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यह सोपान ‘धर्म-संकट में भक्ति की परीक्षा’ का है। राजधर्म, पुत्रधर्म, मातृभाव, और लोकलज्जा—इन सबके बीच राम-आज्ञा (ईश-आज्ञा) को सर्वोच्च मानने की साधना यहाँ घटित होती है। अयोध्या का वैभव-त्याग भीतर के ‘अहं-राज्य’ का विसर्जन बनता है; भरत का विलाप और फिर धीरज—वैराग्य-युक्त प्रेम (विवेक सहित करुणा) की सीढ़ी है।
यह प्रकरण ‘धर्म-संकट में भक्ति की परीक्षा’ का सघन रूपक है। (1) ‘अयोध्या का वैभव-त्याग’ भीतर के ‘अहं-राज्य’ के विसर्जन का संकेत बनता है—राजसत्ता नहीं, आज्ञा-पालन सर्वोच्च। (2) भरत का ‘तात-तात’ पुकारना केवल शोक नहीं; वह सम्बन्धों की डोर टूटने पर आत्मा की पुकार है—जहाँ सहारा केवल धर्म/ईश-आज्ञा रह जाती है। (3) कैकेयी का ‘माहुर’ (विष) रूपक बताता है कि वाणी भी शस्त्र है; मोह/अहंकार जब बोलता है तो करुणा को विषाक्त कर देता है। (4) कौसल्या का ‘धीरज’ उपदेश करुणा को शान्त-रस में रूपान्तरित करता है—भक्ति का परिपक्व रूप: रोना नहीं, सही दिशा में झुकना। (5) भरत की प्रतिज्ञात्मक भाषा और पातक-गणना ‘आत्म-शुद्धि’ का सार्वजनिक संस्कार है—मन को धर्म-प्रतिज्ञा में बाँधकर वह अपने प्रेम को विवेकयुक्त बनाता है। समग्रतः यह खंड ‘शोक → विवेक → शरणागति’ की सीढ़ी है।
Verse 327 (चौपाई)
तात बात मैं सकल सँवारी। भै मंथरा सहाय बिचारी।। कछुक काज बिधि बीच बिगारेउ। भूपति सुरपति पुर पगु धारेउ।। सुनत भरतु भए बिबस बिषादा। जनु सहमेउ करि केहरि नादा।। तात तात हा तात पुकारी। परे भूमितल ब्याकुल भारी।। चलत न देखन पायउँ तोही। तात न रामहि सौंपेहु मोही।। बहुरि धीर धरि उठे सँभारी। कहु पितु मरन हेतु महतारी।। सुनि सुत बचन कहति कैकेई। मरमु पाँछि जनु माहुर देई।। आदिहु तें सब आपनि करनी। कुटिल कठोर मुदित मन बरनी।।
कैकेयी बोली, पिताजी, मैंने सब ठीक कर दिया। मंथरा ने मेरी मदद की। लेकिन भगवान ने थोड़ा बिगाड़ दिया। राजा स्वर्ग चला गया। यह सुन के भरत दुख से बेहाल हो गया, जैसे कोई शेर की आवाज़ सुन के डर जाए। वो चिल्लाया, पिताजी, पिताजी, अरे पिताजी! और ज़मीन पर गिर गया। तुमने मुझे देखने का मौका नहीं दिया जब तुम चले गए। पिताजी, तुमने मुझे राम के हवाले नहीं किया। फिर वो उठा और बोला, माँ, बताओ पिताजी की मौत कैसे हुई। बेटे की बात सुन के कैकेयी बोली, जैसे वो उससे ज़हर दे रही हो। शुरू से यह सब मेरी अपनी करनी थी। मैं कट्टर थी, कठोर थी, और मेरा मन खुश था।
Verse 328 (दोहा/सोरठा)
भरतहि बिसरेउ पितु मरन सुनत राम बन गौनु। हेतु अपनपउ जानि जियँ थकित रहे धरि मौनु।।160।।
जब भरत को पता चला कि राम वन चला गया, तो उसने अपने पिताजी की मौत भी भूल गया। उसके दिल में यह बात बैठ गई कि यह सब उसकी वजह से हुआ। वो चुपचाप खड़ा रहा, बहुत थका हुआ था।
Verse 329 (चौपाई)
