Adhyaya 29
Vana ParvaAdhyaya 2955 Verses

Adhyaya 29

Kṣānti–Tejas Viveka: Prahlāda’s Instruction to Bali (Draupadī’s Application)

Upa-parva: Draupadī–Yudhiṣṭhira Saṃvāda: Prahlāda–Bali Itihāsa (Kṣānti–Tejas Discourse)

Draupadī cites an ancient itihāsa: Bali Vairochana questions Prahlāda on whether kṣamā (forbearance) or tejas (assertive power) is superior. Prahlāda rejects absolutism—neither constant severity nor constant forbearance is always beneficial. He details the systemic risks of perpetual leniency: subordinates and dependents may disrespect authority, appropriate resources, disregard obligations, and destabilize household order. He then outlines risks of tejas when driven by rajas and anger: misapplied punishments, conflict with allies, social hatred, material loss, and eventual collapse of authority; people fear the harsh ruler as they would a dangerous presence. Prahlāda concludes with a rule of timing: be gentle when appropriate and severe when appropriate; such discernment yields well-being here and beyond. He enumerates ‘kṣamā-kālāḥ’—conditions warranting forgiveness (e.g., prior benefactors, the ignorant, first offenses, inadvertent harms, and prudential considerations of place/time/strength and public risk). Draupadī then interprets the present as a ‘tejas-time’ regarding the persistently harmful Dhārtarāṣṭras, asserting that no current occasion for forbearance remains, while acknowledging that both softness and sharpness have social consequences and that the wise ruler knows their proper timing.

Chapter Arc: वनवास के बीच युधिष्ठिर अपने ही मन के भीतर उठते ज्वार को पहचानते हैं—क्रोध को ‘मनुष्यों का हन्ता’ कहकर वे स्वयं से और अपने निकट जनों से प्रश्न करते हैं कि लोक-नाशक इस अग्नि को कोई धर्मात्मा कैसे आश्रय दे सकता है। → वे क्रोध के परिणामों का क्रमशः विस्तार करते हैं: क्रोध से प्रजा का विनाश, बुद्धि का क्षय, शान्ति का लोप और संबंधों का टूटना। फिर वे प्रतिपक्ष (सुयोधन) के वध तक की इच्छा को भी क्रोधजन्य प्रलोभन मानकर कठोर आत्मसंयम का आग्रह करते हैं—यहाँ नैतिक संघर्ष तीव्र होता है, क्योंकि अन्याय का प्रतिकार और क्षमा का व्रत आमने-सामने खड़े हैं। → युधिष्ठिर का निर्णायक कथन उभरता है: ‘संपूर्ण लोक के संकुपित होने पर भी शम (शान्ति) ही प्रजाओं के संधि-मूल है’—और ‘सर्व आपत्तियों में क्षमा’ को पुरुषार्थ का शिखर बताकर वे क्रोध-त्याग को ही सच्चा तेज घोषित करते हैं। → अध्याय का निष्कर्ष यह बनता है कि वास्तविक तेज वह है जिसमें भीतर क्रोध का निवास नहीं; जो उत्पन्न क्रोध को बुद्धि से दबा देता है, वही तत्त्वदर्शियों की दृष्टि में तेजस्वी है। युधिष्ठिर क्षमा को नीति, आत्मरक्षा और लोक-कल्याण—तीनों का आधार ठहराते हैं। → क्षमा का यह आदर्श-निर्णय आगे के व्यवहार में कैसे टिकेगा—विशेषतः सुयोधन के अन्याय और भविष्य के संघर्षों के सामने—यह प्रश्न अनुत्तरित रहकर अगले प्रसंगों की ओर संकेत करता है।

Shlokas

Verse 1

#:2:8 #:23:.7 () हि २ 7 एकोनत्रिशो< ध्याय: युधिष्ठिरके द्वारा क्रोधकी निन्‍दा और क्षमाभावकी विशेष प्रशंसा युधिछिर उवाच क्रोधो हन्ता मनुष्याणां क्रोधो भावयिता पुन: । इति विद्धि महाप्राज्ञे क्रोधमूली भवाभवौ,युधिछिर बोले--परम बुद्धिमती द्रौपदी! क्रोध ही मनुष्योंको मारनेवाला है और क्रोध ही यदि जीत लिया जाय तो अभ्युदय करनेवाला है। तुम यह जान लो कि उन्नति और अवनति दोनों क्रोधमूलक ही हैं (क्रोधको जीतनेसे उन्नति और उसके वशीभूत होनेसे अवनति होती है)

Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai yang amat bijaksana, amarah adalah pembunuh manusia; namun amarah itu pula, bila ditaklukkan, menjadi sebab kemajuan. Ketahuilah: naik dan jatuh, keduanya berakar pada amarah.”

Verse 2

यो हि संहरते क्रोधं भवस्तस्य सुशोभने । यः पुन: पुरुष: क्रोधं नित्यं न सहते शुभे । तस्याभावाय भवति क्रोध: परमदारुण:,सुशोभने! जो क्रोधको रोक लेता है, उसकी उन्नति होती है और जो मनुष्य क्रोधके वेगको कभी सहन नहीं कर पाता, उसके लिये वह परम भयंकर क्रोध विनाशकारी बन जाता है

Wahai yang elok rupawan, siapa menahan amarah akan memperoleh kemajuan; tetapi orang yang tak pernah sanggup menanggung gelora amarah, baginya amarah itu menjadi amat kejam dan membawa kebinasaan.

