
Cakravyūha-saṃkalpaḥ, Saṃśaptaka-āhvānaṃ, Saubhadra-vikrīḍitam (Drona Parva, Adhyāya 32)
Upa-parva: Cakravyūha-vidhāna and Saubhadra-nipātana (Episode Cluster)
Saṃjaya reports a prior Kaurava setback: the forces are disordered and demoralized after being checked by Arjuna (Phalguna) and after Droṇa fails to seize Yudhiṣṭhira despite proximity. In a public, politically charged exchange, Duryodhana reproaches Droṇa—invoking expectations created by a promised boon and implying that a visible enemy should not escape if the commander truly intends capture. Droṇa responds by defending Arjuna’s near-unassailable protection under Kṛṣṇa and by asserting that no ordinary coalition can overpower a Kṛṣṇa–Arjuna pairing. He then announces a new operational plan: he will deploy an exceptionally hard-to-break vyūha and requires that Arjuna be diverted by some means. Saṃśaptaka warriors renew their challenge to draw Arjuna toward the southern direction, and a singularly intense engagement arises there. Droṇa’s array is described as radiant and formidable; Abhimanyu, acting on instruction associated with the Pandava leadership, penetrates and fractures the cakravyūha in battle. After extraordinary feats and heavy fighting, Abhimanyu becomes trapped against multiple elite opponents and falls. Dhṛtarāṣṭra, hearing of the young warrior’s death, laments the severity of kṣatra-dharma and asks Saṃjaya to narrate in full how the ratha-host was ‘played with’ and broken by Saubhadra; Saṃjaya prepares to describe the terror among Kaurava troops, likened to forest-dwellers encircled by wildfire.
Chapter Arc: द्रोण-पर्व के रण-आकाश में द्वात्रिंश अध्याय का उद्घोष होता है—कौरव और पाण्डव सेनाएँ घमासान में टकराती हैं; भीमसेन महारथियों के बीच प्रलय-सा वेग लेकर उतरते हैं, और पाण्डवों की दृष्टि एक ही लक्ष्य पर टिकती है: द्रोणाचार्य का रथ। → द्रोणाचार्य तीक्ष्ण, सीधे जाने वाले बाणों से मर्मस्थलों पर प्रहार कर युद्ध को ‘जीवितान्त’ तक ले जाने की चेष्टा करते हैं। कर्ण और अश्वत्थामा निरन्तर प्रतिघात-आघात की शृंखला बनाए रखते हैं—द्रोण के साथ मिलकर पाण्डवों की अग्रगति को रोकते हैं। चारों ओर वर्ग-से-वर्ग भिड़ते हैं—घोड़े घोड़ों से, हाथी हाथियों से, रथी रथियों से—और रणभूमि नदी-रोध टूटने जैसी उथल-पुथल में डूब जाती है। → पाण्डव-सेनापति की आज्ञा पर योद्धा ‘हंसों की तरह’ द्रोण-रथ की ओर झपटते हैं; उसी उन्मत्त धारा में धृष्टद्युम्न, भीम और सात्यकि कर्ण को निकट से घायल करते हैं, जबकि कर्ण प्रत्युत्तर में उनके धनुषों को काटकर उनकी गति को तोड़ता है। इसी बीच युद्ध का क्रूर शिखर उभरता है—‘पिता पुत्र को’ और ‘वीर वीर को’ चक्र-से-चक्र भिड़ाकर संहारते हैं; संबंध और शौर्य दोनों रक्त में घुल जाते हैं। → अध्याय का अंत किसी एक निर्णायक वध पर नहीं, बल्कि रण-यंत्र के और अधिक कस जाने पर होता है—द्रोण का रथ अभी अडिग है, कर्ण-अश्वत्थामा की प्रतिरोध-दीवार कायम है, और पाण्डवों का द्रोण-वध का संकल्प और तीव्र होकर अगले प्रहार की तैयारी में बदल जाता है। → द्रोण के रथ पर टूटती पाण्डव-धारा और कर्ण की काटती प्रत्याघात-नीति के बीच प्रश्न लटकता है—क्या पाण्डव द्रोण तक पहुँचकर उसे निर्णायक रूप से बाँध/परास्त कर पाएँगे, या यह आक्रमण उन्हीं पर उलट पड़ेगा?
Verse 1
द्वात्रिशोड्थध्याय: कौरव-पाण्डव-सेनाओंका घमासान युद्ध
संजय बोले—महाराज! अपनी सेना का वह विनाश भीमसेन से सहा न गया। उन्होंने गुरु द्रोण को साठ और कर्ण को दस बाणों से घायल कर दिया।
Verse 2
तस्य द्रोण: शितैर्बाणैस्तीक्ष्णधारैरजिद्वागै: । जीवितान्तमभिप्रेप्सुर्मर्माण्याशु जघान ह
तब द्रोणाचार्य ने सीधे जाने वाले, तीखी धार से युक्त पैने बाणों द्वारा शीघ्र ही भीमसेन के मर्मस्थानों पर प्रहार किया; वे उनके प्राणों का अंत करना चाहते थे।
Verse 3
आनन्तर्यमभिप्रेप्सु: षड्विंशत्या समार्पयत् । कर्णो द्वादशभिर्बाणैरश्वृत्थामा च सप्तभि:
इस आघात-प्रतिघात को निरन्तर बनाए रखने की इच्छा से द्रोणाचार्य ने भीमसेन को छब्बीस, कर्ण ने बारह और अश्वत्थामा ने सात बाण मारे।
Verse 4
षड्भिद्दुर्योधनो राजा तत एनमथाकिरत् । भीमसेनो<पि तानू सर्वान् प्रत्यविध्यन्महाबल:
संजय बोले—तब राजा दुर्योधन ने उस पर छह बाणों की वर्षा की। प्रत्युत्तर में महाबली भीमसेन ने अपने बाणों से उन सबको बेध दिया।
Verse 5
द्रोणं पडचाशतेषूणां कर्ण च दशभि: शरै: | दुर्योधन द्वादशभिद्रौणिमष्टाभिराशुगै:,उन्होंने द्रोणको पचास, कर्णको दस, दुर्योधनको बारह और अश्व॒त्थामाको आठ बाण मारे
संजय बोले—उसने द्रोणाचार्य को पचास, कर्ण को दस, दुर्योधन को बारह और द्रोणपुत्र अश्वत्थामा को आठ तीव्र बाण मारे।
Verse 6
आयावं तुमुलं॑ कुर्वन्नभ्यवर्तत तान् रणे । तस्मिन् संत्यजति प्राणान् मृत्युसाधारणीकृते
संजय बोले—भयंकर कोलाहल मचाते हुए वह रण में उन पर चढ़ आया। उसी समय, जब वह मृत्यु के तुल्य दशा में पहुँचकर प्राण त्यागने को उद्यत था, तब अजातशत्रु युधिष्ठिर ने अपने योद्धाओं को आगे बढ़ने की आज्ञा दी।
Verse 7
अजातशणत्रुस्तान् योधान् भीम॑ त्रातेत्यचोदयत् । ते ययुर्भीमसेनस्य समीपममितौजस:
संजय बोले—अजातशत्रु ने उन योद्धाओं को प्रेरित किया—“भीम की रक्षा करो।” यह सुनकर वे अमित पराक्रमी वीर भीमसेन के समीप जा पहुँचे।
Verse 8
युयुधानप्रभृतयो माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ | ते समेत्य सुसंरब्धा: सहिता: पुरुषर्षभा:
संजय बोले—युयुधान (सात्यकि) आदि और माद्रीपुत्र पाण्डव—नकुल तथा सहदेव—वे पुरुषश्रेष्ठ वीर एकत्र हुए। सब मिलकर अत्यन्त क्रोध से भरकर द्रोण की सेना-व्यूह को विदीर्ण करने की इच्छा से आगे बढ़े।
Verse 9
महेष्वासवरैर्गुप्ता द्रोणानीकं बिभित्सव: । समापेतुर्महावीर्या भीमप्रभूतयो रथा:
संजय बोले—श्रेष्ठ महाधनुर्धरों से सुरक्षित द्रोणाचार्य की व्यूह-रचना को विदीर्ण करने की इच्छा से भीम आदि महावीर रथी एक साथ उमड़ पड़े। सात्यकि तथा पाण्डु के पुत्र, और माद्रीपुत्र नकुल-सहदेव—ये सब महारथी प्रचण्ड क्रोध और वीर-निश्चय से भरकर द्रोण की सेना पर टूट पड़े।
Verse 10
तान् प्रत्यगृह्नादव्यग्रो द्रोणोडपि रथिनां वर: । महारथानतिबलान् वीरान् समरयोधिन:
संजय बोले—तब रथियों में श्रेष्ठ आचार्य द्रोण ने तनिक भी विचलित हुए बिना, युद्धभूमि में बढ़ते हुए उन अत्यन्त बलवान् महारथी वीरों को रोक लिया।
Verse 11
बाहां मृत्युभयं कृत्वा तावकान् पाण्डवा ययु: । सादिन: सादिनो<भ्यघ्नंस्तथैव रथिनो रथान्
संजय बोले—परन्तु पाण्डवों ने मृत्यु-भय को मानो अपनी भुजाओं के बाहर फेंक दिया और आपके सैनिकों पर चढ़ आए। घुड़सवार घुड़सवारों को मारने लगे और रथी रथियों पर टूट पड़े।
Verse 12
आसीच्छक्त्यासिसम्पातो युद्धमासीत् परश्वधै: । प्रकृष्टमसियुद्धं च बभूव कटुकोदयम्
उस युद्ध में शक्तियों और खड्गों के घातक प्रहार होने लगे; परशुओं से भीषण मार-काट मची। तलवारें खिंच गईं और ऐसा प्रचण्ड असि-युद्ध छिड़ा कि उसका कटु परिणाम प्रत्यक्ष सामने आने लगा।
Verse 13
कुण्जराणां च सम्पाते युद्धमासीत् सुदारुणम् । अपतत् कुज्जरादन्यो हयादन्यस्त्ववाकृशिरा:
संजय बोले—हाथियों के घमासान में अत्यन्त दारुण संग्राम छिड़ गया। कोई हाथी से गिर पड़ता, तो कोई घोड़े से उछलकर औंधे सिर धराशायी हो जाता।
Verse 14
नरो बाणविनिर्भिन्नो रथादन्यक्ष मारिष । तत्रान्यस्य च सम्मर्दे पतितस्य विवर्मण:
संजय बोले—हे मारिष! बाणों से विद्ध एक योद्धा धुरी टूटे रथ से गिर पड़ा। वहीं रण-सम्मर्द में दूसरा भी, कवच-रहित होकर, धराशायी हो गया।
Verse 15
अपरांश्चापरे5मृद्नन् वारणा: पतितान् नरान्
और दूसरे हाथी, बदले में, गिरे हुए अन्य मनुष्यों को रौंद रहे थे।
Verse 16
नरान्त्रै: केचिदपरे विषाणालग्नसंश्रयै:
कुछ के अंतड़ियाँ बाहर निकल आई थीं; और कुछ दूसरे, सींगों में फँसकर, उन्हीं से लटके हुए थे।
Verse 17
कार्ष्णायसतनुत्राणान् नराश्वरथकुञ्जरान्
वे लोहे के कवचों से सुरक्षित मनुष्यों, घोड़ों, रथों और हाथियों को देख रहे थे।
Verse 18
गृध्रपत्राधिवासांसि शयनानि नराधिपा:
हे नराधिपो! उनके शयन और विश्राम-स्थल गिद्धों के पंखों के आवरणों से सजे थे।
Verse 19
हन्ति स्मात्र पिता पुत्र रथेनाभ्येत्य संयुगे
संजय बोले—युद्ध के घोर संघर्ष में पिता रथ हाँककर सीधे सामने आया और अपने ही पुत्र का वध कर बैठा; ऐसा दृश्य दिखाता है कि संग्राम कैसे स्वाभाविक स्नेह-बंधन उलट देता है और धर्म-कर्तव्य की मर्यादा को कठोर परीक्षा में डाल देता है।
Verse 20
पुत्रश्न पितरं मोहान्निर्मर्यादमवर्तत । वहाँ पिता रथके द्वारा युद्धके मैदानमें आकर पुत्रका ही वध कर डालता था और पुत्र भी मोहवश पिताके प्राण ले रहा था। इस प्रकार वहाँ मर्यादाशून्य युद्ध हो रहा था ।।
संजय बोले—मोहवश पुत्र मर्यादा छोड़कर पिता पर टूट पड़ा। वहाँ पिता रथ लेकर रणभूमि में आकर अपने ही पुत्र का वध कर देता था और पुत्र भी भ्रम से आक्रान्त होकर पिता के प्राण ले लेता था। इस प्रकार वहाँ मर्यादाशून्य युद्ध हो रहा था। रथ टूट रहे थे, ध्वज कट रहे थे और छत्र भूमि पर गिराए जा रहे थे।
Verse 21
सासिर्बाहुर्निपतित: शिरश्छिन्न॑ं सकुण्डलम्
संजय बोले—हाथ में तलवार लिए, बाँह फैलाए वह गिर पड़ा; उसका कटा हुआ सिर भी कुण्डलों सहित लुढ़क गया। रणभूमि में मृत्यु के सामने न शौर्य का मान रहता है, न भूषण का।
Verse 22
रथिना ताडितो नागो नाराचेनापतत् क्षितौ
संजय बोले—किसी रथी ने नाराच बाण से गजराज पर प्रहार किया और वह धराशायी हो गया। इस प्रकार बल और शस्त्र-प्रहार से सवारों सहित वाहनों का पतन होने लगा; वहाँ मर्यादाशून्य, अत्यन्त भयंकर और महान् युद्ध उठ खड़ा हुआ।
Verse 23
सारोहश्चापतद् वाजी गजेनाभ्याहतो भूशम् | निर्मर्यादं महद् युद्धमवर्तत सुदारुणम्
संजय बोले—हाथी के वेगपूर्ण आघात से घोड़ा सवार सहित धरती पर गिर पड़ा। इस प्रकार वहाँ मर्यादाशून्य, महान् और अत्यन्त दारुण युद्ध भड़क उठा।
Verse 24
हा तात हा पुत्र सखे क्वासि तिष्ठ क्व धावसि । प्रहराहर जहोन॑ स्मितक्ष्वेडितगर्जितै:
संजय बोले—“हाय पिता! हाय पुत्र! हे सखे, तुम कहाँ हो? ठहरो; कहाँ दौड़ते हो? मारो, मारो!”—वे बार-बार ऐसे ही पुकारते रहे; दबे हुए पर चुभते स्वर, युद्ध-नाद और गर्जनाएँ—जिनमें स्नेह भी था और रण की निर्दय तात्कालिकता भी।
Verse 25
इत्येवमुच्चरन्ति सम श्रूयन्ते विविधा गिर: । उस समय सभी सैनिक “हा तात! हा पुत्र! सखे! तुम कहाँ हो? ठहरो, कहाँ भागे जा रहे हो? मारो, लाओ, इसका वध कर डालो'--इस प्रकारकी बातें कह रहे थे। हास्य, उछल-कूद और गर्जनाके साथ उनके मुखसे नाना प्रकारकी बातें सुनायी देती थीं ।।
संजय बोले—इस प्रकार अनेक प्रकार की पुकारें एक साथ सुनाई दे रही थीं। सैनिक व्याकुल होकर “हा तात! हा पुत्र! सखे! तुम कहाँ हो? ठहरो; कहाँ भागे जा रहे हो? मारो, पकड़ो, इसका वध कर डालो!”—ऐसी बातें कह रहे थे। हँसी, उछल-कूद और गर्जना के बीच उनके मुखों से नाना स्वर उठते थे; और मनुष्य, घोड़े तथा हाथी का रक्त रणभूमि में एक-दूसरे से मिल गया।
Verse 26
चक्रेण चक्रमासाद्य वीरो वीरस्य संयुगे
संजय बोले—रण के बीच वीर ने वीर के रथ-चक्र को अपने चक्र से आ घेरा; निकट से निकट भिड़ंत हुई, मानो कोलाहल में आमने-सामने बल और धैर्य की परीक्षा हो रही हो।
Verse 27
आसीतू् केशपरामर्शों मुष्टियुद्धं च दारुणम्
संजय बोले—तब भयंकर हाथापाई छिड़ गई; केश पकड़कर घसीटना और मुठ्ठियों के प्रहारों का कठोर युद्ध होने लगा—मानो क्रोध ने संयम को ढक लिया हो।
Verse 28
तत्राच्छिद्यत शूरस्य सखड्गो बाहुरुद्यतः
संजय बोले—उस संग्राम में एक शूरवीर की खड्ग सहित ऊपर उठी हुई भुजा काट दी गई। दूसरे की भी धनुष-बाण और अंकुश सहित बाँह खण्डित हो गई। वहाँ एक सैनिक दूसरे को पुकारता था और दूसरा युद्ध से विमुख होकर भागा जा रहा था—युद्ध ने देह भी तोड़ी और धैर्य भी।
Verse 29
सथधनुश्चापरस्यापि सशर: साड्कुशस्तथा । आक्रोशदन्यमन्यो>त्र तथान्यो विमुखो<द्रवत्
