Adhyaya 190
Vana ParvaAdhyaya 19066 Verses

Adhyaya 190

अध्याय १९० — वामदेव-वाम्य-वृत्तान्तः (The Vāmadeva Horses Episode and the Ethics of Promise)

Upa-parva: Mārkaṇḍeya-upākhyāna (Exempla on Truth, Vows, and Consequence)

Vaiśaṃpāyana reports that a Pāṇḍava requests Mārkaṇḍeya to speak further, and Mārkaṇḍeya begins an illustrative account. A king, entering a charming forest-lake, sees a striking maiden gathering flowers and singing. She identifies herself simply as a maiden and states she can be obtained only ‘by a condition’ (samaya), which the king accepts; she later disappears after descending into a well/pond, leaving the king searching in vain. In grief and anger, the king initiates a severe frog-killing campaign, believing frogs responsible for his loss. The frog-king Āyu, disguised as an ascetic, intervenes and explains that the maiden Suśobhanā is his daughter and has deceived many kings; he gives her to the king and pronounces a lineage consequence tied to her prior untruthfulness. The narrative then shifts to a second dharma-test: during a hunt, the king seeks swift horses and learns of Vāmadeva’s famed pair. Vāmadeva lends them on the explicit condition of prompt return after the task. The king later resolves not to return them, prompting Vāmadeva’s demand and a charged exchange that frames vow-breaking as a grave fault with cosmic-legal repercussions. Coercive pressures and escalating threats culminate in the king’s entanglement in wrongdoing; resolution is achieved through prescribed expiatory action and the queen/princess’s intercession, after which the king returns the horses and is released from culpability. The chapter’s thematic center is the binding nature of promises, the danger of desire-driven judgment, and the corrective role of ascetic authority in re-aligning royal power with dharma.

Chapter Arc: वन के एकांत में तपस्वी ब्रह्मर्षि (विप्रर्षि) पितृ-भक्ति और कठोर ब्रह्मचर्य के बल पर दिव्य साक्षात्कार की देहरी पर खड़ा है—और स्वयं नारायण उसके सामने प्रकट होकर उसके तप का कारण बताते हैं। → देवता-कार्य की सिद्धि हेतु भगवान अपने स्वरूप-रहस्य का विस्तार करते हैं: ‘नारा’ (जल) का नामकरण, ‘नारायण’ की व्युत्पत्ति, जगत् के पंचमहाभूत और स्थावर-जंगम का उद्गम-लय—और यह भी कि वही वसन, शयन, विलय तथा संवर्तक अग्नि हैं। श्रोता का विस्मय बढ़ता है; वह समस्त लोकों को देखकर भी अर्थ-ग्रहण में डगमगाता है। → नारायण का विराट्-घोष: ‘मत्तः प्रादुर्भवन्त्येते मामेव प्रविशन्ति च’—समस्त वेद, वर्ण-व्यवस्था, पंचमहाभूत, त्रैलोक्य और प्रलय-चक्र सब उसी से निकलते और उसी में लीन होते हैं; सहस्र युगों के अंत में होने वाले प्रलय का अधिपति वही शंख-चक्र-गदा-धारी विश्वात्मा है। → भगवान श्रोता की पितृभक्ति, शरणागति और ब्रह्मचर्य की प्रशंसा कर उसे ‘श्रेय’ और ‘सुखोदय’ का आश्वासन देते हैं—यह ज्ञान-प्रकाश केवल विस्मय नहीं, साधक के कल्याण का साधन है। → नारायण के इस विराट्-तत्त्व के बाद श्रोता के लिए अगला प्रश्न उभरता है—इस ज्ञान का आचरण-रूप क्या है, और लोक-धर्म के भीतर इसका प्रयोग कैसे हो?

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल १४४ श्लोक हैं) हि आय ० (0) हि २ 7 -अट्टमन्नं शिवो वेदो ब्राह्मणाश्व चतुष्पथा: | केशो भगं समाख्यातं शूलं तद्‌ विक्रयं विदु: ।। (नीलकण्ठकृत टीका) एकोननवर्त्याधेकशततमो< ध्याय: भगवान्‌ बालमुकुन्दका मार्कण्डेयको अपने स्वरूपका परिचय देना तथा मार्कण्डेयद्वारा श्रीकृष्णकी महिमाका प्रतिपादन और पाण्डवोंका श्रीकृष्णकी शरणमें जाना देव उवाच काम देवा अपि न मां विप्र जानन्ति तत्त्वतः | त्वत्प्रीत्या तु प्रवक्ष्यामि यथेदं विसृजाम्पहम्‌,भगवान्‌ बोले--विप्रवर! देवता भी मेरे स्वरूपको यथेष्ट और यथार्थरूपसे नहीं जानते। मैं जिस प्रकार इस जगत्‌की रचना करता हूँ, वह तुम्हारे प्रेमके कारण तुम्हें बताऊँगा

Sang Bhagavān bersabda: “Wahai brahmana, bahkan para dewa pun tidak sungguh-sungguh mengenal hakikat-Ku. Namun karena kasih kepadamu, akan Kuterangkan bagaimana Aku memancarkan dunia ini.”

Verse 2

पितृभक्तो$सि विप्रर्षे मां चैव शरणं गत: । ततो दृष्टो$स्मि ते साक्षाद्‌ ब्रह्मचर्य च ते महत्‌,ब्रह्मर्ष! तुम पितृभक्त हो, मेरी शरणमें आये हो और तुमने महान्‌ ब्रह्मचर्यका पालन किया है। इन्हीं सब कारणोंसे तुम्हें मेरे साक्षात्‌ स्‍्वरूपका दर्शन हुआ

Wahai resi brahmana, engkau berbakti kepada para leluhur dan engkau pun telah berlindung kepada-Ku. Karena itu Aku menampakkan diri kepadamu secara langsung; dan tapa brahmacarya-mu yang agung juga menjadi sebabnya.

Verse 3

अपां नारा इति पुरा संज्ञाकर्म कृतं मया | तेन नारायणो&प्युक्तो मम तत्‌ त्वयनं सदा,पूर्वकालमें मैंने ही जलका “नारा” नाम रखा था। वह “नारा' मेरा सदा अयन (वासस्थान) है, इसलिये मैं “नारायण' नामसे विख्यात हूँ

Sang Dewa bersabda: “Pada zaman purba, akulah yang menetapkan nama ‘Nārā’ bagi air. Karena ‘Nārā’ itu senantiasa menjadi ayana—tempat bersemayam dan sandaran-Ku—maka Aku pun dikenal sebagai ‘Nārāyaṇa’.”

Verse 4

अहं नारायणो नाम प्रभव: शाश्वृतो5व्यय: । विधाता सर्वभूतानां संहर्ता च द्विजोत्तम,मैं नारायण ही सबकी उत्पत्तिका कारण, सनातन और अविनाशी हूँ। द्विजश्रेष्ठ! सम्पूर्ण भूतोंकी सृष्टि और संहार करनेवाला भी मैं ही हूँ। मैं ही विष्णु हूँ, मैं ही ब्रह्मा हूँ, मैं ही देवराज इन्द्र हूँ और मैं ही राजा कुबेर तथा प्रेतराज यम हूँ

Sang Dewa bersabda: “Aku bernama Nārāyaṇa—sumber segala yang ada, kekal dan tak binasa. Wahai yang terbaik di antara kaum dwija, Akulah penata seluruh makhluk dan Akulah pula yang menariknya kembali pada saat pralaya.”

Verse 5

अहं विष्णुरहं ब्रह्मा शक्रश्नाहं सुराधिप: । अहं वैश्रवणो राजा यम: प्रेताधिपस्तथा,मैं नारायण ही सबकी उत्पत्तिका कारण, सनातन और अविनाशी हूँ। द्विजश्रेष्ठ! सम्पूर्ण भूतोंकी सृष्टि और संहार करनेवाला भी मैं ही हूँ। मैं ही विष्णु हूँ, मैं ही ब्रह्मा हूँ, मैं ही देवराज इन्द्र हूँ और मैं ही राजा कुबेर तथा प्रेतराज यम हूँ

Sang Dewa bersabda: “Akulah Viṣṇu; Akulah Brahmā; Akulah Śakra (Indra), penguasa para dewa. Akulah pula raja Vaiśravaṇa (Kubera), dan demikian juga Yama, penguasa arwah yang telah berpulang.”

