Adhyaya 1
Vana ParvaAdhyaya 147 Verses

Adhyaya 1

Āraṇyaka-parva, Adhyāya 1 — The Pandavas’ Exit from Gajasāhvaya and the Citizens’ Lament (जनमेजयप्रश्नः; पाण्डवानां वनप्रस्थानम्)

Upa-parva: Araṇyapravēśa (The Departure for the Forest) — Opening Unit of Āraṇyaka-parva

Janamejaya requests a detailed account of how the Pandavas, defeated by gambling through deceit, endured the first phase of exile: who accompanied them, what they ate, how they conducted themselves, and where they stayed. Vaiśaṃpāyana narrates their departure from Hastināpura through the Vardhamāna gate, proceeding northward with Draupadī, attended by servants (including Indrasena) and vehicles. The citizens, distressed, condemn Duryodhana’s leadership and its moral-social consequences, and express the desire to follow the Pandavas. They present a didactic reflection on association (saṃsarga) as a generator of virtue or decline, likening it to fragrance permeating cloth and earth. Approaching the Pandavas with folded hands, they plead not to be abandoned under an unethical regime. Yudhiṣṭhira acknowledges their affection but instructs them to return, emphasizing protection of Bhīṣma, Vidura, Kuntī, and others in the city, and framing loyalty as guardianship. The citizens reluctantly withdraw in grief. The Pandavas travel to the Jāhnavī (Ganges) bank, reach a great banyan (Pramāṇa), spend the night with ritual cleanliness using water, and are joined by some Brahmins (with or without fires, with students and kin), whose recitations and consolations accompany the exiled king.

Chapter Arc: व्यास-वाणी का मंगलाचरण—‘नारायणं नमस्कृत्य… ततो जयमुदीरयेत्’—और जनमेजय का तीखा प्रश्न: कौरवों की कठोर वाणी से वैर कैसे भड़का, और पाण्डव अचानक ऐश्वर्य-भ्रष्ट होकर वन को कैसे चले गये? → राजनीतिक अपमान और कटु वचन (परुषा वाचः) से उत्पन्न वैर का विस्तार; पाण्डवों के वन-गमन की पीड़ा के साथ समाज-धर्म का उपदेशात्मक स्वर उभरता है—शान्ति-परायण, वृद्ध, तपस्वी, शिष्ट जनों के संग की आवश्यकता और लोक-आचार/वेदोक्त मर्यादा का स्मरण। → राजा के चारों ओर ब्रह्मवादियों का मंडल—कुछ साग्नि, कुछ अनग्नि—संध्याकाल के ‘रम्य-दारुण’ मुहूर्त में ब्रह्मघोष के साथ संवाद का उत्कर्ष; मधुर-हंसस्वर विप्रों द्वारा कुरुश्रेष्ठ राजा को आश्वासन, मानो धर्म की ध्वनि राजसत्ता के घाव पर मरहम रखती हो। → उपदेश का निष्कर्ष स्पष्ट होता है: धर्म-काम-अर्थ के गुण शिष्ट-सम्मत लोकाचार में प्रतिष्ठित हैं; श्रेष्ठ संगति ही संकट में राजा/समाज को स्थिर करती है—और राजा के हृदय में ‘सब कार्यों में यही सर्वोत्तम’ (सत्कार/धर्म-आश्रय) का संकल्प दृढ़ होता है। → हस्तिनापुर में समाचार फैलता है—‘पाण्डव वन की ओर गये’—और नगर शोकाकुल; भीष्म, विदुर, द्रोण, कृप आदि का एकत्र होना आगे के निर्णायक परामर्श/राजनीतिक मोड़ का संकेत देता है।

Shlokas

Verse 1

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्‌ | देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्‌ ।। “अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान्‌ श्रीकृष्ण, (उनके नित्यसखा) नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, (उनकी लीला प्रकट करनेवाली) भगवती सरस्वती और (उन लीलाओंका संकलन करनेवाले) महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय (महाभारत)-का पाठ करना चाहिये। जनमेजय उवाच एवं द्यूतजिता: पार्था: कोपिताश्न दुरात्मभि: । धार्टराष्ट्रै: सहामात्यैर्निकृत्या द्विजसत्तम,जनमेजयने पूछा--विप्रवर! मन्त्रियोंसहित धृतराष्ट्रके दुरात्मा पुत्रोंने जब इस प्रकार कपट॒पूर्वक कुन्तीकुमारोंको जूएमें हगाकर कुपित कर दिया और घोर वैरकी नींव डालते हुए उन्हें अत्यन्त कठोर बातें सुनायीं, तब मेरे पूर्वपितामह युधिष्ठिर आदि कुरुवंशियोंने क्या किया? इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि पौरप्रत्यागमने प्रथमो5ध्याय:

Setelah bersujud kepada Nārāyaṇa, juga kepada Nara—yang terbaik di antara manusia—serta kepada Dewi Sarasvatī dan Vyāsa, barulah hendaknya orang melantunkan Jaya (Mahābhārata). Janamejaya berkata: “Wahai Brahmana termulia, ketika putra-putra Dhṛtarāṣṭra yang berhati jahat, bersama para menteri mereka, dengan tipu daya mengalahkan para Pārtha dalam permainan dadu, membangkitkan amarah mereka, menanam benih permusuhan yang mengerikan, dan melontarkan kata-kata yang amat keras—apa yang dilakukan para leluhurku, Yudhiṣṭhira dan para pangeran Kuru lainnya?” Demikian berakhir bab pertama dalam Araṇya-parvan, bagian dari Vana-parvan, mengenai kembalinya ke kota.

