
धर्मव्याधोपदेशः (Dharma-vyādha’s Instruction on Śiṣṭācāra and Dharma)
Upa-parva: Dharma-vyādha Upākhyāna (The Discourse of the Righteous Hunter/Butcher)
Mārkaṇḍeya narrates how a brāhmaṇa, reflecting on prior admonitions and the subtle movement of dharma, journeys to Mithilā to seek the dharma-vyādha. The city is described as prosperous and orderly under King Janaka, marked by structured streets, commerce, and continual civic festivity. The brāhmaṇa locates the dharma-vyādha in a slaughter-market setting, yet the latter receives him with reverence, anticipates the purpose of his visit, and invites him home. In dialogue, the brāhmaṇa expresses moral discomfort at the hunter/butcher’s occupation; the dharma-vyādha responds by articulating svadharma as inherited vocation maintained without cruelty of intent, coupled with service to elders, truthful speech, non-envy, measured giving, and hospitality. He outlines a model of polity: rulers sustain dharma by ensuring subjects remain in their proper duties and by correcting deviations. The discourse then turns to śiṣṭācāra: its purifiers (yajña, dāna, tapas, Veda, satya), its restraints (control of desire and anger, rejection of hypocrisy and greed), and its defining virtues (ahiṃsā, satya, compassion, humility, patience, self-control). The chapter culminates in a normative catalogue of ‘conduct of the good’ and a caution against disparaging dharma, presenting ethical life as a disciplined, socially embedded practice that yields stability and spiritual ascent.
Chapter Arc: मार्कण्डेय ऋषि देवताओं की एक अद्भुत कथा छेड़ते हैं—धरती पर उतरकर इन्द्र और अग्नि ने धर्मराज शिबि की परीक्षा लेने का निश्चय किया। → अग्नि कबूतर बनकर प्राण-रक्षा की याचना करता हुआ शिबि की गोद में आ गिरता है; उसी क्षण इन्द्र श्येन (बाज) बनकर उसका पीछा करता है और अपना ‘आहार’ माँगता है। राजा के सामने दो धर्म खड़े हो जाते हैं—शरणागत की रक्षा और हिंसक शिकारी के ‘न्याय’ का प्रतिकार। → राजा शिबि कबूतर के प्राणों के बदले अपने शरीर का मांस देने को तैयार होते हैं; तुला मँगाई जाती है, पर जितना मांस वे काटकर रखते हैं, कबूतर फिर भी भारी पड़ता है। अंततः शिबि स्वयं को ही तुला पर चढ़ाने को उद्यत होते हैं—स्व-त्याग की पराकाष्ठा। → देवता अपना रूप प्रकट करते हैं; शिबि की कीर्ति, करुणा और सत्य-प्रतिज्ञा की प्रशंसा होती है। शिबि के त्याग को ‘शिव’ (कल्याणकारी) कहा जाता है और वर/आशीर्वाद के साथ कथा धर्म-प्रतिष्ठा पर ठहरती है। → पुत्र-प्राप्ति और नाम-व्युत्पत्ति का संकेत दिया जाता है—भविष्य में उत्पन्न पुत्र परीक्षा-भेदन से प्रकट होगा, इसीलिए वह ‘औद्धिद’ कहलाएगा।
Verse 1
ऑरड.2 23: | हि 7 7 सप्तनवर्त्याधेकशततमो< ध्याय: इन्द्र और अग्निद्वारा राजा शिबिकी परीक्षा मार्कण्डेय उवाच देवानां कथा संजाता महीतलं गत्वा महीपतिं शिबिमौशीनरं साध्वेनं शिबिं जिज्ञास्याम इति। एवं भो इत्युक्त्वा अग्नीन्द्रावुपतिछेताम्,मार्कण्डेयजी कहते हैं--युधिष्ठिर![ एक समय देवताओंमें परस्पर यह बातचीत हुई कि “पृथ्वीपर चलकर हम उशीनरके पुत्र राजा शिबिकी श्रेष्ठताकी परीक्षा करें।' "ऐसा ही हो” यह कहकर अग्नि और इन्द्र वहाँ जानेके लिये उद्यत हुए
Mārkaṇḍeya berkata: Di antara para dewa timbul pembicaraan, “Marilah kita turun ke bumi dan menguji Raja Śibi Auśīnara, penguasa negeri; marilah kita mengetahui nilai sejati Śibi yang saleh itu.” Sambil berkata, “Demikianlah,” Agni dan Indra pun bersiap berangkat dan mendekat untuk maksud itu.
