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साधना-सीढ़ी का प्रथम सोपान: ‘श्रवण → संग → संस्कार’ से भक्ति का जन्म। बालकाण्ड में राम-लीला का प्रवेश ‘यज्ञ-रक्षा’ और ‘अहल्या-उद्धार’ जैसे प्रसंगों द्वारा होता है—जहाँ भय (असुर-उत्पात) का शमन, पाप/शाप (अहल्या) का विमोचन, और दर्शन-लालसा (मिथिला-नगर) का सौंदर्य-आस्वाद—तीनों मिलकर जिज्ञासु चित्त को शरणागति की ओर मोड़ते हैं। यह चरण साधक के भीतर ‘निर्भयता’ और ‘अनुग्रह’ का संस्कार बैठाता है: प्रभु की निकटता केवल राजसत्ता नहीं, करुणा-प्रधान धर्म-सेतु है।
この一節では、バ―ラカーンダの「ヴィーラ(勇)―カルナ(悲)―アドブタ(驚異)」の三 रसが主となる。冒頭、ヴィシュヴァーミトラの祭祀(ヤジュニャ)を守護するためのラーマの無畏の出立と、マーリーチ/スバーフの討伐がヴィーラ रसを確立するが、その勇は「ダルマ護持」のためであって、我慢の誇示ではない。続くアハリヤーの段は、悲と恩寵の中心となる。呪縛に沈む意識(アハリヤー)が主の御足の塵の触れによって顕れ、讃嘆する――これは「恩寵を主とする解脱論」である。さらにミティラー都の描写は、アドブタ/シュリンガーラの香りを帯びた美によって心を浄め、ジャナカのラーマ拝見は「愛の昂揚」へと結実する。原理的にトゥルスィーは、サグナのリーラーをニルグナ・ブラフマンの親しみやすい顕現として示す――同じブラフマンが「二つの装いを帯び」幼子の姿で来現するのである。かくして本段は、聴聞から愛へ、愛から帰依(シャラナーガティ)へというバ―ラカーンダの階梯作用を完遂する。
Verse 440 (चौपाई)
प्रात कहा मुनि सन रघुराई। निर्भय जग्य करहु तुम्ह जाई।। होम करन लागे मुनि झारी। आपु रहे मख कीं रखवारी।। सुनि मारीच निसाचर क्रोही। लै सहाय धावा मुनिद्रोही।। बिनु फर बान राम तेहि मारा। सत जोजन गा सागर पारा।। पावक सर सुबाहु पुनि मारा। अनुज निसाचर कटकु सँघारा।। मारि असुर द्विज निर्मयकारी। अस्तुति करहिं देव मुनि झारी।। तहँ पुनि कछुक दिवस रघुराया। रहे कीन्हि बिप्रन्ह पर दाया।। भगति हेतु बहु कथा पुराना। कहे बिप्र जद्यपि प्रभु जाना।। तब मुनि सादर कहा बुझाई। चरित एक प्रभु देखिअ जाई।। धनुषजग्य मुनि रघुकुल नाथा। हरषि चले मुनिबर के साथा।। आश्रम एक दीख मग माहीं। खग मृग जीव जंतु तहँ नाहीं।। पूछा मुनिहि सिला प्रभु देखी। सकल कथा मुनि कहा बिसेषी।।
朝、ラグの主は聖者に言った。「恐れずに供犠を行いに行ってください。」聖者は火の供物を始め、彼自身は供犠の守護者として留まった。これを聞いて、怒れる悪魔マーリーチャはスバーフを味方として連れ、聖者の敵として駆けた。ラーマは羽の必要のない矢で彼を打ち倒した。彼は百ヨージャナ先、海の向こうに落ちた。それから火の矢を放ちスバーフを殺し、弟は悪魔の軍勢を破壊した。悪魔を殺して、二度生まれた聖者たちは浄化の儀式を行った。神々と聖者は称賛を捧げた。そこで数日間、ラグの主は留まり、バラモンに親切を示した。主はすべてを知っていたが、バラモンは献身のために多くの古い物語を語った。それから聖者は敬意を持って説明し言った。「さあ、主のもう一つの偉業を見に行きましょう。」「聖者の弓の供犠があります、ラグの家系の主よ。」喜んで彼らは偉大な聖者と共に出発した。途中で隠遁所を見た。鳥、鹿、生き物、生物はいなかった。主は石を見て聖者に尋ねた。聖者は詳細に全ての物語を語った。
