यह सोपान ‘धर्म-संकट में भक्ति की परीक्षा’ का है। राजधर्म, पुत्रधर्म, मातृभाव, और लोकलज्जा—इन सबके बीच राम-आज्ञा (ईश-आज्ञा) को सर्वोच्च मानने की साधना यहाँ घटित होती है। अयोध्या का वैभव-त्याग भीतर के ‘अहं-राज्य’ का विसर्जन बनता है; भरत का विलाप और फिर धीरज—वैराग्य-युक्त प्रेम (विवेक सहित करुणा) की सीढ़ी है।
इस अंश में करुण-रस प्रधान है, पर वह केवल शोक नहीं—धर्मबोध से संयमित करुणा है। भरत का ‘तात-तात’ पुकारना पुत्र-हृदय की असहायता दिखाता है; कैकेयी का ‘मरमु पाँछि जनु माहुर देई’ वाक्य मनोवैज्ञानिक क्रूरता को तीक्ष्ण रूपक देता है। तत्पश्चात कौसल्या का मातृत्व करुणा को शान्ति में रूपान्तरित करता है—‘धीरज धरहु’ का उपदेश करुण-रस को शान्त-रस की ओर मोड़ता है। यहाँ तुलसीदास ‘लीला’ (राम का वनगमन) को ‘साधना’ (आज्ञापालन, वैराग्य, लोक-धर्म) में बदलते हैं। भरत की प्रतिज्ञात्मक भाषा (पातक-गणना) आत्मशुद्धि की कसौटी है: वह अपने मन को सार्वजनिक रूप से धर्म-प्रतिज्ञा में बाँध देता है। इस प्रकार अयोध्या काण्ड का यह खंड सोपान-क्रम में ‘विरह से विवेक’ और ‘शोक से शरणागति’ की सीढ़ी बनता है।
चौपाई 160.1-4
तात बात मैं सकल सँवारी।भै मंथरा सहाय बिचारी।।
कछुक काज बिधि बीच बिगारेउ।भूपति सुरपति पुर पगु धारेउ।।
सुनत भरतु भए बिबस बिषादा।जनु सहमेउ करि केहरि नादा।।
तात तात हा तात पुकारी।परे भूमितल ब्याकुल भारी।।
चलत न देखन पायउँ तोही।तात न रामहि सौंपेहु मोही।।
बहुरि धीर धरि उठे सँभारी।कहु पितु मरन हेतु महतारी।।
सुनि सुत बचन कहति कैकेई।मरमु पाँछि जनु माहुर देई।।
आदिहु तें सब आपनि करनी।कुटिल कठोर मुदित मन बरनी।।
tāta bāta maiṁ sakala sãvārī |bhai maṁtharā sahāya bicārī ||
kachuka kāja bidhi bīca bigāreu |bhūpati surapati pura pagu dhāreu ||
sunata bharatu bhae bibasa biṣādā |janu sahameu kari kehari nādā ||
tāta tāta hā tāta pukārī |pare bhūmitala byākula bhārī ||
calata na dekhana pāyaũ tohī |tāta na rāmahi sauṁpehu mohī ||
bahuri dhīra dhari uṭhe sãbhārī |kahu pitu marana hetu mahatārī ||
suni suta bacana kahati kaikeī |maramu pā̃chi janu māhura deī ||
ādihu teṁ saba āpani karanī |kuṭila kaṭhora mudita mana baranī ||
हे पुत्र, मैंने सब कुछ सँवार लिया था, और दीन मंथरा मेरी सहायक बनी। पर किसी काम में विधि ने बीच में बिगाड़ डाला: राजा ने देवराज इंद्र के नगर में चरण रख दिए। यह सुनकर भरत शोक से व्याकुल हो गए, जैसे सिंह की गर्जना से हाथी भयभीत हो जाता है। 'तात, तात, हा तात!' पुकारते हुए वे भूमितल पर गिर पड़े, अत्यंत व्याकुल होकर। 'तुम्हें जाते हुए मैं देख न सका, हे तात, और तुमने मुझे राम के सुपुर्द न किया।' फिर धीरज धरकर वे सँभलकर उठे और बोले, 'माता, पिता के मरने का कारण बताइए।' पुत्र के वचन सुनकर कैकेयी ने उत्तर दिया, जैसे कोई घाव को छानकर उसमें विष डाल दे। कुटिल और कठोर हृदय वाली, हर्षित मन से उसने आरंभ से सब अपनी करनी कह दी।
दोहा 160
भरतहि बिसरेउ पितु मरन सुनत राम बन गौनु।हेतु अपनपउ जानि जियँ थकित रहे धरि मौनु।।160।।
bharatahi bisareu pitu marana sunata rāma bana gaunu |hetu apanapau jāni jiyã thakita rahe dhari maunu ||160||