Verse 2

श्राविता: परुषा वाच: सृजद्धिर्वैरमुत्तमम्‌ । किमकुर्वत कौरव्या मम पूर्वपितामहा:,जनमेजयने पूछा--विप्रवर! मन्त्रियोंसहित धृतराष्ट्रके दुरात्मा पुत्रोंने जब इस प्रकार कपट॒पूर्वक कुन्तीकुमारोंको जूएमें हगाकर कुपित कर दिया और घोर वैरकी नींव डालते हुए उन्हें अत्यन्त कठोर बातें सुनायीं, तब मेरे पूर्वपितामह युधिष्ठिर आदि कुरुवंशियोंने क्या किया?

Janamejaya berkata: “Wahai Brahmana termulia, setelah mereka melontarkan kata-kata yang amat keras—yang kian menyalakan permusuhan—dan dengan tipu daya mengalahkan para Pārtha dalam permainan dadu hingga membangkitkan amarah mereka, apa yang dilakukan para leluhurku, para Kuru seperti Yudhiṣṭhira, pada saat itu?”

Verse 3

कथं चैश्वर्यविभ्रष्टा: सहसा दुःखमेयुष: । वने विजद्रिरे पार्था: शक्रप्रतिमतेजस:,तथा जो सहसा ऐश्वर्यसे वंचित हो जानेके कारण महान्‌ दुःखमें पड़ गये थे, उन इन्द्रके तुल्य तेजस्वी पाण्डवोंने वनमें किस प्रकार विचरण किया?

Janamejaya bertanya: “Bagaimanakah para Pārtha—yang seketika tercerabut dari kemegahan kerajaan dan terjerumus ke dalam duka besar—mengembara di rimba, meski bercahaya laksana Indra? Dengan cara apa mereka bertahan dan menata laku hidup di sana?”

Verse 4

के वै तानन्ववर्तन्त प्राप्तान्‌ व्यसनमुत्तमम्‌ । किमाचारा: किमाहारा: क्व च वासो महात्मनाम्‌,उस भारी संकटमें पड़े हुए पाण्डवोंके साथ वनमें कौन-कौन गये थे? वनमें वे किस आचार-व्यवहारसे रहते थे? क्या खाते थे? और उन महात्माओंका निवास-स्थान कहाँ था?

Janamejaya bertanya: “Siapa saja yang menyertai para Pāṇḍava yang berhati agung itu ketika mereka jatuh ke dalam malapetaka yang paling berat? Dengan tata laku dan disiplin apa mereka hidup di rimba? Apa yang mereka makan? Dan di manakah tempat tinggal para mulia itu?”

Verse 5

कथं च द्वादश समा बने तेषां महामुने | व्यतीयुत्रल्वमिणश्रेष्ठ शूराणामरिघातिनाम्‌,महामुने! ब्राह्मणश्रेष्ठ! शत्रुओंका संहार करनेवाले उन शूरवीर महारथियोंके बारह वर्ष वनमें किस प्रकार बीते?

Janamejaya berkata: “Wahai mahāmuni, wahai resi termulia! Bagaimanakah dua belas tahun para kesatria perkasa itu—para penghancur musuh—berlalu di hutan? Dengan cara apa pengasingan panjang itu terjalin bagi mereka?”

Verse 6

कथं च राजपुत्री सा प्रवरा सर्वयोषिताम्‌ । पतिव्रता महाभागा सततं सत्यवादिनी,तपोधन! संसारकी समस्त सुन्दरियोंमें श्रेष्ठ, पतिव्रता एवं सदा सत्य बोलनेवाली वह महाभागा राजकुमारी द्रौपदी, जो दुःख भोगनेके योग्य कदापि नहीं थी, वनवासके भयंकर कष्टको कैसे सह सकी? यह सब मुझे विस्तारपूर्वक बतलाइये

Janamejaya berkata: “Wahai pertapa kaya tapa, bagaimana putri raja itu—yang termulia di antara para wanita, setia kepada para suaminya, berhati luhur, dan senantiasa berkata benar—Draupadī, yang sejatinya tak patut menanggung derita, sanggup memikul kerasnya hidup dalam pengasingan di hutan? Ceritakanlah semuanya kepadaku dengan rinci.”

Verse 7

वनवासमदु:खार्हा दारुणं प्रत्यपद्यत | एतदाचदक्ष्व मे सर्व विस्तरेण तपोधन,तपोधन! संसारकी समस्त सुन्दरियोंमें श्रेष्ठ, पतिव्रता एवं सदा सत्य बोलनेवाली वह महाभागा राजकुमारी द्रौपदी, जो दुःख भोगनेके योग्य कदापि नहीं थी, वनवासके भयंकर कष्टको कैसे सह सकी? यह सब मुझे विस्तारपूर्वक बतलाइये

Janamejaya berkata: “Bagaimana Draupadī—yang tak layak menanggung derita—sampai harus menjalani kehidupan pengasingan di hutan yang begitu keras itu, dan bagaimana ia menahannya? Wahai harta tapa, jelaskanlah semuanya kepadaku dengan selengkap-lengkapnya.”