Verse 441 (दोहा/सोरठा)
गौतम नारि श्राप बस उपल देह धरि धीर। चरन कमल रज चाहति कृपा करहु रघुबीर।।210।।
ガウタマの妻は、呪いを受けて石の身体をとりました。彼女は蓮の足の塵を渇望しています。ラグヴィーラよ、慈悲を示してください。
Verse 442 (छंद)
परसत पद पावन सोक नसावन प्रगट भई तपपुंज सही। देखत रघुनायक जन सुख दायक सनमुख होइ कर जोरि रही।। अति प्रेम अधीरा पुलक सरीरा मुख नहिं आवइ बचन कही। अतिसय बड़भागी चरनन्हि लागी जुगल नयन जलधार बही।। धीरजु मन कीन्हा प्रभु कहुँ चीन्हा रघुपति कृपाँ भगति पाई। अति निर्मल बानीं अस्तुति ठानी ग्यानगम्य जय रघुराई।। मै नारि अपावन प्रभु जग पावन रावन रिपु जन सुखदाई। राजीव बिलोचन भव भय मोचन पाहि पाहि सरनहिं आई।। मुनि श्राप जो दीन्हा अति भल कीन्हा परम अनुग्रह मैं माना। देखेउँ भरि लोचन हरि भवमोचन इहइ लाभ संकर जाना।। बिनती प्रभु मोरी मैं मति भोरी नाथ न मागउँ बर आना। पद कमल परागा रस अनुरागा मम मन मधुप करै पाना।। जेहिं पद सुरसरिता परम पुनीता प्रगट भई सिव सीस धरी। सोइ पद पंकज जेहि पूजत अज मम सिर धरेउ कृपाल हरी।। एहि भाँति सिधारी गौतम नारी बार बार हरि चरन परी। जो अति मन भावा सो बरु पावा गै पतिलोक अनंद भरी।।
彼が足に触れると、浄化する者、悲しみを破壊する者となり、彼女が耐えた蓄積された苦行が現れました。ラグの主、僕に喜びを与える者を見て、彼女は掌を合わせて彼の前に立った。愛に圧倒され、身体は震え、彼女は言葉を話すことができなかった。最も幸運な者として、彼は彼の足にしがみつき、両目から涙の流れが流れた。彼女は心を落ち着かせ、主を認識し、ラグの主の恵みによって献身を得た。最も純粋な言葉で称賛を捧げた。ラグの主に勝利あれ、知識だけが到達できるお方。「私は罪深い女です。主は世界の浄化者、僕に喜びを与える者、ラーヴァナの敵です。蓮の目を持つお方、存在の恐怖からの解放者、私を守ってください、守ってください。私はあなたの避難所に来ました。聖者が私に与えた呪いは最も良かったです。私はそれを最高の恵みと考えます。私はハリ、存在からの解放者を目いっぱい見ました。この利益をシヴァの贈り物と考えます。これが私の祈りです、主よ。私は単純な心を持っています。他の恩恵を求めません、主よ。私の心が蜂のように、あなたの蓮の足の花粉と甘露を飲みますように。最も聖なるガンガーが運んだ足、彼女が現れたときシヴァが頭に載せた足。ブラフマーが礼拝する蓮の足を、慈悲深いハリが私の頭に置いてくださいますように。こうしてガウタマの妻は去り、何度もハリの足にひれ伏した。彼女は心が最も望んだものを得て、夫の世界に行き、喜びに満たされた。
Verse 443 (दोहा/सोरठा)
अस प्रभु दीनबंधु हरि कारन रहित दयाल। तुलसिदास सठ तेहि भजु छाड़ि कपट जंजाल।।211।।
このように主は、謙虚な者の友であり、ハリであり、慈悲深く、私利私欲の動機から自由なお方です。トゥルシーダースは言います、おお愚かな者よ、彼を礼拝し、欺瞞の網を捨て去りなさい。
Verse 444 (चौपाई)