Verse 3

क्रोधमूलो विनाशो हि प्रजानामिह दृश्यते । तत्‌ कथं मादृश: क्रोधमुत्सूजेल्लोकनाशनम्‌,इस जगतमें क्रोधके कारण लोगोंका नाश होता दिखायी देता है; इसलिये मेरे-जैसा मनुष्य लोकविनाशक क्रोधका उपयोग दूसरोंपर कैसे करेगा?

Di dunia ini tampak jelas bahwa kebinasaan manusia berakar pada amarah. Maka bagaimana mungkin orang sepertiku menyerahkan diri pada amarah—dorongan yang membinasakan dunia?

Verse 4

क्रुद्ध: पापं नर: कुर्यात्‌ क्रुद्धों हन्याद्‌ गुरूनपि । क्रुद्ध: परुषया वाचा श्रेयसो5प्यवमन्यते,क्रोधी मनुष्य पाप कर सकता है, क्रोधके वशीभूत मानव गुरुजनोंकी भी हत्या कर सकता है और क्रोधमें भरा हुआ पुरुष अपनी कठोर वाणीद्वारा श्रेष्ठ मनुष्योंका भी अपमान कर देता है

Orang yang dikuasai amarah dapat melakukan dosa; dalam murka ia bahkan dapat membunuh para guru. Dan ketika amarah meluap, dengan kata-kata yang keras ia merendahkan orang-orang mulia sekalipun.

Verse 5

वाच्यावाच्ये हि कुपितो न प्रजानाति कहिचित्‌ । नाकार्यमस्ति क्रुद्धस्य नावाच्यं विद्यते तथा,क्रोधी मनुष्य कभी यह नहीं समझ पाता कि क्‍या कहना चाहिये और क्‍या नहीं। क्रोधीके लिये कुछ भी अकार्य अथवा अवाच्य नहीं है

Orang yang diliputi amarah sama sekali tidak mampu membedakan apa yang patut diucapkan dan apa yang tidak. Bagi yang murka, tiada perbuatan yang tersisa sebagai ‘tak boleh dilakukan’, dan tiada pula kata yang tersisa sebagai ‘tak boleh diucapkan’.

Verse 6

हिंस्यात्‌ क्रोधादवध्यांस्तु वध्यान्‌ सम्पूजयीत च । आत्मानमपि च क्रुद्धः प्रेषयेद्‌ यमसादनम्‌,क्रोधवश वह अवध्य पुरुषोंकी भी हत्या कर सकता है और वधके योग्य मनुष्योंकी भी पूजामें तत्पर हो सकता है। इतना ही नहीं, क्रोधी मानव (आत्महत्याद्वारा) अपने-आपको भी यमलोकका अतिथि बना सकता है

Digerakkan oleh amarah, seseorang dapat menyakiti mereka yang tak patut disakiti, dan secara terbalik memuliakan mereka yang layak dihukum. Bahkan, ketika dikuasai murka, ia dapat mengirim dirinya sendiri ke kediaman Yama melalui penghancuran diri.

Verse 7

एतान्‌ दोषान्‌ प्रपश्यद्धिर्जित: क्रोधो मनीषिभि: । इच्छद्धि: परमं श्रेय इह चामुत्र चोत्तमम्‌,इन दोषोंको देखनेवाले मनस्वी पुरुषोंने, जो इहलोक और परलोकमें भी परम उत्तम कल्याणकी इच्छा रखते हैं, क्रोधको जीत लिया है

Melihat dengan jelas cacat-cacat ini, para bijak yang mendambakan kebaikan tertinggi—di dunia ini dan di dunia sana—telah menaklukkan amarah.

Verse 8

त॑ं क्रोध॑ वर्जितं धीरै: कथमस्मद्विधश्चरेत्‌ । एतद्‌ द्रौपदि संधाय न मे मन्यु: प्रवर्धते,अतः धीर पुरुषोंने जिसका परित्याग कर दिया है। उस क्रोधको मेरे-जैसा मनुष्य कैसे उपयोगमें ला सकता है? ट्रपदकुमारी! यही सोचकर मेरा क्रोध कभी बढ़ता नहीं है

Bagaimana orang sepertiku dapat memanfaatkan amarah yang telah ditinggalkan oleh mereka yang teguh dan bijaksana? Wahai Draupadī, dengan mengingat hal ini, murkaku tidak bertambah.

Verse 9

आत्मानं च परांश्चैव त्रायते महतो भयात्‌ | क्रुध्यन्तमप्रतिक्रुध्यन्‌ द्वयोरेष चिकित्सक:,क्रोध करनेवाले पुरुषके प्रति जो बदलेमें क्रोध नहीं करता, वह अपनेको और दूसरोंको भी महान्‌ भयसे बचा लेता है। वह अपने और पराये दोनोंके दोषोंको दूर करनेके लिये चिकित्सक बन जाता है

Seseorang yang tidak membalas amarah dengan amarah—tetap tak terpancing meski orang lain sedang murka—menyelamatkan dirinya dan orang lain dari bahaya besar. Orang demikian menjadi laksana tabib, mampu menyembuhkan cela di kedua pihak: pada diri sendiri maupun pada pihak lain.

