
Tilā-Dāna, Dīpa-Dāna, and Nitya-Jalapradāna (Yama–Brāhmaṇa Saṃvāda) | तिलदान-दीपदान-नित्यजलप्रदान (यम-ब्राह्मण संवाद)
Upa-parva: Dāna-Dharma Anuśāsana (Gifts of Tilā, Dīpa, Anna, Vāsas; Yama–Brāhmaṇa Saṃvāda)
Yudhiṣṭhira requests further clarification on the proper nature and merit of gifting sesame (tilā), lamps (dīpa), food (anna), and clothing (vāsas). Bhīṣma responds by citing an ancient exemplum: in a brāhmaṇa settlement in Madhyadeśa, Yama instructs a messenger to bring a particular learned brāhmaṇa (Śarmiṇ, of Agastya-gotra), emphasizing careful identification and the ethics of selection. A procedural error occurs when the messenger brings the wrong person; Yama corrects it, honors the appropriate brāhmaṇa, and engages him in dialogue. The brāhmaṇa asks what action yields great merit; Yama teaches that tilā is a supreme gift, recommended especially in śrāddha contexts, to be given according to capacity and proper rite; further, water-giving is continually meritorious, and public water works (ponds, tanks, wells) and drinking stations (prapā) are praised as rare and excellent benefactions. The chapter also affirms the value of lamp-giving for the welfare of ancestors (pitṛ), describing lamps as ‘eye-giving’ to devas and pitṛs. Additional notes include the merit of gifting jewels, the doctrine of mutual inexhaustible merit for worthy giving and worthy acceptance, and the social-ethical fruits of clothing-gifts; the passage closes with a brief endorsement of household continuity through marriage and progeny as a distinguished human good.
Chapter Arc: युधिष्ठिर, दान-धर्म के विधान को सुनकर, एक और सूक्ष्म जिज्ञासा उठाते हैं—क्या नक्षत्र-योग के अनुसार दान करने से फल में भेद आता है? → भीष्म उत्तर देते हैं कि इस विषय का प्रमाण एक प्राचीन संवाद में है। वे देवर्षि नारद के द्वारका-आगमन और देवकी के साथ धर्म-चर्चा का प्रसंग उठाकर, नक्षत्रों के अनुसार दान-वस्तुओं और उनके विशिष्ट फलों की क्रमबद्ध परंपरा खोलते हैं। → नक्षत्र-योगों के साथ दान का ‘फल-मानचित्र’ अपने चरम पर पहुँचता है—हस्त में रथ-हस्ती-दान, ज्येष्ठा में समूल शाक-दान, श्रवण में कम्बल-दान, शतभिषा में अगुरु-चन्दन-गन्ध-दान, भरणी में तिल-धेनु-दान—और प्रत्येक के साथ स्वर्ग, अप्सरा-संग, यश, समृद्धि, उत्तम गति जैसे विशिष्ट लोक-फल घोषित होते हैं। → भीष्म संक्षेप में कहते हैं कि नक्षत्र-योग से विविध दानों का यह लक्षण-निर्देश बताया गया; नारद से सुना हुआ देवकी का उपदेश आगे स्नुषाओं/परिवार की स्त्रियों तक पहुँचा—अर्थात धर्म-ज्ञान का गृहस्थ-परंपरा में प्रसार। → देवकी द्वारा स्नुषाओं को आगे क्या विशेष आचार-विधान, व्रत-नियम या दान-क्रम बताया गया—यह संकेत देकर कथा अगले अध्याय की ओर मोड़ लेती है।
Verse 1
अप्-४-#क+ चतु:षष्टितमो< ध्याय: विभिन्न नक्षत्रोंके योगमें भिन्न-भिन्न वस्तुओंके दानका माहात्म्य युधिछिर उवाच श्रुतं मे भवतो वाक्यमन्नदानस्य यो विधि: । नक्षत्रयोगस्येदानीं दानकल्पं ब्रवीहि मे,युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! मैंने आपका उपदेश सुना। अन्नदानका जो विधान है, वह ज्ञात हुआ। अब मुझे यह बताइये कि किस नक्षत्रका योग प्राप्त होनेपर किस-किस वस्तुका दान करना उत्तम है
尤提希提罗说道:“我已聆听了您的教诲——关于施食布施的规定法则。如今,请为我阐明与月宿合会(nakṣatra-yoga)相应的布施准则:当某一特定的月宿之合出现时,最宜施舍哪些具体之物?”