चले राम लछिमन मुनि संगा। गए जहाँ जग पावनि गंगा।। गाधिसूनु सब कथा सुनाई। जेहि प्रकार सुरसरि महि आई।। तब प्रभु रिषिन्ह समेत नहाए। बिबिध दान महिदेवन्हि पाए।। हरषि चले मुनि बृंद सहाया। बेगि बिदेह नगर निअराया।। पुर रम्यता राम जब देखी। हरषे अनुज समेत बिसेषी।। बापीं कूप सरित सर नाना। सलिल सुधासम मनि सोपाना।। गुंजत मंजु मत्त रस भृंगा। कूजत कल बहुबरन बिहंगा।। बरन बरन बिकसे बन जाता। त्रिबिध समीर सदा सुखदाता।।
ラーマとラクシュマナは聖者と共に出発し、世界を清めるガンガーが流れる場所へ向かった。ガディの息子は、神聖な川がどのように地上に来たか、そのすべての物語を語った。それから主は聖者たちと共に沐浴し、大地の主たちに様々な贈り物を与えた。彼らは喜びに満ちて、聖者たちの群れに助けられて出発し、すぐにヴィデーハの都に近づいた。ラーマが都の美しさを見たとき、彼は喜び、弟も特別な喜びを感じた。そこには多くの種類の池、井戸、川、湖があり、その水は甘露のようで、宝石で飾られた階段があった。蜂は蜜に酔って甘く唸り、多くの色の鳥たちは歌った。森はあらゆる種類の木々で咲き誇り、三種のそよ風は常に幸福をもたらした。
Verse 445 (दोहा/सोरठा)
सुमन बाटिका बाग बन बिपुल बिहंग निवास। फूलत फलत सुपल्लवत सोहत पुर चहुँ पास।।212।।
そこには花園、果樹園、森があり、数え切れない鳥たちの住処であった。花咲き、実を結び、新鮮な葉で覆われ、都は四方に輝いていた。
Verse 446 (चौपाई)
बनइ न बरनत नगर निकाई। जहाँ जाइ मन तहँइँ लोभाई।। चारु बजारु बिचित्र अँबारी। मनिमय बिधि जनु स्वकर सँवारी।। धनिक बनिक बर धनद समाना। बैठ सकल बस्तु लै नाना।। चौहट सुंदर गलीं सुहाई। संतत रहहिं सुगंध सिंचाई।। मंगलमय मंदिर सब केरें। चित्रित जनु रतिनाथ चितेरें।। पुर नर नारि सुभग सुचि संता। धरमसील ग्यानी गुनवंता।। अति अनूप जहँ जनक निवासू। बिथकहिं बिबुध बिलोकि बिलासू।। होत चकित चित कोट बिलोकी। सकल भुवन सोभा जनु रोकी।।
都の美しさは言葉で表すことができない。心が向くところどこでも、そこで心は魅了される。魅力的な市場は不思議な館で満たされ、まるでヴィシュヌ神自らが自らの住処を飾ったかのようであった。裕福な商人たちは、富の神に等しく、あらゆる種類の商品を並べて座っていた。美しい交差点と愛らしい通りは、常に香りで満たされていた。すべての家は吉祥であり、まるで愛の神自らが描いたかのようであった。都の男女は美しく、清らかで、徳があり、正義を重んじ、知恵と功徳に満ちていた。最も驚くべきものはジャナカが住む宮殿であり、神々でさえその壮麗さを見て当惑した。心はその砦を見て驚き、すべての世界の美しさを留めているかのようであった。
Verse 447 (दोहा/सोरठा)
धवल धाम मनि पुरट पट सुघटित नाना भाँति। सिय निवास सुंदर सदन सोभा किमि कहि जाति।।213।।
白い館、金の門、そして多くの種類の幕が美しく配置されていた。シーターの愛ある住処の美しさを、私はどのように語ることができようか。
Verse 448 (चौपाई)
सुभग द्वार सब कुलिस कपाटा। भूप भीर नट मागध भाटा।। बनी बिसाल बाजि गज साला। हय गय रथ संकुल सब काला।। सूर सचिव सेनप बहुतेरे। नृपगृह सरिस सदन सब केरे।। पुर बाहेर सर सारित समीपा। उतरे जहँ तहँ बिपुल महीपा।। देखि अनूप एक अँवराई। सब सुपास सब भाँति सुहाई।। कौसिक कहेउ मोर मनु माना। इहाँ रहिअ रघुबीर सुजाना।। भलेहिं नाथ कहि कृपानिकेता। उतरे तहँ मुनिबृंद समेता।। बिस्वामित्र महामुनि आए। समाचार मिथिलापति पाए।।
