
Dharma-śaṅkā-nivāraṇa: Yudhiṣṭhira’s Response on Karma-Phala and Trust in Dharma
Upa-parva: Dharma-śaṅkā-nivāraṇa (Yudhiṣṭhira–Draupadī Saṃvāda) — within Āraṇyaka Parva
Chapter 32 records Yudhiṣṭhira’s sustained reply to Draupadī after she speaks in an elegant but skeptical register. He asserts that he does not pursue dharma as a bargain for rewards; he gives and performs sacrifice because these are prescribed obligations, executed to the extent possible in exile. He distinguishes steadfast dharma from a utilitarian attempt to extract results, arguing that one who tries to 'milk' dharma or who doubts it after acting does not attain its fruit. The discourse critiques excessive suspicion (ati-śaṅkā) and frames it as socially and spiritually corrosive, contrasting it with reliance on āgama (scriptural tradition) and the observed authority of accomplished sages (e.g., Mārkaṇḍeya, Vyāsa, Vasiṣṭha, Nārada). Yudhiṣṭhira adds a practical-theological defense: if dharma were fruitless, disciplined life, austerity, study, and generosity would collapse, and even divine and sage communities would lack rationale for adherence. He concludes by urging the abandonment of nāstikya, affirming the existence of karma-phala, and recommending reverence toward the cosmic regulator (Dhātṛ/Īśvara).
Chapter Arc: वनवास की धूल-धूसरित संध्या में द्रौपदी युधिष्ठिर से कह उठती है—“मैं शोक से प्रलाप नहीं कर रही; सुनो, मैं तुम्हें कर्म का सत्य स्मरण करा रही हूँ।” → वह धर्मराज की ‘क्षमा’ और ‘धैर्य’ की मर्यादा को चुनौती नहीं देती, पर उसे निष्क्रियता का आवरण मानकर झकझोरती है: ज्ञानी को भी कर्म करना चाहिए; अकर्मण्यता तो स्थावरों का धर्म है, मनुष्यों का नहीं। वह प्रत्यक्ष फल देने वाले पुरुषार्थ, उत्थान और पराक्रम की बात रखती है—देश-काल देखकर सावधान कर्म ही नीति है। → द्रौपदी का तीखा निष्कर्ष—यदि पर्वत-सा संकट (सिन्धु-गिरि जैसा) आ पड़े, यदि निर्वासन और व्यसन का भय हो, तब भी मनुष्य-धर्म यही है कि पराक्रम से उपाय करे; ‘पराक्रम ही उपदेशक’ है—यही क्षण युधिष्ठिर के सामने धर्म बनाम पुरुषार्थ का सबसे कठोर प्रश्न रख देता है। → अपने कथन को वह निजी स्मृति से पुष्ट करती है: पिता के घर ठहरे विद्वान ब्राह्मण से सुनी बृहस्पति-प्रोक्त नीति का उल्लेख कर बताती है कि यह आवेग नहीं, शास्त्र-सम्मत राजधर्म है—कर्मयोग, सतर्कता और अवसरानुकूल निर्णय। → युधिष्ठिर इस नीति-वाणी का उत्तर कैसे देंगे—क्या वे द्रौपदी के आग्रह को राजधर्म का संकेत मानकर सक्रिय उपाय करेंगे, या धर्म-निष्ठा को ही सर्वोपरि रखेंगे?
Verse 1
हि () हल मय द्वात्रिशोड्थ्याय: द्रौोपदीका पुरुषार्थको प्रधान मानकर पुरुषार्थ करनेके लिये जोर देना द्रौपहुुवाच नावमन्ये न गहें च धर्म पार्थ कथंचन । ईश्वरं कुत एवाहमवमंस्ये प्रजापतिम्,द्रौपदी बोली--कुन्तीनन्दन! मैं धर्मकी अवहेलना तथा निन्दा किसी प्रकार नहीं कर सकती। फिर समस्त प्रजाओंका पालन करनेवाले परमेश्वरकी अवहेलना तो कर ही कैसे सकती हूँ
Draupadī berkata: “Wahai Pārtha, aku sama sekali tidak dapat meremehkan dharma, apalagi mencelanya. Maka bagaimana mungkin aku menistakan Tuhan, Prajāpati—pelindung dan pemelihara semua makhluk?”
Verse 2
आर्तईहं प्रलपामीदमिति मां विद्धि भारत । भूयश्व विलपिष्यामि सुमनास्त्वं निबोध मे,भारत! आप ऐसा समझ लें कि मैं शोकसे आर्त होकर प्रलाप कर रही हूँ। मैं इतनेसे ही चुप नहीं रहूँगी और भी विलाप करूँगी। आप प्रसन्नचित्त होकर मेरी बात सुनिये
Wahai Bhārata, ketahuilah aku sebagai seorang yang dilanda duka dan meratap demikian. Aku akan meratap lebih lagi; maka dengarkanlah ucapanku dengan hati yang tenang dan penuh welas.
Verse 3
कर्म खल्विह कर्तव्यं जानतामित्रकर्शन । अकर्माणो हि जीवन्ति स्थावरा नेतरे जना:,शत्रुनाशन! ज्ञानी पुरुषको भी इस संसारमें कर्म अवश्य करना चाहिये। पर्वत और वृक्ष आदि स्थावर भूत ही बिना कर्म किये जी सकते हैं, दूसरे लोग नहीं
Wahai penakluk musuh, orang yang mengetahui dharma wajib bertindak di dunia ini. Tanpa tindakan, hanya makhluk tak bergerak—seperti gunung dan pepohonan—yang dapat bertahan; manusia lainnya tidak.
Verse 4
यावद्गोस्तनपानाच्च यावच्छायोपसेवनात् | जन्तव: कर्मणा वृत्तिमाप्रुवन्ति युधिष्ठिर,महाराज युधिष्ठिर! गौओंके बछड़े भी माताका दूध पीते और छायामें जाकर विश्राम करते हैं। इस प्रकार सभी जीव कर्म करके ही जीवन-निर्वाह करते हैं
Wahai Mahārāja Yudhiṣṭhira, sejak anak sapi menyusu pada induknya hingga ia mencari teduh untuk beristirahat, semua makhluk menegakkan penghidupannya melalui tindakan. Hidup di dunia ini ditopang oleh usaha; tiada yang dapat tanpa berbuat.
Verse 5
जड़मेषु विशेषेण मनुष्या भरतर्षभ । इच्छन्ति कर्मणा वृत्तिमवाप्तु प्रेत्य चेह च,भरतश्रेष्ठ! जंगम जीवोंमें विशेषरूपसे मनुष्य कर्मके द्वारा ही हहलोक और परलोकमें जीविका प्राप्त करना चाहते हैं
Wahai banteng di antara keturunan Bharata, di antara makhluk yang bergerak, manusialah terutama yang berhasrat meraih penghidupan melalui karma—baik di dunia ini maupun setelah wafat di alam berikutnya.
