
Sukta 5.61
Śyāvāśva Ātreya (traditional for RV 5.61)
Maruts (likely continuation of Marut context from 5.60; ‘naraḥ’ commonly fits Maruts as heroic troop)
Anuṣṭubh (probable; short verse)
This hymn addresses the Maruts as a heroic company arriving from the farthest reaches, asking their identity and inviting their protective presence. It celebrates their swift, storm-like power, their capacity to bestow abundance (cattle, strength, “streams” of nourishment), and their role as allies who help the singer cross beyond obstacles. The closing tone gestures to the wider Vedic motif of the bounteous chariot-course moving along the luminous “cows” (rays/wealth), anchoring the Maruts’ gifts in cosmic order.
Mantra 1
के ष्ठा नरः श्रेष्ठतमा य एकएक आयय । परमस्याः परावतः ॥
कौन हो तुम लोग? बड़े वीर और सबसे ऊपर वाले। एक-एक करके आए हो। बहुत दूर से, सबसे ऊंची जगह से आ रहे हो।
Mantra 2
क्व वोऽश्वाः क्वाभीशवः कथं शेक कथा यय । पृष्ठे सदो नसोर्यमः ॥
तुम्हारे घोड़े कहाँ हैं? लगाम कहाँ है? तुम कैसे चल पा रहे हो? तुम्हारी सवारी कैसी है? रास्ता कैसे चल रहे हो?
Mantra 3
जघने चोद एषां वि सक्थानि नरो यमुः । पुत्रकृथे न जनयः ॥
पीछे से धक्का आ रहा है। वीर अपने पैर फैला रहे हैं। जैसे कोई बेटा पैदा करने के लिए तैयार हो।
Mantra 4
परा वीरास एतन मर्यासो भद्रजानयः । अग्नितपो यथासथ ॥
आगे बढ़ो वीरों। आगे बढ़ो तुम लोग। अच्छे घर के हो। अग्नि की तरह तप रहे हो, जल रहे हो।
Mantra 5
सनत्साश्व्यं पशुमुत गव्यं शतावयम् । श्यावाश्वस्तुताय या दोर्वीरायोपबर्बृहत् ॥
उसने घोड़े दिए, गाय दिए, सौ गुना ज़्यादा दिया। श्यावाश्व की तारीफ के लिए, उसने वीर को ताकत दी।
Mantra 6
उत त्वा स्त्री शशीयसी पुंसो भवति वस्यसी । अदेवत्रादराधसः ॥
और एक औरत भी तुम्हारे लिए आदमी से ज़्यादा ताकतवर बन जाती है। वो तुम्हे बचा लेती है उन लोगों से जो भगवान को नहीं मानते। और उनसे भी जो बुरा काम करते हैं।
Mantra 7
वि या जानाति जसुरिं वि तृष्यन्तं वि कामिनम् । देवत्रा कृणुते मनः ॥
जो औरत समझ लेती है कि क्या गलत है। जो लोग प्यासे रहते हैं और गलत इच्छा रखते हैं, उन्हे अलग कर देती है। वो अपना मन भगवान की तरफ कर लेती है।
Mantra 8
उत घा नेमो अस्तुतः पुमाँ इति ब्रुवे पणिः । स वैरदेय इत्समः ॥
कुछ लोग कहते हैं कि यह तो बस आदमी है, कोई उसकी तारीफ नहीं करता। लेकिन जब बात आती है मुकाबले की और देने की, वो सबके बराबर होता है।
Mantra 9
उत मेऽरपद्युवतिर्ममन्दुषी प्रति श्यावाय वर्तनिम् । वि रोहिता पुरुमीळ्हाय येमतुर्विप्राय दीर्घयशसे ॥
मेरे लिए एक नई ताकत आगे बढी है जो खुशी देती है। यह अंधेरे रास्ते पर चल रही है। दो चमकदार शक्तियाँ आगे बढ़ रही हैं उस रिशि के लिए जिसका नाम बहुत दूर तक है।
Mantra 10
यो मे धेनूनां शतं वैददश्विर्यथा ददत् । तरन्त इव मंहना ॥
उसने मेरे लिए सौ गायें ढूंढ कर दी थीं। जैसे देना चाहिए था वैसे दिया। वो ऐसा है जैसे कोई इंसान बहुत ताकत के साथ पार कर जाता है।
Mantra 11
य ईं वहन्त आशुभिः पिबन्तो मदिरं मधु । अत्र श्रवांसि दधिरे ॥
वो लोग जल्दी-से जल्दी आते हैं, रास्ते में मधु पीते हैं। यहाँ आके उनकी बड़ाई हो गई है, सब उन्हे जानते हैं।
