Adhyaya 168
Vana ParvaAdhyaya 16861 Verses

Adhyaya 168

Adhyāya 168: Arjuna’s counters to māyā-rains and the onset of darkness (Nivātakavaca engagement)

Upa-parva: Nivātakavaca-yuddha (Arjuna’s engagement with the Nivātakavacas)

Arjuna reports a sequence of escalating, environment-based assaults: a massive stone-rain (aśmavarṣa) that presses in from all sides, which he pulverizes with Indra-empowered arrows. As the stone fragments fall like sparks, the encounter shifts to an intense water-rain of thick torrents that obscure space and orientation; Arjuna then deploys a drying/absorbing divine weapon (viśoṣaṇa-astra) taught by Indra to neutralize the deluge. The Dānavas answer by projecting further māyā—fire and wind—which Arjuna counters with the water-weapon (salilāstra) and a mountain/rock-weapon (śaila-mahāstra) to check the gale. A compounded, fear-inducing ‘rain’ of dreadful astras follows, culminating in dense darkness that disorients horses and causes Mātali to lose control and drop his golden goad. Mātali, frightened and cognitively overwhelmed, recalls having witnessed earlier cosmic battles (including Vṛtra and Śambara conflicts) yet claims never to have experienced such a condition, interpreting it as an exceptional, near-apocalyptic scenario. Arjuna steadies himself, reassures Mātali, and releases a delusive counter-māyā (mohanī astra-māyā) for the benefit of the gods. Despite momentary restoration of light, the Dānavas repeatedly reassert concealment; Arjuna notes that enemies vanish under māyā, and he targets openings when they present themselves, continuing the engagement amid intermittent visibility.

Chapter Arc: अर्जुन अपनी तपस्या-यात्रा और स्वर्ग-प्रवास से लौटकर युधिष्ठिर के सम्मुख आता है; प्रणाम करते ही धर्मराज का हर्ष गद्गद हो उठता है और वे पूछ बैठते हैं—स्वर्ग में समय कैसे बीता, इन्द्र को कैसे तुष्ट किया, और दिव्यास्त्र कैसे प्राप्त हुए? → अर्जुन क्रमशः अपने अनुभवों का वृत्तांत सुनाता है—किरात-वेषधारी शंकर का रहस्योद्घाटन, फिर दिव्य-स्वरूप में महेश्वर का प्रकट होना, और वह क्षण जब देवाधिदेव स्वयं सामने खड़े होकर कहते हैं: ‘तुष्टोऽस्मि… जो मनोगत हो, मांगो।’ साथ ही अस्त्र-विद्या की भयावह मर्यादा भी उद्घाटित होती है—अल्प-शक्ति वाले पर प्रयोग करने से यह समस्त जगत को दग्ध कर सकती है। → भगवान् वृषभध्वज (उमा सहित) अर्जुन को प्रत्यक्ष वर देते हैं—पाशुपत (रौद्र) महास्त्र का प्रदान, तथा धनुष और अक्षय बाणों से भरे तरकस आदि दिव्य आयुधों का सौंपा जाना; साथ ही कठोर चेतावनी कि इसका प्रयोग केवल प्रतिघात/निवारण और परम-आवश्यकता में ही हो। → अर्जुन का तप, शौर्य और संयम देव-स्वीकृति पाता है; युधिष्ठिर को यह आश्वासन मिलता है कि पाण्डवों के पास अब ऐसे अस्त्र हैं जो महाविपत्ति में भी रक्षा कर सकते हैं—पर उनकी शक्ति के साथ उत्तरदायित्व भी जुड़ा है। → पाशुपतास्त्र का प्राप्त होना भविष्य के महासंघर्ष की छाया डालता है—अब प्रश्न यह रह जाता है कि धर्म की मर्यादा में रहते हुए, कब और किस सीमा तक इन अस्त्रों का उपयोग होगा।

Shlokas

Verse 1

/ (दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल १८ श्लोक हैं) हि >> [हुक माप आप८ सप्तषष्ट्यांधेकशततमो< ध्याय: अर्जुनके द्वारा अपनी तपस्या-यात्राके वृत्तान्तका वर्णन, भगवान्‌ शिवके साथ संग्राम और पाशुपतास्त्र-प्राप्तिकी कथा वैशम्पायन उवाच यथागतं गते शक्रे भ्रातृभि: सह सज्भतः | कृष्णया चैव बीभत्सुर्थर्मपुत्रमपूजयत्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! देवराज इन्द्रके चले जानेपर भाइयों तथा द्रौोपदीके साथ मिलकर अर्जुनने धर्मपुत्र युधिष्ठिरको प्रणाम किया

Vaiśampāyana berkata: Setelah Śakra (Indra) pergi sebagaimana ia datang, Arjuna—yang kembali berkumpul dengan saudara-saudaranya dan dengan Kṛṣṇā Draupadī—memberi hormat penuh bakti kepada Yudhiṣṭhira, putra Dharma.

Verse 2

अभिवादयमान त॑ मूर्ध्न्युपाप्राय पाण्डवम्‌ । हर्षगद्गदया वाचा प्रद्ृष्टो$र्जुनमब्रवीत्‌,पाण्डुनन्दन अर्जुनको प्रणाम करते देख युधिष्छिर बड़े प्रसन्न हुए एवं उनका मस्तक सूँघकर हर्षगद्गद-वाणीमें इस प्रकार बोले--

Waiśampāyana berkata— Melihat Arjuna, putra Pāṇḍu, menundukkan kepala memberi hormat, Yudhiṣṭhira dipenuhi sukacita. Ia menariknya mendekat, menghirup harum kepalanya dengan kasih, lalu dengan suara bergetar oleh bahagia berkata kepada Arjuna.

Verse 3

कथमर्जुन कालो<यं स्वर्गे व्यतिगतस्तव । कथं चास्त्राण्यवाप्तानि देवराजश्न तोषित:,“अर्जुन! स्वर्गमें तुम्हारा यह समय किस प्रकार बीता? कैसे तुमने दिव्यास्त्र प्राप्त किये और कैसे देवराज इन्द्रको संतुष्ट किया?

Waiśampāyana berkata— “Arjuna, bagaimana masa ini engkau lalui di surga? Bagaimana engkau memperoleh senjata-senjata ilahi, dan dengan cara apa engkau menyenangkan Indra, raja para dewa?”

Verse 4

सम्यग वा ते गृहीतानि कच्चिदस्त्राणि पाण्डव । कच्चित्‌ सुराधिप: प्रीतो रुद्रो वास्त्राण्यदात्‌ तव,'पाण्डुनन्दन! क्या तुमने सभी अस्त्र अच्छी तरह सीख लिये? क्या देवराज इन्द्र अथवा भगवान्‌ रुद्रने प्रसन्न होकर तुम्हें अस्त्र प्रदान किये हैं?