Verse 6
उत्थानमभिजानन्ति सर्वभूतानि भारत | प्रत्यक्ष फलमश्रन्ति कर्मणां लोकसाक्षिकम्,भारत! सभी प्राणी अपने उत्थानको समझते हैं और कर्मोंके प्रत्यक्ष फलका उपभोग करते हैं,जिसका साक्षी सारा जगत् है
Wahai Bhārata, semua makhluk mengenali apa yang membawa pada bangkit dan sejahteranya, dan mereka sendiri menikmati hasil nyata dari perbuatan mereka—hasil yang disaksikan oleh seluruh dunia.
Verse 7
सर्वे हि स्वं समुत्थानमुपजीवन्ति जन्तव: । अपि धाता विधाता च यथायमुदके बक:,यह जलके समीप जो बगुला बैठकर (मछलीके लिये) ध्यान लगा रहा है, उसीके समान ये सभी प्राणी अपने उद्योगका आश्रय लेकर जीवन धारण करते हैं। धाता और विधाता भी सदा सृष्टिपालनके उद्योगमें लगे रहते हैं
Sebagaimana bangau di tepi air duduk terpekur mengintai ikan, demikian pula semua makhluk menopang hidup dengan bersandar pada usaha mereka sendiri. Bahkan Dhātā dan Vidhātā pun senantiasa tekun dalam upaya memelihara tatanan ciptaan.
Verse 8
अकर्मणां वै भूतानां वृत्ति: स्यान्न हि काचन | तदेवाभिप्रपद्येत न विहन्यात् कदाचन,कर्म न करनेवाले प्राणियोंकी कोई जीविका भी सिद्ध नहीं होती। अतः: (प्रारब्धका भरोसा करके) कभी कर्मका परित्याग न करे। सदा कर्मका ही आश्रय ले
Bagi makhluk yang tidak bertindak, tidak ada jalan penghidupan yang dapat terwujud. Karena itu, jangan sekali-kali meninggalkan tindakan hanya dengan bersandar pada nasib; senantiasalah berlindung pada kerja yang sungguh-sungguh.
Verse 9
स्वकर्म कुरु मा ग्लासी: कर्मणा भव दंशित: । कृतं हि योडभिजानाति सहस्ने सो5स्ति नास्ति च,अतः आप अपना कर्म करें। उसमें ग्लानि न करें, कर्मका कवच पहने रहें। जो कर्म करना अच्छी तरह जानता है, ऐसा मनुष्य हजारोंमें एक भी है या नहीं? यह बताना कठिन है
Maka lakukanlah kewajibanmu sendiri; jangan tenggelam dalam penyesalan. Jadikan tindakan sebagai zirahmu dan berdirilah teguh. Orang yang sungguh mengetahui apa yang harus dilakukan dan apa yang telah dilakukan—di antara ribuan, entah ada atau tidak; sulit untuk dipastikan.
Verse 10
तस्य चापि भवेत् कार्य विवृद्धौ रक्षणे तथा । भक्ष्यमाणो हानादानात् क्षीयेत हिमवानपि,धनकी वृद्धि और रक्षाके लिये भी कर्मकी आवश्यकता है। यदि धनका उपभोग (व्यय) होता रहे और आय न हो तो हिमालय-जैसी धनराशिका भी क्षय हो सकता है
Bahkan untuk harta, usaha diperlukan—baik untuk menambahnya maupun menjaganya. Jika harta terus-menerus terkikis oleh pengeluaran sementara pemasukan tidak ada, maka simpanan sebesar Himālaya pun dapat menyusut habis.
Verse 11
उत्सीदेरन् प्रजा: सर्वा न कुर्यु: कर्म चेद् भुवि । तथा होता न वर्धेरन् कर्म चेदफलं भवेत्,यदि समस्त प्रजा इस भूतलपर कर्म करना छोड़ दे तो सबका संहार हो जाय। यदि कर्मका कुछ फल न हो तो इन प्रजाओंकी वृद्धि ही न हो
Jika seluruh rakyat di bumi ini meninggalkan tindakan, semuanya akan merosot menuju kebinasaan. Dan bila tindakan tidak berbuah, maka tatanan penopang yajña serta pertumbuhan dan kemakmuran makhluk pun tidak akan bertambah.
Verse 12
अपि चाप्यफल कर्म पश्याम: कुर्वतो जनान् | नान्यथा हाूपि गच्छन्ति वृत्ति लोका: कथंचन,हम देखती हैं कि लोग व्यर्थ कर्ममें भी लगे रहते हैं, कर्म न करनेपर तो लोगोंकी किसी प्रकार जीविका ही नहीं चल सकती
Yudhiṣṭhira berkata: “Kita pun melihat orang-orang tekun melakukan perbuatan yang tak menampakkan buahnya. Sebab, dalam keadaan apa pun, dengan cara lain, manusia sama sekali tak dapat menjalankan penghidupannya.”
Verse 13
यश्न दिष्टपरो लोके यश्चापि हठवादिक: । उभावपि शठावेतौ कर्मबुद्धि: प्रशस्यते,संसारमें जो केवल भाग्यके भरोसे कर्म नहीं करता अर्थात् जो ऐसा मानता है कि पहले जैसा किया है वैसा ही फल अपने-आप ही प्राप्त होगा तथा जो हठवादी है--बिना किसी युक्तिके हठपूर्वक यह मानता है कि कर्म करना अनावश्यक है, जो कुछ मिलना होगा, अपने-आप मिल जायगा, वे दोनों ही मूर्ख हैं। जिसकी बुद्धि कर्म (पुरुषार्थ)-में रुचि रखती है, वही प्रशंसाका पात्र है
Yudhiṣṭhira berkata: “Di dunia ini, baik orang yang hanya bersandar pada takdir lalu tidak bertindak, maupun orang yang keras kepala tanpa alasan sehat dan bersikukuh bahwa usaha itu tak perlu—keduanya tersesat. Yang patut dipuji ialah dia yang budinya tertuju pada tindakan, pada puruṣārtha: upaya manusia yang sadar.”
Verse 14
यो हि दिष्टमुपासीनो निर्विचिष्ट:सुखं शयेत् । अवसीदेत् स दुर्बुद्धिरामो घट इवोदके,जो खोटी बुद्धिवाला मनुष्य प्रारब्ध (भाग्य)-का भरोसा रखकर उद्योगसे मुँह मोड़ लेता और सुखसे सोता रहता है, उसका जलमें रखे हुए कच्चे घड़ेकी भाँति विनाश हो जाता है
Yudhiṣṭhira berkata: “Orang yang hanya memuja ‘takdir’, tanpa upaya dan tanpa pertimbangan, lalu berbaring nyaman—ia yang bodoh itu tenggelam menuju kebinasaan, bagaikan kendi tanah liat yang belum dibakar ketika diletakkan di air.”