Verse 8

श्रोतुमिच्छामि चरितं भूरिद्रविणतेजसाम्‌ । कथ्यमानं त्वया विप्र परं कौतूहलं हि मे,ब्रह्मन! मैं आपके द्वारा कहे जाते हुए महान्‌ पराक्रम और तेजसे सम्पन्न पाण्डवोंके चरित्रको सुनना चाहता हूँ। इसके लिये मेरे मनमें अत्यन्त कौतूहल हो रहा है

Janamejaya berkata: “Wahai brāhmaṇa yang arif, aku ingin mendengar riwayat hidup para Pāṇḍava—yang berlimpah harta dan bercahaya oleh keperkasaan—sebagaimana engkau menuturkannya; sebab rasa ingin tahuku tentang itu amat besar.”

Verse 9

वैशम्पायन उवाच एवं द्यूतजिता: पार्था: कोपिताश्च दुरात्मभि: | धार्तराष्ट्रै: सहामात्यैर्निययुर्गजसाह्लयात्‌,वैशम्पायनजीने कहा--राजन्‌! इस प्रकार मन्त्रियोंसहित दुरात्मा धृतराष्ट्रपुत्रोंद्वारा जूएमें पराजित करके क़ुद्ध किये हुए कुन्तीकुमार हस्तिनापुरसे बाहर निकले

Vaiśampāyana berkata: “Demikianlah para putra Pṛthā (Pāṇḍava), setelah dikalahkan dalam permainan dadu dan dibakar amarahnya oleh putra-putra Dhṛtarāṣṭra yang berhati jahat beserta para menteri mereka, digiring keluar dari Gajasāhvaya (Hastināpura).”

Verse 10

वर्धमानपुरद्वारादभिनिष्क्रम्य पाण्डवा: । उदड्मुखा: शस्त्रभृत: प्रययु: सह कृष्णया,वर्धमानपुरकी दिशामें स्थित नगरद्वारसे निकलकर शणस्त्रधारी पाण्डवोंने द्रौपदीके साथ उत्तराभिमुख होकर यात्रा आरम्भ की

Vaiśampāyana berkata: “Keluar melalui gerbang Vardhamānapura, para Pāṇḍava yang bersenjata, menghadap ke utara, berangkat menempuh perjalanan bersama Kṛṣṇā (Draupadī).”

Verse 11

पडा 5 सी डा ४-५ को (.:25£. -श>: | गज 55% 2४ 82 सर्द (७ ] ॥ | > ॥:/- ९४ / | है >> हि ०४77२ तर | ँ न्ग्ब्यु हर कक । नए ० न छा कल ५ > ल्‍ ध्य्य्जी ० | है! | शा नस / रे ४) ५ ९ ४0 ; पर ॥ मन । ४2 इन्द्रसेनादयश्ैव भृत्या: परि चतुर्दश । रथैरनुययु: शीघ्रै: स्त्रिय आदाय सर्वश:,इन्द्रसेन आदि चौदहसे अधिक सेवक सारी स्त्रियोंको शीघ्रगामी रथोंपर बिठाकर उनके पीछे-पीछे चले

Vaiśampāyana berkata: “Indrasena dan para pelayan lainnya—lebih dari empat belas orang—mengikuti dari belakang dengan kereta-kereta yang cepat, setelah menaikkan semua perempuan ke atasnya.”

Verse 12

गतानेतान्‌ विदित्वा तु पौरा: शोकाभिपीडिता: । गर्हयन्तोडसकृद्‌ भीष्मविदुरद्रोणगौतमान्‌

Vaiśampāyana berkata: “Ketika warga kota mengetahui bahwa mereka telah berangkat, mereka dihimpit duka; berulang kali mereka melontarkan celaan kepada Bhīṣma, Vidura, Droṇa, dan Gautama.”

Verse 13

पौरा ऊचु. नेदमस्ति कुलं सर्व न वयं न च नो गृहा:,पुरवासी बोले--अहो! हमारा यह समस्त कुल, हम तथा हमारे घर-द्वार अब सुरक्षित नहीं हैं; क्योंकि यहाँ पापात्मा दुर्योधन सुबलपुत्र शकुनिसे पालित हो कर्ण और दुःशासनकी सम्मतिसे इस राज्यका शासन करना चाहता है

Warga kota berkata: “Kini seluruh garis keturunan kami, diri kami, bahkan rumah-rumah kami pun tak lagi aman. Sebab di sini Duryodhana yang berdosa—dipelihara dan diarahkan oleh Śakuni putra Subala—hendak memerintah kerajaan ini dengan persetujuan Karṇa dan Duḥśāsana.”

Verse 14

यत्र दुर्योधन: पाप: सौबलेनाभिपालित: । कर्णदु:शासनाभ्यां च राज्यमेतच्चिकीर्षति,पुरवासी बोले--अहो! हमारा यह समस्त कुल, हम तथा हमारे घर-द्वार अब सुरक्षित नहीं हैं; क्योंकि यहाँ पापात्मा दुर्योधन सुबलपुत्र शकुनिसे पालित हो कर्ण और दुःशासनकी सम्मतिसे इस राज्यका शासन करना चाहता है

Di sana, Duryodhana yang berdosa—dipelihara dan diarahkan oleh Saubala (Śakuni), serta didukung Karṇa dan Duḥśāsana—berhasrat merebut kendali atas kerajaan ini.

