Adhyaya 68
Sabha ParvaAdhyaya 6891 Verses

Adhyaya 68

Sabhā Parva, Adhyāya 68 — Pāṇḍavānāṃ Vanavāsa-prasthānaḥ; Duḥśāsana-nindā; Pāṇḍava-pratijñāḥ

Upa-parva: Dyūta–Anuvyāhāra / Vanavāsa-prasthāna (Exile Departure Sequence)

Vaiśaṃpāyana reports that the defeated Pāṇḍavas resolve upon forest exile and don deer-skins in sequence, marking their juridical displacement from kingship. Observing them depart, Duḥśāsana delivers a sustained taunt: he frames the Kaurava ascendancy as providential, ridicules the Pāṇḍavas’ former confidence, and uses demeaning comparisons to deny their worth. He also attempts to destabilize Draupadī’s marital allegiance by suggesting she choose among the Kauravas, thereby extending humiliation from political loss to social identity. Bhīma, provoked yet deliberate, rebukes Duḥśāsana’s boast as ill-gained and issues explicit vows of future retribution consistent with kṣatra-dharma. Duryodhana mockingly imitates Bhīma’s gait, intensifying the public affront. As the Pāṇḍavas exit the assembly, they formalize a set of distributed commitments: Bhīma vows to kill Duryodhana and drink Duḥśāsana’s blood; Arjuna vows to slay Karṇa and allied challengers; Sahadeva vows to kill Śakuni; Nakula vows broader punitive outcomes against the Dhṛtarāṣṭras under Dharmarāja’s direction. The chapter functions as a narrative “contract layer,” converting humiliation into witnessed vows that structure later causality.

Chapter Arc: सभामण्डप में जुए की कुटिल विजय के बाद पाण्डवों के राज्य, धन, अस्त्र-शस्त्र और मान—सब ‘कैतव’ से हरण हो चुके हैं; भीमसेन का क्रोध धधक उठता है और वह प्रतिज्ञा-सी भाषा बोलने लगता है। → भीम द्रौपदी के अपमान का भार युधिष्ठिर पर रखकर उग्र वचन कहता है—क्रोध को वहीं गिराने की घोषणा करता है; सभा में भीष्म, धृतराष्ट्र और विदुर जैसे वृद्ध-श्रेष्ठ उपस्थित होकर भी निर्णायक रोक नहीं लगा पाते। विदुर नीति-वचन और साक्ष्य/सत्य की मर्यादा का स्मरण कराते हैं, पर दुर्योधन-पक्ष की हठधर्मिता बढ़ती जाती है। → कर्ण और दुःशासन का आदेश/उकसावा चरम पर पहुँचता है—‘कृष्णा को दासी कहकर गृह में ले जाओ’; और दुःशासन काँपती, लज्जित, पाण्डवों को पुकारती द्रौपदी को सभा के बीच घसीटता है। → अर्जुन भीम के उन्मत्त प्रतिशोध को तत्काल शान्त करने का प्रयत्न करता है ताकि पाण्डव आवेश में आकर उसी क्षण विनाशकारी कदम न उठा लें; विदुर का धर्मोपदेश सभा के सामने सत्य-धर्म की कसौटी रख देता है, यद्यपि दुष्टों का मन नहीं बदलता। → द्रौपदी का अपमान सार्वजनिक रूप से आरम्भ हो चुका है; पाण्डवों का संयम टूटे या धर्म की कोई अदृश्य रक्षा प्रकट हो—सभा उसी अनिश्चितता में आगे बढ़ती है।

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ५६ श्लोक हैं) ऑपन--माजल बक। अकाल अष्टषष्टितमो< ध्याय: भीमसेनका क्रोध एवं अर्जुनका उन्हें शान्त करना, विकर्णकी धर्मसंगत बातका कर्णके द्वारा विरोध, द्रौपदीका चीरहरण एवं भगवान॒द्वारा उसकी लज्जारक्षा तथा विदुरके द्वारा प्रह्नादका उदाहरण देकर सभासदोंको विरोधके लिये प्रेरित करना भीम उवाच भवन्ति गेहे बन्धक्य: कितवानां युधिष्ठिर । न ताभिरुत दीव्यन्ति दया चैवास्ति तास्वपि,भीमसेन बोले--भैया युधिष्ठिर! जुआरियोंके घरमें प्रायः कुलटा स्त्रियाँ रहती हैं, किंतु वे भी उन्हें दाँवपर लगाकर जूआ नहीं खेलते। उन कुलटाओंके प्रति भी उनके हृदयमें दया रहती है

ភីមបាននិយាយថា៖ «យុធិષ્ઠិរ បងអើយ! នៅក្នុងផ្ទះរបស់អ្នកលេងស៊ីសង ជាញឹកញាប់មានស្ត្រីមានប្រព្រឹត្តិរលុង; ទោះជាយ៉ាងណា ពួកគេក៏មិនយកនាងទាំងនោះទៅដាក់ជាភ្នាល់ក្នុងល្បែងស៊ីសងឡើយ។ សូម្បីចំពោះស្ត្រីបែបនោះ ក៏នៅមានមេត្តាករុណាខ្លះនៅក្នុងចិត្ត។ ហេតុអ្វីបានជាបងអនុញ្ញាតឲ្យដ្រោបទី—ភរិយាស្របច្បាប់របស់បង—ត្រូវគេយកទៅធ្វើជាភ្នាល់?»

Verse 2

काश्यो यद्‌ धनमाहार्षीद्‌ द्रव्यं यच्चान्यदुत्तमम्‌ । तथान्ये पृथिवीपाला यानि रत्नान्युपाहरन्‌,काशिराजने जो धन उपहारमें दिया था एवं और भी जो उत्तम द्रव्य वे हमारे लिये लाये थे तथा अन्य राजाओंने भी जो रत्न हमें भेंट किये थे, उन सबको और हमारे वाहनों, वैभवों, कवचों, आयुधों, राज्य, आपके शरीर तथा हम सब भाइयोंको भी शत्रुओंने जूएके दाँवपर रखवाकर अपने अधिकारमें कर लिया

ភីមបាននិយាយថា៖ «ទ្រព្យសម្បត្តិដែលស្តេចកាសីនាំមកជាអំណោយ និងវត្ថុមានតម្លៃដ៏ល្អឥតខ្ចោះផ្សេងៗដែលគាត់បានប្រគល់ឲ្យ ព្រមទាំងគ្រឿងរតនៈដែលស្តេចដទៃៗនៃផែនដីបានថ្វាយជូន—ទាំងអស់នោះ រួមទាំងយានយន្ត សិរីល្អ អាវក្រោះ អាវុធ រាជ្យ រូបកាយរបស់បង និងយើងបងប្អូនទាំងអស់—សត្រូវបានបង្ខំឲ្យដាក់ជាភ្នាល់ក្នុងល្បែងស៊ីសង ហើយបានយកទៅស្ថិតក្រោមអំណាចរបស់ពួកគេ»។

Verse 3

वाहनानि धनं चैव कवचान्यायुधानि च । राज्यमात्मा वयं चैव कैतवेन हृतं परै:,काशिराजने जो धन उपहारमें दिया था एवं और भी जो उत्तम द्रव्य वे हमारे लिये लाये थे तथा अन्य राजाओंने भी जो रत्न हमें भेंट किये थे, उन सबको और हमारे वाहनों, वैभवों, कवचों, आयुधों, राज्य, आपके शरीर तथा हम सब भाइयोंको भी शत्रुओंने जूएके दाँवपर रखवाकर अपने अधिकारमें कर लिया

ភីមបាននិយាយថា៖ «យានយន្ត និងទ្រព្យសម្បត្តិរបស់យើង អាវក្រោះ និងអាវុធ—រាជ្យ រូបកាយរបស់បង និងយើងខ្លួនឯង—ទាំងអស់ត្រូវបានអ្នកដទៃយកទៅដោយល្បែងស៊ីសងដ៏បោកបញ្ឆោត»។

Verse 4

नच मे तत्र कोपो5भूत्‌ सर्वस्येशो हि नो भवान्‌ । इमं त्वतिक्रमं मन्ये द्रौपदी यत्र पण्यते,किंतु इसके लिये मेरे मनमें क्रोध नहीं हुआ; क्योंकि आप हमारे सर्वस्वके स्वामी हैं। पर द्रौपदीको जो दाँवपर लगाया गया, इसे मैं बहुत ही अनुचित मानता हूँ

«ទោះជាយ៉ាងនោះ ក៏មិនមានកំហឹងកើតឡើងក្នុងចិត្តខ្ញុំទេ ព្រោះបងជាម្ចាស់នៃអ្វីៗទាំងអស់ដែលជារបស់យើង។ ប៉ុន្តែការដែលដ្រោបទីត្រូវបានដាក់ជាភ្នាល់—ខ្ញុំចាត់ទុកថា ជាការរំលោភធ្ងន់ធ្ងរ»។

Verse 5

एषा हानर्हती बाला पाण्डवान्‌ प्राप्प कौरवै: । त्वत्कृते क्लिश्यते क्षुद्रैनशंसैरकृतात्मभि:,यह भोली-भाली अबला पाण्डवोंको पतिरूपमें पाकर इस प्रकार अपमानित होनेके योग्य नहीं थी, परंतु आपके कारण ये नीच, नृशंस और अजितेन्द्रिय कौरव इसे नाना प्रकारके कष्ट दे रहे हैं

«នាងនេះ ជាស្ត្រីវ័យក្មេងសុទ្ធសាធ មិនគួរត្រូវទទួលការប្រមាថបែបនេះឡើយ ដោយបានទទួលពួកបណ្ឌវជាស្វាមី។ ប៉ុន្តែដោយសារបង នាងត្រូវកោរវៈទាបថោក នृশंस និងមិនអាចគ្រប់គ្រងអារម្មណ៍របស់ខ្លួន បានធ្វើទុក្ខទោសនានា»។

Verse 6

अस्या: कृते मन्युरयं त्वयि राजन्‌ निपात्यते । बाहू ते सम्प्रधक्ष्यामि सहदेवाग्निमानय,राजन! द्रौपदीकी इस दुर्दशाके लिये मैं आपपर ही अपना क्रोध छोड़ता हूँ। आपकी दोनों बाहें जला डालूँगा। सहदेव! आग ले आओ

Bhima declares that, for Draupadi’s sake, he is directing his wrath squarely at the king. In a fierce vow born of outrage at injustice, he threatens to burn the king’s arms and commands Sahadeva to bring fire—an explosive moment that exposes the moral collapse of the court and the Pandavas’ simmering resolve to answer humiliation with retributive justice.

Verse 7

अजुन उवाच न पुरा भीमसेन त्वमीदृशीर्वदिता गिर: । परैस्ते नाशितं नून॑ नृशंसैर्धर्मगौरवम्‌,अर्जुन बोले--भैया भीमसेन! तुमने पहले कभी ऐसी बातें नहीं कही थीं। निश्चय ही क्रूरकर्मा शत्रुओंने तुम्हारी धर्मविषयक गौरवबुद्धिको नष्ट कर दिया है

Arjuna said: “Never before, Bhimasena, have you spoken words like these. Surely the ruthless enemies have now destroyed your reverence for dharma—your sense of moral honor.”

Verse 8

न सकामा: परे कार्या धर्ममेवाचरोत्तमम्‌ । भ्रातरं धार्मिकं ज्येष्ठं को$तिवर्तितुमरहति,भैया! शत्रुओंकी कामना सफल न करो; उत्तम धर्मका ही आचरण करो। भला, अपने धर्मात्मा ज्येष्ठ भ्राताका अपमान कौन कर सकता है?

Arjuna said: “Do not act out of desire, nor in a way that serves the designs of others. Practice dharma alone—the highest course. Who could rightly overstep or dishonor one’s own eldest brother, a man devoted to righteousness? Do not let the enemies’ wishes be fulfilled; hold fast to the noblest conduct.”

Verse 9

आहूतो हि परै राजाक्षात्र॑ व्रतमनुस्मरन्‌ । दीव्यते परकामेन तन्न: कीर्तिकरं महत्‌,महाराज युधिष्ठिरको शत्रुओंने द्यूतके लिये बुलाया है; अतः ये क्षत्रियव्रतको ध्यानमें रखकर दूसरोंकी इच्छासे जूआ खेलते हैं। यह हमारे महान्‌ यशका विस्तार करनेवाला है

Arjuna said: “When a king is challenged and summoned by others, remembering the warrior’s code, he plays at dice in compliance with the opponent’s wish. For us, O King Yudhiṣṭhira, this is held to be a great occasion for the increase of fame—yet it also binds us to a perilous custom where honor is measured by accepting a reckless invitation.”

Verse 10

भीमसेन उवाच एवमस्मिन्‌ कृतं विद्यां यदि नाहं धनंजय । दीप्ते5ग्नौ सहितौ बाहू निर्दहेयं बलादिव,भीमसेनने कहा--अर्जुन! यदि मैं इस विषयमें यह न जानता कि इनका यह कार्य क्षत्रियधर्मके अनुकूल ही है, तो बलपूर्वक प्रज्वलित अग्निमें इनकी दोनों बाँहोंको एक साथ ही जलाकर राख कर डालता

Bhima said: “O Dhananjaya (Arjuna), if I did not understand that what has been done in this matter accords with the accepted code of kshatriya conduct, then I would, by sheer force, burn both his arms together in a blazing fire.”