Waiśampāyana berkata— “Wahai Pāṇḍava, apakah senjata-senjata yang engkau terima telah engkau kuasai dengan sempurna? Dan apakah Indra, penguasa para dewa, atau Rudra, karena berkenan, telah menganugerahkan kepadamu senjata-senjata ilahi?”

Verse 5

यथा दृष्टश्न॒ ते शक्रो भगवान्‌ वा पिनाकधृक्‌ । यथैवास्त्राण्यवाप्तानि यथैवाराधितश्ष ते,'शत्रुदमन! तुमने जिस प्रकार देवराज इन्द्रका दर्शन किया है अथवा जैसे पिनाकधारी भगवान्‌ शिवको देखा है, जिस प्रकार तुमने सब अस्त्रोंकी शिक्षा प्राप्त की है और जैसे तुम्हारेद्वारा देवाराधनका कार्य सम्पादित हुआ है, वह सब बताओ। भगवान्‌ इन्द्रने अभी- अभी कहा था कि “अर्जुनने मेरा अत्यन्त प्रिय कार्य सम्पन्न किया है” सो वह उनका कौन- सा प्रिय कार्य था, जिसे तुमने सम्पन्न किया है

Waiśampāyana berkata— “Wahai penakluk musuh, ceritakan semuanya tepat sebagaimana terjadi: bagaimana engkau berjumpa dengan Śakra (Indra), atau bagaimana engkau melihat Sang Bhagavān pemanggul Pināka (Śiva); bagaimana engkau memperoleh senjata-senjata surgawi; dan bagaimana pemujaanmu kepada para dewa berhasil. Dan karena Indra berkata, ‘Arjuna telah menuntaskan tugas yang paling kukasihi,’ apakah tugas tercinta itu yang engkau laksanakan?”

Verse 6

यथोक्तवांस्त्वां भगवान्‌ शतक्रतुररिंदम । कृतप्रियस्त्वयास्मीति तस्य ते कि प्रियं कृतम्‌,'शत्रुदमन! तुमने जिस प्रकार देवराज इन्द्रका दर्शन किया है अथवा जैसे पिनाकधारी भगवान्‌ शिवको देखा है, जिस प्रकार तुमने सब अस्त्रोंकी शिक्षा प्राप्त की है और जैसे तुम्हारेद्वारा देवाराधनका कार्य सम्पादित हुआ है, वह सब बताओ। भगवान्‌ इन्द्रने अभी- अभी कहा था कि “अर्जुनने मेरा अत्यन्त प्रिय कार्य सम्पन्न किया है” सो वह उनका कौन- सा प्रिय कार्य था, जिसे तुमने सम्पन्न किया है

Waiśampāyana berkata— “Wahai penunduk musuh, Sang Bhagavān Śatakratu (Indra) berkata kepadamu demikian dan menyatakan, ‘Engkau telah melakukan sesuatu yang kukasihi.’ Maka, perbuatan tercinta apakah yang engkau lakukan baginya?”

Verse 7

एतदिच्छाम्यहं श्रीतुं विस्तरेण महाद्युते । यथा तुष्टो महादेवो देवराजस्तथानघ,“महातेजस्वी वीर! मैं ये सब बातें विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ। शत्रुओंका दमन करनेवाले निष्पाप अर्जुन! जिस प्रकार तुम्हारे ऊपर महादेवजी तथा देवराज इन्द्र संतुष्ट हुए और वज्रधारी इन्द्रका जो प्रिय कार्य तुमने सम्पन्न किया है, वह सब पूर्णरूपसे बताओ

Waiśampāyana berkata: “Wahai yang bercahaya perkasa, aku ingin mendengar semuanya dengan rinci—bagaimana Mahādewa dan juga raja para dewa menjadi berkenan kepadamu, wahai penakluk musuh yang tanpa noda.”

Verse 8

यच्चापि वज्पाणेस्तु प्रियं कृतमरिंदम । एतदाख्याहि मे सर्वमखिलेन धनंजय,“महातेजस्वी वीर! मैं ये सब बातें विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ। शत्रुओंका दमन करनेवाले निष्पाप अर्जुन! जिस प्रकार तुम्हारे ऊपर महादेवजी तथा देवराज इन्द्र संतुष्ट हुए और वज्रधारी इन्द्रका जो प्रिय कार्य तुमने सम्पन्न किया है, वह सब पूर्णरूपसे बताओ

Dan, wahai Dhanañjaya penunduk musuh, ceritakan kepadaku sepenuhnya perbuatan yang menyenangkan yang engkau lakukan bagi Indra sang pemegang wajra; aku ingin mendengar seluruh kisahnya dengan lengkap.

Verse 9

अजुन उवाच शृणु हन्त महाराज विधिना येन दृष्टवान्‌ | शतक्रतुमहं देव॑ं भगवन्तं च शड्करम्‌,अर्जुन बोले--महाराज! मैंने जिस विधिसे देवराज इन्द्र तथा भगवान्‌ शंकरका दर्शन किया था, वह सब बतलाता हूँ, सुनिये! शत्रुओंका मर्दन करनेवाले नरेश! आपकी बतायी हुई विद्याको ग्रहण करके आपहीके आदेशसे मैं तपस्या करनेके लिये वनकी ओर प्रस्थित हुआ

Arjuna berkata: “Dengarkan, wahai Maharaja. Akan kuceritakan tata cara bagaimana aku memperoleh darśana Indra, sang Śatakratu, dan Bhagavān Śaṅkara.”

Verse 10

विद्यामधीत्य तां राजंस्त्वयोक्तामरिमर्दन । भवता च समादिष्टस्तपसे प्रस्थितो वनम्‌,अर्जुन बोले--महाराज! मैंने जिस विधिसे देवराज इन्द्र तथा भगवान्‌ शंकरका दर्शन किया था, वह सब बतलाता हूँ, सुनिये! शत्रुओंका मर्दन करनेवाले नरेश! आपकी बतायी हुई विद्याको ग्रहण करके आपहीके आदेशसे मैं तपस्या करनेके लिये वनकी ओर प्रस्थित हुआ

Wahai Raja, penghancur musuh, setelah mempelajari pengetahuan suci yang engkau ajarkan, dan atas perintahmu sendiri, aku berangkat ke hutan untuk menjalani tapa.