Verse 10

मूढो यदि क्लिश्यमान: क्रुध्यते5शक्तिमान्‌ नर: । बलीयसां मनुष्याणां त्यजत्यात्मानमात्मना,यदि मूढ़ एवं असमर्थ मनुष्य दूसरोंके द्वारा क्लेश दिये जानेपर स्वयं भी बलिष्ठ मनुष्योंपर क्रोध करता है तो वह अपने ही द्वारा अपने-आपका विनाश कर देता है

Bila seorang yang dungu dan tak berdaya, ketika disakiti orang lain, justru marah kepada mereka yang lebih kuat, maka ia menjerumuskan dirinya sendiri ke dalam kebinasaan oleh perbuatannya sendiri.

Verse 11

तस्यात्मानं संत्यजतो लोका नश्यन्त्यनात्मन: । तस्माद्‌ द्रौपद्यशक्तस्य मन्योर्नियमनं स्मृतम्‌,अपने चित्तको वशमें न रखनेके कारण क्रोधवश देहत्याग करनेवाले उस मनुष्यके लोक और परलोक दोनों नष्ट हो जाते हैं। अतः द्रुपदकुमारी! असमर्थके लिये अपने क्रोधको रोकना ही अच्छा माना गया है

Seseorang yang kehilangan penguasaan diri lalu, dikuasai amarah, sampai meninggalkan nyawanya—baginya kesejahteraan di dunia ini dan di dunia sana sama-sama binasa. Karena itu, wahai Draupadī, bagi yang belum cukup kuat, menahan amarah dipandang sebagai yang terbaik.

Verse 12

विद्वांस्तथैव य:ः शक्तः क्लिश्यमानो न कुप्यति | अनाशयित्वा कलेष्टारं परलोके च नन्दति,इसी प्रकार जो विद्वान्‌ पुरुष शक्तिशाली होकर भी दूसरोंद्वारा क्लेश दिये जानेपर स्वयं क्रोध नहीं करता, वह क्लेश देनेवालेका नाश न करके परलोकमें भी आनन्दका भागी होता है

Demikian pula, seorang bijak yang juga kuat, meski sedang disakiti oleh orang lain, tidak dikuasai amarah. Tanpa membinasakan si penyebab derita, ia pun memperoleh bagian kebahagiaan di alam baka.

Verse 13

तस्माद्‌ बलवता चैव दुर्बलेन च नित्यदा । क्षन्तव्यं पुरुषेणाहुरापत्स्वपि विजानता,इसलिये बलवान्‌ या निर्बल सभी विज्ञ मनुष्योंको सदा आपत्तिकालमें भी क्षमाभावका ही आश्रय लेना चाहिये

Karena itu, baik kuat maupun lemah, seorang yang arif hendaknya senantiasa menempuh jalan pemaafan; bahkan di masa bencana pun, orang bijak menyatakan bahwa kesabaran dan pengampunanlah yang patut dipilih.

Verse 14

मन्योहिं विजयं कृष्णे प्रशंसन्‍्तीह साधव: । क्षमावतो जयो नित्यं साधोरिह सतां मतम्‌,कृष्णे! साधु पुरुष क्रोधको जीतनेकी ही प्रशंसा करते हैं। संतोंका यह मत है कि इस जगत्‌में क्षमाशील साधु पुरुषकी सदा जय होती है

Wahai Kṛṣṇa! Di sini orang-orang saleh memuji kemenangan atas amarah. Inilah pandangan teguh para bajik: di dunia ini, insan yang benar dan sabar itulah yang senantiasa menjadi pemenang sejati.

Verse 15

सत्यं चानृततः श्रेयो नृशंस्याच्चानृशंसता । तमेवं बहुदोषं तु क्रोधं साधुविवर्जितम्‌

Kebenaran lebih mulia daripada dusta, dan welas asih lebih mulia daripada kekejaman. Maka amarah—yang sarat banyak cela dan dijauhi orang-orang baik—patut disingkirkan.

Verse 16

तेजस्वीति यमाहुर्व पण्डिता दीर्घदर्शिन:

Para bijak yang berpandangan jauh menyebut dialah ‘tejasvī’—yang bercahaya oleh daya dan kekuatan budi.

Verse 17

यस्तु क्रोधं समुत्पन्नं प्रज्ञया प्रतिबाधते

Barangsiapa, ketika amarah telah bangkit, menahannya dengan kebijaksanaan jernih,

Verse 18

क्रुद्धों हि कार्य सुश्रोेणि न यथावत्‌ प्रपश्यति । नाकार्य न च मर्यादां नर: क्रुद्धोडनुपश्यति,सुन्दरी! क्रोधी मनुष्य किसी कार्यको ठीक-ठीक नहीं समझ पाता। वह यह भी नहीं जानता कि मर्यादा क्‍या है (अर्थात्‌ क्या करना चाहिये) और क्‍या नहीं करना चाहिये

Wahai wanita berpinggul elok! Saat seseorang dikuasai amarah, ia tak mampu melihat suatu perkara sebagaimana adanya. Dalam keadaan itu ia tak membedakan apa yang tak patut dilakukan, dan ia pun tak lagi memandang batas-batas tata susila; orang yang marah kehilangan kendali dan pertimbangan benar.