壮麗な門は金剛石の扉を持ち、王たち、吟遊詩人、賛美歌の歌い手、楽師たちが控えていた。馬と象のための壮大な厩舎があり、常に馬、牛、戦車で満たされていた。戦士、大臣、将軍は多く、すべての家は王宮のようであった。都の近くには湖と川があり、多くの王たちがそこに降り立った。比類なき美しい林を見て、すべての者が喜んだ。クシカは言った、「私の心は決まりました。ここに賢きラグナータが留まってください」。「よくぞ言われました、主よ」と言って、慈悲の住処は聖者たちと共にそこに降り立った。大聖者ヴィシュヴァーミトラが到着し、ミティラーの王はその知らせを受けた。
Verse 449 (दोहा/सोरठा)
संग सचिव सुचि भूरि भट भूसुर बर गुर ग्याति। चले मिलन मुनिनायकहि मुदित राउ एहि भाँति।।214।।
大臣、清らかな多くの戦士、優れたバラモン、学識ある祭司を伴い、王は喜びに満ちて聖者の主に会うために出発した。
Verse 450 (चौपाई)
कीन्ह प्रनामु चरन धरि माथा। दीन्हि असीस मुदित मुनिनाथा।। बिप्रबृंद सब सादर बंदे। जानि भाग्य बड़ राउ अनंदे।। कुसल प्रस्न कहि बारहिं बारा। बिस्वामित्र नृपहि बैठारा।। तेहि अवसर आए दोउ भाई। गए रहे देखन फुलवाई।। स्याम गौर मृदु बयस किसोरा। लोचन सुखद बिस्व चित चोरा।। उठे सकल जब रघुपति आए। बिस्वामित्र निकट बैठाए।। भए सब सुखी देखि दोउ भ्राता। बारि बिलोचन पुलकित गाता।। मूरति मधुर मनोहर देखी। भयउ बिदेहु बिदेहु बिसेषी।।
彼は頭を彼らの足に置いて礼拝し、喜びに満ちた聖者の主は彼に祝福を与えた。すべてのバラモンの群れは敬意をもって礼拝し、大きな幸運を知って、王は喜びに満ちた。安否を何度も尋ねた後、ヴィシュヴァーミトラは王を座らせた。その時、二人の兄弟が到着した。彼らは花咲く林を見に行き、そこに留まっていた。暗い肌と白い肌、年若く、その目は喜びをもたらし、世界の心を盗んだ。ラグの主が来たとき、すべての者が立ち上がり、ヴィシュヴァーミトラは彼らを自分の近くに座らせた。すべての者は二人の兄弟を見て幸せになり、目は涙で満たされ、体は震えた。彼らの甘く魅力的な姿を見て、ヴィデーハの王は特に彼らが誰であるかを知りたがった。
Verse 451 (दोहा/सोरठा)
प्रेम मगन मनु जानि नृपु करि बिबेकु धरि धीर। बोलेउ मुनि पद नाइ सिरु गदगद गिरा गभीर।।215।।
王の心が愛に浸っていることを知りながらも、識別力を働かせ、落ち着きを保ち、彼は聖者の足に頭を下げ、感情に満ちた深い声で語った。
Verse 452 (चौपाई)
कहहु नाथ सुंदर दोउ बालक। मुनिकुल तिलक कि नृपकुल पालक।। ब्रह्म जो निगम नेति कहि गावा। उभय बेष धरि की सोइ आवा।। सहज बिरागरुप मनु मोरा। थकित होत जिमि चंद चकोरा।। ताते प्रभु पूछउँ सतिभाऊ। कहहु नाथ जनि करहु दुराऊ।। इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा। बरबस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा।। कह मुनि बिहसि कहेहु नृप नीका। बचन तुम्हार न होइ अलीका।। ए प्रिय सबहि जहाँ लगि प्रानी। मन मुसुकाहिं रामु सुनि बानी।। रघुकुल मनि दसरथ के जाए। मम हित लागि नरेस पठाए।।