Verse 2
अग्नि: कपोतरूपेण तमभ्यधावदामिषार्थमिन्द्र: श्येनरूपेण,अग्निदेव कबूतरका रूप धारण करके मानो अपने प्राण बचानेके लिये राजाके पास भागते हुए गये और इन्द्रने बाज पक्षीका रूप धारण कर मांसके लिये उस कबूतरका पीछा किया
Agni, mengambil wujud seekor merpati, bergegas menghampiri sang raja demi perlindungan; dan Indra, menjelma sebagai elang, mengejar merpati itu demi daging.
Verse 3
अथ कपोतो राज्ञो दिव्यासनासीनस्योत्सड्रं न््यपतत्,राजा शिबि अपने दिव्य सिंहासनपर बैठे हुए थे। कबूतर उनकी गोदमें जा गिरा
Lalu merpati itu mendadak jatuh ke pangkuan Raja Śibi yang tengah duduk di atas singgasana ilahinya.
Verse 4
अथ पुरोहितो राजानमब्रवीत् । प्राणरक्षार्थ श्येनादू भीतो भवन्तं प्राणार्थी प्रपद्यते,यह देखकर पुरोहितने राजासे कहा--“महाराज! यह कबूतर बाजके डरसे अपने प्राणोंकी रक्षाके लिये आपकी शरणमें आया है। किसी तरह प्राण बच जायँ--यही इसका प्रयोजन है
Kemudian pendeta istana berkata kepada sang raja, “Wahai Raja, merpati ini, gentar oleh elang, datang berlindung kepadamu demi menyelamatkan nyawanya; ia memohon hidup.”
Verse 5
वसु ददातु अन्तवान् पार्थिवोडस्यथ निष्कृतिं कुर्याद् घोरं कपोतस्य निपातमाहु:,'परंतु विद्वान् पुरुष कहते हैं कि 'इस तरह कबूतरका आकर गिरना भयंकर अनिष्टका सूचक है।' आपकी मृत्यु निकट जान पड़ती है; अतः आपको इस उत्पातकी शान्ति करनी चाहिये। आप धन दान करें'
Mārkaṇḍeya berkata: “Hendaklah sang raja memberikan harta sebagai penebusan; sebab jatuhnya seekor merpati secara tiba-tiba dinyatakan sebagai pertanda yang mengerikan. Orang bijak mengatakan bahwa turunnya demikian menubuatkan malapetaka besar. Kematianmu tampak sudah dekat; karena itu lakukan upacara untuk menenteramkan pertanda ini dan berikanlah derma harta.”
Verse 6
अथ कपोतो राजानमब्रवीत् | प्राणरक्षार्थ श्येनाद्ू भीतो भवन्तं प्राणार्थी प्रपद्ये अज्जैरड्रनि प्राप्यार्थी मुनिर्भूत्वा प्राणांस्त्वां प्रपद्ये,तदनन्तर कबूतरने राजासे कहा--“महाराज! मैं बाजके डरसे प्राण बचानेके लिये प्राणार्थी होकर आपकी शरणमें आया हूँ। मैं वास्तवमें कबूतर नहीं ऋषि हूँ। मैंने स्वेच्छासे पूर्व शरीरसे यह शरीर बदल लिया है। प्राणरक्षक होनेके कारण आप ही मेरे प्राण हैं। मैं आपकी शरणमें हूँ, मुझे बचाइये
Lalu merpati itu berkata kepada raja: “Wahai Maharaja, karena takut pada elang dan demi menyelamatkan nyawaku, aku datang memohon perlindunganmu. Aku mencari hidup itu sendiri, maka aku berserah kepadamu. Ketahuilah, aku bukan merpati sejati; aku seorang resi yang dengan kehendak sendiri mengambil wujud ini. Karena engkau pelindung kehidupan, engkaulah hidupku. Aku berlindung padamu—selamatkan aku.”