बिकल बिलोकि सुतहि समुझावति। मनहुँ जरे पर लोनु लगावति।। तात राउ नहिं सोचे जोगू। बिढ़इ सुकृत जसु कीन्हेउ भोगू।। जीवत सकल जनम फल पाए। अंत अमरपति सदन सिधाए।। अस अनुमानि सोच परिहरहू। सहित समाज राज पुर करहू।। सुनि सुठि सहमेउ राजकुमारू। पाकें छत जनु लाग अँगारू।। धीरज धरि भरि लेहिं उसासा। पापनि सबहि भाँति कुल नासा।। जौं पै कुरुचि रही अति तोही। जनमत काहे न मारे मोही।। पेड़ काटि तैं पालउ सींचा। मीन जिअन निति बारि उलीचा।।
कैकेयी परेशान थी, उसने बेटे को समझाया। लेकिन ऐसा लग रहा था जैसे जले पर नमक डाल रही हो। वो बोली, पिताजी, राजा के लिए तुम्हे इतना दुख नहीं होना चाहिए। उसने अपने अच्छे करम का फल पाया और बड़ाई हासिल की। ज़िन्दगी में उसने सब कुछ पा लिया, और अंत में वो स्वर्ग चला गया। यह सोच के अपना दुख छोड़ दो। वापस राज्य जाओ और राज करो। यह सुन के भरत डर गया, जैसे कोई अंगारा उसके बदन को छू गया हो। उसने खुद को संभाला और गहरी साँस ली। उस पापी ने पूरे खानदान को बर्बाद कर दिया था। भरत बोला, अगर तुम्हारे मन में इतनी बुरी बात थी, तो मेरे पैदा होते ही मुझे क्यों नहीं मारा? तुमने पेड़ काट दिया और फिर उसकी जड़ को पानी दिया। तुमने मछली को मारा और फिर रोज़ पानी भी डालते रहे।
Verse 330 (दोहा/सोरठा)
हंसबंसु दसरथु जनकु राम लखन से भाइ। जननी तूँ जननी भई बिधि सन कछु न बसाइ।।161।।
दशरथ हंस वंश से हैं, जनक भी हंस वंश से हैं। राम और लक्ष्मण भाई हैं। तुम मेरी माँ बन गई हो, भगवान की मर्ज़ी के आगे कुछ नहीं चलता।
Verse 331 (चौपाई)
जब तैं कुमति कुमत जियँ ठयऊ। खंड खंड होइ ह्रदउ न गयऊ।। बर मागत मन भइ नहिं पीरा। गरि न जीह मुहँ परेउ न कीरा।। भूपँ प्रतीत तोरि किमि कीन्ही। मरन काल बिधि मति हरि लीन्ही।। बिधिहुँ न नारि हृदय गति जानी। सकल कपट अघ अवगुन खानी।। सरल सुसील धरम रत राऊ। सो किमि जानै तीय सुभाऊ।। अस को जीव जंतु जग माहीं। जेहि रघुनाथ प्रानप्रिय नाहीं।। भे अति अहित रामु तेउ तोही। को तू अहसि सत्य कहु मोही।। जो हसि सो हसि मुहँ मसि लाई। आँखि ओट उठि बैठहिं जाई।।
जब से तुमने बुरी बातें सुन्नी शुरू की, मेरा दिल टूट के टुकड़े-टुकड़े हो गया। फिर भी यह दिल तुमसे जुड़ा नहीं हुआ। जब मैंने तुमसे कुछ माँगा, तब दिल में कोई दर्द नहीं था। ना मैंने ज़हर पिया, ना मुँह में काँटा चुभा। राजा ने तुम पर इतना भरोसा कैसे कर लिया? मरने के वक़्त ब्रह्मा ने तुम्हारा दिमाग छीन लिया। ब्रह्मा भी औरत के दिल की बात नहीं समझता। वो धोखा, पाप और बुराइयों का घर होती है। राजा तो सीधा और अच्छा इंसान है, धरम में लगा रहता है। वो औरत की फितरत कैसे जानता? क्या कोई जीव है इस दुनिया में जिसके लिए राम जी जान से प्यारे नहीं? वो राम का दुश्मन बन गया, और तुम भी। तुम कौन हो? मुझे सच बताओ। जो हँसना चाहता है, वो हँस ले और अपने मुँह काला कर ले। आँखें बंद करके उठ के चला जाए।
Verse 332 (दोहा/सोरठा)
राम बिरोधी हृदय तें प्रगट कीन्ह बिधि मोहि। मो समान को पातकी बादि कहउँ कछु तोहि।।162।।
ब्रह्मा ने मुझे दिखायी दिला जिसका दिल राम के खिलाफ था। सच बताओ, क्या मेरे जैसा कोई पापी है इस दुनिया में?