भरत ने राम के वन जाने का सुनकर पिता की मृत्यु भी भुला दी। अपने आपको कारण जानकर हृदय में वे स्तब्ध रहे और मौन धारण किया।
चौपाई 161.1-4
बिकल बिलोकि सुतहि समुझावति।मनहुँ जरे पर लोनु लगावति।।
तात राउ नहिं सोचे जोगू।बिढ़इ सुकृत जसु कीन्हेउ भोगू।।
जीवत सकल जनम फल पाए।अंत अमरपति सदन सिधाए।।
अस अनुमानि सोच परिहरहू।सहित समाज राज पुर करहू।।
सुनि सुठि सहमेउ राजकुमारू।पाकें छत जनु लाग अँगारू।।
धीरज धरि भरि लेहिं उसासा।पापनि सबहि भाँति कुल नासा।।
जौं पै कुरुचि रही अति तोही।जनमत काहे न मारे मोही।।
पेड़ काटि तैं पालउ सींचा।मीन जिअन निति बारि उलीचा।।
bikala biloki sutahi samujhāvati |manahũ jare para lonu lagāvati ||
tāta rāu nahiṁ soce jogū |biṛhai sukṛta jasu kīnheu bhogū ||
jīvata sakala janama phala pāe |aṁta amarapati sadana sidhāe ||
asa anumāni soca pariharahū |sahita samāja rāja pura karahū ||
suni suṭhi sahameu rājakumārū |pākeṁ chata janu lāga ãgārū ||
dhīraja dhari bhari lehiṁ usāsā |pāpani sabahi bhā̃ti kula nāsā ||
jauṁ pai kuruci rahī ati tohī |janamata kāhe na māre mohī ||
peṛa kāṭi taiṁ pālau sīṁcā |mīna jiana niti bāri ulīcā ||
विकल पुत्र को देखकर वह उसे समझाती थी, मानो जली हुई जगह पर नमक रगड़ती थी। "तात, राजा शोक के योग्य नहीं हैं। उन्होंने बहुत सुकृत और यश अर्जित किया और उसका भोग उठाया। जीवित रहते ही उन्होंने सब जन्मों का फल पा लिया, और अंत में अमरपति के धाम को सिधारे। ऐसा अनुमानकर शोक त्याग दो, समाज सहित राज्य और नगर का शासन करो।" यह सुनकर राजकुमार अत्यंत भय से सहम गया, मानो पके घाव पर अंगारा लग गया। धीरज धरकर उसने गहरी साँस ली: "पापिनी, तुमने हर प्रकार से कुल का नाश किया है। यदि तुम्हारे मन में इतनी बड़ी दुष्टता थी, तो जन्मते ही मुझे क्यों न मार डाला? पेड़ काटकर उसकी शाखाओं को सींचती हो, और तालाब का जल सुखाकर मछलियों को जीवित रखने की चेष्टा करती हो।"
दोहा 161
हंसबंसु दसरथु जनकु राम लखन से भाइ।जननी तूँ जननी भई बिधि सन कछु न बसाइ।।161।।
haṁsabaṁsu dasarathu janaku rāma lakhana se bhāi |jananī tū̃ jananī bhaī bidhi sana kachu na basāi ||161||
मेरा वंश सूर्यवंश है, दशरथ मेरे जनक हैं, राम और लक्ष्मण मेरे भाई हैं। तुम मेरी जननी हो, तुम ऐसी जननी बन गईं, विधि के आगे कुछ नहीं बसाया जा सकता।
चौपाई 162.1-4
जब तैं कुमति कुमत जियँ ठयऊ।खंड खंड होइ हृदउ न गयऊ।।
बर मागत मन भइ नहिं पीरा।गरि न जीह मुहँ परेउ न कीरा।।
भूपँ प्रतीत तोरि किमि कीन्ही।मरन काल बिधि मति हरि लीन्ही।।
बिधिहुँ न नारि हृदय गति जानी।सकल कपट अघ अवगुन खानी।।
सरल सुसील धरम रत राऊ।सो किमि जानै तीय सुभाऊ।।
अस को जीव जंतु जग माहीं।जेहि रघुनाथ प्रानप्रिय नाहीं।।
भे अति अहित रामु तेउ तोही।को तू अहसि सत्य कहु मोही।।
जो हसि सो हसि मुहँ मसि लाई।आँखि ओट उठि बैठहिं जाई।।
jaba taiṁ kumati kumata jiyã ṭhayaū |khaṁḍa khaṁḍa hoi hṛdau na gayaū ||
bara māgata mana bhai nahiṁ pīrā |gari na jīha muhã pareu na kīrā ||
bhūpã pratīta tori kimi kīnhī |marana kāla bidhi mati hari līnhī ||
bidhihũ na nāri hṛdaya gati jānī |sakala kapaṭa agha avaguna khānī ||
sarala susīla dharama rata rāū |so kimi jānai tīya subhāū ||