Verse 6

अहं शिवश्न सोमश्ष॒ कश्यपो5थ प्रजापति: । अहं धाता विधाता च यज्ञश्षाहं द्विजोत्तम,विप्रवर! मैं ही शिव, चन्द्रमा, प्रजापति कश्यप, धाता, विधाता और यज्ञ हूँ

Sang Dewa bersabda: “Wahai yang terbaik di antara kaum dwija, Akulah Śiva; Akulah Soma (Bulan); Akulah Kaśyapa sang Prajāpati. Akulah Dhātṛ dan Vidhātṛ; dan Akulah Yajña itu sendiri.”

Verse 7

अग्निरास्यं क्षिति: पादौ चन्द्रादित्यौ च लोचने । द्यौर्मूर्धा खं दिश: श्रोत्रे तथा5प: स्वेदसम्भवा:,अग्नि मेरा मुख है, पृथ्वी चरण है, चन्द्रमा और सूर्य नेत्र हैं। द्युलोक मेरा मस्तक है। आकाश और दिशाएँ मेरे कान हैं तथा जल मेरे शरीरके पसीनेसे प्रकट हुआ है। दिशाओंसहित आकाश मेरा शरीर है। वायु मेरे मनमें स्थित है। मैंने पर्याप्त दक्षिणाओंसे युक्त अनेक शत यज्ञोंद्वारा यजन किया है

Sang Dewa menyatakan wujud kosmis-Nya: “Api adalah mulut-Ku; bumi adalah kaki-Ku; bulan dan matahari adalah mata-Ku. Langit adalah kepala-Ku; angkasa dan segala penjuru adalah telinga-Ku; dan air terbit dari peluh-Ku.”

Verse 8

सदिशं च नभ: कायो वायुर्मनसि मे स्थित: । मया क्रतुशतैरिष्टं बहुभि: स्वाप्तदक्षिणै:,अग्नि मेरा मुख है, पृथ्वी चरण है, चन्द्रमा और सूर्य नेत्र हैं। द्युलोक मेरा मस्तक है। आकाश और दिशाएँ मेरे कान हैं तथा जल मेरे शरीरके पसीनेसे प्रकट हुआ है। दिशाओंसहित आकाश मेरा शरीर है। वायु मेरे मनमें स्थित है। मैंने पर्याप्त दक्षिणाओंसे युक्त अनेक शत यज्ञोंद्वारा यजन किया है

Dengan segala penjuru, langit adalah tubuh-Ku; dan angin bersemayam di dalam batin-Ku. Aku telah melaksanakan ratusan yajña, masing-masing disertai dakṣiṇā yang melimpah dan dianugerahkan dengan semestinya.

Verse 9

यजन्ते वेदविदुषो मां देवयजने स्थितम्‌ । पृथिवयां क्षत्रियेन्द्राश्न पार्थिवा: स्वर्गकाड्क्षिण:,शेषो भूत्वाहमेवैतां धारयामि वसुन्धराम्‌ । वेदवेत्ता ब्राह्मण देवयज्ञमें स्थित मुझ यज्ञपुरुषका यजन करते हैं। पृथ्वीका पालन करनेवाले क्षत्रियनरेश स्वर्गप्राप्तिकी अभिलाषासे इस भूतलपर यज्ञोंद्वारा मेरा यजन करते हैं। इसी प्रकार वैश्य भी स्वर्गलोकपर विजय पानेकी इच्छासे मेरी सेवा-पूजा करते हैं। मैं ही शेषनाग होकर मेरुमन्दरसे विभूषित तथा चारों समुद्रोंसे घिरी हुई इस वसुन्धराको अपने सिरपर धारण करता हूँ

Para brahmana yang mengetahui Weda memuja Aku—Sang Yajñapuruṣa—yang bersemayam dalam kurban ilahi. Di bumi ini, para raja dan pemuka kṣatriya yang mendambakan surga pun memuja-Ku melalui yajña. Dan Aku sendiri, menjadi Śeṣa, menopang bumi ini.

Verse 10

यजन्ते मां तथा वैश्या: स्वर्गलोकजिगीषया । चतुःसमुद्रपर्यन्तां मेरुमन्दर भूषणाम्‌

Demikian pula para vaiśya memuja-Ku, terdorong oleh hasrat menaklukkan alam surga—mendambakan kemakmuran berupa negeri yang terbentang hingga empat samudra, dihiasi Meru dan Mandara.

Verse 11

वाराहं रूपमास्थाय मयेयं जगती पुरा,विप्रवर! पूर्वकालमें जब यह पृथ्वी जलमें डूब गयी थी, उस समय मैंने ही वाराहरूप धारण करके इसे बलपूर्वक जलसे बाहर निकाला था। विद्वन! मैं ही बडवामुख अग्नि होकर सदा समुद्रके जलको पीता हूँ और फिर उस जलको बरसा देता हूँ। ब्राह्मण मेरा मुख है, क्षत्रिय दोनों भुजाएँ हैं और वैश्य मेरी दोनों जाँघोंके रूपमें स्थित हैं

Wahai brahmana termulia! Dahulu kala, ketika bumi ini tenggelam ke dalam air, Akulah yang mengambil wujud Varāha dan dengan kekuatan mengangkatnya keluar dari banjir. Wahai orang bijak! Akulah pula api Vaḍavāmukha yang senantiasa meneguk air samudra, lalu menurunkannya kembali sebagai hujan. Brahmana adalah mulut-Ku, kṣatriya kedua lengan-Ku, dan vaiśya berdiam sebagai kedua paha-Ku.

Verse 12

मज्जमाना जले विप्र वीयेणासीत्‌ समुद्धृता । अग्निश्च वडवावक्त्रो भूत्वाहं द्विजसत्तम,विप्रवर! पूर्वकालमें जब यह पृथ्वी जलमें डूब गयी थी, उस समय मैंने ही वाराहरूप धारण करके इसे बलपूर्वक जलसे बाहर निकाला था। विद्वन! मैं ही बडवामुख अग्नि होकर सदा समुद्रके जलको पीता हूँ और फिर उस जलको बरसा देता हूँ। ब्राह्मण मेरा मुख है, क्षत्रिय दोनों भुजाएँ हैं और वैश्य मेरी दोनों जाँघोंके रूपमें स्थित हैं

Wahai brahmana! Ketika bumi sedang tenggelam dalam air, Aku mengangkatnya keluar dengan kekuatan-Ku sendiri. Dan wahai yang terbaik di antara para dwija! Akulah api Vaḍavāmukha yang senantiasa meneguk air samudra, lalu menurunkannya kembali sebagai hujan.

Verse 13

पिबाम्यप: सदा दिद्वंस्ताश्वैवं विसृजाम्यहम्‌ । ब्रह्म वक्‍त्र॑ भुजौ क्षत्रमूरू मे संस्थिता विश:,विप्रवर! पूर्वकालमें जब यह पृथ्वी जलमें डूब गयी थी, उस समय मैंने ही वाराहरूप धारण करके इसे बलपूर्वक जलसे बाहर निकाला था। विद्वन! मैं ही बडवामुख अग्नि होकर सदा समुद्रके जलको पीता हूँ और फिर उस जलको बरसा देता हूँ। ब्राह्मण मेरा मुख है, क्षत्रिय दोनों भुजाएँ हैं और वैश्य मेरी दोनों जाँघोंके रूपमें स्थित हैं

Sang Dewa bersabda: “Aku senantiasa meneguk segala air, dan dengan cara yang sama pula Aku melepaskannya kembali. Brahmana adalah mulut-Ku; para Ksatria adalah kedua lengan-Ku; dan para Waisya tegak sebagai paha-Ku.”

Verse 14

पादौ शूद्रा भवन्तीमे विक्रमेण क्रमेण च । ऋग्वेद: सामवेदश्च यजुर्वेदो5प्यथर्वण:

Kedua kaki menjadi Śūdra—demikian dikatakan—melalui tindakan melangkah maju dan bergerak dengan langkah yang teratur. Dan demikian pula ada Weda: Ṛgveda, Sāmaveda, Yajurveda, dan juga Atharvaveda.

Verse 15

यतय: शान्तिपरमा यतात्मानो बुभुत्सव:,मामेव सतत विद्राश्चिन्तयन्त उपासते । शान्तिपरायण, संयमी, जिज्ञासु, काम-क्रोध-द्वेघपहित आसक्तिशून्य, निष्पाप, सात्विक, नित्य अहंकारशून्य तथा अध्यात्मज्ञानकुशल यति एवं ब्राह्मण सदा मेरा ही चिन्तन करते हुए उपासना करते हैं

Sang Dewa bersabda: “Para pertapa yang menjadikan kedamaian sebagai tujuan tertinggi—yang mengekang diri dan rindu memahami kebenaran—para bijak itu senantiasa memusatkan pikiran pada-Ku semata dan berbakti menyembah-Ku.”