Verse 11

भगुतुड़्मथो गत्वा काम्यकादास्थितस्तप: । एकरात्रोषित: कज्चिदपश्यं ब्राह्मणं पथि,काम्यक वनसे चलकर तपस्यामें पूरी आशा रखकर मैं भृगुतुंग पर्वतपर पहुँचा और वहाँ एक रात रहकर जब आगे बढ़ा, तब मार्गमें किसी ब्राह्मणदेवताका मुझे दर्शन हुआ

Setelah meninggalkan hutan Kāmyaka dan meneguhkan tekad untuk bertapa, aku pergi ke Bhṛgutunga. Di sana aku bermalam satu malam; lalu ketika melanjutkan perjalanan, di jalan aku melihat seorang brāhmaṇa.

Verse 12

स मामपृच्छत्‌ कौन्तेय क्वासि गन्ता ब्रवीहि मे । तस्मा अवितथं सर्वमन्रुवं कुरुनन्दन,उन्होंने मुझसे कहा--“कुन्तीनन्दन! कहाँ जाते हो? मुझे ठीक-ठीक बताओ।” तब मैंने उनसे सब कुछ सच-सच बता दिया

Ia bertanya kepadaku, “Wahai putra Kuntī, ke mana engkau pergi? Katakan kepadaku dengan jelas.” Maka, wahai kebanggaan Kuru, aku menjawabnya dengan sebenar-benarnya, tanpa memutarbalikkan, dan mengungkapkan semuanya sebagaimana adanya.

Verse 13

स तथ्यं मम तच्छुत्वा ब्राह्मणो राजसत्तम | अपूजयत मां राजन प्रीतिमांश्वाभवन्‍न्मयि,नृपश्रेष्ठ! ब्राह्मणदेवताने मेरी यथार्थ बातें सुनकर मेरी प्रशंसा की और मुझपर बड़े प्रसन्न हुए

Wahai raja terbaik, setelah mendengar kata-kataku yang benar, sang Brahmana memuliakanku; dan, wahai Raja, ia pun dipenuhi rasa kasih dan suka cita kepadaku.

Verse 14

ततो मामब्रवीत्‌ प्रीतस्तप आतिष्ठ भारत । तपस्वी नचिरेण त्वं द्रक्ष्स्से विबुधाधिपम्‌,तत्पश्चात्‌ उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक कहा--“भारत! तुम तपस्याका आश्रय लो! तपमें प्रवृत्त होनेपर तुम्हें शीघ्र ही देवराज इन्द्रका दर्शन होगा”

Kemudian, dengan hati gembira, ia berkata kepadaku: “Wahai Bhārata, berlindunglah pada tapa—jalankan pertapaan. Bila engkau teguh dalam laku asketis, tak lama lagi engkau akan memandang penguasa para dewa, Indra.”

Verse 15

ततो<हं वचनात्‌ तस्य गिरिमारुह्मु शैशिरम्‌ । तपो5तप्यं महाराज मासं मूलूफलाशन:,महाराज! उनके इस आदेशको मानकर मैं हिमालय पर्वतपर आरूढ़ हो तपस्यामें संलग्न हो गया और एक मासतक केवल फल-फूल खाकर रहा

Wahai Maharaja, menaati titahnya, aku mendaki gunung yang dingin dan menjalankan tapa; selama sebulan penuh aku hidup hanya dari umbi-umbian dan buah-buahan.

Verse 16

द्वितीयश्षापि मे मासो जल॑ भक्षयतो गत: । निराहारस्तृतीये5थ मासे पाण्डवनन्दन,इसी प्रकार मैंने दूसरा महीना भी केवल जल पीकर बिताया। पाण्डवनन्दन! तीसरे महीनेमें मैं पूर्णतः निराहार रहा। चौथे महीनेमें मैं ऊपरको हाथ उठाये खड़ा रहा। इतनेपर भी मेरा बल क्षीण नहीं हुआ, यह एक आश्वर्यकी-सी बात हुई

Demikian pula bulan keduaku berlalu dengan hanya bertahan pada air. Lalu, wahai kebanggaan para Pāṇḍava, pada bulan ketiga aku sama sekali tidak menyantap apa pun.

Verse 17

ऊर्ध्वबाहुश्नतुर्थ तु मासमस्मि स्थितस्तदा । नच मे हीयते प्राणस्तदद्भुतमिवाभवत्‌,इसी प्रकार मैंने दूसरा महीना भी केवल जल पीकर बिताया। पाण्डवनन्दन! तीसरे महीनेमें मैं पूर्णतः निराहार रहा। चौथे महीनेमें मैं ऊपरको हाथ उठाये खड़ा रहा। इतनेपर भी मेरा बल क्षीण नहीं हुआ, यह एक आश्वर्यकी-सी बात हुई

Pada bulan keempat, aku berdiri dengan kedua lengan terangkat ke atas; namun daya hidupku tidak berkurang—seakan-akan suatu keajaiban.

Verse 18

पज्चमे त्वथ सम्प्राप्ते प्रथमे दिवसे गते । वराहसंस्थितं भूतं मत्समीपं समागमत्‌,पाँचवाँ महीना प्रारम्भ होनेपर जब एक दिन बीत गया तब दूसरे दिन एक शूकररूपधारी जीव मेरे निकट आया

Ketika bulan kelima tiba dan hari pertama telah berlalu, pada hari berikutnya datang mendekat kepadaku suatu makhluk yang mengambil wujud babi hutan (varāha).

Verse 19

निघ्नन्‌ प्रोथेन पृथिवीं विलिखंश्ररणैरपि । सम्मार्जञ्जठरेणोर्वी विवर्तश्न मुहुर्मुहु:,वह अपनी थूथुनसे पृथ्वीपर चोट करता और पैरोंसे धरती खोदता था। बार-बार लेटकर वह अपने पेटसे वहाँकी भूमिको ऐसा स्वच्छ कर देता था, मानो उसपर झाड़ दिया गया हो

Ia menghantam tanah dengan moncongnya dan bahkan mengeriknya dengan tanduk; dengan kaki-kakinya ia menggali bumi. Berulang kali ia merebahkan diri dan dengan perutnya menggosok tanah hingga bersih, seolah-olah tempat itu telah disapu.

Verse 20

अनु तस्यापरं भूतं महत्‌ कैरातसंस्थितम्‌ । भधनुर्बाणासिमत्‌ प्राप्तं सत्रीगणानुगतं तदा,उसके पीछे किरात-जैसी आकृतिमें एक महान्‌ पुरुषका दर्शन हुआ। उसने धनुष-बाण और खड्ग ले रखे थे। उसके साथ स्त्रियोंका एक समुदाय भी था

Di belakangnya tampak sesosok agung dalam samaran Kirāta (pemburu gunung). Ia membawa busur dan anak panah serta sebilah pedang; saat itu ia disertai rombongan perempuan.

