Opening the text
Tyāga-śikṣā (instruction in renunciation) and Dharma-parīkṣā (testing of righteousness): the sādhaka learns that true ‘Ayodhyā’ (the unconquerable inner city of peace) is entered not by possession of kingdom, but by surrender to Rāma’s maryādā. This sopāna turns grief into bhakti by transmuting political injustice into spiritual resolve—especially through Bharata’s spotless love and the community’s lament that becomes kīrtan-like praise.
『アヨーディヤー・カーンダ』は、『マーナス』における離別(ヴィラハ)とダルマの大いなる坩堝である。支配的ラサはカルナー(悲憫)であるが、トゥルシーダースは嘆きをつねに信愛の甘美(マードゥリヤ)へと転化させる—別離の痛みがバクティを駆動する力となるのである。神学的にはここが転軸であり、有相のラーマが人間に理解可能な決断(父命への服従、森への追放)を示すことによって、無相の不可測の摂理(ビディ・ガティ)を露わにする。しかしそれは宿命論へは崩れない。本カーンダは、マリヤーダーそのものが解脱へ向かう道であると教える—ラーマの自制は「行為としての解放」である。 バラタは信者の理想として立ち現れ、あまりに清らかで非難すら付着しない。彼の旅は良心の巡礼である。物語は繰り返し、社会の混乱(カイケーイーの願い、民衆の憤り)を内なる秩序の舞台として描く—謙下、自己責め、そしてラーマの御足への揺るがぬ愛着(ラティ)。かくしてアヨーディヤーは、求道者が追放を内面のタパス(苦行)として担い、災厄を恩寵として読み替えることを学ぶ階梯となる。
Verse 408 (चौपाई)
लालन जोगु लखन लघु लोने। भे न भाइ अस अहहिं न होने।। पुरजन प्रिय पितु मातु दुलारे। सिय रघुबरहि प्रानपिआरे।। मृदु मूरति सुकुमार सुभाऊ। तात बाउ तन लाग न काऊ।। ते बन सहहिं बिपति सब भाँती। निदरे कोटि कुलिस एहिं छाती।। राम जनमि जगु कीन्ह उजागर। रूप सील सुख सब गुन सागर।। पुरजन परिजन गुर पितु माता। राम सुभाउ सबहि सुखदाता।। बैरिउ राम बड़ाई करहीं। बोलनि मिलनि बिनय मन हरहीं।। सारद कोटि कोटि सत सेषा। करि न सकहिं प्रभु गुन गन लेखा।।
ラクシュマナは慈しまれるに値し、若く繊細である。名ばかりの兄弟ではなく、何の欠けもない。市民に愛され、父母に慈しまれ、シーターとラグの主は命のように愛されている。優れた姿、繊細で慈悲深い性質、風さえもその体には触れない。彼らは森であらゆる苦難に耐える、百万の雷が胸に打ち込まれても恐れない。ラーマは生まれて世界を照らした、美徳、幸福、すべての善い資質の海である。市民、親族、師、父母にとって、ラーマの性質はすべてに喜びを与える。敵さえも彼の偉大さを称える、その言葉、その会見、その謙虚さは心を奪う。サラスヴァティーと数百万の賢者、シェーシャでさえ、主の徳の計算を完成できない。
Verse 409 (दोहा/सोरठा)
सुखस्वरुप रघुबंसमनि मंगल मोद निधान। ते सोवत कुस डासि महि बिधि गति अति बलवान।।200।।
ラグ族の宝、至福の化身、喜びと吉祥の宝庫である彼は、クシャ草の上に眠る。これが運命の強大な力である。
Verse 410 (चौपाई)