संजय बोले—उस युद्ध में किसी शूरवीर की खड्ग सहित ऊपर उठी हुई भुजा काट दी गई। दूसरे की भी धनुष-बाण और अंकुश सहित बाँह खण्डित हो गई। वहाँ एक सैनिक दूसरे को पुकार रहा था और कोई अन्य युद्ध से विमुख होकर भयभीत भागा जा रहा था।
Verse 30
अन्य: प्राप्तस्य चान्यस्य शिर: कायादपाहरत् । सशब्दमद्रवच्चान्य: शब्दादन्यो5त्रसद् भृशम्
किसी दूसरे वीर ने सामने आए हुए अन्य योद्धा का मस्तक धड़ से अलग कर दिया। यह देख कोई तीसरा वीर बड़े जोर से कोलाहल करता हुआ भागा। उसके उस आर्तनाद से एक अन्य योद्धा अत्यन्त डर गया।
Verse 31
स्वानन्यो5थ परानन्यो जघान निशितै: शरै: | गिरिशृड्रोपमश्चात्र नाराचेन निपातित:
तब वह तीखे बाणों से कभी अपने शत्रुओं को और कभी दूसरों के शत्रुओं को भी मार गिराता रहा। और वहीं पर्वत-शिखर के समान अडिग प्रतीत होने वाला एक योद्धा नाराच बाण से गिरा दिया गया।
Verse 32
तथैव रथिनं नाग: क्षरन् गिरिरिवारुजन्,भरतनन्दन! दोनों ओरकी सेनाएँ अत्यन्त आहत होकर खूनसे लथपथ हो एक- दूसरीकी ओर देख रही थीं, इतनेहीमें सूर्यदेव अस्ताचलको जा पहुँचे। फिर तो वे दोनों ही धीरे-धीरे अपने-अपने शिविरकी ओर चल दीं ।।
संजय बोले—भरतनन्दन! उसी प्रकार वह महान रथी, मनुष्यों में गजराज-सा, रक्त बहाता हुआ पर्वत के झरनों की भाँति गरज रहा था। दोनों ओर की सेनाएँ अत्यन्त आहत होकर, रक्त से लथपथ, एक-दूसरे की ओर देखती हुई खड़ी रहीं। तभी सूर्यदेव अस्ताचल को जा पहुँचे। फिर दोनों पक्ष धीरे-धीरे अपने-अपने शिविरों की ओर लौट चले।
Verse 33
शूरान् प्रहरतो दृष्टवा कृतास्त्रान् रुधिरोक्षितान्
शूरवीरों को प्रहार करते हुए—अस्त्रविद्या में निपुण और रक्त से सने हुए—देखकर (दृश्य अत्यन्त भयावह प्रतीत होता था)।
Verse 34
सर्वमाविग्नमभवतन्न प्राज्ञायत किड्चन
संजय बोले—सब कुछ अस्त-व्यस्त हो गया; कुछ भी स्पष्ट रूप से जाना न जा सका। रण की नैतिक धुंध में विवेक डगमगा गया और कोलाहल के बीच निश्चय लुप्त हो गया।
Verse 35
ततः: सेनापति: शीघ्रमयं काल इति ब्रुवन्
तब सेनापति ने शीघ्रता से कहा—“यह तो काल (मृत्यु) है।” उसने यह कठोर निश्चय प्रकट किया कि युद्ध में भाग्य-बल कभी एक ही अजेय क्षण में साकार-सा हो उठता है।
Verse 36
कुर्वन्त: शासनं तस्य पाण्डवा बाहुशालिन:
संजय बोले—बलशाली भुजाओं वाले पाण्डवों ने उसका आदेश पालन किया; संकट के बीच भी अनुशासन में रहकर, धर्म और व्यवस्था को न छोड़ा।
Verse 37
गृह्नीताद्रवतान्योन्यं विभीता विनिकृन्तत
संजय बोले—भयभीत होकर वे इधर-उधर दौड़ते हुए एक-दूसरे को पकड़ते और काटते-मारते थे; भय ने उन्हें मोह में डालकर परस्पर संहार की ओर धकेल दिया।
Verse 38
ततो द्रोण: कृप: कर्णो द्रौणी राजा जयद्रथ:ः
संजय बोले—तब द्रोण, कृप, कर्ण, द्रोणपुत्र (अश्वत्थामा) और राजा जयद्रथ एकत्र हुए; कौरवों के प्रमुख वीरों के इस समागम से रण का वेग निर्णायक और धर्म-संकट से भरा हुआ होकर और बढ़ गया।
Verse 39
ते त्वार्यधर्मसंरब्धा दुर्निवारा दुरासदा:
संजय बोले—वे सब आर्यधर्म से प्रेरित और बँधे हुए थे; उन्हें रोक पाना कठिन था और वे दुर्गम थे—युद्ध के कोलाहल में जिसे वे धर्म समझते थे, उसी के लिए अडिग थे।
Verse 40
ततो द्रोणो$तिसंक्रुद्धो विसृजज्छतश: शरान्
संजय बोले—तब अत्यन्त क्रुद्ध द्रोणाचार्य सैकड़ों बाण छोड़ने लगे।
Verse 41
चेदिपज्चालपाण्डूनामकरोत् कदनं महत् । यह देख अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए द्रोणाचार्यने सैकड़ों बाणोंकी वर्षा करके चेदि, पांचाल तथा पाण्डव-योद्धाओंका महान् संहार आरम्भ किया ।।
संजय बोले—अत्यन्त क्रोध में भरे द्रोणाचार्य ने सैकड़ों बाणों की वर्षा कर चेदि, पांचाल तथा पाण्डव-योद्धाओं का महान् संहार आरम्भ किया। हे मारिष! उनकी धनुष-डोरी की गम्भीर टंकार सब दिशाओं में सुनाई देने लगी।
Verse 42
एतस्मिन्नन्तरे जिष्णुर्जित्वा संशप्तकान् बहून्
संजय बोले—इसी बीच जिष्णु (अर्जुन) ने बहुत-से संशप्तकों को जीतकर आगे बढ़ना जारी रखा।
Verse 43
ताञ्छरौघान् महावर्तान् शोणितोदान् महाह्ददान्
संजय बोले—वे बाणों की धाराएँ, जो महान् भँवरों-सी घूमती थीं, रक्त से भरे विशाल सरोवरों के समान हो गईं।
Verse 44
तीर्ण: संशप्तकान् हत्वा प्रत्यदृश्यत फाल्गुन: । संशप्तक योद्धा महान् सरोवरोंके समान थे
संजय बोले—संशप्तकों का वध करके और उन्हें पार कर फाल्गुन (अर्जुन) फिर रणभूमि में दिखाई पड़े। सूर्य के समान तेजस्वी उस कीर्तिमान वीर की कीर्ति और लक्ष्मी प्रकट हो उठी—मानो यह सूचित कर रही हो कि दृढ़ संकल्प और अनुशासित पराक्रम युद्ध में व्रतबद्ध, अडिग विरोध को भी तोड़ देता है।
Verse 45
दीप्यमानमपश्याम तेजसा वानरध्वजम् | सूर्यके समान तेजस्वी एवं यशस्वी अर्जुनके चिह्नस्वरूप वानरध्वजको हमने दूरसे ही देखा, जो अपने दिव्य तेजसे उद्धासित हो रहा था ।।
हमने दूर से ही तेज से दीप्त वानरध्वज को देखा—फाल्गुन (अर्जुन) का वह वानर-चिह्नयुक्त ध्वज दिव्य प्रकाश से प्रज्वलित था, मानो अस्त्रों की किरणों से संशप्तकों के ‘समुद्र’ को ही सुखा देने को उद्यत हो।
Verse 46
प्रददाह कुरून् सर्वानर्जुन: शस्त्रतेजसा
संजय बोले—अर्जुन ने अपने शस्त्रों के तेज से समस्त कुरुओं को दग्ध कर दिया।
Verse 47
युगान्ते सर्वभूतानि धूमकेतुरिवोत्थित: । जैसे प्रलयकालमें प्रकट हुई अग्नि सम्पूर्ण भूतोंको दग्ध कर देती है, उसी प्रकार अर्जुनने अपने अस्त्र-शस्त्रोंके तेजसे समस्त कौरव-सैनिकोंको जलाना आरम्भ किया ।।
युगान्त में उठे धूमकेतु-सदृश प्रलयाग्नि की भाँति अर्जुन ने अपने अस्त्र-शस्त्रों के तेज से कौरव-सेना को जलाना आरम्भ किया। फिर उसने हजारों बाणों की धाराओं से हाथी, घोड़े और रथों पर युद्ध करने वाले योद्धाओं पर प्रहार किया।
Verse 48
ताड्यमानाः क्षितिं जम्मुर्मुक्तकेशा: शरार्दिता: । हाथी, घोड़े तथा रथपर आरूढ़ होकर युद्ध करनेवाले बहुत-से योद्धा अर्जुनके सहस्तरों बाणसमूहोंसे आहत एवं पीड़ित हो बाल खोले हुए पृथ्वीपर गिर पड़े ।।
बाणों से आहत और पीड़ित, केश खुले हुए बहुत-से योद्धा पृथ्वी पर गिर पड़े। कुछ ने आर्तनाद किया और कुछ अन्य फिर वहीं प्राण त्याग गए।
Verse 49
तेषामुत्पतितान् कांश्चित् पतितांश्व पराड़मुखान्