Verse 19

हन्त्यवध्यानपि क्ुद्धो गुरून्‌ क्रुद्धस्तुदत्यपि । तस्मात्‌ तेजसि कर्तव्य: क्रोधो दूरे प्रतिष्ठित:,क्रोधी मनुष्य अवध्य पुरुषोंका वध कर देता है। क्रोधी मनुष्य गुरुजनोंको कटु वचनोंद्वारा पीड़ा पहुँचाता है। इसलिये जिसमें तेज हो, उस पुरुषको चाहिये कि वह क्रोधको अपनेसे दूर रखे

Yudhiṣṭhira berkata: “Seorang manusia, ketika dikuasai amarah, dapat membunuh bahkan mereka yang tak patut dibunuh; dan dalam amarah ia melukai para guru serta orang tua dengan kata-kata yang pedih. Karena itu, siapa yang memiliki kekuatan batin hendaknya menempatkan amarah jauh dari dirinya.”

Verse 20

दाक्ष्यं हमर्ष: शौर्य च शीघ्रत्वमिति तेजस: । गुणा! क्रोधाभिभूतेन न शक्‍्या: प्राप्तुमजजसा,दक्षता, अमर्ष, शौर्य और शीघ्रता--ये तेजके गुण हैं। जो मनुष्य क्रोधसे दबा हुआ है, वह इन गुणोंको सहजमें ही नहीं पा सकता

Yudhiṣṭhira berkata: “Kecakapan, keteguhan menghadapi penghinaan, keberanian, dan ketangkasan—itulah sifat-sifat yang lahir dari daya batin. Namun orang yang ditundukkan amarah tidak dapat meraih kebajikan itu dengan mudah.”

Verse 21

क्रोधं॑ त्यक्त्वा तु पुरुष: सम्यक्‌ तेजो5भिपद्यते । कालयुक्तं महा प्राज्ञे क्रुद्धैेस्‍्तेज: सुदुःसहम्‌,क्रोधका त्याग करके मनुष्य भलीभाँति तेज प्राप्त कर लेता है। महाप्राज्ञे! क्रोधी पुरुषोंके लिये समयके उपयुक्त तेज अत्यन्त दु:ःसह है

Yudhiṣṭhira berkata: “Dengan meninggalkan amarah, seseorang sungguh meraih sinar dan kekuatan batin. Wahai mahābijak, bagi mereka yang dikuasai amarah, daya orang lain yang digunakan pada saat yang tepat dan diarahkan dengan benar menjadi amat sukar ditanggung.”

Verse 22

क्रोधस्त्वपण्डितै: शश्वत्‌ तेज इत्यभिनिश्चितम्‌ । रजस्तु लोकनाशाय विहितं मानुषं प्रति,मूर्खलोग क्रोधको ही सदा तेज मानते हैं। परन्तु रजोगुणजनित क्रोधका यदि मनुष्योंके प्रति प्रयोग हो तो वह लोगोंके नाशका कारण होता है

Yudhiṣṭhira berkata: “Orang yang tidak bijak senantiasa menyimpulkan bahwa amarah itulah ‘daya’ dan ‘kemilau’. Namun dorongan yang lahir dari rajas itu, bila diarahkan kepada sesama manusia, ditetapkan menjadi sebab kebinasaan banyak orang.”

Verse 23

तस्माच्छश्वत्‌ त्यजेत्‌ क्रोधं पुरुष: सम्यगाचरन्‌ | श्रेयान्‌ स्वधर्मानपगो न क्ुद्ध इति निश्चितम्‌,अतः सदाचारी पुरुष सदा क्रोधका परित्याग करे। अपने वर्णधर्मके अनुसार न चलनेवाला मनुष्य (अपेक्षाकृत) अच्छा, किंतु क्रोधी नहीं अच्छा--यह निश्चय है

Karena itu, orang yang berusaha hidup benar hendaknya senantiasa meninggalkan amarah. Telah dipastikan: bahkan seseorang yang menyimpang dari kewajibannya sendiri masih lebih baik daripada orang yang pemarah; sebab amarah menghancurkan kejernihan budi dan laku, sedangkan kekeliruan dalam kewajiban masih dapat diperbaiki dengan pengekangan diri.

Verse 24

यदि सर्वमबुद्धीनामतिक्रान्तमचेतसाम्‌ | अतिक्रमो मद्विधस्य कथंस्वित्‌ स्यादनिन्दिते,साध्वी द्रौपदी! यदि मूर्ख और अविवेकी मनुष्य क्षमा आदि सद्‌गुणोंका उल्लंघन कर जाते हैं तो मेरे-जैसा विज्ञ पुरुष उनका अतिक्रमण कैसे कर सकता है?

Yudhiṣṭhira berkata: “Jika orang-orang bodoh dan tak berdaya membedakan benar-salah—mereka yang batinnya tak teguh—sampai melampaui batas kesabaran dan kebajikan lainnya, bagaimana mungkin orang sepertiku, yang dituntut mengetahui dharma, melakukan pelanggaran semacam itu? Wahai yang tak bercela, Draupadī yang mulia!”

Verse 25

यदि न स्युर्मानुषेषु क्षमिण: पृथिवीसमा: । न स्यात्‌ संधिर्मनुष्याणां क्रोधमूलो हि विग्रह:,यदि मनुष्योंमें पृथ्वीके समान क्षमाशील पुरुष न हों तो मानवोंमें कभी सन्धि हो ही नहीं सकती; क्योंकि झगड़ेकी जड़ तो क्रोध ही है

Yudhiṣṭhira berkata: “Jika di antara manusia tidak ada pribadi pemaaf yang teguh seperti bumi, maka perdamaian di antara manusia takkan pernah terjadi. Sebab akar pertikaian adalah amarah.”