Verse 2
भीष्म उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । देवक्याश्रैव संवाद महर्षेनरिदस्थ च,भीष्मजीने कहा--युधिष्ठिर! इस विषयमें जानकार मनुष्य देवकी देवी और महर्षि नारदके संवादरूप प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं
毗湿摩说道:“在此事上,博学之士也常引一则古老的史传为证——即天后提婆姬(Devakī)与大圣那罗陀(Nārada)之间的对话。”
Verse 3
द्वारकामनुसम्प्राप्तं नारद देवदर्शनम् । पप्रच्छेदं वच: प्रश्न॑ देवकी धर्मदर्शनम्,एक समयकी बात है, धर्मदर्शी देवर्षि नारदजी द्वारकामें आये थे। उस समय वहाँ देवकी देवीने उनके सामने यही प्रश्न उपस्थित किया
毗湿摩说道:“当具天眼的圣者那罗陀来到堕罗迦(Dvārakā)时,深明法义的提婆姬上前请问,求其指示正法之行。”
Verse 4
तस्या: सम्पृच्छमानाया देवर्षिनरिदस्ततः । आचरष्ट विधिवत सर्व तच्छृणुष्व विशाम्पते,प्रजानाथ! देवकीके इस प्रकार पूछनेपर देवर्षि नारदने उस समय विधिपूर्वक सब बातें बतायीं। वे ही बातें मैं तुमसे कहता हूँ, सुनो
毗湿摩说道:“她如此发问时,天眼仙那罗陀便依仪轨、循次第,将一切详加开示。人民之主、众人之王啊,且听我说——我将把那番教诲原原本本告知于你。”
Verse 5
नारद उवाच कृत्तिकासु महा भागे पायसेन ससर्पिषा । संतर्प्य ब्राह्मणान् साधूँल्लोकानाप्रोत्यनुत्तमान्
那罗陀说道:“福德深厚的夫人啊,在昴宿(Kṛttikā)之时,若以酥油(ghee)调和甜乳饭(pāyasa)布施于婆罗门——那些贤善而堪受供养者——便能使他们满足,由此亦将得至最上诸界。”
Verse 6
नारदजीने कहा--महाभागे! कृत्तिका नक्षत्र आनेपर मनुष्य घृतयुक्त खीरके द्वारा श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको तृप्त करे। इससे वह सर्वोत्तम लोकोंको प्राप्त होता है ।। रोहिण्यां प्रसृतैर्मार्ग्मासैरन्नेन सर्पिषा । पयोअऊज्नपानं दातव्यमनृणार्थ द्विजातये,रोहिणी नक्षत्रमें पके हुए फलके गूदे, अन्न, घी, दूध तथा पीनेयोग्य पदार्थ ब्राह्मणको दान करने चाहिये। इससे उनके ऋणसे छुटकारा मिलता है
那罗陀说道:“高贵的夫人啊!当昴宿(Kṛttikā)到来之时,人应以酥油(ghee)调和的乳粥(kheer)使贤善的婆罗门满足;由此得至最上诸界。又当罗希尼宿(Rohiṇī)当旺之时,应施与二次生的婆罗门(dvija)熟果之浆与汁、熟食、酥油、牛乳及相宜之饮;由此脱离负债。”
Verse 7
दोग्ध्रीं दत्त्वा सवत्सां तु नक्षत्रे सोमदैवते । गच्छन्ति मानुषाल्लोकात् सर्वलोकमनुत्तमम्,मृगशिरा नक्षत्रमें दूध देनेवाली गौका बछड़ेसहित दान करके दाता मृत्युके पश्चात् इस लोकसे सर्वोत्तम स्वर्गलोकमें जाते हैं
那罗陀说道:“在由苏摩(Soma)主宰的月宿之时,若有人施舍一头乳牛并连同其犊,死后便离开人间,得至无上天界。”
Verse 8
आर्द्रायां कृसरं दत्त्वा तिलमिश्रमुपोषित: । नरस्तरति दुर्गाणि क्षुरधारांश्व॒ पर्वतान्,आर्द्रा नक्षत्रमें उपवासपूर्वक तिलमिश्रित खिचड़ी दान करनेवाला मनुष्य बड़े-बड़े दुर्गम संकटोंसे तथा क्षुरकी-सी धारवाले पर्वतोंसे भी पार हो जाता है
