
Svargārohaṇa-parva Adhyāya 5 — Karmaphala-Nirdeśa and Phalāśruti (कर्मफलनिर्देशः फलश्रुतिश्च)
Upa-parva: Svargārohaṇa-upākhyāna (Karmaphala-nirdeśa)
The chapter opens with Janamejaya enumerating celebrated warriors and kings (e.g., Bhīṣma, Droṇa, Dhṛtarāṣṭra, Virāṭa, Drupada, Śaṅkha, Uttara, Jayadratha, Karṇa’s sons, Ghaṭotkaca and others) and asking how long they remained in heaven, whether their station was permanent, and what final destiny they attained. Sauti notes that, with Vyāsa’s permission, the account proceeds through Vaiśaṃpāyana. Vaiśaṃpāyana states a general principle: all beings must reach an end-state corresponding to karma, and then details specific integrations—Bhīṣma with the Vasus; Droṇa entering Bṛhaspati; Kṛtavarmā among the Maruts; Pradyumna with Sanatkumāra; Dhṛtarāṣṭra attaining Kubera’s difficult-to-reach realms; Pāṇḍu going to Mahendra’s abode; several rulers entering the Viśvedevas; Abhimanyu identified with Varcā, Soma’s son, returning to Soma; Karṇa entering Ravi (the Sun); Śakuni reaching Dvāpara; Dhṛṣṭadyumna entering Pāvaka (Fire); Dhṛtarāṣṭra’s sons ascending after being ‘weapon-purified’; and Yudhiṣṭhira and Vidura (kṣattā) entering Dharma. The chapter then concludes the narrational frame of the sarpasatra: Janamejaya is astonished; the rite ends; Āstīka is pleased; priests are rewarded; and the epic’s sanctity is proclaimed through extensive phalāśruti, asserting Mahābhārata’s completeness across dharma, artha, kāma, and mokṣa and the merit of recitation, study, and teaching.
Chapter Arc: जनमेजय का प्रश्न उठता है—भीष्म, द्रोण, कर्ण, शकुनि, धृष्टद्युम्न, घटोत्कच और अन्य असंख्य वीर, जो युद्ध में गिरे, वे अंततः कहाँ गए और किस-किन मूलस्वरूपों में लीन हुए? → वैशम्पायन (द्विजोत्तम) तपोदीप्त दृष्टि से एक-एक करके नाम गिनाते हैं—यादव, पाञ्चाल, कौरव-पक्ष, पाण्डव-पक्ष, और वे सब ‘नानुकीर्तित’ भी—और बताते हैं कि मृत्यु के बाद उनकी गंतव्य-यात्रा देवताओं, लोकों और तत्त्वों की ओर हुई। → महान उलटफेर का उद्घाटन: अनेक ‘मानव-वीर’ अपने-अपने दिव्य/तत्त्वात्मक मूल में प्रविष्ट होते हैं—कर्ण सूर्य में, शकुनि द्वापर (कपट-तत्त्व) में, धृष्टद्युम्न पावक (अग्नि) में; पाण्डु दोनों पत्नियों सहित महेन्द्र-भवन में; और धृतराष्ट्र के पुत्र स्वर्गभोग के पश्चात् अपने मूलतः बलोन्मत्त यातुधान-स्वरूप की ओर लौटते हैं। → कथा ‘इतिहास’ से ‘माहात्म्य’ में रूपांतरित होती है—यह पुण्य, पवित्र, उत्तम आख्यान सत्यवादी कृष्णद्वैपायन द्वारा धर्मकाम्यया रचा गया; शस्त्रपूत महात्मा दिव्य लोकों को प्राप्त हुए और समस्त पात्र अपने-अपने कारण-स्वरूप में विलीन हुए।
Verse 1
अपन रा< बछ। ] अत्ऑफा:म पञठ्चमो<ध्याय: भीष्म आदि वीरोंका अपने-अपने मूलस्वरूपमें मिलना और महा'भारतका उपसहार तथा माहात्म्य जनमेजय उवाच भीष्मद्रोणौ महात्मानौ धृतराष्ट्रश्न पार्थिव: । विराटद्रुपदौ चोभौ शड्खश्नैवोत्तरस्तथा
జనమేజయుడు పలికెను—భీష్మద్రోణులు ఆ మహాత్మ వీరులు, రాజు ధృతరాష్ట్రుడు, విరాటుడు మరియు ద్రుపదుడు—ఆ ఇద్దరూ, అలాగే శంఖుడు మరియు ఉత్తరుడు—వారికి ఏమి గతి కలిగింది, ఓ బ్రాహ్మణా?
Verse 2
धृष्टकेतुर्जयत्सेनो राजा चैव स सत्यजित् | दुर्योधनसुताश्चैव शकुनिश्चैव सौबल:
జనమేజయుడు పలికెను—ధృష్టకేతువు, జయత్సేనుడు, అలాగే ఆ రాజు సత్యజితుడు; ఇంకా దుర్యోధనుని కుమారులు, సౌబలుడు శకుని—వారికి ఏమి గతి కలిగింది, ఓ బ్రాహ్మణా?
Verse 3
कर्णपुत्राश्च विक्रान्ता राजा चैव जयद्रथ: । घटोत्कचादयश्चैव ये चान्ये नानुकीर्तिता:
జనమేజయుడు పలికెను—కర్ణుని విక్రాంత కుమారులు, అలాగే రాజు జయద్రథుడు; ఘటోత్కచుడు మొదలైనవారు, ఇంకా పేరుపేరునా చెప్పబడని ఇతరులు—వారికి ఏమి గతి కలిగింది, ఓ బ్రాహ్మణా?
Verse 4
ये चान्ये कीर्तिता वीरा राजानो दीप्तमूर्तय: । स्वर्गे काल॑ कियन्तं ते तस्थुस्तदपि शंस मे
జనమేజయుడు అడిగెను—ఇంకా కీర్తింపబడిన ఇతర వీర రాజులు, దీప్తమూర్తులు—వారు స్వర్గంలో ఎంతకాలం నిలిచిరి? అది కూడా నాకు చెప్పుము.
Verse 5
जनमेजयने पूछा--ब्रह्मन! महात्मा भीष्म और द्रोण, राजा धुृतराष्ट्र, विराट, ट्रुपद, शंख, उत्तर, धृष्टकेतु, जयत्सेन, राजा सत्यजित्द् दुर्योधनके पुत्र, सुबलपुत्र शकुनि, कर्णके पराक्रमी पुत्र, राजा जयद्रथ तथा घटोत्कच आदि तथा दूसरे जो नरेश यहाँ नहीं बताये गये हैं और जिनका नाम लेकर यहाँ वर्णन किया गया है, वे सभी तेजस्वी शरीर धारण करनेवाले वीर राजा स्वर्गलोकमें कितने समयतक एक साथ रहे? यह मुझे बताइये ।। आहोस्विछाश्रृतं स्थान तेषां तत्र द्विजोत्तम | अन्ते वा कर्मणां कां ते गतिं प्राप्ता नरर्षभा:,द्विजश्रेष्ठ! क्या उन्हें वहाँ सनातन स्थानकी प्राप्ति हुई थी? अथवा कर्मोका अन्त होनेपर वे पुरुषश्रेष्ठ किस गतिको प्राप्त हुए? इति श्रीमहा भारते शतसाहस्रयां संहितायां वैयासिकयां स्वर्गारोहणपर्वणि पउठ्चमो<5 ध्याय: इस प्रकार श्रीमहाभारत नामक व्यासनिर्मित शतसाहसी संहिताके स्व्गरोह्रणपर्वमें पॉचवाँ अध्याय पूरा हुआ
జనమేజయుడు అన్నాడు— “ఓ బ్రాహ్మణా! మహాత్ములు భీష్ముడు, ద్రోణుడు, రాజు ధృతరాష్ట్రుడు, విరాటుడు, ద్రుపదుడు, శంఖుడు, ఉత్తరుడు, ధృష్టకేతువు, జయత్సేనుడు, రాజు సత్యజితుడు, దుర్యోధనుని కుమారులు, సుబలపుత్రుడు శకుని, కర్ణుని పరాక్రమశాలి కుమారులు, రాజు జయద్రథుడు, ఘటోత్కచుడు మొదలైనవారు—ఇక్కడ ప్రత్యేకంగా చెప్పబడకపోయినా పేర్లతో వర్ణించబడిన ఇతర రాజులు కూడ—ఈ ప్రకాశమయ దేహాలు ధరించిన వీరనృపతులు స్వర్గలోకంలో ఒకేచోట కలిసి ఎంతకాలం నివసించారు? నాకు చెప్పండి. అలాగే, ఓ ద్విజోత్తమా! వారికి అక్కడ శాశ్వత స్థానం లభించిందా? లేక కర్మఫలాలు క్షీణించిన తరువాత ఆ పురుషశ్రేష్ఠులు ఏ గతిని పొందారు?”