Verse 333 (चौपाई)
सुनि सत्रुघुन मातु कुटिलाई। जरहिं गात रिस कछु न बसाई।। तेहि अवसर कुबरी तहँ आई। बसन बिभूषन बिबिध बनाई।। लखि रिस भरेउ लखन लघु भाई। बरत अनल घृत आहुति पाई।। हुमगि लात तकि कूबर मारा। परि मुह भर महि करत पुकारा।। कूबर टूटेउ फूट कपारू। दलित दसन मुख रुधिर प्रचारू।। आह दइअ मैं काह नसावा। करत नीक फलु अनइस पावा।। सुनि रिपुहन लखि नख सिख खोटी। लगे घसीटन धरि धरि झोंटी।। भरत दयानिधि दीन्हि छड़ाई। कौसल्या पहिं गे दोउ भाई।।
यह सुन के शत्रुघ्न अपनी माँ की कुटिलता पर गुस्से से जल उठा। उसका बदन आग जैसा हो गया, गुस्सा कंट्रोल नहीं हो रहा था। उसी वक़्त कुबर वहाँ आया, उसने अलग-अलग कपड़े और गहने पहने थे। उसे देख के लक्ष्मण का छोटा भाई भड़क गया, जैसे आग में घी डाल दिया हो। उसने एक ज़ोर की लात मारी, कुबर गिर गया और चीखने लगा। कुबर का सिर फट गया, दाँत टूट गए और मुँह से खून बहने लगा। वो चीखा, अरे देवी, मुझे क्यों नहीं मार दिया? मैंने अच्छा किया, फिर भी बुरा फल मिला। यह सुन के और उसकी बुराई देख के लक्ष्मण ने उसे पकड़-पकड़ के घसीटना शुरू किया। भरत, जो दया के भंडार थे, उन्होंने उसे छोड़ दिया। दोनों भाई कौसल्या के पास गए।
Verse 334 (दोहा/सोरठा)
मलिन बसन बिबरन बिकल कृस सरीर दुख भार। कनक कलप बर बेलि बन मानहुँ हनी तुसार।।163।।
उसने गंदे कपड़े पहने थे, रंग पीला था, बहुत दुखी था। शरीर पतला हो गया था और दिल पर बोझ सा था। वो दिख रहा था जैसे जंगल में सोना जैसी बेल पर पाला पड़ गया हो।
Verse 335 (चौपाई)
भरतहि देखि मातु उठि धाई। मुरुछित अवनि परी झइँ आई।। देखत भरतु बिकल भए भारी। परे चरन तन दसा बिसारी।। मातु तात कहँ देहि देखाई। कहँ सिय रामु लखनु दोउ भाई।। कैकइ कत जनमी जग माझा। जौं जनमि त भइ काहे न बाँझा।। कुल कलंकु जेहिं जनमेउ मोही। अपजस भाजन प्रियजन द्रोही।। को तिभुवन मोहि सरिस अभागी। गति असि तोरि मातु जेहि लागी।। पितु सुरपुर बन रघुबर केतू। मैं केवल सब अनरथ हेतु।। धिग मोहि भयउँ बेनु बन आगी। दुसह दाह दुख दूषन भागी।।
भरत को देख के उसकी माँ उठ के दौड़ी। बेहोश होके ज़मीन पर गिर गई। उसे ऐसे देख के भरत बहुत परेशान हो गया। वो उसके पाँव पर गिर गया, अपनी हालत भूल गया। माँ, तुम कहाँ हो? सीता, राम और लक्ष्मण कहाँ हैं? कैकेयी इस दुनिया में क्यों पैदा हुई? अगर पैदा होना ही था, तो बाँझ क्यों नहीं पैदा हुई? जिसने मेरे जनम पर कलंक लगाया, वो अपनी बदनामी का बर्तन है, अपनों की दुश्मन है। तीनों दुनिया में मेरा जैसा कोई अभागा है क्या? जिसकी माँ ऐसी गिर गई हो? पिताजी स्वर्ग चले गए, रघुवर जंगल गए। मैं अकेला सब बरबादी का कारण हूँ। धिग है मुझ पर, मैं जंगल की आग बन गया। जला देने वाला, अपने कुल का कलंक, पापी।
Verse 336 (दोहा/सोरठा)
मातु भरत के बचन मृदु सुनि सुनि उठी सँभारि।। लिए उठाइ लगाइ उर लोचन मोचति बारि।।164।।
