This Sopāna marks the soul’s initiation into Tyāga-yoga: dharma is no longer an ideal but a lived renunciation. Ayodhya—symbol of ordered consciousness—witnesses the wrenching shift from ‘gṛha’ (secure, scripted duty) to ‘vana’ (austere, unscripted surrender). The staircase-step here is Vairāgya tempered by Prem: the devotee learns that love does not cancel duty; it sanctifies separation, hardship, and obedience into bhakti-sādhana.
この段(ドーハー60–69)では、主調は哀憐(カルナー)であり、それが離別の恋(ヴィプラランバのシュリンガーラ)と撚り合わされ、捨離の英雄性(ダルマ・ヴィーラ)の陰影を帯びる。父の言葉を守り抜くラーマの決意が軸であり、その周りで母の慈愛と妻の貞信が波のように寄せては砕ける。カウサリヤーがシーターに授ける訓えは、家庭のダルマを説く教訓文である——年長者への奉仕、節制、そして家住の功徳という「安全な道」。しかしシーターの返答は、単なる慎重さをバクティの論理で覆す。主なき繁栄はすべて悲しみであり、主と共にあるなら樹皮衣すら天界である。神学的に本段は、サグナの親密(夫は परमेश्वर)を舞台にしつつ、静かにニルグナの不動を指し示す——ラーマの平静と सत्यの誓願は、形あるリーラーの内に宿る無形のダルマである。ソーパーナ上の位置づけは निर्णायकである。求道者は、解脱の階梯が森ではなく、犠牲への心の同意から始まることを学ぶ。
Verse 123 (चौपाई)
बन हित कोल किरात किसोरी। रचीं बिरंचि बिषय सुख भोरी।। पाइन कृमि जिमि कठिन सुभाऊ। तिन्हहि कलेसु न कानन काऊ।। कै तापस तिय कानन जोगू। जिन्ह तप हेतु तजा सब भोगू।। सिय बन बसिहि तात केहि भाँती। चित्रलिखित कपि देखि डेराती।। सुरसर सुभग बनज बन चारी। डाबर जोगु कि हंसकुमारी।। अस बिचारि जस आयसु होई। मैं सिख देउँ जानकिहि सोई।। जौं सिय भवन रहै कह अंबा। मोहि कहँ होइ बहुत अवलंबा।। सुनि रघुबीर मातु प्रिय बानी। सील सनेह सुधाँ जनु सानी।।
Verse 124 (दोहा/सोरठा)
कहि प्रिय बचन बिबेकमय कीन्हि मातु परितोष। लगे प्रबोधन जानकिहि प्रगटि बिपिन गुन दोष।।60।।
Verse 125 (चौपाई)
मातु समीप कहत सकुचाहीं। बोले समउ समुझि मन माहीं।। राजकुमारि सिखावन सुनहू। आन भाँति जियँ जनि कछु गुनहू।। आपन मोर नीक जौं चहहू। बचनु हमार मानि गृह रहहू।। आयसु मोर सासु सेवकाई। सब बिधि भामिनि भवन भलाई।। एहि ते अधिक धरमु नहिं दूजा। सादर सासु ससुर पद पूजा।। जब जब मातु करिहि सुधि मोरी। होइहि प्रेम बिकल मति भोरी।। तब तब तुम्ह कहि कथा पुरानी। सुंदरि समुझाएहु मृदु बानी।। कहउँ सुभायँ सपथ सत मोही। सुमुखि मातु हित राखउँ तोही।।
Verse 126 (दोहा/सोरठा)
गुर श्रुति संमत धरम फलु पाइअ बिनहिं कलेस। हठ बस सब संकट सहे गालव नहुष नरेस।।61।।
Verse 127 (चौपाई)
मैं पुनि करि प्रवान पितु बानी। बेगि फिरब सुनु सुमुखि सयानी।। दिवस जात नहिं लागिहि बारा। सुंदरि सिखवनु सुनहु हमारा।। जौ हठ करहु प्रेम बस बामा। तौ तुम्ह दुखु पाउब परिनामा।। काननु कठिन भयंकरु भारी। घोर घामु हिम बारि बयारी।। कुस कंटक मग काँकर नाना। चलब पयादेहिं बिनु पदत्राना।। चरन कमल मुदु मंजु तुम्हारे। मारग अगम भूमिधर भारे।। कंदर खोह नदीं नद नारे। अगम अगाध न जाहिं निहारे।। भालु बाघ बृक केहरि नागा। करहिं नाद सुनि धीरजु भागा।।
Verse 128 (दोहा/सोरठा)
भूमि सयन बलकल बसन असनु कंद फल मूल। ते कि सदा सब दिन मिलिहिं सबुइ समय अनुकूल।।62।।
Verse 129 (चौपाई)