Verse 6
एतदिच्छाम्यहं श्रोतु प्रोच्यमानं द्विजोत्तम । तपसा हि प्रदीप्तेन सर्व त्वमनुपश्यसि,विप्रवर! मैं आपके मुखसे इस विषयको सुनना चाहता हूँ; क्योंकि आप अपनी उद्दीप्त तपस्यासे सब कुछ देखते हैं
“ఓ ద్విజోత్తమా! మీరు వివరించగా ఈ విషయాన్ని నేను వినదలుచుకున్నాను; ఎందుకంటే మీ ప్రకాశించే తపస్సు శక్తితో మీరు సమస్తాన్ని దర్శిస్తారు, ఓ విప్రవరా!”
Verse 7
सौतिर्वाच इत्युक्त: स तु विप्रर्षिरनुज्ञातो महात्मना | व्यासेन तस्य नृपतेराख्यातुमुपचक्रमे,सौति कहते हैं--राजा जनमेजयके इस प्रकार पूछनेपर महात्मा व्यासकी आज्ञा ले ब्रह्मर्षि वैशम्पायनने राजासे इस प्रकार कहना आरम्भ किया
సౌతి అన్నాడు— రాజు జనమేజయుడు ఇలా పలికిన తరువాత, మహాత్ముడు వ్యాసుని అనుమతి పొందిన బ్రహ్మర్షి వైశంపాయనుడు ఆ నృపతికి ఈ వృత్తాంతాన్ని చెప్పడం ప్రారంభించాడు.
Verse 8
वैशम्पायन उवाच न शक्यं कर्मणामन्ते सर्वेण मनुजाधिप । प्रकृति कि नु सम्यक्ते पृच्छैषा सम्प्रयोजिता,वैशम्पायनजी बोले--राजन्! कर्मोंका भोग समाप्त हो जानेपर सभी लोग अपनी प्रकृति (मूल कारण)-को ही नहीं प्राप्त हो जाते हैं; (कोई-कोई ही अपने कारणमें विलीन होता है) यदि पूछो, क्या मेरा प्रश्न असंगत है? तो इसका उत्तर यह है कि जो प्रकृतिको प्राप्त नहीं हैं, उनके उद्देश्यसे तुम्हारा यह प्रश्न सर्वथा ठीक है
వైశంపాయనుడు అన్నాడు— “ఓ మనుజాధిపా! కర్మఫల భోగం ముగిసినప్పుడు అందరూ ఎటువంటి భేదం లేకుండా ప్రకృతిలోనే లయమవుతారని చెప్పడం సాధ్యం కాదు. ‘నా ప్రశ్న అసంగతమా?’ అని నీవు అనుకుంటే—కాదు; ప్రకృతిని పొందని వారిని గురించి నీ ప్రశ్న పూర్తిగా సముచితమైనదే.”
Verse 9
शृणु गुह्मामिदं राजन् देवानां भरतर्षभ । यदुवाच महातेजा दिव्यचक्षु: प्रतापवान्,राजन्! भरतश्रेष्ठ) यह देवताओंका गूढ़ रहस्य है। इस विषयमें दिव्य नेत्रवाले, महातेजस्वी, प्रतापी मुनि व्यासजीने जो कहा है, उसे बताता हूँ; सुनो--
వైశంపాయనుడు అన్నాడు— “ఓ రాజా, భరతశ్రేష్ఠా! దేవతలకు సంబంధించిన ఈ గూఢ రహస్యాన్ని విను. ఈ విషయమై దివ్యదృష్టి కలిగిన, మహాతేజస్సు మరియు ప్రతాపం గల ముని వ్యాసుడు చెప్పినదే నేను వివరిస్తాను—విను.”
Verse 10
मुनि: पुराण: कौरव्य पाराशर्यों महाव्रत: । अगाथबुद्धि: सर्वज्ञो गतिज्ञ: सर्वकर्मणाम्,कुरुनन्दन! जो सब कर्मोकी गतिको जाननेवाले, अगाध बुद्धिसम्पन्न एवं सर्वज्ञ हैं उन महान् व्रतधारी, पुरातन मुनि, पराशरनन्दन व्यासजीने तो मुझसे यही कहा है कि “वे सभी वीर कर्मभोगके पश्चात् अन्ततोगत्वा अपने मूल स्वरूपमें ही मिल गये थे। महातेजस्वी, परम कान्तिमान् भीष्म वसुओंके स्वरूपमें ही प्रविष्ट हो गये”
వైశంపాయనుడు పలికెను—కురునందనా! పరాశరనందనుడు, మహావ్రతధారి, ప్రాచీన ముని వ్యాసుడు—అగాధబుద్ధి గలవాడు, సర్వజ్ఞుడు, సమస్త కర్మాల గతి తెలిసినవాడు—నాకు ఇదే చెప్పెను: ఆ వీరులందరు కర్మఫలాలను అనుభవించిన తరువాత చివరకు తమ తమ మూల స్వరూపములలోనే లీనమయ్యిరి. మహాతేజస్సు, పరమ కాంతిమంతుడైన భీష్ముడు వసువుల స్వరూపములోనే మళ్లీ ప్రవేశించెను.
Verse 11
तेनोक्त कर्मणामन्ते प्रविशन्ति स्विकां तनुम् वसूनेव महातेजा भीष्म: प्राप महाद्युति:,कुरुनन्दन! जो सब कर्मोकी गतिको जाननेवाले, अगाध बुद्धिसम्पन्न एवं सर्वज्ञ हैं उन महान् व्रतधारी, पुरातन मुनि, पराशरनन्दन व्यासजीने तो मुझसे यही कहा है कि “वे सभी वीर कर्मभोगके पश्चात् अन्ततोगत्वा अपने मूल स्वरूपमें ही मिल गये थे। महातेजस्वी, परम कान्तिमान् भीष्म वसुओंके स्वरूपमें ही प्रविष्ट हो गये”
ఆ కర్మఫలాల అంతమున వారు తమ స్వకీయ సత్య స్వరూపములో ప్రవేశించుదురు. అలాగే మహాతేజస్సు, మహాద్యుతిమంతుడైన భీష్ముడు వసువుల స్థితిని పొందెను.
Verse 12
अष्टावेव हि दृश्यन्ते वसवो भरतर्षभ । बृहस्पतिं विवेशाथ द्रोणो हाज्ञिरसां वरम्,भरतभूषण! यही कारण है कि वसु आठ ही देखे जाते हैं (अन्यथा भीष्मजीको लेकर नौ वसु हो जाते)। आचार्य द्रोणने आंगिरसोंमें श्रेष्ठ बृहस्पतिजीके स्वरूपमें प्रवेश किया
భరతశ్రేష్ఠా! వసువులు నిజంగా ఎనిమిదిమందే దర్శనమిస్తారు. ఆపై ద్రోణుడు ఆంగిరసులలో శ్రేష్ఠుడైన బృహస్పతి స్వరూపములో ప్రవేశించెను.
Verse 13
कृतवर्मा तु हार्दिक्य: प्रविवेश मरुद्गणान् । सनत्कुमार प्रद्युम्न: प्रविवेश यथागतम्,हृदिकपुत्र कृतवर्मा मरुदगणोंमें मिल गया। प्रद्युम्म जैसे आये थे उसी तरह सनत्कुमारके स्वरूपमें प्रविष्ट हो गये
హృదీకపుత్రుడైన కృతవర్మ మరుద్గణములలో ప్రవేశించెను. ప్రద్యుమ్నుడు—నిజముగా సనత్కుమారుడే—ఎలా వచ్చెనో అలాగే తన మూల స్వరూపములో లీనమయ్యెను.
Verse 14
धृतराष्ट्रो धनेशस्य लोकान् प्राप दुरासदान् । धृतराष्ट्रेण सहिता गान्धारी च यशस्विनी,धृतराष्ट्रने धनाध्यक्ष कुबेरके दुर्लभ लोकोंको प्राप्त किया। उनके साथ यशस्विनी गान्धारी देवी भी थीं
ధృతరాష్ట్రుడు ధనాధిపతి ధనేశుడు (కుబేరుడు) యొక్క దుర్లభ లోకములను పొందెను. ధృతరాష్ట్రునితో పాటు యశస్సుగల గాంధారీ దేవి కూడా ఉండెను.