भरत के नरम-नरम बात सुन के उनकी माँ उठी और खुद को संभाला। भरत ने उन्हें उठाया और अपने सीने से लगा लिया। फिर उनके आँसू पोंछे।
Verse 337 (चौपाई)
सरल सुभाय मायँ हियँ लाए। अति हित मनहुँ राम फिरि आए।। भेंटेउ बहुरि लखन लघु भाई। सोकु सनेहु न हृदयँ समाई।। देखि सुभाउ कहत सबु कोई। राम मातु अस काहे न होई।। माताँ भरतु गोद बैठारे। आँसु पौंछि मृदु बचन उचारे।। अजहुँ बच्छ बलि धीरज धरहू। कुसमउ समुझि सोक परिहरहू।। जनि मानहु हियँ हानि गलानी। काल करम गति अघटित जानि।। काहुहि दोसु देहु जनि ताता। भा मोहि सब बिधि बाम बिधाता।। जो एतेहुँ दुख मोहि जिआवा। अजहुँ को जानइ का तेहि भावा।।
भरत ने अपनी माँ को सिंपल प्यार से अपने पास लगा लिया। ऐसा लगा जैसे राम खुद आ गए हो। फिर उसने लक्ष्मण से मिला, अपने छोटे भाई से। उसका दिल दुख और प्यार से भर गया। सब लोग देख के बोलने लगे कि ऐसा ही होना चाहिए राम की माँ का। भरत ने अपनी माओं को गोद में बिठाया। उनके आँसू पोंछे और नरम बातें की। उसने कहा बेटा अभी भी हिम्मत रख। यह बुरा वक्त है, इसलिए दुख छोड़ दे। अपने दिल में शर्म मत फील कर। यह वक्त और किस्मत का काम है, कुछ बदला नहीं जा सकता। किसी को दोष मत देना माँ। मेरे ऊपर सब कुछ बुरा ही हो रहा है। राम ने मुझे इतने दुख में भी ज़ि�दा रखा, अभी कोई नहीं जानता उनका क्या इरादा था।
Verse 338 (दोहा/सोरठा)
पितु आयस भूषन बसन तात तजे रघुबीर। बिसमउ हरषु न हृदयँ कछु पहिरे बलकल चीर। 165।।
अपने पिता के कहने पर राम ने अपने गहने और कपड़े उतार दिए। ना खुशी हुई ना दुख, बस पेड़ की छाल के कपड़े पहन लिए।
Verse 339 (चौपाई)
मुख प्रसन्न मन रंग न रोषू। सब कर सब बिधि करि परितोषू।। चले बिपिन सुनि सिय सँग लागी। रहइ न राम चरन अनुरागी।। सुनतहिं लखनु चले उठि साथा। रहहिं न जतन किए रघुनाथा।। तब रघुपति सबही सिरु नाई। चले संग सिय अरु लघु भाई।। रामु लखनु सिय बनहि सिधाए। गइउँ न संग न प्रान पठाए।। यहु सबु भा इन्ह आँखिन्ह आगें। तउ न तजा तनु जीव अभागें।। मोहि न लाज निज नेहु निहारी। राम सरिस सुत मैं महतारी।। जिऐ मरै भल भूपति जाना। मोर हृदय सत कुलिस समाना।।
राम का चेहरा खुश था, दिल में ना कोई जोश था ना गुस्सा। वो सबको खुश रखना चाहते थे। जब वो जंगल के लिए निकले तो सीता उनके पीछे चल पड़ी। वो राम के पाँव से जुड़ गई थी। लक्ष्मण ने सुनते ही उठ के साथ चलना शुरू कर दिया। राम ने मना किया फिर भी वो नहीं रुका। फिर राम ने सबको सलाम किया और सीता और लक्ष्मण के साथ निकल गए। राम, लक्ष्मण और सीता जंगल चले गए। मेरा जान नहीं गया उनके साथ, मेरा प्राण नहीं गया। यह सब मेरी आँखों के सामने हुआ फिर भी यह बदकिस्मत जिस्म नहीं मरा। मुझमें ना शर्म बाकी है ना प्यार। मैं राम जैसा बेटा पैदा करने वाली माँ हूँ। जियूँ या मरूँ, मैं जानती हूँ राजा अच्छा है। मेरा दिल पत्थर जैसा हो गया है।