Verse 21

ततो<हं धनुरादाय तथाक्षय्ये महेषुधी । अताडयं शरेणाथ तद्‌ भूतं लोमहर्षणम्‌

Lalu aku mengangkat busurku dan juga kedua tabung panah besarku yang tak pernah habis; kemudian aku menghantam makhluk yang menggetarkan bulu roma itu dengan sebuah anak panah.

Verse 22

तब मैंने धनुष तथा अक्षय तरकस लेकर एक बाणके द्वारा उस रोमांचकारी सूकरपर आघात किया ।। युगपत्‌ तं किरातस्तु विकृष्य बलवद्‌ धनुः । अभ्याजचघ्ने दृढतरं कम्पयन्निव मे मन:,साथ ही किरातने भी अपने सुदृढ़ धनुषको खींचकर उसपर गहरी चोटकी, जिससे मेरा हृदय कम्पित-सा हो उठा

Lalu aku mengangkat busurku dan tabung panahku yang tak habis-habis, dan dengan satu anak panah kutikam babi hutan yang menggetarkan bulu roma itu. Pada saat yang sama, Kirāta menarik busurnya yang perkasa hingga penuh dan menghantamnya dengan pukulan yang lebih keras—hingga hatiku seakan bergetar.

Verse 23

स तु मामब्रवीद्‌ राजन्‌ मम पूर्वपरिग्रह: । मृगयाधर्ममुत्स॒ज्य किमर्थ ताडितस्त्वया,राजन्‌! फिर वह किरात मुझसे बोला--'“यह सूअर तो पहले मेरा निशाना बन चुका था, फिर तुमने आखेटके नियमको छोड़कर उसपर प्रहार क्यों किया?”

Lalu pemburu itu berkata kepadaku, “Wahai Raja, babi hutan ini telah lebih dahulu menjadi buruanku. Mengapa engkau memukulnya dengan meninggalkan tata-aturan perburuan?”

Verse 24

एष ते निशितैर्बाणैर्दर्प हन्मि स्थिरो भव । स धनुष्मान्‌ महाकायस्ततो मामभ्यभाषत,इतना ही नहीं उस विशालकाय एवं धनुर्धर किरातने उस समय मुझसे यह भी कहा --'अच्छा, ठहर जाओ। मैं अपने पैने बाणोंसे अभी तुम्हारा घमंड चूर-चूर किये देता हूँ!

Aku berkata, “Berdirilah teguh; dengan anak panah yang tajam ini akan kuhancurkan kesombonganmu.” Maka pemanah Kirāta itu—bertubuh besar dan perkasa—menyahut tantanganku.

Verse 25

ततो गिरिमिवात्यर्थमावृणोन्मां महाशरै: । तं॑ चाहं शरवर्षेण महता समवाकिरम्‌,ऐसा कहकर उस भीलने जैसे पर्वतपर वर्षा हो, उस प्रकार महान्‌ बाणोंकी बौछार करके मुझे सब ओरसे ढक दिया; तब मैंने भी भारी बाणवर्षा करके उसे सब ओरसे आच्छादित कर दिया

Kemudian ia menutupi diriku dengan anak panah besar-besar, seakan sebuah gunung diselimuti hujan deras. Sebagai balasan, aku pun menghujaninya dengan panah yang dahsyat dari segala penjuru.

Verse 26

ततः शरैर्दीप्तमुखैर्यन्त्रितैरनुमन्त्रितै: । प्रत्यविध्यमहं तं॑ तु वजैरिव शिलोच्चयम्‌,तदनन्तर जैसे वज्रसे पर्वतपर आघात किया जाय, उसी प्रकार प्रज्वलित मुखवाले अभिमन्त्रित और खूब खींचकर छोड़े हुए बाणोंद्वारा मैंने उसे बार-बार घायल किया

Sesudah itu, dengan anak panah bermata menyala—ditarik hingga tegang dan dikuatkan oleh mantra—aku menghantamnya berulang-ulang, bagaikan gugusan batu dipukul oleh halilintar.

Verse 27

तस्य तच्छतथा रूपमभवच्च सहस्रधा । तानि चास्य शरीराणि शरैरहमताडयम्‌,उस समय उसके सैकड़ों और सहस्रों रूप प्रकट हुए और मैंने उसके सभी शरीरोंपर बाणोंसे गहरी चोट पहुँचायी

Saat itu wujudnya menampakkan diri dalam ratusan dan ribuan rupa; dan aku menghujamkan anak panahku ke semua tubuhnya itu, melukainya dengan dalam.

Verse 28

पुनस्तानि शरीराणि एकीभूतानि भारत । अदृश्यन्त महाराज तान्यहं व्यधमं पुन:,भारत! फिर उसके वे सारे शरीर एकरूप दिखायी दिये। महाराज! उस एकरूपमें भी मैंने उसे पुन: अच्छी तरह घायल किया

Kemudian, wahai Bhārata, semua tubuh itu tampak kembali menyatu menjadi satu wujud. Wahai Raja Agung, bahkan dalam wujud yang tunggal itu pun aku menghantamnya lagi, melukainya dengan hebat.

Verse 29

अर्णुर्ब॑हच्छिरा भूत्वा बृहच्चाणुशिरा: पुन: । एकीभूतस्तदा राजन्‌ सो<भ्यवर्तत मां युधि,कभी उसका शरीर तो बहुत छोटा हो जाता, परंतु मस्तक बहुत बड़ा दिखायी देता था। फिर वह विशाल शरीर धारण कर लेता और मस्तक बहुत छोटा बना लेता था। राजन! अन्तमें वह एक ही रूपमें प्रकट होकर युद्धमें मेरा सामना करने लगा। भरतर्षभ! जब मैं बाणोंकी वर्षा करके भी युद्धमें उसे परास्त न कर सका, तब मैंने महान्‌ वायव्यास्त्रका प्रयोग किया

Wahai Raja, kadang ia menjadi makhluk bertubuh amat kecil namun berkepala sangat besar; lalu kembali ia mengambil tubuh raksasa sementara kepalanya tampak kecil. Akhirnya ia menyatukan diri menjadi satu wujud dan maju menghadapi aku dalam pertempuran.