Verse 15
तथैव हठदुर्बुद्धिः शक्तः कर्मण्यकर्मकृत् । आसीत न चिरं जीवेदनाथ इव दुर्बल:,इसी प्रकार जो हठी और दुर्बुद्धि मानव कर्म करनेमें समर्थ होकर भी कर्म नहीं करता, बैठा रहता है, वह दुर्बल एवं अनाथकी भाँति दीर्घजीवी नहीं होता
Demikian pula, orang yang keras kepala dan sesat—meski mampu bertindak—namun tidak menjalankan kewajibannya dan hanya duduk bermalas-malasan, tidak berumur panjang; ia binasa seperti orang lemah tanpa pelindung.
Verse 16
अकस्मादिह य: कश्रिदर्थ प्राप्नोति पूरुष: । त॑ हठेनेति मन्यन्ते स हि यत्नो न कस्यचित्,जो कोई पुरुष इस जगतमें अकस्मात् कहींसे धन पा लेता है, उसे लोग हठसे मिला हुआ मान लेते हैं; क्योंकि उसके लिये किसीके द्वारा प्रयत्न किया हुआ नहीं दीखता
Yudhiṣṭhira berkata: “Bila seseorang di dunia ini tiba-tiba memperoleh harta entah dari mana, orang-orang bersikeras menyebutnya ‘didapat dengan paksaan belaka’; sebab tak tampak adanya upaya yang disengaja dari siapa pun untuk mewujudkannya.”
Verse 17
यच्चापि किंचित् पुरुषो दिष्टं नाम भजत्युत । दैवेन विधिना पार्थ तद् दैवमिति निश्चितम्,कुन्तीनन्दन! मनुष्य जो कुछ भी देवाराधनकी विधिसे अपने भाग्यके अनुसार पाता है, उसे निश्चितरूपसे दैव (प्रारब्ध) कहा गया है
Wahai Pārtha! Apa pun yang dimiliki seseorang sebagai bagian yang telah ditetapkan baginya—diperoleh menurut ketetapan ilahi—itulah yang dengan pasti disebut ‘daiva’, yakni daya takdir (prārabdha).
Verse 18
यत् स्वयं कर्मणा किंचित् फलमाप्रोति पूरुष: । प्रत्यक्षमेतल्लोकेषु तत् पौरुषमिति श्रुतम्,तथा मनुष्य स्वयं कर्म करके जो कुछ फल प्राप्त करता है, उसे पुरुषार्थ कहते हैं। यह सब लोगोंको प्रत्यक्ष दिखायी देता है
Apa pun hasil yang diraih seseorang melalui tindakannya sendiri tampak nyata di dunia ini; karena itu ia dikenal sebagai ‘pauruṣa’—usaha manusia (purushārtha).
Verse 19
स्वभावतः: प्रवृत्तो यः प्राप्रोत्यर्थ न कारणात् । तत् स्वभावात्मकं विद्धि फलं पुरुषसत्तम,नरश्रेष्ठ)ी जो स्वभावसे ही कर्ममें प्रवृत्त होकर धन प्राप्त करता है, किसी कारणवश नहीं, उसके उस धनको स्वाभाविक फल समझना चाहिये
Wahai insan terbaik! Seseorang yang terdorong semata oleh wataknya sendiri lalu bekerja dan memperoleh harta—bukan karena sebab luar atau dorongan khusus—ketahuilah bahwa perolehan itu adalah buah yang ‘alami’, lahir dari tabiatnya.
Verse 20
एवं हठाच्च दैवाच्च स्वभावात् कर्मणस्तथा । यानि प्राप्रोति पुरुषस्तत् फल पूर्वकर्मणाम्,इस प्रकार हठ, दैव, स्वभाव तथा कर्मसे मनुष्य जिन-जिन वस्तुओंको पाता है, वे सब उसके पूर्वकर्मोके ही फल हैं
Demikianlah, apa pun yang diperoleh seseorang—entah tampak lahir dari keinginan keras, dari takdir, dari tabiat, ataupun dari perbuatannya—semuanya adalah buah dari karma yang telah dilakukan sebelumnya.
Verse 21
धातापि हि स्वकर्मव तैस्तैहेंतुभिरी श्वर: । विदधाति विभज्येह फल पूर्वकृतं नृणाम्,जगदाधार परमेश्वर भी उपर्युक्त हठ आदि हेतुओंसे जीवोंके अपने-अपने कर्मको ही विभक्त करके मनुष्योंको उनके पूर्वजन्ममें किये हुए कर्मके फलरूपसे यहाँ प्राप्त कराता है
Bahkan Sang Pencipta, Tuhan Yang Mahakuasa, melalui sebab-sebab yang beragam itu membagi-bagikan perbuatan tiap insan dan, di dunia ini, menganugerahkan kepada manusia buah dari karma yang telah dikerjakan dahulu kala.
Verse 22
यद्धायं पुरुष: किंचित् कुरुते वै शुभाशुभम् । तद् धातृविहितं विद्धि पूर्वकर्मफलोदयम्,पुरुष यहाँ जो कुछ भी शुभ-अशुभ कर्म करता है, उसे ईश्वरद्वारा विहित उसके पूर्वकर्मोके फलका उदय समझिये
Apa pun yang dilakukan seseorang—baik atau buruk—ketahuilah itu telah ditetapkan oleh Sang Penentu; itulah munculnya buah karma dari perbuatan lampau.
Verse 23
कारणं तस्य देहो<यं धातु: कर्मणि वर्तते । स यथा प्रेरयत्येनं तथायं कुरुतेडवश:,यह मानव-शरीर जो कर्ममें प्रवृत्त होता है, वह ईश्वरके कर्मफलसम्पादन-कार्यका साधन है। वे इसे जैसी प्रेरणा देते हैं, यह विवश होकर (स्वेच्छा--प्रारब्धभोगके लिये) वैसा ही करता है
Tubuh inilah alat bagi (kuasa yang lebih tinggi itu); tersusun dari unsur-unsur, ia bergerak dalam ranah tindakan. Sebagaimana Tuhan mendorongnya, demikianlah ia bertindak—tak sepenuhnya berdaulat atas diri.
Verse 24
तेषु तेषु हि कृत्येषु विनियोक्ता महेश्वर: | सर्वभूतानि कौन्तेय कारयत्यवशान्यपि,कुन्तीनन्दन! परमेश्वर ही समस्त प्राणियोंको विभिन्न कार्योमें लगाते और स्वभावके परवश हुए उन प्राणियोंसे कर्म कराते हैं
Wahai putra Kuntī, dalam tiap-tiap urusan, MahāĪśvara-lah yang menugaskan dan mengarahkan. Ia menempatkan semua makhluk pada tugasnya masing-masing dan membuat bahkan yang terikat oleh kodratnya tetap bertindak.