Verse 15

न तत्‌ कुलं न चाचारो न धर्मो<र्थ: कुतः सुखम्‌ । यत्र पापसहायो<यं पापो राज्यं चिकीर्षति,जहाँ पापियोंकी ही सहायतासे यह पापाचारी राज्य करना चाहता है वहाँ हमलोगोंके कुल, आचार, धर्म और अर्थ भी नहीं रह सकते, फिर सुख तो रह ही कैसे सकता है?

Di tempat di mana orang berdosa ini, dengan bantuan para pendosa, hendak memerintah, di sana takkan tersisa garis keturunan mulia maupun tata laku benar; tak ada dharma, tak ada kemakmuran—maka dari mana mungkin kebahagiaan?

Verse 16

दुर्योधनो गुरुद्वेषी त्यक्ताचारसुहृज्जन: । अर्थलुब्धोडभिमानी च नीच: प्रकृतिनिर्घण:,दुर्योधन गुरुजनोंसे द्वेष रखनेवाला है। उसने सदाचार और पाण्डवों-जैसे सुहृदोंको त्याग दिया है। वह अर्थलोलुप, अभिमानी, नीच और स्वभावतः ही निष्ठुर है

Duryodhana membenci para guru dan sesepuh. Ia menanggalkan tata laku benar dan meninggalkan sahabat-sahabat yang tulus. Ia rakus harta, congkak, hina budi, dan keras oleh tabiatnya.

Verse 17

नेयमस्ति मही कृत्स्ना यत्र दुर्योधनो नृप: । साधु गच्छामहे सर्वे यत्र गच्छन्ति पाण्डवा:,जहाँ दुर्योधन राजा है, वहाँकी यह सारी पृथ्वी नहींके बराबर है, अत: यही ठीक होगा कि हम सब लोग वहीं चलें जहाँ पाण्डव जा रहे हैं

Bumi seluruhnya pun tak layak dimiliki bila Raja Duryodhana berkuasa di sana. Maka baiklah kita semua pergi ke tempat yang dituju para Pāṇḍava.

Verse 18

सानुक्रोशा महात्मानो विजितेन्द्रियशत्रव: । ह्वीमन्तः कीर्तिमन्तश्ष धर्माचारपरायणा:,पाण्डवगण दयालु, महात्मा, जितेन्द्रिय, शत्रुविजयी, लज्जाशील, यशस्वी, धर्मात्मा तथा सदाचारपरायण हैं

Waiśampāyana berkata: Para Pāṇḍava berbelas kasih dan berhati luhur—mereka telah menaklukkan indria-indria mereka sekaligus musuh-musuh mereka. Mereka rendah hati, termasyhur, dan teguh berpegang pada dharma serta tata laku yang benar.

Verse 19

वैशम्पायन उवाच एवमुकक्‍्त्वानुजग्मुस्ते पाण्डवांस्तान्‌ समेत्य च । ऊचुः प्राउज्जलय: सर्वे कौन्तेयान्‌ माद्रिनन्दनान्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--ऐसा कहकर वे पुरवासी पाण्डवोंके पास गये और उन कुन्तीकुमारों तथा माद्रीपुत्रोंस मिलकर वे सब-के-सब हाथ जोड़कर इस प्रकार बोले --

Waiśampāyana berkata: Setelah berkata demikian, para warga kota itu mendatangi para Pāṇḍava; lalu mengerumuni putra-putra Kuntī dan putra-putra Mādrī, dan semuanya dengan tangan terkatup berkata demikian.

Verse 20

क्व गमिष्यथ भद्रं वस्त्यक्त्वास्मान्‌ दुःखभागिन: । वयमप्यनुयास्यामो यत्र यूयं गमिष्यथ,'पाण्डवो! आपलोगोंका कल्याण हो। हम आपके वियोगसे बहुत दुःखी हैं। आपलोग हमें छोड़कर कहाँ जा रहे हैं? आप जहाँ जायँगे वहीं हम भी आपके साथ चलेंगे

“Wahai Pāṇḍava, semoga kebaikan menyertai kalian. Ke mana kalian akan pergi meninggalkan kami, para penyerta dalam duka? Ke mana pun kalian pergi, kami pun akan mengikuti kalian ke sana.”

Verse 21

अधर्मेण जितान्‌ श्र॒त्वा युष्मांस्त्यक्तघृणै: परै: । उद्विग्ना: स्मो भृशं सर्वे नास्मान्‌ हातुमिहाहथ,“निर्दयी शत्रुओंने आपको अधर्मपूर्वक जूएमें हराया है, यह सुनकर हम सब लोग अत्यन्त उद्विग्न हो उठे हैं। आपलोग हमारा त्याग न करें; क्योंकि हम आपके सेवक हैं, प्रेमी हैं, सुहृद्‌ हैं और सदा आपके प्रिय एवं हितमें संलग्न रहनेवाले हैं। आपके बिना इस दुष्ट राजाके राज्यमें रहकर हम नष्ट होना नहीं चाहते

“Mendengar bahwa kalian dikalahkan dengan cara yang tidak benar oleh musuh-musuh yang telah menanggalkan belas kasih, kami semua sangat gelisah. Jangan tinggalkan kami di sini; kalian tidak patut meninggalkan kami.”

