
जनककुलवर्णनम् तथा सीतोर्मिलादानम् (Janaka’s Genealogy and the Bestowal of Sita and Urmila)
बालकाण्ड
इस सर्ग में राजसभा का शिष्ट, विधिपूर्ण संवाद है। इक्ष्वाकुवंश का वर्णन सुनकर जनक वसिष्ठ से कहते हैं कि कन्या-प्रदान के समय कुल की वंशावली का पूर्ण उच्चारण करना धर्म है। फिर वे विदेह वंश का क्रम बताते हैं—प्रसिद्ध राजा निमि से लेकर मिथि (मिथिला के निर्माता) और आगे जनकों की परंपरा, अंत में ह्रस्वरोमा; जिनके दो पुत्र हैं—स्वयं जनक और छोटे भाई कुशध्वज। जनक अपने पिता के वन-गमन, अपने राज्यारोहण, धर्मपूर्वक शासन तथा कुशध्वज के प्रति स्नेहपूर्ण संरक्षण का उल्लेख करते हैं। इसके बाद राजनीतिक संकट आता है—सांकाश्य के राजा सुधन्वा शिवधनुष और सीता की मांग करता है। जनक अस्वीकार करते हैं, युद्ध में उसे मारकर सांकाश्य का राज्य कुशध्वज को सौंप देते हैं। अंततः सार्वजनिक विवाह-घोषणा होती है—जनक आनंदपूर्वक सीता को राम को और ऊर्मिला को लक्ष्मण को प्रदान करते हैं; विधि-निश्चय हेतु दान-वचन तीन बार दोहराते हैं। वे दशरथ को गो-दान और पितृकर्म आदि का निर्देश देते हैं तथा शुभ मुहूर्त बताते हैं—मख नक्षत्र के उदय पर, उत्तर-फाल्गुनी में तीसरे दिन विवाह।
Verse 1
एवं ब्रुवाणं जनक: प्रत्युवाच कृताञ्जलि:।श्रोतुमर्हसि भद्रं ते कुलं न: परिकीर्तितम्।।।।
इस प्रकार कहते हुए (उनसे) जनक ने हाथ जोड़कर उत्तर दिया—“तुम्हारा कल्याण हो। अब हमारे कुल का जो वर्णन किया जाता है, उसे सुनना तुम्हारे लिए उचित है॥”
Verse 2
प्रदाने हि मुनिश्रेष्ठ कुलं निरवशेषत:।वक्तव्यं कुलजातेन तन्निबोध महामुने।।।।
हे मुनिश्रेष्ठ! कन्यादान के समय कुल में जन्मे व्यक्ति को अपने वंश का वृत्तांत बिना शेष के कहना चाहिए; हे महामुने, उसे सुनिए।
Verse 3
राजाऽभूत् त्रिषु लोकेषु विश्रुत स्स्वेन कर्मणा।निमि: परमधर्मात्मा सर्वसत्त्ववतां वर:।।।।
त्रिलोकों में अपने कर्मों से विख्यात ‘निमि’ नामक राजा हुआ, जो परम धर्मात्मा था और बल-पराक्रम से युक्त जनों में श्रेष्ठ था।
Verse 4
तस्य पुत्रोमिथिर्नाम मिथिला येन निर्मिता।प्रथमो जनको नाम जनकादप्युदावसु:।।।।
उसका पुत्र ‘मिथि’ नाम से प्रसिद्ध हुआ, जिसने मिथिला नगरी बसाई। वही ‘जनक’ नाम धारण करने वाला प्रथम था; और उस जनक से ‘उदावसु’ उत्पन्न हुआ।
Verse 5
उदावसोस्तु धर्मात्मा जातो वै नन्दिवर्धन:।नन्दिवर्धनपुत्रस्तु सुकेतुर्नाम नामत:।।।।
उदावसु से धर्मात्मा नन्दिवर्धन उत्पन्न हुआ। और नन्दिवर्धन का पुत्र नाम से ‘सुकेतु’ था।
Verse 6
सुकेतोरपि धर्मात्मा देवरातो महाबल:।देवरातस्य राजर्षेर्बृहद्रथ इति स्मृत:।।।।
सुकेतु से भी धर्मात्मा, महाबली देवरात उत्पन्न हुआ। और उस राजर्षि देवरात का पुत्र ‘बृहद्रथ’ नाम से स्मरण किया जाता है।
Verse 7
बृहद्रथस्य शूरोऽभून्महावीर: प्रतापवान्।महावीरस्य धृतिमान् सुधृतिस्सत्यविक्रम:।।।।
बृहद्रथ के पुत्र महावीर नामक वीर उत्पन्न हुए, जो प्रताप-तेज से दीप्त थे। महावीर से धैर्यवान् सुधृति जन्मे, जिनका पराक्रम सत्य में अचल था।