राम सुना दुखु कान न काऊ। जीवनतरु जिमि जोगवइ राऊ।। पलक नयन फनि मनि जेहि भाँती। जोगवहिं जननि सकल दिन राती।। ते अब फिरत बिपिन पदचारी। कंद मूल फल फूल अहारी।। धिग कैकेई अमंगल मूला। भइसि प्रान प्रियतम प्रतिकूला।। मैं धिग धिग अघ उदधि अभागी। सबु उतपातु भयउ जेहि लागी।। कुल कलंकु करि सृजेउ बिधाताँ। साइँदोह मोहि कीन्ह कुमाताँ।। सुनि सप्रेम समुझाव निषादू। नाथ करिअ कत बादि बिषादू।। राम तुम्हहि प्रिय तुम्ह प्रिय रामहि। यह निरजोसु दोसु बिधि बामहि।।
ラーマは耳にすべきでない悲しみを聞いた、命の木が伐られるかのようであった。蛇の宝石がまぶたに守られるように、母は昼夜彼を慈しんだ。今や彼らは森の旅人として歩き、根、果実、花を食べる。カイケーイーに恥あれ、すべての不幸の根源!彼女は自らの命と愛する者の敵となった。恥、恥を我に、罪人、罪の海、不運な者よ!すべての災いが我に降りかかった。創造主は我を家族の汚点とし、夫にとって邪悪な母とした。これを聞いて、ニシャーダは愛情をもって慰めた。「主よ、なぜそのような悲しみに沈むのですか?ラーマはあなたに愛され、あなたはラーマに愛されています。ここに過失はなく、過失は運命にあります。」
Verse 411 (छंद)
बिधि बाम की करनी कठिन जेंहिं मातु कीन्ही बावरी। तेहि राति पुनि पुनि करहिं प्रभु सादर सरहना रावरी।। तुलसी न तुम्ह सो राम प्रीतमु कहतु हौं सौहें किएँ। परिनाम मंगल जानि अपने आनिए धीरजु हिएँ।।
逆運命の業は困難であり、母はそれによって狂気に陥った。しかし夜ごとに主は敬意をもって彼女を繰り返し称えるだろう。トゥルシーダースは言う:私は誰もあなたほどラーマに愛されているとは言わない。結果が吉祥であると知り、心に忍耐を持ちなさい。
Verse 412 (दोहा/सोरठा)
अंतरजामी रामु सकुच सप्रेम कृपायतन। चलिअ करिअ बिश्रामु यह बिचारि दृढ़ आनि मन।।201।।
心を知る者ラーマは、愛に満ち恥じらいつつ、慈悲の住処であり、このことを熟考し、心を固く決めて言った。「行って休息を取ろう。」
Verse 413 (चौपाई)
सखा बचन सुनि उर धरि धीरा। बास चले सुमिरत रघुबीरा।। यह सुधि पाइ नगर नर नारी। चले बिलोकन आरत भारी।। परदखिना करि करहिं प्रनामा। देहिं कैकइहि खोरि निकामा।। भरी भरि बारि बिलोचन लेंहीं। बाम बिधाताहि दूषन देहीं।। एक सराहहिं भरत सनेहू। कोउ कह नृपति निबाहेउ नेहू।। निंदहिं आपु सराहि निषादहि। को कहि सकइ बिमोह बिषादहि।। एहि बिधि राति लोगु सबु जागा। भा भिनुसार गुदारा लागा।। गुरहि सुनावँ चढ़ाइ सुहाईं। नईं नाव सब मातु चढ़ाईं।। दंड चारि महँ भा सबु पारा। उतरि भरत तब सबहि सँभारा।।
友の言葉を聞き、心を落ち着けて、ラグの主を思いながら住処へと向かった。これを知った都の男女は、深い悲しみを抱いて彼を見ようと出てきた。彼らは手を合わせて拝礼し、カイケーイーを憚ることなく呪った。その目は涙で満たされ、創造主を責めた。ある者はバラタの愛を称え、ある者は王が愛情を貫いたと言った。彼らは自分を責め、ニシャーダを称えた。その迷いと悲しみを誰が語れようか。こうして人々は夜通し目を覚まし、夜明けとともに準備に取りかかった。彼らは師を美しい船に乗せ、すべての母たちを新しい船に乗せた。四更のうちに全員が渡り、バラタは下船して皆を気遣った。
Verse 414 (दोहा/सोरठा)
प्रातक्रिया करि मातु पद बंदि गुरहि सिरु नाइ। आगें किए निषाद गन दीन्हेउ कटकु चलाइ।।202।।
朝の儀式を済ませ、母の足元に拝礼し、師に頭を垂れた。ニシャーダたちを先に遣わし、軍を進発させた。