Verse 11

वैशम्पायन उवाच तथा तान्‌ दु:ःखितान्‌ दृष्टवा पाण्डवान्‌ धृतराष्ट्रज: । कृष्यमाणां च पाज्चालीं विकर्ण इदमब्रवीत्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! पाण्डवोंको दुःखी और पांचालराजकुमारी द्रौोपदीको घसीटी जाती हुई देख धृतराष्ट्रनन्दन विकर्णने यह कहा--

វៃសម្បាយនៈបានមានព្រះវាចា៖ ដោយឃើញបណ្ឌវទាំងឡាយកំពុងទុក្ខសោក ហើយបញ្ចាលី (ដ្រោបទី) ត្រូវគេអូសទាញទៅមុខ នោះវិកರ್ಣ កូនធ្រិតរាស្ត្រ បាននិយាយពាក្យនេះ។

Verse 12

याज्ञसेन्या यदुक्तं तद्‌ वाक्‍्यं विब्रूत पार्थिवा: । अविवेकेन वाक्यस्य नरक: सद्य एव न:,'भूमिपालो! द्रौपदीने जो प्रश्न उपस्थित किया है, उसका आपलोग उत्तर दें। यदि इसके प्रश्बषका ठीक-ठीक विवेचन नहीं किया गया, तो हमें शीघ्र ही नरक भोगना पड़ेगा

«ឱ ព្រះមហាក្សត្រទាំងឡាយ! សូមបកស្រាយឲ្យច្បាស់នូវពាក្យដែលយាជ្ញសេនី (ដ្រោបទី) បាននិយាយ។ ប្រសិនបើពាក្យរបស់នាងមិនត្រូវបានពិចារណាដោយវិចារណញ្ញាណ ហើយមិនបានឆ្លើយតបត្រឹមត្រូវទេ នោះយើងទាំងអស់នឹងធ្លាក់នរកភ្លាមៗ»។

Verse 13

भीष्मश्न धृतराष्ट्रश्न कुरुवृद्धतमावुभौ । समेत्य नाहतु: किंचिद्‌ विदुरश्च महामति:,“पितामह भीष्म और पिता धृतराष्ट्र--ये दोनों कुरुवंशके सबसे वृद्ध पुरुष हैं। ये तथा परम बुद्धिमान्‌ विदुरजी मिलकर कुछ उत्तर क्‍यों नहीं देते?”

វៃសម្បាយនៈបានមានព្រះវាចា៖ «ភីស្ម និងធ្រិតរាស្ត្រ—ជាពួកចាស់ជាងគេក្នុងវង្សកុរុ—រួមជាមួយវិទុរ អ្នកមានប្រាជ្ញាខ្ពស់ បានអង្គុយប្រជុំគ្នានៅទីនេះ; ហេតុអ្វីបានជាពួកគេមិនឆ្លើយអ្វីសោះ?»

Verse 14

भारद्वाजश्च सर्वेषामाचार्य: कृप एव च । कुत एतावपि प्रश्न॑ नाहतुर्द्धिजसत्तमौ

វៃសម្បាយនៈបានមានព្រះវាចា៖ «ដ្រូណ (បារទ្វាជ) ជាគ្រូអាចារ្យរបស់ពួកគេទាំងអស់ ហើយក្រឹបក៏ដូចគ្នា។ ហេតុអ្វីបានជាព្រះព្រាហ្មណ៍ដ៏ប្រសើរទាំងពីរនេះ ក៏មិនលើកសំណួរនេះឡើងដែរ?»

Verse 15

“हम सबके आचार्य भरद्वाजनन्दन द्रोणाचार्य और कृपाचार्य ये दोनों ब्राह्मणकुलके श्रेष्ठ पुरुष हैं। ये दोनों भी इस प्रश्नपर अपने विचार क्‍यों नहीं प्रकट करते? ।। ये त्वन्ये पृथिवीपाला: समेता: सर्वतो दिश: । कामक्रोधौ समुत्सृज्य ते ब्रुवन्तु यथामति,“जो दूसरे राजालोग चारों दिशाओंसे यहाँ पधारे हैं, वे सभी काम और क्रोधको त्यागकर अपनी बुद्धिके अनुसार इस प्रश्नका उत्तर दें

វៃសម្បាយនៈបានមានព្រះវាចា៖ «គ្រូអាចារ្យរបស់យើង—ដ្រូណ កូនបារទ្វាជ និងក្រឹប—ជាបុរសដ៏ប្រសើរនៃពូជព្រាហ្មណ៍។ ហេតុអ្វីបានជាពួកគេទាំងពីរនេះ ក៏មិនបង្ហាញការវិនិច្ឆ័យលើសំណួរនេះ? ចំណែកឯព្រះមហាក្សត្រផ្សេងៗ ដែលបានមកប្រជុំពីទិសទាំងបួន សូមបោះបង់កាម និងកំហឹង ហើយនិយាយតាមប្រាជ្ញារបស់ខ្លួនអំពីរឿងនេះ»។

Verse 16

यदिदं द्रौपदीवाक्यमुक्तवत्यसकृच्छुभा । विमृश्य कस्य कः पक्ष: पार्थिवा वदतोत्तरम्‌,राजाओ! कल्याणी द्रौपदीने बार-बार जिस प्रश्नको दुहराया है, उसपर विचार करके आपलोग उत्तर दें, जिससे मालूम हो जाय कि इस विषयमें किसका क्‍या पक्ष (विचार) है!

វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «សូមព្រះមហាក្សត្រទាំងឡាយពិចារណាឲ្យម៉ត់ចត់លើពាក្យដែលនាងទ្រោបទីដ៏ប្រសើរ បាននិយាយ ហើយបានលើកឡើងម្តងហើយម្តងទៀត។ បន្ទាប់មក សូមព្រះមហាក្សត្រទាំងឡាយឆ្លើយតប ដើម្បីឲ្យច្បាស់ថា ក្នុងរឿងនេះ ម្នាក់ៗមានជំហរយ៉ាងដូចម្តេច»។

Verse 17

एवं स बहुश: सर्वनुक्तवांस्तानू सभासद: । न च ते पृथिवीपालास्तमूचु: साध्वसाधु वा,इस प्रकार विकर्णने उन सब सभासदोंसे बार-बार अनुरोध किया; परंतु उन नरेशोंने उस विषयमें उससे भला-बुरा कुछ नहीं कहा

ដូច្នេះ វិកರ್ಣៈបានអំពាវនាវទៅកាន់សមាជិកសភារាជទាំងអស់ម្តងហើយម្តងទៀត; ប៉ុន្តែព្រះមហាក្សត្រទាំងនោះមិនបានឆ្លើយតបចំពោះរឿងនោះទេ—មិនទាំងយល់ព្រមថាត្រឹមត្រូវ ឬបដិសេធថាមិនត្រឹមត្រូវ។ ភាពស្ងៀមស្ងាត់របស់ពួកគេមុខមាត់នៃការអំពាវនាវខាងធម៌ បង្ហាញពីការខ្វះក្លាហានខាងសីលធម៌ក្នុងរាជសភា។

Verse 18

उक्त्वा सकृत्‌ तथा सर्वान्‌ विकर्ण: पृथिवीपतीन्‌ । पाणौ पार्णिं विनिष्पिष्य नि:श्व॒सन्निदमब्रवीत्‌,उन सब राजाओंसे बार-बार आग्रह करनेपर भी जब कुछ उत्तर नहीं मिला, तब विकर्णने हाथ-पर-हाथ मलते हुए लंबी साँस खींचकर कहा--

វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ ក្រោយពីបាននិយាយទៅកាន់ព្រះមហាក្សត្រទាំងនោះម្តងទៀតហើយម្តងទៀត វិកರ್ಣៈ—ទោះបានអំពាវនាវជាញឹកញាប់ក៏មិនទទួលបានចម្លើយ—បានខ្ទាស់ដៃលើដៃ ខ្យល់ដង្ហើមវែងមួយ ហើយនិយាយពាក្យទាំងនេះ បង្ហាញទាំងការខកចិត្ត និងការតាំងចិត្តខាងធម៌របស់គាត់មធ្យមភាពស្ងៀមស្ងាត់នៃសភា។

Verse 19

विब्रूत पृथिवीपाला वाक्‍्यं मा वा कथंचन । मन्ये न्याय्यं यदत्राहं तद्धि वक्ष्यामि कौरवा:

វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ឱ ព្រះមហាក្សត្រទាំងឡាយ សូមកុំបំភ្លៃពាក្យរបស់ខ្ញុំដោយវិធីណាមួយឡើយ។ ខ្ញុំនឹងនិយាយនៅទីនេះអំពីអ្វីដែលខ្ញុំចាត់ទុកថាត្រឹមត្រូវ និងសមគួរ—សូមស្តាប់ ឱ កౌរាវៈទាំងឡាយ»។

Verse 20

“कौरवों तथा अन्य भूमिपालो! आपलोग द्रौपदीके प्रश्नपर किसी प्रकारका विचार प्रकट करें या न करें, मैं इस विषयमें जो न्यायसंगत समझता हूँ, वह कहता हूँ ।। चत्वार्याहर्नरश्रेष्ठा व्यसनानि महीक्षिताम्‌ । मृगयां पानमक्षांश्ष ग्राम्ये चैवातिरक्तताम्‌,“नरश्रेष्ठ भूपालो! राजाओंके चार दुर्व्यसन बताये गये हैं--शिकार, मदिरापान, जूआ तथा विषयभोगमें अत्यन्त आसक्ति

វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ឱ កౌរាវៈទាំងឡាយ និងអ្នកគ្រប់គ្រងដែនដីដទៃទៀត! មិនថាព្រះអង្គទាំងឡាយនឹងបង្ហាញមតិចំពោះសំណួររបស់ទ្រោបទី ឬមិនបង្ហាញក៏ដោយ ខ្ញុំនឹងនិយាយអំពីអ្វីដែលខ្ញុំឃើញថាយុត្តិធម៌ក្នុងរឿងនេះ។ បណ្ឌិតទាំងឡាយបានប្រកាសថា មានអំពើអាក្រក់បំផ្លាញស្តេច ៤ ប្រការ៖ ការប្រមាញ់ ការផឹកស្រា ការលេងស៊ីសងដោយគ្រាប់ឆ្កាង និងការលង់លក់ខ្លាំងពេកក្នុងកាមគុណ»។

Verse 21

एतेषु हि नर: सक्तो धर्ममुत्सृज्य वर्तते | यथायुक्तेन च कृतां क्रियां लोको न मन्यते,“इन दुर्व्यसनोंमें आसक्त मनुष्य धर्मकी अवहेलना करके मनमाना बर्ताव करने लगता है। इस प्रकार व्यसनासक्त पुरुषके द्वारा किये हुए किसी भी कार्यको लोग सम्मान नहीं देते हैं

ពិតប្រាកដណាស់ មនុស្សដែលជាប់ចិត្តក្នុងអំពើអាក្រក់ទាំងនេះ នឹងបោះបង់ធម៌ ហើយប្រព្រឹត្តទៅតាមចិត្តខ្លួន។ ហើយសកម្មភាពណាដែលគេធ្វើដោយគ្មានសេចក្តីសមរម្យ តាមគន្លងត្រឹមត្រូវ នោះលោកមិនទទួលស្គាល់ មិនគោរពឡើយ។

Verse 22

तदयं पाण्डुपुत्रेण व्यसने वर्तता भृशम्‌ । समाहूतेन कितवैरास्थितो द्रौपदीपण:,'ये पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर द्यूतरूपी दुर्व्यसनमें अत्यन्त आसक्त हैं। इन्होंने धूर्त जुआरियोंसे प्रेरित होकर द्रौपदीको दाँवपर लगा दिया है

វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ ដូច្នេះ កូនប្រុសរបស់បណ្ឌុរូបនេះ បានលង់ជ្រៅក្នុងអំពើអាក្រក់ដ៏ធ្ងន់ធ្ងរ។ ដោយសារក្រុមអ្នកលេងល្បែងដែលត្រូវបានហៅមក និងការលួចលាក់របស់ពួកគេ គាត់បានដល់ថ្នាក់យកដ្រោបទីមកដាក់ជាដំណាក់ភ្នាល់។

Verse 23

साधारणी च सर्वेषां पाण्डवानामनिन्दिता । जितेन पूर्व चानेन पाण्डवेन कृत: पण:,'सती-साध्वी द्रौपदी समस्त पाण्डवोंकी समानरूपसे पत्नी है, केवल युधिष्ठिरकी ही नहीं है। इसके सिवा, पाण्डुकुमार युधिष्ठिर पहले अपने-आपको हार चुके थे, उसके बाद उन्होंने द्रौपदीको दाँवपर रखा है