Verse 8
सुधृतेरपि धर्मात्मा दृष्टकेतुस्सुधार्मिक:।दृष्टकेतोस्तु राजर्षेर्हर्यश्व इति विश्रुत:।।।।
सुधृति से भी धर्मात्मा, धर्म में दृढ़ दृष्टकेतु उत्पन्न हुए। और राजर्षि दृष्टकेतु से हर्यश्व नामक प्रसिद्ध पुत्र हुआ।
Verse 9
हर्यश्वस्य मरु: पुत्रो मरो: पुत्र: प्रतिन्धक:।प्रतिंधकस्य धर्मात्मा राजा कीर्तिरथस्सुत:।।।।
हर्यश्व के पुत्र मरु हुए, और मरु के पुत्र प्रतिन्धक। प्रतिन्धक के पुत्र धर्मात्मा राजा कीर्तिरथ हुए।
Verse 10
पुत्र: कीर्तिरथस्यापि देवमीढ इति स्मृत:।देवमीढस्य विबुधो विबुधस्य महीध्रक:।।।।
कीर्तिरथ का पुत्र ‘देवमीढ’ नाम से प्रसिद्ध हुआ। देवमीढ का पुत्र विबुध, और विबुध का पुत्र महीध्रक था॥
Verse 11
महीध्रकसुतो राजा कीर्तिरातो महाबल:।कीर्तिरातस्य राजर्षेर्महारोमा व्यजायत।।।।
महीध्रक से महाबली राजा कीर्तिरात उत्पन्न हुए। और उस राजर्षि कीर्तिरात के यहाँ महात्मा महारोमा का जन्म हुआ॥
Verse 12
महारोम्णस्तु धर्मात्मा स्वर्णरोमा व्यजायत।स्वर्णरोम्णस्तु राजर्षेर्ह्रस्वरोमा व्यजायत।।।।
महारोमा से धर्मात्मा स्वर्णरोमा उत्पन्न हुए। और राजर्षि स्वर्णरोमा से ह्रस्वरोमा का जन्म हुआ॥
Verse 13
तस्य पुत्रद्वयं जज्ञे धर्मज्ञस्य महात्मन:।ज्येष्ठोऽहमनुजो भ्राता मम वीर: कुशध्वज:।।।।
उस धर्मज्ञ महात्मा के दो पुत्र उत्पन्न हुए। मैं ज्येष्ठ हूँ और मेरा अनुज भ्राता वीर कुशध्वज है॥
Verse 14
मां तु ज्येष्ठं पिता राज्ये सोऽभिषिच्य नराधिप:।कुशध्वजं समावेश्य भारं मयि वनं गत:।।।।
मेरे पिता—नराधिप—ने मुझे, ज्येष्ठ को, राज्य में अभिषिक्त किया। कुशध्वज को साथ रखकर और समस्त भार मुझ पर सौंपकर वे वन को चले गए॥
Verse 15
वृद्धे पितरि स्वर्याते धर्मेण धुरमावहम्।भ्रातरं देवसङ्काशं स्नेहात्पश्यन् कुशध्वजम्।।।।
वृद्ध पिता के स्वर्ग सिधार जाने पर मैंने धर्मपूर्वक राज्य-भार वहन किया। और देवतुल्य भ्राता कुशध्वज को स्नेह से देख-भाल करता रहा॥
Verse 16
कस्य चित्त्वथकालस्य साङ्काश्यादगमत्पुरात्।सुधन्वा वीर्यवान्राजा मिथिलामवरोधक:।।।।
कुछ समय बीतने पर साङ्काश्या-नगरी से पराक्रमी राजा सुधन्वा मिथिला को घेरने के अभिप्राय से चल पड़ा।
Verse 17
स च मे प्रेषयामास शैवं धनुरनुत्तमम्।सीता कन्या च पद्माक्षी मह्यं वै दीयतामिति।।।।
उसने मुझे संदेश भेजा—“अतुलनीय शैव धनुष मुझे दे दिया जाए, और पद्मनयना कन्या सीता भी मुझे प्रदान की जाए।”
Verse 18
तस्याप्रदानाद्ब्रह्मर्षे युद्धमासीन्मया सह।स हतोऽभिमुखो राजा सुधन्वा तु मया रणे।।।।
हे ब्रह्मर्षे! उन्हें न देने के कारण मेरे साथ उसका युद्ध हुआ; और रण में मेरे सम्मुख आया हुआ राजा सुधन्वा मेरे हाथों मारा गया।
Verse 19
निहत्य तं मुनिश्रेष्ठ सुधन्वानं नराधिपम्।साङ्काश्ये भ्रातरं वीरमभ्यषिञ्चं कुशध्वजम्।।।।
हे मुनिश्रेष्ठ! उस नराधिप सुधन्वा को मारकर मैंने साङ्काश्या में अपने वीर भ्राता कुशध्वज का राज्याभिषेक किया।