Verse 415 (चौपाई)
कियउ निषादनाथु अगुआईं। मातु पालकीं सकल चलाईं।। साथ बोलाइ भाइ लघु दीन्हा। बिप्रन्ह सहित गवनु गुर कीन्हा।। आपु सुरसरिहि कीन्ह प्रनामू। सुमिरे लखन सहित सिय रामू।। गवने भरत पयोदेहिं पाए। कोतल संग जाहिं डोरिआए।। कहहिं सुसेवक बारहिं बारा। होइअ नाथ अस्व असवारा।। रामु पयोदेहि पायँ सिधाए। हम कहँ रथ गज बाजि बनाए।। सिर भर जाउँ उचित अस मोरा। सब तें सेवक धरमु कठोरा।। देखि भरत गति सुनि मृदु बानी। सब सेवक गन गरहिं गलानी।।
ニシャーダの主が先導し、母たちは皆、駕籠で進んだ。兄弟たちを呼んで指示を与え、バラモンたちと共に旅立った。自らガンガーに拝礼し、シーターとラーマ、ラクシュマナを心に念じた。旅をするうちにバラタは川岸に着き、船頭たちが船で彼らを渡した。忠実な従者たちは繰り返し言った。「主よ、馬をご用意ください。ラーマは歩いて向こう岸へ行かれました。私たちには戦車、象、馬を用意してください。」「私は歩いて行くのがふさわしい。すべての従者の中で、従者の務めは最も厳しいものだ。」バラタの決意を見、その優しい言葉を聞いて、すべての従者たちは心に恥じ入った。
Verse 416 (दोहा/सोरठा)
भरत तीसरे पहर कहँ कीन्ह प्रबेसु प्रयाग। कहत राम सिय राम सिय उमगि उमगि अनुराग।।203।।
バラタは第三更にプラヤーガに入った。ラーマとシーター、ラーマとシーターと語り、愛が幾度も湧き上がった。
Verse 417 (चौपाई)
झलका झलकत पायन्ह कैंसें। पंकज कोस ओस कन जैसें।। भरत पयादेहिं आए आजू। भयउ दुखित सुनि सकल समाजू।। खबरि लीन्ह सब लोग नहाए। कीन्ह प्रनामु त्रिबेनिहिं आए।। सबिधि सितासित नीर नहाने। दिए दान महिसुर सनमाने।। देखत स्यामल धवल हलोरे। पुलकि सरीर भरत कर जोरे।। सकल काम प्रद तीरथराऊ। बेद बिदित जग प्रगट प्रभाऊ।। मागउँ भीख त्यागि निज धरमू। आरत काह न करइ कुकरमू।। अस जियँ जानि सुजान सुदानी। सफल करहिं जग जाचक बानी।।
足輪のきらめきは、蓮の繊維や露の雫のようだった。バラタが川岸に着くと、集まった人々は皆、悲しみに打ちひしがれた。知らせを聞いて人々は沐浴し、拝礼してトリヴェーニーに来た。シーターとラーマは儀式に従って水で沐浴し、バラモンたちに施しを与え、敬意を表した。暗い波と白い波を見て、バラタの体は歓喜に震えた。ここは巡礼地の王であり、すべての願いを叶える場所で、ヴェーダに知られ、その力は世に現れている。「私は施しを乞う、自らの正義を捨てて。苦しむ魂でなければ、誰が悪事を犯すだろうか。」これを心に知り、賢く寛大な彼は、乞い人の言葉を世に実りあるものとした。
Verse 418 (दोहा/सोरठा)
अरथ न धरम न काम रुचि गति न चहउँ निरबान। जनम जनम रति राम पद यह बरदानु न आन।।204।।
富も正義も欲も望まず、解脱も求めない。生まれるたびにラーマの足元への愛を、これ以外の恵みは求めない。
Verse 419 (चौपाई)
जानहुँ रामु कुटिल करि मोही। लोग कहउ गुर साहिब द्रोही।। सीता राम चरन रति मोरें। अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरें।। जलदु जनम भरि सुरति बिसारउ। जाचत जलु पबि पाहन डारउ।। चातकु रटनि घटें घटि जाई। बढ़े प्रेमु सब भाँति भलाई।। कनकहिं बान चढ़इ जिमि दाहें। तिमि प्रियतम पद नेम निबाहें।। भरत बचन सुनि माझ त्रिबेनी। भइ मृदु बानि सुमंगल देनी।। तात भरत तुम्ह सब बिधि साधू। राम चरन अनुराग अगाधू।। बाद गलानि करहु मन माहीं। तुम्ह सम रामहि कोउ प्रिय नाहीं।।