Verse 26

अभिषक्तो हाभिषजेदाहन्याद्‌ गुरुणा हतः । एवं विनाशो भूतानामथधर्म: प्रथितो भवेत्‌,यदि कोई अपनेको सतावे तो स्वयं भी उसको सतावे। औरोंकी तो बात ही कया है, यदि गुरुजन अपनेको मारें तो उन्हें भी मारे बिना न छोड़े; ऐसी धारणा रखनेके कारण सब प्राणियोंका ही विनाश हो जाता है और अधर्म बढ़ जाता है

Yudhiṣṭhira berkata: “Jika orang yang dikutuk membalas dengan kutukan, dan orang yang dipukul membalas pukulan—bahkan terhadap guru yang menyakitinya—maka asas semacam itu akan membawa kebinasaan bagi semua makhluk. Dengan demikian, adharma justru akan dipuja sebagai ‘dharma’.”

Verse 27

आद्ुष्ट: पुरुष: सर्व प्रत्याक्रोशेदनन्तरम्‌ । प्रतिहन्याद्धतश्चलैव तथा हिंस्याच्च हिंसित:,यदि सभी क्रोधके वशीभूत हो जायँ तो एक मनुष्य दूसरेके द्वारा गाली खाकर स्वयं भी बदलेमें उसे गाली दे सकता है। मार खानेवाला मनुष्य बदलेमें मार सकता है। एकका अनिष्ट होनेपर वह दूसरेका भी अनिष्ट कर सकता है

Yudhiṣṭhira berkata: “Jika semua orang berada di bawah kuasa amarah, maka orang yang tak bersalah pun, setelah dihina, akan segera menghina balik. Yang dipukul akan memukul kembali; yang disakiti akan menyakiti pula. Demikianlah luka melahirkan luka dalam rantai yang tak terputus.”

Verse 28

हन्युहिं पितर: पुत्रान्‌ पुत्राश्ापि तथा पितृन्‌ | हन्युश्व पतयो भार्या: पतीन्‌ भार्यास्तथैव च,पिता पुत्रोंको मारेंगें और पुत्र पिताको, पति पत्नियोंकों मारेंगे और पत्नियाँ पतिको

Yudhiṣṭhira berkata: “Maka para ayah akan membunuh putra-putranya, dan putra-putra pun ayah mereka; para suami akan membunuh istri-istri mereka, dan para istri pun suami mereka.”

Verse 29

एवं संकुपिते लोके शम: कृष्णे न विद्यते । प्रजानां संधिमूलं हि शमं विद्धि शुभानने,कृष्णे! इस प्रकार सम्पूर्ण जगतके क्रोधका शिकार हो जानेपर तो कहीं शान्ति नहीं रहती। शुभानने! तुम यह जान लो कि सम्पूर्ण प्रजाकी शान्ति सन्धिमूलक ही है इति श्रीमहा भारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि द्रौपदीयुधिष्ठिरसंवादे एकोनत्रिंशो5ध्याय:

Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai Kṛṣṇā, ketika seluruh dunia terguncang oleh amarah dan kegelisahan, kedamaian tak ditemukan di mana pun. Wahai yang berwajah elok, pahamilah ini: kedamaian rakyat berakar pada perdamaian dan rekonsiliasi—ketahuilah, damai lahir dari terciptanya kesepahaman.”

Verse 30

ताः क्षिपेरन्‌ प्रजा: सर्वाः क्षिप्रं द्रौपदि तादृशे । तस्मान्मन्युविनाशाय प्रजानामभवाय च,द्रौपदी! यदि राजा तुम्हारे कथनानुसार क्रोधी हो जाय तो सारी प्रजाओंका शीघ्र ही नाश हो जायगा। अत: यह समझ लो कि क्रोध प्रजावर्गके नाश और अवनतिका कारण है

Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai Draupadī, bila seorang raja menjadi pemarah seperti yang kau gambarkan, ia akan segera menyeret seluruh rakyatnya ke dalam kebinasaan. Maka pahamilah: amarah adalah sebab kehancuran dan kemerosotan rakyat.”

Verse 31

यस्मात्‌ तु लोके दृश्यन्ते क्षमिण: पृथिवीसमा: । तस्माज्जन्म च भूतानां भवश्च प्रतिपद्यते,इस जगतमें पृथ्वीके समान क्षमाशील पुरुष भी देखे जाते हैं, इसीलिये प्राणियोंकी उत्पत्ति और वृद्धि होती रहती है

Sebab di dunia ini masih tampak orang-orang pemaaf yang tabah laksana bumi; karena itu kelahiran makhluk hidup dan kelangsungan pertumbuhan serta keberadaan mereka dapat terus berlangsung.

Verse 32

क्षन्तव्यं पुरुषेणेह सर्वापत्सु सुशो भने । क्षमावतो हि भूतानां जन्म चैव प्रकीर्तितम्‌,सुशोभने! पुरुषको सभी आपत्तियोंमें क्षमाभाव रखना चाहिये। क्षमाशील पुरुषसे ही समस्त प्राणियोंका जीवन बताया गया है

Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai yang elok rupanya, di dunia ini seorang lelaki hendaknya menaruh kesabaran dan memaafkan dalam setiap kesusahan. Sebab dikatakan: kelangsungan hidup dan kesejahteraan makhluk bergantung pada orang yang sabar dan pemaaf.”