Verse 7
स्वाध्यायेन कर्शितं ब्रह्माचारिणं_ मां विद्धि | तपसा दमेन युक्तमाचार्यस्याप्रतिकूलभाषिणम् | एवं युक्तमपापं मां विद्धि,“मुझे ब्रह्मचारी समझिये। मैंने वेदोंका स्वाध्याय करते हुए अपने शरीरको दुर्बल किया है। मैं तपस्वी और जितेन्द्रिय हूँ। आचार्यके प्रतिकूल कभी कोई बात नहीं करता। इस प्रकार मुझे योगयुक्त और निष्पाप जानिये
Mārkaṇḍeya berkata: “Ketahuilah aku seorang brahmacārin, murid selibat yang menjadi kurus oleh swādhyāya yang tiada putus. Aku terlatih oleh tapa dan pengendalian diri, dan tak pernah berkata berlawanan dengan guruku. Maka pahamilah aku sebagai insan yang teguh dalam disiplin yoga dan bebas dari dosa.”
Verse 8
गदामि वेदान् विचिनोमि छन््द: सर्वे वेदा अक्षरशो मे अधीता: । न साधु दान श्रोत्रियस्य प्रदानं मा प्रादा: श्येनाय न कपोतो5स्मि,“मैं वेदोंका प्रवचन और छन्दोंका संग्रह करता हूँ। मैंने सम्पूर्ण वेदोंके एक-एक अक्षरका अध्ययन किया है। मैं श्रोत्रिय विद्वान् हूँ। मुझ-जैसे व्यक्तिको किसी भूखे प्राणीकी भूख बुझानेके लिये उसके हवाले कर देना उत्तम दान नहीं है। अतः आप मुझे बाजको न सौंपिये। मैं कबूतर नहीं हूँ
Mārkaṇḍeya berkata: “Aku melantunkan dan mengajarkan Weda, serta menelaah dan menghimpun metrum-metrumnya. Seluruh Weda telah kupelajari, huruf demi huruf. Aku seorang śrotriya yang berilmu. Menyerahkan orang sepertiku sebagai ‘sedekah’ semata untuk memuaskan lapar suatu makhluk bukanlah derma yang baik. Karena itu, jangan serahkan aku kepada elang—aku bukan merpati.”
Verse 9
अथ श्येनो राजनमब्रवीत्,तदनन्तर बाजने राजासे कहा--“महाराज! प्रायः सभी जीवोंको बारी-बारीसे विभिन्न योनियोंमें जन्म लेकर रहना पड़ता है। मालूम होता है, आप इस सृष्टि-परम्परामें पहले कभी इस कबूतरसे जन्म ग्रहण कर चुके हैं; तभी तो इसे अपने आश्रयमें ले रहे हैं! राजन! मैं आग्रहपर्वूक कहता हूँ, आप इस कबूतरको लेकर मेरे भोजनके कार्यमें विघ्न न डालें"
Kemudian elang itu berkata kepada raja: “Wahai raja agung, hampir semua makhluk harus bergiliran lahir dalam berbagai rahim dan wujud. Tampaknya dalam rangkaian ciptaan dunia ini engkau pernah terlahir sebagai merpati ini; sebab itulah kini engkau melindunginya. Wahai Raja, kukatakan dengan tegas: jangan, dengan menahan merpati ini, menghalangi kebutuhanku akan makanan.”
