Ramayana Bala Kanda Sarga 56
Bala KandaSarga 5624 Verses

Sarga 56

बालकाण्ड ५६: विश्वामित्र–वसिष्ठ अस्त्रसंघर्षः (Visvamitra and Vasistha: Contest of Divine Weapons)

बालकाण्ड

इस सर्ग में क्षत्रिय-बल (शस्त्र/अस्त्र) और ब्राह्मण-तेज का सिद्धान्तात्मक संघर्ष दिखाया गया है। वसिष्ठ के वचन सुनकर महाबली विश्वामित्र अग्नेयास्त्र उठाकर प्रहार का आदेश देते हैं, पर वसिष्ठ अपने ब्रह्मदण्ड से उसे शांत कर देते हैं—यह दर्शाते हुए कि ब्राह्मण-तेज अस्त्र-बल से श्रेष्ठ है। इसके बाद विश्वामित्र वरुण, रौद्र, ऐन्द्र, पाशुपत आदि तथा मोहन, स्वापन, धर्मचक्र, विष्णुचक्र जैसे अनेक विशेष अस्त्रों का प्रयोग करते हैं। समस्त जगत् भयावह दृश्य से व्याकुल हो उठता है, किंतु ब्रह्मा-पुत्र वसिष्ठ अपने दण्ड-तेज से उन सबको मानो ‘निगल’ लेते हैं। अंत में विश्वामित्र ब्रह्मास्त्र छोड़ते हैं, जिससे तीनों लोक, देव-ऋषि-गन्धर्व और महान नाग भी आतंकित हो जाते हैं। वसिष्ठ ब्राह्मण-ऊर्जा से ब्रह्मास्त्र को भी उपसंहृत कर लेते हैं और क्रोधरूप धारण कर रोमकूपों से ज्वालाएँ प्रकट करते हैं। ऋषिगण उनकी स्तुति कर लोक-कल्याण हेतु संयम का निवेदन करते हैं। पराजित विश्वामित्र को बोध होता है कि ब्रह्म-तेज क्षत्रिय-बल से बढ़कर है; तब वे ब्रह्मत्व प्राप्त करने के लिए महान तप करने का संकल्प करते हैं।

Shlokas

Verse 1

एवमुक्तो वसिष्ठेन विश्वामित्रो महाबल:।आग्नेयमस्त्रमुत्क्षिप्य तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत्।।।।

वसिष्ठ के ऐसा कहने पर महाबली विश्वामित्र ने आग्नेयास्त्र उठाया और छोड़ते हुए पुकारा—“ठहरो, ठहरो!”

Verse 2

ब्रह्मदण्डं समुत्क्षिप्य कालदण्डमिवाऽपरम्।वसिष्ठो भगवान् क्रोधादिदं वचनमब्रवीत्।।।।

ब्रह्मदण्ड को उठाकर—मानो यमदण्ड के समान—क्रोध से भगवान् वसिष्ठ ने ये वचन कहे।

Verse 3

क्षत्रबन्धो स्थितोस्म्येष यद्बलं तद्विदर्शय।नाशयाम्यद्य ते दर्पं शस्त्रस्य तव गाधिज।।।।

अरे क्षत्रियकुल-कलंक! मैं यहाँ खड़ा हूँ; जो बल है, दिखा। हे गाधि-पुत्र! आज मैं तेरे शस्त्र-गर्व को चूर कर दूँगा।

Verse 4

क्व च ते क्षत्रियबलं क्व च ब्रह्मबलं महत्।पश्य ब्रह्मबलं दिव्यं मम क्षत्रियपांसन।।।।

कहाँ तुम्हारा क्षत्रिय-बल, और कहाँ ब्रह्म-बल की महिमा? हे क्षत्रियाधम, मेरे दिव्य ब्रह्म-बल को देखो।

Verse 5

तस्यास्त्रं गाधिपुत्रस्य घोरमाग्नेयमुद्यतम्।ब्रह्मदण्डेन तच्छान्तमग्नेर्वेग इवाम्भसा।।।।

