Adhyaya 41
Vana ParvaAdhyaya 4150 Verses

Adhyaya 41

Śiva Grants the Pāśupata Astra (Pāśupata-Śastra Upadeśa) | शिवेन पाशुपतास्त्रदानम्

Upa-parva: Kirātārjunīya Episode (Śiva–Arjuna Encounter and Astra-Upadeśa)

This chapter records a formal bestowal and doctrinal framing of the Pāśupata astra. Śiva addresses Arjuna by recalling a primordial identity association with Nara-Nārāyaṇa and situates their shared tejas as world-sustaining. He identifies the Gāṇḍīva as Arjuna’s rightful weapon and reaffirms inexhaustible quivers, then invites Arjuna to request a boon. Arjuna petitions for the formidable Pāśupata—also characterized through the epithet Brahmaśiras—described as cosmically destructive if deployed at the wrong scale. Śiva consents while emphasizing exclusivity of knowledge (even major deities are said not to know it fully), and issues an explicit operational ethic: it must not be released rashly, as misapplication could endanger the entire world-order. The transmission is portrayed as confidential instruction, after which omens occur—earth tremors and celestial sounds—while gods and adversarial beings witness the weapon’s fiery, personified presence near Arjuna. The chapter closes with purification motifs (removal of inauspiciousness by divine touch), Śiva’s permission for Arjuna’s onward ascent, and Śiva’s departure with Umā, leaving Arjuna empowered yet constrained by rule-governed responsibility.

Chapter Arc: महादेव के साक्षात् दर्शन-स्पर्श से अभिभूत अर्जुन अपने सौभाग्य पर विस्मित होकर आत्मगौरव और कृतज्ञता के बीच ठहर जाता है। → उसी दिव्य क्षण में दिक्पाल/लोकपाल एक-एक कर प्रकट होते हैं—यम, वरुण आदि—और अर्जुन की असाधारण नियति (नर-स्वरूप) का संकेत देकर उसे दिव्यास्त्रों के योग्य ठहराते हैं। → लोकपाल अर्जुन को दिव्यास्त्र प्रदान करते हैं और अंततः इन्द्र का आदेश आता है—अर्जुन को स्वर्ग चलकर आगे की सिद्धि और अस्त्र-विद्या प्राप्त करनी है; साथ ही भविष्य के महासंग्राम में भीष्म-कर्ण आदि के वध/विजय की दिशा का संकेत मिलता है। → अस्त्र-प्राप्ति से कृतार्थ होकर अर्जुन ‘पूर्ण-मानस’ होता है; देवता सम्मानपूर्वक यथागत लौटते हैं और अर्जुन का तप-यात्रा-मार्ग अब स्वर्गगमन की ओर मुड़ जाता है। → इन्द्र के आदेश के बाद प्रश्न शेष रहता है—स्वर्ग में अर्जुन को कौन-सी दिव्य शिक्षा/परीक्षा मिलेगी और यह वरदान कुरुक्षेत्र के भाग्य को कैसे पलटेगा?

Shlokas

Verse 1

हि न () है >> >> एकचत्वारिशो< ध्याय: अर्जुनके पास दिक्पालोंका आगमन एवं उन्हें दिव्यास्त्र- प्रदान तथा इन्द्रका उन्हें स्वर्गमें चलनेका आदेश देना वैशम्पायन उवाच तस्य सम्पश्यतस्त्वेव पिनाकी वृषभध्वज: । जगामादर्शन॑ भानुलोंकस्येवास्तमीयिवान्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! अर्जुनके देखते-देखते पिनाकधारी भगवान्‌ वृषभध्वज अदृश्य हो गये, मानो भुवनभास्कर भगवान्‌ सूर्य अस्त हो गये हों

Vaiśampāyana berkata: Wahai Janamejaya! Ketika Arjuna masih memandang, Tuhan pemegang Pināka, yang panjinya bergambar lembu, lenyap dari penglihatan—laksana sang surya, penerang jagat, tenggelam saat senja.

Verse 2

ततोअर्जुन: परं चक्रे विस्मयं परवीरहा । मया साक्षान्महादेवो दृष्ट इत्येव भारत,भारत! तदनन्तर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले अर्जुनको यह सोचकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि आज मुझे महादेवजीका प्रत्यक्ष दर्शन प्राप्त हुआ है

Maka Arjuna, pembantai para pahlawan musuh, diliputi keheranan yang mendalam, seraya berpikir, “Wahai Bhārata, sungguh aku telah memandang Mahādeva secara langsung.”

Verse 3

धन्यो<स्म्यनुगृहीतो5स्मि यन्मया ःयम्बको हर: । पिनाकी वरदो रूपी दृष्ट: स्पृष्टश्न पाणिना,मैं धन्य हूँ! भगवान्‌का मुझपर बड़ा अनुग्रह है कि त्रिनेत्रधारी, सर्वपापहारी एवं अभीष्ट वर देनेवाले पिनाक-पाणि भगवान्‌ शंकरने मूर्तिमान्‌ होकर मुझे दर्शन दिया और अपने करकमलोंसे मेरे अंगोंका स्पर्श किया

Berbahagialah aku, sungguh aku dianugerahi rahmat—sebab aku telah melihat Tryambaka, Hara, sang pemegang Pināka, sang pemberi anugerah, hadir dalam wujud nyata; bahkan ia menyentuhku dengan tangannya sendiri.