asa ko jīva jaṁtu jaga māhīṁ |jehi raghunātha prānapriya nāhīṁ ||
bhe ati ahita rāmu teu tohī |ko tū ahasi satya kahu mohī ||
jo hasi so hasi muhã masi lāī |ā̃khi oṭa uṭhi baiṭhahiṁ jāī ||
जब से तुमने अपने मन में दूषित बुद्धि, दुष्ट सलाह ठहराई, तब से तुम्हारा हृदय टुकड़े-टुकड़े क्यों नहीं हो गया? वर माँगते समय तुम्हारे मन को कोई पीड़ा नहीं हुई, तुम्हारी जीभ नहीं जली, और तुम्हारे मुँह में कीड़े नहीं पड़े। राजा ने तुम पर विश्वास कैसे किया? मरण का समय आ गया था और ईश्वर ने उनकी बुद्धि हर ली थी। ब्रह्मा ने भी स्त्री के हृदय की गति नहीं जानी, जो सब छल, पाप और अवगुणों की खान है। राजा सरल, सुशील और धर्म में रत थे; वे स्त्री के स्वभाव को कैसे जान सकते थे? क्या इस जगत में कोई ऐसा जीव या जंतु है जिसे रघुनाथ प्राणों से प्रिय न हों? फिर भी राम तुम्हारे अत्यंत वैरी बन गए। तुम कौन हो? मुझे सत्य बताओ। जो तुम हो सो हो, पर तुमने अपने मुख पर कालिख मल ली है। उठो, मेरी आँखों से ओटकर जाकर बैठो।
दोहा 162
राम बिरोधी हृदय तें प्रगट कीन्ह बिधि मोहि।मो समान को पातकी बादि कहउँ कछु तोहि।।162।।
rāma birodhī hṛdaya teṁ pragaṭa kīnha bidhi mohi |mo samāna ko pātakī bādi kahaũ kachu tohi ||162||
ब्रह्मा ने मुझे राम के विरोधी हृदय से प्रकट किया। मेरे समान पापी और कोई है? आपसे कुछ कहना व्यर्थ है।
चौपाई 163.1-4
सुनि सत्रुघुन मातु कुटिलाई।जरहिं गात रिस कछु न बसाई।।
तेहि अवसर कुबरी तहँ आई।बसन बिभूषन बिबिध बनाई।।
लखि रिस भरेउ लखन लघु भाई।बरत अनल घृत आहुति पाई।।
हुमगि लात तकि कूबर मारा।परि मुह भर महि करत पुकारा।।
कूबर टूटेउ फूट कपारू।दलित दसन मुख रुधिर प्रचारू।।
आह दइअ मैं काह नसावा।करत नीक फलु अनइस पावा।।
सुनि रिपुहन लखि नख सिख खोटी।लगे घसीटन धरि धरि झोंटी।।
भरत दयानिधि दीन्हि छड़ाई।कौसल्या पहिं गे दोउ भाई।।
suni satrughuna mātu kuṭilāī |jarahiṁ gāta risa kachu na basāī ||
tehi avasara kubarī tahã āī |basana bibhūṣana bibidha banāī ||
lakhi risa bhareu lakhana laghu bhāī |barata anala ghṛta āhuti pāī ||
humagi lāta taki kūbara mārā |pari muha bhara mahi karata pukārā ||
kūbara ṭūṭeu phūṭa kapārū |dalita dasana mukha rudhira pracārū ||
āha daia maiṁ kāha nasāvā |karata nīka phalu anaisa pāvā ||
suni ripuhana lakhi nakha sikha khoṭī |lage ghasīṭana dhari dhari jhoṁṭī ||
bharata dayānidhi dīnhi chaṛāī |kausalyā pahiṁ ge dou bhāī ||
शत्रुघ्न ने जब माता की कुटिलता सुनी, तब उनका शरीर जल उठा और क्रोध में वे अपने को न रोक सके। उसी समय कुबरी वहाँ आई, नाना प्रकार के वस्त्रों और आभूषणों से सुसज्जित होकर। उसे देखकर लक्ष्मण के छोटे भाई में क्रोध भर गया, जैसे घी की आहुति पाकर अग्नि प्रज्वलित हो उठे। वे उछलकर आगे बढ़े, निशाना लेकर कूबर को लात मारी; वह मुँह के बल भूमि पर गिरी और चीखने लगी। कूबर की कूबड़ टूट गई और सिर फट गया, दाँत कुचले गए और मुख से रक्त बहने लगा। "हाय भगवान! मैंने क्या बिगाड़ा? मैंने भला किया और इसका फल बुरा पाया।" यह सुनकर शत्रुघ्न ने उसे नख से शिख तक खोटी देखा और बार-बार जूँठ पकड़कर उसे घसीटने लगे। भरत ने दया के भंडार होकर उसे छुड़ा दिया, और फिर दोनों भाई कौसल्या के पास गए।
दोहा 163
