सोपान-प्रवेश: ‘दर्शन’ से ‘आसक्ति’ और ‘श्रद्धा’ से ‘वर-निश्चय’ तक। बालकाण्ड में भक्ति का जन्म ‘श्रवण–कीर्तन’ से नहीं, ‘साक्षात् रूप-दर्शन’ से भी होता है—नगर-नारी, बालक, मुनि-पत्नी, सबके हृदय में राम-रूप ‘मोहन’ बनकर उतरता है। यह चरण साधक को बताता है कि मुक्ति-मार्ग का प्रथम सोपान है: चित्त का राम में सहज आकृष्ट होना (अनुराग), फिर उसी अनुराग का धर्म-संयम में रूपांतरण (गुरु-आज्ञा, संध्या-वंदन, पुष्प-चयन, पूजा-प्रसंग)।
この一節は、バ―ラカーンダの「甘美なる रस王」の領域に属し、ラーマ・ラクシュマナの都見物、女たちの相互の語らい、そしてシーターのギリジャー(山の娘=パールヴァティー)礼拝が、一つの情の流れに合流する。主 रसはシュリンガーラ(とりわけ「マードゥリヤ=甘美」と「アドブタ」)であるが、その目標は世俗ではない――それは「ルーパ・サマーディ(御姿への三昧)」の序章である。眼が「果を得る」こと、心が「焦がれる」こと、そして「ナーラダの言葉」の想起によって前世の薫習が目覚める。トゥルスィーはここで民衆語の自然な言い回しにより集団心理を織り上げる――「まるで貧者が宝を奪いに走るがごとく」という譬えで都の奔流を示し、「億万のカーマ(愛神)の美を凌ぐ」として御姿の超世性を示す。同時に、師の命、夕べの礼拝(サンディヤー・ヴァンダナ)、御足への奉仕、花の選定、供養の場面は、バクティが感情のみならず規律でもあることを明らかにする。神学的枠組みにおいてこれは、サグナの御姿を媒介としてニルグナへ導く階梯である――姿は心を魅了するが、ついにはその同じ姿が法の確立と自己浄化へと向きを変えさせる。
Verse 460 (चौपाई)
देखन नगरु भूपसुत आए। समाचार पुरबासिन्ह पाए।। धाए धाम काम सब त्यागी। मनहु रंक निधि लूटन लागी।। निरखि सहज सुंदर दोउ भाई। होहिं सुखी लोचन फल पाई।। जुबतीं भवन झरोखन्हि लागीं। निरखहिं राम रूप अनुरागीं।। कहहिं परसपर बचन सप्रीती। सखि इन्ह कोटि काम छबि जीती।। सुर नर असुर नाग मुनि माहीं। सोभा असि कहुँ सुनिअति नाहीं।। बिष्नु चारि भुज बिघि मुख चारी। बिकट बेष मुख पंच पुरारी।। अपर देउ अस कोउ न आही। यह छबि सखि पटतरिअ जाही।।
Verse 461 (दोहा/सोरठा)
बय किसोर सुषमा सदन स्याम गौर सुख घाम। अंग अंग पर वारिअहिं कोटि कोटि सत काम।।220।।
Verse 462 (चौपाई)
कहहु सखी अस को तनुधारी। जो न मोह यह रूप निहारी।। कोउ सप्रेम बोली मृदु बानी। जो मैं सुना सो सुनहु सयानी।। ए दोऊ दसरथ के ढोटा। बाल मरालन्हि के कल जोटा।। मुनि कौसिक मख के रखवारे। जिन्ह रन अजिर निसाचर मारे।। स्याम गात कल कंज बिलोचन। जो मारीच सुभुज मदु मोचन।। कौसल्या सुत सो सुख खानी। नामु रामु धनु सायक पानी।। गौर किसोर बेषु बर काछें। कर सर चाप राम के पाछें।। लछिमनु नामु राम लघु भ्राता। सुनु सखि तासु सुमित्रा माता।।
Verse 463 (दोहा/सोरठा)
बिप्रकाजु करि बंधु दोउ मग मुनिबधू उधारि। आए देखन चापमख सुनि हरषीं सब नारि।।221।।
Verse 464 (चौपाई)
देखि राम छबि कोउ एक कहई। जोगु जानकिहि यह बरु अहई।। जौ सखि इन्हहि देख नरनाहू। पन परिहरि हठि करइ बिबाहू।। कोउ कह ए भूपति पहिचाने। मुनि समेत सादर सनमाने।। सखि परंतु पनु राउ न तजई। बिधि बस हठि अबिबेकहि भजई।। कोउ कह जौं भल अहइ बिधाता। सब कहँ सुनिअ उचित फलदाता।। तौ जानकिहि मिलिहि बरु एहू। नाहिन आलि इहाँ संदेहू।। जौ बिधि बस अस बनै सँजोगू। तौ कृतकृत्य होइ सब लोगू।। सखि हमरें आरति अति तातें। कबहुँक ए आवहिं एहि नातें।।