Verse 340 (दोहा/सोरठा)
कौसल्या के बचन सुनि भरत सहित रनिवास। ब्याकुल बिलपत राजगृह मानहुँ सोक नेवासु।।166।।
कौसल्या की बात सुन के भरत और राजमहल की औरतें बहुत दुखी हुई। सब रोए, पूरे महल में रोना सुनाई दिया जैसे वहाँ दुख ही बस गया हो।
Verse 341 (चौपाई)
बिलपहिं बिकल भरत दोउ भाई। कौसल्याँ लिए हृदयँ लगाई।। भाँति अनेक भरतु समुझाए। कहि बिबेकमय बचन सुनाए।। भरतहुँ मातु सकल समुझाईं। कहि पुरान श्रुति कथा सुहाईं।। छल बिहीन सुचि सरल सुबानी। बोले भरत जोरि जुग पानी।। जे अघ मातु पिता सुत मारें। गाइ गोठ महिसुर पुर जारें।। जे अघ तिय बालक बध कीन्हें। मीत महीपति माहुर दीन्हें।। जे पातक उपपातक अहहीं। करम बचन मन भव कबि कहहीं।। ते पातक मोहि होहुँ बिधाता। जौं यहु होइ मोर मत माता।।
भरत और शत्रुघ्न दोनों भाई रोए, बहुत दुखी थे। कौसल्या ने उनको अपने सीने से लगा लिया। भरत ने उनको बहुत तरीके से समझाया। उन्होंने जो बातें कही वो बिल्कुल सही थी, समझदारी भरी। भरत की माओं ने भी उसे पूरा समझाया। उन्होंने पुराण और वेदस की कहानियाँ सुनाई जो बहुत अच्छी थीं। भरत ने हाथ जोड़ के कहा, बिना किसी छल-छल के। उसकी बात सीधी थी, साफ थी, सिंपल थी। जो लोग अपनी माँ, बाप या बेटा मारते हैं। जो गाँव, गौशाला और पंडितों के घर जला देते हैं। जो औरतों या बच्चों को मारते हैं। या दोस्तों और राजा लोगों को ज़हर देते हैं। जो पाप हैं, छोटे या बड़े, जो जनम के फाँस हैं। जो हम काम, बात या सोच में करते हैं। हे बनाने वाले, मुझे वो सारे पाप लागो। अगर यह मेरी माँ की सलाह है।
Verse 342 (दोहा/सोरठा)
जे परिहरि हरि हर चरन भजहिं भूतगन घोर। तेहि कइ गति मोहि देउ बिधि जौं जननी मत मोर।।167।।
जो लोग हरि और शिव के चरण छोड़ देते हैं। और भूत-प्रेत का पूजा करते हैं जो डरावना है। हे बनाने वाले, मुझे उनकी ही गति दे। माँ, अगर यह तुम्हारी मर्ज़ी है।
Verse 343 (चौपाई)
बेचहिं बेदु धरमु दुहि लेहीं। पिसुन पराय पाप कहि देहीं।। कपटी कुटिल कलहप्रिय क्रोधी। बेद बिदूषक बिस्व बिरोधी।। लोभी लंपट लोलुपचारा। जे ताकहिं परधनु परदारा।। पावौं मैं तिन्ह के गति घोरा। जौं जननी यहु संमत मोरा।। जे नहिं साधुसंग अनुरागे। परमारथ पथ बिमुख अभागे।। जे न भजहिं हरि नरतनु पाई। जिन्हहि न हरि हर सुजसु सोहाई।। तजि श्रुतिपंथु बाम पथ चलहीं। बंचक बिरचि बेष जगु छलहीं।। तिन्ह कै गति मोहि संकर देऊ। जननी जौं यहु जानौं भेऊ।।