नर अहार रजनीचर चरहीं। कपट बेष बिधि कोटिक करहीं।। लागइ अति पहार कर पानी। बिपिन बिपति नहिं जाइ बखानी।। ब्याल कराल बिहग बन घोरा। निसिचर निकर नारि नर चोरा।। डरपहिं धीर गहन सुधि आएँ। मृगलोचनि तुम्ह भीरु सुभाएँ।। हंसगवनि तुम्ह नहिं बन जोगू। सुनि अपजसु मोहि देइहि लोगू।। मानस सलिल सुधाँ प्रतिपाली। जिअइ कि लवन पयोधि मराली।। नव रसाल बन बिहरनसीला। सोह कि कोकिल बिपिन करीला।। रहहु भवन अस हृदयँ बिचारी। चंदबदनि दुखु कानन भारी।।
Verse 130 (दोहा/सोरठा)
सहज सुह्द गुर स्वामि सिख जो न करइ सिर मानि।। सो पछिताइ अघाइ उर अवसि होइ हित हानि।।63।।
Verse 131 (चौपाई)
सुनि मृदु बचन मनोहर पिय के। लोचन ललित भरे जल सिय के।। सीतल सिख दाहक भइ कैंसें। चकइहि सरद चंद निसि जैंसें।। उतरु न आव बिकल बैदेही। तजन चहत सुचि स्वामि सनेही।। बरबस रोकि बिलोचन बारी। धरि धीरजु उर अवनिकुमारी।। लागि सासु पग कह कर जोरी। छमबि देबि बड़ि अबिनय मोरी।। दीन्हि प्रानपति मोहि सिख सोई। जेहि बिधि मोर परम हित होई।। मैं पुनि समुझि दीखि मन माहीं। पिय बियोग सम दुखु जग नाहीं।।
Verse 132 (दोहा/सोरठा)
प्राननाथ करुनायतन सुंदर सुखद सुजान। तुम्ह बिनु रघुकुल कुमुद बिधु सुरपुर नरक समान।।64।।
Verse 133 (चौपाई)
मातु पिता भगिनी प्रिय भाई। प्रिय परिवारु सुह्रद समुदाई।। सासु ससुर गुर सजन सहाई। सुत सुंदर सुसील सुखदाई।। जहँ लगि नाथ नेह अरु नाते। पिय बिनु तियहि तरनिहु ते ताते।। तनु धनु धामु धरनि पुर राजू। पति बिहीन सबु सोक समाजू।। भोग रोगसम भूषन भारू। जम जातना सरिस संसारू।। प्राननाथ तुम्ह बिनु जग माहीं। मो कहुँ सुखद कतहुँ कछु नाहीं।। जिय बिनु देह नदी बिनु बारी। तैसिअ नाथ पुरुष बिनु नारी।। नाथ सकल सुख साथ तुम्हारें। सरद बिमल बिधु बदनु निहारें।।
Verse 134 (दोहा/सोरठा)
खग मृग परिजन नगरु बनु बलकल बिमल दुकूल। नाथ साथ सुरसदन सम परनसाल सुख मूल।।65।।
Verse 135 (चौपाई)
बनदेवीं बनदेव उदारा। करिहहिं सासु ससुर सम सारा।। कुस किसलय साथरी सुहाई। प्रभु सँग मंजु मनोज तुराई।। कंद मूल फल अमिअ अहारू। अवध सौध सत सरिस पहारू।। छिनु छिनु प्रभु पद कमल बिलोकि। रहिहउँ मुदित दिवस जिमि कोकी।। बन दुख नाथ कहे बहुतेरे। भय बिषाद परिताप घनेरे।। प्रभु बियोग लवलेस समाना। सब मिलि होहिं न कृपानिधाना।। अस जियँ जानि सुजान सिरोमनि। लेइअ संग मोहि छाड़िअ जनि।। बिनती बहुत करौं का स्वामी। करुनामय उर अंतरजामी।।
Verse 136 (दोहा/सोरठा)
राखिअ अवध जो अवधि लगि रहत न जनिअहिं प्रान। दीनबंधु संदर सुखद सील सनेह निधान।।66।।
Verse 137 (चौपाई)
मोहि मग चलत न होइहि हारी। छिनु छिनु चरन सरोज निहारी।। सबहि भाँति पिय सेवा करिहौं। मारग जनित सकल श्रम हरिहौं।। पाय पखारी बैठि तरु छाहीं। करिहउँ बाउ मुदित मन माहीं।। श्रम कन सहित स्याम तनु देखें। कहँ दुख समउ प्रानपति पेखें।। सम महि तृन तरुपल्लव डासी। पाग पलोटिहि सब निसि दासी।। बारबार मृदु मूरति जोही। लागहि तात बयारि न मोही। को प्रभु सँग मोहि चितवनिहारा। सिंघबधुहि जिमि ससक सिआरा।। मैं सुकुमारि नाथ बन जोगू। तुम्हहि उचित तप मो कहुँ भोगू।।
Verse 138 (दोहा/सोरठा)
ऐसेउ बचन कठोर सुनि जौं न ह्रदउ बिलगान। तौ प्रभु बिषम बियोग दुख सहिहहिं पावँर प्रान।।67।।
