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Sukta 5.33
Atri (Ātreya)
Indra
Triṣṭubh (probable)
This hymn of Atri praises Indra’s unsurpassed strength and his battle-winning aid, asking him to awaken “good mind” (sumati) and bring victorious power to the worshippers. It recalls Indra’s serpent-crushing might and his gracious bestowal of wealth, framing prosperity as a divinely guided “in-gathering,” like cows entering a secure pen.
Mantra 1
महि महे तवसे दीध्ये नॄनिन्द्रायेत्था तवसे अतव्यान् । यो अस्मै सुमतिं वाजसातौ स्तुतो जने समर्यश्चिकेत ॥
मैं बड़ा स्तोत्र गाता हूँ बड़ी ताकत के लिए, इंद्र के लिए। उसकी ताकत किसी से कम नहीं। जो लोग उसकी बड़ाई करते हैं, वो धन जीत में अच्छी सोच पाते हैं। वो जंग में लड़ने वाला सबसे पहचाना जाता है।
Mantra 2
स त्वं न इन्द्र धियसानो अर्कैर्हरीणां वृषन्योक्त्रमश्रेः । या इत्था मघवन्ननु जोषं वक्षो अभि प्रार्यः सक्षि जनान् ॥
इंद्र, हमारी प्रार्थना सुन के तुम अपनी ताकत को तैयार करते हो। तुम अपने दो घोड़ों को गाड़ी में जोड़ते हो। फिर तुम हम सबको अपने साथ ले चलते हो। तुम लोगों को जीत तक पहुँचाते हो।
Mantra 3
न ते त इन्द्राभ्यस्मदृष्वायुक्तासो अब्रह्मता यदसन् । तिष्ठा रथमधि तं वज्रहस्ता रश्मिं देव यमसे स्वश्वः ॥
इंद्र, हमारी गलतियाँ तुम्हे दूर नहीं ले जाती। तुम अपनी रथ पे खड़े हो, हाथ में वज्र लिए। तुम अपने घोड़ों की लगाम पकड़ते हो और सही दिशा में चलते हो।
Mantra 4
पुरू यत्त इन्द्र सन्त्युक्था गवे चकर्थोर्वरासु युध्यन् । ततक्षे सूर्याय चिदोकसि स्वे वृषा समत्सु दासस्य नाम चित् ॥
इंद्र, लोग तुम्हारे लिए बहुत गाते हैं। तुमने अंधेरा दूर करके रोशनी लाए हो। तुमने सूर्य के लिए जगह बनाई। तुमने दुश्मन का नाम मिटा दिया।
Mantra 5
वयं ते त इन्द्र ये च नरः शर्धो जज्ञाना याताश्च रथाः । आस्माञ्जगम्यादहिशुष्म सत्वा भगो न हव्यः प्रभृथेषु चारुः ॥
इंद्र, हम और तुम्हारे साथी मिलकर तैयार हैं। तुम्हारी शक्ति हम तक पहुँचे। तुम भगवान की तरह हमारे ऊपर मेहरबानी करो। तुम हमें अपना आशीर्वाद दो।
Mantra 6
पपृक्षेण्यमिन्द्र त्वे ह्योजो नृम्णानि च नृतमानो अमर्तः । स न एनीं वसवानो रयिं दाः प्रार्यः स्तुषे तुविमघस्य दानम् ॥
इंद्र, तुम्हारी ताकत सबसे बड़ी है। तुम इंसान को सही रास्ता दिखाते हो। तुम अमर हो। अब हमें धन और सुख दो। मैं तुम्हारी देन की तारीफ करता हूँ।
Mantra 8
उत त्ये मा पौरुकुत्स्यस्य सूरेस्त्रसदस्योर्हिरणिनो रराणाः । वहन्तु मा दश श्येतासो अस्य गैरिक्षितस्य क्रतुभिर्नु सश्चे ॥
त्रसदस्यु के सोना जैसी शक्तियाँ मुझे ले चलें। वो पुरुकुत्स के वंश से आते हैं, बहुत बलवान हैं। दस सफेद घोड़े मेरे लिए आएँ। यह पहाड़ पर रहने वाला राजा अपनी इच्छा से मेरे साथ हो।
Mantra 9
उत त्ये मा मारुताश्वस्य शोणाः क्रत्वामघासो विदथस्य रातौ । सहस्रा मे च्यवतानो ददान आनूकमर्यो वपुषे नार्चत् ॥
मरुताश्व के लाल घोड़े मुझे ले चलें। वो सबसे मिलके बात करने के लिए तैय्यार हैं। च्यवतान ने मुझे हज़ार चीज़ें दी हैं। वो आर्य लोगों के आगे चमकता है, जैसे कोई गाना गाया हो।
Mantra 10
उत त्ये मा ध्वन्यस्य जुष्टा लक्ष्मण्यस्य सुरुचो यतानाः । मह्ना रायः संवरणस्य ऋषेर्व्रजं न गावः प्रयता अपि ग्मन् ॥
ध्वनि और लक्ष्मण्य के पास चमकते हुए लोग मुझे ले चलें। वो अच्छी रोशनी लेकर आगे बढ़ते हैं। संवरण ऋषि के पास इतना धन आया, जैसे गाय अपने बाड़े में जाती है। वो सब तैय्यार थी, सीधा अपनी जगह पहुँच गई।
It asks Indra for victorious strength, protection that crushes obstacles, and generous prosperity—along with sumati, a clear and favorable mind for success.
In Vedic poetry the ‘serpent’ (ahi) often represents an obstructing force. Calling Indra ahiśuṣman means asking him to break what blocks progress—outer threats and inner resistance.
It is a metaphor for wealth and benefits arriving in an orderly, secure way—gathered, protected, and settled where they truly belong, not scattered or lost.
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