ដ្រោបទី អ្នកមានព្រហ្មចរិយា និងគ្មានកំហុស គឺជាប្រពន្ធរួមរបស់បណ្ឌវទាំងអស់ មិនមែនជារបស់យុធិស្ឋិរ តែម្នាក់ឯងទេ។ លើសពីនេះទៅទៀត បណ្ឌវនោះបានចាញ់ខ្លួនឯងជាមុនសិន ហើយបន្ទាប់មកទើបយកដ្រោបទីដាក់ជាដំណាក់ភ្នាល់។

Verse 24

इयं च कीर्तिता कृष्णा सौबलेन पणार्थिना । एतत्‌ सर्व विचार्याहं मन्ये न विजितामिमाम्‌,“सब दाँवोंको जीतनेकी इच्छावाले सुबलपुत्र शकुनिने ही द्रौपदीको दाँवपर लगानेकी बात उठायी है। इन सब बातोंपर विचार करके मैं ट्रुपदकुमारी कृष्णाको जीती हुई नहीं मानता”

ហើយក៏ជាសកុនិ កូនប្រុសសុបលៈ ដែលចង់ឈ្នះដំណាក់ភ្នាល់ទាំងអស់ បានលើកឡើងឲ្យយកក្រឹෂ್ಣា (ដ្រោបទី) មកដាក់ជាដំណាក់ភ្នាល់។ ពិចារណារឿងទាំងនេះទាំងអស់ហើយ ខ្ញុំមិនចាត់ទុកថា កូនស្រីត្រុបដៈ ក្រឹෂṇា នេះ ត្រូវបានឈ្នះឡើយ។

Verse 25

एतच्छुत्वा महान्‌ नाद: सभ्यानामुदतिष्ठत । विकर्ण शंसमानानां सौबलं चापि निन्दतान्‌,यह सुनकर सभी सभासद विकर्णकी प्रशंसा और सुबलपुत्र शकुनिकी निन्‍्दा करने लगे। उस समय वहाँ बड़ा कोलाहल मच गया

ពេលបានឮដូច្នោះ សម្លេងរំខានដ៏ធំបានកើតឡើងក្នុងសភា។ សមាជិកសភាទាំងឡាយបានសរសើរវិកರ್ಣ ហើយព្រមទាំងរិះគន់សកុនិ កូនប្រុសសុបលៈ ដោយធ្វើឲ្យសាលាសភាស្ទើរតែរញ្ជួយដោយសូរស័ព្ទ។

Verse 26

तस्मिन्नुपरते शब्दे राधेय: क्रोधमूर्च्छित: । प्रगृह्म रुचिरं बाहुमिदं वचनमत्रवीत्‌

ពេលសម្លេងអ៊ូអរ​នោះបានស្ងប់ស្ងាត់ហើយ រាធេយៈ (ករណៈ) ដែលត្រូវកំហឹងគ្របដណ្ដប់ដល់ថ្នាក់ងងឹតចិត្ត បានលើកដៃដ៏ស្រស់ស្អាតរបស់ខ្លួនឡើង ហើយនិយាយពាក្យទាំងនេះ។

Verse 27

उस कोलाहलके शान्त होनेपर राधानन्दन कर्ण क्रोधसे मूर्च्छिंत हो उसकी सुन्दर बाँह पकड़कर इस प्रकार बोला ।। कर्ण उवाच दृश्यन्ते वै विकर्णेह वैकृतानि बहून्यपि । तज्जातस्तद्विनाशाय यथाग्निररणिप्रज:,कर्णने कहा-विकर्ण! इस जगतमें बहुत-सी वस्तुएँ विपरीत परिणाम उत्पन्न करनेवाली देखी जाती हैं। जैसे अरणिसे उत्पन्न हुई अग्नि उसीको जला देती है, उसी प्रकार कोई-कोई मनुष्य जिस कुलमें उत्पन्न होता है, उसीका विनाश करनेवाला बन जाता है

ករណៈបាននិយាយថា៖ «វិកර්ណៈ! នៅក្នុងលោកនេះ មានរឿងជាច្រើនដែលឃើញថាបង្កលទ្ធផលបញ្ច្រាស និងគ្រោះថ្នាក់។ ដូចភ្លើងដែលកើតពីឈើអរណី វាឆេះបំផ្លាញឈើអរណីនោះឯង ដូច្នេះដែរ មនុស្សមួយចំនួនកើតក្នុងវង្សកុលណាមួយ តែវិញទៅជាក្លាយជាមូលហេតុនៃការបំផ្លាញវង្សកុលនោះ។»

Verse 28

(व्याधिर्बलं नाशयते शरीरस्थोडपि सम्भृत: । तृणानि पशवो घ्नन्ति स्वपक्षं चैव कौरव: ।। द्रोणो भीष्म: कृपो द्रौणिर्विदुरश्ष महामतिः । धृतराष्ट्रमश्न गान्धारी भवतः: प्राज्ञवत्तरा: ।।) रोग यद्यपि शरीरमें ही पलता है, तथापि वह शरीरके ही बलका नाश करता है। पशु घासको ही चरते हैं, फिर भी उसे पैरोंसे कुचल डालते हैं। उसी प्रकार कुरुकुलमें उत्पन्न होकर भी तुम अपने ही पक्षको हानि पहुँचाना चाहते हो। विकर्ण! द्रोण, भीष्म, कृप, अश्वत्थामा, महाबुद्धिमान्‌ विदुर, धृतराष्ट्र तथा गान्धारी--ये तुमसे अधिक बुद्धिमान हैं। एते न किंचिदप्याहुश्वोदिता हापि कृष्णया । धर्मेण विजितामेतां मन्यन्ते द्रुपदात्मजाम्‌

ករណៈបាននិយាយថា៖ «ជំងឺ ទោះបីលូតលាស់នៅក្នុងរាងកាយក៏ដោយ ក៏វាបំផ្លាញកម្លាំងរបស់រាងកាយនោះឯង។ គោគ្រប់គ្នាស៊ីស្មៅ តែវិញទៅជាជាន់បំផ្លាញស្មៅក្រោមជើង។ ដូច្នេះដែរ ទោះបីអ្នកកើតក្នុងវង្សកុរុ ក៏អ្នកចង់ធ្វើអន្តរាយដល់ភាគីរបស់ខ្លួនឯង ឱ កៅរវៈ។ វិកර්ណៈ! ដ្រូណៈ ភីष្មៈ កೃપៈ អશ્વត្ថាមា (កូនដ្រូណៈ) វិទុរៈអ្នកមានប្រាជ្ញាធំ ហើយទាំងធ្រិតរាស្ត្រ និងគន្ធារី—ពួកនេះប្រាជ្ញាជាងអ្នក។ ទោះដ្រោបទី (ក្រឹෂ್ಣា) កំពុងទុក្ខទ្រាំ ក៏ពួកគេមិននិយាយអ្វីទេ; ពួកគេចាត់ទុកកូនស្រីដ្រុបដៈថាត្រូវបានឈ្នះតាម ‘ធម្មៈ’ ហើយ។»

Verse 29

द्रौपदीने बार-बार प्रेरित किया है, तो भी ये सभासद कुछ भी नहीं बोलते हैं; क्योंकि ये सब लोग द्रुपदकुमारीको धर्मके अनुसार जीती हुई समझते हैं ।। त्वं तु केवलबाल्येन धार्तराष्ट्र विदीर्यसे । यद्‌ ब्रवीषि सभामध्ये बाल: स्थविरभाषितम्‌

ករណៈបាននិយាយថា៖ «ឱ កូនធ្រិតរាស្ត្រ! មានតែភាពក្មេងខ្ចីប៉ុណ្ណោះដែលធ្វើឲ្យអ្នកផ្ទុះឡើងបែបនេះ។ ព្រោះនៅកណ្ដាលសភារាជ អ្នកនិយាយដូចក្មេង បន្តពាក្យដែលសមស្របសម្រាប់មនុស្សចាស់ទុំ។»

Verse 30

धृतराष्ट्रकुमार! तुम केवल अपनी मूर्खताके कारण आप ही अपने पैरोंमें कुल्हाड़ी मार रहे हो; क्योंकि तुम बालक होकर भी भरी सभामें वृद्धोंकी-सी बातें करते हो ।। न च धर्म यथावत्‌ त्वं वेत्सि दुर्योधनावर । यद्‌ ब्रवीषि जितां कृष्णां न जितेति सुमन्दधी:

ករណៈបាននិយាយថា៖ «ឱ កូនធ្រិតរាស្ត្រ! ដោយសារភាពល្ងង់ខ្លៅសុទ្ធសាធ អ្នកកំពុងកាប់ពូថៅលើជើងខ្លួនឯង។ ទោះជាក្មេងក៏ដោយ អ្នកនិយាយនៅក្នុងសភាដ៏ពេញលេញ ដូចជាមនុស្សចាស់ទុំ។ អ្នកមិនដឹងធម្មៈត្រឹមត្រូវទេ ឱ អ្នកគាំទ្រដុរយោធនៈ; ហើយដោយចិត្តមិនឆ្លាត អ្នកថ្លែងថា ក្រឹෂṇា (ដ្រោបទី) ទោះបានឈ្នះហើយ ក៏មិនបានឈ្នះ។»

Verse 31

दुर्योधनके छोटे भाई! तुम्हें धर्मके विषयमें यथार्थ ज्ञान नहीं है। तुम जो जीती हुई द्रौपदीको नहीं जीती हुई बता रहे हो, इससे तुम्हारे मन्दबुद्धि होनेका परिचय मिलता है ।। कथं हाविजितां कृष्णां मन्यसे धृतराष्ट्रज । यदा सभायां सर्वस्वं न्यस्तवान्‌ पाण्डवाग्रज:

ករណៈបាននិយាយថា៖ «ឱ ប្អូនប្រុសតូចរបស់ទុរយោធនៈ! អ្នកមិនមានចំណេះដឹងពិតប្រាកដអំពីធម៌ទេ។ ការដែលអ្នកនិយាយថា ដ្រោបទី—ដែលបានឈ្នះហើយ—មិនបានឈ្នះទេ នោះបង្ហាញពីភាពខ្សោយបញ្ញារបស់អ្នក។ តើអ្នក កូនរបស់ធ្រិតរាស្ត្រា អាចគិតថា ក្រឹෂ್ಣា (ដ្រោបទី) មិនត្រូវបានឈ្នះដូចម្តេចបាន នៅពេលដែលក្នុងសភា បណ្ឌវអគ្គ (យុធិស្ឋិរ) បានដាក់ភ្នាល់អស់ទាំងអស់?»

Verse 32

धृतराष्ट्रकुमार! तुम कृष्णाको नहीं जीती हुई कैसे मानते हो? जब कि पाण्डवोंके बड़े भाई युधिष्ठिरने द्यूतसभाके बीच अपना सर्वस्व दाँवपर लगा दिया है ।। अभ्यन्तरा च सर्वस्वे द्रौपदी भरतर्षभ । एवं धर्मजितां कृष्णां मन्यसे न जितां कथम्‌,भरतश्रेष्ठ! द्रौपदी भी तो सर्वस्वके भीतर ही है। इस प्रकार जब कृष्णाको धर्मपूर्वक जीत लिया गया है, तब तुम उसे नहीं जीती हुई क्यों समझते हो?

ករណៈបាននិយាយថា៖ «ឱ កូនរបស់ធ្រិតរាស្ត្រា! តើអ្នកអាចចាត់ទុកក្រឹෂ்ணា (ដ្រោបទី) ថាមិនបានឈ្នះដូចម្តេច? នៅកណ្ដាលសាលាលេងស៊ីសង យុធិស្ឋិរ—បងធំបណ្ឌវ—បានដាក់ភ្នាល់ទាំងទ្រព្យសម្បត្តិ និងខ្លួនឯងទាំងមូល។ ហើយដ្រោបទីផងដែរ ឱ វីរបុរសក្នុងចំណោមភារតៈ នាងក៏ស្ថិតនៅក្នុងពាក្យថា ‘អស់ទាំងអស់’ នោះដែរ។ ដូច្នេះ បើក្រឹෂ்ணាត្រូវបានឈ្នះតាមច្បាប់នៃល្បែងហើយ ហេតុអ្វីអ្នកនៅតែយល់ថានាងមិនបានឈ្នះ?»

Verse 33

कीर्तिता द्रौपदी वाचा अनुज्ञाता च पाण्डवै: । भवत्यविजिता केन हेतुनैषा मता तव

ករណៈបាននិយាយថា៖ «ដ្រោបទីត្រូវបានប្រកាសដោយពាក្យថាជាភ្នាល់ ហើយបណ្ឌវទាំងឡាយក៏បានអនុម័តដែរ។ ដូច្នេះ តើដោយអ្នកណា នាងត្រូវបានចាត់ទុកថា ‘មិនបានឈ្នះ’? ហេតុអ្វីបានជាអ្នកកាន់ទស្សនៈនេះ?»