Verse 22

भक्तानुरक्तान्‌ सुहृद: सदा प्रियहिते रतान्‌ | कुराजाधिषिते राज्ये न विनश्येम सर्वश:,“निर्दयी शत्रुओंने आपको अधर्मपूर्वक जूएमें हराया है, यह सुनकर हम सब लोग अत्यन्त उद्विग्न हो उठे हैं। आपलोग हमारा त्याग न करें; क्योंकि हम आपके सेवक हैं, प्रेमी हैं, सुहृद्‌ हैं और सदा आपके प्रिय एवं हितमें संलग्न रहनेवाले हैं। आपके बिना इस दुष्ट राजाके राज्यमें रहकर हम नष्ट होना नहीं चाहते

“Kami adalah para pengikut yang berbakti, terikat kasih, dan sahabat yang menghendaki kebaikan kalian—senantiasa sibuk dengan apa yang kalian sukai dan yang membawa manfaat bagi kalian. Kami tidak ingin binasa seluruhnya dengan tetap tinggal di kerajaan yang dikuasai raja lalim.”

Verse 23

श्रूयतां चाभिधास्यामो गुणदोषान्‌ नरर्षभा: | शुभाशुभाधिवासेन संसर्ग: कुरुते यथा,“नरश्रेष्ठ पाण्डवो! शुभ और अशुभ आश्रयमें रहनेपर वहाँका संसर्ग मनुष्यमें जैसे गुण- दोषोंकी सृष्टि करता है, उनका हम वर्णन करते हैं, सुनिये

Waiśampāyana berkata: “Dengarkan, wahai insan terbaik; kini akan kami uraikan bagaimana pergaulan—yang dibentuk oleh tinggal di lingkungan yang mujur atau celaka—menimbulkan lahirnya kebajikan dan cela pada diri seseorang.”

Verse 24

वस्त्रमापस्तिलान्‌ भूमिं गन्धो वासयते यथा । पुष्पाणामधिवासेन तथा संसर्गजा गुणा:,'जैसे फूलोंके संसर्गमें रहनेपर उनकी सुगन्ध वस्त्र, जल, तिल और भूमिको भी सुवासित कर देती है, उसी प्रकार संसर्गजनित गुण भी अपना प्रभाव डालते हैं

Waiśampāyana berkata: “Sebagaimana keharuman, karena kedekatan dengan bunga, meresap ke kain, air, biji wijen, bahkan tanah—demikian pula sifat-sifat yang lahir dari pergaulan menyebarkan pengaruhnya.”

Verse 25

मोहजालस्य योनिर्हि मूढेरेव समागम: । अहन्यहनि धर्मस्य योनि: साधुसमागम:,“मूढ मनुष्योंसे मिलना-जुलना मोहजालकी उत्पत्तिका कारण होता है। इसी प्रकार साधु-महात्माओंका रंग प्रतिदिन धर्मकी प्राप्ति करानेवाला है

Pergaulan dengan orang yang dungu menjadi benih jala-kebingungan; sedangkan dari hari ke hari, pergaulan dengan orang saleh menjadi sumber diperolehnya dan diteguhkannya dharma.

Verse 26

तस्मात्‌ प्राजजैश्न वृद्धैश्न सुस्वभावैस्तपस्विभि: । सद्िश्व सह संसर्ग: कार्य: शमपरायणै:,“इसलिये दिद्दवानों, वृद्ध पुरुषों तथा उत्तम स्वभाववाले शान्तिपरायण तपस्वी सत्पुरुषोंका संग करना चाहिये

Karena itu, siapa pun yang berpegang pada ketenteraman batin hendaknya membina pergaulan dengan orang bijak dan para lanjut usia, dengan pertapa yang berbudi luhur, serta dengan orang-orang baik; sebab pergaulan demikian meneguhkan laku dan menuntun pada dharma.

Verse 27

येषां त्रीण्यवदातानि विद्या योनिश्च कर्म च । ते सेव्यास्तै: समास्या हि शास्त्रेभ्योडपि गरीयसी,“जिन पुरुषोंके विद्या, जाति और कर्म--ये तीनों उज्ज्वल हों, उनका सेवन करना चाहिये; क्योंकि उन महापुरुषोंके साथ बैठना शास्त्रोंके स्वाध्यायसे भी बढ़कर है। हमलोग अग्निहोत्र आदि शुभ कर्मोंका अनुष्ठान नहीं करते, तो भी पुण्यात्मा साधुपुरुषोंके समुदायमें रहनेसे हमें पुण्यकी ही प्राप्ति होगी। इसी प्रकार पापीजनोंके सेवनसे हम पापके ही भागी होंगे

Waiśampāyana berkata: “Mereka yang memiliki tiga hal yang bening—pengetahuan, garis keturunan, dan laku perbuatan—patut didekati dan dilayani. Sebab duduk dalam pergaulan para mahātmā semacam itu dipandang lebih utama daripada sekadar mempelajari kitab-kitab śāstra. Sekalipun kita tidak menjalankan upacara suci seperti Agnihotra, dengan tinggal di tengah kumpulan orang saleh dan berbudi kita tetap memperoleh pahala kebajikan; demikian pula, dengan bergaul dengan orang jahat, kita niscaya menjadi pemikul bagian dosa.”

