त्याग-धर्म की देहरी: राज-सुख और गृह-आसक्ति के बीच ‘राम-रजाइ’ (दैवी आज्ञा) को सर्वोच्च मानकर मन का राज्य ईश्वर को अर्पित करना। यह सोपान साधक को ‘स्व’ के अधिकार-बोध से निकालकर ‘सेवक-भाव’ और लोकहित-धर्म में प्रतिष्ठित करता है—जहाँ विरह (वियोग) ही वैराग्य का ईंधन बनता है।
アヨーディヤ・カाण्डの रसの配列は、悲哀と寂静の合流である。悲哀であるのは、ラーマ離別により社会全体が「嘆きに乱れる」からであり、寂静であるのは、その離別が分別と離欲を生むからである。本段ではこの रसの転調がきわめて微妙に進む。ラーマとバラタの相互の愛、師への礼拝、ジャナカの法難の立場、神々の利己的な働き、そしてついにバラタの「僕の法(sevaka-dharma)」——これらを通して「法」は単なる規則ではなく、「ラーマの御意(rāma-rukha)」に適う、世を益する決断力として स्थापितされる。 トゥルシーはここで王法・師法・僕の信愛(dāsya-bhakti)を一つの軸に回す。ラーマの御足への愛なくしては、ヨーガも知も業もすべて「焼け失せる(jari jāū)」のみである。この階梯で修行者は学ぶ。解脱の道は私的権利ではなく、主の命令をへりくだって受け入れること——これこそバラタ物語の中心の霊性である。
Verse 592 (चौपाई)
राम भरत गुन गनत सप्रीती। निसि दंपतिहि पलक सम बीती।। राज समाज प्रात जुग जागे। न्हाइ न्हाइ सुर पूजन लागे।। गे नहाइ गुर पहीं रघुराई। बंदि चरन बोले रुख पाई।। नाथ भरतु पुरजन महतारी। सोक बिकल बनबास दुखारी।। सहित समाज राउ मिथिलेसू। बहुत दिवस भए सहत कलेसू।। उचित होइ सोइ कीजिअ नाथा। हित सबही कर रौरें हाथा।। अस कहि अति सकुचे रघुराऊ। मुनि पुलके लखि सीलु सुभाऊ।। तुम्ह बिनु राम सकल सुख साजा। नरक सरिस दुहु राज समाजा।।
Verse 593 (दोहा/सोरठा)
प्रान प्रान के जीव के जिव सुख के सुख राम। तुम्ह तजि तात सोहात गृह जिन्हहि तिन्हहिं बिधि बाम।।290।।
Verse 594 (चौपाई)
सो सुखु करमु धरमु जरि जाऊ। जहँ न राम पद पंकज भाऊ।। जोगु कुजोगु ग्यानु अग्यानू। जहँ नहिं राम पेम परधानू।। तुम्ह बिनु दुखी सुखी तुम्ह तेहीं। तुम्ह जानहु जिय जो जेहि केहीं।। राउर आयसु सिर सबही कें। बिदित कृपालहि गति सब नीकें।। आपु आश्रमहि धारिअ पाऊ। भयउ सनेह सिथिल मुनिराऊ।। करि प्रनाम तब रामु सिधाए। रिषि धरि धीर जनक पहिं आए।। राम बचन गुरु नृपहि सुनाए। सील सनेह सुभायँ सुहाए।। महाराज अब कीजिअ सोई। सब कर धरम सहित हित होई।।
Verse 595 (दोहा/सोरठा)
राम सपथ सुनि मुनि जनकु सकुचे सभा समेत। सकल बिलोकत भरत मुखु बनइ न उतरु देत।।296।।
Verse 596 (चौपाई)
सभा सकुच बस भरत निहारी। रामबंधु धरि धीरजु भारी।। कुसमउ देखि सनेहु सँभारा। बढ़त बिंधि जिमि घटज निवारा।। सोक कनकलोचन मति छोनी। हरी बिमल गुन गन जगजोनी।। भरत बिबेक बराहँ बिसाला। अनायास उधरी तेहि काला।। करि प्रनामु सब कहँ कर जोरे। रामु राउ गुर साधु निहोरे।। छमब आजु अति अनुचित मोरा। कहउँ बदन मृदु बचन कठोरा।। हियँ सुमिरी सारदा सुहाई। मानस तें मुख पंकज आई।। बिमल बिबेक धरम नय साली। भरत भारती मंजु मराली।।
Verse 597 (दोहा/सोरठा)
निरखि बिबेक बिलोचनन्हि सिथिल सनेहँ समाजु। करि प्रनामु बोले भरतु सुमिरि सीय रघुराजु।।297।।
Verse 598 (चौपाई)