Verse 34

युधिष्ठिरने अपनी वाणीद्वारा कहकर द्रौपदीको दाँवपर रखा और शेष पाण्डवोंने मौन रहकर उसका अनुमोदन किया। फिर किस कारणसे तुम उसे नहीं जीती हुई मानते हो? ।। मन्यसे वा सभामेतामानीतामेकवाससम्‌ । अधर्मेणेति तत्रापि शृणु मे वाक्यमुत्तमम्‌,अथवा यदि तुम्हारी यह राय हो कि एकद्स्त्रा द्रौपदीको इस सभामें अधर्मपूर्वक लाया गया है तो इसके उत्तरमें भी मेरी उत्तम बात सुनो

ករណៈបាននិយាយថា៖ «យុធិស្ឋិរ បានប្រកាសដោយពាក្យផ្ទាល់ថា ដ្រោបទីជាភ្នាល់ ហើយបណ្ឌវដែលនៅសល់បានស្ងៀមស្ងាត់ ដើម្បីអនុម័ត។ ដូច្នេះ ហេតុអ្វីអ្នកបដិសេធមិនទទួលថានាងត្រូវបានឈ្នះ? ហើយបើអ្នកគិតថា ដ្រោបទី ដែលស្លៀកតែសម្លៀកបំពាក់តែមួយ ត្រូវបាននាំមកសភានេះដោយអធម៌ នោះសូមស្តាប់ពាក្យឆ្លើយដ៏ដាច់ខាតរបស់ខ្ញុំផង។»

Verse 35

एको भर्ता स्त्रिया देवैरविहित: कुरुनन्दन । इयं त्वनेकवशगा बन्धकीति विनिश्चिता,कुरुनन्दन! देवताओंने स्त्रीके लिये एक ही पतिका विधान किया है; परंतु यह द्रौपदी अनेक पतियोंके अधीन है, अतः यह निश्चय ही वेश्या है। इसका सभामें लाया जाना कोई अनोखी बात नहीं है। यह एकवस्त्रा अथवा नंगी हो तो भी यहाँ लायी जा सकती है, यह मेरा स्पष्ट मत है

ករណៈបាននិយាយថា៖ «ឱ កូនចៅកុរុ! ព្រះទាំងឡាយបានកំណត់សម្រាប់ស្ត្រីឲ្យមានប្តីតែមួយ។ ប៉ុន្តែដ្រោបទីនេះស្ថិតក្រោមប្តីជាច្រើន ដូច្នេះត្រូវចាត់ទុកថាជាស្ត្រីវេស្យា។ ហេតុនេះ ការនាំនាងមកសភា មិនមែនជារឿងចម្លែកឡើយ។ មិនថានាងស្លៀកតែសម្លៀកបំពាក់តែមួយ ឬសូម្បីតែគ្មានសម្លៀកបំពាក់ ក៏អាចនាំមកទីនេះបាន—នេះជាមតិច្បាស់លាស់របស់ខ្ញុំ។»

Verse 36

अस्या: सभामानयनं न चित्रमिति मे मति: । एकाम्बरधरत्वं वाप्यथ वापि विवस्त्रता,कुरुनन्दन! देवताओंने स्त्रीके लिये एक ही पतिका विधान किया है; परंतु यह द्रौपदी अनेक पतियोंके अधीन है, अतः यह निश्चय ही वेश्या है। इसका सभामें लाया जाना कोई अनोखी बात नहीं है। यह एकवस्त्रा अथवा नंगी हो तो भी यहाँ लायी जा सकती है, यह मेरा स्पष्ट मत है

ករណៈបាននិយាយថា៖ «តាមទស្សនៈរបស់ខ្ញុំ ការនាំនាងចូលមកក្នុងសភា មិនមែនជារឿងអស្ចារ្យអ្វីឡើយ។ ទោះនាងពាក់តែសម្លៀកបំពាក់តែមួយ ឬសូម្បីតែអាក្រាតកាយ ក៏អាចនាំមកទីនេះបានដែរ ឱ កូនចៅកូរុ! ព្រះទេវតាបានកំណត់សម្រាប់ស្ត្រីឲ្យមានប្តីតែមួយ; ប៉ុន្តែដ្រោបទីនេះស្ថិតក្រោមប្តីជាច្រើន—ដូច្នេះនាងប្រាកដជាស្រីពេស្យា។ ហេតុនេះ ការនាំនាងមកសាលាសភា មិនមែនជារឿងគួរភ្ញាក់ផ្អើលឡើយ»។

Verse 37

यच्चैषां द्रविणं किंचिद्‌ या चैषा ये च पाण्डवा: । सौबलेनेह तत्‌ सर्व धर्मेण विजितं वसु,इन पाण्डवोंके पास जो कुछ धन है, जो यह द्रौपदी है तथा जो ये पाण्डव हैं, इन सबको सुबलपुत्र शकुनिने यहाँ जूएके धनके रूपमें धर्मपूर्वक जीता है

«ទ្រព្យសម្បត្តិអ្វីៗដែលពួកគេមាន ក៏ដូចជาสต្រីនេះ (ដ្រោបទី) និងពួកបណ្ឌវទាំងនេះផ្ទាល់—អស់ទាំងនោះ សុបលបុត្រ (សកុនិ) បានឈ្នះនៅទីនេះ ដោយស្របតាមធម៌ ជាជ័យលាភក្នុងល្បែងស៊ីសង»។

Verse 38

दुःशासन सुबालो<यं विकर्ण: प्राज्ञवादिक: । पाण्डवानां च वासांसि द्रौपद्याश्चाप्युपाहर,दुःशासन! यह विकर्ण अत्यन्त मूढ़ है, तथापि विद्वानोंकी-सी बातें बनाता है। तुम पाण्डवोंके और द्रौपदीके भी वस्त्र उतार लो

ករណៈបាននិយាយថា៖ «ឌុះសាសន! វិករណៈនេះគ្រាន់តែជាក្មេងល្ងង់ម្នាក់ ប៉ុន្តែបែរជានិយាយដូចជាអ្នកប្រាជ្ញ។ ចូរទៅយក—ហើយដោះសម្លៀកបំពាក់—របស់ពួកបណ្ឌវ និងរបស់ដ្រោបទីផង»។

Verse 39

तच्छुत्वा पाण्डवा: सर्वे स्वानि वासांसि भारत । अवकीर्योत्तरीयाणि सभायां समुपाविशन्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! कर्णकी बात सुनकर समस्त पाण्डव अपने- अपने उत्तरीय वस्त्र उतारकर सभामें बैठ गये

ពេលបានឮពាក្យនោះ ពួកបណ្ឌវទាំងអស់—ឱ ភារត!—បានបោះចោលសម្លៀកបំពាក់ខាងលើរបស់ខ្លួន ហើយអង្គុយនៅក្នុងសភា។

Verse 40

ततो दुःशासनो राजन द्रौपद्या वसनं बलात्‌ | सभामध्ये समाक्षिप्य व्यपाक्रष्ठूं प्रचक्रमे,राजन्‌! तब दुःशासनने उस भरी सभामें द्रौपदीका वस्त्र बलपूर्वक पकड़कर खींचना प्रारम्भ किया

បន្ទាប់មក ឱ ព្រះមហាក្សត្រ! ឌុះសាសនបានចាប់សម្លៀកបំពាក់របស់ដ្រោបទីដោយកម្លាំង នៅកណ្ដាលសភាដ៏ពេញមនុស្ស ហើយចាប់ផ្តើមទាញវាចេញ។

Verse 41

वैशम्पायन उवाच आकृष्यमाणे वसने द्रौपद्याश्चिन्तितो हरि: । वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! जब वस्त्र खींचा जाने लगा, तब द्रौपदीने भगवान्‌ श्रीकृष्णका स्मरण किया ।। (्रौपह्ुुवाच ज्ञातं मया वसिष्ठेन पुरा गीत॑ महात्मना । महत्यापदि सम्प्राप्ते स्मर्तव्यो भगवान्‌ हरि: ।। द्रौपदीने मन-ही-मन कहा--मैंने पूर्वकालमें महात्मा वसिष्ठजीकी बतायी हुई इस बातको अच्छी तरह समझा है कि भारी विपत्ति पड़नेपर भगवान्‌ श्रीहरिका स्मरण करना चाहिये। वैशम्पायन उवाच गोविन्देति समाभाष्य कृष्णेति च पुन: पुनः । मनसा चिन्तयामास देवं नारायण प्रभुम्‌ ।। आपत्स्वभयदं कृष्णं लोकानां प्रपितामहम्‌ ।) वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! ऐसा विचारकर द्रौपदीने बारंबार “गोविन्द” और “कृष्ण” का नाम लेकर पुकारा और आपत्तिकालमें अभय देनेवाले लोकप्रपितामह नारायण-स्वरूप भगवान्‌ श्रीकृष्णका मन-ही-मन चिन्तन किया। गोविन्द द्वारकावासिन्‌ कृष्ण गोपीजनप्रिय,'हे गोविन्द! हे द्वारकावासी श्रीकृष्ण! हे गोपांगनाओंके प्राणवललभ केशव! कौरव मेरा अपमान कर रहे हैं, क्या आप नहीं जानते? हे नाथ! हे रमानाथ! हे व्रजनाथ! हे संकटनाशन जानार्दन! मैं कौरवरूप समुद्रमें डूबी जा रही हूँ, मेरा उद्धार कीजिये

វៃសម្បាយនៈបាននិយាយ៖ នៅពេលដែលគេកំពុងទាញយកសម្លៀកបំពាក់របស់ទ្រោបទីចេញ នាងបានបង្វែរចិត្តទៅរក ហរិ (ព្រះស្រីក្រឹષ્ણ)។ ក្នុងមុខមាត់នៃការប្រមាថជាសាធារណៈ និងភាពអស់កម្លាំង នាងមិនតបតដោយកំហឹងទេ ប៉ុន្តែដោយការចងចាំព្រះ—ជាចំណុចបត់សីលធម៌ពីអំណាចមនុស្សទៅកាន់ទីពឹងទេវៈ បង្ហាញថា នៅពេលវិបត្តិធ្ងន់ធ្ងរ គួរស្វែងរកការការពារតាមធម៌ និងភក្តិ មិនមែនតាមការអស់សង្ឃឹម ឬអំពើហិង្សា។

Verse 42

कौरवै: परिभूतां मां कि न जानासि केशव । हे नाथ हे रमानाथ व्रजनाथार्तिनाशन । कौरवार्णवमग्नां मामुद्धरस्व जनार्दन,'हे गोविन्द! हे द्वारकावासी श्रीकृष्ण! हे गोपांगनाओंके प्राणवललभ केशव! कौरव मेरा अपमान कर रहे हैं, क्या आप नहीं जानते? हे नाथ! हे रमानाथ! हे व्रजनाथ! हे संकटनाशन जानार्दन! मैं कौरवरूप समुद्रमें डूबी जा रही हूँ, मेरा उद्धार कीजिये

វៃសម្បាយនៈបាននិយាយ៖ «ឱ កេសវ! កៅរវកំពុងប្រមាថខ្ញុំ—តើព្រះមិនដឹងទេឬ? ឱ ព្រះអម្ចាស់! ឱ ព្រះស្វាមីនៃ រាមា! ឱ ព្រះអម្ចាស់នៃ វ្រាជ! អ្នកបំបាត់ទុក្ខរបស់អ្នករងទុក្ខ! ខ្ញុំកំពុងលិចក្នុងសមុទ្រដែលជាកៅរវ—ឱ ជនារទន! សូមសង្គ្រោះខ្ញុំ!»

Verse 43

कृष्ण कृष्ण महायोगिन्‌ विश्वात्मन्‌ विश्वभावन । प्रपन्नां पाहि गोविन्द कुरुमध्येडवसीदतीम्‌,'सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण। महायोगिन! विश्वात्मन! विश्वभावन! गोविन्द! कौरवोंके बीचमें कष्ट पाती हुई मुझ शरणागत अबलाकी रक्षा कीजिये'

វៃសម្បាយនៈបាននិយាយ៖ «ក្រឹષ્ણ! ក្រឹષ્ણ! ឱ មហាយោគីន! ឱ ព្រលឹងនៃសកលលោក! ឱ អ្នកបង្កើត និងចិញ្ចឹមសកល! ឱ គោវិន្ទ! សូមការពារខ្ញុំដែលបានសុំជ្រកកោននៅព្រះ—ខ្ញុំកំពុងលិចក្នុងទុក្ខវេទនាកណ្ដាលកៅរវ!»