संजय बोले—उन योद्धाओं में से कुछ फिर उछलकर उठते दिखाई दिए, और कुछ गिरकर पीठ फेरते हुए भागने लगे। वह युद्ध ऐसा था जहाँ कभी साहस उभरता, कभी धैर्य टूटता; और भय ऐसा कि शस्त्रधारी भी अपना धर्म छोड़कर पलायन करने लगे।
Verse 50
न जघानार्जुनो योधान् योधव्रतमनुस्मरन् । उन योद्धाओंमेंसे जो लोग रथसे कूद पड़े थे या धरतीपर गिर गये थे अथवा युद्धसे विमुख होकर भाग चले थे, उन सबको एक वीर सैनिकके लिये निश्चित नियमका निरन्तर स्मरण रखते हुए अर्जुनने नहीं मारा ।।
योद्धा-धर्म का स्मरण करते हुए अर्जुन ने उन योद्धाओं को नहीं मारा जो रथ से गिर पड़े थे, जो धरती पर पड़े थे, या जो युद्ध से विमुख होकर भाग चले थे। उनके रथ बिखर चुके थे, पंक्तियाँ टूट चुकी थीं, और वे प्रायः पीठ फेरकर ही पीछे हट रहे थे।
Verse 51
कुरव: कर्ण कर्णेति हाहेति च विचुक्रुशु: । कौरव-सैनिकोंके रथ टूट-फ़ूटकर बिखर गये। उनकी विचित्र अवस्था हो गयी। वे प्रायः: युद्धसे विमुख हो गये और “हा कर्ण, हा कर्ण” कहकर पुकारने लगे ।।
संजय बोले—कुरु-सेना बार-बार “कर्ण! कर्ण!” और “हाय! हाय!” पुकार उठी। उनके रथ टूट-फूटकर बिखर गए, उनकी दशा विचित्र और अव्यवस्थित हो गई; वे प्रायः युद्ध से विमुख होकर “हा कर्ण, हा कर्ण” कहते हुए शरण माँगने लगे। शरणार्थियों का वह करुण क्रंदन सुनकर अधिरथ-पुत्र कर्ण उनकी विपत्ति समझ गया।
Verse 52
स भारतरथश्रेष्ठ: सर्वभारतहर्षण:
वह भरतवंश के रथियों में श्रेष्ठ, समस्त भरतों को हर्ष देने वाला था।
Verse 53
तस्य दीप्तशरौघस्य दीप्तचापधरस्य च
उसके प्रज्वलित बाण-वर्षा के, और उसके दीप्तिमान धनुष धारण करने वाले के—
Verse 54
तथैवाधिरथिस्तस्य बाणाज्ज्वलिततेजस:
संजय बोले—उसी प्रकार अधिरथि भी उसके प्रज्वलित तेज वाले बाण से आहत हुआ। रण के उन्माद में योद्धा बल का उत्तर बल से देते हैं; वहाँ क्रोध नहीं, संयमित कौशल ही विजय-पराजय का निर्णय करता है।
Verse 55
अस्त्रमस्त्रेण संवार्य प्राणदद् विसृजज्छरान् । उसी प्रकार अधिरथकुमार कर्णने भी प्रज्वलित तेजवाले अर्जुनके बाणोंका तथा उनके प्रत्येक अस्त्रका अपने अस्त्रोंद्रारा निवारण करके बाणोंकी वर्षा करते हुए बड़े जोरसे सिंहनाद किया || ५४ $ || धृष्टद्युम्नश्व॒ भीमश्च सात्यकिश्न महारथ:
संजय बोले—अस्त्र का अस्त्र से निवारण करके, मानो प्राणों की बाज़ी लगाकर, वह बाणों को छोड़ने लगा। उसी प्रकार अधिरथकुमार कर्ण ने अर्जुन के प्रज्वलित तेज वाले बाणों और उसके प्रत्येक अस्त्र को अपने अस्त्रों से रोककर, बाणों की वर्षा करते हुए सिंह के समान गर्जना की—धर्मयुक्त, पर घोर युद्ध में अपने संकल्प की घोषणा करता हुआ।
Verse 56
अर्जुनास्त्र तु राधेय: संवार्य शरवृष्टिभि:
संजय बोले—राधेय कर्ण ने अर्जुन के अस्त्र और उसके वेग को शरवृष्टि से रोक दिया। रणभूमि के कठोर धर्म में वह कौशल का उत्तर कौशल से देता रहा, जहाँ संयम और प्रतिकार ही प्राणरक्षा का आधार हैं।
Verse 57
ते निकृत्तायुधा: शूरा निर्विषा भुजगा इव
संजय बोले—वे शूरवीर, जिनके आयुध काट दिए गए थे, विषहीन सर्पों के समान हो गए—आकृति से भयानक, पर उस शक्ति से वंचित जिससे वे वास्तव में प्रहार करते हैं। इससे प्रकट होता है कि युद्ध में पराक्रम केवल साहस से नहीं, साधन और अनुशासन से प्रभावी होता है।
Verse 58
ता भुजाग्रैर्महावेगा निसृष्टा भुजगोपमा:
संजय बोले—वे (अस्त्र-शस्त्र), भुजाओं के अग्रभाग से महावेग से छोड़े गए, सर्पों के समान दौड़ पड़े—शीघ्र, घातक और अचूक—और रण की भीषणता तथा उसके नैतिक भार को और बढ़ा गए।
Verse 59
दीप्यमाना महाशक्त्यो जग्मुराधिरथिं प्रति । उनके हाथोंसे छूटी हुई वे अत्यन्त वेगशालिनी सर्पाकार महाशक्तियाँ अपनी प्रभासे प्रकाशित होती हुई कर्णकी ओर चलीं || ५८ $ || ता निकृत्य शरव्रातैस्त्रिभिस्त्रिभिरजिद्वागै:
संजय बोले—अपने ही तेज से दहकती, सर्पाकार और अत्यन्त वेगशालिनी महाशक्तियाँ हाथों से छूटते ही प्रकाश फैलाती हुई अधिरथि कर्ण की ओर जा पड़ीं।
Verse 60
अर्जुनश्नापि राधेयं विद्ध्वा सप्तभिराशुगै:
संजय बोले—अर्जुन ने भी राधेय कर्ण को सात शीघ्रगामी बाणों से बींध दिया।
Verse 61
कर्णादवरजं बाणैर्जघान निशितै: शरै: | अर्जुनने भी राधानन्दन कर्णको सात शीघ्रगामी बाणोंद्वारा बीधकर अपने पैने बाणोंसे उसके छोटे भाईको मार डाला || ६० $ || ततः शत्रुंजयं हत्वा पार्थ: षड़भिरजिह्यगै:ः
संजय बोले—अर्जुन ने तीखे बाणों से कर्ण के छोटे भाई को मार गिराया। फिर शत्रुंजय का वध करके पार्थ ने छह अचूक, शीघ्रगामी शर और छोड़े।
Verse 62
जहार सद्यो भल्लेन विपाटस्य शिरो रथात् | तत्पश्चात् सीधे जानेवाले छः सायकोंद्वारा शत्रुंजयका संहार करके एक भल्लद्वारा रथपर बैठे हुए विपाटका मस्तक तत्काल काट गिराया ।।
संजय बोले—अर्जुन ने भल्ल से तुरंत ही विपाट का सिर रथ से उड़ा दिया। धृतराष्ट्रपुत्रों के देखते-देखते किरीटी ने एक ही भल्ल से रथस्थ विपाट का मस्तक काटकर गिरा दिया।
Verse 63
प्रमुखे सूतपुत्रस्य सोदर्या निहतास्त्रय: । इस प्रकार धुृतराष्ट्रपुत्रोंके देखते-देखते एकमात्र अर्जुनने युद्धके मुहानेपर सूतपुत्र कर्णके तीन भाइयोंका वध कर डाला ।।
संजय बोले—सूतपुत्र कर्ण के सामने ही उसके सगे तीनों भाई मारे गए। इस प्रकार धृतराष्ट्रपुत्रों के देखते-देखते युद्ध के अग्रभाग में अकेले पार्थ ने कर्ण के तीन भाइयों का वध कर दिया। तब भीम अपने रथ से गरुड़ के समान उछल पड़ा।
Verse 64
पुनस्तु रथमास्थाय धनुरादाय चापरम्
फिर वह पुनः रथ पर आरूढ़ हुआ और दूसरा धनुष हाथ में लेकर युद्ध में फिर से प्रविष्ट होने को उद्यत हुआ।
Verse 65
विव्याध दशभ्ि: कर्ण सूतमश्चांश्व॒ पठचभि: । फिर भी उन्होंने अपने रथपर बैठकर दूसरा धनुष हाथमें ले लिया और दस बाणोंद्वारा कर्णको तथा पाँच बाणोंसे उसके सारथि और घोड़ोंको भी घायल कर दिया ।।
उसने दस बाणों से कर्ण को बेधा और पाँच बाणों से उसके सारथि तथा घोड़ों को भी घायल किया। धृष्टद्युम्न ने भी चमकती हुई ढाल और उत्तम तलवार उठा ली।
Verse 66
ततः स्वरथमास्थाय पाज्चाल्योडन्यच्च कार्मुकम्
तत्पश्चात् पाञ्चाल वीर अपने रथ पर चढ़ा और दूसरा धनुष भी उठा लिया।
Verse 67