मलिन बसन बिबरन बिकल कृस सरीर दुख भार।कनक कलप बर बेलि बन मानहुँ हनी तुसार।।163।।
malina basana bibarana bikala kṛsa sarīra dukha bhāra |kanaka kalapa bara beli bana mānahũ hanī tusāra ||163||
मलिन वस्त्र पहने, विवर्ण और व्याकुल, क्षीण शरीर, दुःख के भार से दबी, मानो वन में स्वर्ण कल्पवृक्ष की उत्तम बेल पर पाला पड़ गया हो।
चौपाई 164.1-4
भरतहि देखि मातु उठि धाई।मुरुछित अवनि परी झइँ आई।।
देखत भरतु बिकल भए भारी।परे चरन तन दसा बिसारी।।
मातु तात कहँ देहि देखाई।कहँ सिय रामु लखनु दोउ भाई।।
कैकइ कत जनमी जग माझा।जौं जनमि त भइ काहे न बाँझा।।
कुल कलंकु जेहिं जनमेउ मोही।अपजस भाजन प्रियजन द्रोही।।
को तिभुवन मोहि सरिस अभागी।गति असि तोरि मातु जेहि लागी।।
पितु सुरपुर बन रघुबर केतू।मैं केवल सब अनरथ हेतु।।
धिग मोहि भयउँ बेनु बन आगी।दुसह दाह दुख दूषन भागी।।
bharatahi dekhi mātu uṭhi dhāī |muruchita avani parī jhaĩ āī ||
dekhata bharatu bikala bhae bhārī |pare carana tana dasā bisārī ||
mātu tāta kahã dehi dekhāī |kahã siya rāmu lakhanu dou bhāī ||
kaikai kata janamī jaga mājhā |jauṁ janami ta bhai kāhe na bā̃jhā ||
kula kalaṁku jehiṁ janameu mohī |apajasa bhājana priyajana drohī ||
ko tibhuvana mohi sarisa abhāgī |gati asi tori mātu jehi lāgī ||
pitu surapura bana raghubara ketū |maiṁ kevala saba anaratha hetu ||
dhiga mohi bhayaũ benu bana āgī |dusaha dāha dukha dūṣana bhāgī ||
भरत को देखकर माता उठकर दौड़ीं। मूर्छित होकर धरती पर गिर पड़ीं। देखते ही भरत अत्यंत व्याकुल हो गए। अपने शरीर की दशा भूलकर उनके चरणों में गिर पड़े। हे माता, मुझे मेरे पिता को दिखाइए। सीता और राम-लक्ष्मण दोनों भाई कहाँ हैं? कैकेयी जगत में क्यों जन्मीं? यदि जन्मीं तो बाँझ क्यों नहीं हुईं? जिसने मुझे जन्म दिया, वह कुल का कलंक है, अपयश का भाजन है, प्रियजनों का विरोधी है। त्रिभुवन में मेरे समान अभागा कौन है, जिसके कारण हे माता, आपको ऐसी दशा प्राप्त हुई? पिता स्वर्गलोक गए, और रघुकुल के श्रेष्ठ राम वन में हैं; मैं अकेला सब आपदाओं का कारण हूँ। धिक्कार है मुझे! मैं बाँस के बन की आग के समान हो गया, जो असहनीय दाह, दुःख और दूषण में भागी है।
दोहा 164
मातु भरत के बचन मृदु सुनि सुनि उठी सँभारि।लिए उठाइ लगाइ उर लोचन मोचति बारि।।164।।
mātu bharata ke bacana mṛdu suni suni uṭhī sãbhāri |lie uṭhāi lagāi ura locana mocati bāri ||164||
माता ने भरत के कोमल वचन बार-बार सुनकर संभल कर उठीं। उन्होंने उसे उठाकर छाती से लगा लिया और नेत्रों से जल बहाने लगीं।
चौपाई 165.1-4
सरल सुभाय मायँ हियँ लाए।अति हित मनहुँ राम फिरि आए।।
भेंटेउ बहुरि लखन लघु भाई।सोकु सनेहु न हृदयँ समाई।।
देखि सुभाउ कहत सबु कोई।राम मातु अस काहे न होई।।
माताँ भरतु गोद बैठारे।आँसु पौंछि मृदु बचन उचारे।।
अजहुँ बच्छ बलि धीरज धरहू।कुसमउ समुझि सोक परिहरहू।।
जनि मानहु हियँ हानि गलानी।काल करम गति अघटित जानि।।
काहुहि दोसु देहु जनि ताता।भा मोहि सब बिधि बाम बिधाता।।
जो एतेहुँ दुख मोहि जिआवा।अजहुँ को जानइ का तेहि भावा।।
sarala subhāya māyã hiyã lāe |ati hita manahũ rāma phiri āe ||
bheṁṭeu bahuri lakhana laghu bhāī |soku sanehu na hṛdayã samāī ||
