衡,也会被诸元素之力(bhūta)所压倒;但当他与这些 bhūta 分离时,便又能获得更高的生存归趣。此教诲强调道德上的自我统御:辨识稍有失守,低下冲动便乘隙而入;远离它们,则上升之道得以恢复。

Verse 33

बृहस्पतिजीने कहा--राजन्‌! जीव उस वीर्यमें प्रविष्ट होकर जब गर्भमें संनिहित होता है, तब वे पाँचों भूत शरीररूपमें परिणत हो उसे बाँध लेते हैं, फिर उन्हीं भूतोंसे विलग होनेपर वह दूसरी गतिको प्राप्त होता है ।।

布里哈斯帕提说道:“大王啊,当生灵之我(jīva)进入精种并安住于胎中时,五大元素化作身形,将其系缚;当它与这些元素分离时,便获得另一种归趣。确实,唯有与诸元素相合的具身之我,才领受乐与苦。其时,安住于五大元素中的主宰神祇,观照它的业行是吉是凶。你还想听什么呢?”

Verse 34

युधिछिर उवाच त्वगस्थिमांसमुत्सृज्य तैश्न भूतैर्विवर्जित: । जीव: स भगवन्‌ क्वस्थ: सुखदु:खे समश्लुते

尤狄希提罗说道:“尊者啊,当生灵之我(jīva)舍弃由皮、骨、肉所成之身,并与五大元素的联系分离之后,它住于何处?又如何经历乐与苦?”

Verse 35

बुहस्पतिर्वाच जीव: कर्मसमायुक्तः शीघ्र॑ रेतस्त्वमागत: । स्त्रीणां पुष्पं समासाद्य सूते कालेन भारत

布里哈斯帕提说道:“婆罗多啊,jīva 为自身业力所驱,迅速趋入精种之态;进入女子的经血之期,随时节成熟而受生。”

Verse 36

यमस्य पुरुषै: क्लेशं यमस्य पुरुषैर्वधम्‌ दुःखं संसारचक्रं च नर: क्लेशं स विन्दति

尤狄希提罗说道:人会在阎摩的使者手下遭受折磨——承受他们的击打与惩罚——并被迫经历轮回之轮(saṃsāra)痛苦的转动。由此,因自身恶行的果报,他遭逢苦恼与反复的悲惨。

Verse 37

इहलोके च स प्राणी जन्मप्रभृति पार्थिव । सुकृतं कर्म वै भुद्धक्ते धर्मस्य फलमाश्रित:

大王啊,就在此世间,众生自出生之时起,确实会亲身领受善业(福德之业)的果报——将其享受为依于(并由)法(Dharma)而生的果实。此偈强调:伦理之行并非抽象之谈,其结果在有身之生中被经历、被品尝。

Verse 38

यदि धर्म यथाशक्ति जन्मप्रभूति सेवते | ततः स पुरुषो भूत्वा सेवते नित्यदा सुखम्‌

由提施提罗说道:若有人自生命伊始便尽其所能奉行与修习法(Dharma),那么此人既已真正成为可称之人,便能恒常安住于快乐之中。

Verse 39

पृथ्वीनाथ! यदि प्राणी इस लोकमें जन्मसे ही पुण्यकर्ममें लगा रहता है तो वह धर्मके फलका आश्रय लेकर उसके अनुसार सुख भोगता है। यदि अपनी शक्तिके अनुसार बाल्यकालसे ही धर्मका सेवन करता है तो वह मनुष्य होकर सदा सुखका अनुभव करता है ।।

由提施提罗说道:“大地之主啊!若有情在此世自出生起便恒常投身于福德之业,则依止法(Dharma)之果,便随其而享受安乐。若又量力自幼修习法,则得为人而常得安稳之乐。然而,若在奉法之中偶尔转而行非法(Adharma),那么在快乐之后,那众生也必将经历忧苦。”

Verse 40

अधर्मेण समायुक्तो यमस्य विषयं गत: । महद्‌ दुःखं समासाद्य तिर्यग्योनौ प्रजायते,अधर्मपरायण मनुष्य यमलोकमें जाता है और वहाँ महान्‌ दुःख भोगकर यहाँ पशु- पक्षियोंकी योनिमें जन्म लेता है

由提施提罗说道:“与非法(Adharma)相应之人,将入阎摩(Yama)之境。于彼处受大苦后,复生于此,堕入兽胎或鸟胎。”

Verse 41

कर्मणा येन येनेह यस्यां योनौ प्रजायते । जीवो मोहसमायुक्तस्तन्मे निगदत: शृणु,जीव मोहके वशीभूत होकर जिस-जिस कर्मका अनुष्ठान करनेसे जैसी-जैसी योनिमें जन्म धारण करता है, उसे बता रहा हूँ, सुनो

由提施提罗说道:“听我说,我将阐明:被迷妄(Moha)所制的有身之众生,如何依其在此世所作的种种特定行为,而生于此胎彼胎。”

Verse 42

यदेतदुच्यते शास्त्रे सेतिहासे च च्छन्दसि । यमस्य विषयं घोर मर्त्यों लोक: प्रपद्यते

玉提希提罗说道:“凡权威的论典、伊提诃娑传统以及吠陀赞歌中所宣说者——即阎摩那可怖的境域——世间一切凡人终究无可避免地要进入那一界。”

Verse 43

शास्त्र, इतिहास और वेदमें जो यह बात बतायी गयी है कि मनुष्य इस लोकमें पाप करनेपर मृत्युके पश्चात्‌ यमराजके भयंकर लोकमें जाता है, यह सत्य ही है ।।

玉提希提罗说道:“论典、伊提诃娑传统与吠陀所宣示的——人在此世造罪,死后将赴阎摩那可怖之界——此言确为真实。然而,国王啊,就在阎摩之世中,也有功德之所,可比天界。凡具福德之有情、诸行走之众,除却生于畜生与下劣胎藏者(如昆虫之类),皆往彼处。”

Verse 44

यमस्य भवने दिव्ये ब्रहलोकसमे गुणै: । कर्मभिनियतैर्बद्धो जन्तुर्दु:खान्युपाश्चुते

玉提希提罗说道:“在阎摩光辉的宫殿中——其神妙与诸般胜德可比梵天界——然而众生为自身业力之驱迫所缚,仍要受诸苦恼。”

Verse 45

येन येन तु भावेन कर्मणा पुरुषो गतिम्‌ । प्रयाति परुषां घोरां तत्ते वक्ष्याम्यत: परम्‌,मनुष्य जिस-जिस भाव और जिस-जिस कर्मसे निष्ठुरतापूर्ण भयंकर गतिको प्राप्त होता है, अब उसीको बता रहा हूँ