Verse 44

इत्यनुस्मृत्य कृष्णं सा हरिं त्रिभुवने श्वरम्‌ । प्रारुदद्‌ दु:खिता राजन्‌ मुखमाच्छाद्य भामिनी,राजन! इस प्रकार तीनों लोकोंके स्वामी श्यामसुन्दर श्रीकृष्णका बार-बार चिन्तन करके मानिनी द्रौपदी दुःखी हो अंचलसे मुँह ढककर जोर-जोरसे रोने लगी

ដោយនឹកចាំព្រះក្រឹષ્ણម្តងហើយម្តងទៀត—ហរិ ព្រះអម្ចាស់នៃបីលោក—ទ្រោបទីដែលពោរពេញដោយទុក្ខ បានយកសម្លៀកបំពាក់បាំងមុខ ហើយយំស្រែកខ្លាំងៗ ឱ ព្រះមហាក្សត្រ។

Verse 45

याज्ञसेन्या वच:ः श्रुत्वा कृष्णो गह्दरितो5भवत्‌ | त्यक्त्वा शय्या55सनं पदभ्यां कृपालु: कृपयाभ्यगात्‌,द्रपदनन्दिनीकी वह करुण पुकार सुनकर कृपालु श्रीकृष्ण गदगद हो गये तथा शय्या और आसन छोड़कर दयासे द्रवित हो पैदल ही दौड़ पड़े। यज्ञसेनकुमारी कृष्णा अपनी रक्षाके लिये श्रीकृष्ण, विष्णु हरि और नर आदि भगवतन्नामोंको जोर-जोरसे पुकार रही थी। इसी समय धर्मस्वरूप महात्मा श्रीकृष्णने अव्यक्तरूपसे उसके वस्त्रमें प्रवेश करके भाँति- भाँतिके सुन्दर वस्त्रोंद्वारा द्रोपदीको आच्छादित कर लिया

វៃសម្បាយនៈបាននិយាយ៖ ព្រះក្រឹષ્ણបានឮពាក្យអំពាវនាវរបស់យាជ្ញសេនី (ទ្រោបទី) ហើយព្រះអង្គរង់ចាំមិនបាន ដោយចិត្តរំភើប។ ព្រះអង្គដែលពោរពេញដោយមេត្តា បានលះចោលទាំងគ្រែ និងអាសនៈ ហើយប្រញាប់រត់ទៅដោយជើងផ្ទាល់។ ក្នុងទស្សនៈនៃធម៌ នេះជាការសាកល្បង៖ ពេលសភាមនុស្សបរាជ័យក្នុងការការពារអ្នកទន់ខ្សោយ អ្នកសុចរិតត្រូវឆ្លើយតប ហើយការការពារព្រះត្រូវបានអំពាវនាវដោយការចងចាំ និងការបោះបង់ខ្លួន។

Verse 46

कृष्णं च विष्णुं च हरिं नरं च त्राणाय विक्रोशति याज्ञसेनी । ततस्तु धर्मो5न्तरितो महात्मा समावृणोद्‌ वै विविधै: सुवस्त्रै:,द्रपदनन्दिनीकी वह करुण पुकार सुनकर कृपालु श्रीकृष्ण गदगद हो गये तथा शय्या और आसन छोड़कर दयासे द्रवित हो पैदल ही दौड़ पड़े। यज्ञसेनकुमारी कृष्णा अपनी रक्षाके लिये श्रीकृष्ण, विष्णु हरि और नर आदि भगवतन्नामोंको जोर-जोरसे पुकार रही थी। इसी समय धर्मस्वरूप महात्मा श्रीकृष्णने अव्यक्तरूपसे उसके वस्त्रमें प्रवेश करके भाँति- भाँतिके सुन्दर वस्त्रोंद्वारा द्रोपदीको आच्छादित कर लिया

វៃសម្បាយនៈបាននិយាយ៖ យាជ្ញសេនី (ទ្រោបទី) ស្រែកអំពាវនាវសុំការពារ ដោយហៅនាមទេវៈយ៉ាងខ្លាំង—ក្រឹષ્ણ, វិស្ណុ, ហរិ និង នរ។ បន្ទាប់មក ព្រះអម្ចាស់មានព្រលឹងធំ ដែលជាធម្មៈផ្ទាល់ ទោះនៅមិនឲ្យឃើញ ក៏បានគ្របដណ្តប់នាងពីគ្រប់ទិសដោយសម្លៀកបំពាក់ស្រស់ស្អាតជាច្រើនប្រភេទ។ ក្នុងការអាម៉ាស់មុខជាសាធារណៈនេះ ជម្រករបស់នាងមិនមែនកម្លាំង ឬការសងសឹកទេ ប៉ុន្តែជាការសម្របខ្លួនចូលស្របនឹងទេវៈ; រឿងរ៉ាវបង្ហាញការឈ្នះរបស់ធម្មៈលើអធម្មៈ និងការការពារកិត្តិយសស្ត្រី នៅពេលស្ថាប័នមនុស្សបរាជ័យ។

Verse 47

आकृष्यमाणे वसने द्रौपद्यास्तु विशाम्पते । तद्गरूपमपरं वस्त्र प्रादुगसीदनेकश:,जनमेजय! द्रौपदीके वस्त्र खींचे जाते समय उसी तरहके दूसरे-दूसरे अनेक वस्त्र प्रकट होने लगे

វៃសម្បាយនៈបាននិយាយ៖ ឱ ព្រះអម្ចាស់នៃប្រជាជន—នៅពេលដែលសម្លៀកបំពាក់របស់ទ្រោបទីត្រូវគេអូសទាញចេញ នោះក្រណាត់មួយទៀតដែលមានលក្ខណៈដូចគ្នា ក៏លេចឡើងម្តងហើយម្តងទៀត ឱ ជនមេជ័យ។ នៅវេលានេះ មហាកាវ្យបញ្ជាក់ថា ការបំពានអាម៉ាស់ស្ត្រី (strī-apamāna) គឺអធម្មៈ ហើយលំដាប់សីលធម៌ខ្ពស់ជាងអាចចូលមកអន្តរាគមន៍ ដើម្បីការពារកិត្តិយសរបស់អ្នកដែលត្រូវគេធ្វើអំពើអយុត្តិធម៌។

Verse 48

नानारागविरागाणि वसनान्यथ वै प्रभो । प्रादुर्भवन्ति शतशो धर्मस्य परिपालनात्‌,राजन! धर्मपालनके प्रभावसे वहाँ भाँति-भाँतिके सैकड़ों रंग-बिरंगे वस्त्र प्रकट होते रहे

វៃសម្បាយនៈបាននិយាយ៖ ឱ ព្រះអម្ចាស់ ឱ ស្តេច—ដោយអំណាចនៃការរក្សា និងការពារធម្មៈ សម្លៀកបំពាក់ជាច្រើនរយប្រភេទ មានពណ៌ និងលំនាំខុសៗគ្នា បានបន្តលេចឡើងម្តងហើយម្តងទៀត។

Verse 49

ततो हलहलाशब्दस्तत्रासीद्‌ घोरदर्शन: । तदद्भुततमं लोको वीक्ष्य सर्वे महीभूत: । शशंसुद्रौपदीं तत्र कुत्सन्तो धृतराष्ट्रजम्‌,उस समय वहाँ बड़ा भयंकर कोलाहल मच गया। जगतमें यह अद्भुत दृश्य देखकर सब राजा द्रौपदीकी प्रशंसा और दुःशासनकी निन्दा करने लगे। उस समय वहाँ समस्त राजाओंके बीच हाथ-पर-हाथ मलते हुए भीमसेनने क्रोधसे फड़कते हुए ओठोंद्वारा भयंकर गर्जनाके साथ यह शाप दिया (प्रतिज्ञा की)

បន្ទាប់មក នៅទីនោះមានសំឡេងកូឡាហលដ៏គួរឱ្យភ័យខ្លាចកើតឡើង។ ឃើញទិដ្ឋភាពអស្ចារ្យបំផុតនោះ ស្តេចទាំងអស់ស្ទើរតែស្រឡាំងកាំង; ពួកគេបានសរសើរទ្រោបទី ហើយថ្កោលទោសកូនរបស់ធ្រិតរាស្ត្រ (ទុះសាសន) ដោយបញ្ចេញពាក្យរិះគន់។ ក្នុងវេលាដ៏តានតឹងនោះ មធ្យមសភាស្តេចទាំងឡាយ ភីមសេន—ខ្ទាស់ដៃមួយទៅមួយ បបូរមាត់ញ័រដោយកំហឹង—បានបន្លឺសំឡេងគួរឱ្យរន្ធត់ ហើយធ្វើពាក្យសច្ចាប្រណិធានសងសឹកយ៉ាងតឹងរឹង។

Verse 50

शशाप तत्र भीमस्तु राजमध्ये बृहत्स्वन: । क्रोधाद्‌ विस्फुरमाणौष्ठो विनिष्पिष्य करे करम्‌,उस समय वहाँ बड़ा भयंकर कोलाहल मच गया। जगतमें यह अद्भुत दृश्य देखकर सब राजा द्रौपदीकी प्रशंसा और दुःशासनकी निन्दा करने लगे। उस समय वहाँ समस्त राजाओंके बीच हाथ-पर-हाथ मलते हुए भीमसेनने क्रोधसे फड़कते हुए ओठोंद्वारा भयंकर गर्जनाके साथ यह शाप दिया (प्रतिज्ञा की)

វៃសម្បាយនៈបាននិយាយ៖ បន្ទាប់មក ក្នុងចំណោមស្តេចទាំងឡាយ ភីមៈបានបញ្ចេញពាក្យសាប (ពាក្យសច្ចាប្រណិធាន) ដោយសំឡេងដ៏ធំដូចផ្គរលាន់; បបូរមាត់ញ័រដោយកំហឹង ហើយខ្ទាស់ដៃមួយទៅមួយ ដូចជាកិនឲ្យរឹង។ ទិដ្ឋភាពនេះបង្ហាញការបែកបាក់សីលធម៌ជាសាធារណៈ៖ កំហឹងរបស់អ្នកសុចរិតចំពោះការអាម៉ាស់ និងការសម្រេចចិត្តឆ្លើយតបអធម្មៈដោយពាក្យសច្ចាប្រណិធានសងសឹក ដែលនឹងកំណត់ទិសដៅសង្គ្រាមនៅពេលក្រោយ។

Verse 51

भीम उवाच इदं मे वाक्यमाददध्वं क्षत्रिया लोकवासिन: । नोक्तपूर्व नरैरन्यैर्न चान्यो यद्‌ वदिष्यति

Bhima said: “Kshatriyas who dwell in this world, take up and heed this statement of mine. It is something not spoken before by other men, nor will anyone else speak what I am about to say.”

Verse 52

भीमसेनने कहा--देश-देशान्तरके निवासी क्षत्रियो! आपलोग मेरी इस बातपर ध्यान दें। ऐसी बात आजसे पहले न तो किसीने कही होगी और न दूसरा कोई कहेगा ही ।। यद्येतदेवमुक्त्वाहं न कुर्या पृथिवीश्वरा: । पितामहानां पूर्वेषां नाहं गतिमवाप्लुयाम्‌,भूमिपालो! यह खोटी बुद्धिवाला दुःशासन भरतवंशके लिये कलंक है। मैं युद्धमें बलपूर्वक इस पापीकी छाती फाड़कर इसका रक्त पीऊँगा। यदि न पीऊँ अर्थात्‌--अपनी कही हुई उस बातको पूरा न करूँ, तो मुझे अपने पूर्वज बाप-दादोंकी श्रेष्ठ गति न मिले

Bhima said: “Kshatriyas dwelling in many lands, attend to my words. Such a vow has never been spoken before today, nor will anyone else speak it. If, having declared this, I do not carry it out, then, O lords of the earth, may I fail to attain the blessed destiny won by my grandsires and forefathers. O king, this Duhshasana—base-minded and a stain upon the Bharata line—I will, in battle, tear open the chest of this sinner by sheer force and drink his blood. If I do not drink it—if I do not fulfill what I have proclaimed—then let me be denied the highest path of my ancestors.”

Verse 53

अस्य पापस्य दुर्बुद्धरर्भारतापसदस्य च । न पिबेयं बलाद्‌ वक्षो भिनत्त्वा चेद्‌ रुधिरं युधि,भूमिपालो! यह खोटी बुद्धिवाला दुःशासन भरतवंशके लिये कलंक है। मैं युद्धमें बलपूर्वक इस पापीकी छाती फाड़कर इसका रक्त पीऊँगा। यदि न पीऊँ अर्थात्‌--अपनी कही हुई उस बातको पूरा न करूँ, तो मुझे अपने पूर्वज बाप-दादोंकी श्रेष्ठ गति न मिले

Bhima said: “This sinner, this evil-minded one—Duhshasana, a disgrace to the Bharata line—on the battlefield I will, by force, tear open his chest and drink his blood. O king, if I do not drink it—if I fail to fulfill the vow I have spoken—then may I not attain the noble destiny of my forefathers.”

Verse 54

वैशम्पायन उवाच तस्य ते तद्‌ वच: श्रुत्वा रौद्रं लोमप्रहर्षणम्‌ । प्रचक्रुर्बहुलां पूजां कुत्सन्तो धृतराष्ट्रजम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! भीमसेनकी यह रोंगटे खड़े कर देनेवाली भयंकर बात सुनकर वहाँ बैठे हुए राजाओंने धृतराष्ट्रपुत्र दःशासनकी निन्दा करते हुए भीमसेनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की

Vaiśampāyana said: Hearing those fierce words of his—words that made the hair stand on end—the kings seated there offered abundant honor, while censuring the son of Dhṛtarāṣṭra (Duḥśāsana). The scene underscores a moral judgment by the assembly: public esteem turns toward the one perceived as defending justice, and public blame falls upon the one seen as acting with cruelty and adharma.