Verse 30

यदाभिभवितु बाणैर्न च शक्नोमि तं रणे । ततो महास्त्रमातिष्ठं वायव्यं भरतर्षभ,कभी उसका शरीर तो बहुत छोटा हो जाता, परंतु मस्तक बहुत बड़ा दिखायी देता था। फिर वह विशाल शरीर धारण कर लेता और मस्तक बहुत छोटा बना लेता था। राजन! अन्तमें वह एक ही रूपमें प्रकट होकर युद्धमें मेरा सामना करने लगा। भरतर्षभ! जब मैं बाणोंकी वर्षा करके भी युद्धमें उसे परास्त न कर सका, तब मैंने महान्‌ वायव्यास्त्रका प्रयोग किया

Wahai yang termulia di antara Bharata, ketika bahkan dengan hujan anak panah aku tak mampu menundukkannya di medan laga, maka aku pun bersandar pada senjata agung—Vāyavya Astra, panah angin.

Verse 31

न चैनमशकं हन्तुं हल 0 खा भवत्‌ | तस्मिन्‌ प्रतिहते चास्त्रे मे महानभूत्‌,किंतु उससे भी उसका वध न कर सका। यह एक अद्भुत-सी घटना हुई। वायव्यास्त्रके निष्फल हो जानेपर मुझे महान्‌ आश्चर्य हुआ

Wahai Bhārata, bahkan dengan senjata angin itu pun aku tak sanggup membunuhnya. Dan ketika senjata itu tertahan serta menjadi sia-sia, timbullah keheranan besar dalam diriku.

Verse 32

भूय एव महाराज सविशेषमहं ततः । अस्त्रपूगेन महता रणे भूतमवाकिरम्‌,महाराज! तब मैंने पुनः विशेष प्रयत्न करके रणभूमिमें किरातरूपधारी उस अद्भुत पुरुषपर महान्‌ अस्त्रसमूहकी वर्षा की

Arjuna berkata: “Wahai Maharaja, sekali lagi dengan upaya yang lebih sungguh-sungguh, di medan laga aku menghujani makhluk menakjubkan itu—yang mengambil rupa seorang Kirāta—dengan gugusan senjata yang amat besar.”

Verse 33

स्थूणाकर्णमथो जालं शरवर्षमथोल्बणम्‌ | शलभास्त्रमश्मवर्ष समास्थायाहमभ्ययाम्‌,स्थूणाकर्ण5, वारुणास्त्र-, भयंकर शरवर्षास्त्रर, शलभास्त्र5<४ तथा अभ्मवर्ष४ इन अस्त्रोंका सहारा ले मैं उस किरातपर टूट पड़ा

Arjuna berkata: “Dengan bersandar pada aśtra bernama Sthūṇākarṇa, Jāla, hujan panah yang mengerikan, Śalabhāstra, dan hujan batu, aku menerjang lurus ke arah Kirāta itu.”

Verse 34

जग्रास प्रसभं तानि सर्वाण्यस्त्राणि मे नृप । तेषु सर्वेषु जग्धेषु ब्रह्मास्त्र महदादिशम्‌,राजन! उसने मेरे उन सभी अस्त्रोंको बलपूर्वक अपना ग्रास बना लिया। उन सबके भक्षण कर लिये जानेपर मैंने महान ब्रह्मास्त्रका प्रयोग किया

Arjuna berkata: “Wahai Raja, ia dengan paksa menelan semua senjataku. Setelah semuanya habis ditelan, barulah kulepaskan Brahmāstra yang maha dahsyat.”

Verse 35

ततः प्रज्वलितैर्बाणै: सर्वतः सोपचीयते । उपचीयमानश्न मया महास्त्रेण व्यवर्धत,तब प्रज्वलित बाणोंद्वारा वह अस्त्र सब ओर बढ़ने लगा। मेरे महान अस्त्रसे बढ़नेकी प्रेरणा पाकर वह ब्रह्मास्त्र अधिक वेगसे बढ़ चला

Kemudian, dengan panah-panah yang menyala, senjata itu mengembang ke segala penjuru. Dan ketika kudorong dengan mahāśastra-ku, Brahmāstra itu bertambah kuat—melaju dan meluas dengan kian dahsyat.

Verse 36

ततः: संतापिता लोका मत्प्रसूतेन तेजसा । क्षणेन हि दिश: खं च सर्वतो हि विदीपितम्‌,तदनन्तर मेरे द्वारा प्रकट किये हुए ब्रह्मास्त्रके तेजसे वहाँके सब लोग संतप्त हो उठे। एक ही क्षणमें सम्पूर्ण दिशाएँ और आकाश सब ओरसे आगकी लपटोंसे उद्दीप्त हो उठे

Arjuna berkata: “Sesudah itu, orang-orang di sana tersengat panas oleh daya menyala yang terpancar dariku. Dalam sekejap, segala penjuru dan langit pun menyala dari segala arah, seakan lidah-lidah api berkobar di mana-mana.”

Verse 37

तदप्यस्त्रं महातेजा: क्षणेनैव व्यशातयत्‌ । ब्रह्मास्त्रे तु हते राजन्‌ भयं मां महदाविशत्‌

Arjuna berkata: “Bahkan senjata itu pun dinetralisir oleh yang maha-bercahaya dalam sekejap. Namun, wahai Raja, ketika Brahmāstra telah dihancurkan, ketakutan besar menyergapku.”

Verse 38

परंतु उस महान्‌ तेजस्वी वीरने क्षणभरमें ही मेरे उस ब्रह्मास्त्रको भी शान्त कर दिया। राजन! उस ब्रह्मास्त्रके नष्ट होनेपर मेरे मनमें महान्‌ भय समा गया ।। ततो<हं धनुरादाय तथाक्षय्ये महेषुधी । सहसाभ्यहनं भूत॑ तान्यप्यस्त्राण्यभक्षयत्‌,तब मैं धनुष और दोनों अक्षय तरकस लेकर सहसा उस दिव्य पुरुषपर आघात करने लगा, किंतु उसने उन सबको भी अपना आहार बना लिया

Lalu aku mengangkat busurku dan, dengan dua tabung panahku yang tak habis-habis berisi anak panah besar, menerjang makhluk menakjubkan itu dan menghantamnya secepat kilat. Namun ia melahap bahkan semua senjata itu seolah-olah makanan. Melihat Brahmāstra-ku dinetralisir dan seranganku menjadi sia-sia, rasa takut yang dahsyat pun bangkit dalam batinku.

Verse 39

हतेष्वस्त्रेषु सर्वेषु भक्षितेष्वायुधेषु च । मम तस्य च भूतस्य बाहुयुद्धमवर्तत,जब मेरे सारे अस्त्र-शस्त्र नष्ट होकर उसके आहार बन गये, तब मेरा उस अलौकिक प्राणीके साथ मल्लयुद्ध प्रारम्भ हो गया

Ketika semua senjataku telah habis dan persenjataanku pun telah dihancurkan—bahkan dilahapnya—maka pertarungan jarak dekat pun terjadi antara aku dan makhluk ganjil itu.