Verse 15
पत्नीभ्यां सहित: पाण्डुमहेन्द्रसदनं ययौ । विराटद्रुपदौ चोभौ धृष्टकेतुश्न पार्थिव:,विश्वेषां देवतानां ते विविशुर्नरसत्तमा: । राजा पाण्डु अपनी दोनों पत्नियोंके साथ महेन्द्रके भवनमें चले गये। राजा विराट, द्रपद, धृष्टकेतु, निशठ, अक्रूर, साम्ब, भानु, कम्प, विदूरथ, भूरिश्रवा, शल, पृथ्वीपति भूरि, कंस, उग्रसेन वसुदेव और अपने भाई शंखके साथ नरश्रेष्ठ उत्तर-ये सभी सत्पुरुष विश्वेदेवोंके स्वरूपमें मिल गये
రాజు పాండుడు తన రెండు భార్యలతో కలిసి మహేంద్రుడు (ఇంద్రుడు) నివాసానికి వెళ్లాడు. అలాగే రాజు విరాటుడు, ద్రుపదుడు, మరియు రాజన్యుడు ధృష్టకేతు, నిశఠుడు—ఈ నరశ్రేష్ఠులు విశ్వదేవుల స్థితిలో ప్రవేశించారు.
Verse 16
निशठाक्रूरसाम्बाश्व भानुः कम्पो विदूरथ: । भूरिश्रवा: शलश्वैव भूरिश्व पृथिवीपति:
నిశఠ, అక్రూర, సాంబ, అశ్వ, భాను, కంప, విదూరథ, భూరిశ్రవ, శల, మరియు భూమిపతి భూరిశ్వ—ఇవీ (అందులో) పేర్కొనబడ్డారు.
Verse 17
कंसश्रैवोग्रसेनश्व वसुदेवस्तथैव च । उत्तरश्न सह भ्रात्रा शड़्खेन नरपुड्भवः
కంసుడు, ఉగ్రసేనుడు, వసుదేవుడు; అలాగే నరశ్రేష్ఠుడు ఉత్తరుడు కూడా తన సోదరుడు శంఖతో కలిసి—(వారూ) పేర్కొనబడ్డారు.
Verse 18
वर्चा नाम महातेजा: सोमपुत्र: प्रतापवान्
వర్చా అనే మహాతేజస్సు, ప్రతాపవంతుడు ఉన్నాడు—అతడు సోముని కుమారుడు.
Verse 19
सोअभिमन्युर्नुसिंहस्य फाल्गुनस्य सुतो5भवत् | स युदृध्वा क्षत्रधर्मेण यथा नानन््य: पुमान् क्वचित्
ఆ వర్చానే నరసింహుడైన ఫాల్గునుడు (అర్జునుడు) కుమారుడిగా అభిమన్యుడై జన్మించాడు. క్షత్రధర్మానుసారంగా యుద్ధం చేసి, ఎక్కడా ఎవ్వరూ సరితూగని వీరత్వాన్ని ప్రదర్శించాడు.
Verse 20
विवेश सोम॑ धर्मात्मा कर्मणो<न्ते महारथ: । चन्द्रमाके महातेजस्वी और प्रतापी पुत्र जो वर्चा हैं, वे ही पुरुषसिंह अर्जुनके पुत्र होकर अभिमन्यु नामसे विख्यात हुए थे। उन्होंने क्षत्रिय-धर्मके अनुसार ऐसा युद्ध किया था, जैसा दूसरा कोई पुरुष कभी नहीं कर सका था। उन धर्मात्मा महारथी अभिमन्युने अपना कार्य पूरा करके चन्द्रमामें ही प्रवेश किया ।। १८-१९ ह।। आविवेश रविं कर्णो निहतः पुरुषर्षभ:
వైశంపాయనుడు పలికెను—పురుషశ్రేష్ఠుడైన కర్ణుడు హతుడై సూర్యునిలోనికి ప్రవేశించాడు. ఈ కావ్యం అతని మరణాన్ని కేవలం ఓటమిగా కాక, తన మహాజగత్తు మూలానికి తిరిగిపోవుటగా చిత్రిస్తుంది—వీరత్వం, ధర్మం, యుద్ధకర్మఫలాలచే నియతమైన గమనం పరిపూర్ణమైనదని సూచిస్తూ।
Verse 21
धृतराष्ट्रात्मजा: सर्वे यातुधाना बलोत्कटा:
వైశంపాయనుడు పలికెను—ధృతరాష్ట్రుని కుమారులందరూ యాతుధానులవలె, బలపరాక్రమంలో అత్యంత ఉగ్రులు. ఈ పంక్తి చెప్పేది—ధర్మం నుండి విడిపోయిన శక్తి నిజమైన మహత్తు కాదు; అది దైత్యసమాన క్రూరత్వమే.
Verse 22
धर्ममेवाविशत् क्षत्ता राजा चैव युधिषछिर:,विदुर और राजा युधिष्ठिरने धर्मके ही स्वरूपमें प्रवेश किया। बलरामजी साक्षात् भगवान् अनन्तदेवके अवतार थे। वे रसातलमें अपने स्थानको चले गये। ये वे ही अनन्तदेव हैं जिन्होंने ब्रहद्माजीकी आज्ञा पाकर योगबलसे इस पृथ्वीकों धारण कर रखा है
వైశంపాయనుడు పలికెను—క్షత్తా విదురుడు ధర్మములోనే ప్రవేశించెను; రాజు యుధిష్ఠిరుడును ధర్మస్వరూపములోనే లీనమయ్యెను. బలరాముడు సాక్షాత్తు అనంతదేవావతారం; అతడు రసాతలములోని తన స్వస్థానమునకు వెళ్లెను. అదే అనంతుడు పితామహ బ్రహ్మ ఆజ్ఞచే యోగబలముతో భూమిని ధరిస్తున్నాడు.
Verse 23
अनन्तो भगवान् देव: प्रविवेश रसातलम् | पितामहनियोगाद् वै यो योगाद् गामधारयत्,विदुर और राजा युधिष्ठिरने धर्मके ही स्वरूपमें प्रवेश किया। बलरामजी साक्षात् भगवान् अनन्तदेवके अवतार थे। वे रसातलमें अपने स्थानको चले गये। ये वे ही अनन्तदेव हैं जिन्होंने ब्रहद्माजीकी आज्ञा पाकर योगबलसे इस पृथ्वीकों धारण कर रखा है
వైశంపాయనుడు పలికెను—భగవాన్ దేవుడైన అనంతుడు రసాతలములో ప్రవేశించెను; పితామహ బ్రహ్మ ఆజ్ఞచే యోగబలముతో భూమిని ధరిస్తున్నవాడు ఆయనే. అతడు తన స్వధామమునకు తిరిగెను; ఇదే ముగింపులో విదురుడు, యుధిష్ఠిరుడు ధర్మములోనే ప్రవేశించారని కూడా చెప్పబడింది—అది కేవలం దేహవియోగం కాదు, స్వతత్త్వములో లయ.
Verse 24
य: स नारायणो नाम देवदेव: सनातन: । तस्यांशो वासुदेवस्तु कर्मणो<डन्ते विवेश ह
వైశంపాయనుడు పలికెను—నారాయణుడని పిలువబడే, దేవదేవుడైన సనాతనుడు ఎవడో; అతని అంసమైన వాసుదేవుడు కర్మాంతమున (తన మూలస్వరూపమున) ప్రవేశించెను.
Verse 25
वे जो नारायण नामसे प्रसिद्ध सनातन देवाधिदेव हैं उन्हींके अंश वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण थे, जो अवतारका कार्य पूरा करके पुन: अपने स्वरूपमें प्रविष्ट हो गये ।। षोडश स्त्रीसहस्राणि वासुदेवपरिग्रह: । अमज्जंस्ता: सरस्वत्यां कालेन जनमेजय,जनमेजय! भगवान् श्रीकृष्णकी जो सोलह हजार स्त्रियाँ थीं, उन्होंने अवसर पाकर सरस्वती नदीमें कूदकर अपने प्राण दे दिये
వైశంపాయనుడు పలికెను—ఓ జనమేజయా! ‘నారాయణుడు’ అని ప్రసిద్ధుడైన సనాతన దేవాధిదేవుని అంసమే వసుదేవనందనుడు శ్రీకృష్ణుడు. అవతారకార్యాన్ని పూర్తిచేసి ఆయన మళ్లీ తన స్వరూపంలో ప్రవేశించాడు. ఓ జనమేజయా! కాలప్రభావంతో వాసుదేవుని పదహారు వేల మంది భార్యలు అవకాశం చూసి సరస్వతి నదిలో దూకి ప్రాణత్యాగం చేశారు.