「ラーマは私を欺いたと知れ、人々は私を主君への反逆者と言うだろう。私の愛はシーターとラーマの足元にある。あなたの恩寵が日々増しますように。水に生まれながら雲はその本質を忘れ、水を乞い、胸から石を落とす。チャータカ鳥は家々で呼び続け、愛はあらゆる方法で善のために増す。金が火で精錬されるように、私は愛する者の足元への誓いを果たす。」トリヴェーニーでバラタの言葉を聞き、川は優しい声で祝福を与えた。「愛しいバラタよ、あなたはすべての点で徳がある。ラーマの足元へのあなたの愛は測り知れない。心に非難を抱いてはならない。ラーマにとってあなたほど愛しい者はいない。」
Verse 420 (दोहा/सोरठा)
तनु पुलकेउ हियँ हरषु सुनि बेनि बचन अनुकूल। भरत धन्य कहि धन्य सुर हरषित बरषहिं फूल।।205।।
カイケーイーの好意的な言葉を聞いて、体は震え、心は喜んだ。「バラタは恵まれている!」と叫び、「恵まれている!」と、神々は喜んで花を降らせた。
Verse 421 (चौपाई)
प्रमुदित तीरथराज निवासी। बैखानस बटु गृही उदासी।। कहहिं परसपर मिलि दस पाँचा। भरत सनेह सीलु सुचि साँचा।। सुनत राम गुन ग्राम सुहाए। भरद्वाज मुनिबर पहिं आए।। दंड प्रनामु करत मुनि देखे। मूरतिमंत भाग्य निज लेखे।। धाइ उठाइ लाइ उर लीन्हे। दीन्हि असीस कृतारथ कीन्हे।। आसनु दीन्ह नाइ सिरु बैठे। चहत सकुच गृहँ जनु भजि पैठे।। मुनि पूँछब कछु यह बड़ सोचू। बोले रिषि लखि सीलु सँकोचू।। सुनहु भरत हम सब सुधि पाई। बिधि करतब पर किछु न बसाई।।
巡礼地の王に住む人々は喜び、森の賢者、家長、修行者たちは皆、喜んだ。五人や十人のグループで集まり、バラタの愛、その優しい性質、真の清らかさを語り合った。ラーマの徳の美しい知らせを聞いて、偉大な賢者バラドヴァージャの元へ来た。賢者は彼らが手を合わせて拝礼するのを見、その運命を幸運なものと記した。彼らを急いで起こし、胸に抱き、祝福を与え、旅を実りあるものとした。座席を与え、彼らは頭を下げて座り、恥じらうように庵に入った。賢者は何か尋ねようと思ったが、大きく躊躇した。彼らの優しく謙虚な性質を見て、リシは語った。「聞け、バラタよ、私はすべてを知った。運命が定めたことは何も変えられない。」
Verse 422 (दोहा/सोरठा)
तुम्ह गलानि जियँ जनि करहु समुझी मातु करतूति। तात कैकइहि दोसु नहिं गई गिरा मति धूति।।206।।
心の中で自分を責めたり、母の行いを咎めたりしてはならない。父とカイケーイーに過ちはなく、言葉が心を曇らせたのだ。
Verse 423 (चौपाई)
यहउ कहत भल कहिहि न कोऊ। लोकु बेद बुध संमत दोऊ।। तात तुम्हार बिमल जसु गाई। पाइहि लोकउ बेदु बड़ाई।। लोक बेद संमत सबु कहई। जेहि पितु देइ राजु सो लहई।। राउ सत्यब्रत तुम्हहि बोलाई। देत राजु सुखु धरमु बड़ाई।। राम गवनु बन अनरथ मूला। जो सुनि सकल बिस्व भइ सूला।। सो भावी बस रानि अयानी। करि कुचालि अंतहुँ पछितानी।। तहँउँ तुम्हार अलप अपराधू। कहै सो अधम अयान असाधू।। करतेहु राजु त तुम्हहि न दोषू। रामहि होत सुनत संतोषू।।