Verse 16

कामक्रोधद्वेषमुक्ता नि:संगा वीतकल्मषा: । सत्त्वस्था निरहड्कारा नित्यमध्यात्मकोविदा:

Mereka yang terbebas dari nafsu, amarah, dan kebencian—tanpa keterikatan, bersih dari noda—teguh dalam sattva, tanpa keakuan, dan senantiasa mahir dalam kebijaksanaan batin: merekalah teladan penguasaan diri dan kejernihan rohani.

Verse 17

अहं संवर्तको वदह्विरहं संवर्तकोडनल:,मैं ही संवर्तक (प्रलयका कारण) वल्ि हूँ। मैं ही संवर्तक अनल हूँ। मैं ही संवर्तक सूर्य हूँ और मैं ही संवर्तक वायु हूँ। द्विजश्रेष्ठ आकाशमें जो ये तारे दिखायी देते हैं उन सबको मेरे ही रोमकूप समझो। रत्नाकर समुद्र और चारों दिशाओंको मेरे वस्त्र, शय्या और निवासस्थान जानो। मैंने ही देवताओंके कार्यकी सिद्धिके लिये इनकी पृथक्‌-पृथक्‌ रचना की है

Sang Dewa bersabda: “Akulah api Saṃvartaka—nyala yang mendatangkan pralaya; Akulah pula bara Saṃvartaka. Akulah matahari Saṃvartaka, dan Akulah angin Saṃvartaka. Wahai yang terbaik di antara para dwija, ketahuilah: semua bintang yang tampak di langit itu hanyalah pori-pori tubuh-Ku. Ketahuilah samudra pengandung ratna dan keempat penjuru sebagai pakaian-Ku, ranjang-Ku, dan tempat tinggal-Ku. Demi terpenuhinya maksud para dewa, Aku sendiri membentuk semuanya dalam rupa yang berbeda-beda.”

Verse 18

अहं संवर्तकः सूर्यस्त्वहं संवर्तकोडनिल: । तारारूपाणि दृश्यन्ते यान्येतानि नभस्तले,मैं ही संवर्तक (प्रलयका कारण) वल्ि हूँ। मैं ही संवर्तक अनल हूँ। मैं ही संवर्तक सूर्य हूँ और मैं ही संवर्तक वायु हूँ। द्विजश्रेष्ठ आकाशमें जो ये तारे दिखायी देते हैं उन सबको मेरे ही रोमकूप समझो। रत्नाकर समुद्र और चारों दिशाओंको मेरे वस्त्र, शय्या और निवासस्थान जानो। मैंने ही देवताओंके कार्यकी सिद्धिके लिये इनकी पृथक्‌-पृथक्‌ रचना की है

Sang Dewa bersabda: “Akulah Matahari Saṃvartaka; Akulah Angin Saṃvartaka. Wujud-wujud laksana bintang yang tampak membentang di kubah langit—ketahuilah, itu hanyalah perwujudan dari keberadaanku sendiri.”

Verse 19

मम वै रोमकूपाणि विद्धि त्वं द्विजसत्तम । रत्नाकरा: समुद्राश्व॒ सर्व एव चतुर्दिशम्‌,मैं ही संवर्तक (प्रलयका कारण) वल्ि हूँ। मैं ही संवर्तक अनल हूँ। मैं ही संवर्तक सूर्य हूँ और मैं ही संवर्तक वायु हूँ। द्विजश्रेष्ठ आकाशमें जो ये तारे दिखायी देते हैं उन सबको मेरे ही रोमकूप समझो। रत्नाकर समुद्र और चारों दिशाओंको मेरे वस्त्र, शय्या और निवासस्थान जानो। मैंने ही देवताओंके कार्यकी सिद्धिके लिये इनकी पृथक्‌-पृथक्‌ रचना की है

Sang Dewa bersabda: “Ketahuilah, wahai Brahmana terbaik, bahwa semuanya ini sungguh pori-pori tubuh-Ku. Samudra-samudra yang mengandung permata dan keempat penjuru—pahamilah sebagai milik-Ku; itulah bentangan yang menjadi selubung dan kediaman-Ku.”

Verse 20

वसनं शयनं चैव विलयं चैव विद्धि मे । मयैव सुविभक्तास्ते देवकार्यार्थसिद्धये,मैं ही संवर्तक (प्रलयका कारण) वल्ि हूँ। मैं ही संवर्तक अनल हूँ। मैं ही संवर्तक सूर्य हूँ और मैं ही संवर्तक वायु हूँ। द्विजश्रेष्ठ आकाशमें जो ये तारे दिखायी देते हैं उन सबको मेरे ही रोमकूप समझो। रत्नाकर समुद्र और चारों दिशाओंको मेरे वस्त्र, शय्या और निवासस्थान जानो। मैंने ही देवताओंके कार्यकी सिद्धिके लिये इनकी पृथक्‌-पृथक्‌ रचना की है

Sang Dewa bersabda: “Ketahuilah bahwa samudra dan keempat penjuru adalah pakaian-Ku, pembaringan-Ku, dan tempat tinggal-Ku. Akulah yang membagi dan menatanya dengan jelas demi terlaksananya tugas para dewa.”

Verse 21

साधुशिरोमणे! काम, क्रोध, हर्ष, भय और मोह--इन सभी विकारोंको मेरी ही रोमावली समझो

Wahai permata mahkota di antara orang saleh! Ketahuilah bahwa nafsu, amarah, kegirangan, ketakutan, dan kebingungan—semua gejolak itu adalah laksana rambut-rambut pada tubuh-Ku sendiri.

Verse 22

प्राप्रुवन्ति नरा विप्र यत्‌ कृत्वा कर्म शो भनम्‌ । सत्यं दानं तपश्चोग्रमहिंसा चैव जन्तुषु,ब्रह्म! जिस शुभ कर्मोके आचरणसे मनुष्यको कल्याणकी प्राप्ति होती है, वे सत्य, दान, उग्र तपस्या और किसी भी प्राणीकी हिंसा न करनेका स्वभाव--ये सब मेरे ही विधानसे निर्मित हुए हैं और मेरे ही शरीरमें विहार करते हैं। मैं समस्त प्राणियोंके ज्ञानको जब प्रकट कर देता हूँ, तभी वे चेष्टाशील होते हैं, अन्यथा अपनी इच्छासे वे कुछ नहीं कर सकते

Sang Dewa bersabda: “Wahai Brahmana, manusia meraih kesejahteraan dengan melakukan perbuatan mulia. Kejujuran, kedermawanan, tapa yang berat, dan ahimsa terhadap makhluk hidup—semuanya lahir dari titah-Ku dan bergerak di dalam keberadaan-Ku. Hanya ketika Aku menyingkapkan pengetahuan dalam semua makhluk, barulah mereka mampu bertindak dengan tujuan; jika tidak, dengan kehendak mereka sendiri semata, mereka tak sanggup menyelesaikan apa pun.”

Verse 23

काम क्रोधं च हर्ष च भयं मोहं तथैव च । ममैव विद्धि रोमाणि सर्वाण्येतानि सत्तम,मद्विधानेन विहिता मम देहविहारिण: । मया<<विर्भूतविज्ञाना विचेष्टन्ते न कामत: ब्रह्म! जिस शुभ कर्मोके आचरणसे मनुष्यको कल्याणकी प्राप्ति होती है, वे सत्य, दान, उग्र तपस्या और किसी भी प्राणीकी हिंसा न करनेका स्वभाव--ये सब मेरे ही विधानसे निर्मित हुए हैं और मेरे ही शरीरमें विहार करते हैं। मैं समस्त प्राणियोंके ज्ञानको जब प्रकट कर देता हूँ, तभी वे चेष्टाशील होते हैं, अन्यथा अपनी इच्छासे वे कुछ नहीं कर सकते

Sang Dewa bersabda: “Wahai yang terbaik di antara orang baik, ketahuilah bahwa hasrat, amarah, kegirangan, ketakutan, dan kebingungan bagaikan rambut-rambut pada tubuh-Ku sendiri—ditetapkan oleh titah-Ku dan bergerak di dalam keberadaan-Ku. Hanya ketika Aku menyingkapkan pengetahuan di dalam makhluk, barulah mereka mampu bertindak; jika tidak, mereka tak melakukan apa pun semata-mata karena kehendak pribadi.”