Verse 10
पर्यायेण वसतिर्वा भवेषु सर्गे ज्ञात: पूर्वमस्मात् कपोतात् । त्वमाददानो5थ कपोतमेनं मा त्वं राजन् विघ्नकर्ता भवेथा:,तदनन्तर बाजने राजासे कहा--“महाराज! प्रायः सभी जीवोंको बारी-बारीसे विभिन्न योनियोंमें जन्म लेकर रहना पड़ता है। मालूम होता है, आप इस सृष्टि-परम्परामें पहले कभी इस कबूतरसे जन्म ग्रहण कर चुके हैं; तभी तो इसे अपने आश्रयमें ले रहे हैं! राजन! मैं आग्रहपर्वूक कहता हूँ, आप इस कबूतरको लेकर मेरे भोजनके कार्यमें विघ्न न डालें"
Mārkaṇḍeya berkata: “Dalam putaran penciptaan, makhluk-makhluk harus berdiam berulang kali dalam berbagai keadaan, lahir silih berganti dalam rahim yang berbeda. Tampaknya pada suatu siklus terdahulu engkau pernah terlahir sebagai merpati ini sendiri—maka kini engkau melindunginya. Karena itu, wahai raja, aku memohon: janganlah dengan mempertahankan merpati ini engkau menjadi penghalang bagi perolehanku akan makanan.”
Verse 11
राजोवाच केनेद्शी जातु परा हि दृष्टा वागुच्यमाना शकुनेन संस्कृता । यां वै कपोतो वदते यां च श्येन उभौ विदित्वा कथमस्तु साधु,राजा बोले--अहो! आजसे पहले किसने कभी भी किसी पक्षीके मुखसे ऐसी उत्तम संस्कृत भाषाका उच्चारण देखा या सुना है, जैसी कि ये कबूतर और बाज बोल रहे हैं? किस प्रकार इन दोनोंका स्वरूप जानकर इनके प्रति न््यायोचित बर्ताव किया जा सकता है?
Raja berkata: “Siapa pernah melihat atau mendengar sebelumnya ucapan sebaik ini—begitu halus dan bernuansa Sanskerta—keluar dari mulut seekor burung? Bahasa yang diucapkan merpati ini, dan yang diucapkan elang ini juga—setelah memahami hakikat keduanya, bagaimana aku dapat bertindak dengan benar dan adil terhadap mereka?”
Verse 12
नास्य वर्ष वर्षति वर्षकाले नास्य बीजं॑ रोहति काल उप्तम् | भीतं प्रपन्नं यो हि ददाति शत्रवे नत्राणं लभेत् त्राणमिच्छन् स काले,जो राजा अपनी शरणमें आये हुए भयभीत प्राणीको उसके शत्रुके हाथमें दे देता है, उसके देशमें समयपर वर्षा नहीं होती। उसके बोये हुए बीज भी समयपर नहीं उगते हैं। वह कभी संकटके समय जब अपनी रक्षा चाहता है, तब उसे कोई रक्षक नहीं मिलता
Mārkaṇḍeya berkata: “Bagi raja yang menyerahkan makhluk yang ketakutan dan telah memohon perlindungan ke tangan musuhnya, hujan tidak turun pada musimnya, dan benih yang ditabur pada waktunya tidak bertunas. Dan ketika ia sendiri menginginkan perlindungan pada saat bahaya, ia tidak menemukan seorang pelindung pun.”
Verse 13
जाता हस्वा प्रजा प्रमीयते सदा न वासं पितरो<स्य कुर्वते । भीतं प्रपन्नं यो हि ददाति शत्रवे नास्य देवा: प्रतिगृह्नन्ति हव्यम्,जो राजा अपनी शरणमें आये हुए भयभीत प्राणीको उसके शत्रुके हाथमें दे देता है, उसकी पैदा हुई संतान छोटी अवस्थामें ही मर जाती है। उसके पितरोंको कभी पितृलोकमें रहनेके लिये स्थान नहीं मिलता और देवता उसका दिया हुआ हविष्य नहीं ग्रहण करते हैं
Mārkaṇḍeya berkata: “Raja yang mengkhianati makhluk yang ketakutan dan telah memohon perlindungan—dengan menyerahkannya kepada musuh—mendapati keturunannya binasa selagi muda. Para leluhurnya tidak memperoleh tempat tinggal yang mantap di alam leluhur, dan para dewa pun menolak persembahan kurban (havis) yang ia haturkan.”