Verse 40

व्यायामं मुष्टिभि: कृत्वा तलैरपि समागतै: । अपाययंश्व तद्‌ भूत॑ निश्रचेष्टमगमं महीम्‌,पहले मुक्कों और थप्पड़ोंसे मैंने उससे टक्कर लेनेकी चेष्टाकी, परंतु उसपर मेरा कोई वश नहीं चला और मैं निश्वेष्ट होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। महाराज! तब वह अलौकिक प्राणी हँसकर मेरे देखते-देखते स्त्रियोंसहित वहीं अन्तर्धान हो गया

Aku bergumul dengannya, memukul dengan tinju dan menampar dengan telapak tangan ketika kami saling mendekat; namun aku tak mampu menundukkannya. Terkalahkan, aku menjadi tak bergerak dan jatuh ke tanah.

Verse 41

ततः प्रहस्य तद्‌ भूतं तत्रैवान्तरधीयत । सह स्त्रीभिर्महाराज पश्यतो मे<द्भधुतोपमम्‌,पहले मुक्कों और थप्पड़ोंसे मैंने उससे टक्कर लेनेकी चेष्टाकी, परंतु उसपर मेरा कोई वश नहीं चला और मैं निश्वेष्ट होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। महाराज! तब वह अलौकिक प्राणी हँसकर मेरे देखते-देखते स्त्रियोंसहित वहीं अन्तर्धान हो गया

Kemudian makhluk ganjil itu tertawa dan, wahai Maharaja, lenyap di tempat itu juga di depan mataku—bersama para perempuan—laksana suatu keajaiban.

Verse 42

एवं कृत्वा स भगवांस्ततो<न्यद्‌ रूपमास्थित: । दिव्यमेव महाराज वसानो<द्धभुतमम्बरम्‌,राजन! वास्तवमें वे भगवान्‌ शंकर थे। उन्होंने पूर्वोक्त बर्ताव करके दूसरा रूप धारण कर लिया। देवताओंके स्वामी भगवान्‌ महेश्वर किरातरूप छोड़कर दिव्य स्वरूपका आश्रय ले अलौकिक एवं अद्भुत वस्त्र धारण किये वहाँ खड़े हो गये

Setelah berbuat demikian, Sang Bhagawan lalu mengambil wujud yang lain. Wahai Maharaja! Menanggalkan samaran Kirāta (pemburu gunung), Dewa Mahēśvara berdiri di sana dalam perwujudan surgawinya sendiri, mengenakan busana yang menakjubkan dan melampaui dunia.

Verse 43

हित्वा किरातरूपं च भगवांस्त्रिदशे श्वर: । स्वरूपं दिव्यमास्थाय तस्थौ तत्र महेश्वर:,राजन! वास्तवमें वे भगवान्‌ शंकर थे। उन्होंने पूर्वोक्त बर्ताव करके दूसरा रूप धारण कर लिया। देवताओंके स्वामी भगवान्‌ महेश्वर किरातरूप छोड़कर दिव्य स्वरूपका आश्रय ले अलौकिक एवं अद्भुत वस्त्र धारण किये वहाँ खड़े हो गये

Meninggalkan wujud Kirāta, Bhagawan, penguasa para dewa, mengambil rupa ilahinya sendiri; di sanalah Mahēśvara berdiri tersingkap.

Verse 44

अदृश्यत तत: साक्षाद्‌ भगवान्‌ गोवृषध्वज: । उमासहायो व्यालधृग्‌ बहुरूप: पिनाकधृकू,इस प्रकार उमासहित साक्षात्‌ भगवान्‌ वृषभ-ध्वजका दर्शन हुआ। उन्होंने अपने अंगोंमें सर्प और हाथमें पिनाक धारण कर रखे थे। अनेक रूपधारी भगवान्‌ शूलपाणि उस रणभूमिमें मेरे निकट आकर पूर्ववत्‌ सामने खड़े हो गये और बोले--'परंतप! मैं तुमपर संतुष्ट हूँ"

Kemudian Sang Bhagawan, yang panjinya bergambar lembu, tampak nyata—bersama Umā, berhias ular-ular, berwujud banyak, dan menggenggam busur Pināka.

Verse 45

स मामभ्येत्य समरे तथैवाभिमुखं स्थितम्‌ । शूलपाणिरथोवाच तुष्टोउस्मीति परंतप,इस प्रकार उमासहित साक्षात्‌ भगवान्‌ वृषभ-ध्वजका दर्शन हुआ। उन्होंने अपने अंगोंमें सर्प और हाथमें पिनाक धारण कर रखे थे। अनेक रूपधारी भगवान्‌ शूलपाणि उस रणभूमिमें मेरे निकट आकर पूर्ववत्‌ सामने खड़े हो गये और बोले--'परंतप! मैं तुमपर संतुष्ट हूँ"

Di tengah pertempuran, Śūlapāṇi mendekat kepadaku saat aku berdiri menghadapnya, seperti sebelumnya. Ia berdiri tepat di depanku dan berkata, “Wahai penakluk musuh, Aku berkenan kepadamu.”

Verse 46

ततस्तदू धनुरादाय तूणौ चाक्षय्यसायकौ । प्रादान्ममैव भगवान्‌ धारयस्वेति चाब्रवीत्‌,अमरत्वमपाहाय ब्रूहि यत्‌ ते मनोगतम्‌ । तदनन्तर मेरे धनुष और अक्षय बाणोंसे भरे हुए दोनों तरकस लेकर भगवान्‌ शिवने मुझे ही दे दिये और कहा--'परंतप! ये अपने अस्त्र ग्रहण करो।' कुन्तीकुमार! मैं तुमसे संतुष्ट हूँ। बोलो, तुम्हारा कौन-सा कार्य सिद्ध करूँ? वीर! तुम्हारे मनमें जो कामना हो, बताओ मैं उसे पूर्ण कर दूँगा। अमरत्वको छोड़कर और तुम्हारे मनमें जो भी कामना हो, बताओ'

Lalu Sang Bhagawan mengambil busur itu serta dua tabung panah yang penuh anak panah tak habis-habisnya, dan menyerahkannya kepadaku sambil berkata, “Pikul dan milikilah ini.” Ia melanjutkan, “Wahai penakluk musuh, Aku berkenan kepadamu. Katakan—urusan apa yang hendak Kusempurnakan bagimu? Pahlawan, nyatakan apa pun hasrat di hatimu; akan Kupenuhi—kecuali keabadian.”