主よ、この二人の美しい少年は誰ですか。聖者の家系の飾りですか、それとも王家の守り手ですか。ヴェーダが「これではなく、あれでもない」と宣言するブラフマンでしょうか。彼が二つの姿をとって来られたのですか。私の心は自然に離欲に傾いていますが、月を慕うチャコラ鳥のように疲れてきます。ですから、主よ、誠心誠意お尋ねします。教えてください、真実を隠さないでください。彼らを見て、私はあまりにも愛に満たされ、心はブラフマンの至福さえ捨ててしまいました。聖者は微笑んで言った、「王よ、良いことを尋ねなさい。あなたの言葉は無駄にならない」。この二人はすべての生き物に愛されている。ラーマは彼らの言葉を聞いて心の中で微笑んだ。彼らはラグの家系の宝石、ダシャラタに生まれ、王は私のために彼らをここに送ったのだ。
Verse 453 (दोहा/सोरठा)
रामु लखनु दोउ बंधुबर रूप सील बल धाम। मख राखेउ सबु साखि जगु जिते असुर संग्राम।।216।।
ラーマとラクシュマナ、この二人の優れた兄弟は、美しさ、徳、そして力の宿る所であります。彼らは供儀を守り、戦いにおいて悪魔を征服した時、全世界がその証人となりました。
Verse 454 (चौपाई)
मुनि तव चरन देखि कह राऊ। कहि न सकउँ निज पुन्य प्राभाऊ।। सुंदर स्याम गौर दोउ भ्राता। आनँदहू के आनँद दाता।। इन्ह कै प्रीति परसपर पावनि। कहि न जाइ मन भाव सुहावनि।। सुनहु नाथ कह मुदित बिदेहू। ब्रह्म जीव इव सहज सनेहू।। पुनि पुनि प्रभुहि चितव नरनाहू। पुलक गात उर अधिक उछाहू।। म्रुनिहि प्रसंसि नाइ पद सीसू। चलेउ लवाइ नगर अवनीसू।। सुंदर सदनु सुखद सब काला। तहाँ बासु लै दीन्ह भुआला।। करि पूजा सब बिधि सेवकाई। गयउ राउ गृह बिदा कराई।।
聖者よ、あなたの御足を拝し、王は自らの功徳の果実を述べることができないと申します。この二人の兄弟、暗き色と明き色の美しき者たちは、喜びそのものに喜びを与える方々です。彼らの相互の愛は清めをもたらし、その心への心地よい影響は言葉に表せません。主よ、聞いてくださいとヴィデーハの王は喜びをもって申します。彼らはブラフマンと魂のように、自然な愛情を持ちます。王は何度も何度も主を見つめ、その身は震え、心は喜びで満ち溢れました。聖者を讃え、その足に頭を垂れ、王は都へと向けて出発しました。彼は美しい館を与え、常に快適な住まいを提供し、彼らはそこに留まり、彼は従者を配しました。彼らを礼拝し、あらゆる奉仕を提供した後、王は別れを告げ、自らの家へと帰りました。
Verse 455 (दोहा/सोरठा)
रिषय संग रघुबंस मनि करि भोजनु बिश्रामु। बैठे प्रभु भ्राता सहित दिवसु रहा भरि जामु।।217।।
聖者たちと共に食事と休息をとった後、ラグ族の宝石である主は兄弟たちと共に座り、一日は十分に過ぎていきました。
Verse 456 (चौपाई)
लखन हृदयँ लालसा बिसेषी। जाइ जनकपुर आइअ देखी।। प्रभु भय बहुरि मुनिहि सकुचाहीं। प्रगट न कहहिं मनहिं मुसुकाहीं।। राम अनुज मन की गति जानी। भगत बछलता हिंयँ हुलसानी।। परम बिनीत सकुचि मुसुकाई। बोले गुर अनुसासन पाई।। नाथ लखनु पुरु देखन चहहीं। प्रभु सकोच डर प्रगट न कहहीं।। जौं राउर आयसु मैं पावौं। नगर देखाइ तुरत लै आवौ।। सुनि मुनीसु कह बचन सप्रीती। कस न राम तुम्ह राखहु नीती।। धरम सेतु पालक तुम्ह ताता। प्रेम बिबस सेवक सुखदाता।।