Verse 28

निरारम्भा हापि वयं पुण्यशीलेषु साधुषु । पुण्यमेवाप्रुयामेह पापं पापोपसेवनात्‌,“जिन पुरुषोंके विद्या, जाति और कर्म--ये तीनों उज्ज्वल हों, उनका सेवन करना चाहिये; क्योंकि उन महापुरुषोंके साथ बैठना शास्त्रोंके स्वाध्यायसे भी बढ़कर है। हमलोग अग्निहोत्र आदि शुभ कर्मोंका अनुष्ठान नहीं करते, तो भी पुण्यात्मा साधुपुरुषोंके समुदायमें रहनेसे हमें पुण्यकी ही प्राप्ति होगी। इसी प्रकार पापीजनोंके सेवनसे हम पापके ही भागी होंगे

Waiśampāyana berkata: “Walau kami tidak memulai laku ritual apa pun, bila kami tinggal di tengah orang-orang saleh dan suci, di sini pun kami akan memperoleh kebajikan. Demikian pula, dengan bergaul dengan para pendosa, seseorang niscaya menjadi turut menanggung dosa.”

Verse 29

असतां दर्शनात्‌ स्पर्शात्‌ संजल्पाच्च सहासनात्‌ | धर्माचारा: प्रहीयन्ते सिद्धयन्ति च न मानवा:,“दुष्ट मनुष्योंके दर्शन, स्पर्श, उनके साथ वार्तालाप अथवा उठने-बैठनेसे धार्मिक आचारोंकी हानि होती है। इसलिये वैसे मनुष्योंको कभी सिद्धि नहीं प्राप्त होती

Melihat orang jahat, bersentuhan, bercakap-cakap, dan duduk bersama mereka—semua itu merusak tata laku dharma; karena itu manusia semacam itu tidak pernah mencapai keberhasilan rohani (siddhi).

Verse 30

बुद्धिश्च हीयते पुंसां नीचै: सह समागमात्‌ | मध्यमैर्मध्यतां याति श्रेष्ठतां याति चोत्तमै:,“नीच पुरुषोंका साथ करनेसे मनुष्योंकी बुद्धि नष्ट होती है। मध्यम श्रेणीके मनुष्योंका साथ करनेसे मध्यम होती है और उत्तम पुरुषोंका संग करनेसे उत्तरोत्तर श्रेष्ठ होती है

Dengan bergaul dengan orang hina, kecerdasan manusia merosot; dengan bergaul dengan orang sedang, ia menjadi sedang; dan dengan bergaul dengan orang utama, ia naik setahap demi setahap menuju keutamaan.

Verse 31

अनीचैनप्यविषयैर्नाधर्मिष्ठिविशेषत: । ये गुणा: कीर्तिता लोके धर्मकामार्थसम्भवा: | लोकाचारेषु सम्भूता वेदोक्ता: शिष्टसम्मता:,उत्तम, प्रसिद्ध एवं विशेषत: धर्मिष्ठ मनुष्योंने लोकमें धर्म, अर्थ और कामकी उत्पत्तिके हेतुभूत जो वेदोक्त गुण (साधन) बताये हैं वे ही लोकाचारमें प्रकट होते हैं--लोगोंद्वारा काममें लाये जाते हैं और शिष्ट पुरुष उन्हींका आदर करते हैं

Waiśampāyana berkata: Bahkan dalam perkara yang tampak rendah atau di luar urusan sendiri, orang yang sungguh-sungguh teguh dalam dharma tidak melepaskan pertimbangan. Kebajikan yang dipuji di dunia sebagai sumber dharma, artha, dan kāma—itulah sarana yang diajarkan Veda—menjadi nyata dalam adat kebiasaan masyarakat: orang mempraktikkannya, dan kaum terpelajar serta berbudi menjunjungnya.

Verse 32

ते युष्मासु समस्ताश्ष व्यस्ताश्वैवेह सदगुणा: । इच्छामो गुणवन्मध्ये वस्तुं श्रेयोडभिकाड्क्षिण:,“वे सभी सदगुण पृथक्‌ू-पृथक्‌ और एक साथ आपलोगोंमें विद्यमान हैं, अतः हमलोग कल्याणकी इच्छासे आप-जैसे गुणवान्‌ पुरुषोंके बीचमें रहना चाहते हैं!

Semua kebajikan mulia—baik dipandang satu per satu maupun sebagai keseluruhan—ada pada diri kalian di sini. Karena itu, demi menggapai yang terbaik, kami ingin tinggal di tengah orang-orang berbudi seperti kalian.

Verse 33

युधिछिर उवाच धन्या वयं यदस्माकं स्नेहकारुण्ययन्त्रिता: । असतोडपि गुणानाहु्ब्राह्मणप्रमुखा: प्रजा:,युधिष्ठिरने कहा--हमलोग धन्य हैं; क्योंकि ब्राह्मण आदि प्रजावर्गके लोग हमारे प्रति स्नेह और करुणाके पाशमें बँधकर जो गुण हमारे अंदर नहीं हैं, उन गुणोंको भी हममें बतला रहे हैं

Yudhiṣṭhira berkata: “Sungguh berbahagialah kami, sebab rakyat—dengan para brāhmaṇa di barisan terdepan—terikat oleh kasih dan belas kasih kepada kami. Karena kelembutan hati itu, mereka bahkan menyandangkan kepada kami kebajikan yang sesungguhnya tidak ada pada diri kami.”

Verse 34

तदहं भ्रातृसहित: सर्वान्‌ विज्ञापयामि व: | नान्यथा तद्धि कर्तव्यमस्मत्स्नेहानुकम्पया,भाइयोंसहित मैं आप सब लोगोंसे कुछ निवेदन करता हूँ। आपलोग हमपर स्नेह और कृपा करके उसके पालनसे मुख न मोड़ें

Karena itu, bersama saudara-saudaraku, aku menyampaikan permohonan ini dengan hormat kepada kalian semua: demi kasih dan belas kasih kepada kami, laksanakanlah tepat sebagaimana dinyatakan; tidak patut dilakukan dengan cara lain.

