Ramayana Bala Kanda Sarga 40
Bala KandaSarga 4030 Verses

Sarga 40

सगरपुत्राणां रसातलगमनम् — The Descent of Sagara’s Sons and the Wrath of Kapila

बालकाण्ड

इस सर्ग में भयभीत देवता ब्रह्मा की शरण लेते हैं। ब्रह्मा बताते हैं कि यह सब पूर्वनियत है—पृथ्वी को वासुदेव ही कपिल-रूप धारण कर धारण करते हैं; इसलिए सगर के पुत्रों द्वारा पृथ्वी का विदारण और अंततः उनका विनाश निश्चित है, क्योंकि वे कपिल का अपराध करेंगे। ब्रह्मा सगर को आदेश देते हैं कि अश्व-चोर का पता लगाने हेतु पुनः उत्खनन कराया जाए। सगर के साठ हजार पुत्र रसातल की ओर उतरते हुए चार दिग्गजों को देखते हैं—पूर्व में विरूपाक्ष, दक्षिण में महापद्म, पश्चिम में सौमनस और उत्तर में भद्र—जो पर्वत-सम विशाल होकर पृथ्वी को धारण किए हैं। उनके सिर के हिलने से पवित्र दिनों में भूकम्प होते हैं—यह कारण भी बताया जाता है। वे सबका सम्मान कर ईशान्य दिशा में खोदते हुए कपिल मुनि (सनातन वासुदेव) को और पास ही चरते यज्ञ-अश्व को देखते हैं। कपिल को ही चोर समझकर वे औज़ारों और शस्त्रों सहित दौड़ते हैं, आरोप लगाते हैं और क्रोध जगाते हैं। कपिल के केवल वचन से वे भस्म हो जाते हैं। सर्ग का संदेश है—अज्ञान से हुई पहचान-भूल, यज्ञ की उतावली और सिद्ध पुरुष के प्रति अधर्म अत्यन्त विनाशकारी है।

Shlokas

Verse 1

.देवतानां वचश्श्रुत्वा भगवान्वै पितामह:।प्रत्युवाच सुसन्त्रस्तान्कृतान्तबलमोहितान्।।।।

देवताओं के वचन सुनकर—विधि के प्रबल बल से मोहित और अत्यन्त भयभीत हुए उन देवों से—भगवान् पितामह ब्रह्मा ने प्रत्युत्तर दिया।

Verse 2

यस्येयं वसुधा कृत्स्ना वासुदेवस्य धीमत:।कापिलं रूपमास्थाय धारयत्यनिशं धराम्।।।।तस्य कोपाग्निना दग्धा भविष्यन्ति नृपात्मजा:।

यह समस्त वसुधा बुद्धिमान् वासुदेव की है; वे कपिल रूप धारण करके निरन्तर इस धरती को धारण करते हैं। उनके क्रोध की अग्नि से राजकुमार जलकर भस्म हो जाएंगे।

Verse 3

पृथिव्याश्चापि निर्भेदोऽदृष्ट एव सनातन:।।।।सगरस्य च पुत्राणां विनाशोऽदीर्घजीविनाम्।

पृथ्वी का विदारण भी प्राचीन काल से ही विधि द्वारा निश्चित था; और वैसे ही अल्पायु सगरपुत्रों का विनाश भी।

Verse 4

पितामहवचश्श्रुत्वा त्रयस्त्रिंशदरिन्दम।।।।देवा: परमसंहृष्टा: पुनर्जग्मुर्यथागतम्।

हे शत्रुदमन, पितामह (ब्रह्मा) के वचन सुनकर तैंतीस देवता अत्यन्त हर्षित हुए और जैसे आए थे वैसे ही लौट गए।

Verse 5

सगरस्य च पुत्राणां प्रादुरासीन्महात्मनाम्।।।।पृथिव्यां भिद्यमानायां निर्घातसमनिस्वन:।

सगर के महात्मा पुत्र जब पृथ्वी को चीरते चले, तब वज्र-घात के समान घोर गर्जना-सा शब्द प्रकट हुआ।

Verse 6

ततो भित्वा महीं सर्वे कृत्वा चाभिप्रदक्षिणम्।।।।सहिता स्सगरास्सर्वे पितरं वाक्यमब्रुवन्।0