Verse 26
तत्र त्यक्त्वा शरीराणि दिवमारुरुहु: पुनः । ताश्चैवाप्सरसो भूत्वा वासुदेवमुपाविशन्,वहाँ देहत्याग करनेके पश्चात् वे सब-की-सब पुनः स्वर्गलोकमें जा पहुँचीं और अप्सराएँ होकर पुनः भगवान् श्रीकृष्णकी सेवामें उपस्थित हो गयीं
అక్కడ దేహాన్ని విడిచిన తరువాత వారు అందరూ మళ్లీ స్వర్గానికి आरोహించారు. అప్సరసలుగా మారి వారు తిరిగి వాసుదేవుడు (శ్రీకృష్ణుడు) సేవలో చేరారు.
Verse 27
हतास्तस्मिन् महायुद्धे ये वीरास्तु महारथा: । घटोत्कचादयश्चैव देवान् यक्षांश्ष॒ भेजिरे,इस प्रकार उस महाभारत नामक महायुद्धमें जो-जो वीर महारथी घटोत्कच आदि मारे गये थे वे देवताओं और यक्षोंके लोकोंमें गये
ఆ మహాయుద్ధంలో హతమైన వీర మహారథులు—ఘటోత్కచుడు మొదలైనవారు—దేవలోకాలను, యక్షలోకాలను పొందారు.
Verse 28
दुर्योधनसहायाश्न राक्षसा: परिकीर्तिता: । प्राप्तास्ते क्रमशो राजन् सर्वलोकाननुत्तमान्,राजन! जो दुर्योधनके सहायक थे, वे सब-के-सब राक्षस बताये गये हैं। उन्हें क्रमशः सभी उत्तम लोकोंकी प्राप्ति हुई
ఓ రాజా! దుర్యోధనునికి సహాయకులైనవారు రాక్షసులని కీర్తింపబడ్డారు; అయినా వారు క్రమంగా సర్వోత్తమ లోకాలను పొందారు.
Verse 29
भवनं च महेन्द्रस्य कुबेरस्थ च धीमतः । वरुणस्य तथा लोकान् विविशु: पुरुषर्षभा:,ये श्रेष्ठ पुरुष क्रमश: देवराज इन्द्रके, बुद्धिमान् कुबेरके तथा वरुण देवताके लोकोंमें गये
ఆ పురుషశ్రేష్ఠులు క్రమంగా మహేంద్రుడైన ఇంద్రుని భవనంలో, ధీమంతుడైన కుబేరుని లోకంలో, అలాగే వరుణుని లోకాలలో ప్రవేశించారు.
Verse 30
एतत् ते सर्वमाख्यातं विस्तरेण महाद्ुते । कुरूणां चरितं कृत्स्नं पाण्डवानां च भारत,महातेजस्वी भरतनन्दन! यह सारा प्रसंग--कौरवों और पाण्डवोंका सम्पूर्ण चरित्र तुम्हें विस्तारके साथ बताया गया
వైశంపాయనుడు పలికెను—ఓ మహాతేజస్వీ భారతా! కౌరవులూ పాండవులూ గూర్చిన సమగ్ర చరిత్రను, వారి ఆచారాన్ని నేను నీకు విస్తారంగా పూర్తిగా వివరించితిని.
Verse 31
सौतिर्वाच एतच्छुत्वा द्विजश्रेष्ठा:स राजा जनमेजय: । विस्मितो5भवदत्यर्थ यज्ञकर्मान्तरेष्वथ,सौति कहते हैं--विप्रवरो! यज्ञकर्मके बीचमें जो अवसर प्राप्त होते थे, उन्हींमें यह महाभारतका आख्यान सुनकर राजा जनमेजयको बड़ा आश्चर्य हुआ
సౌతి పలికెను—ఓ ద్విజశ్రేష్ఠులారా! యజ్ఞకర్మ మధ్య మధ్య లభించిన విరామాలలో ఈ కథను విని రాజు జనమేజయుడు అత్యంత ఆశ్చర్యచకితుడయ్యెను.
Verse 32
ततः समापयामासु: कर्म तत् तस्य याजका: । आस्तीकश्चा भवत् प्रीत: परिमोक्ष्य भुजड्रमान्,तदनन्तर उनके पुरोहितोंने उस यज्ञकर्मको समाप्त कराया। सर्पोंको प्राणसंकटसे छुटकारा दिलाकर आस्तीक मुनिको भी बड़ी प्रसन्नता हुई
అనంతరం అతని యాజకులు ఆ యజ్ఞకర్మను ముగించిరి. సర్పులను ప్రాణాపాయము నుండి విడిపించి ఆస్తీక ముని కూడా అత్యంత సంతోషించెను.
Verse 33
ततो द्विजातीन् सर्वास्तान् दक्षिणाभिरतोषयत् । पूजिताश्चापि ते राज्ञा ततो जम्मुर्यथागतम्,राजाने यज्ञकर्ममें सम्मिलित हुए समस्त ब्राह्मणोंको पर्याप्त दक्षिणा देकर संतुष्ट किया तथा वे ब्राह्मण भी राजासे यथोचित सम्मान पाकर जैसे आये थे उसी तरह अपने घरको लौट गये
తదుపరి రాజు ఆ సమస్త ద్విజులను యథోచిత దక్షిణలతో సంతృప్తిపరచెను. రాజు చేత పూజింపబడి వారు వచ్చినట్లే తమ తమ గృహాలకు తిరిగి వెళ్లిరి.
Verse 34
विसर्जयित्वा विप्रांस्तानू राजापि जनमेजय: । ततस्तक्षशिलाया: स पुनरायाद् गजाह्दयम्,उन ब्राह्मणोंको विदा करके राजा जनमेजय भी तक्षशिलासे फिर हस्तिनापुरको चले आये
ఆ విప్రులను వీడ్కోలు చెప్పి రాజు జనమేజయుడు కూడా తక్షశిల నుండి మరల గజాహ్వయము (హస్తినాపురము)కు తిరిగి వచ్చెను.
Verse 35
एतत् ते सर्वमाख्यातं वैशम्पायनकीर्तितम् । व्यासाज्ञया समज्ञातं सर्पसत्रे नूपस्य हि,इस प्रकार जनमेजयके सर्पयज्ञमें व्यासजीकी आज्ञासे मुनिवर वैशम्पायनजीने जो इतिहास सुनाया था तथा मैंने अपने पिता सूतजीसे जिसका ज्ञान प्राप्त किया था, वह सारा-का-सारा मैंने आपलोगोंके समक्ष यह वर्णन किया है
ఇదంతా నేను మీకు సంపూర్ణంగా వివరించాను—రాజు జనమేజయుని సర్పసత్రంలో వ్యాసుని ఆజ్ఞచేత మునివరుడు వైశంపాయనుడు ప్రకటించిన ఇతిహాసవృత్తాంతం. వినబడినదిగా, పరంపరగా అందినదిగా ఉన్న ఆ సమస్త ఇతిహాసధారను ఇప్పుడు మీ సమక్షంలో నేను వర్ణించాను.
Verse 36
पुण्योडयमितिहासाख्य: पवित्र चेदमुत्तमम् कृष्णेन मुनिना विप्र निर्मितं सत्यवादिना
ఓ బ్రాహ్మణా! ‘ఇతిహాసం’ అని ప్రసిద్ధమైన ఈ పరమోత్తమమైన, పవిత్రమైన గ్రంథం పుణ్యోదయాన్ని కలిగిస్తుంది. సత్యవాది ముని కృష్ణుడు (వ్యాసుడు) దీనిని నిర్మించాడు.