Verse 14
मोघमन्नं विन्दति चाप्रचेता: स्वर्गाल्लोकाद् भ्रश्यति शीघ्रमेव । भीतं प्रपन्नं यो हि ददाति शत्रवे सेन्द्रा देवा: प्रहरन्त्यस्य वज़ञम्,जो राजा शरणमें आये हुए भयभीत प्राणीको उसके शत्रुके हाथमें दे देता है, उसका खाना-पीना निष्फल है। वह अनुदार हृदयका मनुष्य शीघ्र ही स्वर्गलोकसे भ्रष्ट हो जाता है और इन्द्र आदि देवता उसके ऊपर वज्रका प्रहार करते हैं
Mārkaṇḍeya berkata: “Orang yang miskin pertimbangan memperoleh makanan namun sia-sia belaka; ia segera jatuh dari alam surga. Sebab siapa pun yang menyerahkan kepada musuh seseorang yang ketakutan dan telah memohon perlindungan, para dewa—dengan Indra sebagai pemimpin—menghantamnya dengan wajra, petir yang membinasakan.”
Verse 15
उक्षाणं पकक्त्वा सह ओदनेन अस्मात् कपोतात् प्रति ते नयन्तु । यस्मिन् देशे रमसे5तीव श्येन तत्र मांसं शिबयस्ते वहन्तु,“अत: बाज! इस कबूतरके बदले मेरे सेवक ले जाय तुम्हारी पुष्टिके लिये भातके साथ ऋषभकन्द पकाकर दूँगा। तुम जिस स्थानपर प्रसन्नतापूर्वक रह सको, वहीं चलकर रहो। ये शिबिवंशी क्षत्रिय वहीं तुम्हारे लिये भात और ऋषभकन्दका गूदा पहुँचा दें
Mārkaṇḍeya berkata: “Sebagai ganti merpati ini, biarlah mereka memasak ukṣāṇa (umbi ṛṣabhakanda) bersama nasi dan membawanya kepadamu. Wahai Śyena, tinggallah di tempat mana pun engkau dapat berdiam dengan puas sepenuhnya; orang-orang keturunan Śibi akan mengantarkan daging dan bekal ke sana untukmu.”
Verse 16
श्येन उवाच नोक्षाणं राजन् प्रार्थयेयं न चान्य- दस्मान्मांसमधिकं वा कपोतात् | देवैर्दत्त: सोउद्य ममैष भक्ष- स्तन्मे ददस्व शकुनानामभावात्,बाज बोला--राजन! मैं आपसे ऋषभकन्द नहीं माँगता और न मुझे इस कबूतरसे अधिक कोई दूसरा मांस ही चाहिये। आज दूसरे पक्षियोंके अभावमें यह कबूतर ही मेरे लिये देवताओंका दिया हुआ भोजन है। अतः यही मेरा आहार होगा। इसे ही मुझे दे दीजिये
Sang elang berkata: “Wahai Raja, aku tidak memohon ukṣāṇa, dan aku pun tidak menginginkan daging lain yang lebih besar daripada merpati ini. Hari ini, karena tiada burung lain, merpati inilah santapan yang dianugerahkan para dewa kepadaku. Maka inilah makananku yang sah—berikanlah kepadaku.”
Verse 17
राजोवाच उक्षाणं वेहतमनूनं नयन्तु ते पश्यन्तु पुरुषा ममैव । भयाहितस्य दायं ममान्तिकात् त्वां प्रत्याम्नाय॑ तु त्वं होनं मा हिंसी:,राजाने कहा--बाज! उक्षा (ऋषभकन्द) अथवा वेहत नामक ओषधियाँ बड़ी पुष्टिकारक होती हैं। मेरे सेवक जाकर उनकी खोज करें और पर्याप्त मात्रामें भातके साथ उन्हें पकाकर तुम्हारे पास पहुँचा दें। भयभीत कपोतके बदलेमें मेरे पाससे मिलनेवाला यह उचित मूल्य होगा। इसे ले लो, किंतु इस कबूतरको न मारो
Raja berkata: “Biarlah orang-orangku sendiri pergi mencari tumbuhan bergizi bernama ukṣāṇa dan vehata, lalu membawanya kembali dalam jumlah yang cukup. Dari pihakku, inilah tebusan yang layak bagi merpati yang ketakutan ini. Terimalah persembahan ini, tetapi jangan celakai merpati ini.”