Verse 465 (दोहा/सोरठा)
नाहिं त हम कहुँ सुनहु सखि इन्ह कर दरसनु दूरि। यह संघटु तब होइ जब पुन्य पुराकृत भूरि।।222।।
Verse 466 (चौपाई)
बोली अपर कहेहु सखि नीका। एहिं बिआह अति हित सबहीं का।। कोउ कह संकर चाप कठोरा। ए स्यामल मृदुगात किसोरा।। सबु असमंजस अहइ सयानी। यह सुनि अपर कहइ मृदु बानी।। सखि इन्ह कहँ कोउ कोउ अस कहहीं। बड़ प्रभाउ देखत लघु अहहीं।। परसि जासु पद पंकज धूरी। तरी अहल्या कृत अघ भूरी।। सो कि रहिहि बिनु सिवधनु तोरें। यह प्रतीति परिहरिअ न भोरें।। जेहिं बिरंचि रचि सीय सँवारी। तेहिं स्यामल बरु रचेउ बिचारी।। तासु बचन सुनि सब हरषानीं। ऐसेइ होउ कहहिं मुदु बानी।।
Verse 467 (दोहा/सोरठा)
हियँ हरषहिं बरषहिं सुमन सुमुखि सुलोचनि बृंद। जाहिं जहाँ जहँ बंधु दोउ तहँ तहँ परमानंद।।223।।
Verse 468 (चौपाई)
पुर पूरब दिसि गे दोउ भाई। जहँ धनुमख हित भूमि बनाई।। अति बिस्तार चारु गच ढारी। बिमल बेदिका रुचिर सँवारी।। चहुँ दिसि कंचन मंच बिसाला। रचे जहाँ बेठहिं महिपाला।। तेहि पाछें समीप चहुँ पासा। अपर मंच मंडली बिलासा।। कछुक ऊँचि सब भाँति सुहाई। बैठहिं नगर लोग जहँ जाई।। तिन्ह के निकट बिसाल सुहाए। धवल धाम बहुबरन बनाए।। जहँ बैंठैं देखहिं सब नारी। जथा जोगु निज कुल अनुहारी।। पुर बालक कहि कहि मृदु बचना। सादर प्रभुहि देखावहिं रचना।।
Verse 469 (दोहा/सोरठा)
सब सिसु एहि मिस प्रेमबस परसि मनोहर गात। तन पुलकहिं अति हरषु हियँ देखि देखि दोउ भ्रात।।224।।
Verse 470 (चौपाई)
सिसु सब राम प्रेमबस जाने। प्रीति समेत निकेत बखाने।। निज निज रुचि सब लेंहिं बोलाई। सहित सनेह जाहिं दोउ भाई।। राम देखावहिं अनुजहि रचना। कहि मृदु मधुर मनोहर बचना।। लव निमेष महँ भुवन निकाया। रचइ जासु अनुसासन माया।। भगति हेतु सोइ दीनदयाला। चितवत चकित धनुष मखसाला।। कौतुक देखि चले गुरु पाहीं। जानि बिलंबु त्रास मन माहीं।। जासु त्रास डर कहुँ डर होई। भजन प्रभाउ देखावत सोई।। कहि बातें मृदु मधुर सुहाईं। किए बिदा बालक बरिआई।।
Verse 471 (दोहा/सोरठा)
सभय सप्रेम बिनीत अति सकुच सहित दोउ भाइ। गुर पद पंकज नाइ सिर बैठे आयसु पाइ।।225।।
Verse 472 (चौपाई)
निसि प्रबेस मुनि आयसु दीन्हा। सबहीं संध्याबंदनु कीन्हा।। कहत कथा इतिहास पुरानी। रुचिर रजनि जुग जाम सिरानी।। मुनिबर सयन कीन्हि तब जाई। लगे चरन चापन दोउ भाई।। जिन्ह के चरन सरोरुह लागी। करत बिबिध जप जोग बिरागी।। तेइ दोउ बंधु प्रेम जनु जीते। गुर पद कमल पलोटत प्रीते।। बारबार मुनि अग्या दीन्ही। रघुबर जाइ सयन तब कीन्ही।। चापत चरन लखनु उर लाएँ। सभय सप्रेम परम सचु पाएँ।। पुनि पुनि प्रभु कह सोवहु ताता। पौढ़े धरि उर पद जलजाता।।