शैनेयो<5प्यन्यदादाय धनुरिन्दुसमझुति:
शैनेय ने भी चन्द्रमा-सी कान्ति वाला दूसरा धनुष उठा लिया।
Verse 68
भल्लाभ्यां साधुमुक्ता भ्यां छित्त्वा कर्णस्य कार्मुकम्
दो भल्ल बाणों को भली-भाँति छोड़कर उसने कर्ण का धनुष काट दिया।
Verse 69
पुन: कर्ण त्रिभि्बाणैर्बाह्वोरुरसि चार्पयत् । इसके बाद उन्होंने अच्छी तरह छोड़े हुए दो भल्लोंद्वारा कर्णके धनुषको काटकर पुनः तीन बाणोंद्वारा कर्णकी दोनों भुजाओं तथा छातीमें भी चोट पहुँचायी ।।
संजय बोले—उसने फिर तीन बाणों से कर्ण की दोनों भुजाओं और वक्षस्थल में प्रहार किया। फिर दो तीक्ष्ण भल्लों से कर्ण का धनुष काटकर, पुनः तीन बाणों से उसकी भुजाओं और छाती को बेध दिया। तभी दुर्योधन, द्रोणाचार्य, राजा और जयद्रथ भी वहाँ आ पहुँचे, और संग्राम का प्रवाह कौरवों के अग्रणी वीरों की ओर खिंच गया।
Verse 70
पत्त्यश्चरथमातज्ञास्त्वदीया: शतशो5परे
और इनके अतिरिक्त आपकी ओर के अन्य सैकड़ों पैदल सैनिक तथा रथ-हाथी (आदि) के कुशल योद्धा भी वहाँ उपस्थित थे।
Verse 71
कर्णमेवाभ्यधावन्त त्रास्यमाना: प्रहारिण: । उस समय आपकी सेनाके अन्य सैकड़ों पैदल, घुड़सवार, रथी और गजारोही योद्धा सात्यकिसे संत्रस्त होकर कर्णके ही पीछे दौड़े गये || ७० $ ।।
संजय बोले—प्रहारों से त्रस्त होकर वे आक्रान्ता केवल कर्ण की ही ओर दौड़े। उस समय आपकी सेना के अन्य भी सैकड़ों पैदल, घुड़सवार, रथी और गजारोही योद्धा सात्यकि से भयभीत होकर कर्ण के पीछे जा लगे। और धृष्टद्युम्न, भीम, सुभद्रा-पुत्र (अभिमन्यु) तथा अर्जुन भी उसी वेग से आगे बढ़े।
Verse 72
एवमेष महारौद्र: क्षयार्थ सर्वधन्विनाम्
संजय बोले—इस प्रकार यह अत्यन्त भयानक आक्रमण उठ खड़ा हुआ, जो समस्त धनुर्धरों के विनाश के लिए था।
Verse 73
पदातिरथनागाश्चा गजाश्वरथपत्तिभि:
पैदल, रथी और गजारोही—सब गज, अश्व, रथ और पत्तियों (पैदल सैनिकों) के दलों में परस्पर गुँथे हुए थे।
Verse 74
रथिनो नागप्त्त्यश्वै रथपत्ती रथद्विपै: | पैदल, रथ, हाथी और घोड़े क्रमश: हाथी, घोड़े, रथ और पैदलोंके साथ युद्ध करने लगे। रथी हाथियों, पैदलों और घोड़ोंके साथ भिड़ गये। रथी और पैदल सैनिक रथियों और हाथियोंका सामना करने लगे || ७३ $ ।।
रथी नागपुत्र अश्वों से, रथपति रथ-द्विपों से भिड़े। पैदल, रथ, हाथी और घोड़े—क्रमशः हाथी, घोड़े, रथ और पैदलों से युद्ध करने लगे। रथी हाथियों, पैदलों और घोड़ों से टकरा गए; और रथी तथा पैदल सैनिक रथियों और हाथियों का सामना करने लगे।
Verse 75
एवं सुकलिलं युद्धमासीत् क्रव्यादहर्षणम् । महद्विस्तैरभीतानां यमराष्ट्रविवर्धनम्
संजय बोले—इस प्रकार वह युद्ध कीचड़-सा घना और भयावह हो उठा, जो मांसभक्षियों को हर्ष देने वाला था। वह अत्यन्त विशाल और दूर तक फैला हुआ था; उसने निर्भयों को भी मृत्यु की ओर ढकेल दिया और यमराज्य को बढ़ाने लगा।
Verse 76
ततो हता नररथवाजिकुगञ्जरै- रनेकशो द्विपरथपत्तिवाजिन: । गजैर्गजा रथिभिरुदायुधा रथा हयै्हया: पत्तिगणैश्नल पत्तय:
संजय बोले—तब पैदल, रथी, घुड़सवार और हाथीसवारों के द्वारा बहुत-से हाथीसवार, रथी, पैदल और घुड़सवार मारे गए। हाथियों ने हाथियों को, रथियों ने शस्त्र उठाए हुए रथियों को, घुड़सवारों ने घुड़सवारों को और पैदल दलों ने पैदल दलों को मार गिराया।
Verse 77
रथैर्दविपा द्विरदवरैर्महाहया हयैर्नरा वररथिभिश्न वाजिन: । निरस्तजिल्लादशनेक्षणा: क्षितौ क्षयं गता: प्रमथितवर्म भूषणा:
संजय बोले—उस संहार में रथियों ने हाथियों को, गजराजों ने बड़े-बड़े घोड़ों को, घुड़सवारों ने पैदलों को तथा श्रेष्ठ रथियों ने घुड़सवारों को धराशायी कर दिया। वे पृथ्वी पर ऐसे गिरे कि उनकी जीभ, दाँत और नेत्र बाहर निकल आए; उनके कवच और आभूषण चूर-चूर हो गए। इस दशा में वे सब योद्धा नष्ट हो गए।
Verse 78
तथा परैर्बहुकरणैर्वरायुधै- हता गता: प्रतिभयदर्शना: क्षितिम् विपोथिता हयगजपादताडिता भूशाकुला रथमुखनेमिश्रि: क्षता:
संजय बोले—शत्रुओं के पास युद्ध के बहुत-से साधन थे और उनके हाथ में उत्तम अस्त्र-शस्त्र थे। उनके द्वारा मारे जाकर पृथ्वी पर पड़े हुए सैनिक बड़े भयंकर दिखते थे। कितने ही योद्धा हाथियों और घोड़ों के पैरों से कुचले जाकर धरती पर गिर पड़े; और कितने ही बड़े-बड़े रथों के पहियों के अग्रभाग से रौंदे जाकर क्षत-विक्षत हो अत्यन्त व्याकुल हो रहे थे।
Verse 79
प्रमोदने श्वापदपक्षिरक्षसां जनक्षये वर्तति तत्र दारुणे । महाबलास्ते कुपिता: परस्परं निषूदयन्त: प्रविचेरुरोजसा
संजय बोले—वह भयंकर जनसंहार हिंसक पशुओं, पक्षियों और राक्षसों को भी क्रूर आनन्द देनेवाला था। उसमें वे महाबली योद्धा परस्पर क्रुद्ध होकर बलपूर्वक विचरते हुए एक-दूसरे को काट गिरा रहे थे।
Verse 80
ततो बले भृशलुलिते परस्परं निरीक्षमाणे रुधिरौघसम्प्लुते । दिवाकरे<स्तंगिरिमास्थिते शनै- रुभे प्रयाते शिबिराय भारत
संजय बोले—तदनन्तर जब सेनाएँ अत्यन्त विदीर्ण हो गईं, रक्त की धारा में डूबी हुई परस्पर एक-दूसरे को देख रही थीं, और सूर्य धीरे-धीरे अस्ताचल पर्वत पर जा पहुँचा, तब हे भारत! दोनों पक्ष अपने-अपने शिविरों की ओर लौट गए।
Verse 143
शिर: प्रध्वंसयामास वक्षस्याक्रम्प कुज्जर: । आर्य! उस युद्धमें कितने मनुष्य बाणोंसे विदीर्ण होकर रथसे नीचे गिर जाते थे। कितने ही योद्धा कवचशून्य हो धरतीपर गिर पड़ते थे और सहसा कोई हाथी उनकी छातीपर पैर रखकर उनके मस्तकको भी कुचल देता था
संजय बोले—उस युद्ध में कितने ही मनुष्य बाणों से विदीर्ण होकर रथों से नीचे गिर पड़ते थे। कितने ही योद्धा कवचहीन होकर धरती पर ढह जाते थे; और तभी सहसा कोई हाथी उनकी छाती पर पाँव रखकर उनके मस्तक को भी कुचल देता था।
Verse 156
विषाणैश्चावनिं गत्वा व्यभिन्दन् रथिनो बहून् । दूसरे हाथियोंने भी दूसरे बहुत-से गिरे हुए मनुष्यों-को अपने पैरोंसे रौंद डाला। अपने दाँतोंसे धरतीपर आघात करके बहुत-से रथियोंको चीर डाला
संजय बोले—वे हाथी अपने विषाणों से धरती पर प्रहार करते हुए बहुत-से रथियों को चीर डालते थे। दूसरे हाथी भी गिरे हुए अनेक मनुष्यों को पैरों से रौंदते और दाँतों से भूमि पर आघात करके बहुत-से रथियों को विदीर्ण कर देते थे।
Verse 173