Verse 33

आक्रुष्टस्ताडित: क्रुद्धः क्षमते यो बलीयसा । यश्व नित्यं जितक्रोधो विद्वानुत्तमपूरुष:,जो बलवान पुरुषके गाली देने या कुपित होकर मारनेपर भी क्षमा कर जाता है तथा जो सदा अपने क्रोधको काबूमें रखता है, वही विद्वान्‌ है और वही श्रेष्ठ पुरुष है

Orang yang, meski dicaci, dipukul, dan diprovokasi oleh seseorang yang lebih kuat, tetap memaafkan; dan yang senantiasa menaklukkan amarahnya—dialah yang bijaksana, dialah insan terbaik.

Verse 34

प्रभाववानपि नरस्तस्य लोका: सनातना: । क्रोधनस्त्वल्पविज्ञान: प्रेत्य चेह च नश्यति,वही मनुष्य प्रभावशाली कहा जाता है। उसीको सनातन लोक प्राप्त होते हैं। क्रोधी मनुष्य अल्पज्ञ होता है। वह इस लोक और परलोक दोनोंमें विनाशका ही भागी होता है

Seseorang benar-benar disebut berkuasa dan berpengaruh bila, melalui laku yang benar, ia meraih alam-alam yang kekal. Tetapi orang yang dikuasai amarah, karena miskin pertimbangan, binasa baik di dunia ini maupun setelah kematian.

Verse 35

अत्राप्युदाहरन्तीमा गाथा नित्यं क्षमावताम्‌ | गीता: क्षमावता कृष्णे काश्यपेन महात्मना,इस विषयमें जानकार लोग क्षमावान्‌ पुरुषोंकी गाथाका उदाहरण देते हैं। कृष्णे! क्षमावान्‌ महात्मा काश्यपने इस गाथाका गान किया है

Dalam hal ini pula, orang-orang yang memahami perkara itu senantiasa mengutip gāthā ini sebagai teladan laku para pemaaf. Wahai Kṛṣṇā, gāthā ini dinyanyikan oleh Mahātmā Kāśyapa, yang termasyhur karena kesabarannya.

Verse 36

क्षमा धर्म: क्षमा यज्ञ: क्षमा वेदा: क्षमा: श्रुतम्‌ । य एतदेवं जानाति स सर्व क्षन्तुमहति,क्षमा धर्म है, क्षमा यज्ञ है, क्षमा वेद है और क्षमा शास्त्र है। जो इस प्रकार जानता है, वह सब कुछ क्षमा करनेके योग्य हो जाता है

Forbearance adalah dharma; forbearance adalah yajña; forbearance adalah Veda; forbearance adalah śruti. Siapa yang memahami kebenaran ini, ia layak memaafkan segalanya.

Verse 37

क्षमा ब्रह्म क्षमा सत्यं क्षमा भूतं च भावि च । क्षमा तप: क्षमा शौचं क्षमयेदं धृतं जगत्‌,क्षमा ब्रह्म है, क्षमा सत्य है, क्षमा भूत है, क्षमा भविष्य है, क्षमा तप है और क्षमा शौच है। क्षमाने ही सम्पूर्ण जगत्‌को धारण कर रखा है

Forbearance adalah Brahman; forbearance adalah kebenaran. Forbearance adalah yang telah terjadi dan yang akan datang. Forbearance adalah tapa; forbearance adalah kesucian. Oleh forbearance-lah seluruh jagat ini ditegakkan.

Verse 38

अति यज्ञविदां लोकान्‌ क्षमिण: प्राप्तुवन्ति च । अति ब्रह्मविदां लोकानति चापि तपस्विनाम्‌,क्षमाशील मनुष्य यजवेत्ता, ब्रह्मवेत्ता और तपस्वी पुरुषोंसे भी ऊँचे लोक प्राप्त करते हैं

Mereka yang pemaaf meraih alam-alam yang lebih tinggi daripada alam para ahli yajña; lebih tinggi daripada alam para jñānī Brahman; dan bahkan lebih tinggi daripada alam para tapasvin.

Verse 39

अन्ये वै यजुषां लोका: कर्मिणामपरे तथा । क्षमावतां ब्रह्मलोके लोका: परमपूजिता:,(सकामभावसे) यज्ञकर्मोंका अनुष्ठान करनेवाले पुरुषोंके लोक दूसरे हैं एवं (सकामभावसे) वापी, कूप, तडाग और दान आदि कर्म करनेवाले मनुष्योंके लोक दूसरे हैं। परंतु क्षमावानोंके लोक ब्रह्मलोकके अन्तर्गत हैं; जो अत्यन्त पूजित हैं

Yudhiṣṭhira berkata: “Dunia yang dicapai oleh mereka yang tekun pada tata-ritus Yajurveda adalah satu macam; dan dunia yang dicapai oleh para pelaku kebajikan lainnya adalah macam yang lain. Namun dunia milik mereka yang ber-kṣamā—yang sabar dan pemaaf—termasuk dalam Brahmaloka sendiri, dan itulah yang paling dimuliakan.”