Verse 18
त्यजे प्राणान् नैव दद्यां कपोतं॑ सौम्यो हायं कि न जानासि श्येन । यथा क्लेशं मा कुरुष्वेह सौम्य नाहं कपोतमर्पयिष्ये कथंचित्,मैं अपने प्राण दे दूँगा, किंतु इस कबूतरको नहीं दूँगा। बाज! कया तुम नहीं जानते, यह कितना सुन्दर स्वयं कैसा भोला-भाला है? सौम्य! अब तुम यहाँ व्यर्थ कष्ट न उठाओ। मैं इस कबूतरको किसी तरह तुम्हारे हाथमें नहीं दूँगा
“Aku akan menyerahkan nyawaku, tetapi aku tidak akan menyerahkan merpati ini. Wahai Śyena, tidakkah engkau tahu betapa lembut dan tak bersalahnya ia? Orang mulia, janganlah bersusah payah di sini dengan sia-sia; bagaimanapun juga aku tidak akan menyerahkan merpati ini ke tanganmu.”
Verse 19
यथा मां वै साधुवादै: प्रसन्ना: प्रशंसेयु: शिबय: कर्मणा तु । यथा श्येन प्रियमेव कुर्या प्रशाधि मां यद् वदेस्तत् करोमि,बाज! जिस कर्मसे शिबिदेशके लोग प्रसन्न होकर मुझे साधुवाद देते हुए मेरी भूरि-भूरि प्रशंसा करें और जिससे मेरेद्वारा तुम्हारा भी प्रिय कार्य बन सके, वह बताओ। उसीके लिये मुझे आज्ञा दो। मैं वही करूँगा
Sang elang berkata: “Perbuatan apakah yang harus kulakukan agar rakyat Śibi, dengan gembira, memujiku dengan kata-kata restu, dan sekaligus maksudmu yang kau sayangi pun terpenuhi? Perintahkan aku; apa pun yang kau katakan, akan kulakukan.”
Verse 20
श्येन उवाच उरोर्दक्षिणादुत्कृत्य स्वपिशितं तावद् राजन् यावन्मांसं कपोतेन समम् | तथा तस्मात् साधु त्रात: कपोतः प्रशंसेयुश्न शिबय: कृतं च प्रियं स्थान्ममेति,बाज बोला--राजन्! अपनी दायीं जाँघसे उतना ही मांस काटकर दो, जितना इस कबूतरके बराबर हो सके। ऐसा करनेसे कबूतरकी भलीभाँति रक्षा हो सकती है। इसीसे शिबिदेशकी प्रजा आपकी भूरि-भूरि प्रशंसा करेगी और मेरा भी प्रिय कार्य सम्पन्न हो जायगा
Elang itu berkata, “Wahai Raja, potonglah dari paha kananmu sepotong dagingmu sendiri—hanya sebanyak yang setara dengan berat daging merpati ini. Dengan demikian merpati itu akan terlindungi dengan semestinya. Maka rakyat negeri Śibi akan memujimu setinggi-tingginya, dan maksud yang kuinginkan pun akan terpenuhi.”
Verse 21
अथ स दक्षिणादूरोरुत्कृत्य स्वमांसपेशीं तुलया55धारयत् । गुरुतर एव कपोत आसीत्,तब राजाने अपनी दायीं जाँघसे मांस काटकर उसे तराजूके एक पलड़ेपर रखा, किंतु कबूतरके साथ तौलनेपर वही अधिक भारी निकला
Lalu sang raja memotong sepotong daging dari paha kanannya dan meletakkannya pada salah satu sisi timbangan. Namun ketika ditimbang dengan merpati itu, merpati itu tetap lebih berat.
Verse 22
पुनरन्यमुज्चकर्त गुरुतर. एव कपोतः । एवं सर्व समधिकृत्य शरीरं तुलायामारोपयामास । तत् तथापि गुरुतर एव कपोत आसीत्,राजाने फिर दूसरी बार अपने शरीरका मांस काटकर रखा, तो भी कबूतरका ही पलड़ा भारी रहा। इस प्रकार क्रमश: उन्होंने अपने सभी अंगोंका मांस काट-काटकर तराजूपर चढ़ाया तो भी कबूतर ही भारी रहा
Sang raja kembali memotong daging dan meletakkannya pada timbangan; namun sisi merpati tetap lebih berat. Demikianlah, setahap demi setahap, ia mempersembahkan daging dari seluruh anggota tubuhnya ke atas neraca, tetapi merpati itu tetap mengungguli beratnya.