Verse 25
मनसार्थान् विनिश्ित्य पश्चात् प्राप्रोति कर्मणा । बुद्धिपूर्व स्वयं वीर पुरुषस्तत्र कारणम्,किंतु वीर! मनसे अभीष्ट वस्तुओंका निश्चय करके फिर कर्मद्वारा मनुष्य स्वयं बुद्धिपूर्वक उन्हें प्राप्त करता है। अतः पुरुष ही उसमें कारण है
Wahai pahlawan, setelah menetapkan tujuan yang diinginkan dalam batin, seseorang kemudian mencapainya melalui tindakan. Karena bertindak dengan pertimbangan dan kecerdasan, manusialah sebab penentu dalam perkara itu.
Verse 26
संख्यातुं नैव शक््यानि कर्माणि पुरुषर्षभ । अगारनगराणां हि सिद्धि: पुरुषहैतुकी,नरश्रेष्ठ कर्मोीकी गणना नहीं की जा सकती। गृह एवं नगर आदि सभीकी प्राप्तिमें पुरुष ही कारण है। विद्वान पुरुष पहले बुद्धिद्वारा यह निश्चय करे कि तिलमें तेल है, गायके भीतर दूध है और काषप्ठमें अग्नि है, तत्पश्चात् उसकी सिद्धिके उपायका निश्चय करे
Wahai yang terbaik di antara manusia, perbuatan tak mungkin dihitung satu per satu. Sebab keberhasilan mendirikan rumah, kota, dan capaian duniawi semacam itu bertumpu pada upaya manusia sebagai penyebabnya.
Verse 27
तिले तैलं गवि क्षीरं काछ्ठे पावकमन्तत: । धिया धीरो विजानीयादुपायं चास्य सिद्धये,नरश्रेष्ठ कर्मोीकी गणना नहीं की जा सकती। गृह एवं नगर आदि सभीकी प्राप्तिमें पुरुष ही कारण है। विद्वान पुरुष पहले बुद्धिद्वारा यह निश्चय करे कि तिलमें तेल है, गायके भीतर दूध है और काषप्ठमें अग्नि है, तत्पश्चात् उसकी सिद्धिके उपायका निश्चय करे
Yudhiṣṭhira berkata: “Minyak tersembunyi di dalam biji wijen, susu di dalam sapi, dan api di dalam kayu. Orang bijak yang teguh hendaknya terlebih dahulu memahami kebenaran ini dengan budi, lalu menetapkan upaya yang tepat agar daya yang laten itu mencapai kesempurnaan.”
Verse 28
ततः प्रवर्तते पश्चात् कारणैस्तस्य सिद्धये । तां सिद्धिमुपजीवन्ति कर्मजामिह जन्तवः,तदनन्तर उन्हीं उपायोंद्वारा उस कार्यकी सिद्धिके लिये प्रवृत्त होना चाहिये। सभी प्राणी इस जगतमें उस कर्मजनित सिद्धिका सहारा लेते हैं
“Sesudah itu, hendaknya ia bergerak—dengan sarana yang tepat—demi tercapainya tujuan tersebut. Sebab di dunia ini makhluk hidup bertahan dengan bersandar pada keberhasilan yang lahir dari perbuatan mereka sendiri.”
Verse 29
कुशलेन कृतं कर्म कर्त्रा साधु स्वनुछ्ितम् । इदं त्वकुशलेनेति विशेषादुपलभ्यते,योग्य कर्ताके द्वारा किया गया कर्म अच्छे ढंगसे सम्पादित होता है। यह कार्य किसी अयोग्य कततकि द्वारा किया गया है, यह बात कार्यकी विशेषतासे अर्थात् परिणामसे जानी जाती है
“Pekerjaan yang dilakukan oleh pelaku yang terampil terlaksana dengan baik. Bahwa ini dilakukan oleh yang tidak terampil, itu dikenali dari ciri-cirinya—yakni dari hasilnya.”
Verse 30
इष्टापूर्तफलं न स्यान्न शिष्यो न गुरुर्भवेत् । पुरुष: कर्मसाध्येषु स्याच्चेदयमकारणम्,यदि कर्मसाध्य फलोंमें पुरुष (एवं उसका प्रयत्न) कारण न होता अर्थात् वह कर्ता नहीं बनता तो किसीको यज्ञ और कूपनिर्माण आदि कर्मोंका फल नहीं मिलता। फिर तो न कोई किसीका शिष्य होता और न गुरु ही
Yudhiṣṭhira berkata: “Jika dalam tindakan yang hasilnya lahir dari usaha, manusia (dan ikhtiarnya) bukanlah sebab—jika ia tidak menjadi pelaku—maka tidak akan ada buah dari yajña maupun karya kebajikan umum seperti menggali sumur. Dalam keadaan demikian, takkan ada murid dan takkan ada guru.”
Verse 31
कर्तृत्वादेव पुरुष: कर्मसिद्धौ प्रशस्यते । असिद्धौ निन्द्यते चापि कर्मनाशात् कथं त्विह,कर्ता होनेके कारण ही कार्यकी सिद्धिमें पुरुषकी प्रशंसा की जाती है और जब कार्यकी सिद्धि नहीं होती, तब उसकी निन्दा की जाती है। यदि कर्मका सर्वथा नाश ही हो जाय, तो यहाँ कार्यकी सिद्धि ही कैसे हो
Yudhiṣṭhira berkata: “Justru karena manusia dipandang sebagai pelaku, ia dipuji ketika suatu usaha berhasil; dan ketika gagal, ia pun disalahkan. Tetapi jika tindakan itu sendiri dianggap lenyap sama sekali, bagaimana mungkin ada pencapaian di sini?”
Verse 32
सर्वमेव हठेनैके दैवेनैके वदन्त्युत । पुंस: प्रयत्नजं केचित्त्रैधमेतन्निरुच्यते,कोई तो सब कार्योंको हठसे ही सिद्ध होनेवाला बतलाते हैं। कुछ लोग दैवसे कार्यकी सिद्धिका प्रतिपादन करते हैं तथा कुछ लोग पुरुषार्थको ही कार्यसिद्धिका कारण बताते हैं। इस तरह ये तीन प्रकारके कारण बताये जाते हैं इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि द्रौपदीवाक्ये द्वात्रिंशो5ध्याय: ।। ३२ || इस प्रकार श्रीमह्याभारत वनपर्वके अन्तर्गत अजुनाभिगमनपर्वमें द्रौपदीवाक्यविषयक बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
Yudhiṣṭhira berkata: “Sebagian orang menyatakan bahwa setiap hasil dicapai semata-mata oleh hatha—tekad keras yang memaksa; sebagian lain mengatakan bahwa semuanya terlaksana hanya oleh daiva, yakni takdir; dan yang lain lagi menegaskan bahwa upaya manusia (puruṣārtha) adalah sebab sejati keberhasilan. Maka sebab-sebab itu dijelaskan sebagai tiga macam.”