那罗陀说道:“在阿尔德罗宿(Ārdrā)之日,若人先行斋戒,而后施舍掺芝麻的克里萨罗(kṛsara,米与豆之食),便能渡越重重险难,乃至刀锋般的群山亦可跨过。”
Verse 9
पूपान् पुनर्वसौ दत्त्वा तथैवान्नानि शो भने । यशस्वी रूपसम्पन्नो बद्धन्नो जायते कुले
那罗陀说道:“在普那尔婆苏宿(Punarvasu)之时施舍甜饼(pūpa),并同样施与饮食者,将生于高贵之家,具名望与美貌。”
Verse 10
शोभने! पुनर्वसु नक्षत्रमें पूआ और अन्न-दान करके मनुष्य उत्तम कुलमें जन्म लेता है, तथा वहाँ यशस्वी, रूपवान् एवं प्रचुर अन्नसे सम्पन्न होता है ।। पुष्येण कनकं दत्त्वा कृतं वाकृतमेव च । अनालोकेषु लोकेषु सोमवत् स विराजते,पुष्य नक्षत्रमें सोनेका आभूषण अथवा केवल सोना ही दान करनेसे दाता प्रकाशशून्य लोकोंमें भी चन्द्रमाके समान प्रकाशित होता है
那罗陀说道:“吉祥的夫人啊!在普那尔婆苏宿(Punarvasu)之下施舍甜饼(pūpa)并行食施者,将生于上等家族;在彼生之中,名声显赫,容貌端丽,且粮食丰足。又在普沙宿(Puṣya)之下施与黄金——或为成器之饰,或为未炼之金——施者即便在无光之界,亦如明月般辉耀。”
Verse 11
आश्लेषायां तु यो रूप्यमृषभं वा प्रयच्छति । स सर्वभयनिर्मुक्त: सम्भवानधितिष्ठति,जो आश्लेषा नक्षत्रमें चाँदी अथवा बैल दान करता है, वह इस जन्ममें सब प्रकारके भयसे मुक्त हो दूसरे जन्ममें उत्तम कुलमें जन्म लेता है
那罗陀说道:凡在阿湿勒沙(Āśleṣā)宿之时,布施白银或公牛者,于此生即能脱离一切怖畏;来世复得生于上善良族、门第清贵之家。
Verse 12
मघासु तिलपूर्णानि वर्धमानानि मानव: । प्रदाय पुत्रपशुमानिह प्रेत्य च मोदते,जो मनुष्य मघा नक्षत्रमें तिलसे भरे हुए वर्धमान पात्रोंका दान करता है, वह इहलोकमें पुत्रों और पशुओंसे सम्पन्न हो परलोकमें भी आनन्दका भागी होता है
那罗陀说道:凡在摩伽(Maghā)宿之时,布施盛满芝麻的吉祥“增益器”(vardhamāna-pātra)者,今世得子嗣与牲畜丰足;身后亦于来世同享喜乐。
Verse 13
फल्गुनीपूर्वसमये ब्राह्णानामुपोषित: । भक्ष्यान् फाणितसंयुक्तान् दत्त्वा सौभाग्यमृच्छति,पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्रमें उपवास करके जो मनुष्य ब्राह्मणोंको मक्खनमिश्रित भक्ष्य पदार्थ देता है, वह सौभाग्यशाली होता है
那罗陀说道:若有人在前法尔古尼(Pūrvaphalgunī)宿之时持斋禁食,继而以掺入法尼多(phāṇita,甜浆/粗糖)的食物供施婆罗门,便能获得福运与吉祥。
Verse 14
घृतक्षीरसमायुक्तं विधिवत् षष्टिकौदनम् | उत्तराविषये दत्त्वा स्वर्गलोके महीयते,उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रमें विधिपूर्वक घृत और दुग्धसे युक्त साठीके चावलके भातका दान करनेसे मनुष्य स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है
那罗陀说道:“若有人依正法仪轨,于乌多罗(Uttarā,即后法尔古尼 Uttaraphālgunī)宿相应之圣行中,布施以酥油与乳煮成的六十日稻(ṣaṣṭika)熟饭,便在天界受尊崇、得显荣。”
Verse 15