Verse 4

कृतार्थ चावगच्छामि परमात्मानमाहवे । शत्रृंश्न विजितान्‌ सर्वान्‌ निर्वृत्तं च प्रयोजनम्‌,आज मैं अपने-आपको परम कृतार्थ मानता हूँ, साथ ही यह विश्वास करता हूँ कि महासमरमें अपने समस्त शत्रुओंपर विजय प्राप्त करूँगा। अब मेरा अभीष्ट प्रयोजन सिद्ध हो गया

Kini aku merasa sepenuhnya berhasil; dan aku pun yakin bahwa di medan perang besar aku akan menaklukkan semua musuhku. Tujuan yang kuidamkan telah tercapai.

Verse 5

इत्येवं चिन्तयानस्य पार्थस्यामिततेजस: । ततो वैदूर्यवर्णाभो भासयन्‌ सर्वतो दिश: । यादोगणवृत: श्रीमानाजगाम जलेश्वर:,इस प्रकार चिन्तन करते हुए अमित तेजस्वी कुन्तीकुमार अर्जुनके पास जलके स्वामी श्रीमान्‌ वरुणदेव जल-जन्तुओंसे घिरे हुए आ पहुँचे। उनकी अंगकान्ति वैदूर्यमणिके समान थी और वे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित कर रहे थे

Ketika Pārtha (Arjuna) yang bercahaya tak terukur terus merenung demikian, datanglah Varuṇa, penguasa segala perairan, dikelilingi rombongan makhluk air. Kilau tubuhnya laksana permata vaidūrya yang kebiruan, menerangi segenap penjuru.

Verse 6

नागैन्दिनदीभिश्र दैत्यै: साध्यैश्व दैवतै: । वरुणो यादसां भर्ता वशी तं देशमागमत्‌,नागों, नद और नदियोंके देवताओं, दैत्यों तथा साध्यदेवताओंके साथ जल-जन्तुओंके स्वामी जितेन्द्रिय वरुणदेवने उस स्थानको अपने शुभागमनसे सुशोभित किया

Bersama para Nāga, sungai-sungai beserta dewa pelindungnya, para Daitya, dan para Sādhya di antara para dewa, Varuṇa—penguasa makhluk air, yang menaklukkan indria—datang ke tempat itu, memuliakannya dengan kedatangan yang membawa berkah.

Verse 7

अथ जाम्बूनदवपुर्विमानेन महार्चिषा । कुबेर: समनुप्राप्तो यक्षैरनुगत: प्रभु:,तदनन्तर स्वर्णके समान शरीरवाले भगवान्‌ कुबेर महातेजस्वी विमानद्वारा वहाँ आये। उनके साथ बहुत-से यक्ष भी थे

Kemudian Dewa Kubera, bertubuh laksana emas dan bercahaya agung, tiba di sana dengan kereta udara yang gemilang. Banyak Yakṣa pun mengiringinya sebagai pengikut setia.

Verse 8

विद्योतयन्निवाकाशमद्भुतोपमदर्शन: । धनानामीशथ्चर: श्रीमानर्जुन॑ द्रष्ठटमागत:,वे अपने तेजसे आकाशमण्डलको प्रकाशित-से कर रहे थे। उनका दर्शन अद्भुत एवं अनुपम था। परम सुन्दर श्रीमान्‌ धनाध्यक्ष कुबेर अर्जुनको देखनेके लिये वहाँ पधारे थे

Seakan-akan menerangi cakrawala dengan sinarnya sendiri, tampaklah ia begitu menakjubkan dan tiada banding. Kubera yang mulia, penguasa harta, datang ke sana untuk memandang Arjuna.

Verse 9

तथा लोकान्तकृच्छीमान्‌ यम: साक्षात्‌ प्रतापवान्‌ | मर्त्यमूर्तिधरै: सार्थ पितृभिलोॉकभावनै:,इसी प्रकार समस्त जगत्‌का अन्त करनेवाले श्रीमान्‌ प्रतापी यमराजने प्रत्यक्षरूपमें वहाँ दर्शन दिया। उनके साथ मानव-शरीरधारी विश्वभावन पितृगण भी थे

Demikian pula Yama sendiri—mulia dan perkasa, pengakhir segala dunia—tampak hadir di sana. Bersamanya datang para Pitṛ, penopang dunia, yang mengenakan wujud manusia.

Verse 10

दण्डपाणिरचिन्त्यात्मा सर्वभूतविनाशकृत्‌ । वैवस्वतो धर्मराजो विमानेनावभासयन्‌,उनके हाथमें दण्ड शोभा पा रहा था। सम्पूर्ण भूतोंका विनाश करनेवाले अचिन्त्यात्मा सूर्यपुत्र धर्मराज अपने (तेजस्वी) विमानसे तीनों लोकों, गुह्यकों, गन्धर्वों तथा नागोंको प्रकाशित कर रहे थे। प्रलयकाल उपस्थित होनेपर दिखायी देनेवाले द्वितीय सूर्यकी भाँति उनकी अद्भुत शोभा हो रही थी

Dengan gada hukuman di tangannya, berhakikat tak terselami dan menjadi pelaksana peleburan segala makhluk, Vaivasvata—Yama, Raja Dharma—memancar dari wahananya yang cemerlang, menerangi sekeliling. Keagungan sinarnya laksana matahari kedua yang terbit pada saat pralaya.