Verse 35

भीष्म: पितामहो राजा विदुरो जननी च मे । सुहज्जनश्नच प्रायो मे नगरे नागसाह्लये,(आपलोगोंको मालूम होना चाहिये कि) हमारे पितामह भीष्म, राजा धृतराष्ट्र, विदुरजी, मेरी माता तथा प्राय: अन्य सगे-सम्बन्धी भी हस्तिनापुरमें ही हैं

Yudhiṣṭhira berkata: “Ketahuilah bahwa kakek agung kita Bhīṣma, Raja Dhṛtarāṣṭra, Vidura, ibuku, dan hampir semua sahabat serta kerabat dekatku berada di kota bernama Nāgasāhvaya (Hastināpura).”

Verse 36

ते त्वस्मद्धितकामार्थ पालनीया: प्रयत्नत: । युष्माभि: सहिता: सर्वे शोकसंतापविह्वला:,वे सब लोग आपलोगोंके साथ ही शोक और संतापसे व्याकुल हैं, अतः आपलोग हमारे हितकी इच्छा रखकर उन सबका यत्नपूर्वक पालन करें

Karena itu, demi kesejahteraan kami, kalian harus menjaga dan merawat mereka dengan sungguh-sungguh. Mereka semua, bersama kalian, diliputi duka dan kepedihan yang membakar.

Verse 37

निवर्ततागता दूरं समागमनशापिता: । स्वजने न्यासभूते मे कार्या स्नेहान्विता मति:,अच्छा, अब लौट जाइये, आपलोग बहुत दूर चले आये हैं। मैं अपनी शपथ दिलाकर अनुरोध करता हूँ कि आपलोग मेरे साथ न चलें। मेरे स्‍्व्जन आपके पास धरोहरके रूपमें हैं। उनके प्रति आपलोगोंके हृदयमें स्नेहभाव रहना चाहिये

Yudhiṣṭhira berkata: “Kembalilah; kalian telah datang sangat jauh. Dengan ikrar yang sungguh, aku memohon—jangan lagi menyertaiku. Kaum kerabatku tinggal bersama kalian sebagai titipan; maka biarlah hati kalian tetap dipenuhi kasih sayang kepada mereka.”

Verse 38

एतद्धि मम कार्याणां परम॑ हृदि संस्थितम्‌ । कृता तेन तु तुष्टिमें सत्कारश्न भविष्यति,मेरे हृदयमें स्थित सब कार्योमें यही कार्य सबसे उत्तम है, आपके द्वारा इसके किये जानेपर मुझे महान्‌ संतोष प्राप्त होगा और इसीसे मेरा सत्कार भी हो जायगा

Sungguh, di antara segala tugas yang tersimpan di dalam hatiku, inilah yang tertinggi. Jika engkau menunaikannya, aku akan memperoleh kepuasan yang besar—dan melalui hal itu kehormatanku serta penghargaan yang semestinya pun akan terjamin.

Verse 39

वैशम्पायन उवाच तथानुमन्त्रितास्तेन धर्मराजेन ता: प्रजा: । चक्कुरार्तस्वरं घोरं हा राजन्निति संहता:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! धर्मराजके द्वारा इस प्रकार विनयपूर्वक अनुरोध किये जानेपर उन समस्त प्रजाओंने “हा! महाराज!” ऐसा कहकर एक ही साथ भयंकर आर्तनाद किया

Vaiśaṃpāyana berkata: Wahai Janamejaya! Ketika Dharmarāja dengan rendah hati memohon demikian dan memberi izin, seluruh rakyat serentak berkumpul dan melantangkan ratapan yang menggetarkan, “Wahai Raja!”

Verse 40

गुणान्‌ पार्थस्य संस्मृत्य दुःखार्ता: परमातुरा: । अकामा: संन्यवर्तन्त समागम्याथ पाण्डवान्‌,कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरके गुणोंका स्मरण करके प्रजावर्गके लोग दुःखसे पीडित और अत्यन्त आतुर हो गये। उनकी पाण्डवोंके साथ जानेकी इच्छा पूर्ण नहीं हो सकी। वे केवल उनसे मिलकर लौट आये

Mengingat kebajikan Pārtha (Yudhiṣṭhira), rakyat dilanda duka dan menjadi amat gelisah. Mereka ingin menyertai para Pāṇḍava, namun keinginan itu tak terpenuhi; mereka hanya sempat bertemu lalu kembali.

Verse 41

निवत्तेषु तु पौरेषु रथानास्थाय पाण्डवा: | आजममुर्जालह्नवीतीरे प्रमाणाख्यं महावटम्‌,पुरवासियोंके लौट जानेपर पाण्डवगण रथोंपर बैठकर गंगाजीके किनारे प्रमाणकोटि नामक महान्‌ वटके समीप आये

Setelah penduduk kota berbalik pulang, para Pāṇḍava menaiki kereta-kereta mereka dan menuju tepi Jāhnavī (Gaṅgā), lalu tiba di dekat beringin besar yang dikenal sebagai Pramāṇa.