Verse 24

सम्यग्‌ वेदमधीयाना यजन्ते विविधैर्मखै: । शान्तात्मानो जितक्रोधा: प्राप्रुवन्ति द्विजातय:,जो द्विजाति अच्छी तरह वेदोंका अध्ययन करके शान्तचित्त और क्रोधशून्य होकर नाना प्रकारके यज्ञोंद्वारा मेरी आराधना करते हैं, उन्हें ही मेरी प्राप्ति होती है

Sang Dewa bersabda: “Mereka yang dua-kali-lahir (dvija) yang mempelajari Weda dengan benar, berhati tenteram dan telah menaklukkan amarah, menyembah-Ku melalui berbagai macam yajña; merekalah yang mencapai-Ku.”

Verse 25

प्राप्तुंन शक्‍यो यो विद्वन्‌ नरैर्दुष्कृतकर्मभि: । लोभाभिभूतै: कृपणैरनार्यरकृतात्मभि:,विद्वन्‌! पापकर्मा, लोभी, कृपण, अनार्य और अजितात्मा मनुष्य जिसे कभी नहीं पा सकते वह महान्‌ फल मुझे ही समझो। मैं ही शुद्ध अन्तःकरणवाले मानवोंको सुलभ होनेवाला योगसेवित मार्ग हूँ। मूढ़ मनुष्योंके लिये मैं सर्वथा दुर्लभ हूँ

Sang Dewa bersabda: “Wahai orang bijak, pencapaian yang tak dapat diraih oleh manusia berbuat jahat—dikuasai loba, kikir, tak mulia, dan tak menaklukkan diri—ketahuilah bahwa buah agung itu tiada lain adalah Aku. Akulah jalan yang ditempuh melalui yoga; mudah dijangkau oleh mereka yang batinnya disucikan, namun bagi yang terdelusi Aku sepenuhnya sukar diperoleh.”

Verse 26

तं॑ मां महाफलं विद्धि नराणां भावितात्मनाम्‌ | सुदुष्प्रापं विमूढानां मार्ग योगैर्निषेवितम्‌,विद्वन्‌! पापकर्मा, लोभी, कृपण, अनार्य और अजितात्मा मनुष्य जिसे कभी नहीं पा सकते वह महान्‌ फल मुझे ही समझो। मैं ही शुद्ध अन्तःकरणवाले मानवोंको सुलभ होनेवाला योगसेवित मार्ग हूँ। मूढ़ मनुष्योंके लिये मैं सर्वथा दुर्लभ हूँ

Ketahuilah Aku sebagai ganjaran tertinggi bagi manusia yang batinnya terolah dan tertib. Bagi yang terdelusi Aku amat sukar dicapai; Akulah jalan yang dimuliakan dan dijalani melalui yoga.

Verse 27

यदा यदा च धर्मस्य ग्लानिर्भवति सत्तम | अभ्युत्थानमधर्मस्य तदा55त्मानं सृजाम्यहम्‌,महर्ष!! जब-जब धर्मकी हानि और अधर्मका उत्थान होता है, तब-तब मैं अपने- आपको प्रकट करता हूँ। जब हिंसाप्रेमी दैत्य श्रेष्ठ देवताओंके लिये अवध्य हो जाते हैं तथा भयानक राक्षस जब इस संसारमें उत्पन्न हो अत्याचार करने लगते हैं तब मैं पुण्यात्मा पुरुषोंके घरोंपर मानवशरीरमें प्रविष्ट होकर प्रकट होता हूँ और उन दैत्यों एवं राक्षसोंका सारा उपद्रव शान्त कर देता हूँ

Sang Dewa bersabda: “Wahai yang terbaik di antara orang baik, setiap kali dharma merosot dan adharma bangkit menguat, saat itulah Aku menampakkan Diri. Ketika para daitya yang mencintai kekerasan menjadi tak terkalahkan bahkan bagi para dewa utama, dan ketika rākṣasa yang mengerikan lahir di dunia lalu menindasnya, Aku memasuki penjelmaan sebagai manusia—tampak di rumah-rumah orang berbudi—dan Aku meredakan seluruh ancaman para daitya dan rākṣasa itu.”

Verse 28

दैत्या हिंसानुरक्ताश्न अवध्या: सुरसत्तमै: । राक्षसाश्षापि लोकेड5स्मिन्‌ यदोत्पत्स्यन्ति दारुणा:,महर्ष!! जब-जब धर्मकी हानि और अधर्मका उत्थान होता है, तब-तब मैं अपने- आपको प्रकट करता हूँ। जब हिंसाप्रेमी दैत्य श्रेष्ठ देवताओंके लिये अवध्य हो जाते हैं तथा भयानक राक्षस जब इस संसारमें उत्पन्न हो अत्याचार करने लगते हैं तब मैं पुण्यात्मा पुरुषोंके घरोंपर मानवशरीरमें प्रविष्ट होकर प्रकट होता हूँ और उन दैत्यों एवं राक्षसोंका सारा उपद्रव शान्त कर देता हूँ

Sang Dewa: “Ketika para Daitya yang mencintai kekerasan menjadi tak tertebas bahkan oleh para dewa yang utama, dan ketika Rakshasa yang mengerikan muncul di dunia ini lalu menindasnya, saat itulah Aku menampakkan diri—memasuki tubuh manusia di rumah-rumah orang saleh—dan Aku meredakan seluruh ancaman dari Daitya dan Rakshasa itu.”

Verse 29

तदाहं सम्प्रसूयामि गृहेषु शुभकर्मणाम्‌ । प्रविष्टो मानुषं देहं सर्व प्रशमयाम्पहम्‌,महर्ष!! जब-जब धर्मकी हानि और अधर्मका उत्थान होता है, तब-तब मैं अपने- आपको प्रकट करता हूँ। जब हिंसाप्रेमी दैत्य श्रेष्ठ देवताओंके लिये अवध्य हो जाते हैं तथा भयानक राक्षस जब इस संसारमें उत्पन्न हो अत्याचार करने लगते हैं तब मैं पुण्यात्मा पुरुषोंके घरोंपर मानवशरीरमें प्रविष्ट होकर प्रकट होता हूँ और उन दैत्यों एवं राक्षसोंका सारा उपद्रव शान्त कर देता हूँ

Karena itu Aku menampakkan diri dengan lahir di rumah tangga orang-orang berbudi. Dengan memasuki tubuh manusia, Aku menenteramkan setiap gangguan dan meredakan segala kekacauan.

Verse 30

सृष्टवा देवमनुष्यांस्तु गन्धर्वोरगराक्षसान्‌ । स्थावराणि च भूतानि संहराम्यात्ममायया,मैं ही अपनी मायासे देवता, मनुष्य, गन्धर्व, नाग, राक्षस तथा स्थावर प्राणियोंकी सृष्टि करके समय आनेपर पुन: उनका संहार कर डालता हूँ

Akulah yang, dengan māyā-Ku sendiri, menciptakan para dewa dan manusia, Gandharva, Nāga, dan Rākṣasa, serta golongan makhluk yang tak bergerak; dan pada waktunya Aku pun menarik mereka kembali melalui māyā-Ku.

Verse 31

कर्मकाले पुनर्देहमविचिन्त्यं सृजाम्पहम्‌ । आविव्य मानुषं देहं मर्यादाबन्धकारणात्‌,फिर सृष्टि-रचनाके समय मैं अचिन्त्यस्वरूप धारण करता हूँ; तथा मर्यादाकी स्थापना एवं रक्षाके लिये मानव-शरीरसे अवतार लेता हूँ

Pada saat tindakan yang telah ditetapkan, Aku kembali menampakkan suatu tubuh yang hakikatnya tak terjangkau pikiran. Dengan memasuki wujud manusia, Aku lahir demi menegakkan dan menjaga batas-batas tatanan benar (maryādā).

Verse 32

श्वेत: कृतयुगे वर्ण: पीतस्त्रेतायुगे मम । रक्तो द्वापरमासाद्य कृष्ण: कलियुगे तथा,सत्ययुगमें मेरे शरीरका रंग श्वेत, त्रेतामें पीला, द्वापरमें लाल और कलियुगमें काला होता है

Dalam Kṛta (Satya) Yuga, warna wujud-Ku adalah putih; dalam Tretā Yuga kuning; ketika mencapai Dvāpara Yuga menjadi merah; dan demikian pula dalam Kali Yuga menjadi hitam.

Verse 33

त्रयो भागा हुधर्मस्य तस्मिन्‌ काले भवन्ति च । अन्तकाले च सन्प्राप्ते कालो भूत्वातिदारुण:

Sang Dewa bersabda: “Pada saat itu, tiga bagian dharma tampil ke muka. Dan ketika saat terakhir tiba, Waktu sendiri menjadi amat mengerikan.”