पतितान् पोथयाज्चक्रुर्द्धिपा: स्थूलनलानिव । काले रंगके लोहमय कवच धारण करके रणभूमिमें गिरे हुए कितने ही मनुष्यों, रथों, घोड़ों और हाथियोंको बड़े-बड़े गजराजोंने मोटे नरकुलोंके समान रौंद डाला
संजय बोले—रणभूमि में गिरे हुए मनुष्यों, रथों, घोड़ों और हाथियों को वे विशाल गजराज मोटे नरकुलों के समान रौंदते हुए चूर-चूर कर देते थे।
Verse 183
ह्वीमन््त: कालसम्पर्कात् सुदुःखान्यनुशेरते । बड़े-बड़े राजा कालसंयोगसे अत्यन्त दुःखदायिनी तथा गीधकी पाँखरूपी बिछौनोंसे युक्त शय्याओंपर लज्जापूर्वक सो रहे थे
संजय बोले—काल के कठोर संस्पर्श से वे अत्यन्त दुःख भोगते हुए पड़े थे। बड़े-बड़े राजा भी कालसंयोग से विनीत होकर लज्जापूर्वक गीध के पंखों-से बिछे शयनों पर सो रहे थे।
Verse 206
युगार्थ छिन्नमादाय प्रदुद्राव तथा हयः । कितने ही रथ टूट गये, ध्वज कट गये, छत्र पृथ्वीपर गिरा दिये गये और जूए खण्डित हो गये। उन खण्डित हुए आधे जूओंको ही लेकर घोड़े तेजीसे भाग रहे थे
संजय बोले—जूआ कटकर टूट जाने पर भी घोड़ा उसका खण्डित भाग घसीटता हुआ वेग से भागा। उस घोर संग्राम में कितने ही रथ चूर हो गए, ध्वज कट गए, छत्र पृथ्वी पर गिरा दिए गए और जूए खण्डित हो गए; फिर भी घोड़े टूटे हुए जूओं के आधे-आधे टुकड़े लगे रहने पर ही दौड़ते चले गए।
Verse 213
गजेनाक्षिप्य बलिना रथ: संचूर्णित: क्षितौ | कितने ही वीरोंकी भुजाएँ तलवारसहित काट गिरायी गयीं
संजय बोले—एक बलवान हाथी ने रथ को उछालकर पटक दिया और वह पृथ्वी पर गिरकर चूर-चूर हो गया। उसी संहार में कितने ही वीरों की भुजाएँ तलवार सहित काटकर गिरा दी गईं और कितनों के कुण्डल-मण्डित मस्तक धड़ से अलग कर दिए गए। कहीं किसी महाबली गज ने रथ को उठाकर फेंक दिया, और वह भूमि पर गिरते ही चकनाचूर हो गया।
Verse 256
उपाशाम्यद् रजो भौमं भीरून् कश्मलमाविशत् । मनुष्य
संजय बोले—पृथ्वी की धूल शान्त होने लगी और भीरुओं पर कश्मल छा गया। मनुष्य, घोड़े और हाथी का रक्त एक-दूसरे में मिलकर बह रहा था; उसी रक्तप्रवाह से वहाँ उड़ती हुई भयंकर धूल दब गई। उस रक्तराशि को देखकर कायर पुरुषों पर मोह छा जाता था।
Verse 263
अतीतेषुपथे काले जहार गदया शिर: । किसी वीरने अपने चक्रके द्वारा शत्रुपक्षीय वीरके चक्रका निवारण करके युद्धमें बाणप्रहारके योग्य अवसर न होनेके कारण गदासे ही उसका सिर उड़ा दिया
संजय बोले—जब बाणप्रहार का अवसर बीत गया और युद्ध में छेद न रहा, तब उसने गदा से उसका सिर उड़ा दिया। एक वीर ने अपने चक्र से शत्रुपक्षीय वीर के चक्र को रोककर, तीर चलाने का अवसर न पाकर, गदा से ही उसका मस्तक काट गिराया।
Verse 273
नर्खैर्दन्तैश्न शूराणामद्वीपे द्वीपमिच्छताम् । कुछ लोगोंमें एक-दूसरेके केश पकड़कर युद्ध होने लगा। कितने ही योद्धाओं में अत्यन्त भयंकर मुक्कोंकी मार होने लगी। कितने ही शूरवीर उस निराश्रय स्थानमें आश्रय ढूँढ़ रहे थे और नखों तथा दाँतोंसे एक-दूसरेको चोट पहुँचा रहे थे
संजय बोले—उस निराश्रय, अद्वीप-से रणसंकट में शूरवीर अपने बचाव के लिए मानो कोई ‘द्वीप’ खोजते हुए नखों और दाँतों से एक-दूसरे को घायल करने लगे। कहीं केश पकड़कर हाथापाई छिड़ गई, कहीं अत्यन्त भयानक मुक्कों की मार चलने लगी। सुव्यवस्थित युद्ध टूटकर भय और भ्रम में निकट-हिंसा बन गया, और मर्यादा का बंधन ढीला पड़ गया।
Verse 326
अभ्यतिष्ठत् पदा भूमौ सहाश्वं सहसारथिम् | झरने बहानेवाले पर्वतकी भाँति किसी मदस्रावी गजराजने सारथि और अश्वोंसहित रथीको पैरोंसे भूमिपर दबाकर उन सबको कुचल डाला
संजय बोले—मद से उन्मत्त गजराज, जैसे झरने बहानेवाला पर्वत हो, रथी पर घिर आया और उसने सारथि तथा अश्वोंसहित उसे पैरों से भूमि पर दबा दिया। फिर उन सबको एक साथ कुचल डाला। रण के कोलाहल में जब बल पर संयम न रहे, तब वह केवल विनाश बन जाता है।
Verse 333
बहूनप्याविशन्मोहो भीरून् हृदयदुर्बलान् | अस्त्र-विद्यामें निपुण और खूनसे लथपथ हुए शूरवीरोंको परस्पर प्रहार करते देख बहुत-से दुर्बल हृदयवाले भीरु मनुष्योंके मनमें मोहका संचार होने लगा
संजय बोले—अस्त्र-विद्या में निपुण, रक्त से लथपथ शूरवीरों को परस्पर प्रहार करते देख बहुत-से दुर्बल हृदय वाले भीरु जनों के मन में मोह छा गया। उस दृश्य ने उनके चित्त को विचलित कर दिया; धैर्य और विवेक मानो उनसे दूर हटने लगे।
Verse 343
सैन्येन रजसा ध्वस्तं निर्मर्यादमवर्तत । उस समय सेनाद्वारा उड़ायी हुई धूलसे व्याप्त होकर सारा जनसमूह उद्विग्न हो रहा था
संजय बोले—सेना द्वारा उड़ाई हुई धूल से रणभूमि ध्वस्त-सी होकर निर्मर्याद हो गई। धूल से ढँका हुआ सारा जनसमूह व्याकुल था; किसी को कुछ सूझता न था। उस संग्राम में न नियम का पालन हो रहा था, न मर्यादा का।
Verse 356
नित्याभित्वरितानेव त्वरयामास पाण्डवान् | तब सेनापति धूृष्टद्युम्नने यही उपयुक्त अवसर है, ऐसा कहते हुए सदा शीघ्रता करनेवाले पाण्डवोंको और भी जल्दी करनेके लिये प्रेरित किया
संजय बोले—वह पाण्डवों को, जो सदा शीघ्रता करनेवाले थे, और भी जल्दी करने के लिए प्रेरित करने लगा। तब सेनापति धृष्टद्युम्न ने कहा—“यही उपयुक्त समय है,” और उसने सदा तत्पर पाण्डवों को और अधिक वेग से कार्य करने को उकसाया।
Verse 363
सरो हंसा इवापेतुर्घ्नन्तो द्रोणरथं प्रति । तदनन्तर अपनी भुजाओंसे सुशोभित होनेवाले पाण्डव सेनापतिकी आज्ञाका पालन करनेके लिये वहाँ द्रोणाचार्यके रथपर प्रहार करते हुए उसी प्रकार टूट पड़े
संजय बोले—जैसे सरोवर पर सब ओर से उड़कर बहुत-से हंस आ जुटते हैं, वैसे ही योद्धा द्रोण के रथ पर टूट पड़े और उस पर प्रहार करने लगे। तत्पश्चात भुजबल और शोभा से विभूषित पाण्डव-सेनापति की आज्ञा का पालन करने हेतु वे द्रोणाचार्य के रथ को चारों दिशाओं से घेरकर बार-बार आघात करने लगे।
Verse 373
इत्यासीत् तुमुल: शब्दो दुर्धर्षस्य रथं प्रति । उस समय दुर्धर्ष वीर द्रोणाचार्यके रथके समीप सब ओरसे यही भयानक आवाज आने लगी कि “दौड़ो, पकड़ो और निर्भय होकर शत्रुओंको काट डालो”
संजय बोले—इस प्रकार दुर्धर्ष के रथ की ओर घोर कोलाहल उठ खड़ा हुआ। द्रोणाचार्य के रथ के समीप चारों ओर से बार-बार यह भयानक पुकार गूँजने लगी—“दौड़ो, पकड़ो और निर्भय होकर शत्रुओं को काट डालो!”