यद् यत् प्रदीयते दानमुत्तराविषये नरै: । महाफलमनन्तं तद् भवतीति विनिश्चय:,उत्तरा नक्षत्रमें मनुष्य जो-जो दान देते हैं, वह महान् फलसे युक्त एवं अनन्त होता है-- यह शास्त्रोंका निश्चय है
那罗陀说道:凡人在乌多罗(Uttarā)宿之时所行一切布施,必定结成广大乃至无量之果——此乃圣典所下之定论。
Verse 16
हस्ते हस्तिरथं दत्त्वा चतुर्युक्तमुपोषित: । प्राप्रोति परमॉललोकान् पुण्यकामसमन्वितान्,हस्तनक्षत्रमें उपवास करके ध्वजा, पताका, चँदोवा और किंकिणीजाल--इन चार वस्तुओंसे युक्त हाथी जुते हुए रथका दान करनेवाला मनुष्य पवित्र कामनाओंसे युक्त उत्तम लोकोंमें जाता है
在“哈斯塔”(Hastā)宿之日,若有人持斋守戒,布施一乘以象牵引、备四马之车,并以旌旗、幡幢、华盖与铃网庄严之;其人怀清净求福之心,便得往至至上殊胜之诸天界。
Verse 17
चित्रायां वृषभ॑ दत्त्वा पुण्यगन्धांश्व भारत । चरन्त्यप्सरसां लोके रमन्ते नन्दने तथा,भारत! जो लोग चित्रा नक्षत्रमें वृषभ एवं पवित्र गन्धका दान करते हैं, वे अप्सराओंके लोकमें विचरते और नन्दनवनमें रमण करते हैं
那罗陀说道:“噢,婆罗多啊!在‘质多罗’(Citrā)宿之日,若有人布施公牛,并供献清净吉祥之香,便得至阿普萨罗(天女)之界;在那里自在游行,欢娱于难陀那(因陀罗之天园)。”
Verse 18
स्वात्यामथ धन दत्त्वा यदिष्टतममात्मन: । प्राप्रोति लोकान् स शुभानिह चैव महद् यश:,स्वाती नक्षत्रमें अपनी अधिक-से-अधिक प्रिय वस्तुका दान करके मनुष्य शुभ लोकोंमें जाता है और इस जगतमें भी महान् यशका भागी होता है
那罗陀说道:在“娑婆底”(Svātī)宿之日,若有人施舍财物,尤其舍去自己最为珍爱的东西,便能得至吉祥之界;并且在此世亦获大名声。
Verse 19
विशाखायामनडूवाहं थेनुं दत्त्वा च दुग्धदाम् । सप्रासंगं च शकटं सधान्यं वस्त्रसंयुतम्,जो विशाखा नक्षत्रमें गाड़ी ढोनेवाले बैल, दूध देनेवाली गाय, धान्य, वस्त्र और प्रासंगसहित शकट दान करता है, वह देवताओं और पितरोंको तृप्त कर देता है तथा मृत्युके पश्चात् अक्षय सुखका भागी होता है। वह जीते जी कभी संकटमें नहीं पड़ता और मरनेके बाद स्वर्गलोकमें जाता है
那罗陀说道:“在‘毗舍佉’(Viśākhā)宿之日,若有人布施能牵车之役牛、产乳之母牛,并施与配齐车具之车,兼以谷粮与衣服,则能使诸天与祖灵欢喜满足。此人死后得不竭之乐;生时不为忧患所胜;离此世间,便往天界。”
Verse 20
पितृन् देवांश्न प्रीणाति प्रेत्य चानन्त्यमश्रुते । न च दुर्गाण्यवाप्रोति स्वर्गलोक॑ च गच्छति,जो विशाखा नक्षत्रमें गाड़ी ढोनेवाले बैल, दूध देनेवाली गाय, धान्य, वस्त्र और प्रासंगसहित शकट दान करता है, वह देवताओं और पितरोंको तृप्त कर देता है तथा मृत्युके पश्चात् अक्षय सुखका भागी होता है। वह जीते जी कभी संकटमें नहीं पड़ता और मरनेके बाद स्वर्गलोकमें जाता है
那罗陀说:献此等布施者,能令祖灵与诸天同欢。其人死后得无尽之报;生时不陷于困厄;离此世间,便往天界。
Verse 21
दत्त्वा यथोक्तं विप्रेभ्यो वृत्तिमिष्टां स विन्दति । नरकादींश्व॒ संक्लेशान् नाप्रोतीति विनिश्चय:
那罗陀说道:“若有人依所规定之法,将供养生计之资(vṛtti)施与婆罗门,便能获得所愿的安乐与资生之福。此为定论:他不堕入以地狱为始的诸般苦刑。”
Verse 22
पूर्वोक्त वस्तुओंका ब्राह्मणोंको दान करके मनुष्य इच्छित जीविका-वृत्ति पा लेता है और नरक आदिके कष्ट भी कभी नहीं भोगता। ऐसा शास्त्रोंका निश्चय है ।। अनुराधासु प्रावारं वरान्नं समुपोषित: । दत्त्वा युगशतं चापि नर: स्वर्गे महीयते,जो मनुष्य अनुराधा नक्षत्रमें उपवास करके ओढ़नेका वस्त्र और उत्तम अन्न दान करता है, वह सौ युगोंतक स्वर्गलोकमें सम्मानपूर्वक रहता है
那罗陀说道:“将前述诸物布施给婆罗门者,便能获得所愿的生计,而永不必受地狱等处的苦刑——此乃诸经所定之论。又有一事:若人在阿奴罗陀(Anurādhā)月宿之日守斋,然后施舍披衣(覆身之衣)与上妙饮食,则于天界受尊荣达百劫(百瑜伽)。”
Verse 23
कालशाकं तु विप्रे भ्यो दत्त्वा मर्त्य: समूलकम् | ज्येष्ठायामृद्धिमिष्टां वै गतिमिष्टां स गच्छति,जो मनुष्य ज्येष्ठा नक्षत्रमें ब्राह्मयगोंको समयोचित शाक और मूली दान करता है, वह अभीष्ट समृद्धि और सदगतिको प्राप्त होता है
那罗陀说道:“凡人在阇耶湿吒(Jyeṣṭhā)月宿之时,将应时的叶菜(kālaśāka)连同其根施与婆罗门,便得所愿之富饶,并达成所求之吉祥归趣。”
Verse 24
मूले मूलफल दत्त्वा ब्राह्मणेभ्य:ः समाहित: । पितृन् प्रीणयते चापि गतिमिष्टां च गच्छति,मूल नक्षत्रमें एकाग्रचित्त हो ब्राह्मणोंको मूल-फल दान करनेवाला मनुष्य पितरोंको तृप्त करता और अभीष्ट गतिको पाता है
那罗陀说道:“若人心神专一,于牟罗(Mūla)月宿之际,将根茎与果实布施给婆罗门,则亦能使祖灵(pitṛs)欢悦,并得所愿之吉祥归趣。”
Verse 25
अथ पूर्वास्वषाढासु दधिपात्राण्युपोषित: । कुलवृत्तोपसम्पन्ने ब्राह्मणे वेदपारगे
那罗陀说道:“随后,在前阿沙荼(Pūrvāṣāḍhā)月宿之日,他先行斋戒,并备好盛酸乳的器皿,前往一位婆罗门跟前;此婆罗门具足良好的家风与成规传统,且通达吠陀。”
Verse 26
पुरुषो जायते प्रेत्य कुले सुबहुगोधने । पूर्वाषाढ़ा नक्षत्रमें उपवास करके कुलीन, सदाचारी एवं वेदोंके पारंगत विद्वान् ब्राह्मणको दहीसे भरे हुए पात्रका दान करनेवाला मनुष्य मृत्युके पश्चात् ऐसे कुलमें जन्म लेता है, जहाँ गोधनकी अधिकता होती है ।। उदमन्थ॑ं ससर्पिष्कं प्रभूतमधिफाणितम् | दत्त्वोत्तरास्वषाढासु सर्वकामानवाप्रुयात्
那罗陀说:若有人在“前阿沙荼”(Pūrvāṣāḍhā)宿之日守斋戒,而以盛满凝乳(酸乳)的器皿布施于出身高贵、行止端正、通达吠陀的婆罗门,则其人死后将再生于牛财丰饶之家。又若有人在“后阿沙荼”(Uttarāṣāḍhā)诸日,施与充足的搅拌乳饮,和以酥油(ghee),并以大量糖蜜(molasses)调甜,则能圆满一切所愿之事。
Verse 27
जो उत्तराषाढ़ा नक्षत्रमें जलपूर्ण कलशसहित सत्तूकी बनी हुई खाद्य वस्तु, घी और प्रचुर माखन दान करता है, वह सम्पूर्ण मनोवांछित भोगोंको प्राप्त कर लेता है ।। दुग्धं त्वभिजिते योगे दत्त्वा मधुघृतप्लुतम् । धर्मनित्यो मनीषिभ्य: स्वर्गलोके महीयते,जो नित्य धर्मपरायण पुरुष अभिजित् नक्षत्रके योगमें मनीषी ब्राह्मणोंको मधु और घीसे युक्त दूध देता है, वह स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है