Verse 20
कनीयानेष मे भ्राता अहं ज्येष्ठो महामुने।ददामि परमप्रीतो वध्वौ ते मुनिपुङ्गव।।।।सीतां रामाय भद्रं ते ऊर्मिला लक्ष्मणाय च।
हे महामुने! यह मेरा छोटा भाई है और मैं बड़ा हूँ। हे मुनिपुंगव! परम प्रसन्न होकर मैं ये दोनों वधुएँ देता हूँ—सीता श्रीराम को (आपका कल्याण हो) और ऊर्मिला लक्ष्मण को भी।
Verse 21
वीर्यशुल्कां मम सुतां सीतां सुरसुतोपमाम् ।।।।द्वितीयामूर्मिलां चैव त्रिर्ददामि न संशय:।
वीर्य-शुल्क के रूप में मैं अपनी पुत्री सीता को—देवकन्या-सम—और अपनी दूसरी पुत्री ऊर्मिला को भी देता हूँ। मैं इसे तीन बार कहता हूँ; इसमें कोई संशय नहीं।
Verse 22
ददामि परमप्रीतो वध्वौ ते रघुनन्दन।।।।रामलक्ष्मणयो राजन् गोदानं कारयस्व ह।पितृकार्यं च भद्रं ते ततो वैवाहिकं कुरु।।।।
हे रघुनन्दन! मैं परम प्रसन्न होकर तुम्हें राम और लक्ष्मण के लिए ये दोनों वधुएँ देता हूँ। हे राजन्, गोदान कराओ; और पितृकार्य भी—तुम्हारा कल्याण हो। तत्पश्चात् विवाह-क्रिया संपन्न करो।
Verse 23
ददामि परमप्रीतो वध्वौ ते रघुनन्दन।।1.71.22।।रामलक्ष्मणयो राजन् गोदानं कारयस्व ह।पितृकार्यं च भद्रं ते ततो वैवाहिकं कुरु।।1.71.23।।
उदावसु से धर्मात्मा नन्दिवर्धन उत्पन्न हुआ। और नन्दिवर्धन का पुत्र नाम से ‘सुकेतु’ था।
Verse 24
मखा ह्यद्य महाबाहो तृतीये दिवसे प्रभो।फल्गुन्यामुत्तरे राजंस्तस्मिन्वैवाहिकं कुरु।।।।रामलक्ष्मणयो राजन् दानं कार्यं सुखोदयम् ।।
हे महाबाहो, प्रभो! आज मघा नक्षत्र है। हे राजन्, अब से तीसरे दिन उत्तर-फाल्गुनी में उसी समय विवाह-कार्य करो। और हे राजन्, राम-लक्ष्मण के सुखोदय हेतु दान भी कराया जाए।
Janaka faces an extortionate demand from King Sudhanvā—hand over the Śaiva bow and Sītā. Janaka refuses (protecting custodial dharma over sacred property and his daughter’s agency within lawful marriage), accepts the consequences of conflict, defeats Sudhanvā, and then restores political order by crowning Kuśadhvaja in Sāṅkāśya.
The chapter teaches that social acts like marriage are not private transactions but dhārmic institutions requiring transparency (genealogy), public certainty (thrice-proclaimed gift), and ritual completeness (go-dāna and pitṛ rites). It also models kingship as restraint: power is exercised to defend sacred trust and civic order, not to gratify coercive claims.
Mithilā is highlighted as the dynastic capital founded by Mithi and governed by Janaka’s line; Sāṅkāśya appears as Sudhanvā’s city and later Kuśadhvaja’s seat after coronation. Culturally, the Sarga emphasizes kanyā-pradāna customs, go-dāna, pitṛ rites, and nakṣatra-based election of an auspicious wedding time (Makha and Uttara-Phalgunī).
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