Verse 34

अहं त्रिवर्त्मा विश्वात्मा सर्वतोकसुखावह:,मैं तीनों लोकोंमें व्याप्त, सम्पूर्ण विश्वका आत्मा, सब लोगोंको सुख पहुँचानेवाला, सबकी उत्पत्तिका कारण, सर्वव्यापी, अनन्त, इन्द्रियोंका नियन्ता और महान्‌ विक्रमशाली हूँ। ब्रह्म! यह जो सम्पूर्ण भूतोंका संहार करनेवाला और सबको उद्योगशील बनानेवाला अव्यक्त कालचक्र है, इसका संचालन केवल मैं ही करता हूँ। मुनिश्रेष्ठ! इस प्रकार मेरा स्वरूपभूत आत्मा ही सर्वत्र सब प्राणियोंके भीतर भलीभाँति स्थित है। विप्रवर! इतनेपर भी मुझे कोई जानता नहीं है

Sang Dewa bersabda: “Akulah jalan yang tiga, Atman semesta, dan pembawa kesejahteraan bagi segala dunia. Akulah sebab segala kelahiran—meliputi segalanya, tiada bertepi, penguasa indria, dan perkasa dalam daya. Wahai Brahmana, roda Waktu yang tak termanifest ini—yang membinasakan semua makhluk dan menggerakkan segala ciptaan untuk bertindak—berputar hanya oleh-Ku. Wahai resi termulia, demikianlah Diri-Ku yang hakiki bersemayam di mana-mana, teguh di dalam hati semua makhluk hidup. Namun, wahai brahmana utama, tiada seorang pun sungguh mengenal-Ku.”

Verse 35

आविर्भू: सर्वगोडनन्तो हृषीकेश उरुक्रम: । कालचक्रं नयाम्येको ब्रह्मन्नहमरूपकम्‌,मैं तीनों लोकोंमें व्याप्त, सम्पूर्ण विश्वका आत्मा, सब लोगोंको सुख पहुँचानेवाला, सबकी उत्पत्तिका कारण, सर्वव्यापी, अनन्त, इन्द्रियोंका नियन्ता और महान्‌ विक्रमशाली हूँ। ब्रह्म! यह जो सम्पूर्ण भूतोंका संहार करनेवाला और सबको उद्योगशील बनानेवाला अव्यक्त कालचक्र है, इसका संचालन केवल मैं ही करता हूँ। मुनिश्रेष्ठ! इस प्रकार मेरा स्वरूपभूत आत्मा ही सर्वत्र सब प्राणियोंके भीतर भलीभाँति स्थित है। विप्रवर! इतनेपर भी मुझे कोई जानता नहीं है

Sang Dewa bersabda: “Aku nyata, meliputi segalanya, tiada bertepi—Hṛṣīkeśa, Penguasa indria, dan Urukrama, yang berlangkah luas dan berdaya agung. Wahai Brahmana, hanya Aku yang menggerakkan roda Waktu yang tanpa rupa, yang mendorong semua makhluk untuk bertindak dan mendatangkan peleburan segala ciptaan.”

Verse 36

शमन सर्वभूतानां सर्वलोककृतोद्यमम्‌ | एवं प्रणिहित: सम्यड्‌ ममात्मा मुनिसत्तम | सर्वभूतेषु विप्रेन्द्र न च मां वेत्ति कश्चन,मैं तीनों लोकोंमें व्याप्त, सम्पूर्ण विश्वका आत्मा, सब लोगोंको सुख पहुँचानेवाला, सबकी उत्पत्तिका कारण, सर्वव्यापी, अनन्त, इन्द्रियोंका नियन्ता और महान्‌ विक्रमशाली हूँ। ब्रह्म! यह जो सम्पूर्ण भूतोंका संहार करनेवाला और सबको उद्योगशील बनानेवाला अव्यक्त कालचक्र है, इसका संचालन केवल मैं ही करता हूँ। मुनिश्रेष्ठ! इस प्रकार मेरा स्वरूपभूत आत्मा ही सर्वत्र सब प्राणियोंके भीतर भलीभाँति स्थित है। विप्रवर! इतनेपर भी मुझे कोई जानता नहीं है

Sang Dewa bersabda: “Akulah penenteram dan pengatur semua makhluk, dan Akulah yang menggerakkan semua dunia untuk berusaha. Wahai resi termulia, demikianlah Atman-Ku teguh dan tepat bersemayam. Namun, wahai brahmana utama, meski Aku berdiam dalam semua makhluk, tiada seorang pun mengenal-Ku.”

Verse 37

सर्वलोके च मां भक्ता: पूजयन्ति च सर्वश: । यच्च किंचित्‌ त्वया प्राप्तं मयि क्लेशात्मकं द्विज,समस्त जगत्‌में भक्त पुरुष सब प्रकारसे मेरी आराधना करते हैं। तुमने मेरे निकट आकर जो कुछ भी क्लेश उठाया है, ब्रह्मन! वह सब तुम्हारे भावी कल्याण और सुखका साधक है। अनघ! लोकमें तुमने जो कोई भी स्थावर-जंगम पदार्थ देखा है, उसके रूपमें सर्वथा मेरा भूत-भावन आत्मा ही प्रकट हुआ है। सम्पूर्ण लोकोंके पितामह ब्रह्मा मेरा आधा अंग हैं

Sang Dewa bersabda: “Di seluruh dunia, para bhakta-Ku memuja-Ku dengan segala cara. Dan wahai brahmana, segala kesukaran yang kau tanggung demi datang kepada-Ku, itulah sarana bagi kesejahteraan dan kebahagiaanmu kelak. Wahai yang tanpa noda, apa pun yang kau lihat di dunia—yang bergerak maupun yang tak bergerak—di sana, dalam wujud itu pula, Atman-Ku yang menghidupkan segala makhluk telah menampakkan diri. Brahmā, kakek agung segala dunia, adalah setengah dari keberadaan-Ku sendiri.”

Verse 38

सुखोदयाय तत्‌ सर्व श्रेयसे च तवानघ । यच्च किंचित्‌ त्वया लोके दृष्टं स्थावरजड्रमम्‌,समस्त जगत्‌में भक्त पुरुष सब प्रकारसे मेरी आराधना करते हैं। तुमने मेरे निकट आकर जो कुछ भी क्लेश उठाया है, ब्रह्मन! वह सब तुम्हारे भावी कल्याण और सुखका साधक है। अनघ! लोकमें तुमने जो कोई भी स्थावर-जंगम पदार्थ देखा है, उसके रूपमें सर्वथा मेरा भूत-भावन आत्मा ही प्रकट हुआ है। सम्पूर्ण लोकोंके पितामह ब्रह्मा मेरा आधा अंग हैं

Sang Dewa bersabda: “Wahai yang tanpa noda, semua yang terjadi ini ditujukan bagi kebahagiaanmu kelak dan kebaikan yang lestari. Wahai brahmana, segala kesukaran yang kautanggung demi mendekati-Ku akan menjadi sarana kesejahteraan dan sukacita di masa depan. Dan apa pun yang kaulihat di dunia ini—yang tak bergerak maupun yang bergerak—ketahuilah, dalam tiap wujud itu hanya Diri-Ku, Sang Penghidup segala makhluk, yang menampakkan diri.”

Verse 39

विहित: सर्वथैवासी ममात्मा भूतभावन: । अर्ध मम शरीरस्य सर्वलोकपितामह:,समस्त जगत्‌में भक्त पुरुष सब प्रकारसे मेरी आराधना करते हैं। तुमने मेरे निकट आकर जो कुछ भी क्लेश उठाया है, ब्रह्मन! वह सब तुम्हारे भावी कल्याण और सुखका साधक है। अनघ! लोकमें तुमने जो कोई भी स्थावर-जंगम पदार्थ देखा है, उसके रूपमें सर्वथा मेरा भूत-भावन आत्मा ही प्रकट हुआ है। सम्पूर्ण लोकोंके पितामह ब्रह्मा मेरा आधा अंग हैं

Sang Dewa bersabda: “Dalam segala hal engkau teguh di dalam-Ku; Diri-Ku sendiri—Sang Bhūta-bhāvana, yang menampakkan segala makhluk—telah tersingkap. Wahai brahmana, kesukaran yang kautanggung demi mendekati-Ku akan menjadi jalan bagi kesejahteraan dan kebahagiaanmu kelak. Wahai yang tanpa noda, apa pun yang kaulihat di dunia—yang bergerak maupun yang tak bergerak—itulah wujud-Ku sendiri, sumber makhluk, yang tampil dalam rupa itu. Dan Brahmā, kakek agung seluruh dunia, seakan-akan adalah separuh dari tubuh-Ku.”