तत्पश्चात् वे सब सगर-पुत्र पृथ्वी को चीरकर और श्रद्धापूर्वक प्रदक्षिणा करके, एक साथ अपने पिता से ये वचन बोले।

Verse 7

परिक्रान्ता मही सर्वा सत्त्ववन्तश्च सूदिता:।।।।देवदानवरक्षांसि पिशाचोरगकिन्नरा:।न च पश्यामहेऽश्वं तमश्वहर्तारमेव च।।।।किं करिष्याम भद्रं ते बुद्धिरत्र विचार्यताम्।

“हमने समस्त पृथ्वी का परिभ्रमण कर लिया और अनेक बलवान प्राणी—देव, दानव, राक्षस, पिशाच, नाग और किन्नर—संहारित कर दिए। पर न वह अश्व दिखता है, न उसका चोर। अब हम क्या करें? आपका कल्याण हो—इस विषय में आपकी बुद्धि विचार करे।”

Verse 8

परिक्रान्ता मही सर्वा सत्त्ववन्तश्च सूदिता:।।1.40.7।।देवदानवरक्षांसि पिशाचोरगकिन्नरा:।न च पश्यामहेऽश्वं तमश्वहर्तारमेव च।।1.40.8।।किं करिष्याम भद्रं ते बुद्धिरत्र विचार्यताम्।

“हमने समस्त पृथ्वी छान मारी और अनेक बलवान प्राणी—देव, दानव, राक्षस, पिशाच, नाग तथा किन्नर—मार डाले। फिर भी न वह अश्व मिला, न उसका चोर। अब हम क्या करें? आपका कल्याण हो—इस विषय में आपकी बुद्धि विचार कर निर्णय करे।”

Verse 9

तेषां तद्वचनं श्रुत्वा पुत्राणां राजसत्तम:।।।।समन्युरब्रवीद्वाक्यं सगरो रघुनन्दन।

हे रघुनन्दन राम! पुत्रों के वे वचन सुनकर राजाओं में श्रेष्ठ सगर क्रोध से भर उठे और बोले।

Verse 10

भूय: खनत भद्रं वो निर्भिद्य वसुधातलम्।।।।अश्वहर्तारमासाद्य कृतार्थाश्च निवर्तथ।

फिर से खोदो—तुम्हारा कल्याण हो—पृथ्वी-तल को चीरते हुए; अश्व-हर्ता को पा कर, उद्देश्य सिद्ध होने पर लौट आओ।

Verse 11

पितुर्वचनमासाद्य सगरस्य महात्मन:।।।।षष्टि: पुत्रसहस्राणि रसातलमभिद्रवन्।

महात्मा सगर के पिता-वचन को पाकर, उनके साठ हजार पुत्र रसातल की ओर दौड़ पड़े।

Verse 12

खन्यमाने ततस्तस्मिन् ददृशु: पर्वतोपमम्।।।।दिशागजं विरूपाक्षं धारयन्तं महीतलम्।

उस प्रदेश को और खोदते हुए, उन्होंने पर्वत-सम विरूपाक्ष नामक दिशागज को पृथ्वी-तल धारण करते देखा।

Verse 13

सपर्वतवनां कृत्स्नां पृथिवीं रघुनन्दन।।।।शिरसा धारयामास विरूपाक्षो महागज:।

हे रघुनन्दन! महागज विरूपाक्ष अपने सिर पर पर्वतों और वनों सहित समस्त पृथ्वी को धारण किए हुए था।

Verse 14

यदा पर्वणि काकुत्स्थ विश्रमार्थं महागज:।।।।खेदाच्चालयते शीर्षं भूमिकम्पस्तदाभवेत्।

हे काकुत्स्थ राम! जब पर्व-तिथियों में वह महागज विश्राम के हेतु थकावट से अपना सिर हिलाता है, तब पृथ्वी में कम्पन—भूकम्प—उत्पन्न हो जाता है।

Verse 15

तं ते प्रदक्षिणं कृत्वा दिशापालं महागजम्।।।।मानयन्तो हि ते राम जग्मुर्भित्त्वा रसातलम्।