Verse 33
न चैवैतावता कार्य मन्यन्त इति चापरे | अस्ति सर्वमदृश्यं तु दिष्टं चैव तथा हठ:,दूसरे लोगोंकी मान्यता इस प्रकार है कि मनुष्यके प्रयत्नकी कोई आवश्यकता नहीं है। अदृश्य दैव (प्रारब्ध) तथा हठ--ये दो ही सब कार्योंके कारण हैं
Ada pula yang berpendapat bahwa upaya manusia sama sekali tidak diperlukan. Menurut mereka, segala sesuatu terjadi hanya melalui yang tak terlihat—diṣṭa (ketetapan nasib)—dan melalui hatha, yakni kemauan keras yang memaksa; kedua inilah, kata mereka, sebab di balik semua tindakan.
Verse 34
दृश्यते हि हठाच्चैव दिष्टाच्चार्थस्य संतति: । किंचिद् दैवाद्धठात् किंचित् किंचिदेव स्वभावत:,क्योंकि यह देखा जाता है कि हठ तथा दैवसे सब कार्योकी धारावाहिक रूपसे सिद्धि हो रही है। जो लोग तत्त्वज्ञ एवं कुशल हैं, वे प्रतिज्ञापूर्वक कहते हैं कि मनुष्य कुछ फल दैवसे, कुछ हठसे और कुछ स्वभावसे प्राप्त करता है। इस विषयमें इन तीनोंके सिवा कोई चौथा कारण नहीं है
Yudhiṣṭhira berkata: “Sebab memang terlihat bahwa rangkaian peristiwa dan tercapainya hasil kadang berlangsung karena hatha, kadang karena diṣṭa—yang ditetapkan oleh takdir. Seseorang memperoleh sebagian hasil melalui ketentuan ilahi, sebagian melalui usaha yang keras, dan sebagian lagi semata-mata dari sifat alaminya. Di luar tiga ini, tidak ada sebab keempat dalam perkara ini.”
Verse 35
पुरुष: फलमाप्रोति चतुर्थ नात्र कारणम् | कुशला: प्रतिजानन्ति ये वै तत्त्वविदो जना:,क्योंकि यह देखा जाता है कि हठ तथा दैवसे सब कार्योकी धारावाहिक रूपसे सिद्धि हो रही है। जो लोग तत्त्वज्ञ एवं कुशल हैं, वे प्रतिज्ञापूर्वक कहते हैं कि मनुष्य कुछ फल दैवसे, कुछ हठसे और कुछ स्वभावसे प्राप्त करता है। इस विषयमें इन तीनोंके सिवा कोई चौथा कारण नहीं है
Yudhiṣṭhira berkata: “Seseorang meraih hasil, dan dalam hal ini tidak ada sebab keempat. Mereka yang cakap dan mengetahui hakikat menyatakan dengan pasti: manusia memperoleh sebagian hasil melalui takdir, sebagian melalui hatha (usaha yang memaksa), dan sebagian melalui sifat alaminya.”
Verse 36
तथैव धाता भूतानामिष्टानिष्टफलप्रद: । यदि न स्यान्न भूतानां कृषपणो नाम कश्नन,क्योंकि यदि ईश्वर सब प्राणियोंको इष्ट-अनिष्टरूप फल नहीं देते तो उन प्राणियोंमेंसे कोई भी दीन नहीं होता
Yudhiṣṭhira berkata: “Demikian pula Dhātā, Sang Penetap bagi makhluk, adalah pemberi hasil—yang diinginkan maupun yang tidak diinginkan. Seandainya Ia tidak demikian, maka di antara makhluk tidak akan ada seorang pun yang layak disebut ‘kṛśapaṇa’—melarat atau papa; sebab pembagian hasil yang bercampur itulah yang menjatuhkan sebagian ke dalam kesusahan.”
Verse 37
य॑ यमर्थमभिप्रेप्सु: कुरुते कर्म पूरुष: । तत्तत् सफलमेव स्याद् यदि न स्यात् पुरा कृतम्,यदि पूर्वकृत प्रारब्धकर्म प्रभाव डालनेवाला न होता तो मनुष्य जिस-जिस प्रयोजनके अभिप्रायसे कर्म करता, वह सब सफल ही हो जाता
Seandainya daya karma masa lampau (prārabdha) tidak lebih dahulu ada, maka apa pun tujuan yang dikejar manusia dan demi itu ia bertindak, tiap usaha pasti berbuah. Namun karena pengaruh perbuatan terdahulu tetap bekerja, ikhtiar manusia tidak selalu mencapai hasil yang diinginkan.
Verse 38
त्रिद्वारामर्थसिद्धि तु नानुपश्यन्ति ये नरा: । तथैवानर्थसिद्धिं च यथा लोकास्तथैव ते,अत: जो लोग अर्थसिद्धि तथा अनर्थकी प्राप्तिमें देव, हठ और स्वभाव--इन तीनोंको कारण नहीं समझते, वे वैसे ही हैं, जैसे कि साधारण अज्ञ लोग होते हैं
Mereka yang tidak melihat tiga pintu menuju keberhasilan tujuan duniawi—daiva (takdir), haṭha (tekad keras), dan svabhāva (watak)—dan juga tidak memahami tiga pintu yang menjerumuskan pada kemalangan, tak berbeda dari orang kebanyakan yang lalai dan bodoh.
Verse 39
कर्तव्यमेव कर्मेति मनोरेष विनिश्चय: । एकान्तेन हानीहो5यं पराभवति पूरुष:,किंतु मनुका यह सिद्धान्त है कि कर्म करना ही चाहिये, जो बिलकुल कर्म छोड़कर निश्वेष्ट हो बैठ रहता है, वह पुरुष पराभवको प्राप्त होता है
Inilah ketetapan Manu: kewajiban harus dikerjakan. Orang yang sepenuhnya meninggalkan tindakan dan duduk diam tanpa usaha, pasti jatuh dalam kehinaan dan kekalahan.