dekhi subhāu kahata sabu koī |rāma mātu asa kāhe na hoī ||
mātā̃ bharatu goda baiṭhāre |ā̃su pauṁchi mṛdu bacana ucāre ||
ajahũ baccha bali dhīraja dharahū |kusamau samujhi soka pariharahū ||
jani mānahu hiyã hāni galānī |kāla karama gati aghaṭita jāni ||
kāhuhi dosu dehu jani tātā |bhā mohi saba bidhi bāma bidhātā ||
jo etehũ dukha mohi jiāvā |ajahũ ko jānai kā tehi bhāvā ||
सरल स्वभाव से माता ने हृदय में ले लिया, अत्यधिक प्रेम से ऐसा मानो राम फिर आ गए। फिर लक्ष्मण के छोटे भाई को भी गले लगाया, शोक और स्नेह हृदय में समाए नहीं। स्वभाव देखकर सब कोई कहते, राम की माता ऐसी क्यों न हों? माता ने भरत को गोद में बैठाया, आँसू पोंछे और कोमल वचन बोले। अब भी हे बच्चे, विनती करती हूँ, धैर्य धरो, कुसमय समझकर शोक त्यागो। हृदय में हानि-ग्लानि न मानो, काल-कर्म की गति अटळ जानकर। किसी को दोष न दो हे तात, विधाता मुझसे सब प्रकार से प्रतिकूल हो गए हैं। जिसने इतने दुख में भी मुझे जिलाया, अब भी कौन जाने उसे क्या भाया?
दोहा 165
पितु आयस भूषन बसन तात तजे रघुबीर।बिसमउ हरषु न हृदयँ कछु पहिरे बलकल चीर।।165।।
pitu āyasa bhūṣana basana tāta taje raghubīra |bisamau haraṣu na hṛdayã kachu pahire balakala cīra ||165||
हे पुत्र! पिता की आज्ञा से रघुबीर ने आभूषण और वस्त्र त्याग दिए तथा हृदय में न किंचित् विषाद और न हर्ष रखते हुए वल्कल वस्त्र धारण कर लिए।
चौपाई 166.1-4
मुख प्रसन्न मन रंग न रोषू।सब कर सब बिधि करि परितोषू।।
चले बिपिन सुनि सिय सँग लागी।रहइ न राम चरन अनुरागी।।
सुनतहिं लखनु चले उठि साथा।रहहिं न जतन किए रघुनाथा।।
तब रघुपति सबही सिरु नाई।चले संग सिय अरु लघु भाई।।
रामु लखनु सिय बनहि सिधाए।गइउँ न संग न प्रान पठाए।।
यहु सबु भा इन्ह आँखिन्ह आगें।तउ न तजा तनु जीव अभागें।।
मोहि न लाज निज नेहु निहारी।राम सरिस सुत मैं महतारी।।
जिऐ मरै भल भूपति जाना।मोर हृदय सत कुलिस समाना।।
mukha prasanna mana raṁga na roṣū |saba kara saba bidhi kari paritoṣū ||
cale bipina suni siya sãga lāgī |rahai na rāma carana anurāgī ||
sunatahiṁ lakhanu cale uṭhi sāthā |rahahiṁ na jatana kie raghunāthā ||
taba raghupati sabahī siru nāī |cale saṁga siya aru laghu bhāī ||
rāmu lakhanu siya banahi sidhāe |gaiũ na saṁga na prāna paṭhāe ||
yahu sabu bhā inha ā̃khinha āgeṁ |tau na tajā tanu jīva abhāgeṁ ||
mohi na lāja nija nehu nihārī |rāma sarisa suta maiṁ mahatārī ||
jiai marai bhala bhūpati jānā |mora hṛdaya sata kulisa samānā ||
उनका मुख प्रसन्न था, मन में न क्रोध था न राग; सबको सब प्रकार से संतुष्ट किया। जब सीता ने सुना कि वे वन को जा रहे हैं, तब वे उनके साथ चल दीं; राम के चरणों में अनुरागी होकर वे पीछे न ठहरीं। लक्ष्मण ने सुनते ही उठकर उनके साथ चल दिए; रघुनाथ ने यत्न किए, पर वे न ठहरे। तब रघुपति ने सबको शीश झुकाया और सीता तथा अनुज भ्राता के साथ चल दिए। राम, लक्ष्मण और सीता वन को पधारे; मैं न तो उनके साथ गई और न अपने प्राण भेजे। यह सब मेरी इन्हीं आँखों के सामने घटित हुआ, तब भी मेरे देह से यह अभागा जीव न गया। मुझे लाज नहीं आती अपना नेह निहारकर, जो राम समान पुत्र की मैं माता हूँ। राजा जीवन और मृत्यु दोनों के भलीभाँति ज्ञाता थे; मेरा हृदय सौ वज्रों के समान कठोर है।