Verse 47

तुष्टोडस्मि तव कौन्तेय ब्रूहि किं करवाणि ते । यत्‌ ते मनोगतं वीर तद्‌ ब्रूहि वितराम्पहम्‌

Wahai putra Kuntī, aku berkenan kepadamu. Katakan—apa yang harus kulakukan bagimu? Wahai pahlawan, apa pun hasrat yang tersimpan di hatimu, ucapkanlah; akan kukaruniakan itu.

Verse 48

ततः प्राञज्जलिरेवाहमस्त्रेषु गतमानस:,मेरा मन तो अस्त्र-शस्त्रोंमें लगा हुआ था। उस समय मैंने हाथ जोड़कर मन-ही-मन भगवान्‌ शंकरको प्रणाम किया और यह बात कही--“यदि मुझपर भगवान्‌ प्रसन्न हैं, तो मेरा मनोवांछित वर इस प्रकार है--देवताओंके पास जो कोई भी दिव्यास्त्र हैं, उन्हें मैं जानना चाहता हूँ।” यह सुनकर भगवान्‌ शंकरने मुझसे कहा--'पाण्डुनन्दन! मैं तुम्हें सम्पूर्ण दिव्यास्त्रोंकी प्राप्तिका वर देता हूँ

Lalu aku berdiri dengan kedua tangan terkatup; pikiranku sepenuhnya tertuju pada rahasia senjata dan aśtra. Dalam batin aku bersujud kepada Śaṅkara dan berkata, “Jika Sang Bhagavān berkenan kepadaku, inilah anugerah yang kuinginkan: segala aśtra ilahi yang berada pada para dewa—aku ingin mengetahuinya semuanya.” Mendengar itu, Śaṅkara bersabda, “Wahai putra Pāṇḍu, Aku menganugerahkan kepadamu karunia untuk memperoleh seluruh senjata ilahi.”

Verse 49

प्रणम्य मनसा शर्व ततो वचनमाददे । भगवान्‌ मे प्रसन्नश्वेदीप्सितो5यं वरो मम,मेरा मन तो अस्त्र-शस्त्रोंमें लगा हुआ था। उस समय मैंने हाथ जोड़कर मन-ही-मन भगवान्‌ शंकरको प्रणाम किया और यह बात कही--“यदि मुझपर भगवान्‌ प्रसन्न हैं, तो मेरा मनोवांछित वर इस प्रकार है--देवताओंके पास जो कोई भी दिव्यास्त्र हैं, उन्हें मैं जानना चाहता हूँ।” यह सुनकर भगवान्‌ शंकरने मुझसे कहा--'पाण्डुनन्दन! मैं तुम्हें सम्पूर्ण दिव्यास्त्रोंकी प्राप्तिका वर देता हूँ

Arjuna, dalam batin bersujud kepada Śarva (Śiva), lalu berkata, “Jika Sang Bhagavān berkenan kepadaku, inilah anugerah yang kuinginkan: aśtra ilahi yang tersimpan pada para dewa—aku ingin mengetahui dan memperolehnya semuanya.”

Verse 50

अस्त्राणीच्छाम्यहं ज्ञातुं यानि देवेषु कानिचित्‌ । ददानीत्येव भगवानन्रवीत्‌ त्रयम्बकश्न माम्‌,मेरा मन तो अस्त्र-शस्त्रोंमें लगा हुआ था। उस समय मैंने हाथ जोड़कर मन-ही-मन भगवान्‌ शंकरको प्रणाम किया और यह बात कही--“यदि मुझपर भगवान्‌ प्रसन्न हैं, तो मेरा मनोवांछित वर इस प्रकार है--देवताओंके पास जो कोई भी दिव्यास्त्र हैं, उन्हें मैं जानना चाहता हूँ।” यह सुनकर भगवान्‌ शंकरने मुझसे कहा--'पाण्डुनन्दन! मैं तुम्हें सम्पूर्ण दिव्यास्त्रोंकी प्राप्तिका वर देता हूँ

Arjuna berkata, “Aku ingin mengetahui senjata-senjata ilahi—apa pun yang ada di antara para dewa.” Maka Bhagavān Tryambaka (Śiva) bersabda kepadaku, “Aku menganugerahkannya.”

Verse 51

रौद्रमस्त्रं मदीयं त्वामुपस्थास्यति पाण्डव । प्रददौ च मम प्रीत: सो<स्त्रं पाशुपतं महत्‌,'पाण्डुकुमार! मेरा रौद्रास्त्र स्वयं तुम्हें प्राप्त हो जायगा। यह कहकर भगवान्‌ पशुपतिने बड़ी प्रसन्नताके साथ मुझे अपना महान्‌ पाशुपतास्त्र प्रदान किया

“Wahai Pāṇḍava, senjata Raudra milikku akan datang sendiri ke dalam penguasaanmu.” Setelah berkata demikian, Sang Pāśupati, berkenan kepadaku, menganugerahkan kepadaku aśtra Pāśupata beliau yang agung.

Verse 52

उवाच च महादेवो दत्त्वा मे5स्त्रं सनातनम्‌ | न प्रयोज्यं भवेदेतन्मानुषेषु कथठ्चन,अपना सनातन अस्त्र मुझे देकर महादेवजी फिर बोले--तुम्हें मनुष्योंपर किसी प्रकार इस अस्त्रका प्रयोग नहीं करना चाहिये

Setelah menganugerahkan kepadaku senjata abadi itu, Mahādewa berkata lagi: “Jangan sekali-kali, dalam keadaan apa pun, engkau gunakan senjata ini terhadap manusia.”

Verse 53

जगद्‌ विनिर्दहेदेवमल्पतेजसि पातितम्‌ | पीड्यमानेन बलवत्‌ प्रयोज्यं स्याद्‌ू धनंजय

Arjuna berkata: “Jika ketika dijatuhkan pada yang bercahaya kecil saja ia membakar seluruh jagat seperti ini, maka, wahai Dhanañjaya, senjata ini patut dipakai hanya dengan daya yang amat besar terhadap yang benar-benar perkasa.”

Verse 54

तदप्रतिहतं दिव्यं सर्वास्त्रप्रतिषिधनम्‌

Arjuna berkata: “Senjata itu tak tertahan dan bersifat ilahi, serta mampu menahan dan meniadakan setiap senjata lainnya.”

Verse 55

उत्सादनममित्राणां परसेनानिकर्तनम्‌,वह शत्रुओंका संहारक और विपक्षियोंकी सेनाका विध्वंसक है। उसकी प्राप्ति बहुत कठिन है। देवता, दानव तथा राक्षस किसीके लिये भी उसका वेग सहन करना अत्यन्त कठिन है। फिर भगवान्‌ शिवकी आज्ञा होनेपर मैं वहीं बैठ गया और वे मेरे देखते-देखते अन्तर्धान हो गये

Arjuna berkata: “Ia menghancurkan musuh dan menebas habis bala tentara lawan—pembunuh para seteru dan pemusnah pasukan yang memusuhi. Untuk memperolehnya amatlah sukar. Bahkan para dewa, Dānava, dan Rākṣasa pun nyaris tak sanggup menahan daya tak tertahankannya. Lalu, atas titah Bhagavān Śiva, aku tetap duduk di sana; dan di depan mataku sendiri beliau lenyap dari pandangan.”