Verse 139 (चौपाई)
अस कहि सीय बिकल भइ भारी। बचन बियोगु न सकी सँभारी।। देखि दसा रघुपति जियँ जाना। हठि राखें नहिं राखिहि प्राना।। कहेउ कृपाल भानुकुलनाथा। परिहरि सोचु चलहु बन साथा।। नहिं बिषाद कर अवसरु आजू। बेगि करहु बन गवन समाजू।। कहि प्रिय बचन प्रिया समुझाई। लगे मातु पद आसिष पाई।। बेगि प्रजा दुख मेटब आई। जननी निठुर बिसरि जनि जाई।। फिरहि दसा बिधि बहुरि कि मोरी। देखिहउँ नयन मनोहर जोरी।। सुदिन सुघरी तात कब होइहि। जननी जिअत बदन बिधु जोइहि।।
Verse 140 (दोहा/सोरठा)
बहुरि बच्छ कहि लालु कहि रघुपति रघुबर तात। कबहिं बोलाइ लगाइ हियँ हरषि निरखिहउँ गात।।68।।
Verse 141 (चौपाई)
लखि सनेह कातरि महतारी। बचनु न आव बिकल भइ भारी।। राम प्रबोधु कीन्ह बिधि नाना। समउ सनेहु न जाइ बखाना।। तब जानकी सासु पग लागी। सुनिअ माय मैं परम अभागी।। सेवा समय दैअँ बनु दीन्हा। मोर मनोरथु सफल न कीन्हा।। तजब छोभु जनि छाड़िअ छोहू। करमु कठिन कछु दोसु न मोहू।। सुनि सिय बचन सासु अकुलानी। दसा कवनि बिधि कहौं बखानी।। बारहि बार लाइ उर लीन्ही। धरि धीरजु सिख आसिष दीन्ही।। अचल होउ अहिवातु तुम्हारा। जब लगि गंग जमुन जल धारा।।
Verse 142 (दोहा/सोरठा)
सीतहि सासु असीस सिख दीन्हि अनेक प्रकार। चली नाइ पद पदुम सिरु अति हित बारहिं बार।।69।।
In this passage (Doha 60–69), the dominant rasa is Karuṇa braided with Śṛṅgāra-in-vipralambha (love in separation) and shaded by Dharma-vīra (heroism of renunciation). Rama’s resolve to honor the father’s word is the axis; around it, maternal tenderness and spousal devotion surge and break like waves. Kaushalya’s counsel to Sita is a didactic domestic dharma-text: service to elders, restraint, and the ‘safe’ path of household merit. Sita’s reply overturns mere prudence with bhakti-logic: without the Lord, every prosperity is grief; with Him, even bark-cloth is heaven. Theologically, the Manas here stages Saguna intimacy (पति-परमेश्वर) while quietly pointing to Nirguna steadiness: Rama’s equanimity and सत्य-प्रतिज्ञा are the formless dharma within the formed leela. The Sopāna placement is crucial: the seeker is taught that liberation’s staircase begins not in forests but in the heart’s consent to sacrifice.
Traditional satsang reading holds that reciting Sita’s ananyā-bhakti and Rama’s dharma-niṣṭhā strengthens vairāgya, steadies the mind in separation/sorrow, and grants ‘sahaj dhairya’ (natural fortitude) in household trials—turning grief into devotion and duty into worship.
A common practice is to insert the Ram-nāma samput—“श्रीराम जय राम जय जय राम”—especially after each Doha in this sequence, to seal the teaching that Rama’s presence alone converts ‘vana’ into ‘vaikuṇṭha’.
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