Verse 11

त्रींललोकान्‌ गुह्ुकांश्वैव गन्धर्वाश्व॒ सपन्नगान्‌ । द्वितीय इव मार्तण्डो युगान्ते समुपस्थिते,उनके हाथमें दण्ड शोभा पा रहा था। सम्पूर्ण भूतोंका विनाश करनेवाले अचिन्त्यात्मा सूर्यपुत्र धर्मराज अपने (तेजस्वी) विमानसे तीनों लोकों, गुह्यकों, गन्धर्वों तथा नागोंको प्रकाशित कर रहे थे। प्रलयकाल उपस्थित होनेपर दिखायी देनेवाले द्वितीय सूर्यकी भाँति उनकी अद्भुत शोभा हो रही थी

Laksana matahari kedua yang muncul pada akhir zaman, ia menerangi tiga dunia—beserta para Guhyaka, Gandharva, dan bangsa ular (Nāga).

Verse 12

ते भानुमन्ति चित्राणि शिखराणि महागिरे: । समास्थायार्जुनं तत्र ददृशुस्तपसान्वितम्‌

Setelah mencapai puncak-puncak gunung besar yang bercahaya dan menakjubkan, mereka melihat Arjuna di sana—teguh dalam tapa, dipenuhi daya askese—tenggelam dalam laku disiplin rohaninya.

Verse 13

उन सब देवताओंने उस महापर्वतके विचित्र एवं तेजस्वी शिखरोंपर पहुँचकर वहाँ तपस्वी अर्जुनको देखा ।। ततो मुहूर्ताद्‌ भगवानैरावतशिरोगत:ः । आजगाम रहेन्द्राण्या शक्र: सुरगणैर्वृत:

Para dewa mencapai puncak-puncak gunung besar yang menakjubkan dan bercahaya itu, lalu melihat Arjuna sang pertapa di sana. Tak lama kemudian, Śakra (Indra) datang—duduk di atas Airāvata, bersama Indrāṇī, dan dikelilingi rombongan para dewa.

Verse 14

तत्पश्चात्‌ दो ही घड़ीके बाद भगवान्‌ इन्द्र इन्द्राणीके साथ ऐरावतकी पीठपर बैठकर वहाँ आये। देवताओंके समुदायने उन्हें सब ओरसे घेर रखा था ।। पाण्डुरेणातपत्रेण प्रियमाणेन मूर्थनि । शुशुभे तारकाराज: सितमभ्रमिव स्थित:,उनके मस्तकपर श्वेत छत्र तना हुआ था, जिससे वे शुभ्र वर्णके मेघखण्डसे आच्छादित चन्द्रमाके समान सुशोभित हो रहे थे। बहुत-से तपस्वी-ऋषि तथा गन्धर्वगण उनकी स्तुति करते थे। वे उस पर्वतके शिखरपर आकर ठहर गये, मानो वहाँ सूर्य प्रकट हो गये हों

Kemudian, setelah berlalu dua ghaṭikā, Indra yang mulia datang ke sana, duduk di punggung Airāvata dengan Indrāṇī di sisinya; rombongan para dewa mengelilinginya dari segala arah. Dengan payung putih terbentang di atas kepalanya, ia bersinar laksana raja bintang—sang bulan—seakan berdiri di tengah gumpal awan pucat. Banyak resi pertapa dan para Gandharva memujinya dengan kidung. Ia berhenti di puncak gunung itu, seolah-olah matahari sendiri telah menampakkan diri di sana.

Verse 15

संस्तूयमानो गन्धर्वैर्क्षिभिश्न तपोधनै: । शूडूं गिरे: समासाद्य तस्थौ सूर्य इवोदित:,उनके मस्तकपर श्वेत छत्र तना हुआ था, जिससे वे शुभ्र वर्णके मेघखण्डसे आच्छादित चन्द्रमाके समान सुशोभित हो रहे थे। बहुत-से तपस्वी-ऋषि तथा गन्धर्वगण उनकी स्तुति करते थे। वे उस पर्वतके शिखरपर आकर ठहर गये, मानो वहाँ सूर्य प्रकट हो गये हों

Dipuja oleh para Gandharva dan para resi pertapa yang kaya tapa, ia mencapai puncak Gunung Śūḍu dan berdiri di sana—bercahaya seakan matahari sendiri telah terbit di puncak itu.

Verse 16

अथ मेघस्वनो धीमान्‌ व्याजहार शुभां गिरम्‌ यम: परमधर्मज्ञो दक्षिणां दिशमास्थित:,तदनन्तर मेघके समान गम्भीर स्वरवाले परम धर्मज्ञ एवं बुद्धिमान्‌ यमराज दक्षिण दिशामें स्थित हो यह शुभ वचन बोले--

Kemudian Yama—bijaksana, bersuara dalam laksana gemuruh awan, dan mahatahu akan dharma—berdiri di penjuru selatan dan mengucapkan kata-kata yang membawa pertanda baik.