Verse 23
अथ राजा स्वयमेव तुलामारुरोह । न च व्यलीकमासीदू् राज्ञ एतद् वृत्तान्तं दृष्टवा त्रात इत्युक्त्वा प्रालीयत श्येनो5थ राजा अब्रवीत्,तब राजा स्वयं ही तराजूपर चढ़ गये। ऐसा करते समय उनके मनमें क्लेश नहीं हुआ। यह घटना देखकर बाज बोल उठा--'हो गयी कबूतरकी प्राणरक्षा।/ ऐसा कहकर वह वहीं अन्तर्धान हो गया। अब राजा शिबि कबूतरसे बोले--
Kemudian sang raja sendiri naik ke atas neraca. Dalam tindakannya itu tidak ada tipu daya ataupun keraguan di dalam hatinya. Melihat hal tersebut, elang itu berseru, “Nyawa merpati telah terselamatkan,” lalu lenyap di tempat itu juga. Sesudahnya, Raja Śibi berkata kepada merpati itu—
Verse 24
कपोतं विद्यु: शिबयस्त्वां कपोत पृच्छामि ते शकुने को नु श्येन: । नानीश्वर ईदृशं जातु कुर्या- देतं प्रश्न भगवन् मे विचक्ष्व,“कपोत! ये शिबिलोग तो तुम्हें कबूतर ही समझते थे। पक्षिप्रवर! मैं तुमसे पूछता हूँ, बताओ, यह बाज कौन था? ईश्वरके सिवा दूसरा कोई कभी ऐसा चमत्कारपूर्ण कार्य नहीं कर सकता। भगवन! मेरे इस प्रश्नका यथावत् उत्तर दो”
“Wahai Merpati, rakyat negeri Śibi menganggapmu sungguh-sungguh seekor merpati. Wahai yang terbaik di antara burung, aku bertanya kepadamu: siapakah elang itu? Tiada selain Sang Hyang Tuhan yang mampu melakukan perbuatan seajaib itu. Wahai yang mulia, jelaskan kepadaku pertanyaan ini sebagaimana adanya.”
Verse 25
कपोत उवाच वैश्वानरो5हं ज्वलनो धूमकेतु- रथैव श्येनो वजहस्त: शचीपति: । साधु ज्ञातुं त्वामृषभं सौरथेय नौ जिज्ञासया त्वत्सकाशं प्रपन्नौ,कबूतर बोला--राजन्! मैं धूममयी ध्वजासे विभूषित वैश्वानर अग्नि हूँ और उस बाजके रूपमें साक्षात् वजधारी शचीपति इन्द्र थे। सुरथानन्दन! तुम एक श्रेष्ठ पुरुष हो। हम दोनों तुम्हारी श्रेष्ठताकी परीक्षाके लिये यहाँ आये थे
Merpati itu berkata: “Wahai Raja, akulah Vaiśvānara, Api yang menyala, bertanda panji asap; dan elang itu sesungguhnya adalah Indra, suami Śacī, pemegang vajra. Wahai putra Sūratha, engkau manusia utama. Kami berdua datang menghadapmu untuk menguji dan sungguh mengenal keunggulanmu.”
Verse 26
यामेतां पेशीं मम निष्क्रयाय प्रादाद् भवानसिनोत्कृत्य राजन् | एतद् वो लक्ष्म शिवं करोमि हिरण्यवर्ण रुचिरं पुण्यगन्धम्,राजन! तुमने मेरी रक्षाके लिये जो तलवारसे काटकर अपना यह मांस दिया है, इसके घावको मैं अभी अच्छा कर देता हूँ। यहाँकी चमड़ीका रंग सुन्दर और सुनहला हो जायगा तथा इससे बड़ी पवित्र सुगन्ध फैलती रहेगी, यह तुम्हारा राजचिह्न होगा
Merpati itu berkata: “Wahai Raja, potongan daging yang engkau berikan—kau tebas dari tubuhmu sendiri dengan pedang—sebagai tebusan keselamatanku: kini aku menjadikan luka itu membawa berkah bagimu. Biarlah ia menjadi tanda kemuliaan rajamu—indah, berwarna keemasan, dan semerbak harum kesucian.”