ラクシュマナの心に特別な憧れが生じました。ジャナクプルに行って見たいと。しかし主への恐れと聖者の前での恥じらいから、彼はその望みを声には出さず、心の中で微笑むのみでした。ラーマは弟の心の状態を知り、信者への優しき愛で心は喜びました。彼は非常に謙虚に、恥じらいながら微笑み、師の許可を得て語りました。主よ、ラクシュマナは都を見たいと望んでいます。しかし恐れと恥じらいから、あなたの前では公然とは申しません。もしあなたの命令をいただければ、すぐに彼を連れて都を見せ、連れ戻します。これを聞いて、聖者の主は愛に満ちた言葉で申しました。ラーマがあなたを正義の道に留めないことがありましょうか。あなたはダルマの橋の守護者、我が子よ。愛ゆえに、しもべは主人に幸福をもたらします。
Verse 457 (दोहा/सोरठा)
जाइ देखी आवहु नगरु सुख निधान दोउ भाइ। करहु सुफल सब के नयन सुंदर बदन देखाइ।।218।।
行って、都を見て戻ってきなさい、二人の兄弟よ、あなたたちは喜びの宝庫です。あなたたちの美しい御顔を示し、すべての人の目に成就をもたらしてください。
Verse 458 (चौपाई)
मुनि पद कमल बंदि दोउ भ्राता। चले लोक लोचन सुख दाता।। बालक बृंदि देखि अति सोभा। लगे संग लोचन मनु लोभा।। पीत बसन परिकर कटि भाथा। चारु चाप सर सोहत हाथा।। तन अनुहरत सुचंदन खोरी। स्यामल गौर मनोहर जोरी।। केहरि कंधर बाहु बिसाला। उर अति रुचिर नागमनि माला।। सुभग सोन सरसीरुह लोचन। बदन मयंक तापत्रय मोचन।। कानन्हि कनक फूल छबि देहीं। चितवत चितहि चोरि जनु लेहीं।। चितवनि चारु भृकुटि बर बाँकी। तिलक रेखा सोभा जनु चाँकी।।
聖者の蓮の御足に拝礼し、二人の兄弟は出発しました、彼らは世界の目に喜びを与える方々です。その並外れた美しさを見て、少年たちの群れがついて歩き始め、その心はその光景に魅了されました。黄色い衣をまとい、腰には矢筒、手には美しい弓と矢を持って、彼らは輝きました。彼らが通った所、白檀のペーストさえも彼らの体に従うようでした。その暗き色と明き色の肌は、魅惑的な対をなしていました。獅子のような肩と太い腕を持ち、胸には蛇の宝石の美しい花輪が輝いていました。その愛らしい目は金の蓮のよう、その顔は月のようで、三つの苦しみからの解放を与えます。その耳は金の花のような美しさを持ち、一瞥ごとに心を盗むようでした。その眼差しは魅力的で、眉は曲線美をなし、ティラカの印とその線は、まるで意図的に輝かせたようでした。
Verse 459 (दोहा/सोरठा)
रुचिर चौतनीं सुभग सिर मेचक कुंचित केस। नख सिख सुंदर बंधु दोउ सोभा सकल सुदेस।।219।।
彼らの四つの顔は魅力的で、頭には美しい髷があり、髪は巻いていました。足の爪から頭頂まで、二人の兄弟は美しく、その輝きはすべての肢体に現れていました。
परंपरा में यज्ञ-रक्षा और अहल्या-उद्धार का पाठ ‘भय-निवारण’ और ‘कृपा-प्राप्ति’ का साधन माना जाता है: असुर-भय/अंतर्बाधा शांत होती है और शरणागत-भाव दृढ़ होता है। विशेषतः अहल्या-स्तुति का श्रवण/पाठ पाप-बोध को कृपा-विनय में रूपांतरित कर ‘चरण-रज-आश्रय’ की रुचि जगाता है।
सामान्य राम-नाम-सम्पुट: ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ (या ‘सीताराम’). अहल्या-उद्धार/शरणागति प्रसंग में कई परंपराएँ ‘राम राम’ या ‘श्रीराम शरणं मम’ भाव-सम्पुट भी रखती हैं।
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