“人凭何等心态、何等行为而招致严酷可怖的归宿——此后我将为你详说。”

Verse 46

अधीत्य चतुरो वेदान्‌ द्विजो मोहसमन्वित: । पतितात्‌ प्रतिगृह्याथ खरयोनौ प्रजायते,जो द्विज चारों वेदोंका अध्ययन करनेके बाद भी मोहवश पतित मनुष्योंसे दान लेता है, उसका गदहेकी योनिमें जन्म होता है

玉提希提罗说道:“纵然研习四部吠陀,若一位二次生者(dvija)为迷妄所蔽,竟受堕落之人所施之礼,则其后将投生于驴胎。”

Verse 47

खरो जीवति वर्षाणि दश पञठ्च च भारत | खरो मृतो बलीवर्द: सप्त वर्षाणि जीवति,भारत! गदहेकी योनिमें वह पंद्रह वर्षोतक जीवित रहता है। उसके बाद मरकर बैल होता है। उस योनिमें वह सात वर्षोतक जीवित रहता है

尤提施提罗说道:“噢,婆罗多啊,驴能活十五年。它死后转生为公牛,在那一世中活七年。”

Verse 48

बलीवर्दों मृतश्चापि जायते ब्रद्यराक्षस: । ब्रह्मरक्षश्ष मासांस्त्रींस्ततो जायति ब्राह्मण:

尤提施提罗说道:“公牛死后转生为梵罗刹(brahmarākṣasa)。作为梵罗刹停留三个月后,便又再生为婆罗门(brāhmaṇa)。”

Verse 49

पतितं याजयित्वा तु कृमियोनौ प्रजायते । तत्र जीवति वर्षाणि दश पञ्च च भारत

尤提施提罗说道:“然而,为堕落之人(patita)主持祭仪的祭司,死后将转生于虫类之胎。噢,婆罗多啊,他在那里活十五年。”

Verse 50

कृमिभावाद्‌ विमुक्तस्तु ततो जायति गर्दभ: । गर्दभ: पञ्च वर्षाणि पज्च वर्षाणि सूकर:

尤提施提罗说道:“从虫身解脱之后,便转生为驴。为驴五年,继而为猪五年。”

Verse 51

कुक्कुटः पञ्च वर्षाणि पज्च वर्षाणि जम्बुक: । थ्वा वर्षमेक॑ं भवति ततो जायति मानव:

尤提施提罗说道:“公鸡活五年,豺也活五年;而人的生命却极其短促——几乎不过一年——便又逝去。”

Verse 52

कीड़ेकी योनिसे छूटनेपर वह गदहेका जन्म पाता है। पाँच वर्षतक गदहा रहकर पाँच वर्ष सूअर, पाँच वर्ष मुर्गा, पाँच वर्ष सियार और एक वर्ष कुत्ता होता है। उसके बाद वह मनुष्ययोनिमें उत्पन्न होता है ।।

坚战(Yudhiṣṭhira)说道:“愚昧的弟子若以罪业冒犯师长,必定在此世经历三种卑下的再生——毫无疑问。经文阐明:此等过失使灵魂堕入种种卑贱可怖的生存状态(转生为诸多禽兽及其他骇人的境遇),唯有受尽其报,方能复得人身;由此彰显违犯师徒之伦的伦理重罪,以及业行必然结报的法则。”

Verse 53

प्राक्‌ श्वा भवति राजेन्द्र तत: क्रव्यात्तत: खर: । ततः प्रेत: परिक्लिष्ट: पश्चाज्जायति ब्राह्मण:

坚战说道:“诸王之王啊,先则为犬;继而为食肉之罗刹(rākṣasa);再而为驴。其后死去,作受苦的饿鬼(preta),历经诸多折磨,方得再生于婆罗门(brāhmaṇa)之胎。”此偈以卑贱转生与死后苦厄的次第,昭示愚弟子冒犯师长之罪的沉重,直至终能复归人身(婆罗门)之生。

Verse 54

मनसापि गुरोर्भार्या यः शिष्यो याति पापकृत्‌ । स उग्रान्‌ प्रैति संसारानधर्मेणेह चेतसा

坚战说道:“即便只在心念之中,弟子若对师母起意,亦是造罪。凭此不义之念,便在此世招致可怖的轮回,投生于骇人的胎类与境遇之中。”

Verse 55

श्वयोनौ तु स सम्भूतस्त्रीणि वर्षाणि जीवति । तत्रापि निधन प्राप्त: कृमियोनौ प्रजायते

坚战说道:“投生犬胎者,寿三年;即便在彼处,既遭死亡,复生于虫胎。”

Verse 56

कृमिभावमनुप्राप्तो वर्षमेक॑ तु जीवति । ततस्तु निधन प्राप्तो ब्रह्मययोनौ प्रजायते

既堕为虫,寿一岁;其后复遭死亡,乃生于婆罗门(brāhmaṇa)之胎。此处昭示业报之理:沉沦虽苦,受报既尽,亦有复升之机。

Verse 57

यदि पुत्रसमं शिष्य॑ गुरुहन्यादकारणे । आत्मन: कामकारेण सोऊपि हिंस्र: प्रजायते

玉提湿提罗说:若有师长因一己任性与欲望,无端杀害如同亲子般的弟子,则此师长亦成暴戾之人。权威并不能使残酷成圣:即便是导师,若循私欲而不循达摩(正法)行事,也必招致道德之罪。

Verse 58

यदि गुरु अपने पुत्रके समान शिष्यको बिना कारणके ही मारता-पीटता है तो वह अपनी स्वेच्छा-चारिताके कारण हिंसक पशुकी योनिमें जन्म लेता है ।।

玉提湿提罗说:若有师长把弟子视同己子,却无端鞭打殴击,那么由于只凭一己恣意,他将堕入凶暴禽兽之生。又如是,噢大王,那轻慢父母之子,死后首先转生为驴。此段以达摩(正法)为准绳,申明教诲与家道之义:权威须以理与节制行使,而孝敬父母乃根本伦理;违之则招致卑贱之果报。

Verse 59

गर्दभवत्वं तु सम्प्राप्प दश वर्षाणि जीवति । संवत्सरं तु कुम्भीरस्ततो जायेत मानव:,गदहेका शरीर पाकर वह दस वर्षोंतक जीवित रहता है। फिर एक सालतक घड़ियाल रहनेके बाद मानवयोनिमें उत्पन्न होता है

玉提湿提罗说:“堕为驴身者,活十年;其后又作俱毗罗(kumbhīra,鳄类)一年,然后复得人身而生。”此言昭示业报之理:恶行可致卑贱之转生,然轮回亦容其终归人道,于是得以再行抉择,复求达摩(正法)。