गाधि-पुत्र का उठाया हुआ वह भयानक आग्नेय अस्त्र ब्रह्म-दण्ड से शांत कर दिया गया—जैसे जल से अग्नि का वेग दब जाता है।

Verse 6

वारुणं चैव रौद्रं च ऐन्द्रं पाशुपतं तथा।ऐषीकं चापि चिक्षेप कुपितो गाधिनन्दन:।।।।

क्रोधित गाधि-नन्दन ने वारुण, रौद्र, ऐन्द्र, पाशुपत तथा ऐषीक—इन अस्त्रों को भी फेंका।

Verse 7

मानवं मोहनं चैव गान्धर्वं स्वापनं तथा।जृम्भणं मादनं चैव संतापनविलापने।।।।शोषणं दारणं चैव वज्रमस्त्रं सुदुर्जयम्।ब्रह्मपाशं कालपाशं वारुणं पाशमेव च।।।।पैनाकास्त्रं च दयितं शुष्कार्द्रे अशनी उभे।दण्डास्त्रमथ पैशाचं क्रौञ्चमस्त्रं तथैव च।।।।धर्मचक्रं कालचक्रं विष्णुचक्रं तथैव च।वायव्यं मथनं चैव अस्त्रं हयशिरस्तथा।।।।शक्तिद्वयं च चिक्षेप कङ्कालं मुसलं तथा। 560वैद्याधरं महास्त्रं च कालास्त्रमथ दारुणम्।।।।त्रिशूलमस्त्रं घोरं च कापालमथ कङ्कणम्।एतान्यस्त्राणि चिक्षेप सर्वाणि रघुनन्दन।।।।वसिष्ठे जपतां श्रेष्ठे तदद्भुतमिवाभवत्।

हे रघुनन्दन! क्रोधित विश्वामित्र ने मानव, मोहन, गान्धर्व, स्वापन, जृम्भण, मादन, संतापन और विलापन; शोषण और दारण; अजेय वज्रास्त्र; ब्रह्मपाश, कालपाश और वारुण-पाश; पैनाकास्त्र तथा प्रिय दयित; शुष्क और आर्द्र—दोनों अशनि; दण्डास्त्र, पैशाच और क्रौञ्चास्त्र; धर्मचक्र, कालचक्र और विष्णुचक्र; वायव्य, मथन और हयशिरस्-अस्त्र; दो शक्तियाँ, कङ्काल और मुसल; वैद्याधर महास्त्र तथा भयानक कालास्त्र; घोर त्रिशूलास्त्र, कापाल और कङ्कण—ये सब अस्त्र वसिष्ठ पर छोड़े। जप में रतों में श्रेष्ठ वसिष्ठ के सामने वह दृश्य अत्यन्त अद्भुत-सा प्रतीत हुआ।

Verse 8

मानवं मोहनं चैव गान्धर्वं स्वापनं तथा।जृम्भणं मादनं चैव संतापनविलापने।।1.56.7।।शोषणं दारणं चैव वज्रमस्त्रं सुदुर्जयम्।ब्रह्मपाशं कालपाशं वारुणं पाशमेव च।।1.56.8।।पैनाकास्त्रं च दयितं शुष्कार्द्रे अशनी उभे।दण्डास्त्रमथ पैशाचं क्रौञ्चमस्त्रं तथैव च।।1.56.9।।धर्मचक्रं कालचक्रं विष्णुचक्रं तथैव च।वायव्यं मथनं चैव अस्त्रं हयशिरस्तथा।।1.56.10।।शक्तिद्वयं च चिक्षेप कङ्कालं मुसलं तथा। 560वैद्याधरं महास्त्रं च कालास्त्रमथ दारुणम्।।1.56.11।।त्रिशूलमस्त्रं घोरं च कापालमथ कङ्कणम्।एतान्यस्त्राणि चिक्षेप सर्वाणि रघुनन्दन।।1.56.12।। वसिष्ठे जपतां श्रेष्ठे तदद्भुतमिवाभवत्।