Mantra 12
येषां श्रियाधि रोदसी विभ्राजन्ते रथेष्वा । दिवि रुक्म इवोपरि ॥
इनकी चमक दोनों दुनिया में फैली है। उनके रथ चमक रहे हैं, जैसे आसमान में सोने की रोशनी हो।
Mantra 13
युवा स मारुतो गणस्त्वेषरथो अनेद्यः । शुभंयावाप्रतिष्कुतः ॥
मरुत सेना जवान है, उनके रथ में आग है। वो साफ-सुथरे हैं, खूबसूरत चलते हैं, कोई उन्हे रोके नहीं।
Mantra 14
को वेद नूनमेषां यत्रा मदन्ति धूतयः । ऋतजाता अरेपसः ॥
कौन जानता है यह लोग कहाँ खुश होते हैं? वो सच से पैदा हुए हैं, उनमे कोई दोष नहीं।
Mantra 15
यूयं मर्तं विपन्यवः प्रणेतार इत्था धिया । श्रोतारो यामहूतिषु ॥
तुम लोग इंसान को सही रास्ते पे ले चलो। जब भी कोई पुकारता है, तुम उसकी सुनो।
Mantra 16
ते नो वसूनि काम्या पुरुश्चन्द्रा रिशादसः । आ यज्ञियासो ववृत्तन ॥
हम माँगते हैं कि आप हमें वो धन ला कर दे जो हमें चाहिए। यह धन चमकदार है और दूर तक चमकता है। आप बुराई को खत्म करने वाले हैं। आप यहाँ आओ, क्योंकि आप यज्ञ के लायक हैं।
Mantra 17
एतं मे स्तोममूर्म्ये दार्भ्याय परा वह । गिरो देवि रथीरिव ॥
हे पानी से पैदा हुई देवी, मेरी यह स्तुति ले कर दार्भ्य ऋषि तक पहुँचा दो। मेरी बातें ले कर जाओ जैसे कोई रथ चलाता है। सब कुछ साफ-साफ पहुँच जाना चाहिए।
Mantra 18
उत मे वोचतादिति सुतसोमे रथवीतौ । न कामो अप वेति मे ॥
जब सोम रस निकाला जा रहा हो और रथ चल रहा हो, तब मेरी बात सुनी जाए। मेरा इरादा कभी कम नहीं होता। जो मैं चाहता हूँ वो मेरे पास रहता है।
Mantra 19
एष क्षेति रथवीतिर्मघवा गोमतीरनु । पर्वतेष्वपश्रितः ॥
यह वो रथ का रास्ता है जो दान करने वाला चलाता है। वो चमकती किरणों के साथ चलता है। पहाड़ों का सहारा ले कर वो ऊपर रहता है।
A direct questioning-invitation: ‘Who are you, O heroes?’—marveling at the Maruts’ arrival from the highest, farthest realm.
Praise expands into their collective might, speed, and generosity, tying their storm-energy to concrete boons (cattle, nourishment, strength) and to the singer’s safe passage beyond difficulty.
A vivid bestowal motif: the divine helper ‘finds’ and grants abundant ‘streams’ of nourishment—power that enables crossing beyond (taranta iva).
The hymn settles into assurance of beneficent guidance and a stable ‘chariot-course’ of the bounteous power moving along the luminous ‘cows,’ suggesting enduring support and ordered progress.
ke ṣṭhā naraḥ śreṣṭhatamāḥ
taranta iva maṃhanā
rathavītir maghavā gomatīḥ
In this sukta, ‘naraḥ’ most naturally refers to the Maruts—the heroic troop of storm-deities known for speed, brilliance, and protective power.
It invites their presence and seeks protection, victory over obstacles, and increase of prosperity—often expressed as cattle, nourishment, and strong forward movement.
Depending on reading, ‘cows’ can mean literal wealth (cattle) and also luminous rays or insights—signs of abundance and clarity granted by divine power.
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