यह लोग वेद बेच देते हैं और धरम का पैसा ले लेते हैं। यह दूसरों की बुराई करते हैं, उनके पाप बताते हैं। यह धोखेबाज़ हैं, टेढ़े हैं, झगड़ा पसंद करते हैं। गुस्सा करते हैं, वेद को बुरा कहते हैं, दुनिया के दुश्मन हैं। यह लालची हैं, बुरी आदत वाले हैं। जो दूसरों का पैसा और दूसरों की बीवी के पीछे भागते हैं। माँ, मुझे उनकी बुरी गति मिल जाए। अगर तुम्हे यह सही लगता है। जो लोग अच्छे लोगों की संगत नहीं करते। जो बड़े मार्ग से दूर जाते हैं, किस्मत वाले नहीं हैं। जो इंसान के शरीर में आके हरि को भूल जाते हैं। जिनके बारे में हरि और शिव की बात नहीं सुनाई देती। यह वेद के रास्ते को छोड़ के उल्टा रास्ते चलते हैं। यह साधु बनते हैं और दुनिया को धोखा देते हैं। हे शिव, मुझे उनकी गति दे। माँ, अगर यह तुम्हारा इरादा है।
Verse 344 (दोहा/सोरठा)
मातु भरत के बचन सुनि साँचे सरल सुभायँ। कहति राम प्रिय तात तुम्ह सदा बचन मन कायँ।।168।।
अपनी माँ और भरत की बात सुनकर। राम, जो सच्चा था और सिंपल दिल वाला था। उसने कहा, मेरे प्यारे भाई। तुम्हारी बात, तुम्हारा दिल और तुम्हारा काम हमेशा मेरे साथ रहे।
Verse 345 (चौपाई)
राम प्रानहु तें प्रान तुम्हारे। तुम्ह रघुपतिहि प्रानहु तें प्यारे।। बिधु बिष चवै स्त्रवै हिमु आगी। होइ बारिचर बारि बिरागी।। भएँ ग्यानु बरु मिटै न मोहू। तुम्ह रामहि प्रतिकूल न होहू।। मत तुम्हार यहु जो जग कहहीं। सो सपनेहुँ सुख सुगति न लहहीं।। अस कहि मातु भरतु हियँ लाए। थन पय स्त्रवहिं नयन जल छाए।। करत बिलाप बहुत यहि भाँती। बैठेहिं बीति गइ सब राती।। बामदेउ बसिष्ठ तब आए। सचिव महाजन सकल बोलाए।। मुनि बहु भाँति भरत उपदेसे। कहि परमारथ बचन सुदेसे।।
राम मुझसे अपनी जान से भी प्यारा है। और तुम, बेटा, रघु के राजा को जान से भी प्यारे हो। मैं अगर ज़हर चबाऊँ या बरफ़ और आग टपकाऊँ। मैं पानी वाला बन जाऊँगा, पानी से कोई मतलब नहीं। मैं ज्ञान पा लूँ, मगर मेरा भ्रम नहीं जाएगा। मैं कभी राम के खिलाफ़ नहीं होऊँगा। यह तुम्हारी सलाह जो दुनिया तारीफ़ करती है। उसमें न सुख है न अच्छी गति, सपने में भी नहीं। यह कह के कैकेयी ने भरत को सीने से लगा लिया। उसके सीनों से दूध टपकने लगा, आँखों में पानी आ गया। बहुत रोई रात भर यूही बैठी। फिर वामदेव और वशिष्ठ आए। मंत्री और बड़े लोग सबको बुलाया। मुनि ने भरत को बहुत तरीके से समझाया। उन्होंने अच्छी बातें कही जो धरम की बात थीं।
Verse 346 (दोहा/सोरठा)
तात हृदयँ धीरजु धरहु करहु जो अवसर आजु। उठे भरत गुर बचन सुनि करन कहेउ सबु साजु।।169।।
बेटा, हिम्मत रख, दिल में तावत लाओ। जो अभी वक्त की ज़रूरत है वो करो। गुरु के बात सुन के भरत उठा। उन्होंने सब तैयारी करने को कहा।
परंपरा में भरत-चरित के पाठ से ‘राम-प्रेम में निष्कपटता’, माता-पिता के प्रति धर्मबुद्धि, और संकट में धैर्य-लाभ माना गया है; विशेषतः ‘राम-प्रतिकूलता’ का त्याग और शरणागति-भाव दृढ़ होता है।
सामान्य मानस-परंपरा में शोक-निवारण/धैर्य हेतु ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ या ‘राम राम’ नाम-स्मरण समपुट रूप में जोड़ा जाता है; कुछ पाठ-परंपराओं में ‘सियावर रामचंद्र की जय’ का आवर्तन भी किया जाता है।
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