Verse 37
ब्रह्मन्! सत्यवादी मुनि व्यासजीके द्वारा निर्मित यह पुण्यमय इतिहास परम पवित्र एवं बहुत उत्तम है ।। सर्वज्ञेन विधिज्ञेन धर्मज्ञानवता सता | अतीन्द्रियेण शुचिना तपसा भावितात्मना,सर्वज्ञ, विधिविधानके ज्ञाता, धर्मज्ञ, साधु, इन्द्रियातीत ज्ञानसे सम्पन्न, शुद्ध, तपके प्रभावसे पवित्र अन्तःकरणवाले, ऐश्वर्यसम्पन्न, सांख्य एवं योगके विद्वान् तथा अनेक शास्त्रोंके पारदर्शी मुनिवर व्यासजीने दिव्य दृष्टिसे देखकर महात्मा पाण्डवों तथा अन्य प्रचुर धनसम्पन्न महातेजस्वी राजाओंकी कीर्तिका प्रसार करनेके लिये इस इतिहासकी रचना की है
ఓ బ్రాహ్మణా! సత్యవాది ముని వ్యాసుడు నిర్మించిన ఈ పుణ్యమయ ఇతిహాసం పరమ పవిత్రమూ, అత్యుత్తమమూ. సర్వజ్ఞుడు, విధివిధానజ్ఞుడు, ధర్మజ్ఞుడు, సద్గుణసంపన్నుడు—ఇంద్రియాతీత జ్ఞానంతో యుక్తుడు, శుచియైనవాడు, తపస్సు బలంతో శుద్ధమైన అంతఃకరణం కలవాడు—అటువంటి మునివరుడు వ్యాసుడు దివ్యదృష్టితో అన్నిటిని దర్శించి, మహాత్మ పాండవులూ ఇతర ధనసంపన్న, తేజోవంత రాజుల కీర్తి వ్యాప్తి చెందుటకై ఈ ఇతిహాసాన్ని రచించాడు.
Verse 38
ऐश्व॒र्ये वर्तता चैव सांख्ययोगवता तथा । नैकतन्त्रविबुद्धेन दृष्टवा दिव्येन चक्षुषा,सर्वज्ञ, विधिविधानके ज्ञाता, धर्मज्ञ, साधु, इन्द्रियातीत ज्ञानसे सम्पन्न, शुद्ध, तपके प्रभावसे पवित्र अन्तःकरणवाले, ऐश्वर्यसम्पन्न, सांख्य एवं योगके विद्वान् तथा अनेक शास्त्रोंके पारदर्शी मुनिवर व्यासजीने दिव्य दृष्टिसे देखकर महात्मा पाण्डवों तथा अन्य प्रचुर धनसम्पन्न महातेजस्वी राजाओंकी कीर्तिका प्रसार करनेके लिये इस इतिहासकी रचना की है
ఐశ్వర్యసంపన్నుడై, సాంఖ్యయోగాలలో స్థితుడై, అనేక తంత్రశాస్త్రాలలో ప్రబుద్ధుడై ఉన్న వ్యాసుడు దివ్యచక్షువుతో అన్నిటిని దర్శించి (ఈ ఇతిహాసాన్ని రచించాడు).
Verse 39
कीर्ति प्रथणता लोके पाण्डवानां महात्मनाम् | अन््येषां क्षत्रियाणां च भूरिद्रविणतेजसाम्,सर्वज्ञ, विधिविधानके ज्ञाता, धर्मज्ञ, साधु, इन्द्रियातीत ज्ञानसे सम्पन्न, शुद्ध, तपके प्रभावसे पवित्र अन्तःकरणवाले, ऐश्वर्यसम्पन्न, सांख्य एवं योगके विद्वान् तथा अनेक शास्त्रोंके पारदर्शी मुनिवर व्यासजीने दिव्य दृष्टिसे देखकर महात्मा पाण्डवों तथा अन्य प्रचुर धनसम्पन्न महातेजस्वी राजाओंकी कीर्तिका प्रसार करनेके लिये इस इतिहासकी रचना की है
మహాత్మ పాండవుల—మరియు ఇతర ధనసంపన్న, తేజోవంత క్షత్రియ రాజుల—కీర్తి లోకమంతటా వ్యాపించుటకై (ఈ ఇతిహాసం రచించబడింది).
Verse 40
यश्नेदं श्रावयेद् विद्वान् सदा पर्वणि पर्वणि । धूतपाप्मा जितस्वर्गो ब्रह्म भूयाय कल्पते,जो दिद्वान् प्रत्येक पर्वपर सदा इसे दूसरोंको सुनाता है उसके सारे पाप धुल जाते हैं। उसका स्वर्गपर अधिकार हो जाता है, तथा वह ब्रह्मभावकी प्राप्तिके योग्य बन जाता है
ప్రతి పర్వంలో పర్వంలో ఎల్లప్పుడూ ఈ గ్రంథాన్ని పండితుడు ఇతరులకు శ్రవణం చేయిస్తే, అతని పాపములు కడుగబడతాయి; స్వర్గంపై అతనికి హక్కు స్థిరమవుతుంది, బ్రహ్మభావప్రాప్తికి అతడు యోగ్యుడగును।
Verse 41
कार्ष्ण॑ वेदमिमं सर्व शृणुयाद् यः समाहित: । ब्रह्महत्यादिपापानां कोटिस्तस्य विनश्यति,जो एकाग्रचित होकर इस सम्पूर्ण “कार्ष्ण वेदैं” का श्रवण करता है उसके ब्रह्महत्या आदि करोड़ों पापोंका नाश हो जाता है
ఏకాగ్రచిత్తుడై ఈ సమస్త ‘కార్ష్ణ-వేదం’ను శ్రవణం చేసే వాని బ్రహ్మహత్యాది కోట్ల పాపములు నశించును।
Verse 42
यश्चेदं श्रावयेत् श्राद्धे ब्राह्मणान् पादमन्तत: । अक्षय्यमन्नपानं वै पितृंस्तस्योपतिष्ठते,जो श्राद्धकर्ममें ब्राह्यणोंको निकटसे महाभारतका थोड़ा-सा अंश भी सुना देता है, उसका दिया हुआ अन्नपान अक्षय होकर पितरोंको प्राप्त होता है
శ్రాద్ధకర్మలో బ్రాహ్మణులకు దీనిలోని ఒక పాదం—అల్ప భాగమైనా—శ్రవణం చేయిస్తే, అతడు అర్పించిన అన్నపానము అక్షయ పుణ్యమై నిశ్చయంగా పితృదేవతలకు చేరును।
Verse 43
अब्वा यदेन: कुरुते इन्द्रियैर्मनसापि वा । महाभारतमाख्याय पश्चात् संध्यां प्रमुच्यते,मनुष्य अपनी इन्द्रियों तथा मनसे दिनभरमें जो पाप करता है वह सायंकालकी संध्याके समय महाभारतका पाठ करनेसे छूट जाता है
మనిషి పగలంతా ఇంద్రియములచేత గాని మనసుచేత గాని చేసిన పాపమేదైనా, సాయంకాల సంధ్యాసమయంలో మహాభారతాన్ని పఠించిన తరువాత దానినుండి విముక్తుడగును।
Verse 44
यद् रात्रौ कुरुते पापं ब्राह्मण: स्त्रीगणैर्व॒त: । महाभारतमाख्याय पूर्वा संध्यां प्रमुच्यते,ब्राह्मण रात्रिके समय स्त्रियोंक समुदायसे घिरकर जो पाप करता है वह प्रातःकालकी संध्याके समय महाभारतका पाठ करनेसे छूट जाता है
బ్రాహ్మణుడు రాత్రివేళ స్త్రీల సమూహముచే చుట్టుముట్టబడి చేసిన పాపమేదైనా, ప్రాతఃకాలపు పూర్వసంధ్యాసమయంలో మహాభారతాన్ని పఠిస్తే దానినుండి విముక్తుడగును।
Verse 45
भरतानां महज्जन्म तस्माद् भारतमुच्यते । महत्त्वाद् भारवत्त्वाच्च महाभारतमुच्यते । निरुक्तमस्य यो वेद सर्वपापै: प्रमुच्यते,इस ग्रन्थमें भरतवंशियोंके महान् जन्मकर्मका वर्णन है, इसलिये इसे महाभारत कहते हैं। महान् और भारी होनेके कारण भी इसका नाम महाभारत हुआ है। जो महाभारतकी इस व्युत्पत्तिको जानता और समझता है वह समस्त पापोंसे मुक्ता हो जाता है
వైశంపాయనుడు పలికెను—భరతవంశీయుల మహత్తర జన్మకర్మలను వర్ణించుటవలన దీనిని ‘భారతం’ అంటారు. మహత్తులో విస్తారమై, భావభారంలో గంభీరమై ఉండుటవలన దీనిని ‘మహాభారతం’ అని కూడా పిలుస్తారు. ఈ గ్రంథపు ఈ వ్యుత్పత్తి-అర్థాన్ని యథార్థంగా తెలిసినవాడు సమస్త పాపముల నుండి విముక్తుడగును.