Verse 40

क्षमा तेजस्विनां तेज: क्षमा ब्रह्म तपस्विनाम्‌ । क्षमा सत्यं सत्यवतां क्षमा यज्ञ: क्षमा शम:,क्षमा तेजस्वी पुरुषोंका तेज है, क्षमा तपस्वियोंका ब्रह्म है, क्षमा सत्यवादी पुरुषोंका सत्य है। क्षमा यज्ञ है और क्षमा शम (मनोनिग्रह) है

“Bagi yang bercahaya, kṣamā itulah kemilau sejatinya; bagi para pertapa, kṣamā itulah Brahman; bagi para penegak kebenaran, kṣamā itulah kebenaran mereka. Kṣamā adalah yajña, dan kṣamā adalah śama—pengendalian diri.”

Verse 41

तां क्षमां तादृशीं कृष्णे कथमस्मद्विधस्त्यजेत्‌ । यस्यां ब्रह्म च सत्यं च यज्ञा लोकाश्न घिषछिता:,कृष्णे! जिसका महत्त्व ऐसा बताया गया है, जिसमें ब्रह्म, सत्य, यज्ञ और लोक सभी प्रतिष्ठित हैं, उस क्षमाको मेरे-जैसा मनुष्य कैसे छोड़ सकता है

“Wahai Kṛṣṇā, bagaimana mungkin orang sepertiku meninggalkan kṣamā yang demikian? Sebab di dalam kṣamā itulah Brahman, kebenaran, yajña, dan dunia-dunia ditegakkan. Meninggalkan pengampunan berarti meninggalkan penopang dharma.”

Verse 42

क्षन्तव्यमेव सततं पुरुषेण विजानता । यदा हि क्षमते सर्व ब्रह्म सम्पद्यते तदा,विद्वान पुरुषको सदा क्षमाका ही आश्रय लेना चाहिये। जब मनुष्य सब कुछ सहन कर लेता है, तब वह ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है

“Orang yang berakal budi harus senantiasa berpegang pada kṣamā. Sebab ketika seseorang sungguh-sungguh menanggung dan mengampuni segalanya, saat itulah ia mencapai keadaan Brahman.”

Verse 43

क्षमावतामयं लोक: परश्रैव क्षमावताम्‌ | इह सम्मानमृच्छन्ति परत्र च शुभां गतिम्‌,क्षमावानोंके लिये ही यह लोक है। क्षमावानोंके लिये ही परलोक है। क्षमाशील पुरुष इस जगतमें सम्मान और परलोकमें उत्तम गति पाते हैं

“Dunia ini milik mereka yang ber-kṣamā, dan alam sana pun milik mereka yang ber-kṣamā. Di sini mereka meraih kehormatan; di sana mereka mencapai tujuan yang mulia.”

Verse 44

येषां मन्युर्मनुष्याणां क्षमयाभिहत: सदा । तेषां परतरे लोकास्तस्मात्‌ क्षान्ति: परा मता,जिन मनुष्योंका क्रोध सदा क्षमाभावसे दबा रहता है, उन्हें सर्वोत्तम लोक प्राप्त होते हैं। अत: क्षमा सबसे उत्कृष्ट मानी गयी है

Mereka yang amarahnya senantiasa dipukul jatuh dan ditahan oleh pemaafan akan mencapai alam-alam yang lebih tinggi dan lebih mulia. Karena itu, pemaafan dipandang sebagai kebajikan tertinggi.

Verse 45

इति गीता: काश्यपेन गाथा नित्यं क्षमावताम्‌ | श्रुत्वा गाथा: क्षमायास्त्व॑ तुष्य द्रौपदि मा क्रुध:,इस प्रकार काश्यपजीने नित्य क्षमाशील पुरुषोंकी इस गाथाका गान किया है। द्रौपदी! क्षमाकी यह गाथा सुनकर संतुष्ट हो जाओ, क्रोध न करो

Demikianlah Kāśyapa senantiasa melantunkan gāthā ini bagi mereka yang teguh dalam pemaafan. Draupadī, setelah mendengar ajaran tentang kesabaran ini, tenangkanlah hati dan jangan menyerah pada amarah.

Verse 46

पितामह: शान्तनव: शमं सम्पूजयिष्यति । कृष्णश्न देवकीपुत्र: शमं सम्पूजयिष्यति,मेरे पितामह शान्तनुनन्दन भीष्म शान्तिभावका ही आदर करेंगे। देवकीनन्दन श्रीकृष्ण भी शान्तिभावका ही आदर करेंगे

Kakekku, Bhīṣma putra Śāntanu, akan memuliakan jalan damai. Kṛṣṇa, putra Devakī, pun demikian—ia akan menjunjung dan menghormati kedamaian.

Verse 47

आचार्यो विदुर: क्षत्ता शममेव वदिष्यत: । कृपश्च संजयश्चैव शममेव वदिष्यत:,आचार्य द्रोण और विदुर भी शान्तिको ही अच्छा कहेंगे। कृपाचार्य और संजय भी शान्त रहना ही अच्छा बतायेंगे

Ācārya Droṇa dan Vidura sang ksattā pasti akan menasihati hanya kedamaian. Demikian pula Kṛpa dan Saṃjaya—masing-masing akan berkata bahwa damai sajalah jalan yang lebih baik.

Verse 48

सोमदत्तो युयुत्सुश्न द्रोणपुत्रस्तथैव च । पितामहश्न नो व्यास: शमं वदति नित्यश:,सोमदत्त, युयुत्सु, अश्वत्थामा तथा हमारे पितामह व्यास भी सदा शान्तिका ही उपदेश देते हैं

Somadatta, Yuyutsu, dan Aśvatthāmā putra Droṇa—bahkan kakek kami Vyāsa—senantiasa berbicara tentang śama: kedamaian dan pengendalian diri.