Verse 55

यदा तु वाससां राशि: सभामध्ये समाचित: । ततो दुःशासन: श्रान्तो ब्रीडित: समुपाविशत्‌,जब सभामें वस्त्रोंका ढेर लग गया, तब दुःशासन थककर लज्जित हो चुपचाप बैठ गया

When a heap of garments had accumulated in the midst of the royal assembly, Duḥśāsana—exhausted and overcome with shame—fell silent and sat down. The scene underscores how public wrongdoing, pursued with obstinacy, ends not in triumph but in visible moral collapse before the very court that witnessed the outrage.

Verse 56

धिक्शब्दस्तु ततस्तत्र समभूल्लोमहर्षण: । सभ्यानां नरदेवानां दृष्टवा कुन्तीसुतांस्तथा,उस समय कुन्तीपुत्रोंकी ओर देखकर सभामें उपस्थित नरेशोंकी ओरसे दुःशासनपर रोमांचकारी शब्दोंमें धिक्कारकी बौछार होने लगी

វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ នៅទីនោះទាំងនោះ ក្នុងសភានោះ សំឡេង «អាម៉ាស់!» ដ៏ធ្វើឲ្យរោមសក់ឈរឡើង បានផ្ទុះឡើង។ ព្រះមហាក្សត្រដែលអង្គុយនៅក្នុងសាលា ពេលឃើញកូនប្រុសរបស់គុនទីស្ថិតក្នុងសភាពដូច្នោះ ក៏បង្ហូរពាក្យស្តីបន្ទោសយ៉ាងខ្លាំង—បាញ់ទៅលើ ទុះសាសនៈ—ដោយពាក្យដែលធ្វើឲ្យអ្នកស្តាប់ស្ទើរតែញ័រខ្លួន។

Verse 57

न विन्लुवन्ति कौरव्या: प्रश्रमेतमिति सम ह । स जन: क्रोशति स्मात्र धृतराष्ट्र विगर्हयन्‌,कौरव द्रौपदीके पूर्वोक्त प्रश्नपर स्पष्ट विवेचन नहीं कर रहे थे, अतः वहाँ बैठे हुए लोग राजा धृतराष्ट्रकी निन्‍्दा करते हुए उन्हें कोसने लगे

វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ ពួកកౌរវៈមិនឈប់ទេ ដោយគិតថា «ទុកឲ្យគេនឿយហត់ទៅដោយការខិតខំ»។ ដូច្នោះហើយ មនុស្សដែលអង្គុយនៅទីនោះ ក៏ចាប់ផ្តើមស្រែកឡើង ដោយស្តីបន្ទោស ព្រះធ្រិតរាស្ត្រ—ថាទ្រង់អនុញ្ញាតឲ្យអំពើអធម៌បន្តទៅ ដោយគ្មានការទប់ស្កាត់។

Verse 58

ततो बाहू समुच्छित्य निवार्य च सभासद: । विदुर: सर्वधर्मज्ञ इदं वचनमत्रवीत्‌

បន្ទាប់មក វិទុរៈ—អ្នកដឹងគ្រប់ធម៌—បានលើកដៃទាំងពីរឡើង ហើយទប់ស្កាត់សមាជិកសភា។ រួចគាត់បាននិយាយពាក្យទាំងនេះ។

Verse 59

तब सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता विदुरजीने अपनी दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर सभासदोंको चुप कराया और इस प्रकार कहा ।। विदुर उवाच द्रौपदी प्रश्नमुक्त्वैवं रोरवीति हनाथवत्‌ । नच विश्रूत त॑ प्रश्न॑ सभ्या धर्मोत्र पीड्यते

វិទុរៈបាននិយាយថា៖ «ដ្រೌបទី បានលើកសំណួររបស់នាងឡើង ដូច្នេះហើយ នាងក៏ស្រែកយំដូចអ្នកគ្មានអ្នកការពារ។ តែសំណួរនោះ មិនត្រូវបានស្តាប់ឲ្យច្បាស់ក្នុងសភានេះឡើយ; ហើយនៅក្នុងរាជសាលានេះផ្ទាល់ ធម៌កំពុងត្រូវបានបង្ខិតបង្ខំ។»

Verse 60

विदुरजी बोले--इस सभामें पधारे हुए भूपालगण! ट्रुपदकुमारी कृष्णा यहाँ अपना प्रश्न उपस्थित करके इस तरह अनाथकी भाँति रो रही है; परंतु आपलोग उसका विवेचन नहीं करते, अतः यहाँ धर्मकी हानि हो रही है ।। सभां प्रपद्यते हार्त: प्रज्वलन्निव हव्यवाट्‌ । त॑ वै सत्येन धर्मेण सभ्या: प्रशमयन्त्युत

វិទុរៈបាននិយាយថា៖ «ឱ ព្រះមហាក្សត្រនិងមនុស្សចាស់ទុំក្នុងសភា! នៅទីនេះ ដ្រೌបទី ក្រឹෂṇā កូនស្រីត្រពុទៈ បានដាក់សំណួររបស់នាងមុខអ្នកទាំងអស់ ហើយកំពុងយំដូចអ្នកគ្មានអ្នកការពារ; តែអ្នកទាំងអស់មិនពិចារណាវាឡើយ។ ដូច្នេះ នៅក្នុងរាជសាលានេះ ធម៌កំពុងត្រូវបន្ថយ។ អ្នកដែលរងរបួស និងឈឺចាប់ មកដល់សភា ដូចភ្លើងបូជាដ៏កំពុងឆេះភ្លឺ; ហើយជាកាតព្វកិច្ចរបស់សមាជិកសភា ត្រូវបន្ធូរនិងដោះស្រាយទុក្ខនោះ ដោយសេចក្តីពិត និងសេចក្តីសុចរិត។»

Verse 61

संकटमें पड़ा हुआ मनुष्य अग्निकी भाँति चिन्तासे प्रज्वलित हुआ सभाकी शरण लेता है, उस समय सभासदगण धर्म और सत्यका आश्रय लेकर अपने वचनोंद्वारा उसे शान्त करते हैं ।। धर्मप्रश्नमतो ब्रूयादार्य: सत्येन मानव: । विब्रूयुस्तत्र तं प्रश्न कामक्रोधबलातिगा:,अतः: श्रेष्ठ मनुष्यको उचित है कि वह धर्मानुकूल प्रश्नको सचाईके साथ उपस्थित करे और सभासदोंको चाहिये कि वे काम-क्रोधके वेगसे ऊपर उठकर उस प्रश्नका ठीक-ठीक विवेचन करें

វិទុរៈមានពាក្យថា៖ មនុស្សម្នាក់ពេលធ្លាក់ក្នុងទុក្ខលំបាក នឹងឆេះដោយក្តីព្រួយបារម្ភដូចភ្លើង ហើយស្វែងរកជម្រកនៅក្នុងសភា។ នៅពេលនោះ សមាជិកសភា ឈរលើធម៌ និងសច្ចៈ បន្ធូរចិត្តគាត់ដោយពាក្យរបស់ខ្លួន។ ដូច្នេះ បុរសមានកិត្តិយសគួរតែដាក់សំណួរអំពីធម៌ដោយស្មោះត្រង់ ហើយអ្នកប្រឹក្សាគួរតែពិនិត្យវាឲ្យត្រឹមត្រូវ ដោយលើកខ្លួនឲ្យលើសពីកម្លាំងតណ្ហា និងកំហឹង។

Verse 62

विकर्णेन यथाप्रज्ञमुक्त: प्रश्नो नराधिपा: । भवन्तो5पि हि त॑ प्रश्न॑ विब्रुवन्तु यथामति,द्रौोपदी-चीर-हरण राजाओ! विकर्णने अपनी बुद्धिके अनुसार इस प्रश्नका उत्तर दिया है, अब आपलोग भी अपनी-अपनी बुद्धिके अनुसार उस प्रश्नका निर्णय करें

ឱ ព្រះរាជាទាំងឡាយ! វិកರ್ಣៈបានឆ្លើយសំណួរនេះតាមប្រាជ្ញារបស់គាត់រួចហើយ។ ឥឡូវនេះ អ្នកទាំងអស់គ្នាក៏គួរតែបង្ហាញតាមការវិនិច្ឆ័យរបស់ខ្លួនៗ ថាតើសេចក្តីសម្រេចត្រឹមត្រូវចំពោះសំណួរនោះជាអ្វី—សំណួរដែលកើតឡើងក្នុងបរិបទនៃការបំពានលើទ្រព្យសម្បត្តិនិងកិត្តិយសរបស់ទ្រោបទី និងការប៉ុនប៉ងដកសម្លៀកបំពាក់របស់នាង។

Verse 63

यो हि प्रश्न॑ न विब्रूयाद्‌ धर्मदर्शी सभां गतः । अनृते या फलावाप्तिस्तस्या: सो<र्थ समश्षुते,जो धर्मज्ञ पुरुष सभामें जाकर वहाँ उपस्थित हुए प्रश्नका उत्तर नहीं देता, वह झूठ बोलनेके आधे फलका भागी होता है

វិទុរៈមានពាក្យថា៖ អ្នកណាដែលអាចមើលឃើញធម៌ ចូលមកក្នុងសភា ហើយមិនឆ្លើយសំណួរដែលបានដាក់មុខគាត់ទេ អ្នកនោះនឹងទទួលបានភាគមួយនៃផលវិបាកដែលជាកម្មផលនៃការនិយាយមិនពិត—ដូចជាចែករំលែកពាក់កណ្តាលផលនៃការកុហក។

Verse 64

यः पुनर्वितथं ब्रूयाद्‌ धर्मदर्शी सभां गत: । अनृतस्य फल कृत्स्नं सम्प्राप्रोतीति निश्चय:,इसी प्रकार जो धर्मज्ञ मानव सभामें जाकर किसी प्रश्नपर झूठा निर्णय देता है, वह निश्चय ही असत्यभाषण-का पूरा फल (दण्ड) पाता है

វិទុរៈប្រកាសថា៖ អ្នកណាដែលដឹងអំពីធម៌ ចូលមកក្នុងសភា ហើយទោះយ៉ាងណាក៏ដោយ និយាយមិនពិត—ផ្តល់សេចក្តីវិនិច្ឆ័យមិនត្រឹមត្រូវលើរឿងមួយ—អ្នកនោះប្រាកដជាទទួលបានផលវិបាកទាំងមូលនៃការនិយាយមិនពិត។

Verse 65

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्‌ । प्रह्नलादस्य च संवादं मुनेराड्धिरसस्य च,इस विषयमें विज्ञपुरुष प्रह्नमाद और अंगिराकुमार मुनि सुधन्वाके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं

នៅក្នុងរឿងនេះផងដែរ បុគ្គលប្រាជ្ញាតែងយកគំរូពីប្រវត្តិដ៏បុរាណមួយ៖ រឿងចាស់ដែលជាសន្ទនារវាង ព្រាហ្លាទៈ និងមុនីមួយរូបនៃវង្សអង្គិរសៈ—ជាឧទាហរណ៍ដែលត្រូវបានលើកឡើង ដើម្បីបំភ្លឺបញ្ហានេះឯង។

Verse 66

प्रह्नादो नाम दैत्येन्द्रस्तस्य पुत्रो विरोचन: । कन्याहेतोराज्धिरसं सुधन्वानमुपाद्रवत्‌,दैत्यराज प्रह्लादके एक पुत्र था विरोचन। उसका केशिनी नामवाली एक कन्याकी प्राप्तिके लिये अंगिराके पुत्र सुधन्वाके साथ विवाद हो गया

វិទុរៈបាននិយាយថា៖ មានមហាក្សត្រអសុរ (ដៃត្យេន្រ្ទ្រ) មួយឈ្មោះ ប្រាហ្លាទៈ; កូនប្រុសរបស់គាត់ឈ្មោះ វិរោចនៈ។ ដើម្បីទទួលបានកញ្ញាម្នាក់ជាភរិយា វិរោចនៈបានចូលទៅក្នុងជម្លោះដ៏សត្រូវ និងវាយប្រហារ សុធន្វានៈ កូនប្រុសរបស់ អង្គិរៈ។

Verse 67

इस प्रकार श्रीमह्ााभारत सभापव॑के अन्तर्गत झ्यूतपर्वमें द्रौपदीप्रश्नविषयक सरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ,अहं ज्यायानहं ज्यायानिति कन्येप्सया तदा । तयोर्देवनमत्रासीत्‌ प्राणयोरिति नः श्रुतम्‌

វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ នៅពេលនោះ ដោយសេចក្តីប្រាថ្នាចង់ឈ្នះកញ្ញា ម្នាក់ៗបានប្រកាសថា «ខ្ញុំលើសគេ! ខ្ញុំលើសគេ!» ដូចដែលយើងបានឮ មានការប្រកួតប្រជែងនៅទីនោះរវាងវីរបុរសទាំងពីរ ដូចជាកំពុងដាក់ជីវិតជាភ្នាល់។