Verse 60

पुत्रस्य मातापितरौ यस्य रुष्टात्रुभावपि । गुर्वपध्यानत: सो5पि मृतो जायति गर्दभ:,जिस पुत्रके ऊपर माता और पिता दोनों ही रष्ट होते हैं, वह गुरुजनोंके अनिष्टचिन्तनके कारण मृत्युके बाद गदहा होता है

玉提湿提罗说:即便父母对其子怒意坚决,然因诸可敬长者之恶念与怨祝,彼子死后亦转生为驴。此段强调:招致父母与长辈之不悦,乃至成为其诅咒或害意所向,其伦理后果极为沉重。

Verse 61

खरो जीवति मासांस्तु दश श्वा च चतुर्दश । बिडाल: सप्तमासांस्तु ततो जायति मानव:

玉提湿提罗说:“此有情在驴胎中十月;继而为狗十四月;又为猫七月;其后方复生为人。”此言彰显业报之理:堕入下等形体之后,回归人道须经艰辛而分阶而上。

Verse 62

मातापितरावाक़ुश्य सारिक: सम्प्रजायते । ताडयित्वा तु तावेव जायते कच्छपो नृूप

尤提士提罗说道:“辱骂父母者,来世转生为八哥鸟;但啊,大王,若竟动手殴打那同一对父母,便将转生为龟。”

Verse 63

कच्छपो दश वर्षाणि त्रीणि वर्षाणि शल्यक: । व्यालो भूत्वा च षण्मासांस्ततो जायति मानुष:

尤提士提罗说道:“十年为龟,三年为豪猪;又为蛇六个月;其后方得再入人胎而生。”

Verse 64

भर्तृपिण्डमुपाश्नन्‌ यो राजद्विष्टानि सेवते । सो<5पि मोहसमापन्नो मृतो जायति वानर:,जो पुरुष राजाके टुकड़े खाकर पलता हुआ भी मोहवश उसके शत्रुओंकी सेवा करता है, वह मरनेके बाद वानर होता है

“纵使一人靠食君王之赐而活,若因迷妄仍去侍奉憎恨君王之人,则死后转生为猴。”

Verse 65

वानरो दश वर्षाणि पज्च वर्षाणि मूषिक: । श्वाथ भूत्वा तु षण्मासांस्ततो जायति मानुष:

尤提士提罗说道:“十年为猴,五年为鼠;继而为狗六个月;其后再得人身。”

Verse 66

दस वर्षोतक वानर, पाँच वर्षोतक चूहा और छ: महीनोंतक कुत्ता होकर वह मनुष्यका जन्म पाता है ।।

尤提士提罗说道:“经历十年为猴、五年为鼠、六个月为狗之后,那众生方得再获人身。然而,侵吞他人所托之物者,将堕入阎摩之境;辗转百生之后,终将投生为虫。”

Verse 67

तत्र जीवति वर्षाणि दश पञ्च च भारत | दुष्कृतस्य क्षयं कृत्वा ततो जायति मानुष:,भारत! कीड़ेकी योनिमें वह पंद्रह वर्षोतकफ जीवित रहता है और अपने पापोंका क्षय करके अन्तमें मनुष्य-योनिमें जन्म लेता है

婆罗多啊!它在那里活十五年;待其恶业余报消尽之后,便又投生于人胎。

Verse 68

असूयको नरश्नापि मृतो जायति शार्ज्गक: । विश्वासहर्ता तु नरो मीनो जायति दुर्मति:

坚战说道:“好挑人过失、心怀嫉妒者,死后生为鹿;而心智乖僻、背弃他人信任者,死后生为鱼。”

Verse 69

भूत्वा मीनोडष्ट वर्षाणि मृतो जायति भारत । मृगस्तु चतुरो मासांस्ततश्छाग: प्रजायते,भारत! आठ वर्षोतक मछली रहकर मरनेके बाद वह चार मासतक मृग होता है। उसके बाद बकरेकी योनिमें जन्म लेता है

坚战说道:“婆罗多啊,他作鱼八年而后死去,再次投生;继而为鹿四个月;其后,婆罗多啊,他又入羊胎而生。”

Verse 70

छागस्तु निधन प्राप्य पूर्णे संवत्सरे ततः । कीट: संजायते जन्तुस्ततो जायति मानुष:,बकरा पूरे एक वर्षपर मृत्युको प्राप्त होनेके पश्चात्‌ कीड़ा होता है। उसके बाद उस जीवको मनुष्यका जन्म मिलता है

坚战说道:“山羊死后,待满一年,那有身之灵便生为虫;其后又得人身而生。”

Verse 71

धान्यान्‌ यवांस्तिलान्‌ माषान्‌ कुलत्थान्‌ सर्षपांश्वणान्‌ । कलापानथ मुद्गांश्व गोधूमानतसींस्तथा

坚战说道:“凡无耻之人——为无明与迷妄所制——偷盗稻米、大麦、芝麻、黑豆(乌拉豆)、马豆、芥子、鹰嘴豆,以及豌豆、绿豆、小麦、亚麻籽等诸谷物者,死后先堕为鼠。”

Verse 72

सस्यस्यान्यस्य हर्ता च मोहाज्जन्तुरचेतन: । स जायते महाराज मूषिको निरपत्रप:

尤狄湿提罗说道:“噢,大王!若有人因愚痴迷妄而失其知觉,抛却一切羞耻,盗取谷粮与诸般出产;其人死后必生为鼠,天性无耻。”

Verse 73

ततः प्रेत्य महाराज मृतो जायति सूकर: । सूकरो जातमात्रस्तु रोगेण प्रियते नूप,राजन! फिर वह चूहा मृत्युके पश्चात्‌ सूअर होता है। नरेश्वर! वह सूअर जन्म लेते ही रोगसे मर जाता है

随后,噢,大王!其人死后复生为猪;而那猪,噢君王——噢国王——甫一出生,便因疾病而死。

Verse 74

श्वा ततो जायते मूढ: कर्मणा तेन पार्थिव । भूत्वा श्वा पज्च वर्षाणि ततो जायति मानव:,पृथ्वीनाथ! फिर उसी कर्मसे वह मूढ़ जीव कुत्ता होता है और पाँच वर्षतक कुत्ता रहकर अन्तमें मनुष्यका जन्म पाता है

噢,大地之主!正因那一业行,迷昧之众生生为犬;为犬五年之后,终又再得人身。

Verse 75

परदाराभिमर्श तु कृत्वा जायति वै वृकः । श्वा शृुगालस्ततो गृध्रो व्याल: कड़को बकस्तथा,परस्त्रीगमनका पाप करके मनुष्य क्रमशः भेड़िया, कुत्ता, सियार, गीध, साँप, कंक और बगुला होता है