Verse 49

एतैहिं राजा नियतं चोद्यमान: शमं प्रति | राज्यं दातेति मे बुद्धिर्न चेल्लोभान्नशिष्यति,ये सब लोग यदि राजा धुृतराष्ट्रको सदा शान्तिके लिये प्रेरित करते रहेंगे तो वे अवश्य मुझे राज्य दे देंगे, ऐसा मुझे विश्वास है। यदि नहीं देंगे तो लोभके कारण नष्ट हो जायँगे

Jika orang-orang ini terus-menerus mendorong Raja Dhṛtarāṣṭra, berulang kali, menuju perdamaian, aku yakin ia akan menganugerahkan kerajaan kepadaku. Namun bila ia tidak memberikannya, ia takkan bertahan—ia akan binasa oleh ketamakan.

Verse 50

कालो<यं दारुण: प्राप्तो भरतानामभूतये । निश्चितं मे सदैवैतत्‌ पुरस्तादपि भाविनि

Waktu yang kejam ini kini telah tiba, membawa kebinasaan bagi kaum Bharata. Hal ini selalu pasti dalam benakku—seakan telah ditakdirkan sejak semula untuk terjadi.

Verse 51

सुयोधनो नार्हतीति क्षमामेवं न विन्दति । अहहस्तत्राहमित्येवं तस्मान्मां विन्दते क्षमा

Ketika kupikir, “Suyodhana tidak layak dimaafkan,” maka aku tak menemukan daya untuk memaafkan. Namun saat kurenungkan, “Aduhai—di sana aku sendiri berdiri, dengan tanganku sendiri (ikut bertanggung jawab),” maka pengampunan datang kepadaku.

Verse 52

इस समय भरतवंशके विनाशके लिये यह बड़ा भयंकर समय आ गया है। भामिनि! मेरा पहलेसे ही ऐसा निश्चित मत है कि सुयोधन कभी भी इस प्रकार क्षमा-भावको नहीं अपना सकता, वह इसके योग्य नहीं है। मैं इसके योग्य हूँ, इसलिये क्षमा मेरा ही आश्रय लेती है ।। एतदात्मवतां वृत्तमेष धर्म: सनातन: । क्षमा चैवानृशंस्यं च तत्‌ कर्तास्म्यहमज्जसा,क्षमा और दया यही जितात्मा पुरुषोंका सदाचार है और यही सनातनधर्म है, अतः मैं यथार्थ रूपसे क्षमा और दयाको ही अपनाऊँगा

Inilah laku orang yang menaklukkan diri; inilah Dharma yang abadi. Pengampunan dan welas asih—itulah yang akan sungguh-sungguh kupegang dan kulaksanakan tanpa ragu. Suyodhana tak mampu memikul sikap memaafkan seperti itu; akulah yang layak, maka pengampunan pun bernaung padaku.

Verse 153

मादृश: प्रसजेत्‌ कस्मात्‌ सुयोधनवधादपि । झूठसे सत्य श्रेष्ठ है। क्रूरतासे दयालुता श्रेष्ठ है, अतः दुर्योधन मेरा वध कर डाले तो भी इस प्रकार अनेक दोषोंसे भरे हुए और सत्पुरुषोंद्वारा परित्यक्त क्रोधका मेरे-जैसा पुरुष कैसे उपयोग कर सकता है?

Mengapa orang sepertiku harus berpaling pada amarah—bahkan demi kematian Suyodhana? Kebenaran lebih luhur daripada dusta; belas kasih lebih luhur daripada kekejaman. Maka, sekalipun Duryodhana membunuhku, bagaimana mungkin orang sepertiku memakai amarah—dorongan yang sarat cela dan ditinggalkan para bijak?

Verse 163

न क्रोधो5भ्यन्तरस्तस्य भवतीति विनिश्चितम्‌ । दूरदर्शी विद्वान जिसे तेजस्वी कहते हैं, उसके भीतर क्रोध नहीं होता; यह निश्चित बात है

Telah dipastikan dengan teguh bahwa amarah tidak bangkit di dalam diri orang semacam itu. Ia yang berpandangan jauh, berilmu, dan bercahaya—yang disebut orang ‘tejasvī’—tidak menyimpan murka di batinnya.

Verse 173

तेजस्विनं त॑ विद्वांसो मन्यन्ते तत्त्वदर्शिन: । जो उत्पन्न हुए क्रोधको अपनी बुद्धिसे दबा देता है, उसे तत्त्वदर्शी विद्वान्‌ तेजस्वी मानते हैं

Para bijak yang melihat hakikat menganggap dialah ‘tejasvī’—orang yang, ketika amarah timbul, mengekangnya dengan kecerdasan beningnya sendiri.

Frequently Asked Questions

The dilemma is governance under provocation: whether a leader should prioritize forbearance (kṣamā) to avoid escalation or assertive enforcement (tejas) to prevent exploitation—resolved by rejecting fixed rules and requiring contextual judgment.

Ethical action is conditional, not absolute: restraint without discernment invites disorder, while power without restraint invites fear and collapse; the stable path is calibrated response guided by time, place, capability, and the nature of the offense.

No explicit phalaśruti is stated; the chapter’s meta-claim is pragmatic-ethical: the ruler who knows when to be gentle and when to be severe attains well-being ‘here and hereafter,’ positioning discernment itself as the chapter’s implied soteriological and political value.