Verse 473 (दोहा/सोरठा)
उठे लखन निसि बिगत सुनि अरुनसिखा धुनि कान।। गुर तें पहिलेहिं जगतपति जागे रामु सुजान।।226।।
Verse 474 (चौपाई)
सकल सौच करि जाइ नहाए। नित्य निबाहि मुनिहि सिर नाए।। समय जानि गुर आयसु पाई। लेन प्रसून चले दोउ भाई।। भूप बागु बर देखेउ जाई। जहँ बसंत रितु रही लोभाई।। लागे बिटप मनोहर नाना। बरन बरन बर बेलि बिताना।। नव पल्लव फल सुमान सुहाए। निज संपति सुर रूख लजाए।। चातक कोकिल कीर चकोरा। कूजत बिहग नटत कल मोरा।। मध्य बाग सरु सोह सुहावा। मनि सोपान बिचित्र बनावा।। बिमल सलिलु सरसिज बहुरंगा। जलखग कूजत गुंजत भृंगा।।
Verse 475 (दोहा/सोरठा)
बागु तड़ागु बिलोकि प्रभु हरषे बंधु समेत। परम रम्य आरामु यहु जो रामहि सुख देत।।227।।
Verse 476 (चौपाई)
चहुँ दिसि चितइ पूँछि मालिगन। लगे लेन दल फूल मुदित मन।। तेहि अवसर सीता तहँ आई। गिरिजा पूजन जननि पठाई।। संग सखीं सब सुभग सयानी। गावहिं गीत मनोहर बानी।। सर समीप गिरिजा गृह सोहा। बरनि न जाइ देखि मनु मोहा।। मज्जनु करि सर सखिन्ह समेता। गई मुदित मन गौरि निकेता।। पूजा कीन्हि अधिक अनुरागा। निज अनुरूप सुभग बरु मागा।। एक सखी सिय संगु बिहाई। गई रही देखन फुलवाई।। तेहि दोउ बंधु बिलोके जाई। प्रेम बिबस सीता पहिं आई।।
Verse 477 (दोहा/सोरठा)
तासु दसा देखि सखिन्ह पुलक गात जलु नैन। कहु कारनु निज हरष कर पूछहि सब मृदु बैन।।228।।
Verse 478 (चौपाई)
देखन बागु कुअँर दुइ आए। बय किसोर सब भाँति सुहाए।। स्याम गौर किमि कहौं बखानी। गिरा अनयन नयन बिनु बानी।। सुनि हरषीं सब सखीं सयानी। सिय हियँ अति उतकंठा जानी।। एक कहइ नृपसुत तेइ आली। सुने जे मुनि सँग आए काली।। जिन्ह निज रूप मोहनी डारी। कीन्ह स्वबस नगर नर नारी।। बरनत छबि जहँ तहँ सब लोगू। अवसि देखिअहिं देखन जोगू।। तासु वचन अति सियहि सुहाने। दरस लागि लोचन अकुलाने।। चली अग्र करि प्रिय सखि सोई। प्रीति पुरातन लखइ न कोई।।
Verse 479 (दोहा/सोरठा)
सुमिरि सीय नारद बचन उपजी प्रीति पुनीत।। चकित बिलोकति सकल दिसि जनु सिसु मृगी सभीत।।229।।
परंपरागत मान्यता में यह ‘राम-रूप-दर्शन’ और ‘सीता-राम विवाह-हेतु पुण्य-संयोग’ का पाठ है: इसे श्रद्धा से पढ़ने/सुनने से मन में पवित्र अनुराग, विवाह/गृहस्थ-धर्म में सौम्यता, और गुरु-सेवा/नित्यकर्म में स्थिरता आती है—अर्थात् चित्त ‘विषय-मोह’ से हटकर ‘रूप-भक्ति’ में लगने लगता है।
लोक-प्रचलन में ‘सीता-राम’ नाम-संपुट (जैसे: ‘सीता राम, सीता राम’ या ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’) को चौपाई/दोहा के अंत में जोड़कर जप-धारा बनाई जाती है; विवाह-प्रसंगों में विशेषतः ‘जय जय सीताराम’ संपुट का प्रयोग भी मिलता है।
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