尤狄湿提罗说道:“亵犯他人妻者,必生为狼;其后(随诸次转生)为犬,为豺,为鹫,为蛇,为鹭(kaṅka),亦复为鹤。”

Verse 76

भ्रातुर्भार्या तु पापात्मा यो धर्षयति मोहित: । पुंस्कोकिलत्वमाप्नोति सोडपि संवत्सरं नूप ७६ ।। नरेश्वरर जो पापात्मा मोहवश भाईकी स्त्रीके साथ बलात्कार करता है, वह एक वर्षतक कोयलकी योनिमें पड़ा रहता है

尤狄湿提罗说道:“噢,国王!那被欲望迷惑的罪人,若强暴兄长之妻,必受重报:转生为雄杜鹃,并在彼身中停留整整一年。”

Verse 77

सखिभार्या गुरोर्भार्या राजभार्या तथैव च । प्रधर्षयित्वा कामाय मृतो जायति सूकर:,जो कामनाकी पूर्तिके लिये मित्र, गुरु और राजाकी स्त्रीका सतीत्व भंग करता है, वह मरनेके बाद सूअर होता है

坚战(Yudhiṣṭhira)说道:“凡被欲火驱使,侵犯朋友之妻、师长之妻或国王之妻的贞洁者,此人死后必转生为猪。”

Verse 78

सूकर: पज्च वर्षाणि दश वर्षाणि श्वाविध: । बिडाल: पज्च वर्षाणि दश वर्षाणि कुक्कुट:

坚战说道:“(此众生)为野猪五年,为 śvāvidha 十年,为猫五年,为雄鸡十年。”

Verse 79

पिपीलिकस्तु मासांस्त्रीन्‌ कीट: स्यान्मासमेव तु । एतानासाद्य संसारान्‌ कृमियोनौ प्रजायते

坚战说道:“其后为蚁三月,为虫仅一月。经历这些轮回之途后,又复生于虫类之胎。”

Verse 80

तत्र जीवति मासांस्तु कृमियोनौ चतुर्दश । ततो<वधर्मक्षयं कृत्वा पुनर्जायति मानव:,उस कीट-योनिमें वह चौदह महीनोंतक जीवन धारण करता है। तदनन्तर पापक्षय करके वह पुनः मनुष्य-योनिमें जन्म लेता है

在那里,于虫胎之中,他存活十四个月。其后,待罪业余报消尽,此人便再度转生为人。

Verse 81

उपस्थिते विवाहे तु यज्ञे दानेडपि वा विभो | मोहात्‌ करोति यो विघ्नं॑ स मृतो जायते कृमि:,प्रभो! जो विवाह, यज्ञ अथवा दानका अवसर आनेपर मोहवश उसमें विघ्न डालता है, वह भी मरनेके बाद कीड़ा ही होता है

大力者啊,当婚礼、祭祀(yajña)或布施之时已至,若有人因迷妄而加以阻挠,死后亦必转生为虫。

Verse 82

कृमिर्जीवति वर्षाणि दश पञ्च च भारत | अधर्मस्य क्षयं कृत्वा ततो जायति मानव:,भारत! वह कीट पंद्रह वर्षोतक जीवित रहता है। फिर पापोंका क्षय करके वह मनुष्ययोनिमें जन्म लेता है

玉提施提罗说道:“噢,婆罗多啊,一条虫能活十年又五年。其后,待其不义之业的余报耗尽,便再度转生为人。”

Verse 83

पूर्व दत्त्वा तु यः कन्यां द्वितीये दातुमिच्छति । सो<पि राजन्‌ मृतो जन्तुः कृमियोनौ प्रजायते

玉提施提罗说道:“噢,大王,凡先将一位少女许配于人,而后又欲将同一少女再许给第二人者——此人死后亦将转生于虫胎之中。此事在婚姻与社会义务上,被宣告为极重的道德罪过。”

Verse 84

तत्र जीवति वर्षाणि त्रयोदश युधिष्ठिर । अधर्मसंक्षये युक्तस्ततो जायति मानव:,युधिष्ठिर! उस योनिमें वह तेरह वर्षोतक जीवन धारण करता है। तदनन्तर पापक्षयके पश्चात्‌ वह पुनः मनुष्ययोनिमें उत्पन्न होता है

“噢,玉提施提罗,在那种存在中,他活十三年。其后,当其罪业耗尽,便再度转生为人。”

Verse 85

देवकार्यमकृत्वा तु पितृकार्यमथापि वा । अनिर्वाप्य समश्नन्‌ वै मृतो जायति वायस:,जो देवकार्य अथवा पितृकार्य न करके बलि-वैश्वदेव किये बिना ही अन्न ग्रहण करता है, वह मरनेके बाद कौएकी योनिमें जन्म लेता है

玉提施提罗说道:“若有人进食之前不行对诸神之事,亦不行对祖灵之事,不先作应有的供献(如婆利与毗湿瓦提婆祭),则其死后将转生于乌鸦之胎。”

Verse 86

वायस: शतवर्षाणि ततो जायति कुक्कुट: । जायते व्यालकश्चापि मासं तस्मात्‌ तु मानुष:,सौ वर्षोतक कौएके शरीरमें रहकर वह मुर्गा होता है। उसके बाद एक मासतक सर्प रहता है। तत्पश्चात्‌ मनुष्यका जन्म पाता है

玉提施提罗说道:“一百年间转生为乌鸦;其后转生为雄鸡。又转生为蛇一月;再之后,方得人身。”

Verse 87

ज्येष्ठं पितृसमं चापि भ्रातरं यो5वमन्यते । सो5पि मृत्युमुपागम्य क्रौज्चयोनौ प्रजायते,बड़ा भाई पिताके समान आदरणीय है, जो उसका अपमान करता है, उसे मृत्युके बाद क्रौंच पक्षीकी योनिमें जन्म लेना पड़ता है

玉提湿陀罗说:长兄当如父亲一般受人敬奉。凡轻慢此兄者,死后将再生于鸻鹤(krauñca,鹤类)之身。

Verse 88

क्रौज्चो जीवति वर्ष तु ततो जायति चीरक: । ततो निधनमापन्नो मानुषत्वमुपाश्षुते,क्रौंच होकर वह एक वर्षतक जीवित रहता है। उसके बाद चीरक जातिका पक्षी होता है और फिर मरनेके बाद मनुष्य-योनिमें जन्म पाता है

玉提湿陀罗说:“鸻鹤(krauñca)只活一年;其后转生为名为‘奇罗迦’(cīraka)的一类鸟。再死之后,便得人身,生于人间。”