Verse 46
अष्टादशपुराणानि धर्मशास्त्राणि सर्वश: । वेदा: साड्रास्तथैकत्र भारतं चैकत: स्थितम्,अठारह पुराणोंके निर्माता और वेदविद्याके महासागर महात्मा व्यास मुनिका यह सिंहनाद सुनो। वे कहते हैं--“अठारह पुराण, सम्पूर्ण धर्मशास्त्र और छहों अंगोंसहित चारों वेद एक ओर तथा केवल महाभारत दूसरी ओर, यह अकेला ही उन सबके बराबर है!
వైశంపాయనుడు పలికెను—ఒక వైపు అష్టాదశ పురాణములు, సమస్త ధర్మశాస్త్రములు, ఆరు అంగములతో కూడిన నాలుగు వేదములు; మరొక వైపు ఒంటరిగా మహాభారతము. ఈ విధంగా నిలిపి చూడగా, మహాభారతము ఒక్కటే వాటన్నిటికీ సమానమగును.
Verse 47
श्रूयतां सिंहनादो5यमृषेस्तस्य महात्मन: । अष्टादशपुराणानां कर्तुर्वेदमहोदधे:,अठारह पुराणोंके निर्माता और वेदविद्याके महासागर महात्मा व्यास मुनिका यह सिंहनाद सुनो। वे कहते हैं--“अठारह पुराण, सम्पूर्ण धर्मशास्त्र और छहों अंगोंसहित चारों वेद एक ओर तथा केवल महाभारत दूसरी ओर, यह अकेला ही उन सबके बराबर है!
వైశంపాయనుడు పలికెను—అష్టాదశ పురాణముల కర్తయు, వేదవిద్యా-మహాసముద్రమైన ఆ మహాత్మ ఋషి యొక్క ఈ సింహనాదాన్ని వినుడి.
Verse 48
त्रिभिवर्षरिदं पूर्ण कृष्णद्वैपायन: प्रभु: । अखिल भारतं॑ चेदं चकार भगवान् मुनि:,मुनिवर भगवान् श्रीकृष्णद्वैपायनने तीन वर्षोमें इस सम्पूर्ण महाभारतको पूर्ण किया था
వైశంపాయనుడు పలికెను—ప్రభువైన భగవాన్ ముని కృష్ణద్వైపాయనుడు (వ్యాసుడు) మూడు సంవత్సరములలో ఈ సమస్త భారతాన్ని సంపూర్ణం చేసెను.
Verse 49
आकर्णयय भक््त्या सततं जयाख्यं भारतं महत् । श्रीक्ष कीर्तिस्तथा विद्या भवन्ति सहिता: सदा,जो जय नामक इस महाभारत इतिहासको सदा भक्तिपूर्वक सुनता रहता है उसके यहाँ श्री, कीर्ति और विद्या तीनों साथ-साथ रहती हैं
వైశంపాయనుడు పలికెను—‘జయ’ అని ప్రసిద్ధమైన ఈ మహద్భారతాన్ని ఎవడు భక్తితో నిరంతరం శ్రవణం చేస్తాడో, అతని వద్ద శ్రీ, కీర్తి, విద్య—ఈ మూడూ సదా కలిసి నిలిచియుంటాయి.
Verse 50
धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च भरतर्षभ । यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न कुत्रचित्,भरतश्रेष्ठ! धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके विषयमें जो कुछ महाभारतमें कहा गया है, वही अन्यत्र है। जो इसमें नहीं है, वह कहीं नहीं है
వైశంపాయనుడు పలికెను—ఓ భరతశ్రేష్ఠా! ధర్మం, అర్థం, కామం, మోక్షం విషయములలో ఇక్కడ (మహాభారతంలో) ఉన్నదే ఇతరత్రా కూడా ఉంది; ఇక్కడ లేనిది ఎక్కడా లేదు.
Verse 51
जयो नामेतिहासो<यं श्रोतव्यो मोक्षमिच्छता । ब्राह्मणेन च राज्ञा च गर्भिण्या चैव योषिता,मोक्षकी इच्छा रखनेवाले ब्राह्मणको, राज्य चाहनेवाले क्षत्रियको तथा उत्तम पुत्र॒की इच्छा रखनेवाली गर्भिणी स्त्रीकों भी इस जय नामक इतिहासका श्रवण करना चाहिये
వైశంపాయనుడు పలికెను—‘జయ’ అనే ఈ ఇతిహాసాన్ని మోక్షాన్ని కోరువాడు తప్పక వినవలెను. బ్రాహ్మణుడూ, రాజూ, అలాగే ఉత్తమ పుత్రాన్ని కోరే గర్భిణీ స్త్రీయూ దీనిని శ్రవణం చేయవలెను.
Verse 52
स्वर्गकामो लभेत् स्वर्ग जयकामो लभेज्जयम् | गर्भिणी लभते पुत्र कन््यां वा बहुभागिनीम्,महाभारतका श्रवण या पाठ करनेवाला मनुष्य यदि स्वर्गकी इच्छा करे तो उसे स्वर्ग मिलता है और युद्धमें विजय पाना चाहे तो विजय मिलती है। इसी प्रकार गर्भिणी स्त्रीको महाभारतके श्रवणसे सुयोग्य पुत्र या परम सौभाग्यशालिनी कन्याकी प्राप्ति होती है
వైశంపాయనుడు పలికెను—స్వర్గాన్ని కోరువాడు స్వర్గాన్ని పొందును; విజయాన్ని కోరువాడు విజయాన్ని పొందును. అలాగే గర్భిణీ స్త్రీ మహాభారత శ్రవణం (లేదా పఠనం) వలన యోగ్యమైన కుమారుని—లేదా మహాసౌభాగ్యవతియైన కుమార్తెను—పొందును.
Verse 53
अनागतश्र मोक्षश्न कृष्णद्वैपायन: प्रभु: । संदर्भ भारतस्यास्य कृतवान् धर्मकाम्यया
వైశంపాయనుడు పలికెను—రాబోయే క్లేశాల నుండి మోక్షమార్గాన్ని తెలిసిన ప్రభువు కృష్ణద్వైపాయనుడు (వ్యాసుడు) ధర్మాభిలాషతో ఈ భారతగ్రంథాన్ని సంకలనం చేసి క్రమబద్ధం చేశాడు.
Verse 54
नित्यसिद्ध मोक्षस्वरूप भगवान् कृष्णद्वैपायनने धर्मकी कामनासे इस महाभारतसंदर्भकी रचना की है ।। षष्टिं शतसहस््राणि चकारान्यां स संहिताम् । त्रिंशच्छतसहस््राणि देवलोके प्रतिष्ठितम्,उन्होंने पहले साठ लाख श्लोकोंकी महाभारत-संहिता बनायी थी। उसमें तीस लाख श्लोकोंकी संहिताका देवलोकमें प्रचार हुआ। पंद्रह लाखकी दूसरी संहिता पितृलोकमें प्रचलित हुई। चौदह लाख श्लोकोंकी तीसरी संहिताका यक्षलोकमें आदर हुआ तथा एक लाख श्लोकोंकी चौथी संहिता मनुष्योंमें प्रचारित हुई
వైశంపాయనుడు పలికెను—నిత్యసిద్ధ మోక్షస్వరూపుడైన భగవాన్ కృష్ణద్వైపాయనుడు ధర్మాభిలాషతో ఈ మహాభారత-సందర్భాన్ని రచించాడు. అతడు మొదట అరవై లక్షల శ్లోకాలతో ఒక సంహితను నిర్మించాడు; అందులో ముప్పై లక్షల శ్లోకాల సంహిత దేవలోకంలో ప్రతిష్ఠితమైంది.
