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Sukta 1.32
Madhucchandas Vaiśvāmitra (traditional for RV 1.32)
Indra
Triṣṭubh
This hymn celebrates Indra’s primal hero-deed: the slaying of Vṛtra (Ahi), the obstruction that held back the waters, and the consequent release of the life-giving streams. It recounts Indra’s irresistible vajra-might, the breaking of mountain fastnesses, and the restoration of cosmic order and human flourishing. The sukta functions as a praise-invocation that magnifies Indra’s power so that he may again remove obstacles and grant victory, rain, and stability.
Mantra 1
इन्द्रस्य नु वीर्याणि प्र वोचं यानि चकार प्रथमानि वज्री । अहन्नहिमन्वपस्ततर्द प्र वक्षणा अभिनत्पर्वतानाम् ॥
अब मैं इंद्र की बहादुरी के बारे में बताता हूँ। उसने पहले-पहले जो काम किए थे वज्र लेकर। उसने उस बड़े साँप को मारा और पानी को आज़ाद किया। पहाड़ियों को फाड़ दिया उसने।
Mantra 2
अहन्नहिं पर्वते शिश्रियाणं त्वष्टास्मै वज्रं स्वर्यं ततक्ष । वाश्रा इव धेनवः स्यन्दमाना अञ्जः समुद्रमव जग्मुरापः ॥
उसने उस साँप को मारा जो पहाड़ी पर छुपा हुआ था। त्वष्टा ने उसके लिए वज्र बनाया जो आसमान जीत सकता है। फिर पानी बहने लगा, जैसे गायें आवाज़ करती हैं। वो सीधा समुंदर में गया।
Mantra 3
वृषायमाणोऽवृणीत सोमं त्रिकद्रुकेष्वपिबत्सुतस्य । आ सायकं मघवादत्त वज्रमहन्नेनं प्रथमजामहीनाम् ॥
इंद्र ने सोम पिया, वो भी तीन बार निचोड़ के। फिर उसने अपना हथियार उठाया, वज्र पकड़ा। उसने साँप जैसी पहली ताकत को मार दिया जो रास्ता रोक रही थी।
Mantra 4
यदिन्द्राहन्प्रथमजामहीनामान्मायिनाममिनाः प्रोत मायाः । आत्सूर्यं जनयन्द्यामुषासं तादीत्ना शत्रुं न किला विवित्से ॥
जब इंद्र ने उस पहले साँप को मारा, तो उसने जादू करने वाली ताकतें तोड़ दी। उसके बाद उसने सूरज को पैदा किया, आसमान और सवेरा भी आया। उसके बाद उसको कोई दुश्मन नहीं मिला।
Mantra 5
अहन्वृत्रं वृत्रतरं व्यंसमिन्द्रो वज्रेण महता वधेन । स्कन्धांसीव कुलिशेना विवृक्णाहिः शयत उपपृक्पृथिव्याः ॥
इंद्र ने वृत्र को वज्र से मारा, बड़े ज़ोर से। वो साँप जैसे किसी ने कुल्हाड़ी से कंधा काट दिया हो, वैसे ही टूट के ज़मीन पर गिर गया। रोका हुआ पानी आज़ाद हो गया।
Mantra 6
अयोद्धेव दुर्मद आ हि जुह्वे महावीरं तुविबाधमृजीषम् । नातारीदस्य समृतिं वधानां सं रुजानाः पिपिष इन्द्रशत्रुः ॥
वो नशे में अकड़ के लड़ने आया, बड़े हीरो के सामने। लेकिन वो इंद्र के मारों का सामना नहीं कर पाया। वो टूट के बिखर गया, जैसे कोई चीज़ पिस गई हो।
Mantra 7
अपादहस्तो अपृतन्यदिन्द्रमास्य वज्रमधि सानौ जघान । वृष्णो वध्रिः प्रतिमानं बुभूषन्पुरुत्रा वृत्रो अशयद्व्यस्तः ॥
उसके पैर नहीं थे, हाथ नहीं थे, फिर भी इंद्र से लड़ने आया। उसने वज्र पर वार किया, पर इंद्र के बराबर नहीं हो पाया। वो कहीं-कहीं गिर के फैल गया, बिखर गया पूरा।
Mantra 8
नदं न भिन्नममुया शयानं मनो रुहाणा अति यन्त्यापः । याश्चिद्वृत्रो महिना पर्यतिष्ठत्तासामहिः पत्सुतःशीर्बभूव ॥