Verse 56

दुरासदं दुष्प्रसहं सुरदानवराक्षसै: । अनुज्ञातस्त्वहं तेन तत्रैव समुपाविशम्‌,वह शत्रुओंका संहारक और विपक्षियोंकी सेनाका विध्वंसक है। उसकी प्राप्ति बहुत कठिन है। देवता, दानव तथा राक्षस किसीके लिये भी उसका वेग सहन करना अत्यन्त कठिन है। फिर भगवान्‌ शिवकी आज्ञा होनेपर मैं वहीं बैठ गया और वे मेरे देखते-देखते अन्तर्धान हो गये

Arjuna berkata: “Ia (kekuatan/senjata ilahi itu) amat sukar didekati dan mustahil ditahan—bahkan oleh para dewa, Dānava, dan Rākṣasa. Setelah memperoleh izin beliau, aku duduk di tempat itu juga; dan di depan mataku Mahādewa pun lenyap dari pandangan.”

Verse 57

प्रेक्षतश्नैेव मे देवस्तत्रैवान्तरधीयत,वह शत्रुओंका संहारक और विपक्षियोंकी सेनाका विध्वंसक है। उसकी प्राप्ति बहुत कठिन है। देवता, दानव तथा राक्षस किसीके लिये भी उसका वेग सहन करना अत्यन्त कठिन है। फिर भगवान्‌ शिवकी आज्ञा होनेपर मैं वहीं बैठ गया और वे मेरे देखते-देखते अन्तर्धान हो गये

Arjuna berkata: “Ketika aku masih memandang, sosok ilahi itu perlahan-lahan lenyap di tempat itu juga. Dialah pembantai musuh dan penghancur bala tentara lawan; untuk mencapainya amatlah sukar. Bahkan para dewa, Dānava, dan Rākṣasa pun hampir tak sanggup menahan kedahsyatan dayanya. Lalu, menaati titah Bhagavān Śiva, aku tetap duduk di tempat itu, dan di depan mataku ia menghilang.”

Verse 167

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि निवातकवचयुद्धपर्वणि गन्धमादनवासे युधिष्ठटिरार्जुनसंवादे सप्तषष्ट्यधिकशततमो<ध्याय:

Demikianlah, dalam Śrī Mahābhārata, pada Vana Parva—khususnya bagian tentang perang melawan Nivātakavaca—ketika para Pāṇḍava tinggal di Gandhamādana, dalam dialog Yudhiṣṭhira dan Arjuna, berakhirlah bab ke-167.

Verse 473

अमरत्वमपाहाय ब्रूहि यत्‌ ते मनोगतम्‌ । तदनन्तर मेरे धनुष और अक्षय बाणोंसे भरे हुए दोनों तरकस लेकर भगवान्‌ शिवने मुझे ही दे दिये और कहा--'परंतप! ये अपने अस्त्र ग्रहण करो।' कुन्तीकुमार! मैं तुमसे संतुष्ट हूँ। बोलो, तुम्हारा कौन-सा कार्य सिद्ध करूँ? वीर! तुम्हारे मनमें जो कामना हो, बताओ मैं उसे पूर्ण कर दूँगा। अमरत्वको छोड़कर और तुम्हारे मनमें जो भी कामना हो, बताओ'

Arjuna berkata: “Singkirkanlah keinginan akan keabadian; katakan apa yang sungguh ada dalam hatimu.” Sesudah itu Bhagavān Śiva sendiri mengambil busurku dan dua tabung panah yang penuh anak panah tak habis-habis, lalu menyerahkannya kembali kepadaku seraya bersabda: “Wahai penakluk musuh, terimalah senjata-senjata ini. Putra Kuntī, Aku berkenan kepadamu. Katakan—tugas apa yang harus Kusempurnakan bagimu? Pahlawan, apa pun hasrat yang bersemayam di hatimu, nyatakanlah; akan Kupenuhi. Hanya, kesampingkan keabadian, dan sebutkanlah permintaanmu.”

Verse 536

अस्त्राणां प्रतिघाते च सर्वथैव प्रयोजयेत्‌ । “अपनेसे अल्पशक्तिवाले विपक्षी पर यदि इसका प्रहार किया जाय तो यह सम्पूर्ण विश्वको दग्ध कर देगा। धनंजय! जब शत्रुके द्वारा अपनेको बहुत पीड़ा प्राप्त होने लगे, उस दशामें आत्मरक्षाके लिये इसका प्रयोग करना चाहिये। शत्रुके अस्त्रोंका विनाश करनेके लिये सर्वथा इसका प्रयोग उचित है”

Arjuna berkata: “Senjata ini harus digunakan sepenuhnya untuk menangkis senjata. Jika dilemparkan kepada lawan yang lebih lemah, ia akan membakar seluruh jagat. Karena itu, wahai Dhanañjaya, ketika seseorang disiksa hebat oleh musuh, hendaknya ia memakainya demi perlindungan diri. Untuk memusnahkan senjata-senjata musuh, penggunaannya sungguh tepat.”

Verse 546

मूर्तिमन्मे स्थित पारश्वे प्रसन्ने गोवृषध्वजे । इस प्रकार भगवान्‌ वृषभध्वजके प्रसन्न होनेपर सम्पूर्ण अस्त्रोंका निवारण करनेवाला और कहीं भी कुण्ठित न होनेवाला दिव्य पाशुपतास्त्र मूर्तिमान्‌ हो मेरे पास आकर खड़ा हो गया

Arjuna berkata: Ketika Sang Bhagavān yang berpanji lembu berkenan, senjata ilahi Pāśupata—yang mampu meniadakan semua senjata lain dan tak pernah gagal di mana pun—menampakkan diri dalam wujud nyata dan berdiri di sisiku.

Frequently Asked Questions

How to maintain disciplined agency when perception is compromised: Arjuna must act decisively while resisting panic and avoiding indiscriminate escalation amid māyā-driven sensory collapse.

Competence is ethical: trained discernment and proportionate response—matching specific threats with specific remedies—functions as a moral technology for stability under uncertainty.

No explicit phalaśruti is present in this chapter segment; its meta-significance is implicit, illustrating how instruction (Indra’s teaching) and composure transform chaos into intelligible, governable conditions.