तब उसने शोषण और दारण नामक अस्त्र, तथा अजेय वज्रास्त्र; और ब्रह्मपाश, कालपाश तथा वारुणपाश—इन सबको भी (वसिष्ठ के विरुद्ध) छोड़ा।

Verse 9

मानवं मोहनं चैव गान्धर्वं स्वापनं तथा।जृम्भणं मादनं चैव संतापनविलापने।।1.56.7।।शोषणं दारणं चैव वज्रमस्त्रं सुदुर्जयम्।ब्रह्मपाशं कालपाशं वारुणं पाशमेव च।।1.56.8।।पैनाकास्त्रं च दयितं शुष्कार्द्रे अशनी उभे।दण्डास्त्रमथ पैशाचं क्रौञ्चमस्त्रं तथैव च।।1.56.9।।धर्मचक्रं कालचक्रं विष्णुचक्रं तथैव च।वायव्यं मथनं चैव अस्त्रं हयशिरस्तथा।।1.56.10।।शक्तिद्वयं च चिक्षेप कङ्कालं मुसलं तथा। 560वैद्याधरं महास्त्रं च कालास्त्रमथ दारुणम्।।1.56.11।।त्रिशूलमस्त्रं घोरं च कापालमथ कङ्कणम्।एतान्यस्त्राणि चिक्षेप सर्वाणि रघुनन्दन।।1.56.12।। वसिष्ठे जपतां श्रेष्ठे तदद्भुतमिवाभवत्।

तब उसने पैनाकास्त्र और प्रिय ‘दयित’ अस्त्र भी चलाया। उसने ‘शुष्क’ और ‘आर्द्र’—दोनों वज्रों का प्रहार किया; फिर दण्डास्त्र, पैशाचास्त्र और उसी प्रकार क्रौञ्चास्त्र भी छोड़ा।

Verse 10

मानवं मोहनं चैव गान्धर्वं स्वापनं तथा।जृम्भणं मादनं चैव संतापनविलापने।।1.56.7।।शोषणं दारणं चैव वज्रमस्त्रं सुदुर्जयम्।ब्रह्मपाशं कालपाशं वारुणं पाशमेव च।।1.56.8।।पैनाकास्त्रं च दयितं शुष्कार्द्रे अशनी उभे।दण्डास्त्रमथ पैशाचं क्रौञ्चमस्त्रं तथैव च।।1.56.9।।धर्मचक्रं कालचक्रं विष्णुचक्रं तथैव च।वायव्यं मथनं चैव अस्त्रं हयशिरस्तथा।।1.56.10।।शक्तिद्वयं च चिक्षेप कङ्कालं मुसलं तथा। 560वैद्याधरं महास्त्रं च कालास्त्रमथ दारुणम्।।1.56.11।।त्रिशूलमस्त्रं घोरं च कापालमथ कङ्कणम्।एतान्यस्त्राणि चिक्षेप सर्वाणि रघुनन्दन।।1.56.12।। वसिष्ठे जपतां श्रेष्ठे तदद्भुतमिवाभवत्।

उसने धर्मचक्र, कालचक्र और विष्णुचक्र; तथा वायव्यास्त्र, मथनास्त्र और हयशिरास्त्र भी फेंके।

Verse 11

मानवं मोहनं चैव गान्धर्वं स्वापनं तथा।जृम्भणं मादनं चैव संतापनविलापने।।1.56.7।।शोषणं दारणं चैव वज्रमस्त्रं सुदुर्जयम्।ब्रह्मपाशं कालपाशं वारुणं पाशमेव च।।1.56.8।।पैनाकास्त्रं च दयितं शुष्कार्द्रे अशनी उभे।दण्डास्त्रमथ पैशाचं क्रौञ्चमस्त्रं तथैव च।।1.56.9।।धर्मचक्रं कालचक्रं विष्णुचक्रं तथैव च।वायव्यं मथनं चैव अस्त्रं हयशिरस्तथा।।1.56.10।।शक्तिद्वयं च चिक्षेप कङ्कालं मुसलं तथा। 560वैद्याधरं महास्त्रं च कालास्त्रमथ दारुणम्।।1.56.11।।त्रिशूलमस्त्रं घोरं च कापालमथ कङ्कणम्।एतान्यस्त्राणि चिक्षेप सर्वाणि रघुनन्दन।।1.56.12।। वसिष्ठे जपतां श्रेष्ठे तदद्भुतमिवाभवत्।