Verse 40

अहं नारायणो नाम शड्खचक्रगदाधर: । यावद्युगानां विप्रर्षे सहस्रपरिवर्तनात्‌,अशिशु: शिशुरूपेण यावदब्रह्मा न बुध्यते । ब्रह्मर्ष! मैं शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाला विश्वात्मा नारायण हूँ, सहस्र युगके अन्तमें जो प्रलय होता है वह जबतक रहता है, तबतक सब प्राणियोंको (महानिद्रारूप मायासे) मोहित करके मैं (जलमें) शयन करता हूँ। मुनिश्रेष्ठ! यद्यपि मैं बालक नहीं हूँ, तो भी जबतक ब्रह्मा नहीं जागते, तबतक सदा इसी प्रकार बालकरूप धारण करके यहाँ रहता हूँ

Sang Dewa bersabda: “Aku bernama Nārāyaṇa, pemegang sangkha, cakra, dan gada. Wahai brahmana-ṛṣi, selama pralaya yang datang pada akhir perputaran seribu yuga itu berlangsung, Aku menidurkan semua makhluk dalam maya ‘tidur agung’ dan berbaring bersemayam di atas samudra. Wahai yang terbaik di antara para resi, meski Aku bukanlah anak kecil, hingga Brahmā terjaga Aku tetap di sini demikian adanya, mengambil rupa seorang anak.”

Verse 41

तावत्‌ स्वपिमि विश्वात्मा सर्वभूतानि मोहयन्‌ । एवं सर्वमहं कालमिहास्से मुनिसत्तम

Sang Dewa bersabda: “Selama itulah Aku tidur sebagai Ātman Semesta, menebarkan delusi atas semua makhluk. Demikianlah Aku berdiam di sini sepanjang segala masa, wahai resi termulia.”

Verse 42

मया च दत्तो विप्राग्रय वरस्ते ब्रह्म॒रूपिणा,विप्रशिरोमणे! तुम ब्रह्मर्षियोंद्वारा पूजित हो। मैंने ही ब्रह्मारूपसे तुम्हारे ऊपर बार-बार संतुष्ट हो तुम्हें अभीष्ट वर प्रदान किया है। मैंने समझ लिया था कि तुम सम्पूर्ण चराचर जगत्‌को नष्ट तथा एकार्णवमें निमग्न हुआ देखकर व्याकुल हो रहे हो। इसीलिये तुम्हें पुनः जगत्‌का दर्शन कराया है। ब्रह्मर्ष! जब तुम मेरे शरीरके भीतर प्रविष्ट हुए थे और समस्त संसारको देखकर विस्मय-विमुग्ध हो फिर सचेत नहीं हो पा रहे थे, तब मैंने तुरंत तुम्हें मुखसे बाहर निकाल दिया था

Sang Dewa bersabda: “Wahai brahmana terkemuka, permata para resi! Engkau dihormati oleh para brahmarṣi. Akulah yang, dengan menampakkan diri dalam rupa Brahmā, berulang kali berkenan kepadamu dan menganugerahkan karunia yang kauinginkan. Aku memahami kegelisahanmu ketika engkau melihat seluruh jagat—yang bergerak dan yang tak bergerak—telah musnah dan tenggelam dalam satu samudra kosmis. Karena itu Aku memperlihatkan dunia itu kembali kepadamu. Wahai brahmarṣi, ketika engkau masuk ke dalam tubuh-Ku dan, melihat segenap alam semesta, tertegun oleh takjub hingga tak mampu sadar kembali, seketika itu juga Aku menarikmu keluar melalui mulut-Ku.”

Verse 43

असकृत्‌ परितुष्टेन विप्रर्षिगणपूजित । सर्वमेकार्णवं दृष्टवा नष्ट स्थावरजड्रमम्‌,विप्रशिरोमणे! तुम ब्रह्मर्षियोंद्वारा पूजित हो। मैंने ही ब्रह्मारूपसे तुम्हारे ऊपर बार-बार संतुष्ट हो तुम्हें अभीष्ट वर प्रदान किया है। मैंने समझ लिया था कि तुम सम्पूर्ण चराचर जगत्‌को नष्ट तथा एकार्णवमें निमग्न हुआ देखकर व्याकुल हो रहे हो। इसीलिये तुम्हें पुनः जगत्‌का दर्शन कराया है। ब्रह्मर्ष! जब तुम मेरे शरीरके भीतर प्रविष्ट हुए थे और समस्त संसारको देखकर विस्मय-विमुग्ध हो फिर सचेत नहीं हो पा रहे थे, तब मैंने तुरंत तुम्हें मुखसे बाहर निकाल दिया था

Dewa bersabda: “Wahai permata para brahmana, yang dihormati oleh rombongan resi brahmana! Aku, dalam wujud Brahmā, berulang kali berkenan kepadamu dan telah menganugerahkan karunia yang kau dambakan. Aku memahami bahwa engkau diliputi duka ketika melihat seluruh jagat—yang bergerak maupun yang tak bergerak—binasa dan tenggelam dalam satu samudra kosmis. Karena itu Aku membuatmu memandang dunia sekali lagi. Wahai brahmarṣi, ketika engkau memasuki tubuh-Ku dan, setelah menyaksikan segenap alam semesta, tertegun dalam takjub hingga tak mampu kembali sadar, seketika itu juga Aku menarikmu keluar melalui mulut-Ku.”

Verse 44

विक्लवो5सि मया ज्ञातस्ततस्ते दर्शितं जगत्‌ । अभ्यन्तरं शरीरस्य प्रविष्टोडसि यदा मम,विप्रशिरोमणे! तुम ब्रह्मर्षियोंद्वारा पूजित हो। मैंने ही ब्रह्मारूपसे तुम्हारे ऊपर बार-बार संतुष्ट हो तुम्हें अभीष्ट वर प्रदान किया है। मैंने समझ लिया था कि तुम सम्पूर्ण चराचर जगत्‌को नष्ट तथा एकार्णवमें निमग्न हुआ देखकर व्याकुल हो रहे हो। इसीलिये तुम्हें पुनः जगत्‌का दर्शन कराया है। ब्रह्मर्ष! जब तुम मेरे शरीरके भीतर प्रविष्ट हुए थे और समस्त संसारको देखकर विस्मय-विमुग्ध हो फिर सचेत नहीं हो पा रहे थे, तब मैंने तुरंत तुम्हें मुखसे बाहर निकाल दिया था

Dewa bersabda: “Aku memahami bahwa engkau telah diliputi keguncangan; karena itu Aku memperlihatkan dunia kepadamu sekali lagi. Wahai yang utama di antara brahmana, ketika engkau memasuki tubuh-Ku dan, setelah melihat semuanya, terhanyut oleh keheranan hingga tak mampu menenangkan diri, seketika itu juga Aku mengeluarkanmu dengan cepat melalui mulut-Ku.”

Verse 45

दृष्टवा लोक॑ समस्तं च विस्मितो नावबुध्यसे । ततो$सि वकत्राद्‌ विप्रषे द्रुतं निःसारितो मया,विप्रशिरोमणे! तुम ब्रह्मर्षियोंद्वारा पूजित हो। मैंने ही ब्रह्मारूपसे तुम्हारे ऊपर बार-बार संतुष्ट हो तुम्हें अभीष्ट वर प्रदान किया है। मैंने समझ लिया था कि तुम सम्पूर्ण चराचर जगत्‌को नष्ट तथा एकार्णवमें निमग्न हुआ देखकर व्याकुल हो रहे हो। इसीलिये तुम्हें पुनः जगत्‌का दर्शन कराया है। ब्रह्मर्ष! जब तुम मेरे शरीरके भीतर प्रविष्ट हुए थे और समस्त संसारको देखकर विस्मय-विमुग्ध हो फिर सचेत नहीं हो पा रहे थे, तब मैंने तुरंत तुम्हें मुखसे बाहर निकाल दिया था

Dewa bersabda: “Setelah menyaksikan seluruh alam, engkau tertegun dalam takjub dan tak mampu kembali jernih; karena itu, wahai resi brahmana, Aku segera mengeluarkanmu dari mulut-Ku. Aku memahami bahwa engkau dilanda gundah ketika melihat semua makhluk dan benda binasa dan tenggelam dalam satu samudra kosmis; maka Aku menganugerahkan kepadamu penglihatan dunia sekali lagi. Ketika engkau memasuki tubuh-Ku dan, setelah melihat segenap jagat raya, tetap terbingung dan tak sanggup kembali pada dirimu, saat itu juga Aku melepaskanmu ke luar.”