प्रभु पितु मातु सुह्रद गुर स्वामी। पूज्य परम हित अतंरजामी।। सरल सुसाहिबु सील निधानू। प्रनतपाल सर्बग्य सुजानू।। समरथ सरनागत हितकारी। गुनगाहकु अवगुन अघ हारी।। स्वामि गोसाँइहि सरिस गोसाई। मोहि समान मैं साइँ दोहाई।। प्रभु पितु बचन मोह बस पेली। आयउँ इहाँ समाजु सकेली।। जग भल पोच ऊँच अरु नीचू। अमिअ अमरपद माहुरु मीचू।। राम रजाइ मेट मन माहीं। देखा सुना कतहुँ कोउ नाहीं।। सो मैं सब बिधि कीन्हि ढिठाई। प्रभु मानी सनेह सेवकाई।।
Verse 599 (दोहा/सोरठा)
कृपाँ भलाई आपनी नाथ कीन्ह भल मोर। दूषन भे भूषन सरिस सुजसु चारु चहु ओर।।298।।
Verse 600 (चौपाई)
राउरि रीति सुबानि बड़ाई। जगत बिदित निगमागम गाई।। कूर कुटिल खल कुमति कलंकी। नीच निसील निरीस निसंकी।। तेउ सुनि सरन सामुहें आए। सकृत प्रनामु किहें अपनाए।। देखि दोष कबहुँ न उर आने। सुनि गुन साधु समाज बखाने।। को साहिब सेवकहि नेवाजी। आपु समाज साज सब साजी।। निज करतूति न समुझिअ सपनें। सेवक सकुच सोचु उर अपनें।। सो गोसाइँ नहि दूसर कोपी। भुजा उठाइ कहउँ पन रोपी।। पसु नाचत सुक पाठ प्रबीना। गुन गति नट पाठक आधीना।।
Verse 601 (दोहा/सोरठा)
यों सुधारि सनमानि जन किए साधु सिरमोर। को कृपाल बिनु पालिहै बिरिदावलि बरजोर।।299।।
Verse 602 (चौपाई)
सोक सनेहँ कि बाल सुभाएँ। आयउँ लाइ रजायसु बाएँ।। तबहुँ कृपाल हेरि निज ओरा। सबहि भाँति भल मानेउ मोरा।। देखेउँ पाय सुमंगल मूला। जानेउँ स्वामि सहज अनुकूला।। बड़ें समाज बिलोकेउँ भागू। बड़ीं चूक साहिब अनुरागू।। कृपा अनुग्रह अंगु अघाई। कीन्हि कृपानिधि सब अधिकाई।। राखा मोर दुलार गोसाईं। अपनें सील सुभायँ भलाईं।। नाथ निपट मैं कीन्हि ढिठाई। स्वामि समाज सकोच बिहाई।। अबिनय बिनय जथारुचि बानी। छमिहि देउ अति आरति जानी।।
Verse 603 (दोहा/सोरठा)
सुह्रद सुजान सुसाहिबहि बहुत कहब बड़ि खोरि। आयसु देइअ देव अब सबइ सुधारी मोरि।।300।।
Verse 604 (चौपाई)
प्रभु पद पदुम पराग दोहाई। सत्य सुकृत सुख सीवँ सुहाई।। सो करि कहउँ हिए अपने की। रुचि जागत सोवत सपने की।। सहज सनेहँ स्वामि सेवकाई। स्वारथ छल फल चारि बिहाई।। अग्या सम न सुसाहिब सेवा। सो प्रसादु जन पावै देवा।। अस कहि प्रेम बिबस भए भारी। पुलक सरीर बिलोचन बारी।। प्रभु पद कमल गहे अकुलाई। समउ सनेहु न सो कहि जाई।। कृपासिंधु सनमानि सुबानी। बैठाए समीप गहि पानी।। भरत बिनय सुनि देखि सुभाऊ। सिथिल सनेहँ सभा रघुराऊ।।
Verse 605 (चौपाई)
सहित समाज तुम्हार हमारा। घर बन गुर प्रसाद रखवारा।। मातु पिता गुर स्वामि निदेसू। सकल धरम धरनीधर सेसू।। सो तुम्ह करहु करावहु मोहू। तात तरनिकुल पालक होहू।। साधक एक सकल सिधि देनी। कीरति सुगति भूतिमय बेनी।। सो बिचारि सहि संकटु भारी। करहु प्रजा परिवारु सुखारी।। बाँटी बिपति सबहिं मोहि भाई। तुम्हहि अवधि भरि बड़ि कठिनाई।। जानि तुम्हहि मृदु कहउँ कठोरा। कुसमयँ तात न अनुचित मोरा।। होहिं कुठायँ सुबंधु सुहाए। ओड़िअहिं हाथ असनिहु के घाए।।
