
Sukta 5.34
Atri (Ātreya tradition; Mandala 5 is predominantly attributed to the Atris)
Trishtubh (likely; RV 5.34 is predominantly Triṣṭubh)
RV 5.34 is an Atri hymn that summons Indra through the Soma-pressing, praising him as ajātaśatru (“unborn to hostility”) and brahma-vāhas (“bearer of the Word”). It contrasts the disciplined, offering-making pressers with the non-pressers, and presents Indra as the force who sets the cosmic order in motion, subdues obstructing powers, and drives the sacrifice forward into victory and increase.
Mantra 1
अजातशत्रुमजरा स्वर्वत्यनु स्वधामिता दस्ममीयते । सुनोतन पचत ब्रह्मवाहसे पुरुष्टुताय प्रतरं दधातन ॥
तू अपने धरम के साथ चल। तू कभी भी बूढ़ा नहीं होगा, स्वर्ग की रोशनी तेरे पास है। तू उस शक्ति के पास जा जो किसी से दुश्मनी नहीं करती। सोम रस तैय्यार कर, भगवान के लिए पूजा की तैय्यारी कर। इससे मंत्र और भी तेज़ हो जाएगा।
Mantra 2
आ यः सोमेन जठरमपिप्रतामन्दत मघवा मध्वो अन्धसः । यदीं मृगाय हन्तवे महावधः सहस्रभृष्टिमुशना वधं यमत् ॥
जिसने सोम पी के अपना पेट भरा, वो खुश हो गया। वो बहुत देने वाला है, उसने मध जैसा रस पिया। जब उसने उस जंगली जानवर को मारना चाहा जो रास्ता रोकता था, तब ऋषि उशना ने उसके लिए हज़ार धार वाला हथियार बनाया। खुशी भी एक हथियार बन जाती है अंदर की बुरी चीज़ों को मारने के लिए।
Mantra 4
यस्यावधीत्पितरं यस्य मातरं यस्य शक्रो भ्रातरं नात ईषते । वेतीद्वस्य प्रयता यतंकरो न किल्बिषादीषते वस्व आकरः ॥
जिसने बाप और माँ को गिरा दिया, जिसके सामने भाई भी टक्कर नहीं ले सकता, वो जानता है कि आगे कैसे चलना है। जो अपनी जान को कंट्रोल में रखता है और मेहनत करता है, उससे कोई दोष नहीं लगता। वो खज़ाना बन जाता है। इंद्र की यह ताकत है, भागने वाली इच्छा को रोक के सही दिशा में लगा देना।
Mantra 5
न पञ्चभिर्दशभिर्वष्ट्यारभं नासुन्वता सचते पुष्यता चन । जिनाति वेदमुया हन्ति वा धुनिरा देवयुं भजति गोमति व्रजे ॥
वो पाँच या दस चीज़ों से खुश नहीं होता। वो उन लोगों के साथ नहीं चलता जो मेहनत से भागते हैं, चाहे वो बाहर से कितने भी अमीर दिखें। ज्ञान से जीता है या ज़ोर से मारता है। जो भगवान को ढूंढता है, उसको वो चमकता हुआ माल देता है। इंद्र अंदर से सच्चा काम करने वाले को चुनता है, जो सिर्फ दिखावा करते हैं उनको नहीं।
Mantra 6
वित्वक्षणः समृतौ चक्रमासजोऽसुन्वतो विषुणः सुन्वतो वृधः । इन्द्रो विश्वस्य दमिता विभीषणो यथावशं नयति दासमार्यः ॥
जिसने मौसम के साथ साथ चक्कर चलाया, वो अलग है उनसे जो मेहनत नहीं करते, और उनको बढ़ाता है जो करते हैं। इंद्र सबको कंट्रोल में रखता है, उसकी ताकत का डर है। वो अंदर की बुरी आदत को जैसे चाहता है वैसे ले चलता है, और अच्छी ताकत आगे बढ़ती है। यह दिव्य बल समय को संभालता है और नीचे वाली आदतों को रोक के ऊपर ले आता है।
Mantra 7
समीं पणेरजति भोजनं मुषे वि दाशुषे भजति सूनरं वसु । दुर्गे चन ध्रियते विश्व आ पुरु जनो यो अस्य तविषीमचुक्रुधत् ॥