Verse 89

वृषलो ब्राह्मणीं गत्वा कृमियोनौ प्रजायते । ततः सम्प्राप्प निधनं जायते सूकर: पुनः:

玉提湿陀罗说:“若首陀罗(śūdra)男子与婆罗门(brāhmaṇa)女子行淫,离身之后,先堕生为虫。再死之后,又转生为猪。”

Verse 90

सूकरो जातमात्रस्तु रोगेण प्रियते नूप । श्वा ततो जायते मूढ: कर्मणा तेन पार्थिव

玉提湿陀罗说:“大王啊,他转生为猪,方才出生便因疾病而死。其后,那迷昧之众生,由于同一罪业,又生为狗,哦,大地之主。”

Verse 91

श्वा भूत्वा कृतकर्मासौ जायते मानुषस्तत: । तत्रापत्यं समुत्पाद्य मृतो जायति मूषिक:

既已生为狗,那众生便耗尽先前所作之业的果报,随后转生为人。即便得人身,也只生一子,继而死去;为受尽余罪之报,又生为鼠。

Verse 92

कृतघ्नस्तु मृतो राजन्‌ यमस्य विषयं गत: । यमस्य पुरुषै: क्रुद्धैर्वधं प्राप्नोति दारुणम्‌

大王啊,那忘恩负义之人死后,将被带往阎摩之境。在那里,阎摩愤怒的使者会对他施以严酷而可怖的惩罚。

Verse 93

दण्डं समुद्गरं शूलमग्निकुम्भं च दारुणम्‌ । असिपत्रवनं घोरवालुकं कूटशाल्मलीम्‌

由提施提罗说道:“有刑杖、巨槌、长矛与可怖的火釜;又有剑叶之林、骇人的沙地,以及荆棘丛生的娑罗摩梨树之境。”

Verse 94

एताश्षान्याश्च बद्धी क्ष यमस्य विषयं गत: । यातनाः: प्राप्य तत्रोग्रास्ततो वध्यति भारत

由提施提罗说道:“以这些及其他方式捆缚之后,人被押往阎摩之境。在那里,先受猛烈的折磨,继而被处死——噢,婆罗多啊。”

Verse 95

भारत! वह दण्ड, मुद्गर और शूलकी चोट खाकर दारुण अग्निकुम्भ (कुम्भीपाक), असिपत्रवन, तपी हुई भयंकर बालू, काँटोंसे भरी हुई शाल्मली आदि नरकोंमें कष्ट भोगता है। यमलोकमें पहुँचकर इन ऊपर बताये हुए तथा और भी बहुत-से नरकोंकी भयंकर यातनाएँ भोगकर वह वहाँ यमदूतोंद्वारा पीटा जाता है ।।

婆罗多啊!他遭刑杖、巨槌与长矛击打,又在诸般可怖地狱中受苦:如火釜地狱(Kumbhīpāka)、剑叶之林、炽热骇人的沙地、荆棘密布的娑罗摩梨之境,等等。抵达阎摩之界后,受尽上述以及更多地狱的惨烈刑罚,复被阎摩使者鞭挞殴击。随后,那忘恩负义之人被凶猛的阎摩使者所杀——婆罗多族之雄啊——又回到轮回之轮,投生为虫类之胎。

Verse 96

कृमिर्भवति वर्षाणि दश पठ्च च भारत । ततो गर्भ समासाद्य तत्रैव प्रियते शिशु:,भारत! पंद्रह वर्षोतक वह कीड़ेकी योनिमें रहता है। फिर गर्भमें आकर वहीं गर्भस्थ शिशुकी दशामें ही मर जाता है

由提施提罗说道:“噢,婆罗多啊,有人要作虫十年又五年。其后入于胎中,便在彼处死去,仍是未出世的胎儿之身。”

Verse 97

ततो गर्भशतैर्जन्तुर्बहुभि: सम्प्रपद्यते । संसारांश्व बहून्‌ गत्वा ततस्तिर्यक्षु जायते

于是,有身之众生历经数百胎藏,反复承受孕育之苦。于世间轮回中辗转多番,屡屡受生之后,终而堕生于畜生道,成为非人之类。

Verse 98

ततो दुःखमनुप्राप्य बहु वर्षमणानिह । अपुनर्भवसंयुक्तस्तत: कूर्म: प्रजायते,इन योनियोंमें बहुत वर्षोतक दुःख भोगनेके पश्चात्‌ वह फिर मनुष्ययोनिमें न आकर दीर्घकालके लिये कछुआ हो जाता है

继而在那些胎生之中受苦多年之后,他不再复归人身;反而长久投生为龟。

Verse 99

दधि हृत्वा बकश्नापि प्लवो मत्स्यानसंस्कृतान्‌ | चोरयित्वा तु दुर्बुद्धिर्मधु दंश: प्रजायते

愚昧之人盗取凝乳(dadhi),则生为鹭鸟;盗取未烹之鱼,则生为名为“普拉瓦”(plava)的水鸟;盗取蜂蜜,则生为“摩度檀舍”(madhudaṃśa)——叮咬之虫,如蚊虻之类。

Verse 100

फल वा मूलकं हृत्वा अपूपं वा पिपीलिका: । चोरयित्वा च निष्पावं जायते हलगोलक:

若盗取果实、萝卜(mūlaka)或糕饼(apūpa),便转生为蚁。若盗取niṣpāva(一种豆类),则转生为名为“哈拉戈拉卡”(halagolaka)的微小生物。

Verse 101

पायसं चोरयित्वा तु तित्तिरित्वमवाप्तुते हृत्वा पिष्टमयं पूपं कुम्भोलूक: प्रजायते,खीरकी चोरी करनेवाला तीतरकी योनिमें जन्म लेता है। आटेका पूआ चुराकर मनुष्य मरनेके बाद उल्लू होता है

盗取pāyasa(甜乳饭)者,转生为鹧鸪。盗取以面粉制成之饼者,死后转生为鸮(猫头鹰)。

Verse 102

अयो हत्वा तु दुर्बद्धिवायसो जायते नर: । कांस्य हृत्वा तु दुर्बुद्धिहारितो जायते नर:,लोहेकी चोरी करनेवाला मूर्ख मानव कौवा होता है। काँसकी चोरी करके खोटी बुद्धिवाला मनुष्य हारीत नामक पक्षी होता है

尤提士提罗说:“心智乖僻而盗铁者,来世生为乌鸦;心智乖僻而盗取 kāṁsya(钟铜、合金)者,来世生为名为 hārita 的鸟。”

Verse 103

राजतं भाजनं हृत्वा कपोत: सम्प्रजायते । हृत्वा तु काज्चनं भाण्डं कृमियोनौ प्रजायते,चाँदीका बर्तन चुरानेवाला कबूतर होता है और सुवर्णमय भाण्डकी चोरी करके मनुष्यको कीड़ेकी योनिमें जन्म लेना पड़ता है