Verse 17

अर्जुनार्जुन पश्यास्मॉललोकपालान्‌ समागतान्‌ | दृष्टिं ते वितरामो5द्य भवानहति दर्शनम्‌,अर्जुन! हम सब लोकपाल यहाँ आये हुए हैं। तुम हमें देखो। हम तुम्हें दिव्य दृष्टि देते हैं। तुम हमारे दर्शनके अधिकारी हो। तुम महामना एवं महाबली पुरातन महर्षि नर हो। तात! ब्रह्माजीकी आज्ञासे तुमने मानव-शरीर ग्रहण किया है

Waiśampāyana berkata: “Arjuna, Arjuna—pandanglah kami, para Lokapāla, para penjaga dunia, yang telah berkumpul di sini. Hari ini kami menganugerahkan kepadamu penglihatan ilahi, sebab engkau layak menyaksikan kami. Lihatlah—semua Lokapāla telah datang. Engkau berhak atas penglihatan ini. Engkau adalah resi purba Nara—berjiwa luhur dan berkekuatan besar. Wahai anak terkasih, atas titah Brahmā engkau mengenakan tubuh manusia.”

Verse 18

पूर्वर्षिरमितात्मा त्वं नरो नाम महाबल: । नियोगाद्‌ ब्रह्मणस्तात मर्त्यतां समुपागत:,अर्जुन! हम सब लोकपाल यहाँ आये हुए हैं। तुम हमें देखो। हम तुम्हें दिव्य दृष्टि देते हैं। तुम हमारे दर्शनके अधिकारी हो। तुम महामना एवं महाबली पुरातन महर्षि नर हो। तात! ब्रह्माजीकी आज्ञासे तुमने मानव-शरीर ग्रहण किया है

Waiśampāyana berkata: “Engkau adalah resi purba, berjiwa tak terbatas—Nara namamu, dan perkasa dalam kekuatan. Wahai anak terkasih, atas penugasan Brahmā engkau memasuki keadaan fana. Arjuna, kami semua Lokapāla telah datang ke sini; pandanglah kami. Kami menganugerahkan kepadamu penglihatan ilahi; engkau layak menerima darśana ini. Engkau adalah resi primordial Nara, berhati agung dan berdaya besar. Atas titah Brahmā engkau mengenakan tubuh manusia.”

Verse 19

त्वया च वसुसम्भूतो महावीर्य: पितामह: । भीष्म: परमधर्मात्मा संसाध्यक्ष रणेडनघ,कर्णश्न सुमहावीर्यस्त्वया वध्यो धनंजय । “अनघ! वसुओंके अंशसे उत्पन्न महापराक्रमी और परम धर्मात्मा पितामह भीष्मको तुम संग्राममें जीत लोगे। भरद्वाजपुत्र द्रोणाचार्यके द्वारा सुरक्षित क्षत्रिय-समुदाय भी, जिसका स्पर्श अग्निके समान भयंकर है, तुम्हारे द्वारा पराजित होगा। कुरुनन्दन! मानव- शरीरमें उत्पन्न हुए महाबली दानव तथा निवातकवच नामक दैत्य भी तुम्हारे हाथसे मारे जायँगे। धनंजय! सम्पूर्ण जगत्‌को उष्णता प्रदान करनेवाले मेरे पिता भगवान्‌ सूर्यदेवके अंशसे उत्पन्न महापराक्रमी कर्ण भी तुम्हारा वध्य होगा

Waiśampāyana berkata: “Wahai yang tak bercela, dalam pertempuran engkau akan menundukkan Bhīṣma, sang kakek agung—lahir dari bagian para Vasu, berdaya perkasa, dan teguh dalam dharma tertinggi. Dan engkau, Dhanaṃjaya, juga akan menjadi pembunuh Karṇa, yang sangat luar biasa kekuatannya.”

Verse 20

क्षत्रं चाग्निसमस्पर्श भारद्वाजेन रक्षितम्‌ | दानवाश्च महावीर्या ये मनुष्यत्वमागता:

Waiśampāyana berkata: “Dan kekuatan Kṣatra—tak tersentuh bagaikan api—dijaga oleh Bhāradvāja (Droṇa). Dan ada pula Dāṇava-Dāṇava perkasa yang telah memasuki keadaan sebagai manusia.”

Verse 21

निवातकवचाश्नैव दानवा: कुरुनन्दन । पितुर्ममांशो देवस्य सर्वलोकप्रतापिन:

Waiśampāyana berkata: “Wahai kebanggaan Kuru, para Dāṇava yang dikenal sebagai Nivātakavaca juga ada (di sana). Mereka seakan-akan merupakan bagian dari ayahku—sang dewa yang wibawanya menundukkan semua dunia.”

Verse 22

अंशाश्च क्षितिसम्प्राप्ता देवदानवरक्षसाम्‌,'शत्रुओंका संहार करनेवाले कुन्तीकुमार! देवताओं, दानवों तथा राक्षसोंके जो अंश पृथ्वीपर उत्पन्न हुए हैं, वे युद्धमें तुम्हारे द्वारा मारे जाकर अपने कर्मफलके अनुसार यथोचित गति प्राप्त करेंगे

Waiśampāyana berkata: “Wahai putra Kuntī, penumpas musuh! Bagian-bagian (jelmaan) para dewa, Dānava, dan Rākṣasa yang telah turun ke bumi akan, ketika gugur oleh tanganmu di medan perang, mencapai tujuan yang layak bagi mereka, sesuai buah perbuatan masing-masing.”