Verse 27
एतासां प्रजानां पालयिता यशस्वी सुररषीणामथ सम्मतो भृशम् । एतस्मात् पार्श्वात् पुरुषो जनिष्यति कपोतरोमेति च तस्य नाम,तुम्हारे इस दक्षिण पार्श्वस्नै एक पुत्र उत्पन्न होगा, जो इन प्रजाओंका पालक और यशस्वी होनेके साथ ही देवर्षियोंके अत्यन्त आदरका पात्र होगा। उसका नाम होगा, “कपोतरोमा”
Merpati itu berkata: “Dari sisi tubuhmu akan lahir seorang putra; ia akan menjadi pelindung termasyhur bagi makhluk-makhluk ini dan sangat dihormati oleh para resi ilahi. Namanya kelak Kapotaromā.”
Verse 28
कपोतरोमाणं शिबिनीद्धधिदं पुत्र प्रापस्पसि नृप वृषसंहननं यशोदीप्यमान द्रष्टासि शूरमृषभं सौरथानाम्
Merpati itu berkata: “Wahai putra, wahai raja—ketika engkau mencapai negeri Śibi yang termasyhur, engkau akan melihat Kapotaromā: seorang pahlawan sekuat banteng, kemuliaannya menyala terang, yang utama di antara para kesatria kereta.”
Verse 196
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेययमास्यापर्वमें सेदुकवृषदर्भचरितविषयक एक सौ छियानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ
Demikian berakhir bab ke-196 dalam subbagian Markandeya-Samasya, yang termasuk dalam Vana Parva dari Mahabharata suci, mengenai kisah Seduka, Vrisha, dan Darbha.
Verse 197
राजन! तुम्हारे द्वारा उत्पन्न किया हुआ वह पुत्र, जिसे तुम भविष्यमें प्राप्त करोगे, तुम्हारी जाँचका भेदन करके प्रकट होगा; इसीलिये औद्धिद कहलायेगा। उसके शरीरके रोएँ कबूतरके समान होंगे। उसका शरीर साँड़के समान हृष्ट-पुष्ट होगा। तुम देखोगे कि वह सुयशसे प्रकाशित हो रहा है। सुरथाके वंशजोंमें वह सर्वश्रेष्ठ शूरवीर होगा ।। (इतना कहकर अग्निदेव अन्तर्धान हो गये।) इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि शिबिचरिते सप्तनवत्यधिकशततमो<ध्याय:
Wahai Raja! Putra yang akan lahir melalui dirimu—yang kelak akan engkau peroleh—akan muncul dengan menerobos penghalang yang dipasang untuk mengujimu; karena itu ia akan dikenal sebagai Auddhida. Bulu-bulu halus di tubuhnya akan seperti bulu merpati, dan raganya akan tegap, kekar, serta kuat laksana seekor banteng. Engkau akan melihatnya bersinar oleh kemasyhuran yang mulia. Di antara keturunan Suratha, dialah pahlawan terunggul. Setelah berkata demikian, Dewa Agni lenyap dari pandangan.
The brāhmaṇa confronts an apparent contradiction: how can a person engaged in an outwardly violent or impure livelihood be a reliable teacher of dharma? The chapter resolves this by distinguishing external occupation from internal discipline and sustained ethical conduct.
Dharma is best discerned through stable virtues—truthfulness, restraint, compassion, non-malice, service, and appropriate giving—implemented within one’s role; ethical authority is validated by consistent conduct (ācāra), not by status alone.
No formal phalāśruti formula is stated; however, the text implies outcomes: adherence to śiṣṭācāra supports social order, reduces moral error, and is associated with auspicious posthumous trajectories (e.g., ‘svarga’ language used for the conduct of the good).