वो कंजूस से छुपा के रखा हुआ माल छीन के लाता है, ढूंढने वाले के लिए। जो देता है, उसको वो अच्छा माल बाँट देता है। मुश्किल रास्ते में भी सब लोग सहारे रहते हैं, बस जो उसकी ताकत से गुस्सा नहीं करता। यह दिव्य बल चोरी हुआ सुख वापस लाता है और उसे उसको देता है जो भगवान को समर्पित करता है।
Mantra 8
सं यज्जनौ सुधनौ विश्वशर्धसाववेदिन्द्रो मघवा गोषु शुभ्रिषु । युजं ह्यन्यमकृत प्रवेपन्युदीं गव्यं सृजते सत्वभिर्धुनिः ॥
जब इंद्र ने दो अच्छे लोगों को देखा, दोनों के पास खज़ाना था, चमकते हुए माल के बीच, तब उसने दोनों को जोड़ दिया। उसने एक को दूसरे का साथी बना दिया। वो हिला देने वाली ताकत अपने बल से ऊपर की तरफ चमकता माल निकालती है। वो बंटी हुई ताकत को जोड़ता है और ज्ञान की किरण को सामने लाता है।
Mantra 9
सहस्रसामाग्निवेशिं गृणीषे शत्रिमग्न उपमां केतुमर्यः । तस्मा आपः संयतः पीपयन्त तस्मिन्क्षत्रममवत्त्वेषमस्तु ॥
मैं उस अग्नि की तारीफ करता हूँ जो हज़ारों लोगों की आवाज़ लेकर आता है। वो दुश्मनों को हराता है और सच्चा रास्ता ढूँढने वाले के लिए सबसे बड़ा निशानी है। उसके लिए पानी भर के उठो, पूरी तरह से। उसमें वो ताकत जगी रहे जो राज करती है और चमकती है। ऐसे ही आग इरादा बन जाती है इंसान के अंदर की ताकत की निशानी, और ज़िन्दगी के पानी से उसे ताकत मिलती है।
A direct ritual summons: the community is urged to press and prepare offerings for Indra, praised as ageless, radiant, and free from innate hostility (ajātaśatru).
Indra’s responsiveness to Soma and mantra is expanded into a wider vision of his governance—he strengthens the pressers, separates them from the non-pressers, and establishes forward movement through ordered time and force.
Indra appears as the universal tamer and formidable ruler who leads the lower, servile nature according to his will, making the sacrifice an instrument of mastery and ascent.
The hymn settles into assurance: right offering and right word bring increase, protection, and sovereign vigor (kṣatra/ojas) to the worshipper under Indra’s victorious guidance.
ajātaśatrum … brahmavāhase
asunvato viṣuṇaḥ sunvato vṛdhaḥ
सं यज्जनौ सुधनौ विश्वशर्धसाववेदिन्द्रो मघवा गोषु शुभ्रिषु । युजं ह्यन्यमकृत प्रवेपन्युदीं गव्यं सृजते सत्वभिर्धुनिः ॥It is a Soma-ritual hymn calling Indra to the offering, praising him as the power that turns mantra and sacrifice into victory, strength, and right order.
Because the hymn ties spiritual and social success to disciplined ritual effort: those who press and offer are strengthened, while neglect of the offering represents inertia or refusal of sacred order.
It presents Indra as the bearer and carrier of brahman—i.e., the inspired Word/mantra—so the hymn suggests that true speech and right offering become effective power through him.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
A free sign-in with Google or Apple keeps your chat saved across web and the app.