Verse 23

त्वया निपातिता युद्धे स्वकर्मफलनिर्जिताम्‌ । गतिं प्राप्स्यन्ति कौन्तेय यथास्वमरिकर्षण,'शत्रुओंका संहार करनेवाले कुन्तीकुमार! देवताओं, दानवों तथा राक्षसोंके जो अंश पृथ्वीपर उत्पन्न हुए हैं, वे युद्धमें तुम्हारे द्वारा मारे जाकर अपने कर्मफलके अनुसार यथोचित गति प्राप्त करेंगे

Wahai Kuntīputra, penunduk musuh! Mereka yang kau jatuhkan dalam perang akan mencapai jalan hidup (nasib akhir) yang pantas, yang telah mereka peroleh melalui buah karma masing-masing.

Verse 24

अक्षया तव कीर्तिश्व लोके स्थास्यति फाल्गुन । त्वया साक्षान्महादेवस्तोषितो हि महामृथे,'फाल्गुन! संसारमें तुम्हारी अक्षय कीर्ति स्थापित होगी। तुमने यहाँ महासमरमें साक्षात्‌ महादेवजीको संतुष्ट किया है

Phālguna! Kemasyhuranmu akan tegak di dunia ini sebagai sesuatu yang tak binasa; sebab dalam pertempuran agung ini engkau sungguh telah menyenangkan Mahādeva sendiri, berhadapan muka.

Verse 25

लघ्वी वसुमती चापि कर्तव्या विष्णुना सह । गृहाणास्त्रं महाबाहो दण्डमप्रतिवारणम्‌ । अनेनास्त्रेण सुमहत्‌ त्वं हि कर्म करिष्यसि,“महाबाहो! भगवान्‌ श्रीकृष्णके साथ मिलकर तुम्हें इस पृथ्वीका भार भी हलका करना है, अतः यह मेरा दण्डास्त्र ग्रहण करो। इसका वेग कहीं भी कुण्ठित नहीं होता। इसी अस्त्रके द्वारा तुम बड़े-बड़े कार्य सिद्ध करोगे”

Wahai yang berlengan perkasa! Bersama Viṣṇu (Śrī Kṛṣṇa) engkau harus meringankan beban bumi. Maka terimalah senjata Daṇḍa ini—dayanya tak dapat dihalangi di mana pun. Dengan senjata ini engkau akan menuntaskan karya-karya yang sangat agung.

Verse 26

वैशम्पायन उवाच प्रतिजग्राह तत्‌ पार्थो विधिवत्‌ कुरुनन्दन: । समन्त्र॑ सोपचारं च समोक्षविनिवर्तनम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! कुरुनन्दन कुन्तीकुमार अर्जुनने विधिपूर्वक मन्त्र, उपचार, प्रयोग और उपसंहारसहित उस अस्त्रको ग्रहण किया

Waiśampāyana berkata: “Wahai Janamejaya! Pārtha Arjuna, kebanggaan para Kuru, menerima senjata itu dengan tata cara yang semestinya—lengkap dengan mantranya, upacara-ritualnya, cara pemakaiannya, dan metode penarikannya kembali.”

Verse 27

ततो जलधरश्यामो वरुणो यादसां पति: । पश्चिमां दिशमास्थाय गिरमुच्चारयन्‌ प्रभु:,इसके बाद जल-जन्तुओंके स्वामी मेघके समान श्यामकान्तिवाले प्रभावशाली वरुण पश्चिम दिशामें खड़े हो इस प्रकार बोले--

Lalu Varuṇa—berwarna gelap laksana awan hujan, penguasa perkasa para makhluk air—berdiri menghadap arah barat dan, dengan wibawa, mulai berbicara.

Verse 28

पार्थ क्षत्रियमुख्यस्त्वं क्षत्रधर्मे व्यवस्थित: । पश्य मां पृथुताम्राक्ष वरुणो5स्मि जलेश्वर:,'पर्थ! तुम क्षत्रियोंमें प्रधान एवं क्षत्रिय-धर्ममें स्थित हो। विशाल तथा लाल नेत्रोंवाले अर्जुन! मेरी ओर देखो। मैं जलका स्वामी वरुण हूँ

“Wahai Pārtha, engkau yang terdepan di antara para kṣatriya, teguh dalam dharma kṣatriya. Pandanglah aku, wahai Arjuna bermata lebar kemerahan seperti tembaga: akulah Varuṇa, penguasa segala perairan.”

Verse 29

मया समुद्यतान्‌ पाशान्‌ वारुणाननिवारितान्‌ । प्रतिगृह्लीष्व कौन्तेय सरहस्यनिवर्तनम्‌,“कुन्तीकुमार! मेरे दिये हुए इन वरुण-पाशोंको रहस्य और उपसंहारसहित ग्रहण करो। इनके वेगको कोई भी रोक नहीं सकता

“Wahai putra Kuntī, terimalah dariku jerat-jerat Varuṇa ini—telah siap sedia dan tak tertahankan dayanya. Terimalah pula rahasia penggunaannya beserta cara penarikan kembali, agar kuasa dipakai dengan kendali.”

Verse 30

एभिस्तदा मया वीर संग्रामे तारकामये । दैतेयानां सहस्नाणि संयतानि महात्मनाम्‌,“वीर! मैंने इन पाशोंद्वारा तारकामय संग्राममें सहस्रों महाकाय दैत्योंको बाँध लिया था

“Wahai pahlawan, dalam pertempuran yang gemerlap bak bintang itu, dengan ikatan-ikatan inilah dahulu aku mengekang ribuan Daitya—berjiwa besar dan berdaya dahsyat.”