尤提士提罗说:“盗取银器者,来世生为鸽;盗取金器者,来世堕入虫类之胎而生。”

Verse 104

पत्रोर्ण चोरयित्वा तु कृकलत्वं निगच्छति । कौशिक तु ततो हृत्वा नरो जायति वर्तकः,ऊनी वस्त्र चुरानेवाला कृकल (गिरगिट) की योनिमें जन्म लेता है। कौशेय (रेशमी) वस्त्रकी चोरी करनेपर मनुष्य बत्तक होता है

尤提士提罗说:“盗取以植物纤维与羊毛织成之布者,堕为蜥蜴之身;盗取丝绸(kauśeya)者,来世生为鸭。”

Verse 105

अंशुकं चोरयित्वा तु शुकी जायति मानव: । चोरयित्वा दुकूलं तु मृतो हंस: प्रजायते

尤提士提罗说:“盗取细软之布 aṁśuka 者,来世生为鹦鹉;盗取上衣 dukūla 者,死后则生于天鹅之胎。”

Verse 106

क्रौज्च: कार्पासिकं हृत्वा मृतो जायति मानव: । चोरयित्वा नर: पट्ट त्वाविकं चैव भारत

尤提士提罗说:“人若盗取棉布而死,来世生为 krauñca(涉水之鸟)。又盗取丝与羊毛者,噢,婆罗多啊,也同样遭遇这般卑下的再生。”

Verse 107

वर्णान्‌ हत्वा तु पुरुषो मृतो जायति बर्लिण:

玉提希提罗说道:“然而,凡屠戮诸种姓阶序(varṇa)之人,死后将再生为‘巴尔利那’(barliṇa)。”

Verse 108

वर्णकादींस्तथा गन्धांश्नोरयित्वेह मानव:,राजन! जो मनुष्य लोभके वशीभूत होकर वर्णक (अनुलेपन) आदि तथा चन्दनकी चोरी करता है, वह छछूँदर होता है। उस योनिमें वह पंद्रह वर्षतक जीवित रहता है

玉提希提罗说道:“大王啊!凡为贪欲所制而盗取脂粉涂香之物——如芳香膏泥与檀香——者,将堕入麝鼩(shrew/musk-rat)之胎。在那一生中,他活十五年。”

Verse 109

छुच्छुन्दरित्वमाप्रोति राजल्लाॉभपरायण: । तत्र जीवति वर्षाणि ततो दश च पठच च

玉提希提罗说道:“大王啊,被贪欲驱使之人,将得鼩鼱之身。在那一胎生中,他活十五年。”

Verse 110

अधर्मस्य क्षयं गत्वा ततो जायति मानुष: । चोरयित्वा पयश्चापि बलाका सम्प्रजायते,फिर अधर्मका क्षय हो जानेपर वह मनुष्यका जन्म पाता है। दूध चुरानेवाली स्त्री बगुली होती है

玉提希提罗说道:“当不义(adharma)的余业耗尽之后,便又得人身。而即便只是偷取牛乳,犯者也将再生为‘巴拉卡’(balākā,鹤/鹭一类水鸟)。”

Verse 111

यस्तु चोरयते तैलं नरो मोहसमन्वित: । सो<पि राजन्‌ मृतो जन्तुस्तैलपायी प्रजायते

玉提希提罗说道:“大王啊!那被痴迷(moha)所缠而盗取油脂之人,死后将再生为名为‘泰拉帕伊’(tailapāyī)的生灵——一种饮油之虫。由此可知,即便看似细微的盗取,也会招致沉重的业报。”

Verse 112

अश्त्र॑ पुरुषं हत्वा सशस्त्र: पुरुषाधम: । अर्थार्थी यदि वा वैरी स मृतो जायते खर:

玉提湿陀罗说道:“凡持兵刃而杀无兵之人者,乃人中最下。无论是贪求利益,抑或出于仇怨,彼死之后,必转生为驴。”

Verse 113

एकस्तरति दुर्गाणि गच्छत्येकस्तु दुर्गतिम्‌ । बृहस्पतिजीने कहा--राजन्‌! प्राणी अकेला ही जन्म लेता

玉提湿陀罗说道:“人独自渡过险难之关,亦独自堕入败亡。众生独自而生,独自而死;独自经历战胜苦难,也独自品尝厄运。故那卑劣之人,或贪财利,或因仇怨,执兵刃而杀无兵之人——死后必入驴胎而生。为驴者活两年,继而为兵刃所杀;如是死去,又转生为鹿,恒常惶惧,终日畏惧猎人。”

Verse 114

मृगो वध्यति शस्त्रेण गते संवत्सरे तु सः । हतो मृगस्ततो मीन: सो5पि जालेन बध्यते,मृग होकर वह सालभरमें ही शस्त्रद्वारा मारा जाता है। मरनेपर मत्स्य होता है, फिर वह भी जालसे बँधता है

玉提湿陀罗说道:“为鹿者,满一年便为兵刃所获而被杀。那鹿既被杀,便转为鱼;而那鱼亦复为网所困。”

Verse 115

मासे चतुर्थे सम्प्राप्ते श्वापद: सम्प्रजायते । श्वापदो दश वर्षाणि द्वीपी वर्षाणि पजच च

玉提湿陀罗说道:“及至第四月,便生为野兽之属(śvāpad),如狼等猛兽。于此类中住十年,继而五年转为 dvīpin——如虎或豹。”

Verse 116

ततस्तु निधन प्राप्त: कालपर्यायचोदित: । अधर्मस्य क्षयं कृत्वा ततो जायति मानुष:,तदनन्तर पापका क्षय होनेपर कालकी प्रेरणासे मृत्युको प्राप्त हो वह पुनः मनुष्य होता है

其后,随时轮转动之催迫,彼复遭死亡;待其不义(adharma)之余业耗尽,便又再生为人。

Verse 117

स्त्रियं हत्वा तु दुर्बद्धिर्यमस्य विषयं गत: । बहून्‌ क्लेशान्‌ समासाद्य संसारांश्चैव विंशतिम्‌

坚战说道:“心智乖谬之人若杀害妇女,必堕入阎摩(Yama)之境。于彼处受尽种种苦刑之后,他将一次又一次再生——二十次——投于充满忧苦的诸种生存境界。”

Verse 118

ततः पश्चान्महाराज कृमियोनौ प्रजायते । कृमिर्विशतिवर्षाणि भूत्वा जायति मानुष:,महाराज! तदनन्तर वह कीड़ेकी योनिमें जन्म लेता है और बीस वर्षोंतक कीट-योनिमें रहकर अन्तमें मनुष्य होता है