那罗陀说:在“后阿沙荼”(Uttarāṣāḍhā)宿之时,若有人布施满盛清水之罐,并施以炒大麦粉所制之食(sattu),又加酥油(ghee)与丰厚黄油,则能获得其心所愿的一切享受。又那恒常安住于法者——当“阿毗吉特”(Abhijit)宿成合之际——若以蜜与酥油调和之乳供养贤智婆罗门,便在天界受尊崇。
Verse 28
श्रवणे कम्बलं दत्त्वा वस्त्रान्तरितमेव वा । श्वेतेन याति यानेन स्वर्गलोकानसंवृतान्
那罗陀说:“在‘室罗伐那’(Śravaṇa)宿之日,若有人为护人耳而施以羊毛毯——或直接奉与,或裹于他布而赠——其人将乘白色天乘而行,抵达诸天界,畅通无碍。”
Verse 29
जो श्रवण नक्षत्रमें वस्त्रवेष्टित कम्बल दान करता है, वह श्वेत विमानके द्वारा खुले हुए स्वर्गलोकमें जाता है ।। गोप्रयुक्ते धनिष्ठासु यानं दत्त्वा समाहित: । वस्त्रराशिधन सद्य:ः प्रेत्य राज्यं प्रपद्यते,जो धनिष्ठा नक्षत्रमें एकाग्रचित्त होकर बैलगाड़ी, वस्त्र-समूह तथा धन दान करता है, वह मृत्युके पश्चात् शीघ्र ही राज्य पाता है
那罗陀说:当“檀尼什吒”(Dhaniṣṭhā)宿当令之时,若有人摄心专注,布施以牛轭之车乘(如牛车),并施以成堆衣物与财宝,则其人死后将迅速得享王权之报。
Verse 30
गन्धान् शतभिषायोगे दत्त्वा सागुरुचन्दनान् । प्राप्रोत्यप्सरसां संघान् प्रेत्य गन्धांश्व शाश्वतान्,जो शतभिषा नक्षत्रके योगमें अगुरु और चन्दन-सहित सुगन्धित पदार्थोका दान करता है, वह परलोकमें अप्सराओंके समुदाय तथा अक्षय गन्धको पाता है
那罗陀说:在“萨多毗沙”(Śatabhiṣā)宿之吉合之时,若有人布施诸香之物,并以沉香(agaru)与檀香同施,则其人死后得与众天女(阿普萨拉)为伴,并于彼世获得恒常不竭之芳香。
Verse 31
पूर्वाभाद्रपदायोगे राजमाषान् प्रदाय तु । सर्वभक्षफलोपेत: स वै प्रेत्य सुखी भवेत्,पूर्वाभाद्रपदा नक्षत्रके योगमें बड़ी उड़द या सफेद मटरका दान करके मनुष्य परलोकमें सब प्रकारकी खाद्य वस्तुओंसे सम्पन्न हो सुखी होता है
那罗陀说道:“当月宿‘前婆陀罗钵陀’(Pūrvābhādrapadā)与吉祥之瑜伽相合之时,若有人施舍‘王摩沙’(rāja-māṣa,优等的摩沙豆),其人死后将得安乐之境,具足种种饮食与果品。”
Verse 32
औरभ्रमुत्तरायोगे यस्तु मांसं प्रयच्छति । स पितृन् प्रीणयति वै प्रेत्य चानन्त्यमश्षुते,जो उत्तराभाद्रपदा नक्षत्रके योगमें औरभ्र फलका गूदा दान करता है, वह पितरोंको तृप्त करता और परलोकमें अक्षय सुखका भागी होता है
那罗陀说道:“在名为‘后瑜伽’(Uttarā-yoga)的吉祥相合之时,若有人布施‘奥罗婆罗’(aurabhra)之果的肉质果瓤,便真实地使诸皮特利(Pitṛ,祖灵)欢喜;其人死后,于彼世得无尽安乐。”
Verse 33
कांस्योपदोहनां धेनुं रेवत्यां यः प्रयच्छति । सा प्रेत्य कामानादाय दातारमुपतिष्ठति,जो रेवती नक्षत्रमें कांसके दुग्धपात्रसे युक्त धेनुका दान करता है वह धेनु परलोकमें सम्पूर्ण भोगोंको लेकर उस दाताकी सेवामें उपस्थित होती है