Verse 40
कुर्वतों हि भवत्येव प्रायेणेह युधिष्ठिर । एकान्तफलसिद्धि तु न विन्दत्यलस: क्वचित्,(इसलिये मेरा तो कहना यह है कि) महाराज युधिष्ठिर! कर्म करनेवाले पुरुषको यहाँ प्राय: फलकी सिद्धि प्राप्त होती ही है। परंतु जो आलसी है, जिससे ठीक-ठीक कर्तव्यका पालन नहीं हो पाता, उसे कभी फलकी सिद्धि नहीं प्राप्त होती
Wahai Yudhiṣṭhira, di dunia ini keberhasilan hasil umumnya datang kepada orang yang bertindak. Tetapi orang malas—yang tidak menunaikan kewajiban sebagaimana mestinya—tak pernah mencapai kepastian tercapainya buah yang diinginkan.
Verse 41
असम्भवे त्वस्य हेतु: प्रायश्ित्तं तु लक्षयेत् | कृते कर्मणि राजेन्द्र तथानृण्यमवाप्नुते,यदि कर्म करनेपर भी फलकी उत्पत्ति न हो तो कोई-न-कोई कारण है; ऐसा मानकर प्रायश्चित्त (उसके दोषके समाधान)-पर दृष्टि डाले। राजेन्द्र! कर्मको सांगोपांग कर लेनेपर कर्ता उऋण (निर्दोष) हो जाता है
Bila setelah suatu tindakan dilakukan hasil yang diharapkan tidak juga muncul, hendaknya disimpulkan ada sebab penghalang; karena itu arahkan perhatian pada prāyaścitta (penebusan/penyucian) untuk menyingkirkan kekeliruan. Wahai raja terbaik, bila tindakan telah dilaksanakan lengkap menurut ketentuannya, pelakunya menjadi bebas dari tanggungan (tak tercela), meski buah yang tampak tertunda atau tidak terlihat.
Verse 42
अलक्ष्मीराविशत्येने शयानमलसं नरम् | नि:संशयं फल॑ लब्ध्वा दक्षो भूतिमुपाश्ुुते,जो मनुष्य आलस्यके वशमें पड़कर सोता रहता है, उसे दरिद्रता प्राप्त होती है और कार्यकुशल मानव निश्चय ही अभीष्ट फल पाकर ऐश्वर्यका उपभोग करता है
Orang yang terbaring tidur dalam kemalasan, niscaya dimasuki kemalangan; tetapi yang cakap dan tekun, setelah pasti memperoleh hasil yang diinginkan, menikmati kemakmuran.
Verse 43
अनर्था: संशयावस्था: सिद्धयन्ते मुक्तसंशया: । धीरा नरा: कर्मरता ननु नि:संशया: क्वचित्,कर्मका फल होगा या नहीं, इस संशयमें पड़े हुए मनुष्य अर्थसिद्धिसे वंचित रह जाते हैं और जो संशयरहित हैं, उन्हें सिद्धि प्राप्त होती है। कर्मपरायण और संशयरहित धीर मनुष्य निश्चय ही कहीं बिरले देखे जाते हैं
Mereka yang terbelenggu dalam keadaan ragu jatuh ke dalam celaka dan terhalang dari keberhasilan; sedangkan mereka yang bebas dari keraguan meraih pencapaian. Namun manusia yang teguh budi, tekun berbuat, dan sungguh tanpa ragu—memang jarang terlihat di mana pun.
Verse 44
एकान्तेन हाानर्थो<यं वर्तते5स्मासु साम्प्रतम् । स तु नि:संशयं न स्यात् त्वयि कर्मण्यवस्थिते,इस समय हमलोगोंपर राज्यापहरणरूप भारी विपद् आ पड़ी है, यदि आप कर्म (पुरुषार्थ)-में तत्परतासे लग जाय॑ँ तो निश्चय ही यह आपत्ति टल सकती है
Saat ini malapetaka besar—berupa perampasan kerajaan—tanpa ragu telah menimpa kita. Namun itu tidak harus menetap: bila engkau teguh berdiri dalam tindakan dan upaya yang sungguh-sungguh, niscaya bencana ini dapat dielakkan.
Verse 45
अथवा सिद्धिरेव स्यादभिमानं तदेव ते । वृकोदरस्य बीभत्सोर्भ्रोत्रोश्न यमयोरपि,अथवा यदि कार्यकी सिद्धि ही हो जाय, तो वह आपके, भीमसेन और अर्जुनके तथा नकुल-सहदेवके लिये भी विशेष गौरवकी बात होगी
Atau bila keberhasilan semata yang tercapai, keberhasilan itu sendiri akan menjadi kehormatanmu; dan itu pun akan menjadi kemuliaan istimewa bagi Vṛkodara (Bhīma), bagi Bībhatsu (Arjuna), serta bagi kedua saudara kembar putra Yama (Nakula dan Sahadeva).
Verse 46
अन्येषां कर्म सफलमस्माकमपि वा पुन: । विप्रकर्षेण बुध्येत कृतकर्मा यथाफलम्,कर्मोके कर लेनेपर अन्तमें कर्ताको जैसा फल मिलता है, उसके अनुसार ही यह जाना जा सकता है कि दूसरोंका कर्म सफल हुआ है या हमारा
Apakah tindakan orang lain telah berbuah—atau tindakan kita juga—baru dapat dipahami setelah selang waktu, ketika perbuatan itu selesai dan hasilnya tampak. Sebab pelaku pada akhirnya dikenal dari buah yang timbul dari apa yang telah dikerjakan.
Verse 47
पृथिवीं लाड्रलेनेह भित्त्वा बीज॑ वपत्युत । आस्ते<थ कर्षकस्तूष्णीं पर्जन्यस्तत्र कारणम्,किसान हलसे पृथ्वीको चीरकर उसमें बीज बोता है और फिर चुपचाप बैठा रहता है; क्योंकि उसे सफल बनानेमें मेघ कारण हैं। यदि वृष्टिने अनुग्रह नहीं किया तो उसमें किसानका कोई दोष नहीं है। वह किसान मन-ही-मन यह सोचता है कि दूसरे लोग जोतने- बोनेका जो सफल कार्य जैसे करते हैं, वह सब मैंने भी किया है। उस दशामें यदि मुझे ऐसा प्रतिकूल फल मिला तो इसमें मेरा कोई अपराध नहीं है--ऐसा विचार करके उस असफलताके लिये वह बुद्धिमान् किसान अपनी निन्दा नहीं करता
Yudhiṣṭhira berkata: “Di sini seorang petani membelah bumi dengan bajak lalu menabur benih. Setelah itu ia duduk diam, sebab penentu di sana adalah awan pembawa hujan. Jika hujan tidak berkenan, petani itu tidak bersalah. Ia merenung, ‘Apa yang dilakukan orang lain dengan berhasil—membajak dan menabur—telah kulakukan juga; bila hasilnya justru berlawanan, itu bukan kesalahanku.’ Dengan pikiran demikian, petani bijak tidak mencela dirinya atas kegagalan itu.”