Verse 606 (दोहा/सोरठा)
सेवक कर पद नयन से मुख सो साहिबु होइ। तुलसी प्रीति कि रीति सुनि सुकबि सराहहिं सोइ।।306।।
Verse 607 (चौपाई)
सभा सकल सुनि रघुबर बानी। प्रेम पयोधि अमिअ जनु सानी।। सिथिल समाज सनेह समाधी। देखि दसा चुप सारद साधी।। भरतहि भयउ परम संतोषू। सनमुख स्वामि बिमुख दुख दोषू।। मुख प्रसन्न मन मिटा बिषादू। भा जनु गूँगेहि गिरा प्रसादू।। कीन्ह सप्रेम प्रनामु बहोरी। बोले पानि पंकरुह जोरी।। नाथ भयउ सुखु साथ गए को। लहेउँ लाहु जग जनमु भए को।। अब कृपाल जस आयसु होई। करौं सीस धरि सादर सोई।। सो अवलंब देव मोहि देई। अवधि पारु पावौं जेहि सेई।।
Verse 608 (दोहा/सोरठा)
देव देव अभिषेक हित गुर अनुसासनु पाइ। आनेउँ सब तीरथ सलिलु तेहि कहँ काह रजाइ।।307।।
Verse 609 (चौपाई)
एकु मनोरथु बड़ मन माहीं। सभयँ सकोच जात कहि नाहीं।। कहहु तात प्रभु आयसु पाई। बोले बानि सनेह सुहाई।। चित्रकूट सुचि थल तीरथ बन। खग मृग सर सरि निर्झर गिरिगन।। प्रभु पद अंकित अवनि बिसेषी। आयसु होइ त आवौं देखी।। अवसि अत्रि आयसु सिर धरहू। तात बिगतभय कानन चरहू।। मुनि प्रसाद बनु मंगल दाता। पावन परम सुहावन भ्राता।। रिषिनायकु जहँ आयसु देहीं। राखेहु तीरथ जलु थल तेहीं।। सुनि प्रभु बचन भरत सुख पावा। मुनि पद कमल मुदित सिरु नावा।।
Verse 610 (दोहा/सोरठा)
भरत राम संबादु सुनि सकल सुमंगल मूल। सुर स्वारथी सराहि कुल बरषत सुरतरु फूल।।308।।
Verse 611 (चौपाई)
धन्य भरत जय राम गोसाईं। कहत देव हरषत बरिआई। मुनि मिथिलेस सभाँ सब काहू। भरत बचन सुनि भयउ उछाहू।। भरत राम गुन ग्राम सनेहू। पुलकि प्रसंसत राउ बिदेहू।। सेवक स्वामि सुभाउ सुहावन। नेमु पेमु अति पावन पावन।। मति अनुसार सराहन लागे। सचिव सभासद सब अनुरागे।। सुनि सुनि राम भरत संबादू। दुहु समाज हियँ हरषु बिषादू।। राम मातु दुखु सुखु सम जानी। कहि गुन राम प्रबोधीं रानी।। एक कहहिं रघुबीर बड़ाई। एक सराहत भरत भलाई।।
परंपरागत मान्यता में भरत-चरित्र का पाठ ‘सेवक-भाव’, ‘विवेक’ और ‘राम-आज्ञा-निष्ठा’ को दृढ़ करता है; गृह-कलह/अधिकार-विवाद शांत होकर ‘लोकहित-धर्म’ की बुद्धि जागती है, तथा राम-वियोगजन्य करुण रस मन को शान्त-वैैराग्य की ओर मोड़ता है।
सामान्य सत्संग-परंपरा में दास्य-स्थापन हेतु ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ या ‘सीयावर रामचंद्र की जय’ का जप-सम्पुट जोड़ा जाता है; विशेषतः ‘राम-रजाइ’ विषयक पंक्तियों के बाद ‘राम’ नाम-स्मरण का सम्पुट प्रचलित है।
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
A free sign-in with Google or Apple keeps your chat saved across web and the app.
Read Ramcharitmanas in the Vedapath app
Scan the QR code to open this directly in the app, with word-by-word meanings, Sanskrit recitation where available, and more.