Verse 383
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ शल्यश्वैतान् न्यवारयन् । तब द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण, अश्वत्थामा, राजा जयद्रथ, अवन्तीके राजकुमार विन्द और अनुविन्द तथा राजा शल्यने मिलकर इन आक्रमणकारियोंको रोका
संजय बोले—अवन्ती के राजकुमार विन्द और अनुविन्द ने शल्य और श्वेत की सेनाओं की गति रोक दी। उसी समय द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण, अश्वत्थामा, राजा जयद्रथ, अवन्ती के राजकुमार विन्द-अनुविन्द तथा राजा शल्य—इन सबने मिलकर उन आक्रमणकारियों को रोक दिया।
Verse 396
शरार्ता न जहुद्रोणं पज्चाला: पाण्डवैः सह । वे पाण्डवोंसहित पाउ्चालवीर आर्यधर्मके अनुसार विजयके लिये प्रयत्नशील थे। उन्हें रोकना या पराजित करना बहुत कठिन था। वे बाणोंसे पीड़ित होनेपर भी द्रोणाचार्यको छोड़ न सके
संजय बोले—बाणों से पीड़ित होने पर भी पाण्डवों सहित पाञ्चाल द्रोण को छोड़ न सके। वे आर्यधर्म के अनुसार विजय के लिए प्रयत्नशील थे; उन्हें रोकना या पराजित करना अत्यन्त कठिन था। तीरों की पीड़ा सहते हुए भी वे द्रोणाचार्य से विमुख न हुए।
Verse 413
वज्संहादसंकाशस्त्रासयन् मानवान् बहून् | आर्य! उनके धनुषकी प्रत्यंचाका गम्भीर घोष सम्पूर्ण दिशाओंमें सुनायी देता था। वह वज्रकी गर्जनाके समान घोर शब्द बहुसंख्यक मनुष्योंको भयभीत कर रहा था
संजय बोले—वज्र के प्रहार के समान उसके धनुष की प्रत्यंचा का गम्भीर घोष चारों दिशाओं में सुनाई देता था। वह घोर, वज्र-गर्जना-सा शब्द असंख्य मनुष्यों को भयभीत कर रहा था।
Verse 423
अभ्ययात् तत्र यत्रासौ द्रोण: पाण्डून् प्रमर्दति । इसी समय अर्जुन बहुत-से संशप्तकोंपर विजय प्राप्त करके उस स्थानपर आये, जहाँ आचार्य द्रोण पाण्डव-सैनिकोंका मर्दन कर रहे थे
उसी समय अर्जुन बहुत-से संशप्तकों पर विजय पाकर उस स्थान पर जा पहुँचे, जहाँ आचार्य द्रोण पाण्डव-सैनिकों का भीषण संहार कर रहे थे।
Verse 453
स पाण्डवयुगान्तार्क: कुरूनप्यभ्यतीतपत् । वे पाण्डुवंशके प्रलयकालीन सूर्य अपनी अस्त्रमयी किरणोंसे उस संशप्तकरूपी समुद्रको सोखकर कौरव-सैनिकोंको भी संतप्त करने लगे
वे पाण्डववंश के प्रलयकालीन सूर्य के समान प्रज्वलित होकर कौरवों को भी संतप्त करने लगे। अपनी अस्त्रमयी किरणों से उन्होंने संशप्तकरूपी समुद्र को सोख डाला और कौरव-सैनिकों की पंक्तियों में दाह फैला दिया।
Verse 483
पार्थबाणहता: केचितन्निपेतुर्विगतासव: । कोई आर्तनाद करने लगे, कोई नष्ट हो गये, कोई अर्जुनके बाणोंसे मारे जाकर प्राणशून्य हो पृथ्वीपर गिर पड़े
पार्थ के बाणों से आहत कुछ योद्धा प्राणहीन होकर धरती पर गिर पड़े। रणभूमि में कहीं आर्तनाद उठने लगे, कहीं कोई नष्ट हो गया—अर्जुन के शरों ने क्षण भर में जीवन और वीरता को काट डाला।
Verse 513
मा भैछ्टेति प्रतिश्रुत्य ययावभिमुखो<र्जुनम् । तब अधिरथपुत्र कर्णने उन शरणार्थी सैनिकोंकी करुण पुकार सुनकर 'डरो मत” इस प्रकार उन्हें आश्वासन देकर अर्जुनका सामना करनेके लिये प्रस्थान किया
अधिरथपुत्र कर्ण ने शरणागत सैनिकों की करुण पुकार सुनकर उन्हें ‘डरो मत’ कहकर आश्वासन दिया और अर्जुन का सामना करने के लिए उनकी ओर प्रस्थान किया।
Verse 523
प्रादुश्चक्रे तदाग्नेयमस्त्रमस्त्रविदां वर: । उस समय अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ, भरतवंशियोंके श्रेष्ठ महारथी तथा सम्पूर्ण भारतीय सेनाका हर्ष बढ़ानेवाले कर्णने आग्नेयास्त्र प्रकट किया
तब अस्त्रवेत्ताओं में श्रेष्ठ, महारथी कर्ण ने—जो भरतवंशियों का हर्ष बढ़ाने वाले थे—आग्नेयास्त्र प्रकट किया।
Verse 533
शरौघाञ्छरजालेन विदुधाव धनंजय: । प्रजवलित बाणसमूह तथा देदीप्यमान धनुष धारण करनेवाले कर्णके उन बाणसमूहोंको अर्जुनने अपने बाणोंके समुदायद्वारा छिन्न-भिन्न कर दिया
संजय बोले—धनंजय अर्जुन ने अपने बाणों के जाल से उमड़ते हुए बाण-वर्षा को चूर-चूर कर दिया। दीप्तिमान धनुष धारण करने वाले कर्ण के छोड़े हुए प्रज्वलित बाण-समूहों को भी अर्जुन ने अपने सघन बाण-समूह से काटकर तितर-बितर कर दिया।
Verse 553
विव्यधु: कर्णमासाद्य त्रिभिस्त्रिभिरजिद्वागै: । इसी समय धृष्टद्युम्न, भीम तथा महारथी सात्यकिने भी कर्णके पास पहुँचकर उसे तीन-तीन बाणोंसे घायल कर दिया
संजय बोले—कर्ण के पास पहुँचकर उन सबने उसे तीन-तीन बाणों से बेध दिया। उसी क्षण धृष्टद्युम्न, भीम और महारथी सात्यकि भी कर्ण के निकट आ पहुँचे और उन्होंने भी उसे तीन-तीन बाणों से घायल कर दिया।
Verse 576
रथशक्ती: समुत्क्षिप्प भृशं सिंहा इवानदन् । अपने धनुष कट जानेपर विषहीन भुजंगमोंके समान उन शूरवीरोंने रथ-शक्तियोंको ऊपर उठाकर सिंहोंके समान भयंकर गर्जना की
संजय बोले—जब उनके धनुष कट गए, तब वे शूरवीर विषहीन सर्पों के समान रथ-शक्तियों को उठाकर सिंहों की भाँति भयंकर गर्जना करने लगे।
Verse 593
ननाद बलवान् कर्ण: पार्थाय विसृजज्छरान् । परंतु बलवान् कर्णने सीधे जानेवाले तीन-तीन बाणसमूहोंद्वारा उन शक्तियोंके टुकड़े- टुकड़े करके अर्जुनपर बाणोंकी वर्षा करते हुए सिंहनाद किया
संजय बोले—बलवान कर्ण पार्थ अर्जुन पर बाण छोड़ते हुए सिंहनाद करने लगा। उसने सीधा जाने वाले तीन-तीन बाण-समूहों से उन शक्तियों को टुकड़े-टुकड़े कर दिया और फिर अर्जुन पर बाणों की वर्षा कर दी।
Verse 633
वरासिना कर्णपक्षान् जघान दश पञ्च च | तदनन्तर भीमसेनने गरुड़की भाँति अपने रथसे उछलकर उत्तम खड्गद्वारा कर्णपक्षके पंद्रह योद्धाओंको मार डाला
संजय बोले—उत्तम शस्त्र से उसने कर्ण-पक्ष के पंद्रह योद्धाओं को मार गिराया। इसके बाद भीमसेन गरुड़ की भाँति रथ से उछलकर, श्रेष्ठ खड्ग से कर्ण-पक्ष के और पंद्रह योद्धाओं का वध कर गिरा देने लगा।
Verse 653
जघान चन्द्रवर्माणं बृहत्क्षत्रं च नैषधम् । धष्टद्युम्नने भी श्रेष्ठ खड़ग और चमकीली ढाल लेकर चन्द्रवर्मा तथा निषधराज बृहत्क्षतका काम तमाम कर दिया