दोहा 166
कौसल्या के बचन सुनि भरत सहित रनिवास।ब्याकुल बिलपत राजगृह मानहुँ सोक नेवासु।।166।।
kausalyā ke bacana suni bharata sahita ranivāsa |byākula bilapata rājagṛha mānahũ soka nevāsu ||166||
कौसल्या के शब्द सुनकर भरत सहित अंतःपुर की स्त्रियाँ व्याकुल होकर रोने लगीं, और राजमहल मानो शोक का धाम बन गया।
चौपाई 167.1-4
बिलपहिं बिकल भरत दोउ भाई।कौसल्याँ लिए हृदयँ लगाई।।
भाँति अनेक भरतु समुझाए।कहि बिबेकमय बचन सुनाए।।
भरतहुँ मातु सकल समुझाईं।कहि पुरान श्रुति कथा सुहाईं।।
छल बिहीन सुचि सरल सुबानी।बोले भरत जोरि जुग पानी।।
जे अघ मातु पिता सुत मारें।गाइ गोठ महिसुर पुर जारें।।
जे अघ तिय बालक बध कीन्हें।मीत महीपति माहुर दीन्हें।।
जे पातक उपपातक अहहीं।करम बचन मन भव कबि कहहीं।।
ते पातक मोहि होहुँ बिधाता।जौं यहु होइ मोर मत माता।।
bilapahiṁ bikala bharata dou bhāī |kausalyā̃ lie hṛdayã lagāī ||
bhā̃ti aneka bharatu samujhāe |kahi bibekamaya bacana sunāe ||
bharatahũ mātu sakala samujhāīṁ |kahi purāna śruti kathā suhāīṁ ||
chala bihīna suci sarala subānī |bole bharata jori juga pānī ||
je agha mātu pitā suta māreṁ |gāi goṭha mahisura pura jāreṁ ||
je agha tiya bālaka badha kīnheṁ |mīta mahīpati māhura dīnheṁ ||
je pātaka upapātaka ahahīṁ |karama bacana mana bhava kabi kahahīṁ ||
te pātaka mohi hohũ bidhātā |jauṁ yahu hoi mora mata mātā ||
दोनों भाई भरत और शत्रुघ्न व्याकुल होकर रोने लगे, और कौसल्या ने उन्हें हृदय से लगा लिया। उन्होंने अनेक प्रकार से भरत को समझाया, विवेकमय वचन कहकर सुनाए। सभी माताओं ने भी भरत को समझाया, पुराण और श्रुति की सुंदर कथाएँ कहकर। छल से रहित, निर्मल और सरल सुंदर वचन भरत ने दोनों हाथ जोड़कर बोले। जो पाप माता, पिता या पुत्र को मारने से, गोठ सहित गाय जलाने से, या ब्राह्मणों के नगर को जलाने से होते हैं। जो पाप स्त्री या बालक को मारने से, अथवा मित्र या राजा को विष देने से होते हैं। जो पातक और उपपातक हैं, जिन्हें कवि कर्म, वचन और मन से उत्पन्न कहते हैं। वे सब पाप मुझे हों, हे विधाता, यदि यह मेरा मत था, हे माता।
दोहा 167
जे परिहरि हरि हर चरन भजहिं भूतगन घोर।तेहि कइ गति मोहि देउ बिधि जौं जननी मत मोर।।167।।
je parihari hari hara carana bhajahiṁ bhūtagana ghora |tehi kai gati mohi deu bidhi jauṁ jananī mata mora ||167||
जो हरि और हर के चरण त्यागकर भयंकर भूतगणों की पूजा करते हैं, ब्रह्मा मुझे उनकी गति दे, यदि हे माता, यह मेरा मत था।
चौपाई 168.1-4
बेचहिं बेदु धरमु दुहि लेहीं।पिसुन पराय पाप कहि देहीं।।
कपटी कुटिल कलहप्रिय क्रोधी।बेद बिदूषक बिस्व बिरोधी।।
लोभी लंपट लोलुपचारा।जे ताकहिं परधनु परदारा।।
पावौं मैं तिन्ह के गति घोरा।जौं जननी यहु संमत मोरा।।
जे नहिं साधुसंग अनुरागे।परमारथ पथ बिमुख अभागे।।
जे न भजहिं हरि नरतनु पाई।जिन्हहि न हरि हर सुजसु सोहाई।।
तजि श्रुतिपंथु बाम पथ चलहीं।बंचक बिरचि बेष जगु छलहीं।।
तिन्ह कै गति मोहि संकर देऊ।जननी जौं यहु जानौं भेऊ।।
becahiṁ bedu dharamu duhi lehīṁ |pisuna parāya pāpa kahi dehīṁ ||
kapaṭī kuṭila kalahapriya krodhī |beda bidūṣaka bisva birodhī ||