Verse 55
पित्रये पज्चदशं ज्ञेयं यक्षलोके चतुर्दश । एकं शतसहसंर तु मानुषेषु प्रभाषितम्,उन्होंने पहले साठ लाख श्लोकोंकी महाभारत-संहिता बनायी थी। उसमें तीस लाख श्लोकोंकी संहिताका देवलोकमें प्रचार हुआ। पंद्रह लाखकी दूसरी संहिता पितृलोकमें प्रचलित हुई। चौदह लाख श्लोकोंकी तीसरी संहिताका यक्षलोकमें आदर हुआ तथा एक लाख श्लोकोंकी चौथी संहिता मनुष्योंमें प्रचारित हुई
వైశంపాయనుడు పలికెను— పితృలోకంలో ఇది పదిహేను లక్షల శ్లోకాలుగా ప్రసిద్ధం; యక్షలోకంలో పద్నాలుగు లక్షలు; మనుష్యలోకంలో మాత్రం ఇది లక్ష శ్లోకాలుగా పఠింపబడుతుంది.
Verse 56
नारदो5श्रावयद् देवानसितो देवल: पितृन् | रक्षोयक्षात् शुको मर्त्यान् वैशम्पायन एव तु,देवताओंको देवर्षि नारदने, पितरोंको असित देवलने, यक्ष और राक्षसोंको शुकदेवजीने और मनुष्योंको वैशम्पायनजीने ही पहले-पहल महाभारत-संहिता सुनायी है
వైశంపాయనుడు పలికెను— దేవులకు నారదుడు వినిపించెను, పితృలకు అసిత దేవలుడు; యక్ష-రాక్షసులకు శుకుడు; మనుష్యులకు అయితే ఈ మహాభారత-సంహితను మొదటగా వైశంపాయనుడే వినిపించెను.
Verse 57
इतिहासमिमं पुण्यं महार्थ वेदसम्मितम् । व्यासोक्तं श्रूयते येन कृत्वा ब्राह्मणमग्रत:,शौनकजी! जो मनुष्य ब्राह्मणोंको आगे करके गम्भीर अर्थसे परिपूर्ण और वेदकी समानता करनेवाले इस व्यासप्रणीत पवित्र इतिहासका श्रवण करता है वह इस जगतमें सारे मनोवाड्छित भोगों और उत्तम कीर्तिको पाकर परम सिद्धि प्राप्त कर लेता है। इस विषयमें मुझे तनिक भी संशय नहीं है
వైశంపాయనుడు పలికెను— బ్రాహ్మణులను అగ్రస్థానంలో నిలిపి, వ్యాసుడు ఉక్తించిన ఈ పుణ్య ఇతిహాసాన్ని—మహార్థసంపన్నమై వేదసమానమైనదాన్ని—ఎవడు శ్రవణం చేస్తాడో, వాడు మహత్తర ఫలాన్ని పొందును.
Verse 58
स नर: सर्वकामांश्व कीर्ति प्राप्पेह शौनक । गच्छेत् परमिकां सिद्धिमत्र मे नास्ति संशय:,शौनकजी! जो मनुष्य ब्राह्मणोंको आगे करके गम्भीर अर्थसे परिपूर्ण और वेदकी समानता करनेवाले इस व्यासप्रणीत पवित्र इतिहासका श्रवण करता है वह इस जगतमें सारे मनोवाड्छित भोगों और उत्तम कीर्तिको पाकर परम सिद्धि प्राप्त कर लेता है। इस विषयमें मुझे तनिक भी संशय नहीं है
వైశంపాయనుడు పలికెను— ఓ శౌనకా! అతడు ఈ లోకంలో సమస్త కామ్యఫలములను, ఉత్తమ కీర్తిని పొందును; అనంతరం పరమసిద్ధిని చేరును—ఇందులో నాకు లేశమాత్రమూ సందేహం లేదు.
Verse 59
भारताध्ययनात् पुण्यादपि पादमधीयत: । श्रद्धया परया भक्त्या श्राव्यते चापि येन तु,जो अत्यन्त श्रद्धा और भक्तिके साथ महाभारतके एक अंशको भी सुनता या दूसरोंको सुनाता है उसे सम्पूर्ण महाभारतके अध्ययनका पुण्य प्राप्त होता है और उसीके प्रभावसे उसे उत्तम सिद्धि मिल जाती है
వైశంపాయనుడు పలికెను— పరమ శ్రద్ధాభక్తులతో మహాభారతంలోని ఒక పాదమాత్రమైనా ఎవడు వినునో లేదా ఇతరులకు వినిపించునో, అతనికి సమస్త భారతాధ్యయనపు పుణ్యఫలం లభించును.
Verse 60
य इमां संहितां पुण्यां पुत्रमध्यापयच्छुकम् । मातापितृसहस्राणि पुत्रदारशतानि च । संसारेष्वनुभूतानि यान्ति यास्यन्ति चापरे,जिन भगवान् वेदव्यासने इस पवित्र संहिताको प्रकट करके अपने पुत्र शुकदेवजीको पढ़ाया था (वे महाभारतके सारभूत उपदेशका इस प्रकार वर्णन करते हैं--) “मनुष्य इस जगतमें हजारों माता-पिताओं तथा सैकड़ों स्त्री-पुत्रोंके संयोग-वियोगका अनुभव कर चुके हैं, करते हैं और करते रहेंगे
వైశంపాయనుడు పలికెను—ఈ పుణ్యసంహితను ప్రకటించి తన కుమారుడు శుకునికి బోధించినవాడు మహాభారతసారోపదేశాన్ని ఇలా చెప్పెను—సంసారంలో మనుష్యులు వేలాది తల్లిదండ్రులు, వందలాది కుమారులు మరియు భార్యలతో కలయిక-వియోగాలను అనుభవించారు, అనుభవిస్తున్నారు, ఇకముందు కూడా అనుభవిస్తారు; ఈ బంధాలు పునఃపునః ఏర్పడి విడిపోతుంటాయి।
Verse 61
हर्षस्थानसहस्राणि भयस्थानशतानि च । दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम्,अज्ञानी पुरुषको प्रतिदिन हर्षके हजारों और भयके सैकड़ों अवसर प्राप्त होते रहते हैं; किंतु विद्वान पुरुषके मनपर उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता है
వైశంపాయనుడు పలికెను—రోజు రోజుకూ మూర్ఖుణ్ని ఆనందానికి వేల కారణాలు, భయానికి వంద కారణాలు ఆక్రమిస్తాయి; కాని అవి పండితుణ్ని జయించలేవు।
Verse 62
ऊर्ध्वबाहुर्विरौम्येष न च कश्चित् शूणोति मे । धर्मादर्थक्ष॒ कामश्ष॒ स किमर्थ न सेव्यते,“मैं दोनों हाथ ऊपर उठाकर पुकार-पुकारकर कह रहा हूँ, पर मेरी बात कोई नहीं सुनता। धर्मसे मोक्ष तो सिद्ध होता ही है; अर्थ और काम भी सिद्ध होते हैं, तो भी लोग उसका सेवन क्यों नहीं करते
వైశంపాయనుడు పలికెను—నేను రెండు చేతులు పైకెత్తి మళ్లీ మళ్లీ కేక వేస్తున్నాను; అయినా నా మాట ఎవ్వరూ వినరు. ధర్మం వల్ల మోక్షమే కాదు, అర్థమూ కామమూ కూడా సిద్ధిస్తాయి; మరి ప్రజలు దానిని ఎందుకు ఆచరించరు?
Verse 63
न जातु कामाजन्न भयान्न लोभाद् धर्म त्यजेज्जीवितस्यापि हेतो: । नित्यो धर्म: सुखदुः:खे त्वनित्ये जीवो नित्यो हेतुरस्य त्वनित्य:,“कामनासे, भयसे, लोभसे अथवा प्राण बचानेके लिये भी धर्मका त्याग न करे। धर्म नित्य है और सुख-दुःख अनित्य। इसी प्रकार जीवात्मा नित्य है और उसके बन्धनका हेतु अनित्य'
వైశంపాయనుడు పలికెను—కోరిక వల్లగానీ, భయం వల్లగానీ, లోభం వల్లగానీ, ప్రాణరక్షణ కోసమైనా ధర్మాన్ని ఎప్పుడూ విడువకూడదు. ధర్మం నిత్యం; సుఖదుఃఖాలు అనిత్యం. అలాగే జీవాత్మ నిత్యం; దాని బంధనహేతువు అనిత్యం.