उसने शक्तियों की जोड़ी फेंकी, तथा कङ्काल और मुसल भी चलाए। वैद्याधर नामक महास्त्र छोड़ा और फिर भयानक कालास्त्र का प्रहार किया॥

Verse 12

मानवं मोहनं चैव गान्धर्वं स्वापनं तथा।जृम्भणं मादनं चैव संतापनविलापने।।1.56.7।।शोषणं दारणं चैव वज्रमस्त्रं सुदुर्जयम्।ब्रह्मपाशं कालपाशं वारुणं पाशमेव च।।1.56.8।।पैनाकास्त्रं च दयितं शुष्कार्द्रे अशनी उभे।दण्डास्त्रमथ पैशाचं क्रौञ्चमस्त्रं तथैव च।।1.56.9।।धर्मचक्रं कालचक्रं विष्णुचक्रं तथैव च।वायव्यं मथनं चैव अस्त्रं हयशिरस्तथा।।1.56.10।।शक्तिद्वयं च चिक्षेप कङ्कालं मुसलं तथा। 560वैद्याधरं महास्त्रं च कालास्त्रमथ दारुणम्।।1.56.11।।त्रिशूलमस्त्रं घोरं च कापालमथ कङ्कणम्।एतान्यस्त्राणि चिक्षेप सर्वाणि रघुनन्दन।।1.56.12।। वसिष्ठे जपतां श्रेष्ठे तदद्भुतमिवाभवत्।

उसने भयानक त्रिशूलास्त्र छोड़ा, फिर कापाल और कङ्कण भी। हे रघुनन्दन! जप में श्रेष्ठ वसिष्ठ पर उसने ये सब अस्त्र चलाए; वह दृश्य अद्भुत-सा प्रतीत हुआ॥

Verse 13

तानि सर्वाणि दण्डेन ग्रसते ब्रह्मणस्सुत:।।।।तेषु शान्तेषु ब्रह्मास्त्रं क्षिप्तवान् गाधिनन्दन:।

ब्रह्मा-पुत्र वसिष्ठ ने अपने दण्ड से उन सब अस्त्रों को निगल लिया। वे शांत हो गए तो गाधिनन्दन ने ब्रह्मास्त्र का प्रक्षेप किया॥

Verse 14

तदस्त्रमुद्यतं दृष्ट्वा देवास्साग्निपुरोगमा:।।।।देवर्षयश्च सम्भ्रान्तागन्धर्वास्समहोरगा:।त्रैलोक्यमासीत्सन्तप्तं ब्रह्मास्त्रे समुदीरिते।।।

उस अस्त्र को उठता देख, अग्नि-प्रमुख देवगण, देवर्षि, गन्धर्व और महोरग—सब घबरा उठे॥

Verse 15

तदस्त्रमुद्यतं दृष्ट्वा देवास्साग्निपुरोगमा:।।1.56.14।।देवर्षयश्च सम्भ्रान्तागन्धर्वास्समहोरगा:।त्रैलोक्यमासीत्सन्तप्तं ब्रह्मास्त्रे समुदीरिते।।1.56.15।

ब्रह्मास्त्र छोड़े जाने पर तीनों लोक संताप से दग्ध हो उठे॥

Verse 16

तदप्यस्त्रं महाघोरं ब्रह्मं ब्राह्मेण तेजसा ।वसिष्ठो ग्रसते सर्वं ब्रह्मदण्डेन राघव।।।।

हे राघव! ब्रह्मतेज से युक्त वसिष्ठ ने ब्रह्मदण्ड के द्वारा उस परम घोर ब्रह्मास्त्र को भी पूर्णतः निगल लिया।