Verse 31

तस्मादिमान्‌ महासत्त्व मत्प्रसादसमुत्थितान्‌ । गृहाण न हि ते मुच्येदन्‍्तको5प्याततायिन:,“अतः महाबली पार्थ! मेरे कृपाप्रसादसे प्रकट हुए इन पाशोंको तुम ग्रहण करो। इनके द्वारा आक्रमण करनेपर मृत्यु भी तुम्हारे हाथसे नहीं छूट सकती

“Karena itu, wahai Pārtha berhati agung, terimalah jerat-jerat ini yang terbit dari anugerahku. Sebab bahkan Maut sendiri, bila datang sebagai penyerang, takkan lolos dari tanganmu.”

Verse 32

अनेन वत्वं यदास्त्रेण संग्रामे विचरिष्यसि । तदा निःक्षत्रिया भूमिर्भविष्यति न संशय:,“इस अस्त्रके द्वारा जब तुम संग्रामभूमिमें विचरण करोगे, उस समय यह सारी वसुन्धरा क्षत्रियोंसे शून्य हो जायगी, इसमें संशय नहीं है”

Ketika engkau menjelajah medan perang dengan senjata ini, maka bumi akan menjadi tanpa para kṣatriya—tanpa keraguan.

Verse 33

वैशम्पायन उवाच ततः कैलासनिलयो धनाध्यक्षो5भ्यभाषत । दत्तेष्वस्त्रेषु दिव्येषु वरुणेन यमेन च,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! वरुण और यमके दिव्यास्त्र प्रदान कर चुकनेपर कैलासनिवासी धनाध्यक्ष कुबेरने कहा--“महाबली बुद्धिमान्‌ पाण्डुनन्दन! मैं भी तुमपर प्रसन्न हूँ। तुम अपराजित वीर हो। तुमसे मिलकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है”

Vaiśampāyana berkata: Lalu Kubera, penguasa kekayaan yang bersemayam di Gunung Kailāsa, berbicara. Setelah senjata-senjata ilahi dianugerahkan oleh Varuṇa dan Yama, Kubera menyapa putra Pāṇḍu itu.

Verse 34

प्रीतो5हमपि ते प्राज्ञ पाण्डवेय महाबल । त्वया सह समागम्य अजितेन तथैव च,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! वरुण और यमके दिव्यास्त्र प्रदान कर चुकनेपर कैलासनिवासी धनाध्यक्ष कुबेरने कहा--“महाबली बुद्धिमान्‌ पाण्डुनन्दन! मैं भी तुमपर प्रसन्न हूँ। तुम अपराजित वीर हो। तुमसे मिलकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है”

Wahai putra Pāṇḍu yang bijak dan perkasa, aku pun berkenan kepadamu. Berjumpa denganmu—yang tak terkalahkan—membuatku sama gembiranya.

Verse 35

सव्यसाचिन्‌ महाबाहो पूर्वदेव सनातन । सहास्माभिर्भवाउ्छान्त: पुराकल्पेषु नित्यश:,“सव्यसाचिन्‌! महाबाहो! पुरातन देव! सनातनपुरुष! पूर्वकल्पोंमें मेरे साथ तुमने सदा तपके द्वारा परिश्रम उठाया है। नरश्रेष्ठ) आज तुम्हें देखकर यह दिव्यास्त्र प्रदान करता हूँ। महाबाहो! इसके द्वारा तुम दुर्जय मानवेतर प्राणियोंको भी जीत लोगे

Wahai Savyasācin, yang berlengan perkasa—dewa purba, insan abadi! Pada kalpa-kalpa terdahulu engkau senantiasa bersama kami menanggung tapa dan jerih payah.

Verse 36

दर्शनात्‌ ते व्िदं दिव्यं प्रदिशामि नरर्षभ । अमनुष्यान्‌ महाबाहो दुर्जयानपि जेष्यसि,“सव्यसाचिन्‌! महाबाहो! पुरातन देव! सनातनपुरुष! पूर्वकल्पोंमें मेरे साथ तुमने सदा तपके द्वारा परिश्रम उठाया है। नरश्रेष्ठ) आज तुम्हें देखकर यह दिव्यास्त्र प्रदान करता हूँ। महाबाहो! इसके द्वारा तुम दुर्जय मानवेतर प्राणियोंको भी जीत लोगे

Wahai yang terbaik di antara manusia, karena engkau tampak di hadapanku, kuanugerahkan kepadamu senjata ilahi ini. Wahai yang berlengan perkasa, dengannya engkau akan menaklukkan bahkan makhluk non-manusia yang sukar ditundukkan.

Verse 37

मत्तश्वैव भवानाशा गृल्लात्वस्त्रमनुत्तमम्‌ | अनेन त्वमनीकानि धार्तराष्ट्रस्य धक्ष्यसि,“तुम मुझसे शीघ्र ही इस अत्युत्तम अस्त्रको ग्रहण कर लो। तुम इसके द्वारा दुर्योधनकी सारी सेनाओंको जलाकर भस्म कर डालोगे

Waiśampāyana berkata: “Terimalah segera dariku senjata yang tiada banding ini. Dengan itu engkau akan membakar hingga menjadi abu seluruh formasi tempur putra Dhṛtarāṣṭra.”