坚战说道:“其后,噢大王,他将投生于虫之胎。为虫二十年后,方才再得转生为人。”

Verse 119

भोजन चोरयित्वा तु मक्षिका जायते नर: । मक्षिकासंघवशगो बहून्‌ मासान्‌ भवत्युत

坚战说道:“偷盗食物之人,来世转生为蝇。受蝇群驱使,长月久居其身。”

Verse 120

धान्यं॑ हृत्वा तु पुरुषो लोमश: सम्प्रजायते

坚战说道:“盗取谷粮之人,将转生为遍体多毛之身。”

Verse 121

तथा पिण्याकसम्मसिश्रमशन चोरयेन्नर: । स जायते बश्रुसमो दारुणो मूषिको नर:

坚战说道:“同样地,若有人偷取拌有油饼渣(oil-cake)的食物,他将转生为一只褐色的鼠,性情凶厉而残酷。”

Verse 122

दशन्‌ वै मानुषान्नित्यं पापात्मा स विशाम्पते । धान्यकी चोरी करनेवाले मनुष्यके शरीरमें दूसरे जन्ममें बहुत-से रोएँ पैदा होते हैं। प्रजानाथ! जो मानव तिलके चूर्णसे मिश्रित भोजनकी चोरी करता है, वह नेवलेके समान आकारवाला भयानक चूहा होता है तथा वह पापी सदा मनुष्योंको काटा करता है ।।

尤提士提罗说道:“噢,人民之主啊,那怀着罪恶之魂者,无论投生于何等境界,都会不断啮咬人类。”在此段教诲(并由前后文的训示加以铺陈)中,尤提士提罗阐明伦理法则:盗窃——尤其是盗取赖以生存的粮食与家用要物——终将成熟为痛苦而卑贱的再生。惩罚以象征性的禽兽之身呈现:来世的形体映照其行径的伤害与潜匿;其果报不仅是世间的谴责,更是业力的转化,使作恶者化为长久折磨人类的存在。

Verse 123

मत्स्यमांसमथो हृत्वा काको जायति दुर्मति: । लवणं चोरयित्वा तु चिरिकाक: प्रजायते

尤提士提罗说道:“心智乖僻而盗取鱼与肉者,将再生为乌鸦;盗取盐者,则再生为 cirikāka(某一种鸟类)。”此偈强调一条道德法则:即便看似微小的盗窃也有业报,来世之生将依其过失的性质而被塑成相应的形态。

Verse 124

विश्वासेन तु निक्षिप्तं यो विनिहल्लोति मानव: । स गतायुर्नरस्तात मत्स्ययोनौ प्रजायते,तात! जो मानव विश्वासपूर्वक रखी हुई दूसरेकी धरोहरको हड़प लेता है, वह गतायु होनेपर मत्स्यकी योनिमें जन्म लेता है

尤提士提罗说道:“亲爱的啊,那人若背弃信任,侵吞他人因信赖而寄托于己的财物——受托之物——其命终之后,将投生于鱼胎之中。”

Verse 125

मत्स्ययोनिमनुप्राप्य मृतो जायति मानुष: । मानुषत्वमनुप्राप्य क्षीणायुरुपपद्यते,मत्स्ययोनिमें जन्म लेनेके बाद जब मरता है, तब पुनः मनुष्यका जन्म पाता है। मानव- योनिमें आकर उसकी आयु बहुत कम होती है

尤提士提罗说道:“既已投生鱼胎,若在其中死去,便又再生为人;然而一旦复得人身,其寿命便会减损而短促。”

Verse 126

पापानि तु नरा: कृत्वा तिर्यग्‌ जायन्ति भारत । न चात्मन: प्रमाणं ते धर्म जानन्ति किंचन

尤提士提罗说道:“噢,婆罗多啊,人们造作罪业之后,便投生于下等种类(禽兽之中)。在那里,他们不再具备可靠的自我引导与辨别之力,对达摩——使自身得以提升之道——更是一无所知。”

Verse 127

ये पापानि नराः कृत्वा निरस्यन्ति व्रतैः सदा । सुखदुःखसमायुक्ता व्यथितास्ते भवन्त्युत

尤提士提罗说道:“那些人作下罪业,却又不断以誓戒与修持来求驱除其罪者,仍被乐与苦的交替所系缚,终究同样受苦。其内心的不安找不到安稳的归处;因为若只有赎罪之举而无真实的改过自新,恶行的根柢便仍旧未除。”

Verse 128

असंवासा: प्रजायन्ते म्लेच्छाश्वापि न संशय: । नरा: पापसमाचारा लोभमोहसमन्विता:

尤提士提罗说道:“由此等行径,便生出无所归属、无所安居之人;他们也将沦为‘弥勒叉’——此无疑也。那些以罪行为常、为贪欲与迷妄所驱使的人,必将背离有戒有序的生活法度,堕入卑下败坏之境。”

Verse 129

वर्जयन्ति च पापानि जन्मप्रभूति ये नरा: । अरोगा रूपवन्तस्ते धनिनश्व भवन्त्युत,जो मनुष्य जन्मसे ही पापका परित्याग कर देते हैं, वे नीरोग, रूपवान्‌ और धनी होते हैं

尤提士提罗说道:“那些自生命伊始便远离罪行的人,便得无病之身;其形貌端美,亦能得财富。”

Verse 130

स्त्रियो5प्येतेन कल्पेन कृत्वा पापमवाप्रुयु: । एतेषामेव जनन्‍्तूनां भार्यात्वमुपयान्ति ता:

尤提士提罗说道:“即便是女子,若也以此法作恶,亦将分担其罪;并且她们将成为那些同样必须承受此等恶业果报之众生的妻室。”

Verse 131

परस्वहरणे दोषा: सर्व एव प्रकीर्तिता: । एतद्धि लेशमात्रेण कथितं ते मयानघ

尤提士提罗说道:“凡取夺他人之物所生的一切过失,皆已尽数宣说。噢,无垢的王者啊,我所告于你者不过略说一二——仅作此事之微示而已。”

Verse 132

अपरस्मिन्‌ कथायोगे भूय: श्रोष्यसि भारत । एतन्मया महाराज ब्रह्मणो वदत: पुरा

尤提士提罗说道:“噢,婆罗多啊,在另一个谈论的机缘中,你还会再听到此事。大王啊,久远以前,当梵天(Brahmā)开口宣说之时,我亲自从他口中听闻了这些内容。如今你既发问,我便如实依我所闻,向你叙述。听了这些之后,愿你恒常将心安住于达摩(Dharma)。”