Verse 46

आखयातस्ते मया चात्मा दुर्जेयो हि सुरासुरै:,ब्रह्मर्ष! इस प्रकार मैंने तुम्हें अपने स्वरूपका उपदेश किया है, जिसका जानना देवता और असुरोंके लिये भी कठिन है। जबतक महातपस्वी भगवान्‌ ब्रह्माका जागरण न हो, तबतक तुम श्रद्धा और विश्वासपूर्वक सुखसे विचरते रहो

Dewa bersabda: “Kini telah Kunyatakan kepadamu hakikat diri-Ku yang sejati; sungguh, ia sukar dipahami—bahkan oleh para dewa dan asura. Karena itu, wahai brahmarṣi, hingga Sang Brahmā, pertapa agung itu, terjaga, berjalanlah dengan tenteram, ditopang oleh śraddhā dan keyakinan.”

Verse 47

यावत्‌ स भगवान ब्रह्मा न बुध्येत महातपा: । तावत्‌ त्वमिह विप्रषें विश्रब्धश्नर वै सुखम्‌,ब्रह्मर्ष! इस प्रकार मैंने तुम्हें अपने स्वरूपका उपदेश किया है, जिसका जानना देवता और असुरोंके लिये भी कठिन है। जबतक महातपस्वी भगवान्‌ ब्रह्माका जागरण न हो, तबतक तुम श्रद्धा और विश्वासपूर्वक सुखसे विचरते रहो

Dewa bersabda: “Selama Sang Brahmā yang mulia, pertapa agung itu, belum terjaga, tinggallah di sini, wahai brahmarṣi—bergeraklah dengan tenteram, bebas dari takut dan ragu, dengan kepercayaan dan keyakinan.”

Verse 48

ततो विबुद्धे तस्मिंस्तु सर्वलोकपितामहे । एकीभूतो हि स्रक्ष्यामि शरीराणि द्विजोत्तम,द्विजश्रेष्ठ! सर्वलोकपितामह ब्रह्माके जागनेपर मैं उनसे एकीभूत हो समस्त शरीरोंकी सृष्टि करूँगा

Wahai yang terbaik di antara para dwija, ketika Kakek segala dunia, Brahmā, terjaga, aku akan menyatu dengannya dan menurunkan penciptaan makhluk berjasad—mewujudkan beragam tubuh bagi semua makhluk.

Verse 49

आकाश पृथिवीं ज्योतिर्वायुं सलिलमेव च । लोके यच्च भवेच्छेषमिह स्थावरजड्रमम्‌,आकाश, पृथ्वी, अग्नि, वायु और जलका तथा इस संसारमें जो अन्य चराचर वस्तुएँ अवशिष्ट हैं, उन सबका निर्माण करूँगा

Aku akan mewujudkan ruang, bumi, cahaya (api), angin, dan air—serta apa pun yang masih tersisa di dunia ini, yang bergerak maupun tak bergerak, bahkan yang inert.

Verse 50

मार्कण्डेय उवाच इत्युक्त्वान्तर्हितस्तात स देव: परमाद्धुत: । प्रजाश्वैमा: प्रपश्यामि विचित्रा विविधा: कृता:,मार्कण्डेयजी कहते हैं--तात युधिष्ठिर! ऐसा कहकर वे परम अद्भुत देवता भगवान्‌ बालमुकुन्द अन्तर्धान हो गये। उनके अन्तर्धान होते ही मैंने देखा कि यह नाना प्रकारकी विचित्र प्रजा ज्यों-की-त्यों उत्पन्न हो गयी है

Mārkaṇḍeya berkata: “Setelah berkata demikian, wahai anakku, dewa yang maha menakjubkan itu lenyap dari pandangan. Begitu ia menghilang, aku melihat makhluk-makhluk ini—beraneka ragam dan berbilang—muncul sebagaimana adanya, dibentuk dalam rupa yang bermacam-macam.”

Verse 51

एवं दृष्टं मया राजंस्तस्मिन्‌ प्राप्ते युगक्षये । आश्चर्य भरतश्रेष्ठ सर्वधर्मभूतां वर,सम्पूर्ण धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ भरतकुल-तिलक युधिष्ठिर! इस प्रकार उस प्रलयकालके आनेपर मुझे यह आश्चर्यजनक अनुभव हुआ था

Wahai Raja, ketika akhir zaman itu tiba, aku menyaksikannya dengan mata kepalaku sendiri. Sungguh peristiwa yang menakjubkan, wahai yang terbaik di antara Bharata, yang utama di antara para penegak dharma.

Verse 52

य: स देवो मया दृष्ट: पुरा पद्मायतेक्षण: । स एष पुरुषव्याप्र सम्बन्धी ते जनार्दन:,नरश्रेष्ठ! पुरातन प्रलयके समय मुझे जिन कमल-दललोचन देवता भगवान्‌ बालमुकुन्दका दर्शन हुआ था, तुम्हारे सम्बन्धी ये भगवान्‌ श्रीकृष्ण वे ही हैं

Wahai harimau di antara manusia, dewa yang dahulu kulihat—bermata laksana teratai—dialah Janārdana yang hadir ini. Ia adalah kerabatmu; dialah Śrī Kṛṣṇa.

Verse 53

अस्यैव वरदानाद्धि स्मृतिर्न प्रजहाति माम्‌ । दीर्घमायुश्न कौन्तेय स्वच्छन्दमरणं मम,कुन्तीनन्दन! इन्हींके वरदानसे मुझे पूर्वजन्मकी स्मृति भूलती नहीं है। मेरी दीर्घकालीन आयु और स्वच्छन्द मृत्यु भी इन्हींकी कृपाका प्रसाद है

Sesungguhnya, karena anugerah-Nya semata, ingatanku tidak meninggalkanku—aku tidak kehilangan kenangan akan kelahiran-kelahiranku terdahulu. Wahai putra Kuntī yang berumur panjang, umurku dipanjangkan, bahkan kematianku pun berada dalam pilihanku sendiri, semuanya oleh rahmat-Nya.

Verse 54

स एष कृष्णो वार्ष्णेय: पुराणपुरुषो विभु: । आस्ते हरिरचिन्त्यात्मा क्रीडनज्जिव महाभुज:,ये वृष्णिकुल-भूषण महाबाहु श्रीकृष्ण ही वे सर्वव्यापी, अचिन्त्यस्वरूप, पुराण-पुरुष श्रीहरि हैं जो पहले बालरूपमें मुझे दिखायी दिये थे। वे ही यहाँ अवतीर्ण हो भाँति-भाँतिकी लीलाएँ करते हुए-से दीख रहे हैं

Inilah Kṛṣṇa, sang Vārṣṇeya—Pribadi Purba yang Mahakuasa. Ia hadir di sini sebagai Hari, berhakikat tak terpikirkan, seakan-akan sedang bermain dalam lila, berlengan perkasa. Dialah Śrī Hari yang meliputi segalanya, yang dahulu kulihat dalam wujud kanak-kanak; kini turun ke dunia dan tampak menampilkan beraneka ragam lila ilahi.

Verse 55

एष धाता विधाता च संहर्ता चैव शाश्वत: । श्रीवत्सवक्षा गोविन्द: प्रजापतिपति: प्रभु:,श्रीवत्सचिह्न जिनके वक्ष:स्थलकी शोभा बढ़ाता है, वे भगवान्‌ गोविन्द ही इस विश्वकी सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले, सनातन प्रभु और प्रजापतियोंके भी पति हैं

Dialah Tuhan yang kekal—pencipta dan penata, sekaligus pemusnah. Govinda, yang dadanya berhias tanda Śrīvatsa, adalah Penguasa bahkan atas para Prajāpati.

Verse 56

दृष्टवेमं वृष्णिप्रवरं स्मृतिमामियमागता । आदिदेवमयं जिष्णुं पुरुषं पीतवाससम्‌,इन आदिदेवस्वरूप, विजयशील, पीताम्बरधारी पुरुष वृष्णिकुल-भूषण श्रीकृष्णको देखकर मुझे इस पुरातन घटनाकी स्मृति हो आयी है

Melihat tokoh utama wangsa Vṛṣṇi ini—Pribadi tak terkalahkan yang mengenakan kain kuning, yang wujudnya adalah Sang Dewa Purba—maka bangkitlah dalam diriku ingatan akan peristiwa kuno itu.

Verse 57

सर्वेषामेव भूतानां पिता माता च माधव: । गच्छध्यमेनं शरणं शरण्यं कौरवर्षभा:,कुरुकुलश्रेष्ठ पाण्डवो! ये माधव ही समस्त प्राणियोंके पिता और माता हैं। ये ही सबको शरण देनेवाले हैं। अत: तुम सब लोग इन्हींकी शरणमें जाओ

Mādhava sungguh adalah ayah dan ibu bagi semua makhluk. Dialah yang patut dijadikan perlindungan dan Dialah pemberi perlindungan. Karena itu, wahai para kesatria terbaik di antara Kuru, pergilah berlindung kepada-Nya.