lobhī laṁpaṭa lolupacārā |je tākahiṁ paradhanu paradārā ||
pāvauṁ maiṁ tinha ke gati ghorā |jauṁ jananī yahu saṁmata morā ||
je nahiṁ sādhusaṁga anurāge |paramāratha patha bimukha abhāge ||
je na bhajahiṁ hari naratanu pāī |jinhahi na hari hara sujasu sohāī ||
taji śrutipaṁthu bāma patha calahīṁ |baṁcaka biraci beṣa jagu chalahīṁ ||
tinha kai gati mohi saṁkara deū |jananī jauṁ yahu jānauṁ bheū ||
जो वेद को बेचते हैं, धर्म का दुहकर लाभ लेते हैं, और जो चुगलखोर दूसरों के दोष और पाप कहकर फैलाते हैं। जो छली, कपटी, कलहप्रिय, क्रोधी, वेदों के निंदक और संसार के शत्रु हैं। जो लोभी, कामुक और लोलुप आचरण वाले हैं, जो दूसरों के धन और दूसरों की स्त्री पर नजर डालते हैं। माता, यदि यह बात मेरी स्वीकृति वाली थी, तो मैं उनकी भयंकर गति को प्राप्त होऊँ। जो साधुसंग में अनुराग नहीं रखते, जो अभागे परमार्थ के मार्ग से मुख फेर लेते हैं। जो मनुष्य शरीर पाकर भी हरि को नहीं भजते, और जिन्हें हरि और हर का सुयश प्रिय नहीं लगता। जो श्रुति के मार्ग को त्यागकर वाम मार्ग पर चलते हैं, और बनावटी वेष धारणकर जगत को धोखा देते हैं। माता, यदि मैं इस षड्यंत्र का भेद जानता था, तो शंकर मुझे उनकी गति दें।
दोहा 168
मातु भरत के बचन सुनि साँचे सरल सुभायँ।कहति राम प्रिय तात तुम्ह सदा बचन मन कायँ।।168।।
mātu bharata ke bacana suni sā̃ce sarala subhāyã |kahati rāma priya tāta tumha sadā bacana mana kāyã ||168||
माता ने भरत के सच्चे, सरल और स्वाभाविक वचन सुनकर कहा, "पुत्र, तुम सदा वचन, मन और काया से राम को प्रिय हो।"
चौपाई 169.1-4
राम प्रानहु तें प्रान तुम्हारे।तुम्ह रघुपतिहि प्रानहु तें प्यारे।।
बिधु बिष चवै स्रवै हिमु आगी।होइ बारिचर बारि बिरागी।।
भएँ ग्यानु बरु मिटै न मोहू।तुम्ह रामहि प्रतिकूल न होहू।।
मत तुम्हार यहु जो जग कहहीं।सो सपनेहुँ सुख सुगति न लहहीं।।
अस कहि मातु भरतु हियँ लाए।थन पय स्रवहिं नयन जल छाए।।
करत बिलाप बहुत यहि भाँती।बैठेहिं बीति गइ सब राती।।
बामदेउ बसिष्ठ तब आए।सचिव महाजन सकल बोलाए।।
मुनि बहु भाँति भरत उपदेसे।कहि परमारथ बचन सुदेसे।।
rāma prānahu teṁ prāna tumhāre |tumha raghupatihi prānahu teṁ pyāre ||
bidhu biṣa cavai sravai himu āgī |hoi bāricara bāri birāgī ||
bhaẽ gyānu baru miṭai na mohū |tumha rāmahi pratikūla na hohū ||
mata tumhāra yahu jo jaga kahahīṁ |so sapanehũ sukha sugati na lahahīṁ ||
asa kahi mātu bharatu hiyã lāe |thana paya sravahiṁ nayana jala chāe ||
karata bilāpa bahuta yahi bhā̃tī |baiṭhehiṁ bīti gai saba rātī ||
bāmadeu basiṣṭha taba āe |saciva mahājana sakala bolāe ||
muni bahu bhā̃ti bharata upadese |kahi paramāratha bacana sudese ||
राम तुम्हारे अपने प्राणों से भी प्रिय हैं, और तुम रघुपति को अपने प्राणों से भी प्यारे हो। चन्द्रमा विष बरसे, हिम से अग्नि निकले, जलचर जल से विरक्त हो जाए। ज्ञान हो जाए फिर भी मोह न मिटे, पर तुम राम के प्रतिकूल न हो सको। जो जग में कहते हैं कि यह तुम्हारा मत था, वे सपने में भी सुख और सुगति न पाएँ। ऐसा कहकर माता ने भरत को हृदय से लगा लिया, स्तनों से दूध बहने लगा और नेत्रों में जल छा गया। इस प्रकार बहुत विलाप करते हुए बैठे-बैठे सारी रात बीत गई। तब वामदेव और वशिष्ठ आए, और सभी मंत्रियों तथा प्रधान नागरिकों को बुलाया। मुनि ने भरत को बहुत प्रकार से उपदेश दिया, परमार्थ के उत्तम वचन कहे।