那罗陀说道:“当月宿‘勒伐底’(Revatī)之时,若有人布施一头配有青铜(kāṃsya)挤奶器皿的母牛,则其人死后,那头牛本身将携带一切所欲之享受,前来侍奉施主。”
Verse 34
रथमश्वसमायुक्तं दत्त्वाश्विन्यां नरोत्तम: । हस्त्यश्वरथसम्पन्ने वर्चस्वी जायते कुले,जो नरश्रेष्ठ अश्विनी नक्षत्रमें घोड़े जुते हुए रथका दान करता है, वह हाथी, घोड़े और रथसे सम्पन्न कुलमें तेजस्वी पुत्ररूपसे जन्म लेता है
那罗陀说道:“若有贤善之人于月宿‘阿湿毗尼’(Aśvinī)当值之时,布施一乘套马之车,则其人将再生于具足象、马与车乘的家族之中,并在彼处成为光辉显赫之人。”
Verse 35
भरणीषु द्विजातिभ्यस्तिलधेनु प्रदाय वै । गा: सुप्रभूता: प्राप्नोति नर: प्रेत्य यशस्तथा,जो भरणी नक्षत्रमें ब्राह्मणोंको तिलमयी धेनुका दान करता है, वह इस लोकमें बहुत- सी गौओंको तथा परलोकमें महान् यशको प्राप्त करता है
那罗陀说道:“在月宿‘婆罗尼’(Bharaṇī)之时,若有人向二次生者(尤指婆罗门)施与‘芝麻之牛’——以芝麻制成的仪式性供施——则其人在此世得众多牛群;死后亦得大名声。”
Verse 36
भीष्म उवाच इत्येष लक्षणोद्ेश: प्रोक्तो नक्षत्रयोगत: । देवक्या नारदेनेह सा स्नुषाभ्यो5ब्रवीदिदम्
毗湿摩说道:“如是,依诸月宿(那刹多罗)相合之法,诸相之要略已被宣说。在此,天授姬(Devakī)受那罗陀教诲,便将这些话告诫于她的诸位儿媳。”
Verse 64
भीष्मजी कहते हैं--राजन्! इस प्रकार नक्षत्रोंक योगमें किये जानेवाले विविध वस्तुओंके दानका संक्षेपसे यहाँ वर्णन किया गया है। नारदजीने देवकीसे और देवकीजीने अपनी पुत्रवधुओंसे यह विषय सुनाया था ।। इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि नक्षत्रयोगदानं नाम चतु:षष्टितमो5 ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें नक्षत्रयोग सम्बन्धी दान नामक चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ
毗湿摩说道:“大王啊,此处已简要叙述:当特定的月宿合相(nakṣatra-yoga)出现时,应施行的种种布施。此教法,那罗陀从天授姬(Devakī)处听闻;天授姬又转而告知她的诸位儿媳。至此,《摩诃婆罗多》〈教诫篇〉之〈施舍法品〉中,题为‘月宿合相之施’的第六十四章圆满结束。”
It demonstrates the dharmic risk of misidentifying recipients: even well-intended actions can become flawed if the selection and procedure contradict explicit instruction, requiring correction to restore ritual-ethical integrity.
Tilā-dāna is presented as exceptionally meritorious when performed properly and regularly, while water-giving—especially through durable public provisions—embodies continuous welfare and thus yields outstanding merit.
Yes in functional form: lamp-giving is said to benefit devas and pitṛs as ‘eye-giving’ support, and worthy giving/acceptance is described as producing akṣaya (inexhaustible) merit for both donor and recipient.