संजय बोले—हे भरतश्रेष्ठ! धृष्टद्युम्न ने खड्ग और चमकीली ढाल लेकर चन्द्रवर्मा तथा निषधराज बृहत्क्षत्र का रण में शीघ्र वध कर दिया।
Verse 666
आदाय कर्ण विव्याध त्रिसप्तत्या नदन् रणे | तदनन्तर पाञ्चालराजकुमार धृष्टद्युम्नने अपने रथपर बैठकर दूसरा धनुष ले रणक्षेत्रमें गर्जना करते हुए तिहत्तर बाणोंद्वारा कर्णको बींध डाला
संजय बोले—रण में गर्जना करते हुए उसने कर्ण को तिहत्तर बाणों से बींध दिया। तत्पश्चात् पाञ्चालराजकुमार धृष्टद्युम्न अपने रथ पर चढ़कर दूसरा धनुष लेकर, रणभूमि में गर्जते हुए, कर्ण को फिर तिहत्तर शरों से घायल कर गया।
Verse 673
सूतपुत्र॑ चतुःषष्ट्या विद्ध्वा सिंह इवानदत् | तत्पश्चात् चन्द्रमाके समान कान्तिमान् सात्यकिने भी दूसरा धनुष हाथमें लेकर सूतपुत्र कर्णको चौंसठ बाणोंसे घायल करके सिंहके समान गर्जना की
संजय बोले—सात्यकि ने सूतपुत्र कर्ण को चौंसठ बाणों से घायल करके सिंह के समान गर्जना की। फिर चन्द्रमा के समान कान्तिमान् सात्यकि ने हाथ में दूसरा धनुष लेकर कर्ण को पुनः चौंसठ शरों से बींधा और रण में सिंहवत् निनाद किया।
Verse 693
निमज्जमान राधेयमुज्जहु: सात्यकार्णवात् | तत्पश्चात् दुर्योधन, द्रोणाचार्य तथा राजा जयद्रथने डूबते हुए राधानन्दन कर्णका सात्यकिरूपी समुद्रसे उद्धार किया
संजय बोले—जब राधानन्दन कर्ण डूबने लगा, तब उन्होंने सात्यकिरूपी समुद्र से उसे खींचकर बाहर निकाल लिया। तत्पश्चात् दुर्योधन, द्रोणाचार्य और राजा जयद्रथ ने भी रण में उसे संभाला और उसका उद्धार कराया।
Verse 716
नकुल: सहदेवश्व सात्यकिं जुगुपू रणे । उधर धृष्टद्युम्न, भीमसेन, अभिमन्यु, अर्जुन, नकुल तथा सहदेवने रणक्षेत्रमें सात्यकिका संरक्षण आरम्भ किया
संजय बोले—रण में नकुल और सहदेव ने सात्यकि की रक्षा की। उधर धृष्टद्युम्न, भीमसेन, अभिमन्यु, अर्जुन, नकुल तथा सहदेव—सबने एकत्र होकर रणभूमि में सात्यकि का संरक्षण आरम्भ किया।
Verse 726
तावकानां परेषां च त्यक्त्वा प्राणानभूद् रण: । महाराज! इस प्रकार आपके तथा शत्रुपक्षके सम्पूर्ण धनुर्धरोंके विनाशके लिये उनमें परस्पर प्राणोंकी परवा न करके अत्यन्त भयंकर युद्ध होने लगा
तब आपके और शत्रुपक्ष के योद्धाओं ने प्राणों की परवा छोड़ दी और रण भड़क उठा। महाराज! इस प्रकार दोनों ओर के समस्त धनुर्धरों के विनाश के लिए, अपने-अपने प्राणों की चिंता किए बिना, अत्यन्त भयंकर युद्ध आरम्भ हो गया।
Verse 753
इस प्रकार उन निर्भीक सैनिकोंका महान् शक्तिशाली विपक्षी योद्धाओंके साथ अत्यन्त घमासान युद्ध हो रहा था
इस प्रकार उन निर्भीक सैनिकों का महान् शक्तिशाली विपक्षी योद्धाओं के साथ अत्यन्त घमासान युद्ध हो रहा था—जो कच्चा मांस खाने वाले पशु-पक्षियों तथा पिशाचों के हर्ष की वृद्धि और यमराज के राष्ट्र की समृद्धि करने वाला था।
Verse 1636
बभ्रमु: समरे नागा मृद्नन्त: शतशो नरान् । कितने ही गजराज अपने दाँतोंमें लगी हुई मनुष्योंकी आँतें लिये समरभूमिमें सैकड़ों योद्धाओंको कुचलते हुए चक्कर लगा रहे थे
समर में हाथी चक्कर लगा रहे थे और सैकड़ों मनुष्यों को कुचल रहे थे। कितने ही गजराज अपने दाँतों में लगी हुई मनुष्यों की आँतें लिये समरभूमि में घूमते हुए सैकड़ों योद्धाओं को रौंद रहे थे।
Verse 3136
मातड़ो न्यपतद् भूमौ नदीरोध इवोष्णगे । कोई अपने ही सैनिकोंको और कोई शत्रु-योद्धाओंको अपने तीखे बाणोंसे मार रहा था। उस युद्धमें पर्वत शिखरके समान विशालकाय हाथी नाराचसे मारा जाकर वर्षाकालमें नदीके तटकी भाँति धरतीपर गिरा और ढेर हो गया
मातंग भूमि पर ऐसे गिरा जैसे गरमी में नदी का बाँध टूटकर गिर पड़े। उस युद्ध में कोई अपने ही सैनिकों को और कोई शत्रु-योद्धाओं को अपने तीखे बाणों से मार रहा था। पर्वत-शिखर के समान विशालकाय हाथी नाराचों से मारा जाकर वर्षाकाल में नदी के तट की भाँति धरती पर गिर पड़ा और ढेर हो गया।
Verse 5636
तेषां त्रयाणां चापानि चिच्छेद विशिखैस्त्रिभि: । तब राधानन्दन कर्णने अपने बाणोंकी वर्षद्वारा अर्जुनके बाणोंका निवारण करके अपने तीन बाणोंद्वारा धृष्टद्युम्न आदि तीनों वीरोंके धनुषोंको भी काट दिया
उन तीनों के धनुषों को कर्ण ने तीन तीखे बाणों से काट दिया। तब राधानन्दन कर्ण ने अपने बाणों की वर्षा से अर्जुन के बाणों का निवारण करके, अपने तीन बाणों द्वारा धृष्टद्युम्न आदि तीनों वीरों के धनुष भी काट डाले।
Verse 7463
संयुक्ता: समदृश्यन्त पत्तयश्चापि पत्तिभि: । घोड़ोंसे घोड़े, हाथियोंसे हाथी, रथियोंसे रथी और पैदलोंसे पैदल जूझते दिखायी दे रहे थे
पैदल पैदलों से भिड़े दिखते थे; उसी प्रकार रणभूमि में घोड़े घोड़ों से, हाथी हाथियों से, रथी रथियों से—हर वर्ग का योद्धा अपने ही समकक्ष से आमने-सामने घोर संग्राम करता दिखाई देता था।
The chapter stages a dharma-saṃkaṭa between strategic necessity (capturing or neutralizing protected leaders through specialized formations and diversion) and the ethical unease that arises when such strategy results in the isolation and death of a young, valorous combatant.
Power is portrayed as relational rather than merely numeric: Droṇa underscores that the Kṛṣṇa–Arjuna alliance alters the field of possibility, implying that prudent leadership must account for moral-psychological force multipliers (alliances, counsel, legitimacy) alongside raw strength.
No explicit phalaśruti appears in this passage; the meta-commentary functions indirectly through Dhṛtarāṣṭra’s lament on the harshness of kṣatriya codes, framing the narration as an ethical inquiry rather than mere chronicle.
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