Verse 38

तदिदं प्रतिगृह्नीष्व अन्तर्धानं प्रियं मम । ओजस्तेजोद्युतिकरं प्रस्वापनमरातिनुत्‌,“यह मेरा परम प्रिय अन्तर्धान नामक अस्त्र है। इसे ग्रहण करो। यह ओज, तेज और कान्ति प्रदान करनेवाला, शत्रुसेनाकों सुला देनेवाला और समस्त वैरियोंका विनाश करनेवाला है

Terimalah ini—senjata kesayanganku bernama Antardhāna (Menghilang). Ia menganugerahkan daya, teja yang menyala, dan cahaya wibawa; ia dapat menidurkan bala musuh dan meruntuhkan kekuatan para lawan.

Verse 39

महात्मना शड्करेण त्रिपुरं निहतं यदा । तदैतदस्त्र॑ निर्मुक्ते येन दग्धा महासुरा:,“परमात्मा शंकरने जब त्रिपुरासुरके तीनों नगरोंका विनाश किया था, उस समय इस अस्त्रका उनके द्वारा प्रयोग किया गया था; जिससे बड़े-बड़े असुर दग्ध हो गये थे

Ketika Śaṅkara yang berhati agung membinasakan Tripura, senjata inilah yang dilepaskan; olehnya para Asura perkasa terbakar hingga menjadi abu.

Verse 40

इस प्रकार श्रीमह्या भारत वनपवके अन्तर्गत कैरातपर्वमें शिवप्रस्थानविषयक चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ,त्वदर्थमुद्यतं चेद॑ मया सत्यपराक्रम । त्वमहों धारणे चास्य मेरुप्रतिमगौरव 'सत्यपराक्रमी और मेरुके समान गौरवशाली पार्थ! तुम्हारे लिये यह अस्त्र मैंने उपस्थित किया है। तुम इसे धारण करनेके योग्य हो”

Demikian berakhir bab keempat puluh dalam Kirāta-parva pada Vana Parva Mahābhārata yang mulia, mengenai keberangkatan Arjuna mencari Śiva. Wahai Pārtha, yang keberaniannya teguh dalam kebenaran, yang wibawanya laksana Gunung Meru—demi engkau senjata ini telah kusiapkan dan kupersembahkan; engkaulah yang layak memikulnya.

Verse 41

ततोडर्जुनो महाबाहुर्विधिवत्‌ कुरुनन्दन: । कौबेरमधिजग्राह दिव्यमस्त्र महाबल:,तब कुरुकुलका आनन्द बढ़ानेवाले महाबाहु महाबली अर्जुनने कुबेरके उस “अन्तर्धान! नामक दिव्य अस्त्रको ग्रहण किया इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि कैरातपर्वणि देवप्रस्थाने एकचत्वारिंशो 5ध्याय: ।। ४१ || इस प्रकार श्रीमह्ाभारत वनपर्वके अन्तर्गत कैरातपर्वमें देवप्रस्थानविषयक इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

Lalu Arjuna, yang berlengan perkasa, kebanggaan wangsa Kuru, menerimanya dengan tata cara yang semestinya dari Kubera: sebuah senjata ilahi yang dahsyat. Demikian berakhir bab keempat puluh satu dalam Kirāta-parva pada Vana Parva, mengenai keberangkatan menuju para dewa.

Verse 42

ततो<ब्रवीद्‌ देवराज: पार्थमक्लिष्टकारिणम्‌ । सान्त्वयःश्लक्ष्णया वाचा मेघदुन्दुभिनि:स्वन:,तदनन्तर देवराज इन्द्रने अनायास ही महान्‌ कर्म करनेवाले कुन्तीकुमार अर्जुनको मीठे वचनोंद्वारा सान्त्वना देते हुए मेघ और दुन्दुभिके समान गम्भीर स्वरसे कहा--

Kemudian Dewa-raja Indra, dengan suara berat laksana guntur awan dan tabuh dundubhi, menenangkan Pārtha—putra Kuntī yang tak mengenal lelah dalam karya agung—dengan kata-kata lembut, lalu bersabda—

Verse 43

कुन्तीमातर्महाबाहो त्वमीशान: पुरातन: । परां सिद्धिमनुप्राप्त: साक्षाद्‌ देवगतिं गत:,“महाबाहु कुन्तीकुमार! तुम पुरातन शासक हो। तुम्हें उत्तम सिद्धि प्राप्त हुई है। तुम साक्षात्‌ देवगतिको प्राप्त हुए हो

Wahai putra Kuntī yang berlengan perkasa, engkau adalah penguasa purba, tuan yang sejak dahulu. Engkau telah meraih kesempurnaan tertinggi; sungguh, engkau telah mencapai keadaan ilahi secara langsung.

Verse 44

देवकार्य तु सुमहत्‌ त्वया कार्यमरिंदम । आरोढ्व्यस्त्वया स्वर्ग: सज्जीभव महाद्युते,'शत्रुदमन! तुम्हें देवताओंका बड़ा भारी कार्य सिद्ध करना है। महाद्युते! तैयार हो जाओ तुम्हें स्वर्गलोकमें चलना है

Wahai penakluk musuh, suatu tugas yang amat besar bagi para dewa harus engkau selesaikan. Wahai yang bercahaya perkasa, bersiaplah—engkau harus naik ke surga.