Verse 48
वृष्टिश्रेन्नानुगृह्लीयादनेनास्तत्र कर्षक: । यदन्य: पुरुष: कुर्यात् तत् कृतं सफलं मया,किसान हलसे पृथ्वीको चीरकर उसमें बीज बोता है और फिर चुपचाप बैठा रहता है; क्योंकि उसे सफल बनानेमें मेघ कारण हैं। यदि वृष्टिने अनुग्रह नहीं किया तो उसमें किसानका कोई दोष नहीं है। वह किसान मन-ही-मन यह सोचता है कि दूसरे लोग जोतने- बोनेका जो सफल कार्य जैसे करते हैं, वह सब मैंने भी किया है। उस दशामें यदि मुझे ऐसा प्रतिकूल फल मिला तो इसमें मेरा कोई अपराध नहीं है--ऐसा विचार करके उस असफलताके लिये वह बुद्धिमान् किसान अपनी निन्दा नहीं करता
“Jika hujan tidak berkenan,” kata Yudhiṣṭhira, “maka petani tidak patut disalahkan dalam perkara itu. Sebab apa pun yang dilakukan orang lain—membajak dan menabur—telah ia lakukan juga; maka bila hasilnya menjadi buruk, kesalahan bukan padanya. Dengan memahami bahwa sebab-sebabnya melampaui kuasanya, petani bijak tidak menyalahkan diri atas hasil tersebut.”
Verse 49
तच्चेदं फलमस्माकमपराधो न मे क्वचित् | इति धीरो<न्ववेक्ष्यैव नात्मानं तत्र गरहयेत्,किसान हलसे पृथ्वीको चीरकर उसमें बीज बोता है और फिर चुपचाप बैठा रहता है; क्योंकि उसे सफल बनानेमें मेघ कारण हैं। यदि वृष्टिने अनुग्रह नहीं किया तो उसमें किसानका कोई दोष नहीं है। वह किसान मन-ही-मन यह सोचता है कि दूसरे लोग जोतने- बोनेका जो सफल कार्य जैसे करते हैं, वह सब मैंने भी किया है। उस दशामें यदि मुझे ऐसा प्रतिकूल फल मिला तो इसमें मेरा कोई अपराध नहीं है--ऐसा विचार करके उस असफलताके लिये वह बुद्धिमान् किसान अपनी निन्दा नहीं करता
“Jika inilah hasil yang datang kepada kita,” kata Yudhiṣṭhira, “maka tiada kesalahanku sedikit pun di dalamnya.” Dengan menimbang demikian secara teguh, orang bijak tidak patut menyalahkan dirinya atas hasil itu.
Verse 50
कुर्वतो नार्थसिद्धिर्मे भवतीति ह भारत । निर्वेदो नात्र कर्तव्यो द्वावन्यौ हात्र कारणम्,भारत! पुरुषार्थ करनेपर भी यदि अपनेको सिद्धि न प्राप्त हो तो इस बातको लेकर मन-ही-मन खिन्न नहीं होना चाहिये; क्योंकि फलकी सिद्धिमें पुरुषार्थके सिवा दो और भी कारण हैं--प्रारब्ध और ईश्वरकृपा
Wahai Bhārata, sekalipun seseorang telah berusaha, bila keberhasilan atas tujuan yang diinginkan tidak juga datang, ia tidak patut tenggelam dalam kecewa batin. Sebab dalam tercapainya hasil, selain upaya manusia, ada dua sebab lain: daiva (takdir yang telah masak) dan anugerah Īśvara.
Verse 51
सिद्धिर्वाप्पथवासिद्धिरप्रवृत्तिरतोडन्यथा । बहूनां समवाये हि भावानां कर्म सिद्धाति,महाराज! कार्यमें सिद्धि प्राप्त होगी या असिद्धि, ऐसा संदेह मनमें लेकर आप कर्ममें प्रवृत्त ही न हों, यह उचित नहीं है; क्योंकि बहुत-से कारण एकत्र होनेपर ही कर्ममें सफलता मिलती है
Tidak patut seseorang menahan diri dari bertindak hanya karena ragu, “Akankah berhasil atau gagal?” Sebab keberhasilan suatu perbuatan lahir dari bertemunya banyak unsur dan sebab.
Verse 52
गुणाभावे फल न्यूनं भवत्यफलमेव च । अनारम्भे हि न फलं न गुणो दृश्यते क्वचित्,कर्मोमें किसी अंगकी कमी रह जानेपर थोड़ा फल हो सकता है। यह भी सम्भव है कि फल हो ही नहीं। परंतु कर्मका आरम्भ ही न किया जाय तब तो न कहीं फल दिखायी देगा और न कर्ताका कोई गुण (शौर्य आदि) ही दृष्टिगोचर होगा
Bila suatu usaha kekurangan mutu dan unsur yang semestinya, hasilnya dapat berkurang—bahkan bisa tanpa hasil sama sekali. Namun bila tindakan itu tidak dimulai, maka di mana pun tak tampak buahnya, dan keunggulan pelaku—seperti keberanian—pun tidak menjadi nyata.
Verse 53
देशकालावुपायांश्व मड्लं स्वस्तिवृद्धये । युनक्ति मेधया धीरो यथाशक्ति यथाबलम्,धीर मनुष्य मंगलमय कल्याणकी वृद्धिके लिये अपनी बुद्धिके द्वारा शक्ति तथा बलका विचार करते हुए देश-कालके अनुसार साम-दाम आदि उपायोंका प्रयोग करे
Demi bertambahnya kesejahteraan dan kemakmuran yang membawa berkah, orang bijak dan teguh menerapkan cara-cara yang tepat menurut tempat dan waktu; dengan kecerdasan ia menimbang kemampuan serta kekuatannya, lalu bertindak sesuai daya dan tenaga.
Verse 54
अप्रमत्तेन तत् कार्यमुपदेष्टा पराक्रम: । भूयिष्ठं कर्मयोगेषु दृष्ट एव पराक्रम:,सावधान होकर देश-कालके अनुरूप कार्य करे। इसमें पराक्रम ही उपदेशक (प्रधान) है। कार्यकी समस्त युक्तियोंमें पराक्रम ही सबसे श्रेष्ठ समझा गया है
Tugas itu harus dilaksanakan dengan kewaspadaan tanpa lengah; dalam perkara demikian, keberanian sendirilah guru utama. Di antara berbagai siasat untuk menuntaskan pekerjaan, keberanianlah yang tampak paling unggul.