हे राम! उस दिग्पाल महागज का सम्मान करते हुए उन्होंने उसकी प्रदक्षिणा की; फिर पृथ्वी को भेदकर वे रसातल में उतर गए।

Verse 16

तत: पूर्वां दिशं भित्त्वा दक्षिणां बिभिदु: पुन:।।।।दक्षिणस्यामपि दिशि ददृशुस्ते महागजम्।महापद्मं महात्मानं सुमहत्पर्वतोपमम्।।।।शिरसा धारयन्तं ते विस्मयं जग्मुरुत्तमम्।

तब पूर्व दिशा को भेदकर वे फिर दक्षिण दिशा में प्रविष्ट हुए। दक्षिण दिशा में उन्होंने महागज महापद्म को देखा—महात्मा, पर्वत-सम विशाल—जो अपने सिर पर पृथ्वी को धारण किए था; उसे देखकर वे परम विस्मय को प्राप्त हुए।

Verse 17

तत: पूर्वां दिशं भित्त्वा दक्षिणां बिभिदु: पुन:।।1.40.16।।दक्षिणस्यामपि दिशि ददृशुस्ते महागजम्।महापद्मं महात्मानं सुमहत्पर्वतोपमम्।।1.40.17।।शिरसा धारयन्तं ते विस्मयं जग्मुरुत्तमम्।

तब पूर्व दिशा को भेदकर वे फिर दक्षिण दिशा में प्रविष्ट हुए। दक्षिण दिशा में उन्होंने महागज महापद्म को देखा—महात्मा, पर्वत-सम विशाल—जो अपने सिर पर पृथ्वी को धारण किए था; उसे देखकर वे परम विस्मय को प्राप्त हुए।

Verse 18

तत: प्रदक्षिणं कृत्वा सगरस्य महात्मन:।।।।षष्टि: पुत्रसहस्राणि पश्चिमां बिभिदुर्दिशम्।

तत्पश्चात् महात्मा सगर के साठ हजार पुत्रों ने श्रद्धापूर्वक प्रदक्षिणा करके पश्चिम दिशा को भेद डाला।

Verse 19

पश्चिमायामपि दिशि महान्तमचलोपमम्।।।।दिशागजं सौमनसं ददृशुस्ते महाबला:।

पश्चिम दिशा में भी उन महाबली वीरों ने सौमनस नामक दिशागज को देखा—जो महान्, पर्वत के समान विशाल था।

Verse 20

तं ते प्रदक्षिणं कृत्वा पृष्ट्वा चापि निरामयम्।खनन्त स्समुपक्रान्ता दिशं हैमवतीं तत:।।।।

उन्होंने उसकी प्रदक्षिणा की और कुशल-क्षेम भी पूछा; फिर वे खोदते हुए हिमालयाभिमुख उत्तर दिशा की ओर बढ़ चले।

Verse 21

उत्तरस्यां रघुश्रेष्ठ ददृशुर्हिमपाण्डुरम्।।।।भद्रं भद्रेण वपुषा धारयन्तं महीमिमाम्।

हे रघुश्रेष्ठ! उत्तर दिशा में उन्होंने हिम के समान श्वेत भद्र नामक दिशागज को देखा, जो अपने मंगलमय स्वरूप से इस पृथ्वी को धारण कर रहा था।

Verse 22

समालभ्य तत स्सर्वे कृत्वा चैनं प्रदक्षिणम्।।।।षष्टि: पुत्रसहस्राणि बिभिदुर्वसुधातलम्।

तब उन सबने उसे स्पर्श किया और उसकी प्रदक्षिणा की; फिर वे साठ हजार पुत्र पृथ्वी के तल को भेदकर आगे बढ़ गए।

Verse 23

तत: प्रागुत्तरां गत्वा सागरा: प्रथितां दिशम्।।।।रोषादभ्यखनन् सर्वे पृथिवीं सगरात्मजा:।

तब वे सब सगरपुत्र प्रसिद्ध ईशान (उत्तर‑पूर्व) दिशा में जाकर, क्रोध से प्रेरित होकर पृथ्वी को खोदने लगे।

Verse 24

ते तु सर्वे महात्मानो भीमवेगा महाबला:।।।।ददृशु: कपिलं तत्र वासुदेवं सनातनम्।हयं च तस्य देवस्य चरन्तमविदूरत:।।।।प्रहर्षमतुलं प्राप्तास्सर्वे ते रघुनन्दन।