Verse 42

ते तं दिवसशेषेण वर्टं गत्वा तु पाण्डवा: । ऊषुस्तां रजनीं वीरा: संस्पृश्य सलिलं शुचि,संध्या होते-होते उस वटके निकट पहुँचकर शूरवीर पाण्डवोंने पवित्र जलका स्पर्श (आचमन और संध्यावन्दन आदि) करके वह रात वहीं व्यतीत की

Menjelang akhir hari, para Pāṇḍava mencapai beringin itu. Para kesatria menyentuh air yang suci—melakukan penyucian, ācaman, dan pemujaan senja—lalu bermalam di sana.

Verse 43

उदकेनैव तां रात्रिमूषुस्ते दुःखकर्षिता: । अनुजम्मुश्न तत्रैतान्‌ स्नेहात्‌ केचिद्‌ द्विजातय:,दुःखसे पीड़ित हुए वे पाँचों पाण्डुकुमार उस रातमें केवल जल पीकर ही रह गये। कुछ ब्राह्मण-लोग भी इन पाण्डवोंके साथ स्नेहवश वहाँतक चले आये थे

Waiśampāyana berkata: Dilanda duka dan letih karenanya, para Pāṇḍava melewati malam itu dengan bertahan hanya pada air. Karena kasih sayang, beberapa brāhmaṇa dwija pun mengiringi mereka sampai ke tempat itu, enggan meninggalkan mereka sendirian dalam kesusahan.

Verse 44

साग्नयो5नग्नयश्वैव सशिष्यगणबान्धवा: । स तैः परिवृतो राजा शुशुभे ब्रह्म॒वादिभि:,उनमेंसे कुछ साग्नि (अग्निहोत्री) थे और कुछ निरग्नि। उन्होंने अपने शिष्यों तथा भाई- बन्धुओंको भी साथ ले लिया था। वेदोंका स्वाध्याय करनेवाले उन ब्राह्मणोंसे घिरे हुए राजा युधिष्ठिरकी बड़ी शोभा हो रही थी

Di antara para brāhmaṇa itu, sebagian memelihara api suci (sāgni, pelaku agnihotra), sementara sebagian lain hidup tanpa api rumah tangga (anagni). Mereka juga membawa para murid serta sanak-keluarga. Dikelilingi para brahmavādī yang tekun melantunkan dan mengkaji Weda, Raja Yudhiṣṭhira tampak kian bersinar.

Verse 45

तेषां प्रादुष्कृताग्नीनां मुहुर्ते रम्यदारुणे । ब्रह्मघोषपुरस्कार: संजल्प: समजायत,संध्याकालकी नैसर्गिक शोभासे रमणीय तथा राक्षस-पिशाचादिके संचरणका समय होनेसे अत्यन्त भयंकर प्रतीत होनेवाले उस मुहूर्तमें अग्नि प्रजजलित करके वेद-मन्त्रोंके घोषपूर्वक अग्निहोत्र करनेके बाद उन ब्राह्मणोंमें परस्पर संवाद होने लगा

Waiśampāyana berkata: Pada saat senja itu—indah menurut kodratnya namun terasa menggetarkan karena diyakini sebagai waktu berkeliarannya rākṣasa dan piśāca—para brāhmaṇa menyalakan api suci. Setelah menunaikan agnihotra dengan lantunan mantra-mantra Weda yang menggema, timbullah percakapan di antara mereka.

Verse 46

राजानं तु कुरुश्रेष्ठ ते हंसमधुरस्वरा: । आश्वासयन्तो विप्राग्रया: क्षपां सर्वा व्यनोदयन्‌,हंसके समान मधुर स्वरमें बोलनेवाले उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने कुरुकुलरत्न राजा युधिष्ठिरको आश्वासन देते हुए सारी रात उनका मनोरंजन किया

Waiśampāyana berkata: Para brāhmaṇa terkemuka itu, yang suaranya semanis seruan angsa, menenteramkan sang raja—yang terbaik di antara kaum Kuru. Dengan penghiburan mereka, malam itu pun terlewati seluruhnya, dan beratnya duka tersingkir oleh kata-kata lembut.

Verse 126

ऊचुर्विगतसंत्रासा: समागम्य परस्परम्‌ | पाण्डव वनकी ओर गये हैं, यह जानकर हस्तिनापुरके निवासी शोकसे पीडित हो बिना किसी भयके भीष्म, विदुर, द्रोण और कृपाचार्यकी बारंबार निनन्‍्दा करते हुए एक-दूसरेसे मिलकर इस प्रकार कहने लगे

Waiśampāyana berkata: Setelah mengetahui bahwa para Pāṇḍava telah menuju hutan, penduduk Hastināpura diliputi duka. Tanpa gentar mereka berkumpul satu sama lain, dan sambil berulang kali mencela Bhīṣma, Vidura, Droṇa, serta Kṛpācārya, mereka berkata demikian.

Frequently Asked Questions

The dilemma is whether loyal citizens and followers should physically accompany the dispossessed rulers into exile or remain to protect vulnerable elders and preserve social stability—balancing devotion with civic responsibility.

Character is shaped by association: proximity to unethical actors normalizes decline, while companionship with disciplined and virtuous persons cultivates dharma—an applied moral psychology used here to evaluate political leadership.

No explicit phalaśruti is given; the chapter’s meta-function is transitional and pedagogical, establishing exile as an ethical laboratory and positioning saṃsarga and rājadharma as interpretive keys for the parva.