दोहा 169
तात हृदयँ धीरजु धरहु करहु जो अवसर आजु।उठे भरत गुर बचन सुनि करन कहेउ सबु साजु।।169।।
tāta hṛdayã dhīraju dharahu karahu jo avasara āju |uṭhe bharata gura bacana suni karana kaheu sabu sāju ||169||
"हे तात, हृदय में धैर्य धरो और आज जो अवसर अनुकूल है वह करो।" गुरु के वचन सुनकर भरत उठे और सब तैयारी करने को कहा।
मुख्य भक्ति-शिक्षा यह है कि ‘राम-आज्ञा’ को ‘ईश-आज्ञा’ मानकर स्वीकार करना ही सर्वोच्च साधना है—धर्म-संकट में भी। भरत का शोक जब प्रतिज्ञा और आत्म-परीक्षा में बदलता है, तब प्रेम ‘वैराग्य-युक्त’ बनता है: आसक्ति नहीं, समर्पण। कौसल्या का ‘धीरज’ उपदेश बताता है कि भक्ति का परिपक्व रूप करुणा को शान्ति में ढालता है—विलाप से आगे बढ़कर शरणागति। कैकेयी-मंथरा प्रसंग यह भी सिखाता है कि बाह्य कारण (निमित्त) चाहे जितने कटु हों, साधक का लक्ष्य भीतर की शुद्धि और आज्ञापालन है; लोकलज्जा/राजलाभ नहीं, धर्म और राम-भक्ति ही निर्णायक मानदण्ड हैं।
इस अंश में करुण-रस प्रधान है, पर वह केवल शोक नहीं—धर्मबोध से संयमित करुणा है। भरत का ‘तात-तात’ पुकारना पुत्रहृदय की असहायता दिखाता है; कैकेयी का ‘मरमु पाँछि जनु माहुर देई’ वाक्य मनोवैज्ञानिक क्रूरता को तीक्ष्ण रूपक देता है। तत्पश्चात कौसल्या का मातृत्व करुणा को शान्ति में रूपान्तरित करता है—‘धीरज धरहु’ का उपदेश करुण-रस को शान्त-रस की ओर मोड़ता है। यहाँ तुलसीदास ‘लीला’ (राम का वनगमन) को ‘साधना’ (आज्ञापालन, वैराग्य, लोक-धर्म) में बदलते हैं। भरत की प्रतिज्ञात्मक भाषा (पातक-गणना) आत्मशुद्धि की कसौटी है: वह अपने मन को सार्वजनिक रूप से धर्म-प्रतिज्ञा में बाँध देता है। इस प्रकार अयोध्या काण्ड का यह खंड सोपान-क्रम में ‘विरह से विवेक’ और ‘शोक से शरणागति’ की सीढ़ी बनता है।
करुण-रस से आरम्भ: भरत का ‘तात-तात’ पुकारना (असहाय पुत्र-हृदय, शोक का विस्फोट) → बीभत्स/रौद्र की छाया: कैकेयी का कठोर वचन ‘मरमु पाँछि जनु माहुर देई’ (वाणी-हिंसा, मनोवैज्ञानिक क्रूरता) → धर्म-संकट का मंथन: राजधर्म बनाम पुत्रधर्म, लोकलज्जा बनाम सत्य (अन्तर्द्वन्द्व, ग्लानि और आत्म-परीक्षा) → शान्त-रस की ओर मोड़: कौसल्या का ‘धीरज धरहु’ (मातृत्व का करुणा-शमन, विवेक का दीप) → वैराग्य-युक्त प्रेम: भरत का विलाप धीरज में ढलता है, प्रतिज्ञा/पातक-गणना द्वारा आत्मशुद्धि (शोक से शरणागति, विरह से विवेक) → अन्ततः भक्ति-रस का स्थिरीकरण: राम-आज्ञा को ईश-आज्ञा मानकर स्वीकार (आज्ञापालन ही साधना, त्याग ही आराधना)।
परंपरा में भरत-चरित के पाठ से ‘राम-प्रेम में निष्कपटता’, माता-पिता के प्रति धर्मबुद्धि, और संकट में धैर्य-लाभ माना गया है; विशेषतः ‘राम-प्रतिकूलता’ का त्याग और शरणागति-भाव दृढ़ होता है।
सामान्य मानस-परंपरा में शोक-निवारण/धैर्य हेतु ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ या ‘राम राम’ नाम-स्मरण समपुट रूप में जोड़ा जाता है; कुछ पाठ-परंपराओं में ‘सियावर रामचंद्र की जय’ का आवर्तन भी किया जाता है।
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