Verse 133

सुरषषीरणां श्रुतं मध्ये पृष्टभश्नापि यथातथम्‌ । मयापि तच्च कार्त्स्न्येन यथावदनुवर्णितम्‌ । एतच्छुत्वा महाराज धर्मे कुरुमनः सदा

尤提士提罗说道:“在诸天仙圣(天界仙人)之中,我曾听闻此事;你所问之处,我也依其所问如实作答。我如今亦已将那整件事完整无遗、次第分明地叙述。大王啊,婆罗多族之荣光啊,听罢此言,当恒常令心安住于达摩(Dharma)。”

Verse 153

तथैवाधर्मसंयुक्तो नरकं॑ चोपपद्यते । धर्मयुक्त प्राणी ही उत्तम स्वर्गमें जाता है और अधर्मपरायण जीव नरकमें पड़ता है

尤提士提罗说:“同样地,与非达摩(adharma)相缠者,必堕地狱;与达摩相应的众生,得至更高天界,而沉溺于非达摩者,终将坠入地狱。”

Verse 163

धर्म एको मनुष्याणां सहाय: पारलौकिक: । इसलिये विद्वान्‌ पुरुषको चाहिये कि न्यायसे प्राप्त हुए धनके द्वारा धर्मका अनुष्ठान करे। एकमात्र धर्म ही परलोकमें मनुष्योंका सहायक है

尤提士提罗说道:“对人而言,唯有达摩(Dharma)是来世真正的同伴。因此,智者应以公正与正当行为所得之财来奉行达摩。在彼世,唯有达摩会作为助力,常伴其侧。”

Verse 176

नर: करोत्यकार्याणि परार्थे लोभमोहितः । जो बहुश्रुत नहीं है, वही मनुष्य लोभ और मोहके वशीभूत हो दूसरेके लिये लोभ, मोह, दया अथवा भयसे न करने योग्य पापकर्म कर बैठता है

尤提士提罗说道:“人若为贪欲所迷、为痴妄所蔽,便会做出不该做的事,纵然口称‘为了他人之利’亦然。”

Verse 183

एतत्‌ त्रयमवाप्तव्यमधर्मपरिवर्जितम्‌ | धर्म, अर्थ और काम--ये तीन जीवनके फल हैं, अतः मनुष्यको अधर्मके त्यागपूर्वक इन तीनोंको उपलब्ध करना चाहिये

尤提士提罗说道:“此三者当求得,但不可依凭不义。达摩、利(artha)与欲(kāma)——乃人生三果;故人当先弃阿达摩(非正法),然后方可兼得此三。”

Verse 216

बुद्धिरात्मा च सहिता धर्म पश्यन्ति नित्यदा | बृहस्पतिजीने कहा--धर्मराज! पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, यम, बुद्धि और आत्मा--ये सब सदा एक साथ मनुष्यके धर्मपर दृष्टि रखते हैं

尤提士提罗说道:“智慧(buddhi)与真我(ātman)合而为一,恒常观照人的达摩。”在相关教诲中,布里哈斯帕提告诫达摩王:诸元素与内在机能——地、水、火、风、空、意(mind)、阎摩(Yama)、智慧与真我——皆为常住之证人,时时注视众生是否循正法而行。

Verse 226

एतैश्व सह धर्मोडपि तं जीवमनुगच्छति । दिन और रात भी इस जगतके सम्पूर्ण प्राणियोंके कर्मोंके साक्षी हैं। इन सबके साथ धर्म भी जीवका अनुसरण करता है

尤提士提罗说道:“与这些证人同在,达摩亦随众生而行。”昼与夜亦为此世一切生灵之业行作证。在诸证人相伴之中,达摩始终随侍于灵魂——故无一行可谓无证、无报。

Verse 233

शरीर वर्जयन्त्येते जीवितेन विवर्जितम्‌ | महामते! त्वचा

尤提士提罗说道:“生命既离,此诸成分便弃身而去。”噫,大慧者!皮、骨、肉、精与血——一切身中之质,皆舍离无生之躯;亦即抛下曾寄于身的有身之我。唯有达摩随人而行。

Verse 1063

क्षौमं च वस्त्रमादाय शशो जन्तु: प्रजायते । सूती वस्त्रकी चोरी करके मरा हुआ मनुष्य क्रौंच पक्षीकी योनिमें जन्म लेता है। भारत! पाटम्बर

尤提士提罗说道:“盗取 kṣauma 之衣者,将再生为类兔之兽。”此偈昭示伦理之理:偷盗——尤其夺人衣物等生计所需——必招业报,此处以卑下之再生示其果。

Verse 1073

हत्वा रक्तानि वस्त्राणि जायते जीवजीवक: । अनेक प्रकारके रंगोंकी चोरी करके मृत्युको प्राप्त हुआ पुरुष मोर होता है। लाल कपड़े चुरानेवाला मनुष्य चकोरकी योनिमें जन्म लेता है

尤提施提罗说道:“凡毁坏或盗取红色衣裳者,来世将转生为‘吉瓦吉瓦迦’鸟(jīvajīvaka)。盗窃多种染料之人,死后化为孔雀。偷红布者,将投生于‘恰科罗’鸟(cakora)之胎。”

Verse 1196

ततः पापक्षयं कृत्वा मानुषत्वमवाप्तुते । भोजनकी चोरी करके मनुष्य मक्खी होता है और कई महीनोंतक मक्खियोंके समुदायके अधीन रहता है। तत्पश्चात्‌ पापोंका भोग समाप्त करके वह पुनः मनुष्य-योनिमें जन्म लेता है

“其后,当罪业余报受尽,便再得人身。盗取食物者将化为苍蝇,并在数月之间受制于蝇群;待罪果受毕,又复投生为人。”

Verse 1936

शरीरनिचयं ज्ञातुं बुद्धिस्तु मम जायते । युधिष्ठिरने पूछा--भगवन्‌! आपके मुँहसे मैंने धर्मयुक्त परम हितकर बात सुनी। अब शरीरकी स्थिति जाननेके लिये मेरा विचार हो रहा है

尤提施提罗问道:“世尊!我已从尊口听闻合乎法(dharma)、至善而有大利益之言。如今我心中生起求知之愿——欲明了此身的真实状况与构成。”

Frequently Asked Questions

Yudhiṣṭhira asks how a person can be freed from suffering when harm occurs not only through physical acts but also through speech and mental intention—expanding dharma from external behavior to internal causality.

Ahiṃsā is a complete discipline requiring prior mental renunciation, regulated speech, and controlled action; ethical purity is treated as cumulative and fragile, failing if any channel is neglected.

No explicit phalaśruti is stated in the provided verses; instead, the chapter frames practical consequence through the logic of suffering and release (duḥkha–pramokṣa), implying soteriological benefit through comprehensive restraint.