これを悪く言う者はいない。世間もヴェーダもこれを認め、賢者たちも同意する。あなたの父の汚れなき名声は歌われ、世間もヴェーダも彼を大いに称える。世間もヴェーダも、父が王国を与える者はそれを受け取ると宣言する。真理の誓いを守る王はあなたを呼び、幸福と正義と大いなる名誉と共に王国を与える。ラーマの森への追放はすべての災いの根を断ち、それを聞くと全世界は悲しみに貫かれた。それは運命の働きであり、無知な王妃を通じて起こった。彼女は誤った行いをし、最後には悔いるであろう。しかし、そこでもあなたの過失はわずかである。卑しく無知で邪悪な者だけがそう言う。たとえ王国を受け取っても、あなたに責めはない。ラーマはそれを聞いて喜ぶであろう。
Verse 424 (दोहा/सोरठा)
अब अति कीन्हेहु भरत भल तुम्हहि उचित मत एहु। सकल सुमंगल मूल जग रघुबर चरन सनेहु।।207।।
今やあなたは非常に立派になさった、バラタよ。この道はあなたにふさわしい。ラーグヴァの主の足への帰依は、この世のすべての吉祥の根である。
Verse 425 (चौपाई)
सो तुम्हार धनु जीवनु प्राना। भूरिभाग को तुम्हहि समाना।। यह तम्हार आचरजु न ताता। दसरथ सुअन राम प्रिय भ्राता।। सुनहु भरत रघुबर मन माहीं। पेम पात्रु तुम्ह सम कोउ नाहीं।। लखन राम सीतहि अति प्रीती। निसि सब तुम्हहि सराहत बीती।। जाना मरमु नहात प्रयागा। मगन होहिं तुम्हरें अनुरागा।। तुम्ह पर अस सनेहु रघुबर कें। सुख जीवन जग जस जड़ नर कें।। यह न अधिक रघुबीर बड़ाई। प्रनत कुटुंब पाल रघुराई।। तुम्ह तौ भरत मोर मत एहू। धरें देह जनु राम सनेहू।।
その弓はあなたの富、あなたの命、あなたの息吹である。あなたのような者は最も幸運である。これは不思議ではない、兄弟よ。あなたはダシャラタの息子、ラーマの愛する兄弟である。聞け、バラタよ。ラーグヴァの主の心の中で、あなたと等しい愛の対象はいない。ラクシュマナ、ラーマ、シーターはあなたを深く愛している。夜も昼もあなたを称えて過ぎる。プラヤーガで沐浴したとき、私はその秘密を知った。彼らはあなたへの愛に没頭している。ラーグヴァの主があなたに抱く愛はこのようなものである。彼の全人生、世間の名声は、あなたに集中している。これはラーグヴァの主の偉大さの過剰ではない。彼は避難を求める者の守護者、ラーグヴァの支配者である。あなた、バラタよ、は私そのものである。私の体が常にラーマの愛を抱くように。
Verse 426 (दोहा/सोरठा)
तुम्ह कहँ भरत कलंक यह हम सब कहँ उपदेसु। राम भगति रस सिद्धि हित भा यह समउ गनेसु।।208।।
この非難はあなたに、バラタよ、つきまとうが、私たちすべてにとっては教訓である。それはラーマへの帰依の完成にふさわしい時となった。
Verse 427 (चौपाई)
नव बिधु बिमल तात जसु तोरा। रघुबर किंकर कुमुद चकोरा।। उदित सदा अँथइहि कबहूँ ना। घटिहि न जग नभ दिन दिन दूना।। कोक तिलोक प्रीति अति करिही। प्रभु प्रताप रबि छबिहि न हरिही।। निसि दिन सुखद सदा सब काहू। ग्रसिहि न कैकइ करतबु राहू।। पूरन राम सुपेम पियूषा। गुर अवमान दोष नहिं दूषा।। राम भगत अब अमिअँ अघाहूँ। कीन्हेहु सुलभ सुधा बसुधाहूँ।। भूप भगीरथ सुरसरि आनी। सुमिरत सकल सुंमगल खानी।। दसरथ गुन गन बरनि न जाहीं। अधिकु कहा जेहि सम जग नाहीं।।