Verse 68

दोनों ही उस कन्याको पानेकी इच्छासे “मैं श्रेष्ठ हूँ, मैं श्रेष्ठ हूँ ऐसा कहने लगे। मेरे सुननेमें आया है कि उन दोनोंने अपनी बात सत्य करनेके लिये प्राणोंकी बाजी लगा दी ।। तयो: प्रश्नविवादो<भूत्‌ प्रह्लादं तावपृच्छताम्‌ | ज्यायान्‌ क आवयोरेक: प्रश्न॑ प्रत्रूहि मा मृषा,श्रेष्ठताके प्रश्कको लेकर जब उनका विवाद बहुत बढ़ गया, तब उन्होंने दैत्यराज प्रह्नमादसे जाकर पूछा--“हम दोनोंमें कौन श्रेष्ठ है? आप इस प्रश्नका ठीक-ठीक उत्तर दीजिये, झूठ न बोलियेगा” द्रौपदी लज्जामें डूबी हुई थर-थर काँपती और पाण्डवोंको पुकारती थी। उस दशामें दुःशासनने उस भरी सभाके बीच उस बेचारी दुःखिया तपस्विनीको घसीटना आरम्भ किया ।। इति श्रीमहा भारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि द्रौपद्याकर्षणेडष्टपष्टितमोडध्याय:

ដោយសេចក្តីប្រាថ្នាចង់បានកញ្ញានោះ ទាំងពីរបាននិយាយថា «ខ្ញុំលើសគេ! ខ្ញុំលើសគេ!» ហើយដូចដែលខ្ញុំបានឮ ពួកគេបានដាក់ជីវិតជាភ្នាល់ ដើម្បីបញ្ជាក់ពាក្យរបស់ខ្លួន។ ពេលជម្លោះសំណួរ-ចម្លើយអំពីភាពលើសគេកាន់តែរីកធំ ពួកគេបានទៅសួរ ព្រាហ្លាទៈ ថា៖ «ក្នុងចំណោមយើងទាំងពីរ អ្នកណាលើសគេ? សូមឆ្លើយតាមពិត កុំកុហកឡើយ»។

Verse 69

स वै विवदनाद्‌ भीत: सुधन्वानं विलोकयन्‌ । त॑ सुधन्वाब्रवीत्‌ क्रुद्धो ब्रह्म॒दण्ड इव ज्वलन्‌,प्रह्नाद उस विवादसे भयभीत हो सुधन्‍्वाकी ओर देखने लगे, तब सुधन्वाने प्रज्वलित ब्रह्मदण्डके समान कुपित होकर कहा--

ព្រាហ្លាទៈភ័យខ្លាចដោយជម្លោះនោះ ហើយបន្តមើលទៅកាន់ សុធន្វានៈ។ តែសុធន្វានៈ កំហឹងឆេះដូចដំបងទណ្ឌកម្មរបស់ ព្រហ្មា បាននិយាយឡើង—

Verse 70

यदि वै वक्ष्यसि मृषा प्रह्लादाथ न वक्ष्यसि । शतधा ते शिरो वज्री वज्नेण प्रहरिष्पति,'प्रह्नाद! यदि तुम इस प्रश्नके उत्तरमें झूठ बोलोगे अथवा मौन रह जाओगे तो वज्रधारी इन्द्र अपने वज्द्वारा तुम्हारे सिरके सैकड़ों टुकड़े कर देगा”

«ប្រាហ្លាទៈ! ប្រសិនបើអ្នកនិយាយកុហកក្នុងចម្លើយ ឬបើអ្នកស្ងៀមមិនឆ្លើយទេ នោះឥន្ទ្រៈ អ្នកកាន់វជ្រៈ នឹងវាយដោយវជ្រៈ ហើយបំបែកក្បាលអ្នកជារយផ្នែក»។

Verse 71

सुधन्वना तथोक्तः सन्‌ व्यथितो<श्वत्थपर्णवत्‌ । जगाम कश्यपं दैत्य: परिप्रष्ठं महौजसम्‌,सुधन्वाके ऐसा कहनेपर प्रह्लाद व्यथित हो पीपलके पत्तेकी तरह काँपने लगे और इसके विषयमें कुछ पूछनेके लिये वे महातेजस्वी कश्यपजीके पास गये

ព្រះហ្រ្លាទ (ដៃត្យ) ត្រូវសុធន្វននិយាយដូច្នោះហើយ ក៏រងទុក្ខសោកយ៉ាងខ្លាំង ញ័រដូចស្លឹកដើមអស្វត្ថៈ។ ដើម្បីសួរឲ្យច្បាស់អំពីរឿងនោះ គាត់បានទៅរកឥសីកശ്യបៈ អ្នកមានឥទ្ធិពល និងពន្លឺតេជៈដ៏មហិមា ដើម្បីសួរព្រះឥសី។

Verse 72

प्रह्माद उवाच त्वं वै धर्मस्य विज्ञाता दैवस्येहासुरस्य च | ब्राह्मणस्य महा भाग धर्मकृच्छूमिदं शूणु,प्रह्नमाद बोले--महाभाग! आप देवताओं, असुरों तथा ब्राह्मणके भी धर्मको जानते हैं। मुझपर एक धर्मसंकट उपस्थित हुआ है, उसे सुनिये

ព្រះហ្រ្លាទបាននិយាយថា៖ «ឱ មហាភាគ! អ្នកជាអ្នកដឹងធម៌ពិតប្រាកដ—ទាំងធម៌របស់ទេវតា របស់អសុរ និងរបស់ព្រះព្រាហ្មណ៍ផង។ ឥឡូវនេះ ខ្ញុំបានជួបវិបត្តិធម៌ដ៏ធ្ងន់ធ្ងរ សូមអនុញ្ញាតឲ្យខ្ញុំប្រាប់ ហើយសូមលោកស្តាប់»។

Verse 73

यो वैप्रश्न॑ न विब्रूयाद्‌ वितथं चैव निर्दिशेत्‌ । के वै तस्य परे लोकास्तन्ममाचक्ष्व पृच्छत:,मैं पूछता हूँ कि जो प्रश्नका उत्तर ही न दे अथवा असत्य उत्तर दे दे, उसे परलोकमें कौन-से लोक प्राप्त होते हैं? यह मुझे बताइये

ព្រះហ្រ្លាទបាននិយាយថា៖ «ខ្ញុំសួរថា អ្នកណាដែលត្រូវសួរហើយមិនឆ្លើយ ឬឆ្លើយបង្ហាញអសច្ចៈដោយចេតនា នោះនៅលោកក្រោយ គាត់នឹងទៅដល់លោកណាខ្លះ? សូមប្រាប់ខ្ញុំ ដ្បិតខ្ញុំកំពុងសួរ»។

Verse 74

कश्यप उवाच जानन्नविन्वुवन्‌ प्रश्नान्‌ कामात्‌ क्रोधाद्‌ भयात्‌ तथा | सहस्र॑ वारुणान्‌ पाशानात्मनि प्रतिमुज्चति,कश्यपजीने कहा--जो जानते हुए भी काम, क्रोध तथा भयसे प्रश्नोंका उत्तर नहीं देता, वह अपने ऊपर वरुणदेवताके सहस्रों पाश डाल लेता है

កश्यបៈបាននិយាយថា៖ «អ្នកណាដែលដឹងហើយ តែដោយកាមៈ ដោយកំហឹង ឬដោយភ័យ មិនឆ្លើយសំណួរ នោះគាត់ដូចជាដាក់ខ្សែចងរបស់វរុណៈរាប់ពាន់លើខ្លួនឯង បង្រួមចងព្រលឹងខ្លួនឯង»។

Verse 75

साक्षी वा विन्लुवन्‌ साक्ष्यं गोकर्णशिथिल श्चरन्‌ । सहस्र॑ वारुणान्‌ पाशानात्मनि प्रतिमुज्चति,जो गवाह गाय-बैलके ढीले-ढाले कानोंकी तरह शिथिल हो दोनों पक्षोंसे सम्बन्ध बनाये रखकर गवाही नहीं देता, वह भी अपनेको वरुणदेवताके सहस्रों पाशोंसे बाँध लेता है

កश्यបៈបាននិយាយថា៖ «សាក្សីណាដែលទន់ខ្សោយ ឡើងៗចុះៗ ដូចគោមានត្រចៀកទ្រេតៗ ហើយព្យាយាមរក្សាសម្ព័ន្ធជាមួយទាំងពីរភាគី ដោយមិនផ្តល់សក្ខីភាពត្រឹមត្រូវ ឬបំភ្លៃសក្ខីភាព នោះក៏ដូចជាចងខ្លួនឯងដោយខ្សែរបស់វរុណៈរាប់ពាន់ដែរ»។

Verse 76

तस्य संवत्सरे पूर्णे पाश एक: प्रमुच्यते । तस्मात्‌ सत्य॑ तु वक्तव्यं जानता सत्यमज्जसा,एक वर्ष पूरा होनेपर उसका एक पाश खुलता है, अतः सच्ची बात जाननेवाले पुरुषको यथार्थरूपसे सत्य ही बोलना चाहिये

ពេលមួយឆ្នាំពេញលេញ នោះខ្សែចងមួយរបស់គាត់ត្រូវបានដោះចេញ។ ដូច្នេះ អ្នកដែលដឹងអ្វីជាសច្ចៈ គួរនិយាយសច្ចៈដោយត្រង់ត្រូវ មិនបំប្លែង មិនបង្វែរ—នេះហើយជាធម៌ដែលត្រូវអនុវត្ត។

Verse 77

विद्धो धर्मो हाधर्मेण सभां यत्रोपपद्यते । न चास्य शल्यं कृन्तन्ति विद्धास्तत्र सभासद:

នៅទីដែលធម៌ត្រូវអធម៌ចាក់ប៉ះ ហើយសភារាជក៏ត្រូវបានប្រជុំឡើងក្រោមរបួសនោះ សមាជិកសភានោះ—ទោះដឹងថាមានរបួស—ក៏មិនកាត់ដកមុតស្រួចចេញ។ ក្នុងសភាបែបនោះ ការស្ងៀមស្ងាត់ទាំងដឹង គឺជាការចូលរួមជាដៃគូ ហើយយុត្តិធម៌នៅតែរងទុក្ខ ព្រោះគ្មាននរណាហ៊ានដកមូលហេតុនៃអំពើខុស។

Verse 78

जहाँ धर्म अधर्मसे विद्ध होकर सभामें उपस्थित होता है, उसके काँटेको उससे बिंधे हुए सभासदलोग नहीं काट पाते (अर्थात्‌ उनको पापका फल भोगना ही पड़ता है) ।। अर्ध हरति वै श्रेष्ठ; पादो भवति कर्तृषु पादश्चैव सभासत्सु ये न निन्दन्ति निन्दितम्‌,सभामें जो अधर्म होता है, उसका आधा भाग स्वयं सभापति ले लेता है, एक चौथाई भाग करनेवालोंको मिलता है और एक चतुर्थाश उन सभासदोंको प्राप्त होता है जो निन्दनीय पुरुषकी निन्दा नहीं करते

នៅពេលធម៌ចូលមកក្នុងសភា ដោយរងរបួស និងត្រូវអធម៌ចាក់ប៉ះ សមាជិកសភានោះមិនអាចកាត់ដកមុតស្រួចដែលជាប់នៅក្នុងវាបានទេ; ដូច្នេះ ពួកគេត្រូវចែករំលែកផលនៃបាបជៀសមិនរួច។ ក្នុងសភាដែលមានអំពើខុស ក្បាលសភាទទួលកំហុសពាក់កណ្តាល; មួយភាគបួនទៅលើអ្នកប្រព្រឹត្ត; ហើយមួយភាគបួនទៅលើសមាជិកសភាដែលមិនបន្ទោសអ្នកគួរត្រូវបន្ទោស។

Verse 79

अनेना भवति श्रेष्ठो मुच्यन्ते च सभासद: । एनो गच्छति कर्तरिं निन्दाहों यत्र निन्द्यते

កាស្យបៈបាននិយាយថា៖ «ដោយការប្រព្រឹត្តបែបនេះ មនុស្សម្នាក់ក្លាយជាអ្នកល្អឥតខ្ចោះក្នុងចំណោមមនុស្សទាំងឡាយ ហើយសមាជិកសភាក៏រួចផុតពីកំហុស។ បាបទៅលើអ្នកប្រព្រឹត្ត; ការរិះគន់ក៏ធ្លាក់ទៅកន្លែងដែលគួរត្រូវរិះគន់ពិតប្រាកដ»។

Verse 80

जिस सभामें निनन्‍्दाके योग्य मनुष्यकी निन्‍दा की जाती है, वहाँ सभापति निष्पाप हो जाता है, सभासद भी पापसे मुक्त हो जाते हैं और सारा पाप करनेवालेको ही लगता है ।। वितथं तु वदेयुरयें धर्म प्रह्मलाद पृच्छते । इष्टापूर्त च ते घ्नन्ति सप्त सप्त परावरान्‌,प्रह्नमाद! जो लोग धर्मविषयक प्रश्न पूछनेवालेको झूठा उत्तर देते हैं, वे अपने इष्टापूर्त धर्मका नाश तो करते ही हैं आगे-पीछेकी सात-सात पीढ़ियोंके भी पुण्योंका वे हनन करते हैं