वे सब महात्मा, अत्यन्त वेगवान् और महाबली सगरपुत्र वहाँ सनातन वासुदेव—कपिल—को देखने लगे; और उसी देव का घोड़ा भी पास ही चरता हुआ दिखा। हे रघुनन्दन, उन सबको अतुल हर्ष प्राप्त हुआ।

Verse 25

ते तु सर्वे महात्मानो भीमवेगा महाबला:।।1.40.24।।ददृशु: कपिलं तत्र वासुदेवं सनातनम्।हयं च तस्य देवस्य चरन्तमविदूरत:।।1.40.25।।प्रहर्षमतुलं प्राप्तास्सर्वे ते रघुनन्दन।

वे सब महात्मा, तीव्र वेगवान् और महाबली सगरपुत्र वहाँ सनातन वासुदेव—कपिल—को देख बैठे; और उसी दिव्य पुरुष का घोड़ा भी पास ही चरता हुआ दिखा। हे रघुनन्दन, उन सबको अनुपम हर्ष हुआ।

Verse 26

ते तं हयवरं ज्ञात्वा क्रोधपर्याकुलेक्षणा:।।।।खनित्रलाङ्गलधरा नानावृक्षशिलाधरा:।अभ्यधावन्त सङ्क्रुद्धास्तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रुवन्।।।।

उस उत्तम घोड़े को पहचानकर, क्रोध से व्याकुल नेत्रों वाले वे—फावड़े और हल धारण किए, तथा विविध वृक्षों और शिलाओं को उठाए—क्रुद्ध होकर दौड़े और बोले, “ठहरो! ठहरो!”

Verse 27

ते तं हयवरं ज्ञात्वा क्रोधपर्याकुलेक्षणा:।।1.40.26।।खनित्रलाङ्गलधरा नानावृक्षशिलाधरा:।अभ्यधावन्त सङ्क्रुद्धास्तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रुवन्।।1.40.27।।

श्रेष्ठ घोड़े को पहचानकर, क्रोध से व्याकुल दृष्टि वाले वे—फावड़े और हल लिए, तथा वृक्षों और पत्थरों को उठाए—क्रुद्ध होकर दौड़े और चिल्लाए, “ठहरो! ठहरो!”

Verse 28

अस्माकं त्वं हि तुरगं यज्ञीयं हृतवानसि।दुर्मेधस्त्वं हि सम्प्राप्तान् विद्धि नस्सगरात्मजान् ।।।।

तूने हमारा यज्ञ का अश्व चुरा लिया है। अरे दुष्टबुद्धि! जान ले कि यहाँ पहुँचे हुए हम सगर के पुत्र हैं।

Verse 29

श्रुत्वा तु वचनं तेषां कपिलो रघुनन्दन।रोषेण महताऽऽविष्टो हुङ्कारमकरोत्तदा।।।।

उनके वचन सुनकर, हे रघुनन्दन, कपिल मुनि महान् क्रोध से आविष्ट होकर तब भयंकर ‘हुँ’कार करने लगे।

Verse 30

ततस्तेनाप्रमेयेन कपिलेन महात्मना।भस्मराशीकृतास्सर्वे काकुत्स्थ सगरात्मजा:।।।।

तत्पश्चात्, हे काकुत्स्थ, अपरिमेय सामर्थ्य वाले महात्मा कपिल ने सगर के सभी पुत्रों को भस्मराशि कर दिया।

Frequently Asked Questions

The pivotal action is the sons of Sagara accusing Kapila of stealing the sacrificial horse and rushing to attack without verification; the dilemma centers on whether ritual urgency justifies suspicion and violence, especially toward an ascetic figure.

The sarga teaches that adharma rooted in anger and misrecognition can destroy even powerful agents; true discernment (viveka) and reverence toward realized beings are integral to sustaining both ritual purpose and moral order.

Rasātala and the northeast digging route are emphasized, along with the cosmological ‘landmarks’ of the four diggajas (Virūpākṣa, Mahāpadma, Saumanasa, Bhadra) and the etiological explanation of earthquakes linked to their movement on sacred days.

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