Verse 45

रथो मातलिसंयुक्त आगन्ता त्वत्कृते महीम्‌ तत्र ते5हं प्रदास्यामि दिव्यान्यस्त्राणि कौरव,“मातलिके द्वारा जोता हुआ दिव्य रथ तुम्हें लेनेके लिये पृथ्वीपर आनेवाला है। कुरुनन्दन! वहीं (स्वर्गमें) मैं तुम्हें दिव्यास्त्र प्रदान करूँगा”

Sebuah kereta surgawi, dengan Mātali sebagai kusirnya, akan turun ke bumi demi dirimu. Di sana, wahai keturunan Kuru, akan kuberikan kepadamu senjata-senjata ilahi.

Verse 46

तान्‌ दृष्टवा लोकपालांस्तु समेतान्‌ गिरिमूर्थनि । जगाम विस्मयं धीमान्‌ कुन्तीपुत्रो धनंजय:,उस पर्वतशिखरपर एकत्र हुए उन सभी लोक-पालोंका दर्शन करके परम बुद्धिमान्‌ धनंजयको बड़ा विस्मय हुआ

Melihat para Lokapāla berkumpul di puncak gunung itu, Dhanañjaya—putra Kuntī yang bijaksana—tertegun dalam keheranan yang mendalam.

Verse 47

ततोडर्जुनो महातेजा लोकपालान्‌ समागतान्‌ | पूजयामास विधिवद्‌ वाग्भिरद्धि: फलैरपि,तत्पश्चात्‌ महातेजस्वी अर्जुनने वहाँ पधारे हुए लोकपालोंका मीठे वचन, जल और फलोंके द्वारा भी विधिपूर्वक पूजन किया

Kemudian Arjuna yang bercahaya oleh tenaga agung menghormati para Lokapāla yang telah berkumpul. Menurut tata cara yang semestinya, ia menyambut mereka dengan kata-kata santun, dengan air jamuan, dan dengan buah-buahan.

Verse 48

ततः प्रतिययुर्देवा: प्रतिमान्य धनंजयम्‌ । यथागतेन विबुधा: सर्वे काममनोजवा:,इसके बाद इच्छानुसार मनके समान वेगवाले समस्त देवता अर्जुनके प्रति सम्मान प्रकट करके जैसे आये थे वैसे ही चले गये

Sesudah itu para dewa, setelah memuliakan Dhanañjaya, pun kembali berangkat. Semua makhluk surgawi yang secepat pikiran itu pergi sebagaimana mereka datang, menurut kehendak mereka sendiri.

Verse 49

ततोडर्जुनो मुर्दं लेभे लब्धास्त्र: पुरुषर्षभ: । कृतार्थमथ चात्मानं स मेने पूर्णणमानसम्‌,तदनन्तर देवताओंसे दिव्यास्त्र प्राप्त करके पुरुषोत्तम अर्जुनको बड़ी प्रसन्नता हुई; उन्होंने अपने-आपको कृतार्थ एवं पूर्णमनोरथ माना

Kemudian Arjuna, sang banteng di antara manusia, setelah memperoleh senjata-senjata ilahi, merasa kepalanya terangkat oleh kehormatan. Ia menganggap dirinya telah mencapai tujuan dan batinnya pun sepenuhnya puas.

Verse 213

कर्णश्न सुमहावीर्यस्त्वया वध्यो धनंजय । “अनघ! वसुओंके अंशसे उत्पन्न महापराक्रमी और परम धर्मात्मा पितामह भीष्मको तुम संग्राममें जीत लोगे। भरद्वाजपुत्र द्रोणाचार्यके द्वारा सुरक्षित क्षत्रिय-समुदाय भी, जिसका स्पर्श अग्निके समान भयंकर है, तुम्हारे द्वारा पराजित होगा। कुरुनन्दन! मानव- शरीरमें उत्पन्न हुए महाबली दानव तथा निवातकवच नामक दैत्य भी तुम्हारे हाथसे मारे जायँगे। धनंजय! सम्पूर्ण जगत्‌को उष्णता प्रदान करनेवाले मेरे पिता भगवान्‌ सूर्यदेवके अंशसे उत्पन्न महापराक्रमी कर्ण भी तुम्हारा वध्य होगा

Vaiśampāyana berkata: “Wahai Dhanañjaya, bahkan Karṇa yang berdaya-berani amat besar akan gugur oleh tanganmu. Wahai yang tak bernoda, engkau akan menaklukkan di medan perang kakek agung Bhīṣma—sangat saleh dan mahaperkasa—yang lahir dari bagian para Vasu. Pasukan para kṣatriya yang dilindungi Droṇācārya, putra Bharadvāja—mengerikan disentuh bagaikan api—juga akan kau kalahkan. Wahai kebanggaan Kuru, para Dānava perkasa yang lahir dalam tubuh manusia, dan para Daitya bernama Nivātakavaca, akan kau bunuh dengan tanganmu. Dan Karṇa pula—lahir dari bagian Sūrya, ayahku, Dewa Matahari yang memberi panas kepada seluruh jagat—ditakdirkan jatuh olehmu, wahai Dhanañjaya.”

Frequently Asked Questions

The risk is misuse of an overwhelmingly potent astra: Śiva states it must not be released impulsively or by an insufficiently qualified agent, because disproportionate deployment could destabilize or devastate the world-order.

Capability requires governance: the highest power is legitimate only when paired with restraint, secrecy, and situational appropriateness, making ethical control a prerequisite to strategic effectiveness.

Yes, indirectly: the text signals the weapon’s exceptional status through exclusivity claims (even major deities do not fully know it), confidential pedagogy, and cosmic omens—functioning as a narrative certification that comprehension and use demand elevated qualification.