កាស្យបៈបាននិយាយថា៖ «ក្នុងសភាដែលអ្នកគួរត្រូវបន្ទោសត្រូវបានបន្ទោសតាមពិត ប្រធានសភាមិនមានបាបទេ; សមាជិកសភាក៏រួចផុតពីកំហុស ហើយបាបទាំងមូលធ្លាក់ទៅលើអ្នកប្រព្រឹត្តតែប៉ុណ្ណោះ។ តែអ្នកណាឆ្លើយក្លែងក្លាយចំពោះអ្នកសួរអំពីធម៌—ឱ ព្រាហ្លាទៈ—ពួកគេបំផ្លាញបុណ្យរបស់ខ្លួនដែលបានពីយជ្ញ និងការធ្វើសាធារណប្រយោជន៍ ហើយថែមទាំងបំផ្លាញបុណ្យដែលសន្សំរបស់ជំនាន់ប្រាំពីរមុន និងប្រាំពីរបន្ទាប់ផងដែរ»។

Verse 81

हृतस्वस्य हि यद्‌ दुःखं हतपुत्रस्य चैव यत्‌ । ऋणिन: प्रति यच्चैव स्वार्थाद्‌ भ्रष्टस्य चैव यत्‌

កាស្យបៈ «ទុក្ខរបស់អ្នកដែលទ្រព្យសម្បត្តិត្រូវបានលួចយកទៅ; ទុក្ខរបស់អ្នកដែលកូនប្រុសត្រូវបានសម្លាប់; ការឈឺចាប់ពេលត្រូវប្រឈមមុខនឹងម្ចាស់បំណុល; និងការឈឺចាប់របស់អ្នកដែលបានធ្លាក់ចេញពីផលប្រយោជន៍ និងគោលបំណងដ៏ត្រឹមត្រូវរបស់ខ្លួន—ទាំងនេះគឺជាទុក្ខធ្ងន់ធ្ងរ និងស៊ីសង្វាក់ចិត្ត។»

Verse 82

स्त्रिया: पत्या विहीनाया राज्ञा ग्रस्तस्य चैव यत्‌ । अपुत्रायाश्व यद्‌ दुःखं व्याप्राप्रातस्य चैव यत्‌

កាស្យបៈ «ចូរពិចារណាទុក្ខរបស់ស្ត្រីដែលខ្វះប្តី; ការឈឺចាប់របស់ព្រះរាជាដែលត្រូវគេគ្រប់គ្រង និងត្រូវបង្ខំឲ្យស្ថិតក្រោមអំណាចអ្នកដទៃ; ទុក្ខរបស់ស្ត្រីដែលគ្មានកូនប្រុស; និងទុក្ខរបស់អ្នកដែលខិតខំប្រឹងប្រែង តែបរាជ័យមិនឈានដល់គោលដៅ។»

Verse 83

अध्यूढायाश्व यद्‌ दुःखं साक्षिभिविहतस्य च । एतानि वै समान्याहुर्दु:खानि त्रिदिवेश्वरा:

កាស្យបៈ «ទុក្ខរបស់ស្ត្រីដែលត្រូវបានយកទៅដោយបង្ខំដូចជាកូនក្រមុំ; និងទុក្ខរបស់អ្នកដែលត្រូវគេបំផ្លាញនៅចំពោះមុខសាក្សី—ព្រះអម្ចាស់នៃស្ថានសួគ៌បានប្រកាសថា ទាំងនេះស្មើគ្នាតាមសភាពជាទុក្ខ។»

Verse 84

जिसका सर्वस्व छीन लिया गया हो, उसे जो दुःख होता है, जिसका पुत्र मर गया हो, उसे जो शोक होता है, ऋणग्रस्त और स्वार्थसे वंचित मनुष्यको जो क्लेश होता है, पतिसे विहीन होनेपर स्त्रीको तथा राजाके कोपभाजन मनुष्यको जो कष्ट उठाना पड़ता है, पुत्रहीना नारीको जो संताप होता है, शेरके चंगुलमें फँसे हुए प्राणीको जो व्याकुलता होती है, सौतवाली स्त्रीको जो दुःख होता है, साक्षियोंने जिसे धोखा दिया हो, उस मनुष्यको जो महान्‌ क्लेश होता है--इन सभी प्रकारके दुःखोंको देवताओंने समान बतलाया है || ८१-- ८३ || तानि सर्वाणि दु:खानि प्राप्रोति वितथं ब्रुवन्‌ । समक्षदर्शनात्‌ साक्षी श्रवणाच्चेति धारणात्‌

កាស្យបៈ «អ្នកនិយាយពាក្យកុហក នឹងទទួលរងទុក្ខទាំងអស់នោះ ដែលអ្នកប្រាជ្ញប្រៀបធៀបជាមួយទុក្ខធ្ងន់បំផុតរបស់មនុស្ស។ ព្រោះសាក្សីត្រូវបានបង្កើតឡើងដោយការមើលឃើញដោយផ្ទាល់ និងដោយការស្តាប់; ហើយនៅពេលសក្ខីកម្មនោះត្រូវបានគេគោរព និងយកជាមូលដ្ឋាន ការនិយាយកុហកនៅចំពោះមុខសាក្សី គឺជាបាបធ្ងន់ធ្ងរ ដែលនាំឲ្យអ្នកកុហកទទួលទម្ងន់ទុក្ខទាំងនោះ។»

Verse 85

कश्यपस्य वच: श्र॒त्वा प्रह्नाद: पुत्रमब्रवीत्‌,कश्यपजीकी यह बात सुनकर प्रह्नलादने अपने पुत्रसे कहा--

ព្រាហ្លាទៈ ពេលបានស្តាប់ពាក្យរបស់កាស្យបហើយ ក៏និយាយទៅកាន់កូនប្រុសរបស់ខ្លួន—ដូចជាការបញ្ជូនព្រះបន្ទូល និងភារកិច្ចពីអ្នកចាស់ទៅកាន់អ្នកក្មេង តាមលំដាប់នៃធម៌។

Verse 86

श्रेयान्‌ सुधन्वा त्वत्तो वै मत्त: श्रेयांस्तथाज्िरा: । माता सुधन्वनश्वापि मातृतः श्रेयसी तव । विरोचन सुधन्वायं प्राणानामी श्वरस्तव,“विरोचन! सुधन्वा तुमसे श्रेष्ठ है, उसके पिता अंगिरा मुझसे श्रेष्ठ हैं और सुधन्वाकी माता तुम्हारी मातासे श्रेष्ठ है। अब यह सुधन्वा ही तुम्हारे प्राणोंका स्वामी है!

កាស្យបៈ បានមានព្រះវាចា៖ «សុធន្វា ពិតជាលើសលប់ជាងអ្នក; ហើយឪពុករបស់គាត់ អង្គិរា ក៏លើសលប់ជាងខ្ញុំដែរ។ ម្តាយរបស់សុធន្វា ក៏លើសលប់ជាងម្តាយរបស់អ្នកផង។ ដូច្នេះ ឱ វិរោចនៈ សុធន្វានេះហើយ ជាម្ចាស់លើដង្ហើមជីវិតរបស់អ្នក»។

Verse 87

युधन्वोवाच पुत्रसस्‍्नेहं परित्यज्य यस्त्वं धर्मे व्यवस्थित: । अनुजानामि ते पुत्र जीवत्वेष शतं समा:

យុធន្វា បានមានព្រះវាចា៖ «ព្រោះអ្នកបានបោះបង់សេចក្តីស្រឡាញ់ចំពោះកូន ដែលកើតពីមោទនភាពនៃស្នេហា ហើយបានឈរមាំមួនក្នុងធម៌ ដូច្នេះ ខ្ញុំអនុញ្ញាតឲ្យកូនរបស់អ្នករស់នៅបានពេញមួយរយឆ្នាំ»។

Verse 88

सुधन्वाने कहा--दैत्यराज! तुम पुत्रस्नेहकी परवा न करके जो धर्मपर डटे रह गये, इससे प्रसन्न होकर मैं तुम्हारे पुत्रको यह आज्ञा देता हूँ कि यह सौ वर्षोतक जीवित रहे ।। विदुर उवाच एवं वै परमं धर्म श्रुत्वा सर्वे सभासद: । यथाप्रश्न॑ तु कृष्णाया मन्यध्वं तत्र कि परम्‌,विदुरजी कहते हैं--सभासदो! इस प्रकार इस उत्तम धर्ममय प्रसंगको सुनकर आप सब लोग द्रौपदीके प्रश्नके अनुसार यह बतावें कि उसके सम्बन्धमें आपकी क्‍या मान्यता है?

សុធន្វា បានមានព្រះវាចា៖ «ឱ ព្រះមហាក្សត្រអសុរ! ព្រោះអ្នកមិនខ្វល់ខ្វាយចំពោះស្នេហាកូន ហើយបានឈរមាំមួនលើធម៌ ខ្ញុំសប្បាយចិត្ត ហើយបញ្ជាឲ្យកូនរបស់អ្នករស់នៅរហូតដល់មួយរយឆ្នាំ»។ វិទុរៈ បានមានព្រះវាចា៖ «ឱ សមាជិកសភា! កាលអ្នកទាំងអស់បានស្តាប់រឿងធម៌ដ៏ឧត្តមនេះហើយ សូមឆ្លើយតាមសំណួររបស់ក្រឹෂ್ಣា (ដ្រោបទី) ថា ក្នុងរឿងនេះ អ្នកទាំងអស់មានទស្សនៈយ៉ាងដូចម្តេច? តើមានកាតព្វកិច្ចណាខ្ពស់ជាងការឆ្លើយឲ្យត្រឹមត្រូវ នៅពេលធម៌កំពុងត្រូវសាកល្បង?»

Verse 89

वैशम्पायन उवाच विदुरस्य वच: श्रुत्वा नोचु: किंचन पार्थिवा: । कर्णो दुःशासन त्वाह कृष्णां दासीं गृहान्‌ू नय,वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! विदुरकी यह बात सुनकर भी सब राजालोग कुछ न बोले। उस समय कर्णने दुःशासनसे कहा--“इस दासी द्रौपदीको अपने घर ले जाओ'

វៃសម្បាយនៈ បានមានព្រះវាចា៖ «ឱ ជនមេជ័យ! ទោះបានស្តាប់ពាក្យវិទុរៈហើយ ក៏ព្រះមហាក្សត្រទាំងឡាយមិននិយាយអ្វីសោះ។ នៅពេលនោះ កರ್ಣៈ បាននិយាយទៅកាន់ ទុះសាសនៈ ថា៖ ‘នាំក្រឹෂ್ಣា—ដែលគេហៅថាទាសី—ទៅកាន់បន្ទប់ខាងក្នុង’»។

Verse 90

तां वेपमानां सव्रीडां प्रलपन्ती सम पाण्डवान्‌ | दुःशासन: सभामध्ये विचकर्ष तपस्विनीम्‌

វៃសម្បាយនៈ បានមានព្រះវាចា៖ «នាងញ័រខ្លួន អៀនខ្មាស់ ហើយយំរំលែក សំពះអំពាវនាវទៅកាន់បណ្ឌវៈ។ នៅកណ្ដាលសភារាជ នោះ ទុះសាសនៈ បានអូសនារីសុចរិតនោះចេញមក»។

Verse 843

तस्मात्‌ सत्यं ब्रुवन्‌ साक्षी धर्मार्थाभ्यां न हीयते । झूठ बोलनेवाला मनुष्य उन सभी दु:खोंका भागी होता है। समक्ष दर्शन, श्रवण और धारणसे साक्षी संज्ञा होती है, अतः सत्य बोलनेवाला साक्षी कभी धर्म और अर्थसे वंचित नहीं होता

ដូច្នេះ សាក្សីដែលនិយាយសេចក្តីពិត មិនរអាក់រអួលចេញពីធម៌ និងអត្ថ (សេចក្តីត្រឹមត្រូវ និងសម្បត្តិសមគួរ) ឡើយ។ អ្នកនិយាយកុហក នឹងក្លាយជាអ្នកចែករំលែកទុក្ខទាំងអស់នោះ; ព្រោះពាក្យ “សាក្សី” ត្រូវហៅដូច្នេះ ដោយសារការមើលឃើញដោយផ្ទាល់ ការស្តាប់ និងការចងចាំរក្សាទុក—ហេតុនេះ សាក្សីដែលនិយាយពិត មិនដែលត្រូវដកហូតពីធម៌ និងអត្ថឡើយ។

Frequently Asked Questions

The tension lies between accepting an imposed legal outcome (exile after dyūta) and resisting the attempt to convert that outcome into total moral defeat through public humiliation; the Pāṇḍavas maintain restraint while preserving future claims via witnessed vows.

The chapter underscores that speech can be ethically formative: boast and insult aim to erase the opponent’s dignity, while disciplined speech-as-vow preserves agency, memory, and responsibility, converting suffering into structured intention rather than despair.

No explicit phalaśruti is stated here; the meta-function is narrative-legal—publicly articulated vows operate as a binding framework that later episodes repeatedly recall to measure truthfulness, duty, and the moral weight of promised action.