あなたの名声、父よ、は汚れなき新月であり、ラーグヴァの主はその僕、月の蓮とコキルである。それは常に昇り、決して沈まない。この世の空において衰えることなく、日ごとに倍に輝く。コキルとティロカはそれを大いに愛する。太陽の栄光もその輝きを減じない。昼も夜もすべての者に喜びをもたらす。カイケーイーの行いの蝕はそれを決して飲み込まない。ラーマの完全な愛は甘露である。師を軽んじる欠点はそれを汚さない。今やラーマの信者たちは不滅の至福に満たされている。彼らは大地から容易に甘露を得た。バギーラタ王は天の川を下した。その思い出はすべての祝福の鉱山である。ダシャラタの徳は語り尽くせない。彼と等しい者はこの世にいない。なぜもっと言う必要があろうか。
Verse 428 (दोहा/सोरठा)
जासु सनेह सकोच बस राम प्रगट भए आइ।। जे हर हिय नयननि कबहुँ निरखे नहीं अघाइ।।209।।
その愛と遠慮によってラーマが彼の前に現れた方。その心と目は彼を見つめても決して満たされない。
Ayodhya Kāṇḍa is the Manas’ great crucible of viraha and dharma. Its dominant rasa is karuṇā, yet Tulsidas continually converts lament into mādhurya of devotion: the pain of separation becomes a devotional engine. Theologically, it is the pivot where Saguna Rāma’s humanly legible decisions (obedience to father, forest-exile) disclose the Nirguna’s inscrutable ordinance (bidhि gati) without collapsing into fatalism. The kāṇḍa teaches that maryādā is itself mokṣa-ward: Rāma’s restraint is liberation in action. Bharata emerges as the bhakta-ideal—so pure that even blame cannot cling; his journey is a pilgrimage of conscience. The narrative repeatedly frames social disorder (Kaikeyī’s boon, public outrage) as a stage for inner order: humility, self-reproach, and unwavering rati at Rāma’s feet. Thus Ayodhya becomes the staircase step where the seeker learns to carry exile inwardly as tapas and to read calamity as grace.
Paramparā holds that reciting Bharata’s Prayāga-prayer and Bharadvāja’s absolution (Doha 204–207 region) purifies ‘glāni’ (self-blame), steadies the mind in विपत्ति, and grants ‘राम पद रति’—the inner fruit of Ayodhya Kāṇḍa: steadfast devotion that does not bargain even for mokṣa.
A common samput used in many Rāma-bhakti recitations here is: “श्रीराम जय राम जय जय राम” (inserted between units). In some Manas-kathā traditions, the refrain “राम सिया राम सिया राम जय जय राम” is favored, resonating with Doha 203’s ‘कहत राम सिय राम सिय’ cadence.
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