Verse 58

वैशम्पायन उवाच एवमुक्ताश्न ते पार्था यमौ च पुरुषर्षभौ । द्रौपद्या सहिता: सर्वे नमश्नक्रुर्जनार्दनम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! मार्कण्डेय मुनिके ऐसा कहनेपर कुन्तीपुत्र युधिष्ठि, भीम और अर्जुन तथा पुरुषरत्न नकुल-सहदेव--इन सबने द्रौपदीसहित उठकर भगवान्‌ श्रीकृष्णके चरणोंमें प्रणाम किया

Waiśampāyana berkata: Setelah demikian diucapkan, semua pangeran Pāṇḍawa—termasuk kedua saudara kembar, para insan utama—bangkit bersama Draupadī dan menunduk hormat kepada Janārdana (Śrī Kṛṣṇa).

Verse 59

स चैतान्‌ पुरुषव्याप्र साम्ना परमवल्गुना । सान्त्वयामास मानाहों मनन्‍्यमानो यथाविधि,नरश्रेष्ठ! फिर सम्माननीय श्रीकृष्णने भी इन सबका विधिपूर्वक समादर करते हुए परम मधुर सान्त्वनापूर्ण वचनोंद्वारा इन्हें सब प्रकारसे आश्वासन दिया

Waiśampāyana berkata: “Wahai harimau di antara manusia, kemudian beliau (Śrī Kṛṣṇa) menenteramkan mereka semua dengan kata-kata yang amat manis dan lembut. Sambil memuliakan mereka menurut tata cara yang semestinya, beliau meyakinkan mereka dalam segala hal.”

Verse 103

शेषो भूत्वाहमेवैतां धारयामि वसुन्धराम्‌ । वेदवेत्ता ब्राह्मण देवयज्ञमें स्थित मुझ यज्ञपुरुषका यजन करते हैं। पृथ्वीका पालन करनेवाले क्षत्रियनरेश स्वर्गप्राप्तिकी अभिलाषासे इस भूतलपर यज्ञोंद्वारा मेरा यजन करते हैं। इसी प्रकार वैश्य भी स्वर्गलोकपर विजय पानेकी इच्छासे मेरी सेवा-पूजा करते हैं। मैं ही शेषनाग होकर मेरुमन्दरसे विभूषित तथा चारों समुद्रोंसे घिरी हुई इस वसुन्धराको अपने सिरपर धारण करता हूँ

Sang Dewa bersabda: “Menjadi Śeṣa, Aku sendiri menopang bumi ini. Para brāhmaṇa yang mengetahui Weda, teguh dalam dewa-yajña, mempersembahkan kurban kepada-Ku—Yajña-Puruṣa. Raja-raja kṣatriya, pelindung bumi, demi meraih surga, menyembah-Ku di tanah ini melalui yajña. Demikian pula para vaiśya, menginginkan kemenangan atas alam surga, berbakti dan memuja-Ku. Maka Akulah, sebagai Śeṣa-nāga, yang menanggung di atas kepala-Ku bumi ini—berhias Meru dan Mandara serta dilingkari empat samudra.”

Verse 163

मामेव सतत विद्राश्चिन्तयन्त उपासते । शान्तिपरायण, संयमी, जिज्ञासु, काम-क्रोध-द्वेघपहित आसक्तिशून्य, निष्पाप, सात्विक, नित्य अहंकारशून्य तथा अध्यात्मज्ञानकुशल यति एवं ब्राह्मण सदा मेरा ही चिन्तन करते हुए उपासना करते हैं

Sang Dewa bersabda: Mereka yang bijaksana dan teguh berbhakti kepada-Ku semata, senantiasa memusatkan batin pada-Ku. Kedamaian menjadi tumpuan mereka; mereka menahan diri dan rindu mengetahui kebenaran. Bebas dari dorongan nafsu, amarah, dan kebencian; tanpa keterikatan, tanpa dosa, dan teguh dalam kemurnian. Senantiasa tanpa ego, serta mahir dalam pengetahuan tentang Ātman—para pertapa dan brāhmaṇa demikian terus-menerus merenungkan-Ku dan hidup dalam pemujaan yang khidmat.

Verse 188

इस प्रकार श्रीमह्ाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें एक सौ अद्ठासीवाँ अध्याय पूरा हुआ

Demikianlah, dalam Śrī Mahābhārata, pada Vana Parva, berakhirlah bab ke-188 dari bagian ringkasan Markandeya (Mārkaṇḍeya-samāsya).

Verse 189

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि भविष्यकथने एकोननवत्यधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें भविष्यकथनविषयक एक सौ नवासीवाँ अध्याय पूरा हुआ

Waiśampāyana berkata: “Demikianlah, dalam Śrī Mahābhārata, di dalam Vana Parva, pada bagian yang dikenal sebagai Mārkaṇḍeya-samāsya Parva, bab tentang penuturan peristiwa-peristiwa masa depan—yakni bab ke-seratus delapan puluh sembilan—berakhir.”

Verse 336

त्रैलोक्यं नाशयाम्येक: कृत्स्नं स्थावरजड्रमम्‌ । उस कलिकालमें तीन हिस्सा अधर्म और एक ही हिस्सा धर्म रहता है। प्रलयकाल आनेपर मैं ही अत्यन्त दारुण कालरूप होकर अकेला ही सम्पूर्ण चराचर त्रिलोकीका नाश करता हूँ

Sang Dewa bersabda: “Aku seorang diri melenyapkan seluruh triloka—segala yang bergerak maupun yang tetap dan tak bernyawa. Ketika pada Kali Yuga adharma menguasai dan dharma menyusut, maka saat pralaya tiba, Akulah Waktu yang dahsyat; Aku menarik kembali semua makhluk dan segenap jagat ke dalam kebinasaan.”

Verse 413

अशिशु: शिशुरूपेण यावदब्रह्मा न बुध्यते । ब्रह्मर्ष! मैं शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाला विश्वात्मा नारायण हूँ, सहस्र युगके अन्तमें जो प्रलय होता है वह जबतक रहता है, तबतक सब प्राणियोंको (महानिद्रारूप मायासे) मोहित करके मैं (जलमें) शयन करता हूँ। मुनिश्रेष्ठ! यद्यपि मैं बालक नहीं हूँ, तो भी जबतक ब्रह्मा नहीं जागते, तबतक सदा इसी प्रकार बालकरूप धारण करके यहाँ रहता हूँ

Sang Dewa bersabda: “Walau Aku bukanlah seorang bayi, Aku tetap berada di sini dalam wujud bayi sampai Brahmā terjaga. Wahai brahmarṣi, Akulah Nārāyaṇa, Ātman semesta, pemegang sangkha, cakra, dan gada. Selama pralaya pada akhir seribu yuga berlangsung, Aku menidurkan semua makhluk dalam pesona Māyā laksana tidur agung, lalu berbaring di atas samudra. Wahai yang termulia di antara para resi, selama Brahmā belum bangkit, demikianlah Aku senantiasa tinggal, mengenakan rupa kanak-kanak.”

Verse 1463

मत्तः प्रादुर्भवन्त्येते मामेव प्रविशन्ति च | ये शूद्र मेरे दोनों चरण हैं। मेरी शक्तिसे क्रमश: इनका प्रादुर्भाव हुआ है। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद--ये मुझसे ही प्रकट होते और मुझमें ही लीन हो जाते हैं

Sang Dewa bersabda: “Dari-Ku semata semuanya muncul, dan kepada-Ku semata semuanya kembali masuk. Oleh daya-Ku mereka menampakkan diri menurut urutan, dan ketika perjalanannya usai, mereka pun larut kembali ke dalam-Ku. Demikian pula Veda—Ṛg, Yajus, Sāma, dan Atharva—terungkap dari-Ku dan akhirnya kembali kepada-Ku.”

Frequently Asked Questions

The chapter stages two linked dilemmas: whether grief justifies collective punishment (the frog-killing campaign) and whether a ruler may retain what was received under a conditional loan—testing the king’s fidelity to truth and agreement.

Desire and anger distort judgment; dharma is preserved through truthful speech, honoring conditions, and accepting corrective counsel—especially when obligations cross social roles (ascetic and ruler).

No explicit phalaśruti is presented in the supplied passage; the chapter’s meta-function is exemplum-based instruction, using narrative consequence as its interpretive frame rather than a stated recitational reward.