Verse 17

ब्रह्मास्त्रं ग्रसमानस्य वसिष्ठस्य महात्मन:।त्रैलोक्यमोहनं रौद्रं रूपमासीत्सुदारुणम्।।।।

ब्रह्मास्त्र को ग्रसते हुए महात्मा वसिष्ठ का रूप रौद्र और अत्यन्त दारुण हो उठा, जो तीनों लोकों को मोहित-स्तब्ध कर देने वाला था।

Verse 18

रोमकूपेषु सर्वेषु वसिष्ठस्य महात्मन:।मरीच्य इव निष्पेतुरग्नेर्धूमाकुलार्चिष:।।।।

महात्मा वसिष्ठ के समस्त रोमकूपों से धुएँ से आवृत अग्निशिखाएँ प्रकाश-किरणों की भाँति फूट पड़ीं।

Verse 19

प्राज्वलद्ब्रह्मदण्डश्च वसिष्ठस्य करोद्यत:।विधूम इव कालाग्निर्यमदण्ड इवापर:।।।।

वसिष्ठ के उठे हुए हाथ में ब्रह्मदण्ड प्रज्वलित हो उठा—धूमरहित प्रलयाग्नि के समान, मानो यम का दूसरा दण्ड हो।

Verse 20

ततोऽस्तुवन् मुनिगणा वसिष्ठं जपतां वरम्।अमोघं ते बलं ब्रह्मन् तेजो धारय तेजसा।।।।

तब मुनिगण जप-निष्ठों में श्रेष्ठ वसिष्ठ की स्तुति करने लगे—“हे ब्रह्मन्! आपका बल अमोघ है; अपने ही तेज से अपने तेज को धारण कीजिए।”

Verse 21

निगृहीतस्त्वया ब्रह्मन् विश्वामित्रो महातपा:।प्रसीद जपतां श्रेष्ठ लोकास्सन्तु गतव्यथा:।।।।

हे ब्रह्मन्! महातपस्वी विश्वामित्र आपके द्वारा निगृहीत हो गया है। हे जप-निष्ठों में श्रेष्ठ! प्रसन्न हों; समस्त लोक व्यथा-रहित हों।

Verse 22

एवमुक्तो महातेजाश्शमं चक्रे महातपा:।विश्वामित्रोऽपि निकृतो विनिश्वस्येदमब्रवीत्।।।।

ऐसा कहे जाने पर महातेजस्वी महातपस्वी शांत हो गया। और विश्वामित्र भी, विनीत होकर, दीर्घ निःश्वास लेकर यह वचन बोला।

Verse 23

धिग्बलं क्षत्रियबलं ब्रह्मतेजो बलं बलम्।एकेन ब्रह्मदण्डेन सर्वास्त्राणि हतानि मे।।।।

धिक् है उस क्षत्रिय-बल पर! ब्रह्मतेज ही सच्चा बल है। एक ही ब्रह्मदण्ड से मेरे समस्त अस्त्र नष्ट हो गए।

Verse 24

तदेतत्समवेक्ष्याहं प्रसन्नेन्द्रियमानस:।तपो महत्समास्थास्ये यद्वै ब्रह्मत्वकारणम्।।।।

इसे भलीभाँति देखकर, इन्द्रियों और मन को प्रसन्न करके, मैं महान् तप का आश्रय लूँगा—जो निश्चय ही ब्रह्मत्व-प्राप्ति का कारण है।

Frequently Asked Questions

The pivotal action is Viśvāmitra’s escalation from conventional astras to the Brahmāstra against a sage, testing whether martial capability may override ascetic authority; the narrative judges this as a misuse of power when detached from dharma and restraint.

The sarga teaches that brahma-tejas—disciplined spiritual energy grounded in tapas and dharma—can neutralize even the most catastrophic weapons; true strength is ethical and ascetic, not merely technological or martial.

Rather than a named geography, the text highlights a cosmological landmark—trailokya (the three worlds)—and a cultural-ritual institution: brahmadaṇḍa and mantra-japa as symbols of brahmanical authority within epic-era ascetic culture.

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