जैसे किसी नदी का बंध टूट जाए, पानी उसके ऊपर से निकल जाता है जब वो वहाँ पड़ा हो। पानी ऊपर उठता है, मन में सोच आती है कि यह बढ़ रहा है। वृत्र ने अपनी ताकत से जो पानी रोक रखा था, इंद्र ने उसे छोड़ दिया। अब वो बड़ा साँप मिट्टी का ढेर बन गया।
Mantra 9
नीचावया अभवद्वृत्रपुत्रेन्द्रो अस्या अव वधर्जभार । उत्तरा सूरधरः पुत्र आसीद्दानुः शये सहवत्सा न धेनुः ॥
वृत्र की माँ बहुत नीचे गिर गई। इंद्र ने उसपर ज़ोर से मारा। ऊपर वाली माँ बनी, नीचे वाला बेटा बन गया। दानु वहाँ पड़ी है जैसे गाय अपने बच्चे के साथ सो रही हो, ताकत खत्म, अब बस पड़ा है।
Mantra 10
अतिष्ठन्तीनामनिवेशनानां काष्ठानां मध्ये निहितं शरीरम् । वृत्रस्य निण्यं वि चरन्त्यापो दीर्घं तम आशयदिन्द्रशत्रुः ॥
वो लकड़ियों के बीच में छुपा पड़ा था जहाँ कोई नहीं रहता। उसका शरीर वहाँ पड़ा था। वृत्र का छुपा हुआ अड्डा अब खुला है, पानी आज़ादी से बह रहा है। इंद्र के दुश्मन ने अंधेरा सह लिया, अब कोई ताकत नहीं बची।
Mantra 11
दासपत्नीरहिगोपा अतिष्ठन्निरुद्धा आपः पणिनेव गावः । अपां बिलमपिहितं यदासीद्वृत्रं जघन्वाँ अप तद्ववार ॥
पानी रोक के रखा हुआ था, जैसे कोई गाय बंध कर दे। दास और साँप पानी को रोक के खड़े थे। जब पानी का रास्ता बंद था, इंद्र ने वृत्र को मारा और रास्ता खोल दिया। अब पानी आज़ादी से बह सकता है।
Mantra 12
अश्व्यो वारो अभवस्तदिन्द्र सृके यत्त्वा प्रत्यहन्देव एकः । अजयो गा अजयः शूर सोममवासृजः सर्तवे सप्त सिन्धून् ॥
इंद्र, तेरे लिए यह एक घोड़े जैसा मैदान बना। जब एक देवता तुझसे टकराया। तूने गायें जीत ली, सोम भी मिल गया। तूने सात नदियों को बहने दिया, अब पानी आज़ादी से बह सकता है।
Mantra 13
नास्मै विद्युन्न तन्यतुः सिषेध न यां मिहमकिरद्ध्रादुनिं च । इन्द्रश्च यद्युयुधाते अहिश्चोतापरीभ्यो मघवा वि जिग्ये ॥
बिजली भी इंद्र को रोक नहीं पाई, न ही बादल की घटाई। जब इंद्र और उस बड़े साँप ने लड़ाई की, तो इंद्र जीत गया। वो ऐसे ही सब बंधन तोड़ के आगे बढ़ गया।
Mantra 14
अहेर्यातारं कमपश्य इन्द्र हृदि यत्ते जघ्नुषो भीरगच्छत् । नव च यन्नवतिं च स्रवन्तीः श्येनो न भीतो अतरो रजांसि ॥
इंद्र, जब तूने उस साँप को मारा, तो थोड़ा डर भी लगा। पर फिर भी तूने चियान-बीस नदियाँ पार कर ली। जैसे कोई बाज़ डर के बिना उड़ता है, वैसे ही तू दुनिया के पार निकल गया।
Mantra 15
इन्द्रो यातोऽवसितस्य राजा शमस्य च शृङ्गिणो वज्रबाहुः । सेदु राजा क्षयति चर्षणीनामरान्न नेमिः परि ता बभूव ॥
इंद्र अब राजा बन के आया है। उसके हाथ में वज्र है, और वो लोगों का राजा है। वो सबको अपने में समेटा है, जैसे साइकिल की रिंग सब स्पोक्स को पकड़ती है। सब ठीक से चल रहे हैं।
It tells how Indra kills Vṛtra (also called Ahi), the power that blocked the waters, and how the waters are released to flow freely again—restoring life and order.
Waters stand for rain, rivers, fertility, and the return of movement and abundance. When Indra releases them, the world becomes livable and prosperous again.
Indra can be read as inner strength and clarity, while Vṛtra is blockage—fear, inertia, confusion. The hymn describes the breakthrough that releases energy, insight, and forward movement.
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