Verse 64
इमां भारतसावित्रीं प्रातरुत्थाय यः पठेत् । स भारतफल प्राप्य परं ब्रह्माधिगच्छति,यह महाभारतका सारभूत उपदेश 'भारत-सावित्री” के नामसे प्रसिद्ध है। जो प्रतिदिन सबेरे उठकर इसका पाठ करता है वह सम्पूर्ण महाभारतके अध्ययनका फल पाकर परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है
వైశంపాయనుడు పలికెను—ప్రాతఃకాలంలో లేచి ఈ ‘భారత-సావిత్రి’ని పఠించేవాడు, సమస్త మహాభారతాధ్యయనఫలాన్ని పొందించి పరబ్రహ్మను చేరుకొనును।
Verse 65
यथा समुद्रो भगवान् यथा हि हिमवान् गिरि: । ख्यातावुभौ रत्ननिधी तथा भारतमुच्यते,जैसे ऐश्वर्यशशाली समुद्र और हिमालय पर्वत दोनों ही रत्नोंकी निधि कहे गये हैं, उसी प्रकार महाभारत भी नाना प्रकारके उपदेशमय रत्नोंका भण्डार कहलाता है
వైశంపాయనుడు పలికెను—యెట్లనగా మహిమగల సముద్రము మరియు హిమవాన్ పర్వతము—ఇవిరువురును రత్ననిధులని ప్రసిద్ధులు; అట్లే మహాభారతమును కూడా నానావిధ ఉపదేశరూప రత్నముల భాండాగారమని చెప్పుదురు.
Verse 66
कार्ष्ण वेदमिमं विद्वान् श्रावयित्वार्थम क्षुते । इदं भारतमाख्यानं यः पठेत् सुसमाहितः । स गच्छेत् परमां सिद्धिमिति मे नास्ति संशय:,जो दिद्वान् श्रीकृष्णद्वैपायनके द्वारा प्रसिद्ध किये गये इस महाभारतरूप पठ्चम वेदको सुनाता है उसे अर्थकी प्राप्ति होती है। जो एकाग्रचित्त होकर इस भारत-उपाख्यानका पाठ करता है वह मोक्षरूप परम सिद्धिको प्राप्त कर लेता है। इस विषयमें मुझे संशय नहीं है
వైశంపాయనుడు పలికెను—ఈ కార్ష్ణవేదమును (మహాభారతరూప పంచమవేదమును) పండితుడు శ్రావ్యముగా చేయించితే, దాని యథార్థ ఫలమును పొందును. మరియు ఏవడు సుసమాహితచిత్తుడై ఈ భారతాఖ్యానమును పఠించునో, వాడు పరమసిద్ధి—మోక్షమును—ప్రాప్తించును; ఇందులో నాకు సందేహము లేదు.
Verse 67
द्वैपायनोष्ठपुटनि:सृतमप्रमेयं पुण्यं पवित्रमथ पापहरं शिवं च । यो भारतं समधिगच्छति वाच्यमानं कि तस्य पुष्करजलैरभिषेचनेन,जो वेदव्यासजीके मुखसे निकले हुए इस अप्रमेय (अतुलनीय), पुण्यदायक, पवित्र, पापहारी और कल्याणमय महाभारतको दूसरोंके मुखसे सुनता है उसे पुष्करतीर्थके जलमें गोता लगानेकी क्या आवश्यकता है
వైశంపాయనుడు పలికెను—ద్వైపాయనుడు (వ్యాసుడు) నోటి నుండి వెలువడిన ఈ మహాభారతము అప్రమేయము, పుణ్యప్రదము, పవిత్రము, పాపహరము, శివప్రదము. ఎవడు దీనిని పఠింపబడుచుండగా యథార్థముగా గ్రహించునో, వానికి పుష్కరజలములతో స్నానాభిషేకమునకు ఏమి అవసరము?
Verse 68
यो गोशतं कनकश्ड्रमयं ददाति विप्राय वेदविदुषे सुबहुश्रुताय । पुण्यां च भारतकथां सततं शृणोति तुल्यं फलं भवति तस्य च तस्य चैव,सौ गौओंके सींगमें सोना मढ़ाकर वेदवेत्ता एवं बहुज्ञ ब्राह्मणको जो गौएँ दान देता है और जो महाभारतकथाका प्रतिदिन श्रवणमात्र करता है, इन दोनोंमेंसे प्रत्येकको बराबर ही फल मिलता है
వైశంపాయనుడు పలికెను—వేదవిదుడు, బహుశ్రుతుడైన బ్రాహ్మణునికి బంగారు కొమ్ములతో కూడిన వంద గోవులను దానమిచ్చువాడు, మరియు పుణ్యప్రదమైన భారతకథను నిరంతరం శ్రవణమాత్రముచేయువాడు—ఇద్దరికీ సమాన ఫలము కలుగును.
Verse 173
विश्वेषां देवतानां ते विविशुर्नरसत्तमा: । राजा पाण्डु अपनी दोनों पत्नियोंके साथ महेन्द्रके भवनमें चले गये। राजा विराट, द्रपद, धृष्टकेतु, निशठ, अक्रूर, साम्ब, भानु, कम्प, विदूरथ, भूरिश्रवा, शल, पृथ्वीपति भूरि, कंस, उग्रसेन वसुदेव और अपने भाई शंखके साथ नरश्रेष्ठ उत्तर-ये सभी सत्पुरुष विश्वेदेवोंके स्वरूपमें मिल गये
వైశంపాయనుడు పలికెను—ఆ నరశ్రేష్ఠులు విశ్వేదేవతల సమూహములో ప్రవేశించిరి. రాజు పాండువు తన రెండు భార్యలతో కలిసి మహేంద్రుడు (ఇంద్రుడు) నివసించు భవనమునకు వెళ్లెను. రాజు విరాటుడు, ద్రుపదుడు, ధృష్టకేతువు, నిషఠుడు, అక్రూరుడు, సామ్బుడు, భానువు, కంపుడు, విదూరథుడు, భూరిశ్రవుడు, శలుడు, రాజు భూరి, కంసుడు, ఉగ్రసేనుడు, వసుదేవుడు, మరియు తన సోదరుడు శంఖతో కూడిన నరశ్రేష్ఠుడు ఉత్తరుడు—ఈ సత్పురుషులందరూ విశ్వేదేవతల స్వరూపస్థితిని పొందిరి.
Verse 206
द्वापरं शकुनि: प्राप धृष्टद्युम्नस्तु पावकम् । पुरुषप्रवर कर्ण जो अर्जुनके द्वारा मारे गये थे, सूर्यमें प्रविष्ट हुए। शकुनिने द्वापरमें और धृष्टद्युम्नने अग्निके स्वरूपमें प्रवेश किया
వైశంపాయనుడు పలికెను—శకుని ద్వాపర తత్త్వాన్ని పొందెను; ధృష్టద్యుమ్నుడు అగ్నిలో ప్రవేశించెను. అర్జునుని చేత హతుడైన పురుషప్రవరుడు కర్ణుడు సూర్యునిలో లీనమయ్యెను. ఈ విధంగా శకుని ద్వాపరంలో, ధృష్టద్యుమ్నుడు అగ్నిస్వరూపంలో సమావేశమయ్యెను.
Verse 2136
ऋद्धिमन्तो महात्मान: शस्त्रपूता दिव॑ गता: । धृतराष्ट्रके सभी पुत्र स्वर्गभोगके पश्चात् मूलतः बलोन्मत्त यातुधान (राक्षस) थे। वे समृद्धिशाली महामनस्वी क्षत्रिय होकर युद्धमें शस्त्रोंके आघातसे पवित्र हो स्वर्गलोकमें गये थे
వైశంపాయనుడు పలికెను—ఐశ్వర్యసంపన్నులైన మహాత్ములు శస్త్రాఘాతాలతో పవిత్రులై స్వర్గానికి వెళ్లిరి. ధృతరాష్ట్రుని కుమారులందరూ స్వర్గభోగానంతరం తమ మూల స్వభావంలో బలోన్మత్త యాతుధానులు (రాక్షసప్రకృతి) యే. అయినా వారు సమృద్ధులైన, మహామనస్క క్షత్రియులుగా యుద్ధంలో శస్త్రాఘాతాలతో శుద్ధులై స్వర్గలోకాన్ని పొందిరి.
He asks whether the warriors’ heavenly attainments are permanent or time-bound and what final destiny (gati) they reach at the completion of their karma, seeking a principled account rather than mere praise.
The text presents destiny as karma-governed and intelligible: all beings reach an outcome at the end of action, and individuals are described as returning to or merging with their appropriate cosmic principles or divine domains.
Yes. It asserts the Mahābhārata’s sanctity and efficacy—recitation, study, and teaching are described as purifying and merit-producing—thereby framing the epic as both ethical instruction and ritual-knowledge transmission.