Verse 55
यत्र धीमानवेक्षेत श्रेयांसं बहुभिगुणै: । साम्नैवार्थ ततो लिप्सेत् कर्म चास्मै प्रयोजयेत्,जहाँ बुद्धिमान् पुरुष शत्रुको अनेक गुणोंसे श्रेष्ठ देखे, वहाँ सामनीतिसे ही काम बनानेकी इच्छा करे और उसके लिये जो सन्धि आदि आवश्यक कर्तव्य हो, करे
Di mana orang bijak melihat pihak lain unggul dalam banyak kebajikan, di sana ia hendaknya mengupayakan tujuannya melalui pendamaian semata; dan demi itu ia melakukan kewajiban yang diperlukan—seperti perjanjian damai dan langkah-langkah sepadan.
Verse 56
व्यसन वास्य काड्क्षेत विवासं वा युधिष्ठिर । अपि सिन्धोगिरिर्वापि किं पुनर्मर्त्यधर्मिण:,महाराज युधिष्ठिर! अथवा शत्रुपर कोई भारी संकट आने या देशसे उसके निकाले जानेकी प्रतीक्षा करे; क्योंकि अपना विरोधी यदि समुद्र अथवा पर्वत हो तो उसपर भी विपत्ति लानेकी इच्छा रखनी चाहिये, फिर जो मरणधर्मा मनुष्य है, उसके लिये तो कहना ही क्या है?
Wahai Yudhiṣṭhira! Seseorang boleh menantikan datangnya malapetaka atas musuh, atau pengusirannya dari negeri. Sebab bila lawan itu sekalipun lautan atau gunung, tetap patut diinginkan agar kesusahan menimpanya—apalagi bila ia manusia fana yang terikat maut.
Verse 57
उत्थानयुक्त: सततं परेषामन्तरैषणे । आनृण्यमाप्रोति नर: परस्यात्मन एव च,शत्रुओंके छिद्रका अन्वेषण करनेके लिये सदा प्रयत्नशील रहे। ऐसा करनेसे वह अपनी और दूसरे लोगोंकी दृष्टिमें भी निर्दोष होता है
Seseorang hendaknya senantiasa bersemangat dan waspada, meneliti celah kelemahan para lawan. Dengan kewaspadaan dan upaya yang terus-menerus itu, ia menunaikan kewajibannya sehingga bebas dari cela—baik di mata orang lain maupun di hadapan suara hatinya sendiri.
Verse 58
न त्वेवात्मावमन्तव्य: पुरुषेण कदाचन । न हाात्मपरिभूतस्य भूतिर्भवति शोभना,मनुष्य कभी अपने-आपका अनादर न करे--अपने-आपको छोटा न समझे। जो स्वयं ही अपना अनादर करता है, उसे उत्तम ऐश्वर्यकी प्राप्ति नहीं होती
Seseorang jangan sekali-kali merendahkan dirinya sendiri atau menganggap dirinya tidak berarti. Sebab bagi orang yang telah menghina nilai dirinya sendiri, tidak akan tumbuh kesejahteraan atau kemakmuran yang sungguh mulia.
Verse 59
एवं संस्थितिका सिद्धिरियं लोकस्य भारत | तत्र सिद्धिर्गति: प्रोक्ता कालावस्थाविभागत:,भारत! लोकको इसी प्रकार कार्यसिद्धि प्राप्त होती है--कार्यसिद्धिकी यही व्यवस्था है। काल और अवस्थाके विभागके अनुसार शत्रुकी दुर्बलताके अन्वेषणका प्रयत्न ही सिद्धिका मूल कारण है
Wahai Bhārata, demikianlah tatanan keberhasilan di dunia ini. Menurut pembagian waktu dan keadaan, upaya meneliti kelemahan musuh disebut sebagai sebab pokok tercapainya keberhasilan.
Verse 60
ब्राह्म॒णं मे पिता पूर्व वासयामास पण्डितम् । सो<पि सर्वामिमां प्राह पित्रे मे भरतर्षभ,भरतमश्रेष्ठ! पूर्वकालमें मेरे पिताजीने अपने घरपर एक दविद्दान् ब्राह्मणको ठहराया था। उन्होंने ही पिताजीसे बृहस्पतिजीकी बतायी हुई इस सम्पूर्ण नीतिका प्रतिपादन किया था और मेरे भाइयोंको भी इसीकी शिक्षा दी थी। उस समय अपने भाइयोंके निकट रहकर घरमें ही मैंने भी उस नीतिको सुना था
Wahai yang terbaik di antara keturunan Bharata, dahulu ayahku menempatkan di rumahnya seorang Brāhmaṇa yang pandai. Dialah yang menyampaikan kepada ayahku seluruh ajaran tata laku ini.
Verse 61
नीतिं बृहस्पतिप्रोक्तां भ्रातृन् मे5ग्राहयत् पुरा । तेषां सकाशादश्रौषमहमेतां तदा गृहे,भरतमश्रेष्ठ! पूर्वकालमें मेरे पिताजीने अपने घरपर एक दविद्दान् ब्राह्मणको ठहराया था। उन्होंने ही पिताजीसे बृहस्पतिजीकी बतायी हुई इस सम्पूर्ण नीतिका प्रतिपादन किया था और मेरे भाइयोंको भी इसीकी शिक्षा दी थी। उस समय अपने भाइयोंके निकट रहकर घरमें ही मैंने भी उस नीतिको सुना था
Wahai yang terbaik di antara Bharata, dahulu ajaran tata laku yang diajarkan oleh Bṛhaspati disampaikan kepada saudara-saudaraku. Berada dekat mereka, pada masa itu di rumah aku pun mendengar nasihat tersebut.
Verse 62
स मां राजन् कर्मवतीमागतामाह सान्त्वयन् । शुश्रूषमाणामासीनां पितुरड्के युधिछ्िर,महाराज युधिष्ठिर! मैं उस समय किसी कार्यसे पिताके पास आयी थी और यह सब सुननेकी इच्छासे उनकी गोदमें बैठ गयी थी। तभी उन ब्राह्मण देवताने मुझे सान्त्वना देते हुए इस नीतिका उपदेश किया था
Wahai Maharaja Yudhiṣṭhira! Saat itu aku datang kepada ayah karena suatu urusan, lalu demi mendengar semuanya aku duduk di pangkuannya. Maka brahmana mulia itu menenangkanku dan menasihatkan ajaran kebijaksanaan ini.
The dilemma concerns whether dharma should be trusted and practiced when its results are not immediately visible—i.e., whether skepticism (nāstikya/ati-śaṅkā) is justified under suffering and delayed outcomes.
Perform prescribed duties without reducing dharma to a transaction; stabilize conduct through āgama and the example of the wise, and avoid corrosive suspicion that undermines both ethical life and one’s capacity for long-term flourishing.
There is no formal phalaśruti formula; however, the chapter contains an explicit meta-assertion that karma has results (karmaṇāṃ phalam asti) and that steadfast, non-doubting adherence to dharma leads to auspicious post-mortem outcomes, while persistent doubt is portrayed as spiritually obstructive.