यो हि संहरते क्रोधं भवस्तस्य सुशोभने । यः पुन: पुरुष: क्रोधं नित्यं न सहते शुभे । तस्याभावाय भवति क्रोध: परमदारुण:,सुशोभने! जो क्रोधको रोक लेता है, उसकी उन्नति होती है और जो मनुष्य क्रोधके वेगको कभी सहन नहीं कर पाता, उसके लिये वह परम भयंकर क्रोध विनाशकारी बन जाता है
Wahai yang elok rupawan, siapa menahan amarah akan memperoleh kemajuan; tetapi orang yang tak pernah sanggup menanggung gelora amarah, baginya amarah itu menjadi amat kejam dan membawa kebinasaan.
युधिछिर उवाच